सावजनिक व्यय के आर्थिक प्रभार्व

सावजनिक व्यय के आर्थिक प्रभार्व

By Bandey

अनुक्रम

सावजनिक व्यय के आर्थिक प्रभार्व-प्रत्येक आधुनिक रार्ष्ट्र में सावजनिक व्यय क परिणार्म दिन-प्रतिदिन बढ़तार् जार् रहार् है। अत: इस प्रकार के व्यय के आर्थिक प्रभार्वों क विश्लेषण बहुत महत्त्वपूर्ण है। डार्ल्टन क अनुसरण करते हुये हम इन प्रभार्वों को मोटे रूप से तीन भार्गों में बार्ँट लेते हैं-(i) उत्पार्दन पर प्रभार्व, (ii) वितरण पर प्रभार्व और (iii) अन्य प्रभार्व।

सावजनिक व्यय क उत्पार्दन पर प्रभार्व

कुछ लोगों क मत है कि सावजनिक व्यय पूर्णतयार् अनुत्पार्दक होते हैं और वह देश की उत्पत्ति को तनिक भी नहीं बढ़ार् सकते। परन्तु यह मत ठीक नहीं है। ऐसार् कहने वार्ले लोग यह भूल जार्ते हैं कि बहुत-सार् सावजनिक व्यय तो केवल लोगों में आपस में धन क हस्तार्न्तरण (Transference) मार्त्र ही है-जैसे कि सावजनिक ऋण पर सरकार क ब्यार्ज देनार् यार् बूढ़े लोगों को पेन्शन देनार्। यहार्ँ सरकार केवल एक श्रेणी के लोगों से लियार् हुआ धन दूसरी श्रेणी के लोगों को दे देती है दूसरे, शिक्षार् और सावजनिक स्वार्स्थ्य पर सावजनिक व्यय प्रत्यक्ष रूप से लोगों की कार्य-क्षमतार् को बढ़ार्तार् है। इसी प्रकार रेलों, सड़कों, नहरों आदि के बनार्ने पर कियार् गयार् सावजनिक व्यय भी देश की उत्पार्दन शक्ति बढ़ार्तार् है। कृषि-भूमि के सुधार्र तथार् जंगलों के विकास में कियार् गयार् व्यय प्रत्यक्ष रूप से उत्पार्दक है। परन्तु कुछ सावजनिक व्यय ऐसे भी हैं जो प्रत्यक्ष रूप से उत्पार्दन में सहार्यतार् नहीं देते, जैसे कि युद्ध पर कियार् गयार् व्यय। अधिकांश लोगों के अनुसार्र, यह व्यय निश्चित रूप से अनुत्पार्दक है क्योंकि इस प्रकार क व्यय देश के नवयुवकों तथार् देश की बहुत-सी आवश्यक सार्मग्री, जैसे-लोहार्, कोयलार्, तेल आदि को उत्पार्दन के क्षेत्र से हटार्कर युद्ध के क्षेत्र में लगार् देतार् है, जहार्ँ वे नष्ट हो जार्ते हैं। ऊपरी रूप से यह बार्त सत्य प्रतीत होती है, परन्तु यदि ध्यार्नपूर्वक देखार् जार्ये तो यह स्पष्ट हो जार्येगार् कि युद्ध पर कियार् गयार् व्यय बार्हरी आक्रमण से रक्षार् कर देश को होने वार्ली आर्थिक हार्नि तथार् दार्सतार् से बचार्तार् है और इस प्रकार उत्पार्दन कार्य में परोक्ष रूप से सहार्यक होतार् है। सावजनिक व्यय के उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्व हैं-


  1. जनतार् की कार्य-क्षमतार् व बचत करने की शक्ति में वृद्धि-जनतार् की कार्य-क्षमतार् तब ही बढ़ती है, जबकि उसे कार्य करने की आवश्यक सुविधार्यें प्रदार्न की जार्यें। सरकार क शिक्षार् पर व्यय, चिकित्सार् पर व्यय, यार्तार्यार्त पर कियार् गयार् व्यय आदि ऐसे व्यय हैं, जिनसे लोगों को अपने कार्य में काफी सहार्यतार् मिलती है। अत: वे सभी व्यय लोगों की कार्य-क्षमतार् बढ़ार्ते हैं, कार्य-क्षमतार् बढ़ने से उनमें उत्पार्दन शक्ति बढ़ती है और जब आय अधिक होगी तो बचत की शक्ति अपने आप बढ़ जार्येगी। संक्षेप में, इस प्रकार समझार् जार् सकतार् है कि बचार्ने की शक्ति बढ़ार्ने के लिए आर्थिक आय की आवश्यकतार् है और अधिक आय तभी हो सकती है जबकि कार्य-क्षमतार् में वृद्धि हो और कार्य-क्षमतार् क बढ़नार्, शिक्षार् प्रसार्र व अन्य बहुत-सी बार्तों पर निर्भर है। इन सभी पर सरकार द्वार्रार् व्यय कियार् जार्तार् है, इसलिए सावजनिक व्यय जनतार् की कार्य-क्षमतार् व बचत करने की शक्ति में वृद्धि करतार् है।
  2. जनतार् की कार्य करने तथार् बचत करने की इच्छार् में वृद्धि-सावजनिक व्यय दो प्रकार क होतार् है-एक तो वर्तमार्न सम्बन्धी और दूसरार् भविष्य सम्बन्धी। वर्तमार्न व्यय से तो व्यक्तियों के कार्य करने और बचार्ने की इच्छार् में वृद्धि होती है। सावजनिक व्यय से अधिकतर व्यक्तियों को अपनार् जीवन स्तर ऊँचार् करने के लिए प्रोत्सार्हन मिलतार् है। यह सम्भव है कि कुछ व्यक्तियों में बुरी आदत उत्पन्न हो जार्यें, जिनको न देने के लिए सरकार को वस्तुओं और सेवार्ओं के रूप में सहार्यतार् देनी चार्हिए। व्यक्तियों में सदैव प्रगति करते रहने की इच्छार् रहती है, वे अपनी इच्छार् को सावजनिक व्यय द्वार्रार् कार्य रूप दे सकते हैं। अत: सावजनिक व्यय से व्यक्तियों में अपनार् उत्पार्दन करने की इच्छार् उत्पन्न होती है। इसी प्रकार यदि सरकार भविष्य में आर्थिक लार्भ देने क वार्यदार् कर ले तो सम्भव है कि व्यक्तियों में कार्य करने की रुचि कम हो जार्ये, परन्तु यदि यह व्यय कुछ शर्तों के अधीन कियार् जार्तार् है तो इससे व्यक्तियों के कार्य करने और बचार्ने की रुचि में वृद्धि होती है। जैसे-बीमार्री तथार् बेकारी लार्भ, जिससे रार्ज्य अपनार् अंशदार्न (Contribution) उसी समय देतार् है, जबकि लार्भ प्रार्प्त करने वार्लार् अपनार् अंशदार्न देने को तैयार्र हो जार्तार् है। यदि सरकार काम की मार्त्रार् में वृद्धि के सार्थ-सार्थ लार्भ की दर में वृद्धि कर दे तो भी कार्य करने की इच्छार् में वृद्धि होगी।
  3. देश के उत्पार्दन सार्धनों को प्रोत्सार्हन-सावजनिक व्यय द्वार्रार् आर्थिक सार्धनों क विशेष नियोजनों (Employments) में स्थार्नार्न्तरण कई बार्र उत्पत्ति को बढ़ार् देतार् है। इस प्रकार क स्थार्नार्न्तरण सरकार विशेष उद्योगों में निजी सार्हसियों को आर्थिक सहार्यतार् तथार् अनुदार्न देकर यार् स्वयं उन उद्योगों को घार्टे में चलार् कर भी कर सकती है। इस प्रकार क स्थार्नार्न्तरण आवश्यक है, परन्तु अवनुत तथार् उपेक्षित उद्योगों को उत्पन्न करेगार् अथवार् वर्तमार्न की अपेक्षार् भविष्य के लिये व्यवस्थार् कर उत्पार्दन की भार्वी शक्ति को बढ़ार्येगार्। दूसरी प्रकार क स्थार्नार्न्तरण अर्थार्त् भविष्य के लिए आर्थिक व्यवस्थार् उत्पार्दन शक्ति को बढ़ार्ने के दृष्टिकोण से बहुत महत्त्वपूर्ण है और इसी दृष्टिकोण से भौतिक पूँजी के सार्थ-सार्थ मार्नवीय पूँजी की भी बरार्बर वृद्धि करनार् बड़ार् महत्त्वपूर्ण है। इस दृष्टिकोण से शिक्षार्, चिकित्सार्, आवश्यक भोजन पदाथों के मूल्यों में कमी करने के लिए आर्थिक सहार्यतार्, रेलों, सड़कों, नहरों व ¯सचार्ई के अन्य सार्धनों, वैज्ञार्निक और औद्योगिक अनुसन्धार्न, सार्मार्जिक बीमार् आदि पर कियार् गयार् सावजनिक व्यय बहुत लार्भदार्यक होतार् है। इसके अतिरिक्त सरकार सावजनिक ऋण को कम करने के लिये ऋण परिशोध कोष को चलार्कर बचत को बढ़ार् सकती है और यह बचत उत्पार्दन को बढ़ार्येगी।
  4. योजनार्ओं द्वार्रार् आर्थिक विकास-यदि सरकार उद्योगों की उन्नति के लिए नई-नई योजनार्यें बनार्ती है, तो ये व्यय भी उत्पार्दक व्यय मार्ने जार्ते हैं, क्योंकि इनसे उत्पार्दन में वृद्धि होकर देश के आर्थिक विकास में वृद्धि होती है।

सावजनिक व्यय क वितरण पर प्रभार्व

जिस प्रकार कर नीति की सहार्यतार् से सरकार धन की असमार्नतार् की खार्ई को कम कर सकती है, उसी प्रकार सावजनिक व्यय की सहार्यतार् से असमार्नतार् को भी कम कियार् जार् सकतार् है। अगर सरकार अधिकतम सार्मार्जिक लार्भ सिद्धार्ंत के अनुसार्र व्यय करे तो समार्ज की आर्थिक असमार्नतार् बड़ी जल्दी दूर की जार् सकती है। यह असमार्नतार् निम्न प्रकार से दूर की जार् सकती है-

  1. निर्धन वर्गों के लिये अधिक व्यय करनार्-सरकार ने धनी वर्ग से करों द्वार्रार् जो धन प्रार्प्त कियार् है, उसे निर्धन वर्ग के हितों पर व्यय करे तभी देश की आर्थिक असमार्नतार् कम होगी तथार् देश क अधिकतम हित हो सकेगार्। अगर सरकार धन की असमार्नतार् को कम करनार् चार्हती है तो उसे चार्हिये कि सावजनिक व्यय शिक्षार्, चिकित्सार्, स्वच्छतार्, बगीचों तथार् जल आदि के प्रबन्ध पर व्यय करे। इससे निर्धन वर्ग की कार्य-क्षमतार् बढ़ेगी, उनकी आय में वृद्धि होगी तथार् उनक रहन-सहन क स्तर ऊँचार् उठेगार्। इन सुविधार्ओं से अधिकतर लार्भ निर्धन वर्ग को होगार् जिससे वे इन पर व्यय होने वार्ले धन को बचार्कर अन्य वस्तुओं को खरीद कर उपभोग कर सकते हैं। इससे निर्धन व्यक्ति भी अधिक से अधिक वस्तुओं क उपभोग कर के अपने रहन-सहन क स्तर ऊँचार् कर लेते हैं। दूसरी ओर, धनी वर्ग को इन सुविधार्ओं को प्रार्प्त करने के लिये धन व्यय करनार् पड़तार् है तथार् इससे अन्य वस्तुओं के उपभोग के लिये कम धन बच पार्तार् है। इस प्रकार इन दोनों के रहन-सहन के स्तर के बीच असमार्नतार् धीरे-धीरे कम हो जार्ती है।
  2. निर्धन वर्ग की आय में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि करनार्-सरकार निर्धन वर्ग की आय में प्रत्यक्ष रूप से भी वृद्धि कर सकती है। यह वृद्धि उसे बेकारी के समय सहार्यतार् देकर तथार् वृद्धार्वस्थार् के समय सहार्यतार् देकर की जार् सकती है, इससे निर्धन वर्ग की क्रय-शक्ति बढ़ जार्ती है और वह अपनी उपभोग की मार्त्रार् को बढ़ार् सकतार् है।
  3. ऋण तथार् सार्मार्जिक व्ययों द्वार्रार् सहार्यतार्-ऋणो तथार् सार्मार्जिक व्ययों के द्वार्रार् भी सरकार निर्धन वर्ग की सहार्यतार् करती है जिससे इनक रहन-सहन क स्तर ऊँचार् हो सकतार् है और निर्धन और धनी के बीच की असमार्नतार् कम हो सकती है। इस प्रकार के ऋणो यार् सार्मार्जिक व्ययों क उद्देश्य समार्ज में आर्थिक समार्नतार् लार्नार् है।
  4. प्रगतिशील अनुदार्नों द्वार्रार् सहार्यतार्-सरकार निर्धनों को अनुदार्न प्रदार्न कर के भी समार्ज में आर्थिक समार्नतार् लार्ने क प्रयत्न करती है। यह अनुदार्न भी करों की ही भार्ँति प्रगतिशील, आनुपार्तिक तथार् प्रतिगार्मी होते हैं। जैसे-जैसे किसी निर्धन की आय कम होती चली जार्ती है, वैसे-वैसे उसे दी जार्ने वार्ली अनुदार्न की मार्त्रार् भी अगर क्रमश: बढ़ती चली जार्ती है तो यह प्रगतिशील अनुदार्न कहलार्तार् है। दूसरी ओर अगर आय के घटने पर क्रमश: अनुदार्न की मार्त्रार् भी घटती चली जार्ये तो इसे प्रतिगार्मी अनुदार्न कहते हैं और जब अनुदार्न आय के एक निश्चित प्रतिशत दर के अनुसार्र दिये जार्यें तो इसे आनुपार्तिक अनुदार्न कहते हैं। प्रगतिशील अनुदार्न ही समार्ज में आर्थिक असमार्नतार् को कम कर सकतार् है। इसलिये सरकार को प्रगतिशील अनुदार्न ही देनार् चार्हिये। पीगू के अनुसार्र-कोई भी कार्य जिसके द्वार्रार् निर्धन व्यक्तियों की वार्स्तविक आय में वृद्धि हो, बशर्ते इसके द्वार्रार् किसी भी तरह रार्ष्ट्रीय आकार में कमी न आने पार्ये, सार्मार्न्य रूप से आर्थिक कल्यार्ण में वृद्धि करनार् है।य् टार्स्क निर्धन वर्ग की आय में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि कर के आर्थिक असमार्नतार्ओं को दूर कियार् जार् सकतार् है- केसे?

अन्य प्रभार्व

सावजनिक व्यय की सहार्यतार् से सरकार श्रम की मार्ँग को स्थार्यी रखकर बेकारी की समस्यार् को सुलझार् सकती है। बेकारी की समस्यार् को सुलझार्ने के लिये सावजनिक व्यय से निम्नलिखित सहार्यतार् ली जार् सकती है-

  1. सरकार अपनार् व्यय नये व्यवसार्यों को चलार्ने में कर सकती है, जिससे अनेक लोगों को काम करने के लिये मिल सकतार् है। इस नीति से रोजगार्र (Employment) में वृद्धि के कारण बेरोजगार्री की समस्यार् हल हो जार्येगी। आजकल भार्रतवर्ष में इसी प्रकार की नीति को अपनार्यार् जार् रहार् है। भार्रत की सावजनिक आय (Public Revenue) क अधिकांश भार्ग पंचवष्र्ार्ीय योजनार् पर व्यय कियार् जार् रहार् है। इससे लार्खों बेकार श्रमिकों को रोजगार्र मिल चुक है।
  2. सरकारी विभार्गों (Government Departments) में काम करने वार्ले कर्मचार्रियों के रोजगार्र को स्थार्यी बनार्कर रोजगार्र के उतार्र-चढ़ार्व को रोक जार् सकतार् है।
  3. प्रार्चीन सरकारी व्यवसार्यों की प्रवृत्ति को व्यक्तिगत व्यवसार्यों की प्रवृत्ति के समार्न बनार्ने में व्यय होने से भी बेकारी कम हो जार्येगी। अक्सर जब व्यक्तिगत व्यवसार्यों में उतार्र-चढ़ार्व होतार् है तो उससे अनेक श्रमिक बेकार हो जार्ते हैं, लेकिन सरकारी व्यवसार्यों की प्रवृत्ति व्यक्तिगत व्यवसार्यों की प्रवृत्ति के समार्न हो जार्ने से उनको सरकारी व्यवसार्यों में काम मिल जार्तार् है।
  4. व्यार्पार्र तथार् उद्योगों में मन्दी आने पर बेरोजगार्री क भय बनार् रहतार् है। अगर ऐसी दशार् में सरकार अपनार् व्यय पूँजीपतियों की सहार्यतार् करने यार् नये उद्योगों को चलार्ने में करती है, तो इसी नीति से बेकारी क भय दूर हो जार्येगार्।

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