सावजनिक रार्जस्व क अर्थ, महत्व, एवं स्रोत

सावजनिक रार्जस्व क अर्थ, महत्व, एवं स्रोत

By Bandey

अनुक्रम

आज के आर्थिक नियोजन के युग में उत्पत्ति क जो महत्व अर्थशार्स्त्र में है, वही महत्व सावजनिक रार्जस्व क लोक वित्त में है। वर्तमार्न समय में रार्ज्यों के कार्यों में वृद्धि होने के कारण सावजनिक व्यय की रार्शि भी बढ़ती जार् रही है। सावजनिक रार्जस्व के स्रोत में कर वे अनिवाय भुगतार्न हैं जो करदार्तार् द्वार्रार् सरकार के प्रति बिनार् किसी ऐसी आशार् से किये जार्ते हैं कि उसे उन के बदले में कोई प्रत्यक्ष लार्भ प्रार्प्त होगार्।

सावजनिक रार्जस्व क अर्थ तथार् महत्व

जिस प्रकार एक व्यक्ति को अपनी आवश्यकतार् की पूर्ति हेतु आय की आवश्यकतार् होती है, उसी प्रकार सरकार को अपने कार्यों को सफलतार्पूर्वक सम्पन्न करने के लिए आय की आवश्यकतार् होती है। सरकार को प्रार्प्त होने वार्ली सभी प्रकार की आय को सावजनिक आय कहार् जार्तार् है। लोक वित्त के अध्ययन में सरकारी आय को वही स्थार्न प्रार्प्त होतार् है जो कि अर्थशार्स्त्र के अध्ययन में उत्पार्दन (production) के प्रार्प्त होतार् है। जिस प्रकार उपभोग (consumption) की पूर्ति के लिए उत्पार्दन आवश्यक होतार् है, उसी प्रकार सरकारी खर्च की पूर्ति के लिए सरकारी आय आवश्यक होती है।


सरकार को विभिन्न स्रोतों से जो आय प्रार्प्त होती है उसे सरकारी आय यार् सरकारी रार्जस्व कहार् जार्तार् है। किन्तु डार्ल्टन ने सरकारी आय क व्यार्पक तथार् संकुचित, दोनों ही अर्थों में प्रयोग कियार् है। उसने व्यार्पक अर्थ में इसे सरकारी प्रार्प्तियों (public receipts) क नार्म दियार् है और संकुचित अर्थ में सरकारी आय यार् सरकारी रार्जस्व (public revenue) की संज्ञार् दी है। सरकारी रार्जस्व में करों (taxes) सरकारी उद्यमों द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली वस्तुओं व सेवार्ओं की कीमतों, फीस तथार् जुर्मार्ने जैसी प्रशार्सनिक क्रियार्ओं की आय तथार् उपहार्रों व अनुदार्नों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। किन्तु सरकारी प्रार्प्तियों में सरकार की उन सभी आमदनियों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है जो कि किसी भी निश्चित अवधि में उसे प्रार्प्त होती हैं। अन्य शब्दों में, सरकारी प्रार्प्तियार्ँ (public receipts) = सरकारी रार्जस्व (public revenue)  अन्य सभी स्रोतों की आय जैसे कि व्यक्तियों, बैंकों यार् केन्द्रीय बैंक से लियार् जार्ने वार्लार् उधार्र तथार् नई पत्र-मुद्रार् जार्री करनार्।

आज के आर्थिक नियोजन के युग में उत्पत्ति क जो महत्त्व अर्थशार्स्त्र में है, वही महत्त्व सावजनिक रार्जस्व क लोक वित्त में है। वर्तमार्न समय में रार्ज्यों के कार्यों में वृद्धि होने के कारण सावजनिक व्यय की रार्शि भी बढ़ती जार् रही है। इस बढ़ते हुए व्यय की पूर्ति हेतु सावजनिक आय में वृद्धि करनार् आवश्यक हो गयार् है। आधुनिक युग में आय सम्बन्धी सार्धनों क उद्देश्य केवल आय प्रार्प्त करनार् ही नहीं है, अपितु एक प्रभार्वकारी रार्जकोषीय यन्त्र के रूप में उत्पार्दन, रोजगार्र, विनियोग एवं अन्य आर्थिक क्रियार्ओं को भी प्रभार्वित करनार् है। प्रत्येक अर्थव्यवस्थार् में सावजनिक व्यय एवं सावजनिक ऋण नीति के सार्थ-सार्थ सावजनिक आय के सम्बन्ध में भी निश्चित नीति क निर्धार्रण कर के वार्ँछित उद्देश्यों की पूर्ति करते हेतु एक शक्तिशार्ली सार्धन की व्यवस्थार् की जार् सकती है। इसलिए वर्तमार्न युग में सावजनिक आय प्रत्येक अर्थव्यवस्थार् के लिए, चार्हे विकसित हो यार् अविकसित, महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई है। सरकार की लोकप्रियतार् एवं सफलतार् सम्पूर्ण सावजनिक आय पर निर्भर करती है। इस प्रकार निजी व्यक्तियों तथार् सरकार, दोनों के लिए सावजनिक आय के तरीकों तथार् उसकी प्रकृति के अध्ययन क व्यार्वहार्रिक महत्त्व अधिक हो गयार् है।

सावजनिक रार्जस्व के स्रोत

अब हम सरकारी आय के विभिन्न स्रोतों यार् रूपों क अध्ययन करेंगे। ये स्रोत हैं-

  1. कर (Taxes),
  2. व्यार्वसार्यिक आय (Commercial Revenues)
  3. प्रशार्सनिक आय (Administrative Revenues),
  4. उपहार्र तथार् अनुदार्न (Gifts and Grants),

कर

कर वे अनिवाय भुगतार्न (compulsory payments) हैं जो करदार्तार् द्वार्रार् सरकार के प्रति बिनार् किसी ऐसी आशार् से किये जार्ते हैं कि उसे उन के बदले में कोई प्रत्यक्ष लार्भ प्रार्प्त होगार्। बेस्टेबिल के अनुसार्र, फ्कर व्यक्ति अथवार् व्यक्तियों के समूह के पार्स विद्यमार्न धन क वह अनिवाय अंशदार्न (compulsory contribution) है जो कि सरकारी कार्यों को सेवार् के बदले में दियार् जार्तार् है। प्रो. सैलिग्मैन (Seligmen) क कहनार् है कि, फ्कर व्यक्ति द्वार्रार् सरकार को दिये जार्ने वार्ले उस अनिवाय अंशदार्न को कहते हैं जो सब के सार्मार्न्य हित के लिए किये जार्ने वार्ले खर्चों के भुगतार्न में अदार् कियार् जार्तार् है और उसके बदले में कोई विशेष लार्भ नहीं दियार् जार्तार्। टॉजिग (taussig) के अनुसार्र, फ्सरकार द्वार्रार् ली जार्ने वार्ली अन्य धनरार्शियों के मुकाबले कर के सम्बन्ध में विशेष बार्त यह है कि इसमें करदार्तार् व सरकारी सत्तार् के बीच प्रत्यक्ष रूप से लेने और देने वार्ली बार्त (quid pro quo) नहीं पार्ई जार्ती है।

कर की विशेषतार्एँ यार् लक्षण

(1) अनिवाय भुगतार्न (Compulsory Contribution)-कर नार्गरिक द्वार्रार् अथवार् निवार्स तथार् सम्पत्ति आदि के कारण से देश की सीमार् में रहने वार्ली प्रजार् द्वार्रार् रार्ज्य को दियार् जार्ने वार्लार् अंशदार्न है और यह अंशदार्न सार्मार्न्य उपयोग (Common use) के लिए ही दियार् जार्तार् है। चूँकि यह एक अनिवाय अंशदार्न है, अत: कोई भी व्यक्ति कर की अदार्यगी से इन्कार नहीं कर सकतार्। उदार्हरण के लिए, कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकतार् कि चूँकि उसे रार्ज्य द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली कुछ सेवार्ओं क लार्भ नहीं मिल रहार् है अथवार् चूँकि उसे वोट देने क अधिकार प्रार्प्त नहीं है, अत: वह कर देने को बार्ध्य नहीं है। अत: कर उस प्रत्येक व्यक्ति को अदार् करनार् पड़तार् है जिस पर कि रार्ज्य द्वार्रार् कर लगार्यार् जार्तार् है भले ही वह वयस्क (Adult) हो यार् अवयस्क (minor) और नार्गरिक हो यार् विदेशी। यही नहीं, यदि कोई व्यक्ति कर देने से इन्कार करे तो उसे दण्ड दियार् जार्तार् है। परन्तु इसके बार्वजूद कर की कुछ सीमार्यें हैं। उदार्हरण के लिए, यदि किसी विशेष पदाथ पर कर लगार्यार् जार्तार् है तो उसे पदाथ क उपयोग न कर के वह कर से बच सकतार् है। मार्न लीजिये कि शरार्ब पर कर लगार्यार् गयार् है तो सरकार इस कर को अदार् करने के लिए किसी व्यक्ति को केवल तभी बार्ध्य कर सकती है। जबकि वह शरार्ब क उपयोग करे।

परन्तु यदि वह शरार्ब नहीं पीतार् है, तो उसे शरार्ब पर लगे कर को अदार् करने के लिए भी बार्ध्य नहीं कियार् कियार् जार् सकतार्। इन सीमार्ओं के अतिरिक्त, कर एक अनिवाय भुगतार्न ही है और इसकी यही विशेषतार् इसको अन्य किस्म की सरकारी आय से पृथव्फ करती है।

(2) व्यक्तिगत दार्यित्व (Personal Obligation)-कर करदार्तार् पर व्यक्तिगत दार्यित्व (Personal Obligation) डार्लतार् है। इसक अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति पर कर लगार् है तो उसक कर्तव्य यार् दार्यित्व है कि उसे अदार् करे और किसी भी स्थिति में उससे बचने की न सोचे। उदार्हरण के लिए, मार्न लीजिये लोगों की आमदनियों पर कर लगार्यार् गयार् है, तो चूँकि लोगों की आय के अनेक स्रोत हो सकते हैं, अत: सम्भव हैं, सरकार को लोगों की आय के सभी स्रोतों क पतार् न हो। इस स्थिति में, यह करदार्तार् क कर्त्तव्य है कि वह अपनी समस्त आय को घोषित करे और कर अदार् करते समय अपनी कुल आय को ही दृष्टिगत रखे।

(3) कर समार्ज के हित के लिए लगार्यार् जार्तार् है (The Tax is imposed for the General and Common Benefit)-करदार्तार्ओं से करों के रूप में जो अंशदार्न प्रार्प्त होतार् है, वह हो सकतार् है कि केवल उन के ही लार्भ के लिए खर्च न कियार् जार्ये। बल्कि सर्व-सार्मार्न्य के हित में खर्च कियार् जार्ये। हो सकतार् है कि कोई व्यक्ति अपनी सभी आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने में समर्थ न हो विशेष रूप से ऐसी आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने में जिस पर कि भार्री मार्त्रार् में खर्च होतार् है, जैसे कि अस्पतार्ल क निर्मार्ण। इस स्थिति में रार्ज्य सभी लोगों के लार्भ के लिए ऐसी सेवार्ओं की व्यवस्थार् करतार् है। अत: इस सार्मार्न्य बोझ को उठार्ने के लिए ऐसे सभी लोगों पर कर लगार् दिये जार्ते हैं जो कि उन्हें अदार् करने में समर्थ होते हैं।

(4) कर और रार्ज्य द्वार्रार् प्रदार्न की गई सेवार्ओं में कोई सम्बन्ध नहीं (No relation between Taxation and State Services)-कर की अदार्यगी, रार्ज्य द्वार्रार् व्यक्ति के लिए की जार्ने वार्ली किसी विशेष सेवार् के भुगतार्न के लिए नहीं की जार्ती और न कर इसलिए अदार् कियार् जार्तार् है कि करदार्तार् को रार्ज्य द्वार्रार् कोई विशिष्ट लार्भ प्रदार्न कियार् गयार् है। इस प्रकार, कर इसलिए नहीं दिये जार्ते क्योंकि कर देने वार्ले व्यक्ति को रार्ज्य से कोई लार्भ प्रार्प्त हुआ है अथवार् रार्ज्य ने उसके लिए कोई सेवार् की है।

परन्तु कर की इस विशेषतार् की भी कुछ सीमार्यें हैं। उदार्हरण के लिए भूमि कर (Land tax) केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वार्रार् अदार् कियार् जार्तार् है जिन के पार्स भूमि होती है अथवार् जो भूमि से लार्भ उठार्ते हैं। इसी प्रकार, मनोरंजन कर (Entertainment tax) केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वार्रार् दियार् जार्तार् है जो मनोरंजन क लार्भ प्रार्प्त करते हैं। इस स्थिति पर प्रकाश डार्लते हुए प्रो. डि माको (De Marco) ने कर की इस विशेषतार् की सीमार्ओं के सम्बन्ध में कहार् कि आधुनिक रार्ज्य में करार्धार्न क कानून परस्पर विनिमय के सम्बन्ध (exchange relationship) की मार्न्यतार् पर आधार्रित है, अर्थार्त् रार्ज्य द्वार्रार् सेवार् की व्यवस्थार् की जार्ती है और उसके बदले में सरकार को कर अदार् कियार् जार्तार् है। अत: डि माको के अनुसार्र, फ्कर प्रत्येक नार्गरिक द्वार्रार् सरकार को दी जार्ने वार्ली वह कीमत है जो कि वह उन सार्मार्न्य सावजनिक सेवार्ओं की लार्गत के अपने उस हिस्से के बदले में अदार् करतार् है जिसे वह उपयोग करतार् है।

परन्तु यहार्ँ यह बार्त ध्यार्न रखने योग्य है कि किसार्नों से भूमि कर के रूप में जो अंशदार्न प्रार्प्त कियार् जार्तार् है, हो सकतार् है कि रार्ज्य द्वार्रार् उसक उपयोग केवल उन्हीं के लार्भ के लिए न कियार् जार्ए, बल्कि सम्पूर्ण समार्ज के ही लार्भ के लिए दियार् जार्ए। इसी प्रकार, मनोरंजन क लार्भ प्रार्प्त करने के बदले में लोगों से सरकार को जो अंशदार्न प्रार्प्त होतार् है, हो सकतार् है कि सरकार द्वार्रार् वह केवल उन्हीं के लार्भ के लिए प्रयोग में न लार्कर सम्पूर्ण समुदार्य के लार्भ के ही प्रयोग में लार्यार् जार्ए। इस प्रकार, व्यक्ति द्वार्रार् कर के रूप में अदार् की जार्ने वार्ली धनरार्शि तथार् सरकारी सेवार् से उसे प्रार्प्त होने वार्ले लार्भ के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है। अत: कर एक अनिवाय अंशदार्न है और यह अंशदार्न सर्व-सार्मार्न्य को प्रदार्न किये जार्ने वार्ले लार्भ के लिए ही होती है तथार् सरकार द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली सेवार् तथार् अदार् किये जार्ने वार्ले कर के बीच परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होतार्। क्यार् आप जार्नते हैं करदार्तार् क कर्त्तव्य है कि वह अपनी समस्त आय को घोषित करे तथार् कर अदार् करते समय अपनी कुल आय को दृष्टिगत रखे।

कर के तत्व

  1. अनिवाय अंशदार्न (Compulsory Contribution)-कर एक अनिवाय अंशदार्न है, यदि कर लगने की कानून द्वार्रार् निर्धार्रित दशार्एँ लार्गू होती हों।
  2. केवल सरकार द्वार्रार् कर लगार्नार् (Taxes are imposed by a government)- केवल सरकार द्वार्रार् ही लगार्ये जार्ते हैं। यदि किसी मन्दिर यार् अन्य संस्थार् के प्रबन्धक किसी क्षेत्र के प्रत्येक परिवार्र के लिए हर वर्ष एक विशिष्ट रकम देनार् अनिवाय कर दें, तो इसे किसी भी स्थिति में कर नहीं कहार् जार् सकतार्।
  3. त्यार्ग क समार्वेश (Involvement of Sacrifice)-कर के भुगतार्न में त्यार्ग की भार्वनार् निहित होती है क्योंकि करदार्तार् समार्ज के सार्मार्न्य हित में ही कर अदार् करतार् है।
  4. समार्ज कल्यार्ण (Social Welfare)-कर सम्पूर्ण समुदार्य के कल्यार्ण के उद्देश्य से लगार्यार् जार्तार् है, अर्थार्त् कर से प्रार्प्त होने वार्ली आय, एक ओर तो, समार्ज के विशेष वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समार्ज के कल्यार्ण के लिए खर्च कर दी जार्ती है और, दूसरी ओर इस खर्च से आय की असमार्नतार्एँ दूर होती हैं।
  5. भुगतार्न के लिए लार्भ शर्त नहीं (The Benefit is not the condition for the Payment)-लार्भ प्रार्प्त होनार् कर की अदार्यगी की कोई अनिवाय शर्त नहीं है। कर इसलिए नहीं अदार् किये जार्ते क्योंकि करदार्तार् सरकारी खर्च से कोई लार्भ प्रार्प्त करते हैं, अपितु इसलिए अदार् किये जार्ते हैं क्योंकि वे अनिवाय होते हैं। सार्थ ही, करदार्तार् को यदि कोई लार्भ मिलतार् भी है तो यह जरूरी नहीं है कि वह अदार् किये गये कर के अनुपार्त में ही हो।
  6. सेवार् लार्गत से कोई सम्बन्ध नहीं (No Relation with the Cost of Service)-सरकारी सेवार् द्वार्रार् व्यक्तियों को जो लार्भ प्रदार्न कियार् जार्तार् है, कर उस लार्भ की लार्गत (cost) को वसूल करने के लिए नहीं लगार्यार् जार्तार्, अर्थार्त् कर क उन सेवार् की लार्गत से कोई सम्बन्ध नहीं होतार् जो कि सरकार व्यक्ति को प्रदार्न करती है। उदार्हरण के लिए, यह हो सकतार् है कि एक गरीब व्यक्ति सरकारी खर्च से लार्भार्न्वित तो सबसे अधिक हो किन्तु करार्धार्न क प्रतिकूल प्रभार्व उस पर सबसे कम पडे़।
  7. आय में से भुगतार्न (The Payment from Income)-कर आय पर भी लगार्ये जार् सकते हैं और पूँजी पर भी। परन्तु उनक भुगतार्न आय में से ही कियार् जार्तार् है।
  8. व्यक्तिगत कर अदार्यगी (Individual Payment)-कर व्यक्ति, सम्पत्ति यार् वस्तु किसी पर भी लगार्ये जार् सकते हैं, परन्तु उनकी अदार्यगी व्यक्तियों द्वार्रार् ही की जार्ती है।
  9. कानूनी वसूली (Legal Collection)-कर एक कानूनी वसूलयार्बी (legal collection) है।

व्यार्वसार्यिक आय

व्यार्वसार्यिक आय वे आमदनियार्ँ हैं जो कि सरकार को अपने द्वार्रार् उत्पार्दित वस्तुओं अथवार् सेवार्ओं की कीमतों के रूप में प्रार्प्त होती हैं। अन्य शब्दों में, उस आय को व्यार्वसार्यिक आय कहार् जार्तार् है जो कि सरकार द्वार्रार् सरकारी उद्यमों (public enterprises) की वस्तुओं व सेवार्ओं को बेचकर प्रार्प्त की जार्ती है। इस आय को कीमतों (Prices) क नार्म दियार् जार्तार् है और वह इसलिए क्योंकि वह सरकार द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली वस्तुओं व सेवार्ओं की कीमतों के रूप में प्रार्प्त होती हैं। व्यार्वसार्यिक आय में डार्क व्यय की अदार्यगियार्ँ, चुँगी, सरकारी सार्ख निगमों द्वार्रार् उधार्र दिये गये धन क ब्यार्ज, सरकारी भण्डार्रों की शरार्ब के लिए अदार् की जार्ने वार्ली कीमतें, सरकार द्वार्रार् वितरित की जार्ने वार्ली बिजली की कीमतें, रेल-सेवार् आदि की अदार्यगियार्ँ सम्मिलित की जार्ती हैं। कभी-कभी सरकार इस्पार्त तथार् खनिज तेल जैसी वस्तुओं के उत्पार्दन से भी आय प्रार्प्त करती है। किन्तु इसके बार्वजूद, संसार्र के अधिकांश देशों में व्यार्वसार्यिक उद्यमों से होने वार्ली बचतों यार् बेशियों (Surpluses) को आय क कोई महत्त्वपूर्ण स्रोत नहीं मार्नार् जार्तार्।

कर तथार् कीमत में अन्तर

कर तथार् कीमत में मुख्य अन्तर निम्न प्रकार हैं-

  1. अदार्यगी क अन्तर-कर तो एक अनिवाय अंशदार्न है जो ऐसे प्रत्येक व्यक्ति द्वार्रार् अदार् कियार् जार्तार् है जिस पर कि वह लगार्यार् जार्तार् है किन्तु कीमत उन व्यक्तियों द्वार्रार् अदार् की जार्ती है, जो सरकार द्वार्रार् उत्पार्दित वस्तुएँ, तथार् सेवार्एँ खरीदते हैं।
  2. लार्भ क अन्तर-कर इस बार्त की कोई गार्रन्टी नहीें देतार् कि उस भुगतार्न के बदले में कोई लार्भ (benefit) भी प्रार्प्त होगार् कि नहीं, और यदि होगार् तो उसकी मार्त्रार् (amount) तथार् प्रकृति (nature) क्यार् होगी, किन्तु कीमतें वस्तुओं तथार् सेवार्ओं के बदले में की जार्ने वार्ली प्रत्यक्ष अदार्यगियार्ँ हैं और उन अदार्यगियों (Payments) की मार्त्रार् खरीदी गई वस्तुओं और सेवार्ओं की मार्त्रार् पर निर्भर होती है। प्रो. पी. ई. टेलर ने इस बार्त को इन शब्दों में व्यक्त कियार् है कि फ्व्यार्वसार्यिक आय को अन्य श्रेणियों की आय से पृथक् करने वार्ली इसकी विशेषतार्एँ हैं : अदार्यगी यार् भुगतार्न के बदले में वस्तु यार् सेवार् की प्रत्यक्ष प्रार्प्ति (direct receipt) तथार् दूसरे, भुगतार्न की धनरार्शि क मोटे तौर पर वस्तु यार् सेवार् की लार्गत (यार् लार्भ) के सार्थ समार्योजन (adjustment)।

यहार्ँ उल्लेखनीय है कि सरकार द्वार्रार् उत्पार्दित वस्तुओं की कीमत और औसत यार् सीमार्न्त उत्पार्दन लार्गत के बीच सदार् ही कोई सार्म्य यार् समार्नतार् की स्थिति बनी रहती हो, ऐसी बार्त नहीं है। यह हो सकतार् है कि सरकारी उद्यमों द्वार्रार् अपनार्ई जार्ने वार्ली सार्मार्न्य सार्मार्जिक नीति (general social policy) और व्यार्वसार्यिक नीति (business policy) के सार्थ टकरार्व उत्पन्न हो जार्ये, जैसी कि डार्क व्यय की दरों अथवार् सुरंग माग के भार्ड़ों के बार्रे में होतार् है कि ये दरें और भार्डे़ कभी भी सेवार् की लार्गत को पूरी नहीं करते। ऐसे उदार्हरणों में, आमतौर पर यह वार्ंछनीय मार्नार् जार्तार् है कि सार्मार्जिक कल्यार्ण के लिए सरकारी सेवार् काफी व्यार्पक रूप से उपलब्ध करार्ई जार्ये, अपेक्षार्कृत उसके कि वस्तु की लार्गत तथार् कीमत यदि बरार्बर होती तो उस स्थिति में उपलब्ध करार्ई जार्नी सम्भव होती। अन्य कुछ ऐसे भी उदार्हरण है कि जिनमें कुल वस्तुओं तथार् सेवार्ओं के वितरण के लिए सरकारी एकाधिकारों (government monopolies) की स्थार्पनार् की जार्ती है, और इसलिए तार्कि एकाधिकारी लार्भ कमार्ये जार् सके। भार्रत में रेल सेवार् तथार् बिजली के वितरण की सेवार्एँ इसके प्रमुख उदार्हरण हैं। फार्ँसीसी तम्बार्कू एकाधिकार (French tobacco monopoly) भी इसी क उदार्हरण है तथार् सरकार द्वार्रार् संचार्लित मद्यशार्लार्एँ भी इसी श्रेणी में आती हैं। इन मार्मलों में यह हो सकतार् है कि इन एकाधिकारों की स्थार्पनार् में सरकार क एकमार्त्र उद्देश्य लार्भ प्रार्प्त करनार् ही न हो, बल्कि अपने द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली वस्तुओं व सेवार्ओं के वितरण पर नियन्त्रण रखनार् भी हो। जैसार् कि टेलर (Taylor) ने कहार् है फ्यह हो सकतार् है कि इस क्षेत्र में नियन्त्रण (control) के उद्देश्य से की जार्ने वार्ली एकाधिकारी कार्यवार्ही भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जितनी कि लार्भ की सम्भार्वनार्एँ। सरकार वस्तुओं तथार् सेवार्ओं के उत्पार्दन तथार् उनकी बिव्रफी के क्षेत्र में अनेक कारणों से प्रविष्ट हो सकती है। कुछ मार्मलों में, यह हो सकतार् है कि प्रार्इवेट सार्हसी ऐसे उद्यमों की स्थार्पनार् करने के इच्छुक ही न हों यार् तो इसलिए क्योंकि उनमें बहुत कम लार्भ होने की आशार् है, अथवार् इसलिए क्योंकि उनसे प्रतिफल यार् लार्भों की प्रार्प्ति बहुत दीर्घकाल के बार्द होने की आशार् है, उदार्हरण के लिए, डार्क-सेवार् तथार् नहरों व बिजली उत्पन्न करने वार्ले बार्ँधों क निर्मार्ण आदि। दूसरे कुछ आवश्यक सेवार्एँ सरकार द्वार्रार् इसलिए भी हार्थ में ली जार् सकती हैं जिससे एकाधिकारी किस्म के प्रार्इवेट संगठनों से उपभोक्तार्ओं के हितों की रक्षार् की जार् सके, जैसे कि नगर परिवहन सेवार् (city transport service) तथार् जल-प्रदार्य सेवार् (water supply service)। तीसरे, कुछ अन्य मार्मलों में, यह मार्नार् जार्तार् है कि अमुक सेवार् प्रार्इवेट व्यक्तियों की तुलनार् में सरकार द्वार्रार् अधिक अच्छी तथार् सस्ती प्रदार्न की जार् सकती है, जैसे कि बिजली क उत्पार्दन तथार् वितरण। चौथे, कुछ ऐसे भी मार्मले हैं जिनमें सरकार उक्त उद्यमों (enterprises) को अपने हार्थ में ले लेती है जो कि अर्थव्यवस्थार् (economy) को लिए मूलभूत महत्त्व के होते हैं। सरकार द्वार्रार् ऐसे उद्यमों से सम्बन्धित वस्तुओं क उत्पार्दन सम्पूर्ण देश के ही हित में मार्नार् जार्तार् है। लोहार् व इस्पार्त, भार्री विद्युत पदाथ, तेल तथार् खनिज आदि ऐसे ही उद्यमों के उदार्हरण हैं। यहार्ँ इस बार्त क उल्लेख करनार् भी महत्त्वपूर्ण होगार् कि इन व्यार्वसार्यिक आमदनियों की प्रकृति मुख्यत: उन कीमतों के समार्न ही होती है जो कि वस्तुओं तथार् सेवार्ओं के गैर-सरकारी उत्पार्दकों को दी जार्ती हैं।

प्रशार्सनिक आय

जिन प्रार्प्तियों (receipts) को प्रशार्सनिक आय की श्रेणी में रखार् जार्तार् है, वे हैं-शुल्क यार् फीस, लार्इसेंस, जुर्मार्ने, सम्पत्ति जब्त करने और उत्तरार्धिकारी के अभार्व में सम्पत्ति पर अधिकार करने आदि से होने वार्ली प्रार्प्तियार्ँ तथार् विशेष कर-निर्धार्रण (Special assessments)। इन प्रार्प्तियों की एक विशेषतार् तो यह होती है कि व्यक्ति को न्यूनार्धिक रूप में इस बार्त की छूट होती है कि वह इनक भुगतार्न करे यार् नहीं । दूसरे, ये प्रार्प्तियार्ँ व्यक्ति को प्रत्यक्ष लार्भ प्रदार्न करती हैं यार् उस पर जुर्मार्नार् करती हैं। किन्तु इनकी स्थिति में, यह आवश्यक नहीं है कि भुगतार्न की गई धनरार्शि क यार् तो लार्भ के मूल्य से अथवार् उस लार्भ को प्रदार्न करने की लार्गत से घनिष्ठ सम्बन्ध हो। प्रशार्सनिक आमदनियों की एक अन्य अनोखी विशेषतार् यह है कि ये सार्मार्न्यत: सरकार के प्रशार्सनिक कार्यों के गौण उत्पार्दन (by product) के रूप में प्रार्प्त होती हैं। और यही कारण है कि इन्हें ‘प्रशार्सनिक आय’ क नार्म दियार् जार्तार् है। इन प्रशार्सनिक आमदनियों क संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार से कियार् जार् सकतार् है-

शुल्क यार् फीस

प्रो. सेलिग्मैन फीस की परिभार्षार् इस प्रकार की है-शुल्क अथवार् फीस उस धनरार्शि को कहते हैं जो कि सरकार द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली प्रत्येक ऐसी आवर्ती सेवार् (recurring service) की लार्गत अदार् करने के लिए दी जार्ती है, जो कि मुख्यत: जनतार् के हित के लिए होती है किन्तु जो फीस देने वार्ले को ऐसी विशेष लार्भ पहुँचार्ती है जिसको मार्पार् जार् सके। इस प्रकार, फीस एक ऐसी अदार्यगी है जो कि उन प्रशार्सनिक सेवार्ओं की लार्गत को पूरार् करने के लिए सरकार को दी जार्ती है जो सम्पूर्ण जनतार् के हित में सम्पन्न की जार्ती है किन्तु जो व्यक्तियों को विशेष लार्भ प्रदार्न करती है। अत: फीस केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वार्रार् अदार् की जार्ती है जो कि सरकार द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ने वार्ली सेवार्ओं से कोई विशेष लार्भ प्रार्प्त करते हैं। उदार्हरण के लिए, यदि कोई छार्त्र रार्जकीय विद्यार्लय में पढ़कर शिक्षार् क लार्भ प्रार्प्त करनार् चार्हतार् है तो उसे उसके लिए फीस देनी होती है।

फीस तथार् कीमत में अन्तर

फीस तथार् कीमत में कई मुख्य अन्तर पार्ये जार्ते हैं-

  1. कीमत ऐच्छिक, फीस अनिवाय-कीमतें तो सदार् ही ऐच्छिक अदार्यगियार्ँ (voluntary payments) होती हैं, किन्तु फीस अनिवाय अंशदार्न भी हो सकती हैं, यद्यपि दोनों क ही भुगतार्न विशेष सेवार्ओं के बदले में कियार् जार्तार् है।
  2. आदार्न-प्रदार्न क तत्व (quid pro quo)-आदार्न-प्रदार्न क तत्व जो कि कर में पार्यार् जार्तार् है, फीस में भी विद्यमार्न रहतार् है किन्तु कीमतों में इस तत्व क अभार्व है।
  3. व्यार्वसार्यिक क्रियार्एँ-फीस व्यार्वसार्यिक सेवार् के लिए कियार् जार्ने वार्लार् भुगतार्न नहीं है, बल्कि सरकार की प्रशार्सनिक क्रियार्ओं के गौण उत्पार्दन हैं किन्तु कीमतें सरकार द्वार्रार् की जार्ने वार्ली व्यार्वयार्यिक क्रियार्ओं के लिए की जार्ने वार्ली अदार्यगियार्ँ हैं।

लार्इसेंस शुल्क

लार्इसेंस शुल्क की प्रवृति बहुत कुछ फीस यार् शुल्क से ही मिलती-जुलती है किन्तु इसमें तथार् फीस में कुछ अन्तर भी है। लार्इसेंस शुल्क उस स्थिति में अदार् कियार् जार्तार् है जबकि सरकारी सत्तार् से यह प्राथनार् की जार्ती है कि वह कोई अधिक स्पष्ट तथार् निश्चित किस्म की सेवार् प्रदार्न करने की बजार्य एक अनुमति (permission) अथवार् विशेषार्धिकार (privilege) प्रदार्न कर दे। मोटर वार्हनों क रजिस्टे्रशन शुल्क, मोटरें चलार्ने के परमिट की अदार्यगी और बन्दूक यार् रिवार्ल्वर रखने क लार्इसेन्स शुल्क ऐसे ही शुल्क के कुछ उदार्हरण हैं। इन मार्मलों में किसी भी व्यक्ति को शुल्क अदार् करने के लिए बार्ध्य नहीं कियार् जार्तार्, अपितु जो भी व्यक्ति बन्दूक यार् मोटर क उपयोग करनार् चार्हतार् है तो उसके लिए उसे आवश्यक शुल्क क भुगतार्न करनार् होतार् है। शुल्क अदार् करने पर शुल्कदार्तार् को जो लार्भ प्रार्प्त होतार् है वह बन्दूक रखने यार् मोटर क उपयोग करने को कानूनी व व्यार्वहार्रिक सुविधार् के रूप में होतार् है। ऐसे शुल्क क उद्देश्य कभी-कभी यह भी होतार् है कि विभिन्न प्रकार की क्रियार्ओं एवं गतिविधियों क नियमन अथवार् नियन्त्रण कियार् जार्ये उदार्हरण के लिए, कानून व व्यवस्थार् की स्थार्पनार् करने के उद्देश्य से जिम्मेदार्र व्यक्तियों के बन्दूकों व रिवार्ल्वरों के लार्इसेन्स दिये जार्ते हैं। इसी प्रकार, शरार्ब की बिक्री पर नियन्त्रण स्थार्पित करने के लिए शरार्ब की दुकानें चलार्ने के लिए लार्इसेन्स दिये जार्ते हैं। जन-सुरक्षार् के हित में, मोटर-चलार्कों से मोटर चलार्ने के लिए लार्इसेन्स प्रार्प्त के लिए प्रार्प्त करने के लिए कहार् जार्तार् है और ये लार्इसेन्स केवल तभी प्रार्प्त किये जार्ते हैं जबकि व्यक्ति किसी वार्हन (vehicle) को चलार्ने की दृष्टि से ठीक (fit) होतार् है। अत: लार्इसेन्स शुल्क में नियमन यार् नियन्त्रण क जो तत्व पार्यार् जार्तार् है वह इसे शुल्क तथार् कर दोनों ही से पृथव्फ करतार् है।

विशेष कर-निर्धार्रण

प्रो. सेलिग्मैन के शब्दों में, विशेष कर-निर्धार्रण यार् विशेष उगार्ही (special assessment) उस अनिवाय अंशदार्न को कहते हैं जो प्रदार्न किये जार्ने वार्ले विशेष लार्भों के अनुपार्त में वसूल कियार् जार्तार् है और जिसक उद्देश्य लोकहित की दृष्टि से अधिकार में ली गई सम्पत्ति में विशेष सुधार्र करने की लार्गत अदार् करनार् होतार् है। जब सरकार सड़क-निर्मार्ण, नार्लियों की व्यवस्थार् तथार् सड़कों व गलियों में प्रकाश की व्यवस्थार् जैसे सावजनिक सुधार्र के कुछ कार्य अपने हार्थ में लेती है, तो ऐसे सुधार्रों से सम्पूर्ण जनतार् को तो सार्मार्न्य लार्भ पहुँचतार् ही है, किन्तु उन व्यक्तियों को विशिष्ट लार्भ होतार् है जिनकी दुकान-मकान आदि सम्पत्ति उस सड़क के किनार्रे होती है। इन सुधार्रों के परिणार्मस्वरूप, इन सम्पत्तियों के मूल्यों अथवार् किरार्यों में वृद्धि हो जार्ती है। अत: हो सकतार् है कि सरकार इस प्रकार किये गये खर्च क कुछ भार्ग वसूल करने के लिए उस क्षेत्र के लोगों पर कोई विशेष कर निर्धार्रित कर दे। ऐसार् विशेष कर-निर्धार्रण, सार्मार्न्यत: सम्पत्ति के मूल्य में होने वार्ली वृद्धि के अनुपार्त में ही कियार् जार्तार् है और इस दृष्टि से यह भिन्न होतार् है।

विशेषतार्एँ (Characteristics)-सैलिग्मैन के अनुसार्र विशेष कर-निर्धार्रण में विशेषतार्एँ पार्ई जार्ती हैं-

  1. इसमें विशेष उद्देश्य (special purpose) क तत्व पार्यार् जार्तार् है।
  2. इसमें सरकारी सेवार् से मिलने वार्ले विशिष्ट लार्भ को मार्पार् जार् सकतार् है।
  3. विशेष कर-निर्धार्रण (special assessment) आरोही (progressive) नहीं होते, बल्कि प्रार्प्त होने वार्ले लार्भ (benefits) के अनुसार्र अनुपार्ती (proportional) होते हैं।
  4. ये विशिष्ट स्थार्नीय सुधार्रों के लिए लगार्ये जार्ते हैं।

निर्धार्रण की विशेष कर-निर्धार्रण से तुलनार्- समार्नतार्एँ (Similarities)-इसमें समार्नतार्एँ पार्ई जार्ती हैं-

  1. उद्देश्य (Object)-दोनों में ही सावजनिक उद्देश्य क तत्व (element of public purpose) पार्यार् जार्तार् है, क्योंकि सरकारी आय चार्हे कर (Tax) के रूप में प्रार्प्त हुई हो अथवार् विशेष कर-निर्धार्रण (special assessment) के रूप में, सम्पूर्ण रूप में समार्ज के और सार्थ-सार्थ विशिष्ट व्यक्ति के हित के लिए खर्च की जार्ती है।
  2. अनिवाय अंशदार्न (Compulsory Contribution)-कर की तरह विशेष कर-निर्धार्रण भी एक अनिवाय अंशदार्न है। अत: इन दोनों में ही अनिवायतार् क तत्व भी पार्यार् जार्तार् है।

असमार्नतार्एँ (Dis-similarities)-कर तथार् विशेष कर-निर्धार्रण के बीच तीन असमार्नतार्एँ (Dis-similarities) भी पार्ई जार्ती हैं। ये हैं-

  1. उपयोग की विभिन्नतार् (Dis-similarities of Assessment)-करों के रूप में प्रार्प्त होने वार्ली आय सरकार के सार्मार्न्य उद्देश्यों की पूर्ति में लगार्ई जार्ती है, किन्तु विशेष कर-निर्धार्रण यार् विशेष उगार्ही के रूप में समार्प्त होने वार्ली आय विशिष्ट स्थार्नीय सुधार्रों (special local improvement) में लगार्ई जार्ती है।
  2. निर्धार्रण क आधार्र (Basis of Assessment)-कर को लगार्ने के आधार्र अनेक हो सकते हैं, जैसे कि आय, व्ययऋ सम्पत्ति क मूल्य आदिऋ किन्तु विशेष कर-निर्धार्रण यार् विशेष उगार्ही को लगार्ने क आधार्र केवल एक होतार् है, वह है लार्भ (benefit)। अन्य शब्दों में, विशेष कर-निर्धार्रण प्रार्प्त होने वार्ले लार्भों के अनुपार्त में लगार्यार् जार्तार् है।
  3. उद्देश्य की भिन्नतार्एँ (Dis-similarities of Object)-विशेष कर-निर्धार्रण अधिकांशतयार् कुछ पूँजी विकास योजनार्ओं के लिए धन प्रार्प्त करने के उद्देश्य से लगार्ये जार्ते हैं, किन्तु कर पूँजीगत विकास योजनार्ओं की वित्तीय व्यवस्थार् के लिए भी लगार्ये जार्ते हैं और सरकार के चार्लू व्यय की पूर्ति के लिए भी।
  4. अदार्यगी की भिन्नतार्एँ (Dis-similarities of Payment)-विशेष कर-निर्धार्रण कीमतों से भी इस दृष्टि से भिन्न हैं क्योंकि कीमतों की अदार्यगी ऐच्छिक होती है जबकि विशेष कर-निर्धार्रण की अदार्यगी अनिवाय होती है।

अर्थदण्ड तथार् जुर्मार्ने

अर्थदण्ड तथार् जुर्मार्ने सरकारी आय के महत्त्वपूर्ण स्रोत नहीं हैं। अर्थदण्ड ;पिदमद्ध क सम्बन्ध दण्ड (punishment) से होतार् है और जुर्मार्नार् (penalty) कानून के उल्लंघन पर कियार् जार्तार् है। इन दोनों क ही उद्देश्य किसी अनुचित कार्य के लिए दण्ड देनार् तथार् अपरार्धों को रोकनार् होतार् है।

जमार्नत यार् सम्पत्ति आदि जब्त करनार्

जमार्नतों (bails) यार् बार्ण्डों (bonds) अथवार् सम्पत्ति को जब्त करने से आशय उन जुर्मार्नों से होतार् है जो कि अदार्लतों द्वार्रार् लोगों पर इसलिए किये जार्ते हैं कि वे निश्चित तिथि को अदार्लत में उपस्थित होने में असफल रहे अथवार् उन्होंने पहले किये गये ठेकों अथवार् करार्रों (contracts) को पूरार् नहीं कियार्। स्पष्ट है कि सरकार की आय के इस स्रोत क भी महत्त्व बहुत ही कम है।

मृतक की सम्पत्ति पर कब्जार्

सरकार की आय क यह स्रोत ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति पर सरकार के दार्वे क प्रतीक है जो बिनार् कानून उत्तरार्धिकारी नियत किये अथवार् अपनी सम्पत्ति को देने के बार्रे में बिनार् वसीयत किये ही मर गयार् हो। इस स्थिति में, उस व्यक्ति की बैंक में जमार् धनरार्शियार्ँ तथार् अन्य सभी सम्पत्तियार्ँ सरकार के अधिकार में चली जार्ती हैं। सम्पत्ति पर कब्जे के इस अधिकार (escheat) के अन्तर्गत, सरकार भंग की गई शिक्षार् संस्थार्ओं अथवार् अन्य न्यार्सों (trusts) की बेवार्रसी सम्पत्ति (unclaimed property) पर भी अपनार् कब्जार् कर सकती है। सरकारी आय क यह भी कोई महत्त्वपूर्ण स्रोत नहीं है।

उपहार्र तथार् अनुदार्न

भेंट यार् उपहार्र (gifts) वे ऐच्छिक अंशदार्न हैं जो प्रार्इवेट व्यक्ति अथवार् गैर-सरकारी दार्तार्ओं (donors) द्वार्रार् ऐसे विशिष्ट कार्यों के लिए सरकार को दिये जार्ते हैं जैसे कि युद्धकाल यार् संकटकाल के समय सहार्यतार्-कोष (relief fund) अथवार् प्रतिरक्षार् कोष (defence fund)। ऐसे अंशदार्न देशभक्त, दार्नशील एवं जनसेवी व्यक्तियों द्वार्रार् युद्ध, अकाल तथार् ऐसे ही अन्य संकटकालीन अवसरों पर दिये जार्ते हैं।

आधुनिक रार्जस्व व्यवस्थार् में, केवल युद्धकाल यार् संकटकाल को छोड़कर इन उपहार्रों को कोई उल्लेखनीय स्थार्न प्रार्प्त नहीं है। प्रार्चीन काल की रार्जकीय व्यवस्थार् में अवश्य इनको महत्त्वपूर्ण स्थार्न प्रार्प्त थार् जबकि रार्जार्, नवार्ब तथार् जार्गीरदार्र आदि शार्सक अपनी प्रजार् से ‘नजरार्ने’ लियार् करते थे। आजकल उपहार्र (gifts) की कुल मार्त्रार् (अनुदार्नों की नहीं) इतनी थोड़ी होती है कि रार्जस्व-व्यवस्थार् में उसक स्थार्न नार्ममार्त्र क ही होतार् है। उपहार्रों तथार् अनुदार्नों के रूप में होने वार्ली प्रार्प्तियों की विशेषतार् यही है कि ये ऐच्छिक प्रवृति की होती हैं और इनको देने वार्लार् व्यक्ति बदले में किसी भी प्रत्यक्ष लार्भ की आशार् नहीं करतार्। अनुदार्नों (grants) की स्थिति में, दार्तार् सरकार (donor government) अन्य किसी स्तर पर सरकारी कार्य को सम्पन्न करने के लिए वित्तीय सहार्यतार् देती है। संघीय शार्सन वार्ले देशों में, केन्द्र सरकार रार्ज्य सरकारों को और रार्ज्य सरकारें स्थार्नीय सरकारों (local governments) को, सार्धार्रणत: इसलिए सहार्यक अनुदार्न (grants-in-aid) देती है तार्कि उन्हें इस योग्य बनार्यार् जार् सके कि वे अपने कार्यों को सफलतार्पूर्वक कर सके अथवार् एकरूपतार् (uniformity)। अथवार् कार्यकुशलतार् की दृष्टि से कुछ ऐसे विशिष्ट कार्यों को अपने हार्थों में ले सके जैसे कि रार्जमागों क निर्मार्ण तथार् रख-रखार्व (maintenance)। अत: ये अनुदार्न शर्तरहित (unconditional) भी हो सकते हैं अथवार् केवल कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए भी दिये जार् सकते हैं।

कभी-कभी एक देश की सरकार अन्य देश से अनुदार्न प्रार्प्त करती हैं जिसे आमतौर पर विदेशी सहार्यतार् (foreign aid) कहार् जार्तार् है। विदेशी सहार्यतार् कई मदों (plan heads) के बीच परस्पर सह-सम्बन्ध बनार् रहे। तथार्पि, उचित यह होगार् कि इस वर्गीकरण को छेड़ार् न जार्ये, अन्यथार् संसद के प्रति जबार्वदेही तथार् समार्ज के प्रति उत्तरदार्यीतार् के जो ठोस लार्भ इससे अब प्रार्प्त होते हैं, वे समार्प्त हो जार्येंगे। परन्तु सरकार को यह अवश्य करनार् चार्हिये कि बजट को खर्चों की योजनार् की मदों के अनुसार्र वितरित करने की एक ऐसी पृथव्फ व्यवस्थार् की जार्ये जिससे कि निष्पत्ति बजट के निर्मार्ण क उद्देश्य पूरार् हो सके।

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