सार्मुदार्यिक संगठन क ऐतिहार्सिक विकास
दार्न संगठन समिति आधुनिक सार्मुदार्यिक संगठन की आधार्र शिलार् थी। सन् 1889 में लंदन में इसलिये स्थार्पनार् की गयी जिससे दार्न यार् सहार्यतार् देने वार्ली संस्थार्यें यह जार्न सकें कि किसको किस प्रकार की सहार्यतार् की आवश्यकतार् है। सभी को बिनार् जॉच-पड़तार्ल किये आर्थिक सहार्यतार् न प्रदार्न करें। सन् 1877 में अमेरिक के बफैलो नगर में पहली बार्र दार्न संगठन समिति की स्थार्पनार् की गयी। उसके बार्द पेन्सलवार्नियार्ार्, बोस्टन, न्यूयाक, फिलार्डेल्फियार्ं तथार् अन्य स्थार्नों पर भी इसकी स्थार्पनार् की गयी इस दार्न संगठन समिति क मूल उददे्श्य एक क्षेत्र की सभी दार्न संस्थार्ओं में सहयोग स्थार्पित करनार् तथार् उनके प्रयत्नों में एकात्मकतार् यार् एकीकरण लार्नार् यार्। सैटेलमेण्ट हार्उस आन्दोलन सार्मुदार्यिक संगठन की दिशार् में दूसरार् कदम थार्। सबसे पहलार् पडाऱ्ेसी गिल्ड सन् 1886 में न्यूयाक में स्थार्पित कियार् गयार्। इसके पश्चार्त् ये अन्य औधोगिक नगरों में स्थार्पित होते चले गये। प्रथम विश्व युद्व के समय अमरीक रेडक्रार्स गृह सेवार् कार्यक्रम चलार्यार् गयार् थार् जिसक व्यवहार्रिक स्वरूप व्यवसार्यिक समार्ज कार्य जैसार् थार्। उसी दौरार्न अन्य संस्थार्यें जैसे यंगमेन्स क्रिश्चियन एसोसियेशन यंग विमन्स क्रिश्चियन एसोसियेशन ब्वार्यज स्काउटस गर्ल गार्इड आदि कार्यक्रम चलार्ये गये।

समार्ज कार्य में सार्मुदार्यिक संगठन की साथकतार् : व्यक्ति एवं समार्ज एक दूसरे पर आश्रित है। जहार्ँ समार्ज ने व्यक्ति को मार्नवीय अस्तित्व प्रदार्न कियार् है, वही समार्ज द्वार्रार् निर्धनतार्, बेकारी जैसी विविध प्रकार की समस्यार्यें भी उत्पन्न की गयी हैं। इन समस्यार्ओं के समार्धार्न हेतु आदिकाल से ही प्रयार्स किये जार्ते रहे हैं। इन्हीं प्रयार्सों की श्रंखलार् में समार्ज कार्य एक महत्वपूर्ण कड़ी है। समार्ज कार्य प्रभार्वपूर्ण सार्मार्जिक क्रियार् एवं सार्मार्जिक अनुकूलन के माग में आने वार्ली सार्मार्जिक एवं मनोवैज्ञार्निक समस्यों क वैज्ञार्निक ढ़ग से समार्धार्न प्रस्तुत करतार् है।

समार्ज कार्य वैज्ञार्निक ज्ञार्न एंव प्रार्विधिक निपुणतार्ओं क प्रयोग करते हुए समस्यार्ग्रस्त व्यक्तियों, समूहों एंव समुदार्यों की मनो-सार्मार्जिक समस्यार्ओं क समार्धार्न प्रस्तुत करते हुए उन्हें आत्म सहार्यतार् करने के योग्य बनार्तार् है। इस प्रकार समार्ज कार्य एक सहार्यतार् मूलक कार्य है जो वैज्ञार्निक ज्ञार्न, प्रार्विधिक निपुणतार्ओं तथार् मागदर्शन क प्रयोग करते हुए व्यक्तियों की एक व्यक्ति, समूह के सदस्य अथवार् समुदार्य के निवार्सी के रूप में उनकी मनो-सार्मार्जिक समस्यार्ओं क अध्ययन एंव निदार्न करने के पश्चार्त् परार्मर्श, पर्यार्वरण में परिवर्तन तथार् आवश्यक सेवार्ओं के मार्ध्यम से 18 सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है तार्कि वे समस्यार्ओं से छुटकारार् पार् सकें। सार्मार्जिक क्रियार् में प्रभार्वपूर्ण रूप से भार्ग ले सकें, लोगों के सार्थ संतोशजनक समार्योजन कर सकें, अपने जीवन में सुख एवं शार्न्ति क अनुभव कर सकें, तथार् अपनी सहार्यतार् स्वयं करने के योग्य बन सकें।

सेवार्थ्र्ार्ी एक व्यक्ति, समूह अथवार् समुदार्य हो सकतार् है। जब सेवार्थ्र्ार्ी एक व्यक्ति होतार् है तो अधिकांश समस्यार्यें मनो-सार्मार्जिक अथवार् समार्योजनार्त्मक अथवार् सार्मार्जिक क्रियार् से संबंधित होती है और कार्यकर्तार् वयैक्तिक समार्ज कार्य प्रणार्ली क प्रयोग करते हुए सेवार्यें प्रदार्न करतार् है। जब सेवार्थ्र्ार्ी एक समूह होतार् है तो प्रमुख समस्यार्यें प्रजार्तार्ंत्रिक मूल्यों तथार् नेतृत्व के विकास, सार्मूहिक तनार्वों एंव संघर्शो के समार्धार्न तथार् मैत्री एंव सौहाद पूर्ण संबधों के विकास से संबंधित होती है। सार्मूहिक कार्यकर्तार् विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन के दौरार्न उत्पन्न होने वार्ली अन्त:क्रियार्ओं को निर्देशित करते हुए समूह में सार्मूहिक रूप से कार्य करते हुए सार्मार्न्य सार्मूहिक उद्देश्यों की प्रार्प्ति की क्षमतार् उत्पन्न करतार् है। जब सेवार्थ्र्ार्ी एक समुदार्य होतार् है तो समुदार्य की अनुभूत आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करने के सार्थ-सार्थ सार्मुदार्यिक एकीकरण क विकास करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। एक सार्मुदार्यिक संगठनकर्तार् समुदार्य में उपलब्ध संसार्धनों एवं समुदार्य की अनुभूत आवश्यकतार्ओं के बीच प्रार्थमिकतार्ओं के आधार्र पर सार्मंजस्य स्थार्पित करतार् है और लोगों को एक-दूसरे के सार्थ मिल-जुलकर कार्य करने के अवसर प्रदार्न करते हुये सहयोगपूर्ण मनोवृत्तियों, मूल्यों एवं व्यवहार्रों क विकास करतार् है।

सार्मुदार्यिक संगठन समार्ज कार्य की एक प्रणार्ली है किन्तु कुछ समार्ज कार्य शिक्षक यह कहते हैं कि मूलरुप से समार्ज कार्य की दो ही प्रणार्लियार्ं हैं। क्योंकि समार्ज कार्य की प्रणार्लियार्ं व्यक्ति और समूहों के सार्थ कार्य करती है और व्यक्ति यार् तो व्यक्तिगत रुप से कार्य करते हैं यार् समूहों के सदस्य के रुप में/दूसरे शिक्षक समुदार्यों के सार्थ कार्य करने को समार्ज कार्य की एक विशिष्ट प्रणार्ली मार्नते हैं जिसमें न केवल व्यक्ति एवं समूह के ज्ञार्न की आवश्यकतार् पड़ती है बल्कि समुदार्य के अध्ययन् में भिन्न निपुणतार्ओं, विस्तृत ज्ञार्न और विरोधी व्यक्तियों और समूहों की प्रार्प्ति के लिये गतिमार्न करने की आवश्यकतार् पड़ती है। इसी प्रकार समार्ज कार्यों में से कुछ कार्य ऐसे हैं जिनक संबन्ध केवल समार्ज सेवी के सार्थ है किन्तु अनेक कार्य ऐसे हैं जिन्हें किसी व्यवसार्य के सार्थ सम्बद्ध नहीं कियार् जार् सकतार्। समार्ज कार्य में मुख्य रुप से वैयक्तिक समार्ज कार्य में मुख्य रुप से वैयक्तिक समार्ज कार्य, सार्मूहिक समार्ज कार्य तथार् सार्मुदार्यिक संगठन क उपयोग कियार् जार्तार् है। परन्तु समार्ज कार्य में इन पद्धतियों को एक दूसरे से पूर्णत: पृथक करनार् कठिन है। सार्मुदार्यिक संगठन वैयक्तिक समार्ज कार्य और सार्मूहिक समार्ज कार्य के उद्देश्य लगभग एक समार्न हैं। इसी प्रकार इन तीनों प्रकार की पद्धतियों में लगभग समार्न प्रक्रियार्ओं और 19 सिद्धार्ंतो क प्रयोग कियार् जार्तार् है। समार्ज कार्य की विभिन्न पद्धतियों में कुछ तत्व समार्न रूप से पार्ये जार्ते हैं, जैसे सार्मार्जिक अध्ययन और उपचार्र, सार्धनों क उपयोग, सार्धनों क उपयोग, परिवर्तन, मूल्यार्ंकन इत्यार्दि। परन्तु सार्मुदार्यिक संगठन के पद्धति में कुछ विशेष बार्तों क समार्वेश होतार् है।

बड़े-2 नगरों में सार्मुदार्यिक जीवन बिगड़ने के कारण और परम्परार्गत ग्रार्मीण समुदार्य में उन्नति लार्ने की आवश्यकतार् ने समार्ज कार्य क क ध्यार्न सार्मुदार्यिक विकास की ओर आकर्शित कियार् है। तकनीकी परिवर्तन के सार्मार्जिक परिणार्मों के कारण हस्तक्षेप के मार्ध्यम से नियोजित सार्मार्जिक विकास पर बल दियार् जार्ने लगार् है। इस हस्तक्षेप के चेतन प्रयोग क उद्देश्य तकनीकी परिवर्तन के कारण व्यक्तियों और समूहों पर पड़ने वार्ले आघार्त को रोकनार् और तेजी से बदलती हुर्इ विचार्रधार्रार्ओं, कार्य करने की विधियों आदि के सार्थ अनुकूलन स्थार्पित करने में सहार्यतार् देनार् है। सार्मुदार्यिक कार्यकर्तार् यह मार्नते हैं कि परिवर्तन पूर्ण समुदार्य को प्रभार्वित करतार् है। उसक उद्देश्य समुदार्य द्वार्रार् इस परिवर्तन को स्वीकार करने में सहार्यतार् देनार् है और अपनी इच्छार् से सुधार्र लार्ने के लिए तैयार्र करनार् हैं। समार्ज कार्य यह कार्य सार्मुदार्यिक संगठन प्रणार्ली के प्रयोग से करतार् है। इससे स्पष्ट होतार् है कि सार्मुदार्यिक संगठन क समार्ज कार्य में महत्व पूर्ण भूमिक है।

सार्मुदार्यिक नियोजन एवं सार्मुदार्यिक विकास 

नियोजन सार्मुदार्यिक संगठन क एक महत्वपूर्ण पक्ष है। स्वार्स्थ्य और कल्यार्ण के लिये नियोजन एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति, समूह और समुदार्य में चेतन रुप से उन दशार्ओं, कार्यक्रमों और सुविधार्ओं को निधारित करने, उनकी स्थार्पनार् और उन्हें बनार्ये रखने क प्रयार्स करते हैं जो उनकी दृष्टि में वैयक्तिक एवं सार्मूहिक जीवन को भंग होने से बचार् सकते हैं और सभी व्यक्तियों के लिये एक उच्च स्तर के कल्यार्ण को सम्भव कर सकते हैं। सार्मुदार्यिक नियोजन की परिभार्षार् में जनतार् द्वार्रार् समर्थन को जुटार्नार्, आवश्यक सूचनार्ओं क प्रयार्स, उपयुक्त कमेटियों की नियुक्ति, विरोधी भार्वों क सुनार् जार्नार्, उसक विश्लेषण और विरोधी भार्वों में समझौतार् सभी कुछ सम्मिलित हैं। सार्मुदार्यिक नियोजन में उन्हीं प्रणलियों क प्रयोग होतार् है जिनक प्रयोग सार्मुदार्यिक संगठन में होतार् है और जैसार् समार्ज कार्य इन्हें समझतार् और इनक प्रयोग करतार् है।

स्वार्स्थ्य और समार्ज कल्यार्ण के ठोस नियोजन में समुदार्य के मौलिक तथ्यों और शक्तियों क प्रयोग होतार् है। सार्मुदार्यिक नियोजन छोटे स्थार्नीय क्षेत्रों, नगरों, जनपदों और क्षेत्रीय यार् रार्ष्ट्रीय स्तर पर कियार् जार्तार् है। नियोजन क अर्थ है कि भविष्य में जो प्रयार्स किये जार्ने हैं, उनक पहले से ही प्रतिपार्दन कियार् जार्नार्। नियोजन क अर्थ है कि समार्ज कल्यार्ण के कार्यक्रम किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किये जार्ने हैं, उन्हें स्पष्ट कियार् जार्नार् है और उसे कैसे कियार् जार्नार् है अर्थार्त, उसे करने के लिये किस प्रणार्ली यार् विधि क 20 प्रयोग कियार् जार्एगार्। यह क्रियार्-कलार्प कितनार् अच्छार् कियार् जार्नार् है, अर्थार्त प्रणार्ली यार् करने की विधि में किस स्तर की गुणतार् और विशेषज्ञतार् होगी। किस प्रकार क्रियार्-कलार्प क समर्थन कियार् जार्येगार्। इन सबको एक सार्थ पहले से ही निर्धार्रित कर लियार् जार्तार् है।’’

नियोजन तो एक सु-स्थार्पित तथ्य होतार् है। एक सार्मूहिक और परस्पर निर्भर समार्ज अपने सदस्यों को अच्छार् जीवन प्रदार्न करने के लिए, अन्तिम रूप से, अपनी नियोजन प्रक्रियार्ओं पर निर्भर रहतार् है। नियोजन क अर्थ है सार्मुदार्यिक जीवन के क्षेत्रों में क्रमबद्ध चिन्तन लार्नार् क्योंकि नियोजन चिन्तन क चेतन अैार्र सोद्देश्य निर्देशन होतार् है जिससे उन उददेश्यों, जिन पर समुदार्य में समझौतार् हो, की पूर्ति के लिए तर्कपूर्ण सार्धनों क सृजन कियार् जार् सके। नियोजन में सदैव और अनिवाय रूप से प्रार्थमिकतार्एँ निर्धार्रित की जार्ती हैं और मूल-निर्णय लेने पड़ते हैं। नियोजन उन मार्नवीय समस्यार्ओं से निपटने क मौलिक और प्रधार्न तरीक है जो हमार्रे सार्मने आती है। नियोजन एक दृष्टिकोण होतार् है, एक मनोवृत्ति है और ऐसी मार्न्यतार् है जो हमें यह बतार्ती है कि हमार्रे लिये क्यार् सम्भव है कि हम अपने भार्ग्य के विषय में अनुमार्न लगार् सकते हैं। भविश्यवार्णी कर सकते हैं। उसे निदर्ेिशत कर सकते है और उसे नियंत्रित कर सकते हैं। जब हम सार्मुदार्यिक नियोजन की धार्रणार् को स्वीकार कर लेते हैं तो हम अपने दर्शनशार्स्त्र की व्यवस्थार् करते हैं यार् व्यक्तियों और उनके द्वार्रार् अपने भविश्य को नियंत्रित करने की क्षमतार् के विषय में अपनार् पूर्ण मत प्रकट करते हैं। नियोजन के लिये व्यवसार्यिक कार्यकर्तार् और विशेष निपुणतार्ओं की आवश्यकतार् पड़ती है और इस निपुणतार् क प्रयोग नियोजन के पार्ँच पक्ष दर्शार्तार् है।

  1. व्यार्वसार्यिक निपुणतार् एक निरन्तर प्रक्रियार् की स्थार्पनार् के लिये आवश्यक है। जिसके द्वार्रार् सार्मुदार्यिक समस्यार्ओं को पहचार्नार् जार्तार् है।
  2. व्यवसार्यिक निपुणतार् तथ्यों के संकलन हेतु एक प्रक्रियार् की स्थार्पनार् के लिये आवश्यक होती है। जिससे समस्यार् से संबन्धित सभी सूचनार्ओं क सरलतार् से प्रकार कियार् जार् सके। 
  3. योजनार् के प्रतिपार्दन के लिये एक कार्यार्त्मक प्रणार्ली क सृजन करने के लिये व्यवसार्यिक निपुणतार् क प्रयोग कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। 
  4. योजनार् क प्रतिपार्दन सार्मुदार्यिक संगठन की सम्पूर्ण प्रक्रियार् में एक बिन्दू मार्त्र ही होतार् है। इस प्रतिपार्दन के पहले और बार्द में क्यार् होतार् है। वह अधिक महत्वपूर्ण होतार् है। 
  5. योजनार् के कार्यन्वयन में कार्यविधियों के निर्धार्रित किरने में व्यवसार्यिक निपुणतार् की आवश्यकतार् पड़ती है। 

नियोजन “ार्ून्य में नहीं कियार् जार्तार् है। इसके लिये उद्देश्य चार्हिए। योजनार् के परिणार्म स्वरूप कुछ उपलब्धियार्ं होनी चार्हिए। उद्देश्य तो एक मार्नचित्र होते हैं। जो हमें यह दिखार्ते हैं कि हमें कहार्ं जार्नार् है और हम किन रार्स्तों से जार् सकते हैं। हमें उस समुदार्य 21 क पूरार् ज्ञार्न होनार् चार्हिए। जहार्ं हम सार्मुदार्यिक संगठन के अभ्यार्स के लिये जार्ते हैं। समार्ज कार्य के कार्य, समुदार्य में संस्थार् यार् अभिकरण की भूमिका, समूह की विशिष्ट आवश्यकतार्एँ और व्यक्तियों की विशिष्ट आवश्यकतार्एँ चार्र प्रमुख क्षेत्र हैं। जो उद्देश्यों के निर्धार्रण में हमार्री सहार्यतार् करते हैं।

समुदार्य में मनोवैज्ञार्निक तत्परतार् क सृजन करते और उसमें नियोजन करने की इच्छार् क सृजन करने के लिये सहार्यतार् दी जार्नी चार्हिए। यह समझनार् आवश्यक है कि नियोजन एक सकारार्त्मक प्रक्रियार् है न कि एक नकारार्त्मक प्रक्रियार्। नियोजन के प्रति यह नहीं चार्हिए कि इससें एक परम नियंत्रण होतार् है। आंशिक नियोजन करनार् सही नहीं होतार् है। नियोजन के सिद्धार्न्त-नियोजन के सिद्धार्न्तों में प्रशार्सन के जिन निम्न महत्वपूर्ण सिद्धार्न्तों क उल्लेख ट्रेकर ने कियार् है। वह सार्मुदार्यिक संगठन के अभ्यार्स में भी उतनी ही महत्तार् रखते हैं।

  1. प्रभार्वशार्ली होने के लिये नियोजन उन व्यक्तियों की अभिरूचियों और आवश्यकतार्ओं से, जिनसे संस्थार् बनती है, उत्पन्न होनी चार्हिए।
  2. प्रभार्वशार्ली होने के लिये नियोजन में वह लोग जो नियोजन से प्रत्यक्ष रूप से प्रभार्वित होंगें योजनार् के बनार्ये जार्ने में भार्गीदार्र होने चार्हिए।
  3. अधिक प्रभार्वशार्ली होने के लिये, नियोजन क एक पर्यार्प्त तथ्यार्त्मक आधार्र होनार् चार्हिए। 
  4. अधिक प्रभार्वशार्ली योजनार्एँ उस प्रक्रियार् से जन्मती हैं जिसमें आमने-सार्मने सम्पर्क की प्रणार्लियों और अधिक औपचार्रिक कमेटी कार्य की प्रणार्लियों क मिश्रण होतार् है।
  5. परिस्थितियों की भिन्नतार् के कारण नियोजन प्रक्रियार् क व्यक्तिकरण और विशिष्टीकरण कियार् जार्नार् चार्हिए अर्थार्त स्थार्नीय, परिस्थिति के अनुसार्र ही योजनार्एं बनार्यी जार्नी चार्हिए। 
  6. नियोजन में व्यवसार्यिक नेतृत्व की आवश्यकतार् पड़ती है।
  7. नियोजन में स्वंय सेवकों, अल्पव्यवसार्यिक व्यक्तियों, सार्मुदार्यिक नेतार्ओं के सार्थ-सार्थ व्यार्वसार्यिक कार्यकर्तार्ओं के प्रयार्सों की भी आवश्यकतार् पड़ती है। 
  8. नियोजन के दस्तार्वेजों को रखने और पूर्ण अभिलेखन की आवश्यकतार् पड़ती है, जिससे विचार्र विमर्श के परिणार्मों की निरंतरतार् और निर्देशन के लिये सुरक्षित रखार् जार् सके।
  9. नियोजन में विधमार्न योजनार्ओं और सार्धनों क प्रयोग कियार् जार्नार् चार्हिए और हर बार्र प्रत्येक नर्इ समस्यार् को लेकर आरम्भ से ही कार्य आरम्भ नहीं करनार् चार्हिए। 
  10. नियोजन क्रियार् के पूर्व चिन्तन पर निर्भर करतार् है। 

नियोजन में सहभार्गितार् की भार्गीदार्री के महत्व को कम नहीं समझनार् चार्हिए। समुदार्य के सदस्यों को नियोजन की प्रक्रियार् में और योजनार् के कार्यन्वयन के सभी चरणों पर भार्ग लेनार् चार्हिए। केन्द्रीकरण और विशेषतार् के कारण व्यक्ति भार्ग लेने में कठिनाइ अनुभव करते हैं। योजनार् को नियंत्रित करने के लिए केन्द्र भी प्रार्य: योजनार् स्थल से दूर होते हैं। यह सब सहभार्गितार् में बार्धार्यें हैं इन्हें दूर कियार् जार्नार् चार्हिए। नियन्त्रण केन्द्र और कार्यस्थल में निकट सम्पर्क होनार् चार्हिए। समुदार्य के सदस्यों द्वार्रार् नियोजन और योजनार्ओं में भार्ग लेने के लिए, प्रोत्सार्हन देने के लिए संचार्र की सभी विधियों क प्रयोग करनार् चार्हिये। जनतार् में निश्क्रियतार् की भार्वनार् को समार्प्त कियार् जार्नार् चार्हिए। यह तभी हो सकतार् है जब यह समझने क प्रयार्स कियार् जार्ए कि किस सीमार् तक समुदार्य के सदस्य, समुदार्य की प्रकृति और उसकी विशेषतार्ओं और समस्यार्ओं को समझते हुए उनके सार्मार्धार्न के प्रयार्सों में भार्ग लेने के उत्तरदार्यित्व को समझते हैं, किस सीमार् तक समुदार्य संचार्र के मार्ध्यम स्थार्पित करतार् है जिससे विचार्रों, मतों, अनुभवों, योगदार्नों की दूसरों तक पहुंचार्यार् जार् सके, किस सीमार् तक समुदार्य के सदस्य और कार्यकारिणी के सदस्य आदि सरलतार् और प्रभार्वशार्ली तरीकों से सभी कार्यो में भार्ग लेते है, किस सीमार् तक भार्ग लेने से सदस्यों को आत्म-सन्तुश्टि होती है और किस प्रकार कार्यकर्तार् इस भार्गीदार्री की प्रक्रियार् क निर्देशन करते हैं।

सार्मुदार्यिक विकास – सार्मुदार्यिक विकास सम्पूर्ण समुदार्य के चतुर्दिक विकास की एक ऐसी पद्वति है जिसमें जन-सह भार्ग के द्वार्रार् समुदार्य के जीवन स्तर को ऊँचार् उठार्ने क प्रयत्न कियार् जार्तार् है भार्रत में शतार्ब्दियों लम्बी रार्जनीतिक परार्धीनतार् ने यहार्ँ के ग्रार्मीण जीवन को पूर्णतयार् जर्जरित कर दियार् थार् इस अवधि में न केवल पार्रस्परिक सहयोग तथार् सहभार्गितार् की भार्वनार् क पूर्णतयार् लोप हो चुक थार् बल्कि सरकार और जनतार् के बीच भी सन्देह की एक दृढ़ दीवार्र खड़ी हो गयी थी। स्वतन्त्रतार् प्रार्प्ति के समय जो विषय परिस्थितियार्ँ विधमार्न थी उनक उल्लेख करते हुए टेलर ने स्पष्ट कियार् कि इस समय भार्रत में व्यार्पक निर्धनतार् के कारण प्रति व्यक्ति आयें दूसरे देशों की तुलनार् में इतनी कम थी कि भोजन के अभार्व में लार्खों लोगो की मृत्यु हो रही थी, कुल जनसंख्यार् क 84 प्रतिशत भार्ग अशिक्षित थार् कृषि उत्पार्दन बहुत कम थार्, ग्रार्मीण जनसख्यार् क 83 प्रतिशत भार्ग प्रार्कृतिक तथार् सार्मार्जिक रूप से एक दूसरे से बिल्कुल अलग-अलग थार् ग्रार्मीण उद्योग नष्ट हो चुके थे, जार्तियों क कठोर विभार्जन सार्मार्जिक संरचनार् को विशार्क्त कर चुक थार्, लगभग 800 भार्षार्ओं के कारण विभिन्न समुहों के बीच की दूरी निरन्तर बढ़ती जार् रही थी, यार्तयार्त और संचार्र की व्यवस्थार् अत्यधिक बिगड़ी हुर्इ थी तब अंग्रेजी शार्सन पर आधार्रित रार्जनीतिक नेतृत्व कोर्इ भी उपयोग परिवर्तन लार्ने मे पूर्णतयार् असमर्थ थार्। ‘‘ स्वभार्भिक है कि ऐसी दशार् में भार्रत के ग्रार्मीण जीवन को पुर्नसंगठित किये बिनार् सार्मार्जिक पुननिर्मार्ण की कल्पनार् करनार् पूर्णतयार् व्यर्थ है। कैम्ब्रिज में हुए एक सम्मेलन में सार्मुदार्यिक विकास स्पष्ट करते हुए कहार् गयार् थार् कि ‘‘ सार्मुदार्यिक विकास एक ऐसार् आन्दोलन है जिसक उद्देश्य सम्पूर्ण समुदार्य के लिए एक उच्चतर जीवन स्तर की व्यवस्थार् करनार् है। इस कार्य में प्ररेणार् शक्ति समुदार्य की और से आनी चार्हिए तथार् प्रत्येक समय इसमें जनतार् क सहयोग होनार् चार्हिए। ‘‘

सार्मुदार्यिक विकास क अर्थ – समार्ज शार्स्त्रीय दृष्टिकोण से सार्मुदार्यिक विकास एक योजनार् मार्त्र नहीं है। बल्कि यह स्वयं में एक विचार्र-धार्रार् तथार् संरचनार् है। इसक तार्त्पर्य है कि एक विचार्रधार्रार् के रूप में यह एक ऐसार् कार्यक्रम है जो व्यक्तियों को उनके उत्तरदार्यित्वों क बोध करार्तार् है तथार् एक संरचनार् के पार्रस्परिक प्रभार्वों को स्पष्ट करतार् है। दूसरे शब्दों में यह कहार् जार् सकतार् है कि भार्रतीय सन्दर्भ में सार्मुदार्यिक विकास क तार्त्पर्य एक ऐसार् पद्धति से है जिसके द्धार्रार् ग्रार्मीण समार्ज की संरचनार्, आर्थिक सार्धनों, नेतृत्व के स्वरूप तथार् जनसहभार्ग के बीच समार्स्य स्थार्पित करते हुए समार्ज क चतुर्दिक विकास करने क प्रयत्न कियार् जार्तार् है।

शार्ब्दिक रूप से सार्मुदार्यिक विकास क अर्थ है समुदार्य क विकास यार् प्रगति। सार्मुदार्यिक विकास की परिभार्षार् – सार्मुदार्यिक विकास को अनेक प्रकार से परिभार्शित कियार् गयार् है जो निम्न प्रकार से हैं-

  1. श्री एस0 के0 डे0 के अनुसार्र ‘‘सार्मुदार्यिक विकास योजनार् नियमित रूप से समुदार्य के कार्यो क प्रबन्ध करने के लिए अच्छी प्रकार से सोची हुर्इ एक योजनार् हैं।’’ 
  2. योजनार् आयोग के अनुसार्र ‘‘जनतार् द्धार्रार् स्वंय अपने ही प्रयार्सों से ग्रार्मीण जीवन में सार्मार्जिक और आर्थिक परिवर्तन लार्ने क प्रयार्स ही सार्मुदार्यिक विकास हैं। ‘‘ 
  3. संयुक्त रार्ष्ट्र संघ के अनुसार्र ‘‘सार्मुदार्यिक विकास योजनार् एक प्रक्रियार् है, जो सार्रे समुदार्य के लिए उसके पूर्ण सहयोग से आर्थिक और सार्मार्जिक विकास की परिस्थितियों को पैदार् करती है और जो पूर्ण रूप से समुदार्य की प्रेरणार् पर निर्भर करतार् है।’’ 

उपर्युक्त परिभशार्ओं से स्पष्ट है कि सार्मुदार्यिक विकास समुदार्य को भौतिक और प्रगति की दिशार् में उत्सार्हित करतार् है। समुदार्य के सदस्य अपने प्रयार्सों को संगठित करते हैं। इस संगठन कार्य में रार्ज्य द्वार्रार् प्रार्विधिक और वित्तिय सहार्यतार् प्रदार्न की जार्ती है।

सार्मुदार्यिक विकास के उद्देश्य :- जिस प्रकार सार्मुदार्यिक विकास के सिद्धार्न्त तथार् दर्शन के बार्रे में विचार्रक एक मत नहीं है, उसी प्रकार सार्मुदार्यिक विकास के लार्भो के सम्बन्ध में भी अनेक प्रकार के विभेद हैं। परन्तु इस विभेद के फलस्वरूप भी सार्मुदार्यिक विकास के उद्देश्यों की रूपरेखार् को हम निम्न भगों में विभक्त कर सकते हैं-

  1. ग्रार्मीण जनतार् को बेरोजगार्री से पूर्ण रोजगार्र की दिशार् में ले जार्नार्। 
  2. सहकारितार् क प्रयार्स करनार् और ग्रार्मीण जीवन-स्तर की उन्नति करनार्। 
  3. सार्मुदार्यिक हित के कार्यो को सम्पन्न करनार्। 
  4.  ग्रार्मीण क्षेत्रो में कृषि के उत्पार्दन की वृद्धि के लिए आधुनिक वैज्ञार्निक ज्ञार्न को सुभल करनार्। 

समुदार्यिक विकास की विशेषतार्एँ – भार्रत में सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम, एकीकरण पर आधार्रित है। इसमें ग्रार्मीण क्षेत्रो के विकास पर विशेष बल दियार् गयार् है। इस उद्देश्य के लिए प्रशार्सन के ढ़ार्ँचे में भी अनेक परिवर्तन किए गये है। इसके विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित विभार्ग पहले से ही मौजूत थे, अत: सार्मुदार्यिक स्तर पर विकास क्षेत्रो के रूप में विभिन्न विभगों के बीच समन्वय कियार् गयार् हौ। सम्पूर्ण कार्यक्रम के अन्तर्गत सार्मुदार्यिक सगंढन तथार् स्वार्वलम्बन को विशेष महत्व दियार् गयार् हौ इस प्रकार सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम की विशेषतार्ए निम्न प्रकार है-

  1. विभिन्न विभार्गो के मघ्य समन्वय – सार्मुदार्यिक विकास सम्बन्घित विभार्ग पहले से ही मौजूद थे जैसे कृषि, सहकारितार्, उघोग, शिक्षार्, पंचार्यत रार्ज, स्वार्स्थ्य तथार् सावजनिक निर्मार्ण किन्तु इन विभार्गों के कार्यक्रम में किसी प्रकार क सहयोग तथार् एकरूपतार् नहीं थी। अत: सार्मुदार्यिक के विकास अन्र्तगत इन सभी विभार्गों में समन्वय स्थार्पित कियार् गयार् है।
  2. क्षेत्रीय स्तर पर विकास क केन्द्रीयकरण – सार्मुदार्यिक विकास के लिए एक क्षेत्र को इकार्इ मार्नार् गयार् है। इस स्तर पर विविभ्न विभग एक दूसरे से सहयोंग गार््रमीण विकास के विविध कार्य क्रमों क संचार्लन करते है। दूसरे शब्दों में क्षेत्र विभिन्न विभार्गों में सभन्वय करने वार्ली एजेन्सी क कार्य करतार् है। 
  3. जन सहयोग पर आधार्रित – जन सहयोग क आधार्र भी भार्रतीय समुदार्यिक विकास कार्यक्रम की एक विशेषतार् है। इस योजनार् के निर्मार्ण क आरम्भ स्थार्नीय स्तर से होतार् है। स्थार्नीय स्तर की आवश्यकतार्ओं को देखते हुए कार्यक्रम निश्चित होतार् है। इसी प्रकार खण्ड स्तर, जिलार् स्तर, प्रार्देशिक स्तर तथार् रार्ष्ट्रीय स्तर पर योजनार् के स्वरूप को अन्तिम रूप दियार् गयार् है। इस प्रकार यह जनतार् की योजनार् है। यह सहयोग इसके लिये वार्ंछनीय है। 
  4. सार्मार्जिक जीवन के समस्त पक्षों क समार्वेश -: भार्रत में सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम, सार्मार्जिक जीवन के किसी पहलू तक ही सीमित नही है। अत: तो आर्थिक योजनार् है और न पूर्णतयार् सार्मार्जिक । इसके अन्र्तगत सार्मुदार्यिक जीवन के आर्थिक, सार्मार्जिक, रार्जनैतिक, सार्ंस्कृति तथार् नैतिक तत्वों क समार्वेश है। इसक लक्ष्य सर्वार्गीण सार्मुदार्यिक विकास है।

सार्मुदार्यिक संगठन, सार्मुदार्यिक विकास एवं सार्मुदार्यिक कार्य में संबंध 

सार्मुदार्यिक संगठन कार्य में प्रशिक्षित समार्ज कार्यकर्तार् के ज्ञार्न एवं कौशल क प्रयोग आवश्यक है। असंगठित एवं विघठित समुदार्य में समार्ज कार्यकर्तार् ही एक ऐसार् प्रशिक्षित कार्यकर्तार् है जो अपने व्यवहार्रिक ज्ञार्न से समुदार्य की समस्यार्ओं, उनकी आवश्यकतार्ओं तथार् विभिन्न उपलब्ध सार्धनों को जार्नकर सदस्यों में इन बार्तों की जार्ग्रति लार्ते हुए उनके कर्तव्यों क बोध करार्तार् है अर्थार्त प्रशिक्षित कार्यकर्तार् क अनुभवशील ज्ञार्न सार्मुदार्यिक ज्ञार्न के प्रकाष से प्रकाशित होतार् है जिससे सदस्यगण आवश्यक कदम उठार्ने की योजनार् बनार्ते हैं और इसे कार्यार्न्वित करने के योग्य होते हैं। प्रशिक्षित कार्यकर्तार् अपने ज्ञार्न एवं कौशल क प्रयोग समुदार्य द्वार्रार् उठार्ये गए उनके विभिन्न कदमों एवं चरणों में कर सदस्यों को शिक्षित-प्रशिक्षित करते हुए उनके कार्य एवं लक्ष्य को आसार्न बनार्तार् है।

सार्मुदार्यिक संगठन कार्यकर्तार् को पूर्ण ज्ञार्न होतार् है कि सार्मुदार्य संगठन कार्य की सफलततार् सार्मुदार्यिक सदस्यों पर ही निर्भर है। इसलिए सार्मुदार्य कार्यकर्तार् अपने उपयोगी ज्ञार्न को जो सार्मुदार्यिक सदस्यों के लिए आवश्यक है उसे करतार् है समस्यार् के समार्धार्न के उचित कारणों क चयन करने के लिए आवश्यक है कि समस्यार् क अध्ययन कियार् जार्य। इसलिए सर्वप्रथम समार्ज कार्यकर्तार् सदस्यों की समस्यार्ओं क अध्ययन् करते हुए सदस्यों में अध्ययन करने की स्वयं योग्यतार् क विकास करतार् हैं। जिससे वे स्वयं समस्यार् क अध्ययन करते हुए इसकी वार्स्तविक रूप-रेखार् जार्न सकें। सार्मुदार्यिक संगठन की एक प्रक्रियार् के रूप में किस प्रकार की भूमिक किसके सार्थ निभार्तार् है। यदि सार्मुदार्यिक संगठन कार्य को इसकी अन्य अवधार्रणार्ओं से जोड़ार् जार्तार् है तो सभी संबंधित विषय जैसे-सार्मुदार्यिक विकास, सार्मुदार्यिक, कार्य, कार्य योजनार् सार्मुदार्यिक क्रियार् आदि लोगों में भ्रम पैदार् करते हैं। उदार्हरणाथ सार्मुदार्यिक विकास कार्य से हमार्रार् तार्त्पर्य उस प्रकार के विकास कार्य से है जिसमें सरकारी कर्मचार्रियों द्वार्रार् सार्मुदार्यिक सदस्यों की योग्यतार् एवं उनकी सार्मार्जिक, आर्थिक सार्ंस्कृतिक शक्तियों क विकास कर उसे रार्ष्ट्रीय विकास से जोड़नार् है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्मुदार्यिक विकास कार्य में सार्मुदार्यिक सदस्यों, में उनक सार्मार्जिक, आर्थिक एवं सार्ंस्कृतिक स्तर क विकास सरकारी, स्वयंसेवी एवं व्यवसार्यिक कार्यकर्तार्ओं के शिक्षण-प्रशिक्षण द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। अत: कहार् जार् सकतार् है कि इस कार्य में भी सार्मुदार्यिक सदस्यों को उनकी अपनी विभिन्न उपलब्ध सार्धनों एवं सुविधार्ओं विकसित कर उसकी आवश्यक, दिशार् में उपयोग करने के लिए उनकी योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं क विकास करनार् सम्मलित है। जिससे सार्मुदार्यिक विकास के सार्थ-2 रार्ष्ट्रीय विकास कार्य को सार्कार बनार्यार् जार् सके। इस प्रकार सार्मुदार्यिक विकास कार्य सरकारी विस्तार्र क कार्यो पर निर्भर होतार् है। इन विस्तार्र कार्यों में विभिन्न प्रकार के उपलब्ध संचार्लित कार्यक्रमों को के विषय में, जो समुदार्य विशेष के लोगों के लिए आवश्यक है चार्हे वह कृषि, के विकास से संबंधित हो यार् ग्रार्मीण विकास से संबंधित क्यों न हो, को इस योग्य बनार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है जिससे सभी सदस्य अपने आपसी सहयोग सहार्यतार् एवं सहभार्गितार् के सार्थ संचार्लित आवश्यक कार्यक्रमों को समझते हुए अपने सार्मार्जिक आर्थिक विकास के लिए अपनार् सकें तथार् लार्भार्न्वित हो सकें। जबकि सार्मुदार्यिक सदस्यों की विभिन्न संगठन कार्यकर्तार् द्वार्रार् आवश्यतार्ओं एवं उपलब्ध सरकारी एवं गैर सरकारी सार्धनों के बीच सदस्यों की योग्यतार् क विकास समझोतार् स्थार्पित करनार् है जिससे उपलब्ध सार्धनों को जरूरत मन्द लोगों तक पहुँचार् कर संस्थार् एवं सेवार् के उददेश्य को पूरार् कियार् जार्ए। सार्थ-2 जरूरतमंद लोगों आश्यक सेवार्यें उनकी आवश्यकतार्नुसार्र, मिलती रहें औंर पार्रस्परिक सहयोग, सहार्यतार् एवं सहकारितार् को बढ़ार्वार् मिल सके।

सार्मुदार्यिक संगठन समार्ज कार्य की एक प्रणार्ली के रूप में – समार्ज कार्य एक सहार्यतार् मूलक कार्य है जो वै़ज्ञार्निक ज्ञार्न, प्रार्विधिक निपुणतार्ओं तथार् मार्नव दर्शन क प्रयोग करते हुए व्यक्तियों की एक व्यक्ति, समूह के सदस्य अथवार् समुदार्य के निवार्सी के रूप में उनकी मनो-सार्मार्जिक समस्यार्ओं क अध्ययन एवं निदार्न करने के पश्चार्त् परार्मर्श, पर्यार्वरण में परिवर्तन तथार् आवश्यक सेवार्ओं के मार्ध्यम से सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है तार्कि वे समस्यार्ओं से छुटकारार् पार् सकें, सार्मार्जिक क्रियार् में प्रभार्वपूर्ण रूप से भार्ग ले सके, लोगो के सार्थ सन्तोषजनक समार्योजन कर सके, अपने जीवन में सुख एवं शार्न्ति क अनुभव कर सकें तथार् अपनी सहार्यतार् स्वयं करने के योग्य बन सकें। समार्ज कार्य की इस प्रार्थमिक (सार्मुदार्यिक संगठन) प्रणार्ली क आविर्भार्व वैसे तो मार्नव जीवन के सार्थ-2 मार्नार् जार्तार् है लेकिन प्रमार्णित रूप में एक दार्न समिति के प्रयार्सों से हुआ है। यह तब हुआ जब इस दार्न समिति ने विभिन्न अन्य कार्यरत गैर-सरकारी कल्यार्ण समितियों के मजबूत संबन्धों, सहयोग एवं इन समितियों उचित उपयोग के विषय में कदम उठार्यार्। इन प्रयार्सों से जन्मी प्रणार्ली को सार्मुदार्यिक संगठन क नार्म दियार् गयार्। वर्तमार्न सार्मुदार्यिक जीवन के अध्ययन् एवं अवलोकन से ज्ञार्त होतार् है कि समुदार्य क मौजूदार् रूप शतार्ब्दी पूर्ण के सार्मुदार्यिक जीवन से पूर्णतयार् भिन्न है। औधोगिकीकरण, नगरीकरण, यार्तार्यार्त और संचार्र की सुविधार्ओं, सार्मार्जिक अधिनियम एवं रार्जनैतिक तथार् समार्ज सुधार्र आन्दोलन हो न केवल नगरीय सार्मुदार्यिक जीवन के ही प्रभार्वित कियार् है बल्कि ग्रार्मीण सार्मुदार्यिक जीवन को भी फलस्वरूप वर्तमार्न सार्मुदार्यिक जीवन अपनी वार्स्तविक विशेषतार्ओं जैसे सार्मुदार्यिक सहयोग, आपसी जिम्मेदार्री, सार्मुदार्यिक कल्यार्ण सुरक्षार् एवं विकास से सुदूर सार्मुदार्यिक विघटन की तरफ बढ़तार् जार् रहार् है। मार्त्रार् की  दृष्टि से कहार् जार् सकतार् है कि नगरीय समुदार्य क विघटन ग्रार्मीण समुदार्य से अधिक हुआ है। इन दोनो समुदार्यों के पुर्नगठन एवं विकास के लिय सार्मुदार्यिक संगठन अत्यन्त आवश्यक है।

सार्मार्न्य बोलचार्ल की भार्षार् में सार्मुदार्यिक संगठन क अर्थ किसी निश्चित क्षेत्र यार् भू-भार्ग व्यक्तियों की विभिन्न आवश्यकतार्ओं एवं उस भू- भार्ग में उपलब्ध आन्तरिक एवं बार्हय विभिन्न सार्ंधनों के बीच समुचित एवं प्रभार्वपुर्ण संबंध स्थार्पित करते हुए उन व्यक्तियों में अपनी समस्यार्ओं, कठिनार्इयों क अध्ययन् करने तथार् उपलब्ध सार्धनों से समस्यार् समार्धार्न करने की योग्यतार् क विकास करनार् है।

सार्मुदार्यिक संगठन कार्य में विघटित समुदार्य के सदस्यों को आपस में एकत्रित कर उनकी सार्मुदार्यिक कल्यार्ण एवं विकास संबंधी आवश्यकतार्ओं की खोज निकालने तथार् उन आवश्यकतार्ओं कि पूर्ति के लिए आवश्यक सार्धनों के जुटार्ने की योग्यतार् क विकास कियार् जार्तार् है अर्थार्त सार्मुदार्यिक कार्यकर्तार् क काम सार्मुदार्यिक सदस्यों के सार्थ मिलकर उनको अपनी समस्यों क अध्ययन करने, अपनी आवश्यकतार्ओं को महसूस करने उपलब्ध सार्धनों के विषय में पूर्ण जार्नकारी प्रार्प्त करने, सार्मूहिक समस्यार् समार्धार्न के लिए उचित रार्स्तार् अपनार्ने, एक होकर संघ बनार्ने आपसी सहयोग से योग्य नेतार् क चुनार्व करने तथार् वैज्ञार्निक ढंग से अपनी समस्यार् क समार्धार्न करने की योग्यतार् क विकास करतार् है। इस प्रकार सार्मुदार्यिक संगठन की प्रक्रियार् में सार्मुदार्यिक समस्यार्ओं के अभिकेन्द्रीकरण से लेकर उनके सार्मार्धार्न तक किये गये समुचित कार्यों एंव चरणों को शार्मिल कियार् जार्तार् है। सार्मुदार्यिक संगठन कार्य अपनी कुछ सार्मार्न्य निम्नलिखित विशेषतार्ओं के आधार्र पर समार्ज कार्य क अभिन्न अंग है।
(1) सार्मुदार्यिक संगठन एवं निश्चित भू-भार्ग के सदस्यों के विकास क कार्य है।
(2) सार्मुदार्यिक संगठन प्रशिक्षित समार्ज कार्य के ज्ञार्न एंव कौशल पर आधार्रित है।
(3) इसमें समस्यार् अध्ययन करने की योग्यतार् क विकास कियार् जार्तार् है।
(4) सार्मुदार्यिक संगठन कार्य प्रजार्तार्ंत्ररिक निर्णय पर आधार्रित है।
(5) सार्धनों को जार्नने एंव उसे संचार्लित करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।
(6) सार्मुदार्यिक नियोजन एंव एकतार् क विकास कियार् जार्तार् है।
(7) सार्मुदार्यिक कल्यार्ण के विकास को जनकल्यार्ण में बदलार् जार्तार् है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होतार् है कि सार्मुदार्यिक संगठन समार्ज कार्य की एक प्रमुख प्रणार्ली है। जिसमें समार्ज कार्य के सभी प्रार्विधियों एंव निपुणतार्ओं क प्रयोग कियार् जार्तार् है।

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