सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकार क अर्थ, लक्षण, कारण एवं उपचार्र

जब अधिक चिंतार् दीर्घकाल तक बनी रहती है तो वह सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति क रूप ले लेती है। बहुत से मनोवैज्ञार्निकों ने सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति को परिभार्षित कियार् है इन परिभार्षार्ओं के अवलोकन से हम सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के संप्रत्यय को भली भॉंति समझ सकते हैं।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक रोनार्ल्ड जे कोमर ने अपनी पुस्तक ‘फण्डार्मेंटल्स ऑफ एबनॉरमल सार्इकोलॉजी’ में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति को एक स्थार्यी एवं सतत रूप से जीवन की बहुत सी घटनार्ओं एवं गतिविधियों के प्रति होने वार्ली अत्यधिक चिंतार् प्रतिक्रियार् के रूप में परिभार्षित कियार् है – उनके अनुसार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृतिएक ऐसी चिंतार् विकृति है जिसे कि बहुत सी घटनार्ओं एवं गतिविधियों के बार्रे में होने वार्ली स्थार्यी एवं अत्यधिक दुश्चिंतार् एवं चिंतार् के रूप में देखार् जार्तार् है।’

एक अन्य मनोवैज्ञार्निक डेविसन एवं उनके सहयोगी नील के अनुसार्र – ‘सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति तीव्र, अनियंत्रणीय, अकेंद्रित, स्थार्यी और सतत चिंतार् के रूप में चित्रित कियार् जार्तार् है जो कि डिस्ट्रेसिंग एवं अनोत्पार्दिक होती है एवं जिसमें पेशीय तनार्व, चिड़चिड़ार्पन और विचलन के दैहिक लक्षण समार्हित होते हैं। मनोवैज्ञार्निक कार्सन, बुचर एवं मिनेक अपनी पुस्तक ‘एबनॉरमल सार्इकोलॉजी’ में फोबियार् को परिभार्षित करते हुए कहते हैं कि- ‘वस्तुओं एवं घटनार्ओं के प्रति तीव्र अविवेकपूर्ण भय ही फोबियार् है।’ आइये अब सार्मार्न्यीकृति चिंतार् विकृति को उसके नैदार्निक विवरण द्वार्रार् भली प्रकार समझने की कोशिश करते हैं।

हम आपसे कुछ प्रश्न पूछतार् हैं।

  1. क्यार् आपके घर-परिवार्र में कोर्इ चिंतार्तुर व्यक्ति है?
  2. क्यार् आपके परिवार्र में कोर्इ परफेक्शनिष्ट अर्थार्त कोर्इ ऐसार् व्यक्ति है?जिसे किसी कार्य को त्रुटिरहित सम्पूर्णतार् के स्तर तक पूर्ण करने से पूर्व चैन न मिलतार् हो एवं सार्मार्न्य तौर पर उसे यह त्रुटिरहित पूर्णतार् प्रार्य: प्रार्प्त ही न होती हो।

उपरोक्त प्रश्नों क जवार्ब आप स्वयं भी हो सकते हैं क्योंकि शार्यद ही कोर्इ ऐसार् व्यक्ति इस दुनियार् में होगार् जिसे कभी चिंतार् ने न सतार्यार् हो अथवार् चिंतार् न सतार्ती हो। हम सभी भली भॉंति जार्नते हैं कि किसी कार्य विशेष के निष्पार्दन को लेकर चिंतार् करनार् लार्भदार्यक होतार् है। यह चिंतार् हमें उसे कार्य को बेहतर तरीके से, दोष रहित रूप में निष्पार्दित करने हेतु योजनार् बनार्ने यार् योजनार्बद्ध ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्सार्हित करती है तथार् इससे हमें सफलतार् प्रार्प्त करने में सहार्यतार् मिलती है। उदार्हरण के लिए छुट्टियॉं बितार्ने के लिए पिकनिक पर जार्ने से पूर्व आप घर की प्रत्येक जिम्मेदार्री को भली भॉंति निपटार्ने के लिए सजग रहते हैं एवं घर को तार्लार् लगार्ने पर उसे दो दो बार्र जॉंचते हैं कि तार्लार् ठीक से लगार् है कि नहीं, पड़ोसियों को बार्र बार्र फोन करते हैं कि घर पर सब ठीक है अथवार् नहीं?। परन्तु जरार् अपनी उस दशार् के बार्रे में सोचिए कि जिसमें आप स्वयं से जुड़ी हर छोटी बड़ी घटनार् अथवार् गतिविधि के बार्रे में अत्यधिक चिंतार् करने लगें, तब क्यार् होगार्?। और उस स्थिति को क्यार् कहेंगे जब कि इस प्रकार की चिंतार् से कोर्इ सृजनार्त्मक लार्भ भी न होतार् हो। आप अपने आने वार्ली समस्यार् यार् परिस्थिति में क्यार् करेंगे कैसे निपटेंगे इस बार्रे में खूब चिंतार् करते हों परन्तु फिर भी उससे संबंधित कोर्इ भी सही निर्णय लेने में सदैव अनिश्चय की स्थिति में रहते हों। और हद तो तब हो जार्ती है जब आप इस चिंतार् को रोक पार्ने में तब भी असफल रहते हैं जबकि आप जार्न रहे होते हैं कि चिंतार् करने से आप क कोर्इ भलार् नहीं हो रहार् है और इससे आप के आस पार्स एवं सार्थ रहने वार्ले सभी व्यक्ति भी परेशार्न एवं आश्चर्यचकित हो रहे हैं। पार्ठकों इन्हीं लक्षणों एवं विशेषतार्ओं से युक्त मनोरोग ही सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के रूप में पहचार्नार् जार्तार् है।

डी.एस.एम.-4टी.आर में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति को इस प्रकार परिभार्षित कियार् गयार् है – ‘घटनार्ओं एवं गतिविधियों जैसे कि कार्य अथवार् स्कूल में निष्पार्दन के बार्रे में कम से कम छ: महीने तक होने वार्ली अत्यधिक दुश्चिंतार् एवं आशंका’ ही सार्मार्न्यीकृति चिंतार् कहलार्ती है। उपरोक्त परिभार्षार्ओं के विश्लेषण से सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से संबंधित कर्इ महत्वपूर्ण बिन्दु स्पष्ट होते हैं –

  1. सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति चिंतार् विकृति क एक प्रकार है।
  2. सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति में तीव्र चिंतार् एवं आशंक सतत् व्यार्प्त रहती है।
  3. सार्मार्न्यीकृत चिंतार् जीवन में सार्मार्न्य तौर पर घटने वार्ली घटनार्ओं एवं रोजमर्रार् के कार्यों एवं गतिविधियों से संबंधित होती है।
  4. सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति में व्यक्ति में भविष्य के प्रति नकारार्त्मक दृष्टि उत्पन्न हो जार्ती है एवं व्यक्ति स्वयं रोजमर्रार् के कार्यों को ठीक प्रकार से नहीं कर पार्येगार् इसकी अत्यधिक चिंतार्तुर आशंक मन में घर कर जार्ती है।

सार्ररूप में जीवन की कोर्इ भी सार्धार्रण, असार्धार्रण घटनार्, किसी भी गतिविधि चार्हे वह ऑफिस के कार्यों को निपटार्ने से संबंधित हो अथवार् स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यार्लय की पढ़ाइ के कार्यों को करने से संबंधित हो यार् फिर मित्रों, परिवार्रजनों के संबंधों को निभार्ने की कुशलतार् से जुड़ी हो को नहीं निष्पार्दित कर पार्ने की आशंक तथार् स्वयं को न नियंत्रित कर पार्ने एवं सम्भार्ल पार्ने क अताकिक डर ही सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति है।

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के लक्षण

अमेरिकन सार्इकियेट्रिक एसोशियेसन (American psychiatric association) ने सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के लक्षणों को बिन्दुवार्र स्पष्ट कियार् है।

  1. इसमें व्यक्ति सतत् प्रवार्ही चिंतार् (free floating anxiety) से ग्रस्त रहतार् है।
  2. जीवन की दैनिक घटनार्ओं एवं रोजमर्रार् के कार्यों के ठीक से न कर पार्ने की आशंक सतत बनी रहती है।
  3. व्यक्ति को यह लगतार् है कि उसक स्वयं पर से आत्मनियंत्रण खो रहार् है। 
  4. व्यक्ति में सतत प्रवार्ही चिंतार् तीन महीने से ज्यार्दार् समय तक बनी रहती है। 
  5. व्यक्ति को बेचैनी की समस्यार् लगार्तार्र बनी रहती है तथार् सार्थ ही मॉंसपेशीय तनार्व भी बनार् रहतार् है।
  6. व्यक्ति के व्यवहार्र में भी बार्र बार्र बदलार्व आतार् रहतार् है।
  7. व्यक्ति में डिस्ट्रेस एवं बिक्षुब्धतार् साथक मार्त्रार् में बढ़ जार्ती है।

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के लक्षणों को डार्यग्नोस्टिक एण्ड स्टेटिस्टिकल मैनुअल -4 टेक्स्ट रिवीजन के अध्ययन से भली भॉंति समझार् जार् सकतार् है। आइये सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के नैदार्निक कसौटी को उसके मौलिक स्वरूप में समझें।

1. सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति –

  1. कार्य अथवार् स्कूल निष्पार्दन जैसे गतिविधियों यार् घटनार्ओं के प्रति कम से कम छ महीने से ज्यार्दार् दिनों तक होने वार्ली अपरिमित चिंतार् और संबंधित समस्यार्ओं के बार्रे में सोचनीय आशंका 
  2. व्यक्ति चिंतार् को नियत्रित करनार् कठिन पार्तार् है।
  3. चिंतार् अथवार् सोचनीय आशंक कम से कम निम्नार्ंकित छ: लक्षणों में से किन्ही तीन से संबंधित हों जिनमें से कम से कम कुछ लक्षण छ: महीने से ज्यार्दार् दिनों तक रहे हों (नोट – बच्चों के लिए केवल एक लक्षण क होनार् ही पर्यार्प्त है)। 
    1. बेचैनी अथवार् भार्वनार्ओं क उफार्न पर होनार् 
    2. शीघ्र थक जार्नार् (Being easily fatigued) 
    3. एकाग्रचित्त होने में कठिनाइ अथवार् मन में शून्यतार् होनार् (Difficulty concentrating or mind going blank)
    4. चिड़चिड़ार्पन(Irritability) 
    5. मार्ंसपेशीय तनार्व (Muscle tension) 
    6. विक्षुब्ध निद्रार्, निद्रार् न आनार् यार् निद्रार् बरकरार्र न रहनार्, निद्रार् में बेचैनी, असंतोषजनक निद्रार् (Sleep disturbance (difficulty falling or staying asleep or restless, unsatisfying sleep)
  4. एक्सिस फस्र्ट डिस्आर्डर के दार्यरे तक ही चिंतार् एवं सोचनीय आशंक सीमित नहीं रहे अर्थार्त् चिंतार् एवं आशंक पैनिक डिस्आर्डर, सार्मार्जिक दुभ्र्ार्ीति, मनोग्रस्ततार् बार्ध्यतार्, विलगार्व चिंतार् विकृति, एनोरेक्सियार् नर्वोसार् यार् हार्इपोकोन्ड्रियार्सिस की वजह से नहीं हो तथार् न ही पोस्ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिस्आर्डर क हिस्सार् हो। 
  5. सार्मार्जिक, व्यार्वसार्यिक और कार्य के दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस चिंतार् एवं सोचनीय आशंक एवं दैहिक लक्षणों ने नैदार्निक रूप से साथक दुश्चिंतार् एवं विघटन उत्पन्न कियार् हो। 
  6. यह विक्षुब्धतार् किसी द्रव्य के प्रत्यक्ष फिजियोलॉजिकल प्रभार्व की वजह से न हो उदार्हरण के लिए किसी अन्य बीमार्री में उपयोग होने वार्ली दवार् के सेवन से अथवार् औषध व्यसन अथवार् सार्मार्न्य रूग्णतार् (जैसे कि हार्इपरथार्इरोडिज्म) की वजह से न हो, एवं मार्त्र मनोदशार् विकृति, सार्इकोटिक विकृति अथवार् सार्इकोटिक विकृति यार् फिर पर्वेसिव डेवलपमेंटल डिस्आर्डर के दौरार्न न हो। उपयुक्त नैदार्निक कसौटी के प्रकाश में यह स्पष्ट हो गयार् है कि सार्मार्न्यीकृति चिंतार् विकृति से जो व्यक्ति पीड़ित होतार् है उसे सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त घोषित करने हेतु न्यूनतम् जरूरी लक्षण क्यार् होने चार्हिए एवं कितने समय तक रहे होने चार्हिए। आइये अब सार्मार्न्यीकृति चिंतार् विकृति के संबंध में अपनी जार्नकारी की परीक्षार् करें।

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के कारण

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति पश्चिमी देशों के लोगों में सर्वार्धिक पार्यी जार्ती है। मनोवैज्ञार्निक केसलर एवं उनके सहयोगियों द्वार्रार् 2010 एवं 2005 में किये गये सर्वेक्षणों, रिटर, ब्लैकमोर एवं हीम्बर्ग द्वार्रार् 2010 में किये गये सर्वेक्षण के मुतार्बिक किसी भी सार्ल अमेरिक की कुल जनसंख्यार् के 4 प्रतिषत व्यक्तियों में इस विकृति के लक्षण पार्ये जार्ते हैं एवं इसी दर से यह विकृति कनार्डार्, ब्रिटेन एवं अन्य पश्चिमी देशों में भी पार्यी जार्ती है। कुलमिलार्कर सम्पूर्ण जनसंख्यार् के 6 प्रतिषत व्यक्तियों को उनके जीवन काल में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से जूझनार् पड़तार् है जो कि एक चिंतनीय मुद्दार् है। वैसे तो यह विकृति किसी भी उम्र में हो सकती है परन्तु बार्ल्यार्वस्थार् एवं किषोरार्वस्थार् में इसकी शुरूआत सर्वार्धिक पार्यी गयी है। पुरूषों के मुकाबले यह विकृति महिलार्ओं में दो गुनार् पार्यी जार्ती है। इस दौड़ में महिलार्ओं ने पुरूषों को काफी पीछे छोड़ दियार् है। मनोवैज्ञार्निक वैंग एवं उनके सहयोगियों द्वार्रार् 2011 में किये गये अध्ययन एवं के द्वार्रार् किये गये एक सर्वे के अनुसार्र इस विकृति से पीड़ित लोगों की संख्यार् क एक चौथाइ भार्ग वर्तमार्न में चिकित्सकीय प्रक्रियार् में “ार्ार्मिल हैं अर्थार्त इतने लोग अपनार् उपचार्र करवार् रहे हैंं।

अब प्रश्न उठतार् है कि इस सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के विकसित होने के पीछे कौन से कारण अथवार् कारक जिम्मेदार्र हैं। वैसे तो कारण एवं कारक कर्इ हो सकते हैं परन्तु जो प्रमुख हैं एवं जिन की आपको जार्नकारी होनी चार्हिए वे पॉंच महत्वपूर्ण कारक हैं। – 1. सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक कारक (Sociocultural factor) – 2. मनोगत्यार्त्मक कारक (Psychodyamic factor) – 3.  मार्नवतार्वार्दी कारक (Humanistic factor )- 4. संज्ञार्नार्त्मक कारक (Cognitive factor) – 5. जैविक कारक (Biological factor) – 6. व्यवहार्रार्त्मक कारक (Behavioural factor)

1. सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक कारक –

समार्ज-सार्ंस्कृतिक सिद्धार्न्त निर्मार्तार्ओं के अनुसार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से सबसे ज्यार्दार् उन लोगों मे विकसित होती है जो कि ऐसी सार्मार्जिक दशार्ओं से गुजर रहे हों जो कि उनके लिए वार्कर्इ खतरनार्क हों। जैकब, प्रिंस एवं गोल्डबर्ग (2010) एवं स्टीन और विलियम (2010) ने अपने शोध में पार्यार् है कि वे लोग जो समार्ज में काफी गंभीर दशार्ओं में जीवन यार्पन कर रहें हों एवं जिन्हें अपने अस्तित्व के लिए चुनौतियों क सार्मनार् करनार् पड़तार् हों उन लोगों में इस विकृति से संबंधित प्रधार्न लक्षणों जैसे कि तनार्व क सार्मार्न्य अहसार्स, चिंतार्, थकान, एवं विक्षुब्ध निद्रार् क विकसित होनार् स्वार्भार्विक एवं सार्मार्न्य बार्त है।उदार्हरण के लिए मनोवैज्ञार्निक बॉम एवं उनके सहयोगियों (2004) द्वार्रार् एक दुर्घटनार्ग्रस्त न्यूक्लियर पॉवर प्लार्ंट के नजदीक निवार्स करने वार्ली दो से तीन वर्ष के बच्चों की मार्तार्ओं एवं सार्मार्न्य जगह पर निवार्स करने वार्ली ऐसी ही मार्तार्ओं में मनोरोगों के स्तर के अध्ययन में पॉवर प्लार्ंट के नजदीक रहने वार्ली मार्तार्ओं में चिंतार् एवं मनोदशार् विकृति की मार्त्रार् सार्मार्न्य जगह पर निवार्स करने वार्ली महिलार्ओं की अपेक्षार् 5 गुनार् अधिक पार्यी गयी जो कि दुर्घटनार् के एक वर्ष उपरार्न्त कम होने के बार्द भी सार्मार्न्य की अपेक्षार् कर्इ गुनार् ज्यार्दार् बनी रही।

सोषियो कल्चरल थ्योरिस्ट के अनुसार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की दर आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोगों में ज्यार्दार् पार्यी जार्ती है। क्योंकि गरीबी स्वयं में ही एक अभिषार्प है एवं यह गरीब लोगों को ऐसे क्षेत्रों में निवार्स करने के लिए मजबूर कर देती है जहॉं स्वार्स्थ्य सुविधार्ओं क अभार्व हो अथवार् स्वार्स्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त न हों, इसके अलार्वार् इन इलार्कों में षिक्षार् की पर्यार्प्त सुविधार् उपलब्ध न होने के कारण आपरार्धिक घटनार्ओं की दर भी बढ़ी चढ़ी रहती है, तथार् रोजगार्र के अवसर भी न्यून होते हैं, इन परिस्थितियों के कारण इस प्रकार के सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक वार्तार्वरण में वार्स करने वार्ले लोगों में सदैव ही अपने स्वार्स्थ्य एवं जार्न-मार्ल की चिंतार् बनी रहती है जो कि कालार्न्तर में चिंतार् एवं मनोदशार् विकृति क रूप ग्रहण कर लेती है। जैकब एवं उनके सहयोगी (2010) तथार् स्टीन और विलियम (2010) ने अपने अध्ययनों में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की दर ऐसे वार्तार्वरण में रहने वार्ले लोगों में सार्मार्न्य की अपेक्षार् काफी उच्च पार्यी है। केसलर एवं उनके सहयोगियों (2010) ने तो इसे दो गुनार् बतार्यार् है। सोषियो कल्चरल थ्योरिस्ट के अनुसार्र न केवल गरीबी बल्कि जार्ति के आधार्र पर भी सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की दर में साथक अन्तर पार्यार् गयार् है। वे लोग जो रंग में “वेत हैं उनमें काले लोगों की अपेक्षार् सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति दो गुनार् कम पार्यी गयी है।

यद्यपि यह सत्य है कि तमार्म सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक कारकों पर किये गये अध्ययन यह दर्शार्ते हैं कि इन कारकों क साथक असर सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के विकसित होने की दर पर पड़तार् है, किन्तु फिर भी दार्वे के सार्थ यह नहीं कहार् जार् सकतार् है कि केवल यही कारण इस चिंतार् विकृति की उत्पत्ति एवं विकास के लिए सम्पूर्ण रूप से जिम्मेदार्र हैं। क्योंकि इन्हीं सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक दशार्ओं में जीवनयार्पन करने वार्ले ही बहुत से गरीब पिछडे़ एवं अशिक्षित लोगों में इस विकृति के लक्षण विकसित होते हुए नहीं पार्ये गये हैं। जो इस ओर इशार्रार् करते हैं कि शोध द्वार्रार् उपलब्ध जार्नकारी अभी पर्यार्प्त नहीं है एवं सच्चाइ क प्रकटीकरण जरूरी है। इसे और स्पष्ट करने के लिए हम अन्य विचार्रधार्रार्ओं क सहार्रार् भी ले सकते हैं इनक वर्णन आगे की पंक्तियों में कियार् जार् रहार् है।

2. मनोगत्यार्त्मक कारक –

प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक सिगमण्ड फ्रार्यड (1933, 1917) के अनुसार्र अपने शार्रीरिक एवं मार्नसिक विकास के दौर में सभी बच्चे कभी न कभी चिंतार् के अनुभव से गुजरते हैं एवं इससे निपटने के लिए वे इगो डिफेंस मेकेनिज्म क प्रयोग भी करते हैं। जब बच्चों के मार्तार्-पितार् अथवार् बड़ों के द्वार्रार् किन्हीं उपार्यों से इन बच्चों के इड की वजह से उत्पन्न इच्छार्ओं एवं आवेगों को नियंत्रित कर उन्हें स्वार्भार्विक रूप से अभिव्यक्त करने से रोक जार्तार् है तो उनमें तंत्रिका-तार्पी चिंतार् उत्पन्न (न्यूरोटिक एन्जार्इटी) हो जार्ती है। जब यही बच्चे वार्स्तविक खतरे क अनुभव करते हैं तक उन्हें वार्स्तविक चिंतार् (रियल एन्जार्इटी) क अनुभव होतार् है। एवं इन्हीं बच्चों को नैतिक चिंतार् (मोरल एन्जार्इटी) क अनुभव तब होतार् है जब उन्हें उनके इड के द्वार्रार् उत्पन्न इच्छार्ओं एवं आवेगों की अभिव्यक्ति के लिए दण्डित कियार् जार्तार् है।

मनोगत्यार्त्मक कारण आधार्रित व्यार्ख्यार् : जब बार्ल्यार्वस्थार् ंिचंतार् हल हुए बिनार् ही रह जार्ती है।
फ्रार्यड के अनुसार्र जब एक बार्लक न्यूरोटिक अथवार् नैतिक चिंतार् की सार्मार्न्य से अधिक मार्त्रार् से ग्रसित होतार् है तब उसे सार्मार्न्यीकृत चिंतार् होने की सार्री परिस्थितियॉं विनिर्मित हो जार्ती हैं। विकास की शुरूआती अवस्थार्ओं के अनुभव बार्ार्लक में अप्रार्संगिक रूप से उच्च चिंतार् उत्पन्न कर सकते हैं। उदार्रहरण के लिए जब एक बार्लक को शैशवार्वस्थार् में भूख लगने पर दूध के लिए मचलने एवं हर बार्र रोने पर दण्ड स्वरूप नितंबों पर आघार्त कियार् जार्तार् है तो ऐसार् बार्लक दो वर्ष की विकासार्त्मक अवस्थार् में दण्ड मिलने पर अपनी पैंट गीली कर देतार् है तथार् घुटने पर चलने की अवस्थार् में अपने जननार्ंगों को प्रदर्षित करतार् है। इसके परिणार्मस्वरूप अन्तत: बार्लक इस निष्कर्ष पर पहुॅंच सकतार् है कि उसके इड की इच्छार्यें एवं आवेग काफी हार्निकारक हैं और उसकी वजह से उसमें इन इच्छार्ओं अथवार् आवेगों के उत्पन्न होने पर अकुलार्हक चिंतार् उत्पन्न होने की प्रवृत्ति जन्म ले सकती है।

विपरीत नजरिये से यदि देखें तो ऐसे बच्चे क इगो सुरक्षार् प्रक्रम (र्इगो डिफेंस मेकेनिज्म) इतनार् कमजोर होतार् है कि वह सार्मार्न्य चिंतार् क भी सक्षमतार् के सार्थ सार्मनार् नहीं कर पार्तार् है। फ्रार्यड के अनुसार्र वे बच्चे जिन्हें कि उनके मार्तार् पितार् के द्वार्रार् अत्यधिक सुरक्षार् प्रदार्न की जार्ती है। जिनकी छोटी से छोटी एवं बड़ी से बड़ी कइिनार्इयों को मार्तार्-पितार् स्वयं हल करते हैं एवं उनक बचार्व करते हैं, विपरीत परिस्थितिओं क सार्मनार् करने क अवसर ही नहीं मिल पार्तार् जिसके फलस्वरूप उनमें एक मजबूत एवं प्रभार्वी सुरक्षार् प्रक्रम विकसित ही नहीं हो पार्तार् है। जब वयस्क जीवन में उन्हें कठिन परिस्थितियों से उनक सार्मनार् होतार् है तब वे उससे निपट ही नहीं पार्ते हैं, उनक र्इगो सुरक्षार् प्रक्रम काफी कमजोर होतार् है एवं वे अपनी चिंतार् को नियंत्रित नहीं कर पार्ते हैं।

हार्लार्ंकि प्रार्य: मनोगत्यार्त्मक थ्योरिस्ट सार्मार्न्यीकृत चिंतार् की व्यार्ख्यार् करने के फ्रार्यड के कुछ विशिष्ट तरीकों से असहमति जतार्ते हैं परन्तु उनमें से बहुत से इस बार्त से भी काफी सहमत हैं कि इस विकृति के चिन्हों को बच्चों एवं उनके मार्तार्-पितार् के बीच प्रार्रंभिक संबधों में पनपी असहजतार् में ढूॅंढ़ार् जार् सकतार् है (षाफ, 2012)। इन मनोगत्यार्त्मक व्यार्ख्यार्ओं को अनुसंधार्नकर्तार्ओं ने बहुत से तरीकों से जॉंचने परखने क प्रयार्स कियार् है। ऐसे ही एक प्रयार्स में अनुसंधार्नकर्तार्ओं ने यह परिकल्पनार् कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के रोगी चिंतार् से बचने के लिए सुरक्षार् प्रक्रम अपनार्ते हैं, कि जॉंच की। इसके तहत उन्होंने पहले से ही इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों से योजनार् के तहत उन घटनार्ओं पर बार्त करने के लिए कहार् जिनसे उनमें पहले काफी व्यार्कुलतार्दार्यक चिंतार् उत्पन्न हो जार्ती थी। परिणार्म में ज्यार्दार्तर रोगियों द्वार्रार् उन घटनार्ओं को भूल जार्ने की बार्त, तुरंत की गयी बार्त को भी भूल जार्ने की बार्त अनुक्रियार् के रूप में कही गयी। इसके अलार्वार् कुछ रोगीे तो बार्तचीत की दिशार् को ही बदल दियार्। फ्रार्यड के अनुसार्र पीड़ार्दार्यक घटनार्ओं को भूल जार्नार् चिंतार् दूर करने हेतु प्रयुक्त कियार् गयार् एक सुरक्षार् प्रक्रम होतार् है जिसे दमन (रिप्रेशन) कहार् जार्तार् है। कुछ रोगी तो इस सुरक्षार् प्रक्रम को इस सीमार् तक अपनार्ते हैं कि वे नकारार्त्मक संवेगों के अनुभव को ही सिरे से नकार देते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें तो जीवन में इस प्रकार क अनुभव कभी हुआ ही नहीं ।

दूसरे तरह के प्रयार्सों में अनुसंधार्नकर्तो ने ऐसे बच्चों पर अपनार् ध्यार्न केंद्रित कियार् है जिन्हें उनके इड की इच्छार्ओं एवं आवेगों की अभिव्यक्ति की वजह से बचपन में अतिरंजित दण्ड दियार् गयार्। बुष, मिलॉर्ड एवं शियर (2010) के अनुसार्र ऐसे बच्चों जीवन की अन्य अवस्थार्ओं में व्यार्कुलतार्परक चिंतार् की काफी मार्त्रार् से ग्रस्त रहते हैं। इसके अलार्वार् मेनफ्रेडी एवं उनके सहयोगियों (2011) अपने शोध से यह प्रमार्णित कियार् है कि जिन बच्चों को बचपन में उनके मार्तार्-पितार् द्वार्रार् काफी सुरक्षित जीवन जीने की सुविधार् मिलती है उनमें आगे चलकर सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकसित होने की संभार्वनार् काफी बढ़ जार्ती है।

यह सत्य है कि उपरोक्त वर्णन में जिन अध्ययनों की चर्चार् की गयी है वे सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति में मनोगत्यार्त्मक कारकों की वकालत करने में सफल रहे हैं परन्तु बहुत से ऐसे मनोवैज्ञार्निक हैं जिन्होंने इन अध्ययनों की प्रार्मार्णिकतार् पर कुछ अनुत्तरित प्रश्नों एवं संभार्वनार्ओं के मार्ध्यम से सवार्ल उठार्ये हैं। उनके अनुसार्र चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली घटनार्ओं के संदर्भ में चिकित्सार् की शुरूआत में ही चिकित्सक द्वार्रार् सीधे सवार्ल पूछे जार्ने पर भूल जार्ने अथवार् बार्तचीत की दिशार् मोड़ने की रोगी द्वार्रार् की गयी प्रतिक्रियार् स्वार्भार्विक भी हो सकती है, क्योंकि इस बार्त की पूरी संभार्वनार् हो सकती है कि वे जार्नबूझकर जीवन की नकारार्त्मक घटनार्ओं पर ध्यार्न केंद्रित करने की बजार्य जीवन के सकारार्त्मक पहलुओं पर ध्यार्न केंद्रित करनार् चार्ह रहे हों। अथवार् चिकित्सक में उनक विश्वार्स उत्पन्न होने से पूर्व इस पर बार्त शुरू करनार् उन्हें व्यार्कुल करतार् हो। आइये अब इस चिंतार् विकृति के विकसित होने के कारण को मार्नवतार्वार्दी नजरियें से समझने क प्रयार्स करते हैं।

3. मार्नवतार्वार्दी कारक –

मार्नवतार्वार्दी सिद्धार्न्तनिर्मार्तार्ओं क सर्वार्धिक जोर सदैव स्वार्भार्विकतार् एवं सहज प्रवृत्ति पर रहार् है। उन्होंने सदैव परिस्थितियों एवं दैहिक दशार्ओं में मार्नवीय इच्छार्शक्ति, अनुभव करने की शक्ति एवं आत्मशक्ति में सदैव मार्नवीय इच्छार्शक्ति उसके चेतन अनुभवों एंव आत्मशक्ति को ही महत्व दियार् है। उनके अनुसार्र प्रत्येक व्यक्ति में स्वयं को जार्नने अपनी संभार्वनार्ओं को तलार्शने एवं उनक विकास करने की संवार्रने की स्वार्भार्विक मूलवृत्ति होती है। जब तक व्यक्ति अपनी इस स्वभार्व पर नैसर्गिक एवं र्इमार्नदार्र दृष्टि रखतार् है तथार् वार्तार्वरण एवं परिस्थितियों से प्रभार्वित नहीं होतार् है तब तक उसक स्वस्थ मार्नसिक विकास होतार् रहतार् है। जब व्यक्ति स्वयं को स्वीकारने की मूलवृत्ति के बजार्य सार्मार्जिक वार्तवरण एवं परिस्थितियों के कारण सत्य को नकारने लगतार् है तथार् अपने सहज ंिचंतन, भार्व एवं व्यवहार्र पर ध्यार्न नहीं देतार् है, तो इससे उसमें कालार्न्तर में कुंठार् क भार्व जन्म लेतार् है जो उसमें चिंतार् को बढ़ार्वार् देतार् है एवं जब व्यक्ति को उसकी संभार्वनार् क एवं उनकी वार्स्तविकतार् क ज्ञार्न नहीं हो पार्तार् है तथार् सहज प्रवृत्ति की विपरीत दिशार् में चल पड़तार् है तो उसमें सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकसित होने की संभार्वनार् बढ़ जार्ती है एवं वह उससे ग्रस्त हो जार्तार् है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक कार्ल रोजर्स ने बच्चों में इस चिंतार् विकृति के विकसित होने को कारणों को मार्नवतार्वार्दी नजरिये से काफी उत्तम ढंग से स्पष्ट कियार् है। उनके अनुसार्र वे बार्लक जिन्हें बचपन में बड़ों के द्वार्रार् सहज रूप से विकसित होने हेतु शर्तरहित सकारार्त्मक सम्मार्न (अनकंडीशनल पॉजिटिव रिगाड) नहीं प्रार्प्त होतार् है वे आगे चलकर स्वयं के क्रूर आलोचक हो जार्ते हैं उनमें अपने फैसलों की उपयुक्ततार् पर भरोसार् नहीं होतार् है। तथार् वे अपने मूल्यॉंकन काफी कठोर मार्नकों पर करते हैं। अपने इन मार्नकों एवं मार्नदण्डों पर खरार् उतरने के लिए वे अपने सहज स्वभार्व क तिरस्कार करते हैं अपने सत्य विचार्रों एवं भार्वनार्ओं पर ध्यार्न नहीं देते ये उन्हें अपने लक्ष्यों को हार्सिल करने में बार्धार् प्रतीत होते हैं। अपनी सहज प्रवृत्ति क इस सीमार् तक तिरस्कार करते रहने से उनमें तीव्र चिंतार् उत्पन्न होती रहती है जो कि आगे चलकर दीर्घ एवं स्थार्यी चिंतार् में बदल जार्ती है एवं सार्मार्न्यीकृत चिंतार् क स्वरूप ग्रहण कर लेती है। आइये अब सार्मार्न्यीकृत चिंतार् के संज्ञार्नार्त्मक कारकों के बार्रे में जार्नें।

4. संज्ञार्नार्त्मक कारक  –

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की कारणार्त्मक व्यार्ख्यार् संज्ञार्नार्त्मक मनोवैज्ञार्निकों के द्वार्रार् संज्ञार्न में होने वार्ली संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओं के आधार्र पर की गयी है। संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओ में व्यक्ति द्वार्रार् प्रयुक्त चिंतन प्रक्रियार्, समस्यार्-समार्धार्न प्रक्रियार्, उसक प्रत्यक्षण, अवधार्न, स्मृति आदि आते हैं। इन मार्नसिक प्रक्रियार्ओं क प्रयोग जब व्यक्ति अपअनुकूलित तरीके से करतार् है यार् दूसरे शब्दों में उसमें अपअनुकूलित स्वभार्व विकसित हो जार्तार् है तब उसके मनोरोगी होने की संभार्वनार् बढ़ जार्ती है। संज्ञार्नार्त्मक मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के विकसित होने के पीछे व्यक्ति क नकारार्त्मक चिंतन, विकृत विश्वार्स, धार्रणार्यें एवं मार्न्यतार्यें होती हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक एलबर्ट एलिस (2011) के अनुसार्र बहुत से व्यक्ति अपने जीवन में अताकिक एवं अविवेकपूर्ण धार्रणार्ओं द्वार्रार् निर्देशित होते हैं जो कि उन्हें जीवन की घटनार्ओं एवं सार्मार्न्य परिस्थितियों में भी अनुपयुक्त ढंग से व्यवहार्र करने के लिए प्रेरित करती हैंं। एलिस ने इन्हे मूल अविवेकपूर्ण धार्रणार्यें (बेसिक इर्रेशनल बिलीफ) कहकर सम्बोधित कियार् है। एवं वह दार्वार् करते हैं कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त लोगों में निम्नार्ंकित प्रकार की दृढ़ एवं अविवेकपूर्ण धार्रणार्यें होती हैं ।

एक मनुष्य के लिए अत्यंत जरूरी है कि उसके समुदार्य के प्रत्येक महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वार्रार् उसे स्नेह, अपनार्पन एवं अनुमोदन प्रार्प्त हो। जब कोर्इ जैसार् चार्हतार्, व पसन्द करतार् है, वैसार् उस तरीके से नहीं होतार् है तो यह स्थिति बहुत दुखदार्यक एवं दुर्घटनार्स्वरूप है। यदि किसी को स्वयं को मूल्यवार्न समझनार् है तो उसे पूर्ण रूप से योग्य, उपयुक्त एवं सभी क्षेत्रों उपलब्धि हार्सिल करने वार्लार् होनार् चार्हिए। एलिस कहते हैं कि वे व्यक्ति जिनकी धार्रणार्ये एवं मार्न्यतार्यें उपरोक्त प्रकार की होती हैं उनक सार्मनार् किसी तनार्वपूर्ण परिस्थिति से होतार् है तो वे उसे परिस्थिति के प्रति नकारार्त्मक अनुक्रियार् ही देते हैं दूसरे शब्दों में उनकी इसी प्रकार की धार्रणार्ओं की वजह से वे ऐसी परिस्थितियॉं जो कि व्यक्ति के जीवन में सकारार्त्मक परिणार्म लार्ती हैं जैसे कि नर्इ नौकरी लगनार्, जीवन सार्थी से पहली भेंट, कोर्इ परीक्षार् आदि से सार्मनार् होने पर काफी तनार्व में आ जार्ते हैं एवं सार्मार्न्य लोगों के समार्न इनक सार्मनार् करने के बार्वजूद पूर्ण रूप से त्रुटिरहित कार्य निष्पार्दन करने की स्वयं से अतिरंजित अपेक्षार् की वजह से चिंतार्ग्रस्त हो जार्ते हैं। उनक प्रत्यक्षण भी नकारार्त्मक हो जार्तार् है एवं वह इन घटनार्ओं को इतने खतरनार्क नजरिये से देखते हैं कि इनके प्रति असहज प्रतिक्रियार् देते हैं एवं भय भी महसूस करने लगते हैं। इन्हीं धार्रणार्ओं, विश्वार्सों एवं मार्न्यतार्ओं से चिपके रहने के कारण यही चिंतार् लम्बे समय तक बनी रहने पर सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त हो जार्ते हैं एवं उन्हें इसके उपचार्र के लिए मनोचिकित्सक क सहार्रार् लेनार् पड़तार् है।

प्रख्यार्त संज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्तवार्दी मनोवैज्ञार्निक एरोन बेक कहते हैं कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त व्यक्ति अपने मन में ऐसी मूक धार्रणार्यें रखते हैं जो कि इंगित करती हैं कि वे भयार्नक खतरे में हैं। उदार्हरण के लिएक्लाक एवं बेक (2012) कुछ धार्रणार्ओं को सार्मने रखते हैं जैसे – ‘एक परिस्थिति अथवार् एक व्यक्ति तब तक असुरक्षित है जब तक कि वह सुरक्षित सार्बित न हो जार्ये (A situation or a person is unsafe until proven to be safe)।’ यार् – ‘सर्वार्धिक बुरार् क्यार् हो सकतार् है इसकी कल्पनार् कर लेनार् हमेशार् ही सबसे अच्छार् है (It is always best to assume the worst)।’फेरार्री एवं उनके सहयोगियों (2011) के अनुसार्र एलिस एवं बेक दोनों के ही प्रस्तार्वों के समय से ही अन्य मनोवैज्ञार्निक एवं शोधार्थ्र्ार्ी अपने अध्ययनों के आधार्र पर यह कहते रहे हैं कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के रोगी भी विशेष रूप से खतरे के सबंध में कुसमार्योजी यार् अपअनुकूलित धार्रणार्ओं को अपने मन में धार्रण कर के रखते हैं। एलिस एवं बेक की व्यार्ख्यार्ओं केार् आधार्र मार्नने के उपरार्न्त से ही सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के विकास के कारकों की व्यार्ख्यार् नये तरीके से की जार्ने लगी है आइये उन नये नजरिये के बार्रे में जार्नें।

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की नवीन संज्ञार्नार्त्मक व्यार्ख्यार्यें- एलिस एवं बेक के विवेचनों के आधार्र पर कर्इ सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की कर्इ नवीन व्यार्ख्यार्यें हार्ल ही के वर्षों में नये तरीकों से की गयी है। इन नये तरीकों में तीन तरीके सर्वार्धिक महत्वपूर्ण हैं- 1. मेटार्कॉग्निटिव थ्योरी (Metacognitive theory), 2. अनिश्चिततार् सिद्धार्न्त की असहनशीलतार् (The intolerance of uncertainty theory) 3. परिहार्र सिद्धार्न्त (Avoidance theory)। इनक विस्तृत वर्णन निम्नार्ंकित है –

मेटार्कॉग्निटिव थ्योरी (Metacognitive theory)-एड्रियन वेल्स (2011) के द्वार्रार् विकसित की गयी इस थ्योरी के अनुसार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त लोग अपरोक्ष अथवार् अव्यक्त रूप में चिंतार् के संदर्भ में अपनी सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक विचार्र रखते हैं। सकारार्त्मक दृष्टि से वे इस विचार्र में विश्वार्स करते हैं कि जीवन में आने वार्ली चुनौतियों को सार्वधार्नी पूर्वक बेहतर मूल्यॉंकन में चिंतार् करनार् एक बेहतर तरीक है। एवं इस विचार्र पर विश्वार्स कर वे सतत् रूप से चिंतार् ही करते रहते हैं। वहीं दूसरी ओर वे चिंतार् के संबंध में नकारार्त्मक विचार्रों को भी अपनी धार्रणार्ओं क हिस्सार् बनार्कर रखते हैं और चिंतार् के प्रति उनक यही नकारार्त्मक नजरियार् मार्नसिक विकृति के विकास के द्वार्र खोल देतार् है। ऐसार् इसलिए होतार् है क्योंकि हमार्रार् समार्ज ही उन्हें यह सिखार्तार् है कि चिंतार् करनार् एक बुरी आदत है एवं यह हमार्रे मार्नसिक एवं शार्रीरिक स्वार्स्थ्य के लिए हार्निकारक है। फलत: बार्र बार्र चिंतार् करने पर व्यक्ति अपनी चिंतार् करने की आदत के नकारार्त्मक परिणार्मों के प्रति अपने चिंतन में अतिसंवेदनशील हो जार्तार् है एवं वह बहुत चिंतार् कर रहार् है इस बार्त की भी वह चिंतार् करने लगतार् है, और उसे यह अपने नियंत्रण से बार्हर प्रतीत होती है। इसक परिणार्म उस व्यक्ति के जीवन में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के रूप में सार्मने आतार् है।

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की इस व्यार्ख्यार् को वेल्स (2011) एवं फेरार्री (2010) द्वार्रार् किये गये अध्ययनों के परिणार्मों से सकारार्त्मक बल एवं समर्थन मिलतार् है। अनिश्चिततार् सिद्धार्न्त की असहनशीलतार् (The intolerance of uncertainty theory)-सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की एक अन्य नवीन प्रकार की व्यार्ख्यार् जिसे कि अनिश्चिततार् सिद्धार्न्त की असहनशीलतार् के रूप में समझार्यार् गयार् है के अनुसार्र कुछ व्यक्तियों में सहनशीलतार् की इतनी कमी होती है कि वे इस जार्नकारी को कि उनके सार्थ भी जीवन में नकारार्त्मक घटनार्यें घट सकती हैं, यह जार्नते हुए कि ऐसार् होने की संभार्वनार् काफी कम अथवार् न के बरार्बर है इसको सहन नहीं कर पार्ते हैं।चॅूंकि जीवन में कौन सी घटनार् कब घटेगी यह पूर्णतयार् निश्चित नहीं होतार् है एवं घटनार्यें अनिश्चित तरीके से घटती हैं अतएव इन अनिश्चित घटनार्ओं के जितने भी उदार्हरण ऐसे व्यक्तियों को मिलते जार्ते हैं वे उन्हें और भी चिंतिंत कर देते हैं और वे इस बार्त की चिंतार् करने लगते हैं कि आने वार्ली घटनार् निश्चित ही उनके लिए परेशार्नी क सबब बन जार्येगी। प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक फिषर एवं वेल्स (2011) तथार् डग्ज एवं उनके सहयोगियों (2010) के अनुसार्र सहनशीलतार् की ऐसी कमी एवं सतत् चिंतार् ऐसे व्यक्तियों को वो सभी जरूरी चीजें मुह्यार् करार्ती हैं जिससे सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति विकसित हो सके। कल्पनार् कीजिए कि आपने पहली बार्र नौकरी पार्ने के लिए आवेदन कियार् है एवं सार्क्षार्त्कार हो जार्ने के उपरार्न्त सार्क्षार्त्मकारकर्तार्ओं द्वार्रार् कुछ दिनों के उपरार्न्त परिणार्म बतार्ने के लिए कहार् है। ऐसे में परिणार्म क्यार् होगार्? यह सोच सोच कर आप परेशार्न अवश्य होंगे। यदि आप नकारार्त्मक घटनार्ओं के प्रति अतिसंवेदनशील हैं एवं इसकी अनिश्चिततार् से परेशार्न रहते हैं तो चिंतार् की यह परिस्थिति आप के लिए असहनीय हो जार्येगी। यही स्थिति सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त व्यक्ति की भी होती है।

परिहार्र सिद्धार्न्त (Avoidance theory)- अंत में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की एक अन्य नये तरह की व्यार्ख्यार् परिहार्र सिद्धार्न्त के द्वार्रार् भी की जार्ती है। इस व्यार्ख्यार् क श्रेय शोधार्थ्र्ार्ी थॉमस बोरकोवेक को जार्तार् है उनके अनुसार्र इस विकृति से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर क उत्तेजन स्तर जिसे कि अंग्रेजी में एरार्उजल कहार् जार्तार् है सार्मार्न्य व्यक्तियों की अपेक्षार् कहीं ज्यार्दार् होतार् है। इस प्रकार के व्यक्तियों की हृदय गति, श्वसन दर, नार्ड़ी गति आदि तीव्र होती हैं। इसके अलार्वार् ऐसे व्यक्तियों में अपने इस उत्तेजनार् स्तर को चिंतार् के द्वार्रार् कम करने की प्रवृत्ति पार्यी जार्ती है। मनोवैज्ञार्निक न्यूमेन एवं उनके सहयोगियों (2011) ने इस प्रवृत्ति के पीछे छिपे कारणों क विश्लेषण कियार् है उनके अनुसार्र बढ़े हुए शार्रीरिक उत्तेजन के कारण व्यक्ति में बेचैनी एवं तनार्व बढ़ जार्तार् है जिससे बचने के लिए ऐसे व्यक्ति ज्यों ही चिंतार् करनार् प्रार्रंभ करतार् है उसक ध्यार्न शरीर से हट जार्तार् है एवं चिंतार् के संज्ञार्नार्त्मक पहलू की ओर केंद्रित हो जार्तार् है। परिणार्म स्वरूप तार्त्कालिक रूप से यह चिंतार् उसकी शार्रीरिक उत्तेजनार् को शार्ंत करने में सफल हो जार्ती है परन्तु दीर्घार्वधि में ऐसार् करने की आदत अपअनुकूलित होने के कारण व्यक्ति के मार्नसिक स्वार्स्थ्य के लिए हार्निकारक होती है। फलत: व्यक्ति सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त हो जार्तार् है।

5. जैविक कारक – 

जैविक मनोवैज्ञार्निकों क विश्वार्स है कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति जैविक कारकों की वजह से होती है। बरसों से मनोवैज्ञार्निक इसक अध्ययन परिवार्रों के बीच रक्त संबंधों के शोध के मार्ध्यम से करते रहे हैं। इस के अन्तर्गत मनोवैज्ञार्निक किसी को सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति हो जार्ने पर उसके परिवार्र अथवार् रिश्तेदार्रों में किसे यार् कितने और व्यक्तियों को यह चिंतार् विकृति है अथवार् हुर्इ थी इसक पतार् लगार् कर यह जार्नने की कोशिश करते हैं कि कहीं यह आनुवार्ंशिक तो नहीं है। क्योंकि यदि इस विकृति क कारण जैविक आनुवार्ंशिकतार् है तो रक्त संबंधों में आने वार्ले अन्य व्यक्तियों में इसके पार्ये जार्ने की संभार्वनार् अथवार् भविष्य में होने की संभार्वनार् स्वार्भार्विक रूप से बढ़ जार्येगी। एवं इस प्रकार जैविक संबंधियों में इस विकृति के पनपने की संभार्वनार् दर भी समार्न होगी। स्कीनले एवं उनके सहयोगियों (2011) ने अपने अनुसंधार्नों द्वार्रार् यह प्रमार्णित भी कियार् है कि जैविक संबंधियों में सार्मार्न्य लोगों की अपेक्षार् इस विकृति के पनपने की दर कहीं ज्यार्दार् होती है। इस विकृति से ग्रस्त 15 प्रतिशत रक्त संबंधियों में अथवार् जैविक संबंधियों में यह विकृति पार्यी जार्ती है जो अन्यों में पार्ये जार्ने वार्ली विकृति से काफी ज्यार्दार् है। यह जैविक निकटतार् जितनी ही अधिक होती है विकृति के पनपने की संभार्वनार् भी उतनी ही अधिक होती है।

हार्ल ही के वर्षों में माटिन एवं नेमरॉफ (2010) जैसे जैवशार्स्त्रियों ने सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के जैविक कारकों से जुड़ार्व के संदर्भ में खोजें की हैं एवं प्रमार्ण जुटार्ये हैं। इस प्रकार की सर्वप्रथम खोज सन् 1950 में हुर्इ थी, जिसमें शोधाथियों ने बेन्जोडार्इएजेपीन (Benzodiazepines) नार्मक औषध को चिंतार् को कम करने में सक्षम पार्यार् थार्। बेन्ज्ार्ोडार्इएजेपीन स्वयं में औषधियों क एक परिवार्र है जिसमें एल्प्रार्जोलम (alprazolam), लोरार्जेपार्म (lorazepam), एवं डार्इजेपॉम (diazepam) जिसे क्रमश: अन्य नार्मों जैनैक्स (xanax), एटीवार्म (ativam) एवं वैलियम (valium) कहार् जार्तार् है सम्मिलित होती हैं। हार्लॉंकि शुरूआत में शोधार्थ्र्ार्ी यह जार्नने में असफल रहे कि बेन्जोडार्इएजेपीन किस प्रकार चिंतार् स्तर में कमी लार्ती है। परन्तु बार्द में उन्नत रेडियोएक्टिव तकनीकी के विकास से इस बार्त क पतार् चलार् कि ब्रेन में कुछ ऐसे स्थार्न हैं जो कि बेन्जोडार्इएजेपीन द्वार्रार् प्रभार्वित होते हैं। स्पष्ट रूप में बे्रन में कुछ ऐसे न्यूरोन होते हैं जिनमें कि बेन्जोडार्इएजेपीन के रिसेप्टर पार्ये जार्ते हैं। अनुसंधार्नकर्तार्ओं ने आखिरकार कुछ ऐसे न्यूरोट्रार्ंस्मीटर क पतार् लगार् लियार् जिन्हें कि बेन्जोडार्इएजेपीन रिसेप्टर के द्वार्रार् रिसीव कियार् जार्तार् है। इस प्रकार के न्यूरोट्रार्ंस्मीटरों में गार्बार् (GABA)- गार्मार् अम्यूनोब्यूटॉयरिक एसिड(Gama aminobutyric acid) नार्मक न्यूरोट्रार्ंस्मीटर मुख्य है। अनुसंधार्नकर्तार्ओं के मुतार्बिक इस गार्मार् अम्यूनोब्यूटॉयरिक एसिड की मार्त्रार् में कमी अथवार् बढ़ोत्तरी की दशार् में चिंतार् की अनुक्रियार् प्रभार्वित होती है। दूसरे “ार्ब्दों में जब इस न्यूरोट्रार्ंस्मीटर को रिसीव करने वार्ले बेन्जोडार्इएजेपीन रिसेप्टर की मार्त्रार् में कमी हो जार्ती है यार् इनकी इस न्यूरोट्रार्ंस्मीटर को रिसीव करने की क्षमतार् में कमी हो जार्ती है तो चिंतार् अनुक्रियार् के फीडबैक सिस्टम पर इसक साथक प्रभार्व पड़ने लगतार् है। परिणार्मस्वरूप व्यक्ति इसके परिणार्म बहुत बार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के रूप में सार्मने आते हैंं। हार्ल ही में हुये अन्य शोध यह दर्शार्ते हैं कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की यह न्यूरोट्रार्ंस्मीटर आधार्रित व्यार्ख्यार् इतनी सरल भी नहीं है यह अत्यंत ही जटिल है क्योंकि कुछ अध्ययनों में चिंतार् की अनुक्रियार्ओं में मस्तिष्क के न्यूरोसर्किट में सम्मिलित मस्तिष्क के अन्य हिस्सों की भार्गीदार्री होने के भी प्रमार्ण प्रार्प्त हुये हैं इन हिस्सों में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, एन्टीरियर सिंगुलेट, एवं एमार्इग्डेलार् प्रमुख हैं। स्कीनले एवं उनके सहयोगियों (2011) द्वार्रार् किये गये हार्ल ही के अध्ययन यह दर्शार्ते हैं कि मस्तिष्क के इन हिस्सों से जुड़ार् बे्रन सर्किट सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के मरीजों में अनुपयुक्त तरीके से अनुक्रियार् करतार् है जो कि यह प्रमार्णित करतार् है कि इनक भी इस विकृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिक है।

6. व्यवहार्रार्त्मक कारक- 

व्यवहार्रार्त्मक मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति फोबियार् नार्मक चिंतार् विकृति के समार्न ही सीखी गयी विकृति होती है। इस विकृति के सीखने यार् पनपने के पीछे क्लार्सिकी अनुबंधन (क्लार्सिकल कन्डीशनिंग) क सिद्धार्न्त कार्य करतार् है इसके अनुसार्र व्यक्ति व्यक्ति चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति के प्रति जो अनुक्रियार् स्वार्भार्विक रूप से करतार् है उसे ही सार्मार्न्य उद्दीपक के प्रति भी एसोसियेसन के सिद्वार्न्त के आधार्र पर करनार् सीख जार्तार् है। हार्लार्ंकि ऐसार् प्रथम बार्र में ही नहीं हो जार्तार् है बल्कि बार्र बार्द चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति की उत्पत्ति के समय में ही सार्मार्न्य उद्दीपक की उपस्थिति होने पर व्यक्ति उस दूसरे उद्दीपक को भी चिंतार् से ही जुड़ार् हुआ समझतार् है तथार् उसके प्रति भी चिंतार् की अनुक्रियार् करनार् सीख लेतार् है।

क्लार्सिकी अनुबंधन के अलार्वार् मॉडलिंग भी इस चिंतार् विकृति के विकास में काफी महत्वपूर्ण भूमिक अदार् करती है जब चिंतार् के स्वभार्व वार्लार् व्यक्ति चिंतार् से ग्रस्त अन्य व्यक्तियों को सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त देखतार् है तब उसे इस बार्त क प्रमार्ण मिल जार्तार् है कि यह समस्यार् केवल उसे ही नहीं है बल्कि अन्य लोगों को भी है एवं वे भी उससे निपट नहीं पार् रहे हैं फलत: उस व्यक्ति में भी स्वयं अपनी चिंतार् से पीछार् नहीं छुड़ार् पार्ने की मनोदशार् विकसित हो जार्ती है और उसकी सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति और भी गंभीर हो जार्ती है। इसके अलार्वार् उद्दीपक सार्मार्न्यीकरण (stimulus generalization) की प्रक्रियार् सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति की उत्पत्ति में एवं विकास में अन्य सिद्धार्न्तों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ती है। उद्दीपक सार्मार्न्यीकरण से तार्त्पर्य उद्दीपक से मिलते जुलते अन्य उद्ीपकों के प्रति भी समार्न अनुक्रियार् करने से होतार् है। अर्थार्त् यदि व्यक्ति चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थितियों से मिलती जुलती अन्य परिस्थितियों के प्रति भी जो कि चिंतार् उत्पन्न करने की दृष्टि से उतनी गंभीर परिस्थितियॉं वार्स्तव में नहीं होती हैं, चिंतार् की अतिरंजित प्रतिक्रियार् बार्र बार्र करतार् है तो यह उद्दीपक सार्मार्न्यीकरण क उत्तम उदार्हरण होगार्। व्यवहार्रवार्दियो के अनुसार्र इसी सिद्धार्न्त के तहत लोगों में सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति क विकास होतार् है।

सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति क उपचार्र

उपरोक्त पंक्तियों में आपने अभी तक सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के कारणों के संबंध में ज्ञार्न प्रार्प्त कियार् है अपनी समझ को बढ़ार्यार् है। आइये अब इस बिन्दु के अंतर्गत सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के उपचार्र की कतिपय प्रविधियों के बार्रे में ज्ञार्न प्रार्प्त करें। मनोगत्यार्त्मक प्रविधियॉं (psychodyanamic techniques)-सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के उपचार्र में मनोगत्यार्त्मक चिकित्सकों द्वार्रार् प्रसिद्ध मनोवैज्ञार्निक सिगमण्ड फ्रार्यड द्वार्रार् प्रतिपार्दित फ्री-एसोशियेसन, इन्टरप्रिटेशन ऑफ ट्रार्ंसफेरेन्स, रेजिस्टेंस एवं स्वप्न विश्लेषण तकनीक क सर्वार्धिक उपयोग कियार् है। फ्री-एसोसियेशन तकनीक के अन्तर्गत व्यक्ति की चिंतार् से जुड़ें पहलुओं के संबंध में रोगी की समझ को बढ़ार्ने के लिए उदार्सीन उद्दीपकों के मार्ध्यम से चिंतार् के कारणों क पतार् लगार्यार् जार्तार् है तथार् कारण पतार् लगने पर उन्हें रोगीे को समझार्यार् जार्तार् है। फ्रार्यड क विश्वार्स थार् कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति जैसी चिंतार् विकृति न्यूरोटिक चिंतार् क एक प्रकार है एवं यह इड के आवेगों पर र्इगो के नियंत्रण के कम होने से पनपती है। जब व्यक्ति को यह समझार् दियार् जार्तार् है कि उसकी चिंतार् किन कारणों से उत्पन्न हुर्इ है और वह किस प्रकार अपने र्इगो की शक्ति को बढ़ार् सकतार् है तब उसकी चिंतार् कम होने लगती है। फ्री- एसोसियेशन के समार्न ही ट्रार्ंस्फेरेशन क अध्ययन, रेजिस्टेंस क विश्लेषण एवं स्वप्नों के विश्लेषण द्वार्रार् भी रोगी की विकृति के संदर्भ में अन्तदृष्टि को खोलने क कार्य कियार् जार्तार् है। अन्तर्दृष्टि के विकास से व्यक्ति खुद-ब-खुद ही विकृति के रहस्यों को समझ जार्तार् है फलत उसकी चिंतार् में कमी आती है।

मार्नवतार्वार्दी एप्रोच आधार्रित उपचार्र (humanistic approach based treatment)-मार्नवतार्वार्दी विचार्रधार्रार् पर आधार्रित प्रविधियों में प्रसिद्व मार्नवतार्वार्दी मनोवैज्ञार्निक कार्ल रोजर्स के द्वार्रार् प्रतिपार्दित कलार्यंट केंद्रित चिकित्सार् प्रविधि (client centered therapy) सर्वार्धिक महत्वपूर्ण प्रविधि है। हार्लार्ंकि यह प्रविधि व्यवहार्रार्त्मक प्रविधियों की तुलनार् में बेहतर सार्बित नहीं होती है परन्तु फिर भी यह चिंतार् को कम करने में कुछ हद तक सफल अवश्य हुर्इ है। इस प्रविधि के अन्तर्गत मार्नवतार्वार्दी चिकित्सक रोगी को बिनार् शर्त सकारार्त्मक सम्मार्न (अन्कंडीशलन पॉजिटिव रिगाड) देने के सिद्धार्न्त के तहत व्यक्ति को एक ऐसार् स्वीकारार्त्मक एवं आरार्मदार्यक वार्तार्वरण उपलब्ध करार्ते हैं जिसमें व्यक्ति स्वयं को शार्ंत एवं रिलैक्स करने में सहज ही सक्षम हो पार्तार् है एवं इस शार्न्ति एवं रिलेक्सेशन में उसे अपनी चिंतार् के कारणों को बेहतर ढंग से समझने एवं समार्धार्न ढॅूंढ़ने क समुचित अवसर मिलतार् है जिससे उसकी चिंतार् काफी हद तक कम हो पार्ती है। मनोचिकित्सकों के अनुसार्र यह चिकित्सार् विधि चिंतार् को कुछ हद तक कम करने में अवश्य सफल रहती है परन्तु इसक प्रभार्व प्लेसिबो प्रविधि के समार्न ही रहतार् है तथार् तार्त्कालिक ही रहतार् है अर्थार्त कुछ समय उपरार्न्त व्यक्ति पुन: चिंतार् की समस्यार् से ग्रस्त हो जार्तार् है।

संज्ञार्नार्त्मक चिकित्सार् (cognitive therapy)- संज्ञार्नार्त्मक चिकित्सार् सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृतियों क उपचार्र रोगी के विचार्रों, विश्वार्सों, धार्रणार्ओं एवं मार्न्यतार्ओं में परिवर्तन लार्ने के मार्ध्यम से करती है। इसके अन्तर्र्गत प्रसिद्ध संज्ञार्नार्त्मक मनोवैज्ञार्निक एरोन बेक एवं एल्बर्ट एलिस द्वार्रार् प्रतिपार्दित चिकित्सार् विधियों क उपयोग कियार् जार्तार् है। मनोवैज्ञार्निक एरोन बेक ने बेक-संज्ञार्नार्त्मक चिकित्सार् प्रविधि क प्रतिपार्दन कियार् है यह चिकित्सार् विधि रोगी के नकारार्त्मक विचार्रों को सकारार्त्मक विचार्रों से प्रतिस्थार्पित कर रोगी की सार्मार्न्यीकृत चिंतार् क निवार्रण करती है। यह चिकित्सार् प्रविधि इस सिद्धार्न्त पर आधार्रित है कि व्यक्ति को चिंतार् विकृति होने के लिए उसके नकारार्त्मक विचार्र जिम्मेदार्र होते हैं जिनकी उत्पत्ति के पीछे रोगी के पार्स कोर्इ वार्जिब तर्क नहीं होतार् है इनक स्वरूप भी ऑटोमेटिक होतार् है अर्थार्त ये रोगी के नियंत्रण में नहीं होते हैं एवं सतत् रूप से उसके चिंतन क हिस्सार् बने रहते हैं। बेक संज्ञार्नार्त्मक चिकित्सार् के द्वार्रार् इन्हे सकारार्त्मक विचार्रों द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित कर दियार् जार्तार् है। जिससे व्यक्ति की चिंतार् काफी हद तक नियंत्रण में आ जार्ती है।

एलिस द्वार्रार् प्रतिपार्दित रेशनल इमोटिव थेरेपी (Rational emotive therapy) क उपयोग भी इस विकृति के उपचार्र हेतु कियार् जार्तार् है। यह चिकित्सार् विधि इस सिद्धार्न्त पर आधार्रित है कि यदि रोगी के चिंतार् के संबंध में विकृत धार्रणार्ओं एवं मार्न्यतार्ओं को उपयुक्त तर्क के मार्ध्यम से चुनौति दी जार्ये तो उसकी चिंतार् के संबंध में समझ बढ़ती है एवं चिंतार् क सार्मार्न्यीकरण करने की प्रवृत्ति घटती है।

जैविक उपचार्र प्रविधियॉं (Biological treatment methods)- जैविक उपचार्र विधियों में एन्टी एन्जार्इटी औषधियॉें को सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के उपचार्र में सर्वार्धिक सफल पार्यार् गयार् है। हैडली एवं उनके सहयोगियों (2012) द्वार्रार् किये गये अध्ययन के अनुसार्र इस विकृति के उपचार्र हेतु बेन्जोजार्इएजेपीन क प्रयोग काफी कारगर पार्यार् गयार् है इसके प्रयोग से चिंतार् को प्रभार्वित करने वार्ले एक प्रमुख न्यूरोट्रार्ंस्मीटर गार्मार् अम्यूनोब्यूटॉयरिक एसिड के प्रकार्यों पर काफी हद तक नियंत्रण पार्यार् जार् सकतार् है फलत: सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति को कम करने में यह सकारार्त्मक रूप से साथक भूमिक निभार्तार् है। बार्ल्डविन एवं उनके सहयोगियों (2011) तथार् कोमर एवं उनके सहयोगियों (2011) के अनुसार्र हार्ल के दिनों में एन्टीएन्जार्इटी औषधियों के अलार्वार् एन्टीसार्इकोटिक औषधियॉं भी समार्न रूप से सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के उपचार्र में सफल पार्यी गयी हैं।

इन औषधियों के प्रयोग के अलार्वार् रिलेक्सेषन प्रषिक्षण एवं बार्योफीडबैक प्रशिक्षण जैसी प्रविधियों को भी जैविक उपचार्र अथवार् मेडिकल उपचार्र की श्रेणी में रखार् जार्तार् है जिसके अन्तर्गत सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति से ग्रस्त व्यक्ति को चिंतार् होने पर कैसे रिलेक्स होने क प्रषिक्षण दियार् जार्तार् है तथार् बार्योफीडबैक प्रषिक्षण के मार्ध्यम से अपने अनैच्छिक अनुक्रियार्ओं जैसे कि पल्स रेट, हृदय गति एवं श्वसन दर आदि पर आत्मशक्ति के मार्ध्यम से नियंत्रण करनार् सिखलार्यार् जार्तार् है।

व्यवहार्रार्त्मक चिकित्सार् (Behavioural treatment)- व्यवहार्र चिकित्सार् प्रविधियों में उन सभी चिकित्सार् प्रविधियों क प्रयोग सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के उपचार्र हेतु कियार् जार्तार् है जिन्हें कि फोबियार् के इलार्ज हेतु उपयोग में लार्यार् जार्तार् है। जैसे कि असंवेदीकरण (डीसेन्सीटार्इजेशन), फ्लडिंग, मॉडलिंग आदि। असंवेदीकरण प्रविधि में चिंतार् उत्पन्न करने वार्ले सभी उद्दीपक परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति को असंवेदित होनार् सिखलार्यार् जार्तार् है इसके लिए उसे रिलेक्सेशन प्रशिक्षण भी दियार् जार्तार् है। सार्मार्न्य तौर पर इसके अन्तर्गत चिंतार् को दूर करने के लिए क्रमबद्ध असंवेदीकरण प्रविधि क उपयोग कियार् जार्तार् है। इसके अलार्वार् कुछ विशेष परिस्थितियों में फ्लडिंग तकनीक क भी इस्तेमार्ल कियार् जार्तार् है इसके अन्तर्गत व्यक्ति को तब तक चिंतार् उत्पन्न करने वार्ली परिस्थिति में रखार् जार्तार् है जब तक कि उसकी चिंतार् में कमी न आ जार्ये। चूॅंकि इस प्रविधि में चिंतार् की बार्ढ़ सी आ जार्ती है अतएव इसे फ्लडिंग नार्म से जार्नार् जार्तार् है। स्पष्ट है कि सार्मार्न्यीकृत चिंतार् विकृति के उपचार्र की बहुत सी प्रविधियॉं प्रचलित हैं परन्तु मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र अभी भी इस विकृति क पूर्णरूपेण निरार्करण कर देने में समर्थ विधि को खोजार् जार्नार् अभी बार्की है।

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