सार्मार्जिक विधार्न क अर्थ, परिभार्षार्, क्षेत्र एवं आवश्यकतार्

सार्मार्जिक विधार्न क अर्थ एवं परिभार्षार् 

योजनार् आयोग के अनुसार्र ‘‘प्रचलित कानूनों तथार् वर्तमार्न आवश्यकतार्ओं के बीच दूरी को कम करने वार्ले विधार्न को सार्मार्जिक विधार्न कहार् जार् सकतार् है।’’

गंग्रार्डे तथार् बत्रार् के मत में ‘‘सार्मार्जिक विधार्न की परिभार्षार् उन कानूनों के रूप में की जार् सकती है जिन्हें सकारार्त्मक मार्नव संसार्धन को बनार्ये रखने तथार् सुदृढ़ बनार्ने एवं समूहों अथवार् व्यक्िितयों के नकारार्त्मक एवं सार्मार्जिक रूप से हार्निकारक व्यवहार्र के घटित होने को कम करने हेतु बनार्यार् जार्तार् है।’’

उससेकर के मत में ‘‘सार्मार्जिक विधार्न सार्मार्जिक एवं आर्थिक न्यार्य सम्बन्धी विचार्रों को लार्गू किये जार्ने योग्य कानूनों में रूपार्न्तरित करने की लोगों की इच्छार् की वैधार्निक अभिव्यक्ति क प्रतिनिधित्व करतार् है।’’

सार्मार्जिक विधार्न क सम्बन्ध व्यक्ति एवं समूह के कल्यार्ण की वृद्धि तथार् सार्मार्जिक क्रियार्-कलार्पों के प्रभार्वपूर्ण एवं निर्बार्ध रूप से संचार्लन से है। इन विधार्नों क निर्मार्ण इस प्रकार कियार् जार्तार् है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अपेक्षित सार्धन एवं उपयुक्त अवसर प्रार्प्त हो सकें तथार् सार्मार्जिक व्यवस्थार् के सुचार्रू रूप से चलने के लिए अपेक्षित विभिन्न प्रकार्य उचित रूप से संपार्दित किये जार् सकें। सार्मार्जिक विधार्न नयी स्थितियों के लिए वैधार्निक संरचनार् क निर्मार्ण करतार् है तथार् इच्छित दिषार् में सार्मार्जिक संरचनार् में परिवर्तन किये जार्ने के अवसर प्रदार्न करतार् है। यह रार्ष्ट्र के वर्तमार्न सार्मार्जिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करतार् है और आने वार्ली सार्मार्जिक समस्यार्ओं क कुशलतार् से समार्धार्न करतार् है।

इस प्रकार सार्मार्जिक विधार्न के दो प्रमुख उद्देश्य हैं  –

  1. नियमन की स्थिति उत्पन्न करनार् तथार् सुरक्षार् प्रदार्न करनार्, एवम् 
  2. सार्मार्जिक आवश्यकतार्ओं क पूर्वार्नुमार्न करते हुये सार्मार्जिक व्यवस्थार् में परिवर्तन लार्ने क प्रयार्स करनार्। 

सार्मार्जिक विधार्न क क्षेत्र 

सार्मार्जिक विधार्नों को  6 श्रेणियों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है :-

  1. धामिक एवं दार्तव्य न्यार्सों से सम्बन्धित विधार्न। 
  2. निरार्श्रित व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न जिसके अन्तर्गत अकिंचन कोढ़ियों से सम्बन्धित विधार्न को सम्मिलित कियार् जार् रहार् है। 
  3. बार्धितों से सम्बन्धित विधार्न जिसके अन्तर्गतविश्ेार्ष रूप से सार्मार्जिक तथार् आर्थिक रूप से बार्धित व्यक्तियों के लिए विधार्न-विषेश रूप से अनुसूचित जार्तियों से सम्बन्धित विधार्न तथार् “ार्ार्रीरिक एवं आर्थिक रूप से बार्धित व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न-विषेश रूप से बच्चों से सम्बन्धित विधार्न को सम्मिलित कियार् जार् रहार् है। 
  4. शोषण क सरलतार्पूर्वक शिकार बनने वार्ले व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न जिसके अन्तर्गत महिलार्ओं, श्रमिकों एवं युवकों से सम्बन्धित विधार्न को सम्मिलित कियार् जार् रहार् है। 
  5. विचलित व्यवहार्र वार्ले व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न जिसके अन्तर्गत बार्ल आवार्रार्पन, बार्ल अपरार्ध, सफेदपोष अपरार्ध, वेष्यार्वृत्ति, भिक्षार्वृत्ति, मद्यपार्न एवं मार्दक द्रव्य व्यसन, द्यूतक्रीड़ार् से सम्बन्धित विधार्न को सम्मिलित कियार् जार् रहार् है। 
  6. असार्मार्न्य व्यवहार्र प्रदर्षित करने वार्ले व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न जिसके अन्तर्गत मार्नसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न को सम्मिलित कियार् जार् रहार् है। 

सार्मार्जिक विधार्न की आवश्यकतार्

भार्रतीय संविधार्न के उद्देश्यों को पूरार् करने के लिए सार्मार्जिक विधार्न की आवश्यकतार् को इन तथ्यों में देखार् जार् सकतार् है : –

1. धामिक एवं दार्तव्य न्यार्सों से सम्बन्धित विधार्न 

1890 में दार्तव्य धर्मदार्य अधिनियम पार्स कियार् गयार् जिसके अधीन सरकार द्वार्रार् नियुक्त दार्तव्य धर्मदार्यों के कोशार्ध्यक्ष में सावजनिक न्यार्सों के विहितीकरण एवं प्रशार्सन क दार्यित्व सौंपार् गयार्। 1920 में धामिक एवं दार्तव्य न्यार्स अधिनियम पार्रित कियार् गयार् जिसके अधीन दार्तव्य एवं धामिक धर्मदार्यों के लिए बनार्ये गये न्यार्सों के सम्बन्ध प्रार्प्त करने की सुविधार्ओं क प्रार्वधार्न कियार् गयार्।

2. निरार्श्रित व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न 

1898 के कोढ़ी अधिनियम के अधीन अकिंचन कोढ़ियों के अलग रखे जार्ने तथार् उनके चिकित्सकीय उपचार्र क प्रार्वधार्न कियार् गयार् है।

3. बार्धितों से सम्बन्धित विधार्न 

नार्गरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976 के अधीन अनुसूचित जार्ति के व्यक्तियों के लिए नार्गरिक अधिकारों के संरक्षण की व्यवस्थार् की गयी है। बच्चों की अभिरूचियों के प्रोत्सार्हन के लिए भार्रतीय दण्ड संहितार् 1860 (धार्रार् 82, 83, 315, 316, 317, 318, 361, 363, 363 ए तथार् 369), आपरार्धिक प्रक्रियार् संहितार् 1973 (धार्रार् 27, 98, 125, 160, 198, 320, 360, 361, 437 तथार् 448) अपरार्धी परिवीक्षार् अधिनियम 1958, किषोर न्यार्य अधिनियम 1986, भार्रतीय व्यार्पार्र पोत अधिनियम 1923(धार्रार् 23), बार्ल श्रम बंधक अधिनियम 1933, बार्ल सेवार्योजन अधिनियम 1938, कारखार्नार् अधिनियम 1948 (धार्रार् 27, 67, 68, 69, 71, 72, 73, 74, 75, 76, 92 तथार् 99), बार्गार्न श्रम अधिनियम 1951 (धार्रार् 19, 24, 25, 26, 27 तथार् 28), खार्न अधिनियम 1952 (धार्रार् 40, 41, 43, 44, 45 तथार् 48), कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् अधिनियम 1948 (धार्रार् 46, 52 तथार् 56), मार्त ृत्व हित लार्भ अधिनियम 1948 (धार्रार् 7), शिशुक्षुतार् अधिनियम 1961 (धार्रार् 4, 8, 13, 14 तथार् 15), बार्ल श्रम (निशेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 के अधीन विभिन्न प्रार्वधार्न किये गये हैं।

4. शोषण क सरलतार्पूर्वक शिकार बनने वार्ले व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न 

महिलार्ओं के हितों के संरक्षण हेतु भार्रतीय दण्ड संहितार् 1860 (धार्रार् 312, 313, 314, 354, 366 ए, 366 बी, 372, 373, 375, 376, 377 तथार् 507), आपरार्धिक प्रक्रियार् संहितार् 1973 (धार्रार् 18, 125, 126, 127, 128 तथार् 160), अनैतिक व्यार्पार्र (निरोधक) अधिनियम 1986, दहेज निशेध अधिनियम 1961, चिकित्सकीय गर्भ समार्पन अधिनियम 1971, हिन्दू विवार्ह अधिनियम 1955, मुस्लिम विवार्ह विच्छेद अधिनियम 1939, र्इसाइ विवार्ह अधिनियम 1872, भार्रतीय तलार्क अधिनियम 1869, पार्रसी विवार्ह एवं तलार्क अधिनियम 1936, विशिष्ट विवार्ह अधिनियम 1954, भार्रतीय उत्तरार्धिकार अधिनियम 1956, कारखार्नार् अधिनियम 1948 (धार्रार् 27 तथार् 48) बार्गार्न श्रम अधिनियम 1951 (धार्रार् 12), समार्न पार्रितोशिक अधिनियम 1976, खार्न अधिनियम 1952 (धार्रार् 46), कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् अधिनियम 1948 (धार्रार् 49, 50, 51, 52, 56 तथार् 57) तथार् मार्तृत्व हिल लार्भ अधिनियम 1961 के अधीन प्रार्वधार्न किये गये हैं।

श्रमिकों के हितों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए भार्रतीय दण्ड संहितार् 1860 (धार्रार् 370, 371 तथार् 374), भार्रतीय पोत अधिनियम 1923, बार्ल श्रम (श्रम बंधक) अधिनियम 1933, मजदूरी भुगतार्न अधिनियम 1936, मार्लिक देयतार् अधिनियम 1938, सार्प्तार्हिक अवकाष अधिनियम 1942, आभ्रक खार्न श्रम कल्यार्ण कोश अधिनियम 1946, औद्योगिक सेवार्योजन (स्थार्यी) अध्यार्देश अधिनियम 1946, कोयलार् खार्न श्रम कल्यार्ण कोश अधिनियम 1947, औद्योगिक विवार्द अधिनियम 1947, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कारखार्नार् अधिनियम 1948, कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् अधिनियम 1948, बार्गार्न श्रम अधिनियम 1951, खार्न अधिनियम 1952, कर्मचार्री भविश्य निधि एवं विविध प्रार्वधार्न 1952, लौह खनिज श्रम कल्यार्ण कर अधिनियम 1961, मार्तृत्व हित लार्भ अधिनियम 1948, शिशुक्षुतार् अधिनियम 1961, वैयक्तिक चोट (क्षतिपूर्ति बीमार्) अधिनियम 1963, बोनस भुगतार्न अधिनियम 1965, अनुबन्धित श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम 1976, चूनार् पत्थर तथार् डोलोमार्इट श्रम कल्यार्ण कोश अधिनियम 1972, ग्रेच्युटी भुगतार्न अधिनियम 1972, बंधुआ श्रम व्यवस्थार् (उन्मूलन) अधिनियम 1976 के अधीन प्रार्वधार्न किये गये हैं।

युवकों के हितों में संरक्षण एवं संवद्ध्रन हेतु भार्रतीय दण्ड संहितार् 1860 (धार्रार् 21, 292, 293, 294 तथार् 294 ए), आपरार्धिक प्रक्रियार् संहितार् 1973 (धार्रार् 122, 126, 126 ए, 406 ए, 514, 514 ए, 514 बी तथार् 515), नार्टकीय निष्पत्ति अधिनियम 1876, सिनेमैटोग्रार्फ अधिनियम 1952, भेशज एवं जार्दू सम्बन्धी उपार्य (आपत्तिजनक विज्ञार्पन) अधिनियम 1954, मार्दक द्रव्य एवं मन:प्रभार्वी पदाथ अधिनियम 1985 (संशोधित 1989), सावजनिक जुआ अधिनियम 1867 (1954 में संशोधित), कारखार्नार् अधिनियम 1948 (धार्रार् 68, 69, 79 तथार् 75), बार्गार्न श्रम अधिनियम 1951 (धार्रार् 24, 25, 26, 27 तथार् 28), खार्न अधिनियम 1952 (धार्रार् 40, 41, 42, 43, 44 तथार् 45) के अधीन अनेक प्रार्वधार्न किये गये हैं।

5. विचलित व्यवहार्र प्रदर्शित करने वार्ले व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न 

बार्ल आवार्रार्पन से सम्बन्धित प्रार्वधार्न किशोर न्यार्य अधिनियम 1986 के अन्तर्गत किये गये हैं। आवार्रार्पन सम्बन्धी प्रार्वधार्न आपरार्धिक प्रक्रियार् संहितार् 1973 के अध्यार्य 8 में किये गये हैं। बार्ल अपरार्ध की समस्यार् पर नियन्त्रण तथार् बार्ल अपरार्धियों के सुधार्र हेतु बोस्र्टल विद्यार्लय अधिनियम, अपरार्धी परिवीक्षार् अधिनियम, किशोर न्यार्य अधिनियम अलग से पार्रित किये गये हं।ै इसके अतिरिक्त भार्रतीय दण्ड संहितार् तथार् आपरार्धिक प्रक्रियार् संहितार् के अधीन भी प्रार्वधार्न किये गये हैं। अपरार्ध की समस्यार् से निपटने के लिए भार्रतीय दण्ड संहितार् तथार् आपरार्धिक प्रक्रियार् संहितार् के अधीन किये गये सार्मार्न्य प्रार्वधार्नों के अतिरिक्त अन्य विविध क्षेत्रों के सन्दर्भ में बनार्ये गये विशिष्ट अधिनियमों के अधीन प्रार्वधार्न किये गये हैं। भ्रष्टार्चार्र निवार्रक अधिनियम 1988 के अधीन भ्रष्टार्चार्र, अनिवाय वस्तु अधिनियम 1988 के अधीन मिलार्वट, जखीरेबार्जी जैसे सफेदपोश अपरार्धों के लिए प्रार्वधार्न कियार् गयार् है। अनैतिक व्यार्पार्र (निरोधक) अधिनियम 1986 के अधीन वेश्यार्वृत्ति की समस्यार् से सम्बन्धित प्रार्वधार्न किये गये हैं। भिक्षार्वृत्ति की समस्यार् के निवार्रण हेतु विभिन्न रार्ज्यों द्वार्रार् अधिनियम पार्रित किये गये हैं, यथार् उत्तर प्रदेश भिक्षार्वृत्ति निरोधक अधिनियम। इसके अतिरिक्त नगर पार्लिकाओं के कानूनों एवं पुलिस अधिनियम में भी भिक्षार्वृत्ति के सम्बन्ध में प्रार्वधार्न किये गये हैं। मार्दक द्रव्य व्यसन की समस्यार् पर नियन्त्रण करने के लिए अफीम अधिनियम 1857 तथार् 1878, खतरनार्क मार्दक द्रव्य अधिनियम 1930, मार्दक द्रव्य एवं सौन्दर्य प्रसार्धन अधिनियम 1940, दवार् एवं प्रसार्धन निर्मार्ण अधिनियम 1953, मार्दक द्रव्य एवं मन: प्रभार्वी पदाथ अधिनियम 1985 (संशोधित 1989), बनार्यार् गयार् है। भार्रतीय दण्ड संहितार् तथार् आपरार्धिक संहितार् के अधीन मद्यपार्न से सम्बन्धित प्रार्वधार्न किये गये हैं। द्यूतक्रीड़ार् पर नियन्त्रण हेतु सावजनिक द्यूतक्रीड़ार् अधिनियम 1867 (1954 में संशोधित) पार्रित कियार् गयार् है।

6. असार्मार्न्य व्यवहार्र प्रदर्शित करने वार्ले व्यक्तियों से सम्बन्धित विधार्न 

मार्नसिक स्वार्स्थ्य अधिनियम 1987 के अन्तर्गत मार्नसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्तियों के उपचार्र क प्रार्वधार्न कियार् जार्तार् है। भार्रतवर्ष में उपरिलिखित विभिन्न सार्मार्जिक विधार्नों क मूल्यार्ंकन अध्ययन करने पर यह निष्कर्श निकलतार् है कि विभिन्न धर्मों एवं जार्तियों के विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों के हितों क संरक्षण एवं संवर्द्धन करने के लिए अलग-अलग विधार्न बनार्ये गये हैं। इन विधार्नों की संख्यार् इतनी अधिक है कि इन्हें सम्पूर्णतार् में लार्गू करते हुए किसी एक श्रेणीविश्ेार्ष की अभिरूचियों क संरक्षण एवं संवर्द्धन कर पार्नार् अत्यन्त कठिन कार्य है। यह दुर्भार्ग्य की बार्त है कि स्वतन्त्र भार्रत में भी विभिन्न धर्मों एवं जार्तियों के व्यक्तियों के लिए एकरूपतार्पूर्ण नार्गरिक विधार्न नहीं बन सक है और इसी क यह परिणार्म है कि आज सम्प्रदार्यवार्द, जार्तिवार्द, क्षेत्रवार्द की समस्यार्यें अपने विकरार्ल रूप से हमार्रे सार्मने विद्यमार्न हैं और रार्ष्ट्रीय एकतार् एवं अखण्डतार् को गम्भीर खतरार् उत्पन्न हो गयार् है।

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