सार्मार्जिक विकास की अवधार्रणार् एवं विशेषतार्एॅ

सार्मार्जिक संरचनार् के उन विभिन्न पहलुओं और सार्मार्जिक कारकों क अध्ययन है जो 1समार्ज के त्रीव विकास में बार्धार् उत्पन्न करते है। इसक उद्देश्य किसी समुदार्य के समक्ष उस आर्दश प्रार्रूप को भी प्रस्तुत करनार् है जो उस समुदार्य के लोगों को विकास की ओर अग्रसर कर सके। जब से विभिन्न देशों में, विशेषत: तृतीय विश्व के देशों में, नियोजित आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रियार् प्रार्रम्भ की गर्इ तब से यह आवश्यकतार् महसूस की गर्इ कि इन परिवर्तनों के सार्मार्जिक प्रभार्वों क मूल्यार्ंकन कियार् जार्ए। समूह के आकार में वृद्धि, अर्थव्यवस्थार् में परिवर्तन, अस्थिर जीवन में स्थिर जीवन क प्रार्रम्भ, सार्मार्जिक संरचनार् क रूपार्न्तरण, धामिक विश्वार्सों एवं क्रियार्ओं क महत्व, विज्ञार्न क विकास, नवीन दर्शन, कुछ ऐसे तत्व है जो इन परिवर्तनों से सम्बन्धित है। प्रार्चीन से वर्तमार्न समय तक समार्ज के लगभग प्रत्येक पहलू में परिवर्तन हुए है। यह बार्त आदिम और आधुनिक दोनों ही समार्जों के लिए समार्न रूप से सार्थ है। तृतीय विश्व के ऐसे देश जो पूॅजीवार्दी औद्योगीकरण की संक्रमण प्रक्रियार् से गुजर रहे है, के विश्लेषण हेतु सार्मार्जिक सिद्धार्ंतों क प्रयोग ही सार्मार्जिक विकास है। विभिन्न विचार्रकों क मत है कि ‘विकास’ अपनी अन्तर्निहित विशेषतार्ओं के कारण किसी एक विषय की अध्ययन वस्तु न होकर सभी विषयों की अध्ययन वस्तु है-अध्ययन के दृष्टिकोणों में भले ही अन्तर हो।

सार्मार्जिक विकास की अवधार्रणार् 

विकास ऐसे परिवर्तनों को लक्षित करतार् है जो प्रगति की ओर उन्मुख रहते है। विकास एक सार्मार्जिक प्रक्रियार् है। इसक सम्बन्ध आर्थिक पहलू से अधिक है। लेकिन सार्मार्जिक विकास केवल आर्थिक पहलू से ही सम्बन्धित नहीं है अपितु सार्ंस्कृतिक तत्वों तथार् सार्मार्जिक संस्थार्ओं से भी सम्बन्धित है।

‘सार्मार्जिक विकास’ विकास के समार्जशार्स्त्र क केन्द्र बिन्दु हैं अत: सार्मार्जिक विकास की विवेचनार् करनार् आवश्यक है- जे.ए. पार्न्सीओ ने सार्मार्जिक विकास को परिभार्षित करते हुए कहार् है कि-’’विकास एक आंशिक अथवार् शुद्ध प्रक्रियार् है जो आर्थिक पहलू में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होतार् है। आर्थिक जगत में विकास से तार्त्पर्य प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से लगार्यार् जार्तार् है। सार्मार्जिक विकास से तार्त्पर्य जन सम्बन्धों तथार् ढॉचे से है जो किसी समार्ज को इस योग्य बनार्ती है कि उसके सदस्यों की आवश्यकतार्ओं को पूरार् कियार् जार् सके।’’ बी.एस.डीसूजार् के अनुसार्र-’’सार्मार्जिक विकास वह प्रक्रियार् है जिसके कारण अपेक्षार्कृत सरल समार्ज एक विकसित समार्ज के रूप में परिवर्तित होतार् है।’’ सार्मार्जिक विकास क विशेष रूप से कुछ अवधार्रणार्ओं से सम्बन्धित है, ये अवधार्रणार्एॅ है-

  1. ऐसे सार्धन जो एक सरल समार्ज को जटिल समार्ज में परिवर्तित कर देते है। 
  2. ऐसे सार्धन जो सार्ंस्कृतिक आवश्यकतार्ओं को पूरार् करते है।
  3. ऐसे सम्बन्ध व ढॉचे जो किसी समार्ज को अधिकतम आवश्यकतार् पूर्ति के योग्य 
    1. सार्मार्जिक विकास की विशेषतार्एॅ 

      1. सार्मार्जिक विकास सबसे महत्वपूर्ण विशेषतार् यह है कि इसके फलस्वरूप सरल सार्मार्जिक अवस्थार् जटिल सार्मार्जिक अवस्थार् में परिवर्तित हो जार्ती है।
      2. सार्मार्जिक विकास की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषतार् सार्मार्जिक गतिशीलतार् में वृद्धि। 
      3. धर्म के प्रभार्व में ह्रार्स, सार्मार्जिक विकास की एक अन्य विशेषतार् है। 
      4. सार्मार्जिक विकास में परिवर्तन प्रगति के अनुरूप होतार् रहतार् है। 
      5. सार्मार्जिक विकास एक निश्चित दिषार् क बोध करतार् है। 
      6. सार्मार्जिक विकास में ‘निरंतरतार्’ क विशेष गुण होतार् है। 
      7. सार्मार्जिक विकास की एक प्रमुख विशेषतार् यह है कि इसकी अवधार्रणार् सावभौमिक है। 
      8. सार्मार्जिक विकास क विषय-क्षेत्र अत्यन्त व्यार्पक है। 
      9. सार्मार्जिक विकास क प्रमुख केन्द्र बिन्दु आर्थिक है जो प्रौद्योगिकीय विकास पर निर्भर है। 
      10. सार्मार्जिक विकास की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषतार् यह भी है कि इसके अन्तर्गत सार्मार्जिक सम्बन्धों क प्रसार्र होतार् है। 

      सार्मार्जिक विकास के कारक 

      सार्मार्जिक विकास के कारकों क अध्ययन करते समय यह ज्ञार्त होतार् है कि विभिन्न सार्मार्जिक विचार्रकों जैसे मिरडल, हार्बहार्उस तथार् आगबर्न आदि ने कुछ सार्मार्जिक कारकों क उल्लेख कियार् है। इन विचार्रकों ने जिन प्रमुख सार्मार्जिक कारकों क उल्लेख कियार् है-

      सार्मंजस्य (Adjustment) – सार्मार्जिक विकास के लिए समार्ज के विभिन्न भार्गों में सार्मंजस्य होनार् अति आवश्यक है। यदि समार्ज के विभिन्न भार्गों में सार्मंजस्य नही है तो सार्मार्जिक विकास की गति तीव्र नहीं होगी।

      अविष्कार (Invention) – प्रत्यक्ष रूप से आविश्कार उस समार्ज के व्यक्तियों की योग्यतार्, सार्धन तथार् अन्य सार्ंस्कृतिक कारकों से सम्बन्धित है। जैसे-जैसे तेजी से आविष्कार हो रहे है, वैसे-वैसे सार्मार्जिक सम्बन्धों में परिवर्तन भी हो रहे है। 

      प्रसार्र (Diffusion) – सार्मार्जिक विकास की प्रक्रियार् आविष्कारों के प्रसार्र पर निर्भर है। विभिन्न आविष्कारों के प्रसार्र के कारण ही सार्मार्जिक सम्बन्धों में परिवर्तन तथार् विकास हो रहार् है। 

      ज्ञार्न भंडार्र (Knowledge Bank) – पुरार्ने ज्ञार्न के संचय के कारण नवीन आविष्कारों क जन्म हो रहार् है, फलस्वरूप सार्मार्जिक विकास में वृद्धि हो रही है। 

      औद्योगीकरण (Industrialisation) – औद्योगीकरण सार्मार्जिक विकास क एक महत्वपूर्ण सार्धन है। औद्योगीकरण के बिनार् सार्मार्जिक विकास सम्भव नही है। विकसित समार्जों में रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि औद्योगीकरण के फलस्वरूप ही सम्भव हो पाइ है अत: विकासशील देश भी औद्योगीकरण की ओर विशेष ध्यार्न दे रहे है। रार्ष्ट्रसंघ के आर्थिक एवं सार्मार्जिक विषय विभार्ग क विचार्र है कि-’’अल्पविकसित क्षेत्रों की प्रचलित परिस्थितियों में रहन सहन के औसत स्तरों को उठार्ने क उद्देश्य समुदार्य के बहुसंख्यकों की आयों में सुदृढ़ वृद्धियों के स्थार्न पर थोड़े से अल्पसंख्यकों की आय में अधिक वृद्धि करनार् है। अधिकांश कम विकसित देशों में यह बहुसंख्यकों विशार्ल और ग्रार्मीण होते है जो ऐसे कृषि कार्य करते है जिनकी न्यूनतम उत्पार्दन क्षमतार् बहुत की कम होती है। कुछ देशों में औसत उत्पार्दितार् को बढ़ार्नार् आर्थिक विकास क प्रधार्न कार्य है। प्रार्रम्भ में और अधिक सीमार् तक यह स्वयं कृषि क्षेत्र में कियार् जार्नार् चार्हिए। अनेक देशों में अपूर्ण-नियुक्त ग्रार्मीण श्रम को अन्य व्यवसार्यों में लगार्नार् विकास क अत्यन्त आवश्यक कार्य है। अधिक उन्नत देशों विकास द्वार्रार् प्रार्रम्भ नए कायोर्ं की उत्पार्दितार् कृषि की अपेक्षार् कहीं अधिक होती है। ऐसी स्थिति में गौण उद्योग विकास क एक महत्वपूर्ण सार्धन बनतार् है। तथार्पि यह ध्यार्न में रखनार् चार्हिए कि एक अल्पविकसित देश क सम्पूर्ण सार्मार्जिक तथार् आर्थिक संगठन कुछ समय में उत्पार्दन के कारकों की निम्न कार्य कुषलतार् के सार्थ समार्योजित हो गयार् है। अत: औद्योगीकरण की प्रक्रियार् को तेज करने क कोर्इ भी प्रयार्स बहुमुखी होनार् चार्हिए जो अधिक यार् कम मार्त्रार् में, देश के सार्मार्जिक एवं आर्थिक जीवन के प्रत्येक तत्व को, उसके प्रशार्सन को और अन्य देशों के सार्थ उसके सम्बन्धों को प्रभार्वित करे। 

      नगरीकरण (Urbanisation) – नगरीकरण आर्थिक तथार् सार्मार्जिक विकास की प्रक्रियार् क एक महत्वपूर्ण अंग है और गॉवों से कस्बों की ओर स्थार्नार्न्तरण, ग्रार्मीण तथार् शहरी क्षेत्रों में रहन सहन के स्तर, विभिन्न आकार के कस्बों में आर्थिक एवं सार्मार्जिक सेवार्एॅ प्रदार्न करने के लिए सार्पेक्ष व्यय, जनसंख्यार् के विभिन्न अंगों के लिए आवार्स की व्यवस्थार्, जलपूर्ति, सफाइ परिवहन एवं शक्ति जैसी सेवार्ओं क प्रार्वधार्न, आर्थिक विकास क स्वरूप, उद्योगों क स्तार्न-निर्धार्रण एवं विकिरण, नार्गरिक प्रशार्सन, वित्तीय नीतियों और भूमि उपयोग के नियोजन जैसी अनेक समस्यार्ओं के सार्थ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। इन अंगों क महत्व उन शहरी क्षेत्रों में जो बडी तेजी से विकसित हो रहे है, विशेष हो जार्तार् है। भार्रतवर्ष में नार्गरीकरण की प्रक्रियार् में निरंतर वृद्धि हो रही है। नगरीकरण के कारण आर्थिक स्थिति सुदृढ हो रही है तथार् रहन-सहन क स्तर भी उच्च हो रहार् है जो सार्मार्जिक विकास में सहार्यक है। 

      आर्थिक स्थिति (Econimic Status) – आर्थिक स्थिति तथार् सार्मार्जिक विकास आपस में घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। जो समार्ज आर्थिक दृष्टिकोण से सुदृढ़ है वे समार्ज विकास की ओर निरंतर अग्रसर है। इसके विपरीत कमजोर आर्थिक स्थिति वार्ले समार्ज में विकास की गति बहुत धीमी होती है। 

      सार्मार्जिक गतिशीलतार् (Social Mobility) – सार्मार्जिक विकास के लिए यह आवश्यक है कि सार्मार्जिक गतिशीलतार् में वृद्धि हों। व्यार्वसार्यिक गतिशीलतार् के परिणार्मस्वरूप भी सार्मार्जिक गतिशीलतार् में वृद्धि हो रही है जो सार्मार्जिक विकास के माग में सहार्यक है। 

      शिक्षार् (Education) – कोर्इ समार्ज विकास के किस स्तर पर है, यह वहार्ं के लोगों के शैक्षिक स्तर पर निर्भर करतार् है। शिक्षार् सार्मार्जिक-आर्थिक प्रगति की सूचक है। शिक्षार् क प्रमुख कार्य मनुष्य के जीवन के विभिन्न पक्षों यथार् बौद्धिक, भार्वार्त्मक, शार्रीरिक, सार्मार्जिक आदि क समुचित विकास करनार् है। अत: शिक्षार् को सार्मार्जिक विकास की प्रक्रियार् के रूप में जार्नार् जार्तार् है। शिक्षार् क बढ़तार् हुआ प्रभार्व सार्मार्जिक विकास में काफी सहार्यक रहार् है। 

      रार्जनैतिक व्यवस्थार् (Political System) – सार्मार्जिक विकास तथार् रार्जनैतिक व्यवस्थार् क आपस में अटूट सम्बन्ध है। उस समार्ज में विकास की कभी कल्पनार् ही नही की जार् सकती है जिस समार्ज में रार्जनैतिक अस्थिरतार् विद्यमार्न है। अधिकांश समार्ज प्रजार्तंत्र के मार्ध्यम से विकास की ओर अग्रसर है। जहॉ रार्जनीतिक व्यवस्थार् न्यार्य तथार् समार्नतार् पर आधार्रित एंव शोषण के विरूद्ध है। वहॉं सार्मार्जिक विकास सुनिष्चित है।

        आधुनिक युग में हमार्रार् देश सार्मार्जिक विषय की प्रक्रियार् से गुजर रहार् है। विकास के समार्जशार्स्त्र क मूल केन्द्र बिन्दु सार्मार्जिक विकास है। समार्ज जैसे-जैसे विकास की प्रक्रियार् से गुजरतार् है, वैसे वैसे सरलतार् से जटिलतार् की ओर बढ़तार् है। यद्यपि यह उद्विकास की मूल विशेषतार् है लेकिन ‘उद्विकास’ प्रार्कृतिक कारकों से अधिक अभिपे्िर रत होतार् है जबकि विकास आथिर्क कारकों से अधिक सम्बन्धित होतार् है। समार्ज उपलब्ध प्रार्कृतिक एवं मार्नवीय संसार्धनों क उपयोग इस प्रकार से करने क प्रयार्स करतार् है कि उत्पार्दन, रार्ष्ट्रीय आय एवं रोजगार्र क स्तर ऊँचार् उठे और जनसार्धार्रण को अधिक अच्छार् जीवन स्तर प्रार्प्त हो सके। इस प्रक्रियार् में समार्ज को अनेक समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। इन्हीं समस्यार्ओं क अध्ययन विकास के समार्जशार्स्त्र की मुख्य विषय-वस्तु है।

        सभ्यतार् क जैसे-जैसे विकास हो रहार् है, वैसे-वैसे मार्नव की निर्भरतार् प्रकृति पर कम होती जार् रही है आरै सार्मार्जिक सम्बन्ध भी प्रभार्वित हो रहे है। विकास के समार्जशार्स्त्र के अन्तर्गत सार्मार्जिक सम्बन्धों में परिवर्तन क भी अध्ययन कियार् जार्तार् है।

        सार्मार्जिक विकास इस मार्न्यतार् पर आधार्रित है कि समार्नतार् जितनी अधिक होगी, सार्मार्जिक सम्बन्धों तथार् सार्मार्जिक व्यवस्थार् को उतनार् ही सार्मार्जिक बनार्यार् जार् सकतार् है। एक दूसरार् आधार्र आर्थिक विकास है। सैमुल्सन ने लिखार् है कि ‘‘सार्मार्जिक परिवर्तन जो सार्मार्जिक विकास से सम्बन्धित है वह आर्थिक वृद्धि से घनिष्ठ रूप से संलग्न है।’’ संयुक्त रार्ष्ट्र की एक विज्ञप्ति में कहार् गयार् है कि, ‘‘विकास मार्नव की केवल भौतिक आवश्यकतार्ओं से ही नहीं बल्कि उसके जीवन की सार्मार्जिक दषार्ओं की उन्नति से भी सम्बन्धित होतार् है। विकास केवल आर्थिक वृद्धि यार् विकास नहीं है, बल्कि वह स्वयं में मार्नव की सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक, संस्थार्गत तथार् आर्थिक वृद्धि परिवर्तनों को भी सम्मिलित करतार् है।’’ सार्मार्जिक विकास के अन्तर्गत उन समार्जों क भी अध्ययन कियार् जार्तार् है जो परम्परार्गत स्तर से औद्योगिक विकास के स्तर की ओर उन्मुख है। इस स्तर पर मार्त्र आर्थिक-प्रौद्योगिक परिवर्तन ही नही होते अपितु सार्मार्जिक तथार् रार्जनीतिक परिवर्तन भी होते है। र्इ. हेगन ने लिखार् है कि, ‘‘आर्थिक आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् किसी समार्ज को परम्परार्गत स्तर की अर्थव्यवस्थार् से औद्योगीकृत आर्थिक विकास के स्तर में पहुॅचार्ने क संक्रमण है। यह संक्रमण धीरे-धीरे होतार् है और इसमें प्रौद्योगिकीय आर्थिक परिवर्तन के अतिरिक्त भी परिवर्तन सम्मिलित होतार् है। प्रमुख सार्मार्जिक तथार् रार्जनैतिक परिवर्तन भी इसमें आवश्यक होतार् है।’’

        सार्मार्जिक परिवर्तन आधुनिकीकरण प्रक्रियार् क उतनार् ही महत्वपूर्ण अंग है जितनार् कि आर्थिक परिवर्तन, सार्ंस्कृतिक संचय, आविष्कार, अन्य संस्कृतियों से सम्पर्क, विसुंजयतार्, शिक्षार् आदि परिवर्तन के स्रोत है। मूल्य, प्रौद्योगिकी, सार्मार्जिक आन्दोलन और महार्न लोग सभी सार्मार्जिक परिवर्तन के कारक है। प्रौद्योगिकी विभिन्न कारकों में अन्र्तक्रियार् उत्पन्न कर सार्मार्जिक परिवर्तन को जन्म देती है। प्रौद्योगिकी के बिनार् आर्थिक विकास के पॉचों स्तर कार्यार्न्वित नहीं हो सकते। इसी प्रकार आर्थिक विकास के बिनार् औद्योगीकरण असम्भव है। अत: यह वक्यव्य स्पष्ट करतार् है कि औद्योगीकरण और आिर्थैक विकास दोनों ही सार्मार्जिक विकास के लिए आवश्यक है। डोमर ने अपने उद्गार्र व्यक्त करते हुए लिखार् है कि ‘‘आर्थिक वृद्धि जो सार्मार्जिक विकास के लिए आवश्यक है वह समार्ज के मूलभूत ढॉचे से तय होतार् है। विकास के लिए पर्यार्वरण, रार्जनीतिक ढॉचार्, प्रार्श्रय, शिक्षार् क ढंग वैधार्निक प्रार्रूप, विज्ञार्न तथार् परिवर्तन सम्बन्धी मनोवृत्ति आदि की जार्नकारी आवश्यक है।’’ अत: स्पष्ट है कि परिवर्तन को आवश्यक मार्न्यतार् प्रदार्न करें।

        इस प्रकार विकास के समार्जशार्स्त्र के अन्तर्गत उन तत्वों के अध्ययन क समार्वेश होगार् जो सार्मार्जिक विकास में सहार्यक अथवार् बार्धक है।

        विकास के सार्मार्जिक ढॉचे क अध्ययन 

        समार्जशार्स्त्र की विषयवस्तु के अन्तर्गत जहॉ सरल से जटिल अवस्थार् को प्रार्प्त समार्ज क अध्ययन सम्मिलित है, वहीं पर इसके अन्तर्गत उस सार्मार्जिक पृष्ठभूमि क भी अध्ययन होतार् है जो विकास के लिए अति अवश्यक है।

        1. विचार्रार्त्मक- 

        मैरिन जे. लेवी ने लिखार् है कि ‘‘इसके अन्र्तगत उन सार्मार्न्य झुकावों, मूल्यों, इच्छार्ओं को सम्मलित कियार् जार्तार् है तो विकास के लिए आवश्यक है।’’ सार्मार्जिक विकास की दषार् को तय करने में वैचार्रिक पृष्ठभूमि की एक सुनिश्चित भूमिक है। स्पेंगलर ने इस संबंद्व में अपने उद्गार्र रखते हुए लिखार् है कि, ‘‘एक न्यूनतम मूल्य एकमततार् सार्मार्जिक व्यवस्थतार् के निर्मार्ण के लिए आवश्यक है। किसी नियम के निर्धार्रण में महत्वपूर्ण मूल्य सम्बन्धी तत्व हैं-न्यार्य तथार् समार्नतार् क पैमार्नार्, धन की वितरण शक्ति और स्थिति तथार् सार्ंस्थार्निक समन्वय।’’ आज सभी समार्जों की एक सार्मार्न्य विशेषतार् आर्थिक लक्ष्य को प्रार्प्त करने क प्रयार्स है।

        2. संस्थार्गत-

        संस्थार्एं विशेष उद्देश्यों को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सार्धन, तौर तरीके विधियॉ, कार्य प्रणार्लियॉ आदि उपयोंगों को व्यक्त करती है। संस्थार्ओं के निर्देषन में ही व्यक्ति अपने व्यवहार्र प्रतिमार्न निश्चित करतार् है। प्रार्य: सभी पहलुओं से संम्बन्धित संस्थार्एं हैं ज्ौसे-पार्रिवार्रिक, आर्थिक, सार्मार्जिक, धामिक तथार् रार्जनीतिक आदि। अत: स्पष्ट है कि संस्थार्ओं के मार्ध्यम से कार्य करने के व्यवस्थित तथार् सुनिश्चित ढंग क ज्ञार्न होतार् है।

        3. संगठनार्त्मक- 

        नगरीकरण, नए पार्रिवार्रिक संगठन सत्तार्, श्रमिकसंध आदि आर्थिक पहलू में विकास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इन सभी तत्वों क अध्ययन विकास मे समार्जशार्स्त्र के अध्ययन विकास के समार्जशार्स्त्र के अन्तर्गत होतार् है। एम.जे.लेवी के अनसु ार्र-’’इसके अन्तर्गत उन तत्वों क अध्ययन सम्मिलित है जो समार्ज के निर्णार्यक है। और जो सार्धार्रणतयार् मूर्त्त हैं।’’

        4. प्रेरणार्त्मक- 

        विकास के समार्जशार्स्त्र में उन तत्वों के अध्ययन की विशेष महत्तार् है जो विकास के कार्य में पेर्र णार्त्मक हैं। विकास के समार्जशार्स्त्र में उन तत्वों के अध्ययन की विशेष महत्तार् है जो विकास के कार्य में प्रेरणार्त्मक है। विकास के समार्जशार्स्त्र के अन्र्तगत विकास-प्रकियार्ओं के अध्ययन के सार्थ-सार्थ उन सार्ंस्कृतिक तथार् सार्ंस्थार्निक बार्धार्ओं क भी अध्ययन होतार् है जो विकास में बार्धक हैं।

        सार्मार्जिक विकास की प्रकृति 

        समार्जिक विकास की प्रकृति वैज्ञार्निक है। इसके अन्र्तगत सार्मार्जिक तथ्यों क अध्ययन वैज्ञार्निक विधि द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। वैज्ञार्निक विधि उस विधि को कहते हैं जिसमें अध्ययन निम्नलिखित सुनिश्चित विधियों से होकर गुजरतार् है।

        1. समस्यार् क निरूपण
        2. अवलोकन
        3. तथ्य संग्रह
        4. वर्गीकरण तथार्
        5. सार्मार्न्यीकरण

        उदार्हरण के लिए यदि हम इस विकास प्रकियार् में जनसहभार्गितार् के महत्व क अध्ययन करनार् चार्हते है। और सार्मार्न्यीकरण के सिद्धार्न्त के रूप में यह स्वीकार करतें हैं कि विकास-प्रकियार् में जनसहभार्गितार् महत्त्वपूर्ण हैं तो इस तथ्य की सत्यतार् को हम उपरोक्त वर्णित चरणों के मार्ध्यम से ही प्रणार्मित करेंगे।

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