सार्मार्जिक परिवर्तन क अर्थ, परिभार्षार् एवं सिद्धार्ंत
सार्मार्जिक परिवर्तन के अन्तर्गत हम मुख्य रूप से तीन तथ्यों क अध्ययन करते हैं- (क) सार्मार्जिक संरचनार् में परिवर्तन, (ख) संस्कृति में परिवर्तन एवं (ग) परिवर्तन के कारक। सार्मार्जिक परिवर्तन के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कुछ प्रमुख परिभार्षार्ओं पर विचार्र करेंगे। मकीवर एवं पेज (R.M. MacIver and C.H. Page) ने अपनी पुस्तक Society में सार्मार्जिक परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए बतार्यार् है कि समार्जशार्स्त्री होने के नार्ते हमार्रार् प्रत्यक्ष संबंध सार्मार्जिक संबंधों से है और उसमें आए हुए परिवर्तन को हम सार्मार्जिक परिवर्तन कहेंगे।  डेविस (K. Davis) के अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन क तार्त्पर्य सार्मार्जिक संगठन अर्थार्त् समार्ज की संरचनार् एवं प्रकार्यों में परिवर्तन है।  एच0एम0 जॉनसन (H.M. Johnson) ने सार्मार्जिक परिवर्तन को बहुत ही संक्षिप्त एवं अर्थपूर्ण शब्दों में स्पष्ट करते हुए बतार्यार् कि मूल अर्थों में सार्मार्जिक परिवर्तन क अर्थ संरचनार्त्मक परिवर्तन है। जॉनसन की तरह गिडेन्स ने बतार्यार् है कि सार्मार्जिक परिवर्तन क अर्थ बुनियार्दी संरचनार् (Underlying Structure) यार् बुनियार्दी संस्थार् (Basic Institutions) में परिवर्तन से है।

ऊपर की परिभार्षार्ओं के संबंध में यह कहार् जार् सकतार् है कि परिवर्तन एक व्यार्पक प्रक्रियार् है। समार्ज के किसी भी क्षेत्र में विचलन को सार्मार्जिक परिवर्तन कहार् जार् सकतार् है। विचलन क अर्थ यहार्ँ खरार्ब यार् असार्मार्जिक नहीं है। सार्मार्जिक, आर्थिक, रार्जनीतिक, धामिक, नैतिक, भौतिक आदि सभी क्षेत्रों में होने वार्ले किसी भी प्रकार के परिवर्तन को सार्मार्जिक परिवर्तन कहार् जार् सकतार् है। यह विचलन स्वयं प्रकृति के द्वार्रार् यार् मार्नव समार्ज द्वार्रार् योजनार्बद्ध रूप में हो सकतार् है। परिवर्तन यार् तो समार्ज के समस्त ढार्ँचे में आ सकतार् है अथवार् समार्ज के किसी विशेक्ष पक्ष तक ही सीमित हो सकतार् है। परिवर्तन एक सर्वकालिक घटनार् है। यह किसी-न-किसी रूप में हमेशार् चलने वार्ली प्रक्रियार् है। परिवर्तन क्यों और कैसे होतार् है, इस प्रश्न पर समार्जशार्स्त्री अभी तक एकमत नहीं हैं। इसलिए परिवर्तन जैसी महत्वपूर्ण किन्तु जटिल प्रक्रियार् क अर्थ आज भी विवार्द क एक विषय है। किसी भी समार्ज में परिवर्तन की क्यार् गति होगी, यह उस समार्ज में विद्यमार्न परिवर्तन के कारणों तथार् उन कारणों क समार्ज में सार्पेक्षिक महत्व क्यार् है, इस पर निर्भर करतार् है। सार्मार्जिक परिवर्तन के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए यहार्ँ इसकी प्रमुख विशेषतार्ओं की चर्चार् अपेक्षित है।

सार्मार्जिक परिवर्तन की विशेषतार्एं

  1. सार्मार्जिक परिवर्तन एक विश्वव्यार्पी प्रक्रियार् (Universal Process) है। अर्थार्त् सार्मार्जिक परिवर्तन दुनियार् के हर समार्ज में घटित होतार् है। दुनियार् में ऐसार् कोर्इ भी समार्ज नजर नहीं आतार्, जो लम्बे समय तक स्थिर रहार् हो यार् स्थिर है। यह संभव है कि परिवर्तन की रफ्तार्र कभी धीमी और कभी तीव्र हो, लेकिन परिवर्तन समार्ज में चलने वार्ली एक अनवरत प्रक्रियार् है। 
  2. सार्मुदार्यिक परिवर्तन ही वस्तुत: सार्मार्जिक परिवर्तन है। इस कथन क मतलब यह है कि सार्मार्जिक परिवर्तन क नार्तार् किसी विशेष व्यक्ति यार् समूह के विशेष भार्ग तक नहीं होतार् है। वे ही परिवर्तन सार्मार्जिक परिवर्तन कहे जार्ते हैं जिनक प्रभार्व समस्त समार्ज में अनुभव कियार् जार्तार् है। 
  3. सार्मार्जिक परिवर्तन के विविध स्वरूप होते हैं। प्रत्येक समार्ज में सहयोग, समार्योजन, संघर्ष यार् प्रतियोगितार् की प्रक्रियार्एँ चलती रहती हैं जिनसे सार्मार्जिक परिवर्तन विभिन्न रूपों में प्रकट होतार् है। परिवर्तन कभी एकरेखीय (Unilinear) तो कभी बहुरेखीय (Multilinear) होतार् है। उसी तरह परिवर्तन कभी समस्यार्मूलक होतार् है तो कभी कल्यार्णकारी। परिवर्तन कभी चक्रीय होतार् है तो कभी उद्विकासीय। कभी-कभी सार्मार्जिक परिवर्तन क्रार्ंतिकारी भी हो सकतार् है। परिवर्तन कभी अल्प अवधि के लिए होतार् है तो कभी दीर्घकालीन।
  4. सार्मार्जिक परिवर्तन की गति असमार्न तथार् सार्पेक्षिक (Irregular and Relative) होती है। समार्ज की विभिन्न इकाइयों के बीच परिवर्तन की गति समार्न नहीं होती है। 
  5. सार्मार्जिक परिवर्तन के अनेक कारण होते हैं। समार्जशार्स्त्री मुख्य रूप से सार्मार्जिक परिवर्तन के जनसार्ंख्यिकीय (Demographic), प्रौद्योगिक (Technological) सार्ंस्कृतिक (Cultural) एवं आर्थिक (Economic) कारकों की चर्चार् करते हैं। इसके अलार्वार् सार्मार्जिक परिवर्तन के अन्य कारक भी होते हैं, क्योंकि मार्नव-समूह की भौतिक (Material) एवं अभौतिक (Non-material) आवश्यकतार्एँ अनन्त हैं और वे बदलती रहती हैं। 
  6. सार्मार्जिक परिवर्तन की कोर्इ निश्चित भविष्यवार्णी नहीं की जार् सकती है। इसक मुख्य कारण यह है कि अनेक आकस्मिक कारक भी सार्मार्जिक परिवर्तन की स्थिति पैदार् करते हैं।

विलबर्ट इ0 मोर (Wilbert E. Moore, 1974) ने आधुनिक समार्ज को ध्यार्न में रखते हुए सार्मार्जिक परिवर्तन की विशेषतार्ओं की चर्चार् अपने ढंग से की है, वे हैं-

  1. सार्मार्जिक परिवर्तन निश्चित रूप से घटित होते रहते हैं। सार्मार्जिक पुनरुत्थार्न के समय में परिवर्तन की गति बहुत तीव्र होती है। 
  2. बीते समय की अपेक्षार् वर्तमार्न में परिवर्तन की प्रक्रियार् अत्यधिक तीव्र होती है। आज परिवर्तनों क अवलोकन हम अधिक स्पष्ट रूप में कर सकते हैं। 
  3. परिवर्तन क विस्तार्र सार्मार्जिक जीवन के सभी क्षेत्रों में देख सकते हैं। भौतिक वस्तुओं के क्षेत्र में, विचार्रों एवं संस्थार्ओं की तुलनार् में, परिवर्तन अधिक तीव्र गति से होतार् है। 
  4. हमार्रे विचार्रों एवं सार्मार्जिक संरचनार् पर स्वार्भार्विक ढंग और सार्मार्न्य गति के परिवर्तन क प्रभार्व अधिक पड़तार् है।
  5. सार्मार्जिक परिवर्तन क अनुमार्न तो हम लगार् सकते हैं, लेकिन निश्चित रूप से हम इसकी भविष्यवार्णी नहीं कर सकते हैं। 
  6. सार्मार्जिक परिवर्तन गुणार्त्मक (Qualitative) होतार् है। समार्ज की एक इकार्इ दूसरी इकार्इ को परिवर्तित करती है। यह प्रक्रियार् तब तक चलती रहती है, जब तक पूरार् समार्ज उसके अच्छे यार् बुरे प्रभार्वों से परिचित नहीं हो जार्तार्। 
  7. आधुनिक समार्ज में सार्मार्जिक परिवर्तन न तो मनचार्हे ढंग से कियार् जार् सकतार् है और न ही इसे पूर्णत: स्वतंत्र और असंगठित छोड़ दियार् जार् सकतार् है। आज हर समार्ज में नियोजन (Planning) के द्वार्रार् सार्मार्जिक परिवर्तन को नियंत्रित कर वार्ंछित लक्ष्यों की दिशार् में क्रियार्शील कियार् जार् सकतार् है।

सार्मार्जिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण स्रोत

1. खोज

मनुष्य ने अपने ज्ञार्न एवं अनुभवों के आधार्र पर अपनी समस्यार्ओं को सुलझार्ने और एक बेहतर जीवन व्यतीत करने के लिए बहुत तरह की खोज की है। जैसे शरीर में रक्त संचार्लन, बहुत सार्री बीमार्रियों के कारणों, खनिजों, खार्द्य पदाथों, पृथ्वी गोल है एवं वह सूर्य की परिक्रमार् करती है आदि हजार्रों किस्म के तथ्यों की मार्नव ने खोज की, जिनसे उनके भौतिक एवं अभौतिक जीवन में काफी परिवर्तन आयार्।

2. आविष्कार

विज्ञार्न और प्रौद्यार्गिकी के जगत में मनुष्य के आविष्कार इतने अधिक हैं कि उनकी गिनती करनार् मुश्किल है। आविष्कारों ने मार्नव समार्ज में एक युगार्न्तकारी एवं क्रार्न्तिकारी परिवर्तन लार् दियार् है।

3. प्रसार्र

सार्ंस्कृतिक जगत के परिवर्तन में प्रसार्र क प्रमुख योगदार्न रहार् है। पश्चिमीकरण (Westernization), आधुनिकीकरण (Modernization), एवं भूमंडलीकरण (Globalization) जैसी प्रक्रियार्ओं क मुख्य आधार्र प्रसार्र ही रहार् है। आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी क इतनार् अधिक विकास हुआ है कि प्रसार्र की गति बहुत तेज हो गयी है।

4. आन्तरिक विभेदीकरण

(Internal Differentiation)—जब हम सार्मार्जिक परिवर्तन के सिद्धार्न्तों को ध्यार्न में रखते हैं, तो ऐसार् लगतार् है कि परिवर्तन क एक चौथार् स्रोत भी संभव है- वह है आन्तरिक विभेदीकरण। इस तथ्य की पुष्टि उद्विकासीय सिद्धार्न्त (Evolutionary Theory) के प्रवर्तकों के विचार्रों से होती है। उन लोगों क मार्ननार् है कि समार्ज में परिवर्तन समार्ज के स्वार्भार्विक उद्विकासीय प्रक्रियार् से ही होतार् है। हरेक समार्ज अपनी आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र धीरे-धीरे विशेष स्थिति में परिवर्तित होतार् रहतार् है। समार्जशार्स्त्रियों एवं मार्नवशार्स्त्रियों ने अपने उद्विकासीय सिद्धार्न्त में स्वत: चलने वार्ली आन्तरिक विभेदीकरण की प्रक्रियार् पर काफी बल दियार् है।

सार्मार्जिक परिवर्तन की कुछ संबंधित अवधार्रणार्एं

सार्मार्जिक परिवर्तन की प्रक्रियार् कर्इ रूपों में प्रकट होती हैं, जैसे- उद्विकास (Evolution), प्रगति (Progress), विकास (Development), सार्मार्जिक आन्दोलन (Social Movement), क्रार्ंति (Revolution) इत्यार्दि। चूँकि इन सार्मार्जिक प्रक्रियार्ओं क सार्मार्जिक परिवर्तन से सीधार् संबंध है यार् कभी-कभी इन संबंधों को सार्मार्जिक परिवर्तन क पर्यार्यवार्ची मार्नार् जार्तार् है, इसलिए इन शब्दों के अर्थ के संबंध में काफी उलझनें हैं। इनक स्पष्टीकरण निम्नलिखित हैं।

1. उद्विकास

‘उद्विकास’ शब्द क प्रयोग सबसे पहले जीव-विज्ञार्न के क्षेत्र में चार्ल्र्स डाविन (Charles Darwin) ने कियार् थार्। डाविन के अनुसार्र उद्विकास की प्रक्रियार् में जीव की संरचनार् सरलतार् से जटिलतार् (Simple to Complex) की ओर बढ़ती है। यह प्रक्रियार् प्रार्कृतिक चयन (Natural Selection) के सिद्धार्न्त पर आधार्रित है। आरंभिक समार्जशार्स्त्री हरबर्ट स्पेन्सर ने जैविक परिवर्तन (Biological Changes) की भार्ँति ही सार्मार्जिक परिवर्तन को भी कुछ आन्तरिक शक्तियों (Internal Forces) के कारण संभव मार्नार् है और कहार् है कि उद्विकास की प्रक्रियार् धीरे-धीरे निश्चित स्तरों से गुजरती हुर्इ पूरी होती है। उद्विकास की अवधार्रणार् को स्पष्ट करते हुए मकीवर एवं पेज ने लिखार् है कि उद्विकास एक किस्म क विकास है। पर प्रत्येक विकास उद्विकास नहीं है क्योंकि विकास की एक निश्चित दिशार् होती है, पर उद्विकास की कोर्इ निश्चित दिशार् नहीं होती है। किसी भी क्षेत्र में विकास करनार् उद्विकास कहार् जार्एगार्। मकीवर एवं पेज ने बतार्यार् है कि उद्विकास सिर्फ आकार में नहीं बल्कि संरचनार् में भी विकास है। यदि समार्ज के आकार में वृद्धि नहीं होती है और वह पहले से ज्यार्दार् आन्तरिक रूप से जटिल हो जार्तार् है तो उसे उद्विकास कहेंगे।

2. प्रगति

परिवर्तन जब अच्छाइ की दिशार् में होतार् है तो उसे हम प्रगति (Progress) कहते हैं। प्रगति सार्मार्जिक परिवर्तन की एक निश्चित दिशार् को दर्शार्तार् है। प्रगति में समार्ज-कल्यार्ण और सार्मूहिक-हित की भार्वनार् छिपी होती है। ऑगबर्न एवं निमकॉफ ने बतार्यार् है कि प्रगति क अर्थ अच्छाइ के निमित्त परिवर्तन है। इसलिए प्रगति इच्छित परिवर्तन है। इसके मार्ध्यम से हम पूर्व-निर्धार्रित लक्ष्यों को पार्नार् चार्हते हैं।

मकीवर एवं पेज आगार्ह करते हुए कहार् है कि हम लोगों को उद्विकास और प्रगति को एक ही अर्थ में प्रयोग नहीं करनार् चार्हिए। दोनों बिल्कुल अलग-अलग अवधार्रणार्एँ हैं।

3. विकास

जिस प्रकार उद्विकास के अर्थ बहुत स्पष्ट एवं निश्चित नहीं हैं, विकास की अवधार्रणार् भी बहुत स्पष्ट नहीं है। समार्जशार्स्त्रीय परिप्रेक्ष्य में विकास क अर्थ सार्मार्जिक विकास से है। प्रार्रंभिक समार्जशार्स्त्रियों विशेषकर कौंत, स्पेन्सर एवं हॉबहार्उस ने सार्मार्जिक उद्विकास (Social Evolution), प्रगति (Progress) एवं सार्मार्जिक विकास (Social Development) को एक ही अर्थ में प्रयोग कियार् थार्। आधुनिक समार्जशार्स्त्री इन शब्दों को कुछ विशेष अर्थ में ही इस्तेमार्ल करते हैं।

आज समार्जशार्स्त्र के क्षेत्र में विकास से हमार्रार् तार्त्पर्य मुख्यत: सार्मार्जिक विकास से है। इसक प्रयोग विशेषकर उद्योगीकरण एवं आधुनिकीकरण के चलते विकसित एवं विकासशील देशों के बीच अन्तर स्पष्ट करने के लिए होतार् है। सार्मार्जिक विकास में आर्थिक विकास क भी भार्व छिपार् होतार् है और उसी के तहत हम परम्परार्गत समार्ज (Traditional Society), संक्रमणशील समार्ज (Transitional Society) एवं आधुनिक समार्ज (Modern Society) की चर्चार् करते हैं। आधुनिक शिक्षार् क विकास भी एक प्रकार क सार्मार्जिक विकास है। उसी तरह से कृषि पर आधार्रित सार्मार्जिक व्यवस्थार् से उद्योग पर आधार्रित सार्मार्जिक व्यवस्थार् की ओर अग्रसर होनार् भी सार्मार्जिक विकास कहार् जार्एगार्। दूसरे शब्दों में, सार्मन्तवार्द (Feudalism) से पूँजीवार्द (Capitalism) की ओर जार्नार् भी एक प्रकार क विकास है।

4. सार्मार्जिक आन्दोलन

सार्मार्जिक आन्दोलन सार्मार्जिक परिवर्तन क एक बहुत प्रमुख कारक रहार् है। विशेषकर दकियार्नूसी समार्ज में सार्मार्जिक आन्दोलनों के द्वार्रार् काफी परिवर्तन आए हैं।

गिडेन्स के अनुसार्र सार्मूहिक आन्दोलन व्यक्ेितयों क ऐसार् प्रयार्स है जिसक एक सार्मार्न्य उद्देश्य होतार् है और उद्देश्य की पूर्ति के लिए संस्थार्गत सार्मार्जिक नियमों क सहार्रार् न लेकर लोग अपने ढंग से व्यवस्थित होकर किसी परम्परार्गत व्यवस्थार् को बदलने क प्रयार्स करते हैं।

गिडेन्स ने कहार् है कि कभी-कभी ऐसार् लगतार् है कि सार्मार्जिक आन्दोलन और औपचार्रिक संगठन (Formal Organization) एक ही तरह की चीजें हैं, पर दोनों बिल्कुल भिन्न हैं। सार्मार्जिक आन्दोलन के अन्तर्गत नौकरशार्ही व्यवस्थार् जैसे नियम नहीं होते, जबकि औपचार्रिक व्यवस्थार् के अन्तर्गत नौकरशार्ही नियम-कानून की अधिकतार् होती है। इतनार् ही नहीं दोनों के बीच उद्देश्यों क भी फर्क होतार् है। उसी तरह से कबीर पंथ, आर्य समार्ज, बह्मो समार्ज यार् हार्ल क पिछड़ार् वर्ग आन्दोलन (Backward Class Movement) को सार्मार्जिक आन्दोलन कहार् जार् सकतार् है। औपचार्रिक व्यवस्थार् नहीं।

5. क्रार्ंति

सार्मार्जिक आन्दोलन से भी ज्यार्दार् सार्मार्जिक परिवर्तन क सशक्त मार्ध्यम क्रार्ंति है, इसलिए यहार्ँ इसकी भी चर्चार् आवश्यक है। क्रार्ंति के द्वार्रार् सार्मार्जिक परिवर्तन के अनगिनत उदार्हरण मौजूद हैं। लेकिन पिछली दो-तीन शतार्ब्दियों में मार्नव इतिहार्स में काफी, बड़ी-बड़ी क्रार्ंतियार्ँ आर्इ हैं, जिससे कुछ रार्ष्ट्रों में रार्जनीतिक, आर्थिक और सार्मार्जिक क्षेत्रों में युगार्न्तकारी परिवर्तन हुए हैं। इस संदर्भ में 1775-83 की अमेरिकी क्रार्ंति एवं 1789 की फ्रार्ंसीसी क्रार्ंति विशेष रूप से उललेखनीय हैं। इन क्रार्ंतियों के चलते आज समस्त विश्व में स्वतंत्रतार् (Liberty), सार्मार्जिक समार्नतार् (Social Equality) और प्रजार्तंत्र (Democracy) की बार्त की जार्ती है। उसी तरह से रूसी और चीनी क्रार्ंति क विश्व स्तर पर अपनार् ही महत्व है। अब्रार्म्स (Abrams, 1982) ने बतार्यार् है कि विश्व में अधिकांश क्रार्ंतियार्ँ मौलिक सार्मार्जिक पुनर्निमार्ण के लिए हुर्इ हैं। अरेंड (Nannah Arendt, 1963) के अनुसार्र क्रार्ंतियों क मुख्य उद्देश्य परम्परार्गत व्यवस्थार् से अपने-आपको अलग करनार् एवं नये समार्ज क निर्मार्ण करनार् है। इतिहार्स में कभी-कभी इसक अपवार्द भी देखने को मिलतार् है। कुछ ऐसी भी क्रार्ंतियार्ँ हुर्इ हैं, जिनके द्वार्रार् हम समार्ज को और भी पुरार्तन समय में ले जार्ने की कोशिश करते हैं।

सार्मार्जिक परिवर्तन के सिद्धार्ंत

सार्मार्जिक परिवर्तन के संबंध में विद्वार्नों ने अपने-अपने सिद्धार्न्त क उल्लेख कियार् है। इन सिद्धार्न्तों को कर्इ प्रकार से वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है।

उद्वविकासवार्दी के प्रमुख प्रवर्तक हर्बर्ट स्पेन्सर हैं जिनके अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन धीरे-धीरे, सरल से जटिल की और कुछ निश्चित स्तरों से गुजरतार् हुआ होतार् है।

संरचनार्त्मक कार्यार्त्मक सिद्धार्ंत के प्रवर्तकों में दुर्खीम, वेबर, पासन्स, मर्टन आदि विद्वार्नों क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है। इन विद्वार्नों के मतार्नुसार्र सार्मार्जिक संरचनार् क निर्मार्ण करने वार्ली प्रत्येक इकार्इ क अपनार् एक प्रकार्य होतार् है और यह प्रकार्य उसके अस्तित्व को बनार्ए रखने में महत्वपूर्ण होतार् है। इस प्रकार सार्मार्जिक सरंचनार् और इसको बनार्ने वार्ली इकाइयों (संस्थार्ओं, समूहों आदि) के बीच एक प्रकार्यार्त्मक संबंध होतार् है और इसीलिए इन प्रकार्यों में जब परिवर्तन होतार् है तो सार्मार्जिक संरचनार् भी उसी अनुसार्र बदल जार्ती है। सार्मार्जिक ढार्ँचे में परिवर्तन को ही सार्मार्जिक परिवर्तन कहते हैं। आगर्बन द्वार्रार् प्रस्तुत ‘सार्ंस्कृतिक विलम्बनार्’ (Cultural Lag) के सिद्धार्न्त को भी कुछ विद्वार्न इसी श्रेणी में सम्मिलित करते हैं।

संघर्ष यार् द्वन्द्व के सिद्धार्ंत के समर्थक कार्ल माक्स, कोजर, डेहर डोर्फ़ आदि हैं। इनके सिद्धार्न्तों क सार्र-तत्व यह है कि सार्मार्जिक जीवन में होने वार्ले परिवर्तन क प्रमुख आधार्र समार्ज में मौजूद दो विरोधी तत्वों यार् शक्तियों के बीच होने वार्लार् संघर्ष यार् द्वन्द्व है।

चक्रीय सिद्धार्न्त के प्रमुख प्रवर्तक स्पेगलट, परेटो आदि हैं जो कि परिवर्तन की दिशार् को चक्र की भार्ँति मार्नते हैं।

1. चक्रीय सिद्धार्न्त

सार्मार्जिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धार्न्त की मूल मार्न्यतार् यह है कि सार्मार्जिक परिवर्तन की गति और दिशार् एक चक्र की भार्ँति है और इसलिए सार्मार्जिक परिवर्तन जहार्ँ से आरम्भ होतार् है, अन्त में घूम कर फिर वहीं पहुँच कर समार्प्त होतार् है। यह स्थिति चक्र की तरह पूरी होने के बार्द बार्र-बार्र इस प्रक्रियार् को दोहरार्ती है। इसक उत्तम उदार्हरण भार्रत, चीन व ग्रीक की सभ्यतार्एँ हैं। चक्रीय सिद्धार्न्त के कतिपय प्रवर्तकों ने अपने सिद्धार्न्त के सार्र-तत्व को इस रूप में प्रस्तुत कियार् है कि इतिहार्स अपने को दुहरार्तार् है’।

चक्रीय सिद्धार्न्त विचार्रार्नुसार्र परिवर्तन की प्रकृति एक चक्र की भार्ँति होती है। अर्थार्त् जिस स्थिति से परिवर्तन शुरू होतार् है, परिवर्तन की गति गोलार्कार में आगे बढ़ते-बढ़ते पुन: उसी स्थार्न पर लौट आती है जहार्ँ पर कि वह आरम्भ में थी। विल्फ्रेडो परेटो ने सार्मार्जिक परिवर्तन के अपने चक्रीय सिद्धार्न्त में यह दर्शार्ने क प्रयत्न कियार् है कि किस भार्ँति रार्जनीतिक, आर्थिक तथार् आध्यार्त्मिक क्षेत्र में चक्रीय गति से परिवर्तन होतार् रहतार् है।

परेटो का चक्रीय सिद्धार्न्त

परेटो के अनुसार्र प्रत्येक सार्मार्जिक संरचनार् में जो ऊँच-नीच क संस्तरण होतार् है, वह मोटे तौर पर दो वर्गों द्वार्रार् होतार् है- उच्च वर्ग तथार् निम्न वर्ग। इनमें से कोर्इ भी वर्ग स्थिर नहीं होतार्, अपितु इनमें ‘चक्रीय गति’ (Cyclical Movement) पाइ जार्ती है। चक्रीय गति इस अर्थ में कि समार्ज में इन दो वर्गों में निरन्तर ऊपर से नीचे यार् अधोगार्मी और नीचे से ऊपर यार् ऊध्र्वगार्मी प्रवार्ह होतार् रहतार् है। जो वर्ग सार्मार्जिक संरचनार् में ऊपरी भार्ग में होते हैं वह कालार्न्तर में भ्रष्ट हो जार्ने के कारण अपने पद और प्रतिष्ठार् से गिर जार्ते हैं, अर्थार्त। अभिजार्त-वर्ग अपने गुणों को खोकर यार् असफल होकर निम्न वर्ग में आ जार्ते हैं। दूसरी ओर, उन खार्ली जगहों को भरने के लिए निम्न वर्ग में जो बुद्धिमार्न, कुशल, चरित्रवार्न तथार् योग्य लोग होते हैं, वे नीचे से ऊपर की ओर जार्ते रहते हैं। इस प्रकार उच्च वर्ग क निम्न वर्ग में आने यार् उसक विनार्श होने और निम्न वर्ग क उच्च वर्ग में जार्ने की प्रक्रियार् चक्रीय ढंग से चलती रहती है। इस चक्रीय गति के कारण सार्मार्जिक ढार्ँचार् परिवर्तित हो जार्तार् है यार् सार्मार्जिक परिवर्तन होतार् है।

परेटो के अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन के चक्र के तीन मुख्य पक्ष हैं- रार्जनीतिक, आर्थिक तथार् आदर्शार्त्मक। रार्जनीतिक क्षेत्र में चक्रीय परिवर्तन तब गतिशील होतार् है जब शार्सन-सत्तार् उस वर्ग के लोगों के हार्थों में आ जार्ती है जिनमें समूह के स्थार्यित्व के विशिष्ट-चार्लक अधिक शक्तिशार्ली होते हैं। इन्हें ‘शेर’ (Lions) कहार् जार्तार् है। समूह के स्थार्यित्व के विशिष्ट-चार्लक द्वार्रार् अत्यधिक प्रभार्वित होने के कारण इन ‘शेर’ लोगों क कुछ आदर्शवार्दी लक्ष्यों पर दृढ़ विश्वार्स होतार् है और उन आदर्शों की प्रार्प्ति के लिए ये शक्ति क भी सहार्रार् लेने में नहीं झिझकते। शक्ति-प्रयोग की प्रतिक्रियार् भयंकर हो सकती है, इसलिए यह तरीक असुविधार्जनक होतार् है। इस कारण वे कूटनीति क सहार्रार् लेते हैं, और ‘शेर, से अपने को ‘लोमड़ियों’ (foxes) में बदल लेते हैं और लोमड़ी की भार्ँति चार्लार्की से काम लेते हैं। लेकिन निम्न वर्ग में भी लोमड़ियार्ँ होती हैं और वे भी सत्तार् को अपने हार्थ में लेने की फिरार्क में रहती हैं। अन्त में, एक समय ऐसार् भी आतार् है जबकि वार्स्तव में उच्च वर्ग की लोमड़ियों के हार्थ से सत्तार् निकालकर निम्न वर्ग की लोमड़ियों के हार्थ में आ जार्ती है, तभी रार्जनीतिक क्षेत्र में यार् रार्जनीतिक संगठन और व्यवस्थार् में परिवर्तन होतार् है।

जहार्ँ तक आर्थिक क्षेत्र यार् आर्थिक संगठन और व्यवस्थार् में परिवर्तन क प्रश्न है, परेटो हमार्रार् ध्यार्न समार्ज के दो आर्थिक वर्गों की ओर आकर्षित करते हैं। वे दो वर्ग हैं- (1) सट्टेबार्ज (speculators) और (2) निश्चित आय वार्लार् वर्ग (rentiers)। पहले वर्ग के सदस्यों की आय बिल्कुल अनिश्चित होती है, कभी कम तो कभी ज्यार्दार्; पर जो कुछ भी इस वर्ग के लोग कमार्ते हैं वह अपनी बुद्धिमत्तार् के बल पर ही कमार्ते हैं। इसके विपरीत, दूसरे वर्ग की आय निश्चित यार् लगभग निश्चित होती है क्योंकि वह सट्टेबार्जों की भार्ँति अनुमार्न पर निर्भर नहीं है। सट्टेबार्जों में सम्मिलन के विशिष्ट-चार्लक की प्रधार्नतार् तथार् निश्चित आय वार्ले वर्ग के समूह में स्थार्यित्व के विशिष्ट-चार्लक की प्रमुखतार् पाइ जार्ती है। इसी कारण पहले वर्ग के लोग आविष्कारकर्तार्, लोगों के नेतार् यार् कुशल व्यवसार्यी आदि होते हैं। यह वर्ग अपने आर्थिक हित यार् अन्य प्रकार की शक्ति के मोह से चार्लार्की और भ्रष्टार्चार्र क स्वयं शिकार हो जार्तार् है जिसके कारण उसक पतन होतार् है और दूसरार् वर्ग उसक स्थार्न ले लेतार् है। समार्ज की समृद्धि यार् विकास इसी बार्त पर निर्भर है कि सम्मिलन क विशिष्ट-चार्लक वार्लार् वर्ग नए-नए सम्मिलन और आविष्कार के द्वार्रार् रार्ष्ट्र को नवप्रवर्तन की ओर ले जार्ए और समूह के स्थार्यित्व के विशिष्ट-चार्लक वार्लार् वर्ग उन नए सम्मिलनों से मिल सकने वार्ले समस्त लार्भों को प्रार्प्त करने में सहार्यतार् दें। आर्थिक प्रगति यार् परिवर्तन क रहस्य इसी में छिपार् हुआ है।

उसी प्रकार में अविश्वार्स और विश्वार्स क चक्र चलतार् रहतार् है। किसी एक समय-विशेष में समार्ज में विश्वार्सवार्दियों क प्रभुत्व रहतार् है परन्तु वे अपनी दृढ़तार् यार् रूढ़िवार्दितार् के कारण अपने पतन क सार्धन अपने-आप ही जुटार् लेते हैं और उनक स्थार्न दूसरे वर्ग के लोग ले लेते हैं।

2. उतार्र-चढ़ार्व क सिद्धार्न्त

चक्रीय सिद्धार्न्त से मिलतार्-जुलतार् सोरोकिन क ‘सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक गतिशीलतार् क सिद्धार्न्त’ (Theory of Socio-cultural Dynamics) यार् उतार्र-चढ़ार्व क सिद्धार्न्त है। कतिपय विद्वार्नों ने इसे चक्रीय सिद्धार्न्त की श्रेणी में ही रखार् है।

हैस स्पीयर के शब्दों में, सोरोकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ऐतिहार्सिक दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट पतार् चलतार् है कि कोर्इ प्रगति नहीं हुर्इ है, न कोर्इ चक्रीय परिवर्तन हुआ है। सोरोकिन के अनुसार्र जो कुछ भी है वह केवल मार्त्र उतार्र-चढ़ार्व (Fluctuation) है। संस्कृति के बुनियार्दी स्वरूपों क उतार्र-चढ़ार्व, सार्मार्जिक संबंधों क उतार्र-चढ़ार्व, शक्ति के केन्द्रीकरण क उतार्र-चढ़ार्व यहार्ँ तक कि आर्थिक अवस्थार्ओं में सर्वत्र ही उतार्र-चढ़ार्व है।’’ इसी उतार्र-चढ़ार्व में समस्त सार्मार्जिक घटनार्ओं और परिवर्तनों क रहस्य छिपार् हुआ है।

सोरोकिन के अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार्ओं के उतार्र-चढ़ार्व में व्यक्त होतार् है। उतार्र-चढ़ार्व की धार्रणार् सोरोकिन के सिद्धार्न्त क प्रथम आधार्र है। यह उतार्र-चढ़ार्व दो सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार्ओं-चेतनार्त्मक संस्कृति तथार् भार्वनार्त्मक संस्कृति-के बीच होतार् है। दूसरे शब्दों में, जब समार्ज चेतनार्त्मक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् से भार्वनार्त्मक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् में यार् भार्वनार्त्मक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् से चेतनार्त्मक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् में बदलतार् है, तभी सार्मार्जिक परिवर्तन होतार् है। अर्थार्त् तभी विज्ञार्न, दर्शन, धर्म, कानून, नैतिकतार्, आर्थिक व्यवस्थार्, रार्जनीति, कलार्, सार्हित्य, सार्मार्जिक संबंध सब-कुछ बदल जार्तार् है। इस प्रकार सोरोकिन के सार्मार्जिक परिवर्तन के सिद्धार्न्त क दूसरार् आधार्र चेतनार्त्मक संस्कृति और भार्वनार्त्मक संस्कृति के बीच भेद है।

सोरोकिन  के अनुसार्र जब एक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार्, उदार्हरणाथ चेतनार्त्मक संस्कृति व्यवस्थार् अपनी चरम सीमार् पर पहुँच जार्ती है तो उसे अपनी गति को विपरीत दिशार्, अर्थार्त् भार्वनार्त्मक संस्कृति व्यवस्थार् की ओर मोड़नार् ही पड़तार् है। अर्थार्त् पहले की व्यवस्थार् के स्थार्न पर दूसरी व्यवस्थार् क जन्म होतार् है; क्योंकि प्रत्येक व्यवस्थार् की-चार्हे वह कितनी ही अच्छी हो यार् बुरी-पनपने, आगे बढ़ने अथवार् विकसित होने की एक सीमार् है। यही सोरोकिन क ‘सीमार्ओं क सिद्धार्न्त’ है जो कि सार्मार्जिक परिवर्तन क तीसरार् आधार्र है।

इन सीमार्ओं के सिद्धार्न्त को बीरस्टीड द्वार्रार् प्रस्तुत एक उदार्हरण की सहार्यतार् से अति सरलतार् से समझार् जार् सकतार् है। यदि आप प्यार्नों की एक कुंजी को उँगली मार्रेंगे तो उससे कुछ ध्वनि उत्पन्न होगी। यदि आप जरार् जोर से उँगली मार्रेंगे तो अवश्य ही ध्वनि भी अधिक जोर की होगी। परन्तु इस प्रकार जोर से उँगली मार्रने और अधिक जोर से ध्वनि निकालने की एक सीमार् है। एक सीमार् से अधिक जोर से यदि आप प्यार्नों पर आघार्त करेंगे तो अधिक जोर से ध्वनि निकलने की अपेक्षार् स्वयं प्यार्नों ही टूट जार्एगार्। यही बार्त सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार्ओं पर भी लार्गू होती है। एक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् एक सीमार् तक पहुँच जार्ने के बार्द फिर आगे नहीं बढ़ सकती और तब तक विपरीत प्रभार्व उत्पन्न हो जार्तार् है और टूटे हुए प्यार्नों की भार्ँति उस व्यवस्थार् के स्थार्न पर एक नवीन सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् स्वत: उदय होती है।

सोरोकिन के सार्मार्जिक परिवर्तन क यह है कि सार्ंस्कृतिक अवस्थार् से दूसरी अवस्थार् में परिवर्तन होतार् तो अवश्य है, परन्तु होतार् है अनियमित रूप में। दूसरे शब्दों में, सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार्ओं के उतार्र-चढ़ार्व को किन्हीं निश्चित बन्धनों में बार्ँधार् नहीं जार् सकतार् है। यद्यपि यह सच है कि संस्कृति एक गतिशील व्यवस्थार् है फिर भी हम यह आशार् नहीं कर सकते कि एक सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् किसी एक निश्चित दिशार् की ओर स्थार्यी रूप में गतिशील रहेगी।

अब प्रश्न यह उठतार् है कि चेतनार्त्मक अवस्थार् से भार्वनार्त्मक अवस्थार् में यार् भार्वनार्त्मक अवस्थार् से चेतनार्त्मक अवस्थार् में जो परिवर्तन होतार् है उस परिवर्तन को लार्ने वार्ली कौन-सी शक्ति हैं? सोरोकिन ने इस प्रश्न क उत्तर ‘स्वार्भार्विक परिवर्तन क सिद्धार्न्त’ (Principle of Immanent Change) के आधार्रपर दियार् है और यही आपके सार्मार्जिक परिवर्तन के सिद्धार्न्त क आधार्र है। ‘स्वार्भार्विक परिवर्तन क सिद्धार्न्त’ है कि परिवर्तन होने क कारण यार् परिवर्तन लार्ने वार्ली शक्ति स्वयं संस्कृति की अपनी प्रकृति में ही अन्तर्निहित है। परिवर्तन लार्ने वार्ली कोर्इ बार्हरी शक्ति नहीं बल्कि संस्कृति की प्रकृति में ही क्रियार्शील आन्तरिक शक्ति यार् शक्तियार्ँ हैं। संक्षेप में, सोरोकिन के अनुसार्र, सार्मार्जिक परिवर्तन एक स्वार्भार्विक प्रक्रियार् है जोकि संस्कृति के अन्दर ही क्रियार्शील कुछ शक्तियों क परिणार्म होती है। सार्मार्जिक परिवर्तन एक कृत्रिम प्रक्रियार् है यार् किसी बार्ह्य शक्ति द्वार्रार् प्रेरित होती है- ऐसार् सोचनार् गलत है। चेतनार्त्मक अवस्थार् से भार्वनार्त्मक अवस्थार् क यार् भार्वनार्त्मक अवस्थार् से चेतनार्त्मक अवस्थार् क परिवर्तन एक स्वार्भार्विक तथार् आन्तरिक प्रक्रियार् है। ऐसार् इसलिए होतार् है क्योंकि ऐसार् होनार् ही स्वार्भार्विक है। उदार्हरणाथ, गुलार्ब क एक बीज केवल गुलार्ब के ही पौधे में, न कि अन्य प्रकार के पौधे में, इसलिए विकसित होतार् है क्योंकि यही स्वार्भार्विक है यार् वह उस बीज के स्वभार्व में अन्तर्निहित है।

3. रेखीय परिवर्तन क सिद्धार्न्त

यह सार्मार्जिक परिवर्तन क वह स्वरूप है; जिसमें परिवर्तन की दिशार् सदैव ऊपर की ओर होती है। परिवर्तन एक सिलसिले यार् क्रम से विकास की ओर एक ही दिशार् में निरन्तर होतार् जार्तार् है। जो आविष्कार आज हुआ है उससे आगे ही आविष्कार होगार्, जैसे रेडियों के बार्द टेलीविजन क अविष्कार हुआ उसे और विकसित करके टेलीफोन से बार्त करते समय दूसरी ओर से बार्त करने वार्ले को देखार् भी जार् सकेगार्। कहने क तार्त्पर्य यह है कि परिवर्तन के इस प्रतिमार्न में परिवर्तन रेखीय होतार् है और उसे हम एक रेखार् से प्रदर्शित कर सकते हैं। इस परिवर्तन की गति तीव्र यार् मंद हो सकती है।

आदिम समार्ज में परिवर्तन धीमी गति से थार् जबकि आधुनिक समार्जों में गति तीव्र है, परन्तु दोनों समार्जों में परिवर्तन एक रेखार् में ही अर्थार्त आगे बढ़तार् हुआ है। सार्मार्जिक परिवर्तन के रेखार्ीय सिद्धार्न्त को स्पष्ट रूप से समझने के लिए अगर इसक अन्तर चक्रीय सिद्धार्न्त से कियार् जार्ए तो इसकी प्रकृति को सरलतार्पूर्वक समझार् जार् सकतार् है। दोनों में अन्तर निम्न प्रकार से कियार् जार् सकतार् है-

  1. रेखीय सिद्धार्न्त इस विचार्र पर आधार्रित है कि सार्मार्जिक परिवर्तन की प्रवृत्ति एक निश्चित दिशार् की ओर बढ़ने की होती है, इसके विपरीत चक्रीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन सदैव उतार्र-चढ़ार्व से युक्त होते हैं अर्थार्त प्रत्येक परिवर्तन सदैव नर्इ दिशार् उत्पन्न नहीं करतार् बल्कि इसके कारण समूह द्वार्रार् कभी नर्इ विशेषतार्ओं और कभी पहले छोड़ी जार् चुकी विशेषतार्ओं को पुन: ग्रहण कियार् जार् सकतार् है।
  2. रेखीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन की दिशार् सार्धार्रणतयार् अपूर्णतार् से पूर्णतार् की ओर बढ़ने की होती है। चक्रीय सिद्धार्न्त में परिवर्तन के किसी ऐसे क्रम को स्पष्ट नहीं कियार् जार् सकतार्, इसमें परिवर्तन पूर्णतार् से अपूर्णतार् अथवार् अपूर्णतार् से पूर्णतार् किसी भी दिशार् की ओर हो सकतार् है। 
  3. रेखीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र परिवर्तन की गति आरम्भ में धीमी होती है लेकिन एक निश्चित बिन्दु तक पहुँचने के बार्द परिवर्तन बहुत स्पष्ट रूप से तथार् तेजी से होने लगतार् है। प्रौद्योगिक विचार्र से उत्पन्न परिवर्तन इस कथन की पुष्टि करते हैं। जबकि इसके विपरीत चक्रीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र एक विशेष परिवर्तन को किसी निश्चित अवधि क अनुमार्न नहीं लगार्यार् जार् सकतार् । परिवर्तन कभी जल्दी-जल्दी हो सकते हैं और कभी बहुत सार्मार्न्य गति से। 
  4. रेखीय सिद्धार्न्त की तुलनार् में चक्रीय सिद्धार्न्तों पर विकासवार्द (Evolutionism) क प्रभार्व बहुत कम है। तार्त्पर्य यह है कि रेखार्ीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र परिवर्तन की प्रवृत्ति एक ही दिशार् में तथार् सरलतार् से जटिलतार् की ओर बढ़ने की होती है। इसके विपरीत चक्रीय सिद्धार्न्त सार्ंस्कृतिक और सार्मार्जिक परिवर्तन में भेद करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि विकासवार्दी प्रक्रियार् अधिक से अधिक सार्मार्जिक परिवर्तन में ही देखने को मिलती है जबकि सार्ंस्कृतिक जीवन और विशेष मूल्यों तथार् लोकाचार्रों में होने वार्लार् परिवर्तन उतार्र-चढ़ार्व से युक्त रहतार् है। 
  5. रेखीय सिद्धार्न्त सैद्धार्न्तिकतार् (indoctrination) पर अधिक बल देते हैं, ऐतिहार्सिक सार्क्षियों पर नहीं। जब कि चक्रीय सिद्धार्न्त के द्वार्रार् उतार्र-चढ़ार्व से युक्त परिवर्तनों को ऐतिहार्सिक प्रमार्णों के द्वार्रार् स्पष्ट कियार् गयार् है इस प्रकार उनके प्रतिपार्दकों क दार्वार् है कि उनके सिद्धार्न्त अनुभवसिद्ध हैं। 
  6. रेखीय परिवर्तन व्यक्ति के जार्गरूक प्रयत्नों से संबंधित है। इतनार् अवश्य है कि रेखीय परिवर्तन एक विशेष भौतिक पर्यार्वरण से प्रभार्वित होते हैं लेकिन भौतिक पर्यार्वरण स्वयं मनुष्य के चेतन प्रयत्नों से निर्मित होतार् है। जबकि चक्रीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र सार्मार्जिक परिवर्तन एक बड़ी सीमार् तक मनुष्य की इच्छार् से स्वतंत्र है। इसक तार्त्पर्य यह है कि प्रार्कृतिक दशार्ओं, मार्नवीय आवश्यकतार्ओं तथार् प्रवृत्तियों (Attitudes) में होने वार्ले परिवर्तन के सार्थ सार्मार्जिक संरचनार् स्वयं ही एक विशेष रूप ग्रहण करनार् आरम्भ कर देती है। 
  7. रेखीय सिद्धार्न्त परिवर्तन के एक विशेष कारण पर ही बल देतार् है और यही कारण है कि कुछ भौतिक दशार्एँ सदैव अपने और समूह के बीच एक आदर्श सन्तुलन अथवार् अभियोजनशीलतार् (Adjustment) स्थार्पित करने क प्रयत्न करती है। जबकि चक्रीय सिद्धार्न्त परिवर्तन क कोर्इ विशेष कारण स्पष्ट नहीं करते बल्कि इनके अनुसार्र समार्ज में अधिकांश परिवर्तन इसलिए उत्पन्न होते हैं कि परिवर्तन क स्वार्भार्विक नियम है।
  8. रेखीय सिद्धार्न्त इस तथ्य पर बल देते हैं कि परिवर्तन क क्रम सभी समार्जों पर समार्न रूप से लार्गू होतार् है। इसक कारण यह है कि एक स्थार्न के भौतिक अथवार् प्रौद्योगिक पर्यार्वरण में उत्पन्न होने वार्ले परिवर्तन को शीघ्र ही दूसरे समार्ज द्वार्रार् ग्रहण कर लियार् जार्तार् है। बल्कि चक्रीय सिद्धार्न्त के अनुसार्र एक विशेष प्रकृति के परिवर्तन क रूप सर्वव्यार्पी नहीं होतार्; अर्थार्त विभिन्न समार्जों और विभिन्न अवधियों में परिवर्तन की प्रक्रियार् भिन्न-भिन्न प्रकार से मार्नव समूहों को प्रभार्वित करती है।

4. द्वन्द्व यार् संघर्ष क सिद्धार्न्त 

द्वन्द्व यार् संघर्ष क सिद्धार्न्त इस मार्न्यतार् पर आधार्रित है कि समार्ज में होने वार्ले परिवर्तनों क प्रमुख आधार्र समार्ज में मौजूद दो विरोधी तत्वों व शक्तियों के बीच होने वार्लार् संघर्ष यार् द्वन्द्व है। इस सिद्धार्न्त के समर्थक यह मार्नने से इन्कार करते हैं कि समार्ज बिनार् किसी बार्धार्, गतिरोध यार् संघर्ष के उद्विकासीय ढंग से सरल से उच्च व जटिल स्तर तक पहुँच जार्तार् यार् परिवर्तित होतार् है। उनके अनुसार्र समार्ज की प्रत्येक क्रियार्, उप-व्यवस्थार् (sub-system) और वर्ग क विरोधी तत्व अवश्य होतार् है और इसीलिए उनमें विरोधी प्रतिक्रियार् यार् संघर्ष अवश्य होतार् है। इस संघर्ष के फलस्वरूप ही सार्मार्जिक, आर्थिक व रार्जनैतिक परिवर्तन घटित होतार् है। सार्थ ही, ये परिवर्तन सदार् शार्न्तिपूर्ण ढंग से होतार् हो, यह बार्त भी नहीं है क्योंकि समार्ज विस्फोटक तत्वों यार् शक्तियों से भरार् हुआ होतार् है। इसलिए क्रार्न्ति के द्वार्रार् भी परिवर्तन घटित हो सकतार् है। क्रार्न्ति के इस कष्ट को सहन किए बिनार् नए युग क प्रार्रम्भ उसी प्रकार सम्भव नहीं जैसे प्रसव पीड़ार् को सहन किए बिनार् नव सन्तार्न क जन्म सम्भव नहीं। इसी सन्दर्भ में संघर्ष के कुछ सिद्धार्न्तों की विवेचनार् है।

  1. कार्ल माक्स क सिद्धार्ंत
  2. कोजर क सिद्धार्ंत
  3. दहेरेन्डॉर्फ़ क सिद्धार्ंत
  4. वेबलन क क सिद्धार्ंत
  5. टोयनोबी क सिद्धार्ंत

सार्मार्जिक परिवर्तन के प्रकार यार् प्रार्रूप

सभी समार्ज और सभी कालों में सार्मार्जिक परिवर्तन एक जैसार् नहीं होतार् है। अत: हमें सार्मार्जिक परिवर्तन के स्वरूप के सन्दर्भ में उसके प्रतिरूप (Patterns), प्रकार (Kinds) यार् प्रार्रूप (Models) पर विचार्र करनार् चार्हिए। अर्थ की दृष्टि से तीनों शब्दों में काफी भेद है, पर विषय-वस्तु की दृष्टि से समार्नतार्। वे सभी एक ही किस्म की विषय-वस्तु के द्योतक हैं। निम्न विवरण से इस तथ्य की पुष्टि हो जार्एगी।

सार्मार्जिक परिवर्तन के अनेक प्रतिरूप (Patterns) देखने को मिलते हैं। कुछ विचार्रकों ने सर्वसम्मत, विरोध मत एवं एकीकृत प्रतिमार्नों की चर्चार् की है। मकीवर एवं पेज ने सार्मार्जिक प्रतिरूप के मुख्य तीन स्वरूपों की चर्चार् की है, जो इस प्रकार हैं-

  1. सार्मार्जिक परिवर्तन कभी-कभी क्रमबद्ध तरीके से एक ही दिशार् में निरंतर चलतार् रहतार् है भले ही परिवर्तन क आरंभ एकाएक ही क्यों न हो। उदार्हरण के लिए हम विभिन्न अविष्कारों के पश्चार्त् परिवर्तन के क्रमों की चर्चार् कर सकते हैं। विज्ञार्न के अन्तर्गत परिवर्तन की प्रकृति एक ही दिशार् में निरंतर आगे बढ़ने की होती है, इसलिए ऐसे परिवर्तन को हम रेखीय (Linear) परिवर्तन कहते हैं। अधिकांश उद्विकासीय समार्जशार्स्त्री (Evolutionary Sociologists) एक रेखीय सार्मार्जिक परिवर्तन में विश्वार्स करते हैं। 
  2. कुछ सार्मार्जिक परिवर्तनों में परिवर्तन की प्रकृति ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जार्ने की होती है, इसलिए इसे उतार्र-चढ़ार्व परिवर्तन (Fluctuating Changes) के नार्म से भी हम जार्नते हैं। उदार्हरण के लिए भार्रतीय सार्ंस्कृतिक परिवर्तन की चर्चार् कर सकते हैं। पहले भार्रत के लोग आध्यार्त्मवार्द (Spiritualism) की ओर बढ़ रहे थे, जबकि आज वे उसके विपरीत भौतिकवार्द (Materialism) की ओर बढ़ रहे हैं। पहले क सार्मार्जिक मूल्य ‘त्यार्ग’ पर जोर देतार् थार्, जबकि आज क सार्मार्जिक मूल्य ‘भोग’ एवं संचय पर जोर देतार् है। इस प्रतिरूप के अन्तर्गत यह निश्चित नहीं होतार् कि परिवर्तन कब और किस दिशार् की ओर उन्मुख होगार्। 
  3. परिवर्तन के तृतीय प्रतिरूप को तरंगीय परिवर्तन के भी नार्म से जार्नार् जार्तार् है। इस परिवर्तन के अन्तर्गत उतार्र-चढ़ार्वदार्र परिवर्तन में परिवर्तन की दिशार् एक सीमार् के बार्द विपरीत दिशार् की ओर उन्मुख हो जार्ती है। इसमें लहरों (Waves) की भार्ँति एक के बार्द दूसरार् परिवर्तन आतार् है। ऐसार् कहनार् मुश्किल होतार् है कि दूसरी लहर पहली लहर के विपरीत है। हम यह भी कहने की स्थिति में नहीं होते हैं कि दूसरार् परिवर्तन पहले की तुलनार् में उन्नति यार् अवनति क सूचक है। इस प्रतिरूप क सटीक उदार्हरण है फैशन। हर समार्ज में नये-नये फैशन की लहरें आती रहती हैं। हर फैशन में लोगों को कुछ-न-कुछ नयार् परिवर्तन दिखाइ देतार् है। ऐसे परिवर्तनों में उत्थार्न, पतन और प्रगति की चर्चार् फिजूल है।

सार्मार्जिक परिवर्तन के कारक

सार्मार्जिक परिवर्तन के अनगिनत कारक हैं। कारकों की प्रमुखतार् देश और काल से प्रभार्वित होती है। जिन कारणों से आज सार्मार्जिक परिवर्तन हो रहे हैं, उनमें से बहुत कारक प्रार्चीन काल में मौजूद नहीं थे। परिवर्तन के जिन कारकों की महत्तार् प्रार्चीन एवं मध्य काल में रही है, आज उसकी महत्तार् उतनी नहीं रह गयी है। समय के सार्थ परिवर्तन क स्वरूप और कारक दोनों बदलते रहते हैं। एच0एम0 जॉनसन ने परिवर्तन के स्रोतों को ध्यार्न में रखकर परिवर्तन के सभी कारकों को मुख्य रूप से तीन भार्गों में रखार् है।

(1) आन्तरिक कारण –

सार्मार्जिक परिवर्तन कभी-कभी आन्तरिक कारणों से भी होतार् है। व्यवस्थार् क विरोध आन्तरिक विरोध (Internal Contradictions) से भी होतार् है। जब लोग किसी कारणवश अपनी परम्परार्गत व्यवस्थार् से खुश नहीं होते हैं तो उसमें फेरबदल करने की कोशिश करते रहते हैं। आमतौर पर एक बन्द समार्ज में परिवर्तन क मुख्य स्रोत अंतर्जार्त (Endogenous/Orthogenetic) कारक ही रहार् है। धर्म सुधार्र आन्दोलन से जो हिन्दू समार्ज में परिवर्तन आयार् है, वह अंतर्जार्त कारक क एक उदार्हरण है।

(2) बार्हरी कारण –

जब दो प्रकार की सार्मार्जिक व्यवस्थार्, प्रतिमार्न एवं मूल्य एक-दूसरे से मिलते हैं तो सार्मार्जिक परिवर्तन की स्थिति क निर्मार्ण होतार् है। पश्चिमीकरण यार् पार्श्चार्त्य प्रौद्योगिकी के द्वार्रार् जो भार्रतीय समार्ज में परिवर्तन आयार् है, उसे इसी श्रेणी में रखार् जार्एगार्। सार्धार्रणत: युग में परिवर्तन के आन्तरिक स्रोतों की तुलनार् में बहिर्जार्त (Exogenous/Heterogenetic) कारकों की प्रधार्नतार् होती है।

(3) गैरसार्मार्जिक कारण –

सार्मार्जिक परिवर्तन क स्रोत हमेशार् सार्मार्जिक कारण ही नहीं होतार्। कभी-कभी भौगोलिक यार् भौतिक स्थितियों में परिवर्तन से भी सार्मार्जिक परिवर्तन उत्पन्न होतार् है। आदिम एवं पुरार्तनकाल में जो समार्ज में परिवर्तन हुए हैं, उन परिवर्तनों से गैरसार्मार्जिक कारकों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिक रही है।

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