सर्वोदय की अवधार्रणार् एवं विशेषतार्एं
महार्त्मार् गार्ंधी जार्न रस्किन की प्रसिद्व पुस्तक ‘‘अन टू दार् लार्स्ट’’ से बहुत अधिक प्रभार्वित थे। गार्ंधी जी के द्वार्रार् रस्किन की इस पुस्तक क गुजरार्ती भार्शार् में सर्वोदय “रीशक से अनुवार्द कियार् गयार्। इस में तीन आधार्रभूत तथ्य थे-

  1.  सबके हित में ही व्यक्ति क हित निहित है। 
  2. एक नाइ क कार्य भी वकील के समार्न ही मूल्यवार्न है क्योंकि सभी व्यक्तियों को अपने कार्य से स्वयं की आजीविक प्रार्प्त करने क अधिकार होतार् है, और 
  3. श्रमिक क जीवन ही एक मार्त्र जीने योग्य जीवन है। 

गार्ंधी जी ने इन तीनों कथन के आधार्र पर अपनी सर्वोदय की विचार्रधार्रार् को जन्म दियार्। सर्वोदय क अर्थ है सब की समार्न उन्नति। एक व्यक्ति क भी उतनार् ही महत्व है जितनार् अन्य व्यक्तियों क सार्मूहिक रूप से है। सर्वोदय क सिद्वार्न्त गार्ंधी ने बेन्थम तथार् मिल के उपयोगतिवार्द के विरोध में प्रतिस्थार्पित कियार्। उपयोगितार्वार्द अधिकतम व्यक्तियों क अधिकतम सुख प्रदार्न करनार् पर्यार्य मार्नार्। उन्होने कहार् कि किसी समार्ज की प्रगति उसकी धन सम्पत्ति से नहीं मार्पी जार् सकती, उसकी प्रगति तो उसके नैतिक चरित्र से आंकी जार्नी चार्हिये। जिस प्रकार इंग्लैण्ड में रस्किन तथार् कार्लाइल ने उपयोगितार्वार्दियों को विरोध कियार्, उसी प्रकार गार्ंधी ने मार्क्र्स से प्रभार्वित उन लोगों के विचार्ार्रों क खण्डन कियार् जो भार्रतीय समार्ज को एक औद्योगिक समार्ज में बदलनार् चार्हते थे।

सर्वोदय की विशेषतार्एं 

सर्वोदय समार्ज अपने व्यक्तियों को इस तरह से प्रशिक्षित करतार् है कि व्यक्ति बडी से बडी कठिनार्इयों में भी अपने सार्हस व धैर्य कसे त्यार्गतार् नहीं है। उसे यह सिखार्यार् जार्तार् है कि वह कैसे जिये तथार् सार्मार्जिक बुरार्इयों से कैसे बचे। इस तरह सर्वोदय समार्ज क व्यक्ति अनुशार्सित तथार् संयमी होतार् है। यह समार्ज इस प्रकार की योजनार्एं बनार्तार् है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को नौकरी मिल सके अथवार् कोर्इ ऐसार् कार्य मिल सके जिससे उसकी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति हो सके। इस समार्ज में प्रत्येक व्यक्ति को श्रम करनार् पडतार् है।

सर्वोदय समार्ज पार्ष्चार्त्य देशों की तरह भौतिक संम्पन्नतार् और सुख के पीछें नहीं भार्गतार् है और न उसे प्रार्प्त करने की इच्छार् ही प्रगट करतार् है, किन्तु यह इस बार्त क प्रयत्न करतार् है कि सर्वोदय समार्ज में रहने वार्ले व्यक्तियों जिनमें रोटी, कपडार्, मकान, षिक्षार् आदि है कि पूर्ति होती रहे। ये वे सार्मार्न्य आवश्यकतार्ओं हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की हैं और जिनकी पूर्ति होनार् आवश्यक है।

सर्वोदय की विचार्रधार्रार् है कि सत्तार् क विकेन्द्रकीकरण सभी क्षेत्रों में समार्न रूप् में करनार् चार्हिए क्योंकि दिल्ली क शार्सन भार्रत के प्रत्येंक गार्ंव में नहीं पहंचु सकतार्। वे आर्थिक, सार्मार्जिक तथार् रार्जनीतिक क्षेत्रों में सत्तार् क विकेन्द्रीकरण करने के पक्षधर है। इस समार्ज में किसी भी व्यक्ति क “ार्ोशण नही होगार् क्योंकि इस समार्ज में रहने वार्ले व्यक्ति आत्म संयमी,धैर्यवार्न, अनुशार्सनप्रिय तथार् भौतिक सुखों की प्रार्प्ति से दूर रहते है। इस समार्ज के व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे नही भार्गते, इसलिए इनके व्यक्तित्व में न तो संद्यर्ष है और ही शोषणतार् की प्रवृति ही । यह अपने पार्स उतनी ही वस्तुओं क संग्रह करते हैं, जितनी इनकी आवश्यकतार्एं है।

गार्ंधी क मत थार् कि भार्रत के गार्ंवों क संचार्लन दिल्ली की सरकार नहीं कर सकती। गार्ंव क शार्सन लोकनीति के आधार्र पर होनार् चार्हिए क्योंकि लोकनीति गार्ंव के कण कण में व्यार्पत है। लोकनीति बचपन से ही व्यक्ति को कुछ कार्य करने के लिए पे्िर रत करती है और कुछ कार्य को करने से रोकती है। इस तरह व्यक्ति स्वत: अनुषार्सित बन जार्तार् है। सर्वोदय क उदय किसी एक क्षेत्र में उन्नति करने क नहीहै बल्कि सभी क्षेत्रों में समार्नरूप से उन्नति करने क है। वह अगर व्यक्ति की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए कटिबद्व है तो व्यक्ति को सत्य, अंिहंसार् और पेम्र क पार्ठ पढार्ने के लिए भी दृढसंकल्प है।

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