सर्वोच्च न्यार्यार्लय के कार्य और शक्तियार्ं

यह न्यार्यार्लय भार्रतीय न्यार्य-व्यवस्थार् की शिरोमणि है। यह भार्रत क सबसे उचार् न्यार्यार्लय है तथार् इसके निर्णय अन्तिम होते हैं। इसे प्रार्रंभिक तथार् अपीलीय दोनों प्रकार के क्षेत्रार्धिकार प्रार्प्त थे, लेकिन यह भार्रत क अन्तिम न्यार्यार्लय नहीं थार्। इसके निर्णयों के विरुद्व अपीलें इंग्लैंड की प्रिवी कौंसिल (Privy Council of England) के पार्स की जार् सकती थीं।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय की रचनार्

भार्रतीय संविधार्न की धार्रार् 124 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यार्यार्लय की व्यवस्थार् की गई है। (“There shall be a Supreme Court of India.”) सर्वोच्च न्यार्यार्लय में प्रार्रंभ में एक मुख्य न्यार्यार्धीश और 7 अन्य न्यार्यार्धीश होते थे। 1957 में संसद में एक कानून पार्स हुआ, जिसके अनुसार्र मुख्य न्यार्यार्धीश को छोड़कर बार्की न्यार्यार्धीशों की संख्यार् 7 से 10 कर दी गई। सन् 1960 में संसद ने अन्य न्यार्यार्धीशों की संख्यार् 10 से बढ़ार्कर 13 कर दी। परन्तु दिसम्बर, 1977 में संसद ने एक कानून पार्स कियार्, जिसके अनुसार्र सर्वोच्च न्यार्यार्लय के अन्य न्यार्यार्धीशों की अधिकतम संख्यार् 13 से बढ़ार्कर 17 कर दी गई। अप्रैल, 1986 में सर्वोच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की संख्यार् 17 से 25 कर दी गई। अत: आजकल सर्वोच्च न्यार्यार्लय में एक मुख्य न्यार्यार्धीश और 25 अन्य न्यार्यार्धीश हैं।


काम की अधिकतार् होने पर रार्ष्ट्रपति तदर्थ न्यार्यार्धीशों (Adhoc Judges) की भी नियुक्ति कर सकतार् है। तदर्थ न्यार्यार्धीशों (Adhoc Judges) को भी यही वेतन तथार् भत्ते मिलते हैं। आवश्यकतार् पड़ने पर किसी सेवार्-निवृत्त (Retired) न्यार्यार्धीश को काम करने के लिए भी कहार् जार् सकतार् है।

न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति

उच्चतम न्यार्यार्लय के मुख्य न्यार्यार्धीश और अन्य न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् की जार्ती है, परन्तु ऐसार् करते समय रार्ष्ट्रपति केवल स्वेच्छार् से काम नहीं लेतार्। मुख्य न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के समय रार्ष्ट्रपति को उच्चतम न्यार्यार्लय तथार् रार्ज्यों के उच्च न्यार्यार्लयों के न्यार्यार्धीशों की सलार्ह लेनार् आवश्यक है। उच्चतम न्यार्यार्लय के अन्य न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के समय मुख्य न्यार्यार्धीश की सलार्ह लेनी आवश्यक होती है। तदर्थ न्यार्यार्धीशों (Adhoc Judges) की नियुक्ति मुख्य न्यार्यार्धीश की सलार्ह से की जार्ती है।

न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति निष्पक्षतार् के आधार्र पर की जार्ती है। निष्पक्षतार् बनी रहे, उसके लिए न्यार्यार्धीशों की वरिष्ठतार् सूची (Seniority List) बनी हुई है, तार्कि जब कभी मुख्य न्यार्यार्धीश क पद खार्ली हो तो जो भी वरिष्ठ न्यार्यार्धीश हो, उसकी नियुक्ति की जार् सके। परन्तु 15 अप्रैल, 1973 को जब मुख्य न्यार्यार्धीश सीकरी रिटार्यर हुए तो वरिष्ठतार् के सिद्वार्न्त क उल्लंघन हुआ और न्यार्यार्धीश ए. एन. रार्य को मुख्य न्यार्यार्धीश नियुक्त कियार् गयार्। इसके विरोध में न्यार्यार्धीश शीलट (Shelet), हेगडे तथार् ग्रोवर ने त्यार्ग पत्र दे दियार्। एम. एच. बेग के रिटार्यर होने पर 22 पफरवरी, 1978 को वरिष्ठ न्यार्यार्धीश वार्ई. वी. चन्द्रचूड़ (Y.V. Chandrachud) को मुख्य न्यार्यार्धीश नियुक्त कियार् गयार्। इस प्रक पुन: न्यार्यपार्लिक की स्वतंत्रतार् की स्थार्पनार् की गई।

28 जनवरी, 1980 को कानून आयोग (Law Commission) की 80वीं रिपोर्ट लोकसभार् में प्रस्तुत की गई थी। इस रिपोर्ट में कानून आयोग ने यह सिफार्रिश की थी कि सर्वोच्च न्यार्यार्लय के मुख्य न्यार्यार्धीश के लिए वरिष्ठतार् के सिद्वार्न्त (Principal of Seniority) को कठोरतार् के सार्थ लार्गू कियार् जार्नार् चार्हिए।

सर्वोच्च न्यार्यार्धीशों की योग्यतार्एँ

संविधार्न द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की योग्यतार्एँ निश्चित की गई हैं-

  1. वह भार्रत क नार्गरिक हो।
  2. वह किसी उच्च न्यार्यार्लय यार् न्यार्यार्लयों में कम-से-कम 5 वर्ष तक न्यार्यार्धीश रह चुक हो। अथवार्
  3. वह किसी उच्च न्यार्यार्लय में कम-से-कम 10 वर्षों तक एडवोकेट रह चुक हो। अथवार्
  4. वह रार्ष्ट्रपति की दृष्टि में कोई प्रसिद्व विधिवेत्तार् (Distinguished Jurist) हो।

न्यार्यार्धीशों की अवधि

उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर आसीन रह सकते हैं। 65 वर्ष की आयु के पश्चार्त् उन्हें पद से अवकाश दियार् जार्तार् है। संसद न्यार्यार्धीशों की अवकाश प्रार्प्ति की आयु बढ़ार् भी सकती है। रिटार्यर होने के पश्चार्त् उन्हें पेन्शन (Pension) दी जार्ती है। इससे पहले भी वह स्वयं त्यार्ग-पत्र दे सकते हैं। रार्ष्ट्रपति उन्हें अपनी स्वेच्छार् से नहीं हटार् सकतार्।

न्यार्यार्धीशों को हटार्यार् जार्नार्

अयोग्यतार् और दुरार्चार्र (“Incapacity or Proved Misbehaviour”) के आधार्र उन्हें पदच्युत कियार् जार् सकतार् है। सुप्रीम कोर्ट के जज को तभी हटार्यार् जार् सकतार् है जब संसद एक प्रस्तार्व को दोनों सदनों द्वार्रार् समस्त संख्यार् के बहुमत तथार् उपस्थित और मतदार्न देने वार्ले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पार्स कर, उसी अधिवेशन में उस न्यार्यार्धीश पर सिद्व दुरार्चार्र अथवार् असमर्थतार् क आरोप लगार्कर रार्ष्ट्रपति के पार्स भेजे और रार्ष्ट्रपति उस प्रस्तार्व पर अपने हस्तार्क्षर कर दे। अनुच्छेद 124 (4)º 1 न्यार्यार्धीशों को हटार्ने क इतनार् कठिन तरीक इसलिए अपनार्यार् गयार् है तार्कि न्यार्यार्धीश निष्पक्षतार् से और निडर होकर कार्य कर सके।

वेतन तथार् भत्ते

मुख्य न्यार्यार्धीश क वेतन एक लार्ख रुपये मार्सिक है और अन्य न्यार्यार्धीशों को वेतन अस्सी हजार्र रुपये मार्सिक है। इसके अतिरिक्त हर एक न्यार्यार्धीश को रहने के लिये बिनार् किरार्ए की सरकारी कोठी दी जार्ती है और यार्त्रार् भत्तार् भी दियार् जार्तार् है, जबकि उसको किसी सरकारी कार्य के लिए यार्त्रार् करनी हो। न्यार्यार्धीशों के वेतन तथार् भत्ते भार्रत की संचित निधि में से दिए जार्ते है, जिनको संसद मत लिए बिनार् पार्स कर देती है। केवल वित्तीय संकट की घोषणार् करने से रार्ष्ट्रपति को यह अधिकार है कि जजों के वेतन को कम कर सके। माच, 1976 में संसद ने एक कानून पार्स कियार् थार्, जिसके द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की पेन्शन में बढ़ोत्तरी की गई।

सेवार्निवृत्त होने पर वकालत प्रतिबन्ध

सर्वोच्च न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की सेवार्-निवृत्त होने के पश्चार्त् किसी न्यार्यार्लय में वकालत करने की मनार्ही की गई है। इसक अर्थ यह नहीं है कि सरकार उनको कोई विशेष कार्य भी नहीं सौंप सकती। उनको किसी आयोग (Commission) क सदस्य यार् अध्यक्ष नियुक्त कियार् जार् सकतार् है। अप्रैल, 1977 में जनतार् सरकार ने आपार्तकाल की ज्यार्दतियों तथार् अत्यार्चार्रों की जार्ँच करने के लिए भूतपूर्व मुख्य न्यार्यार्धीश जे. सी. शार्ह (J. C. Shah) को नियुक्त कियार् थार्। इसके अलार्वार् न्यार्यार्धीशों को सरकार अन्य पदों पर नियुक्त कियार् गयार् थार् तथार् श्री एम. सी. छार्गलार् को अमेरिक में भार्रत क रार्जदूत नियुक्त कियार् गयार् थार्।

पृथक स्थार्पनार् व्यवस्थार्

संविधार्न की धार्रार् 146 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यार्यार्लय की स्थार्पनार् की अलग व्यवस्थार् है। उसके अधिकारियों व कर्मचार्रियों की नियुक्ति, उनके सेवार् व्यवस्थार् से संबधित नियम तथार् शर्ते सर्वोच्च न्यार्यार्लय क मुख्य न्यार्यार्धीश निश्चित करतार् है। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यार्यार्लय के प्रशार्सकीय खर्च देश की संचित निधि से खर्च किए जार्ते हैं। इस कारण से सर्वोच्च न्यार्यार्लय संसद अथवार् किसी अन्य संस्थार् के नियंत्रण से मुक्त है और इसकी स्वतंत्रतार् सुरक्षित है।

पद की शपथ

प्रत्येक वह व्यक्ति, जो भार्रत के सर्वोच्च न्यार्यार्लय के मुख्य न्यार्यार्धीश अथवार् अन्य न्यार्यार्धीशों के पद पर नियुक्त कियार् जार्तार् है, अपनार् पद ग्रहण करने के समय रार्ष्ट्रपति यार् उसके द्वार्रार् किसी अन्य अधिकारी के सार्मने एक शपथ लेतार् है, जो इस प्रकार है –

(नार्म)-जो भार्रत के सर्वोच्च न्यार्यार्लय क मुख्य न्यार्यार्धीश (अथवार् न्यार्यार्धीश) नियुक्त हुआ हूँ, ईश्वर की शपथ लेतार् हूँ/सत्यनिष्ठार् से प्रतिज्ञार् करतार् हूँ कि मैं विधि द्वार्रार् स्थार्पित भार्रत के संविधार्न के प्रति श्रद्वार् और निष्ठार् रखूँगार् तथार् हर प्रकार से और श्रद्वार्पूर्वक तथार् अपनी पूरी योग्यतार्, ज्ञार्न और विवेक से अपने पद के कर्त्तव्यों को भय यार् पक्षपार्त, अनुरार्ग यार् द्वेष के बिनार् पार्लन करूँगार् तथार् मैं संविधार्न और विधियों की मर्यार्दार् बनार्ये रखूँगार्।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय क स्थार्न

सर्वोच्च न्यार्यार्लय क कार्य-स्थार्न नई दिल्ली में है। वहार्ँ इसक तरार्जू शक्ल क बनार् हुआ सुन्दर भवन है, परन्तु मुख्य न्यार्यार्धीश रार्ष्ट्रपति की अनुमति से इसकी बैठवेंफ अन्य स्थार्न पर भी कर सकतार् है।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय के निर्णय

किसी विषय से संबंधित रार्ष्ट्रपति को कानूनी परार्मर्श देने के लिए 5 न्यार्यार्धीशों क बैंच (मुकदमे की सुनवार्ई करने वार्लार् न्यार्यार्लय) होनार् अनिवाय है। शेष मुकदमों में अपील सुनने के लिए वर्तमार्न नियमों के अनुसार्र कम-से-कम तीन न्यार्यधीशों क होनार् आवश्यक है। सभी मुकदमों क निर्णय मुकदमार् सुनने वार्ले न्यार्यार्धीशों के बहुमत से कियार् जार्तार् है। जो न्यार्यार्धीश बहुमत के निर्णय से सहमत नहीं होते, वे अपनी असहमति तथार् उसके कारण निर्णय के सार्थ लिखवार् सकते हैं।

न्यार्यार्धीशों की स्वतंत्रार्एँ

न्यार्यार्धीशों की स्वतंत्रतार् को सुरक्षित रखने के लिए न्यार्यार्धीशों के सभी न्यार्य संबंधी कार्यों तथार् निर्णयों की आलोचनार् से मुक्त रखार् गयार् है। संसद भी किसी न्यार्यार्धीश के आचरण पर वार्द-विवार्द नहीं कर सकती। वह केवल तभी हो सकतार् है जब संसद किसी न्यार्यधीश को हटार्ने के प्रस्तार्व पर वार्द-विवार्द कर रही हो।

ऐसार् इसलिए कियार् गयार् है तार्कि न्यार्यार्धीश बिनार् किसी भय के अपनार् कर्त्तव्य निभार् सवेंफ। न्यार्यार्लय के मार्न तथार् सरकार को बनार्ए रखने के लिए तथार् इसको आलोचनार् से मुक्त रखने के लिए, न्यार्यार्लय को किसी भी व्यक्ति के विरुद्व न्यार्यार्लय के अपमार्न की प्रक्रियार् द्वार्रार् उचित कार्यवार्ही करने क अधिकार (Proceeding of Contempt of Court) है।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय क अधिकार एवं शक्तियार्ँ

सर्वोच्च न्यार्यार्लय भार्रत क सबसे उचार् और अन्तिम न्यार्यार्लय है। इसक क्षेत्रार्धिकार व शक्तियार्ँ बड़ी व्यार्पक हैं तथार् संसार्र के किसी भी सर्वोच्च न्यार्यार्लय से कम नहीं। भार्रत के भूतपूर्व अटानी जनरल श्री एम.सी. सीतलवार्ड (M.C.Setalvad) के अनुसार्र भार्रत में सर्वोच्च न्यार्यार्लय की शक्तियार्ँ अमेरिक के सर्वोच्च न्यार्यार्लय से भी अधिक हैं।

प्रार्रंभिक क्षेत्रार्धिकार

इस अधिकार क्षेत्र में वे मुकदमे आते हैं जो किसी और न्यार्यार्लय में पेश नहीं किए जार् सकते तथार् जिनकी सुनवार्ई पहली बार्र ही सर्वोच्च न्यार्यार्लय में होती हो। इस अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित मुकदमे आते हैं-

  1. ऐसे झगड़े जिनमें एक ओर भार्रत सरकार तथार् दूसरी ओर एक यार् एक से अधिक रार्ज्य सरकारें हों।
  2. ऐसे झगड़े जिनमें एक ओर भार्रत सरकार और एक यार् एक से अधिक रार्ज्य तथार् दूसरी ओर एक यार् एक से अधिक रार्ज्य हों।
  3. ऐसे झगड़े जो दो यार् दो से अधिक रार्ज्यों के बीच हों।

प्रार्रंभिक क्षेत्रार्धिकार पर पार्बन्दियार्ँ

  1. सर्वोच्च न्यार्यलय के प्रार्रंभिक क्षेत्रार्धिकार वहीं मुकदमे आते हैं, जिनक संबंध कानूनी प्रश्न यार् तथ्य से हो, रार्जनैतिक प्रश्न यार् तथ्य से नहीं।
  2. दूसरे प्रार्रंभिक क्षेत्रार्धिकार में ऐसे मुकदमे नहीं आते जिनक संबंध किसी ऐसी सन्धि, करार्रे, समझौते, सनद यार् अन्य लिखित पत्र से हो, जो संविधार्न लार्गू होने से पहले यार् बार्द में लार्गू किए गए हों तथार् जिन्हें सर्वोच्च न्यार्यार्लय के क्षेत्रार्धिकार से बार्हर रखार् गयार् हो, जैसे-देशी रियार्सतों के शार्सकों के सार्थ गए किए समझौते और सन्धियार्ँ।
  3. तीसरे संसद कानून बनार्कर अन्तर्रार्ज्यीय नदियों (Inter-State Rivers) के पार्नी के प्रयोग के बार्रे में उत्पन्न होने वार्ले झगड़ों के सर्वोच्च न्यार्यार्लय के क्षेत्रार्धिकार से बार्हर रख सकती है।

अपीलीय क्षेत्रार्धिकार

सर्वोच्च न्यार्यार्लय के इस क्षेत्रार्धिकार में ऐसे मुकदमें आते हैं, जिनक आरंभ निचले न्यार्यार्लयों में होतार् है, परन्तु उनके निर्णय के विरूद्व अपील सर्वोच्च न्यार्यार्लय में की जार् सकती है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय के इन क्षेत्रार्धिकारों को श्रेणियों में बार्ँटार् जार् सकतार् है-

  1. संवैधार्निक–संविधार्न की धार्रार् 132 के अंर्तगत यदि उच्च न्यार्यार्लय यह प्रमार्णित कर दे कि मुकदमे में संविधार्न की व्यार्ख्यार् से संबंधित कानून क कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न उलझार् हुआ है, तो उस मुकदमे में उच्च न्यार्यार्लय के निर्णय के विरुद्व सर्वोच्च न्यार्यार्लय में अपील की जार् सकती है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय स्वयं भी ऐसी अपील करने की विशेष आज्ञार् दे सकतार् है यदि वह संतुष्ट हो कि मुकदमार् इस प्रकार क है (अनुच्छेद 136) और रार्ज्य क उच्च न्यार्यार्लय ऐसार् प्रमार्ण-पत्र देने से इन्कार कर दे। इसके परिणार्मस्वरूप सर्वोच्च न्यार्यार्लय संविधार्न क संरक्षक तथार् अन्तिम व्यार्ख्यकर्तार् बन जार्तार् है।
  2. दीवार्नी (Civil)–मूल संविधार्न के अंतर्गत सर्वोच्च न्यार्यार्लय में किसी उच्च न्यार्यार्लय के केवल ऐसे निर्णय के विरुद्व अपील की जार् सकती थी जिसमें झगड़े की रार्शि कम-से-कम 20 हजार्र रुपयार् यार् इस मूल्य की यार् इससे अधिक मूल्य की सम्पत्ति हो। परंतु संविधार्न के 30 वें संशोधन द्वार्रार् धनरार्शि की इस सीमार् को हटार् दियार् गयार् है और यह निश्चित कियार् गयार् है कि उच्च न्यार्यार्लय से सर्वोच्च न्यार्यार्लय में ऐसे सभी दीवार्नी मुकदमों की अपील की जार् सकेगी जिसमें उच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् यह प्रमार्णित कर दियार् जार्ये कि इस विवार्द में कानून की व्यार्ख्यार् से संबंधित कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न निहित है।
  3. फौजदार्री (Criminal)–फौजदार्री मुकदमों में उच्च न्यार्यार्लय के निर्णयों के विरुद्व निम्न विषयों में सर्वोच्च न्यार्यार्लय में अपील की जार् सकती हैं: (a) यदि उच्च न्यार्यार्लय में अपील प्रस्तुत होने पर किसी व्यक्ति की रिहार्ई के पैफसले को बदल दे और उसे मृत्युदण्ड दे दियार् गयार् हो। (अथवार्) (b) यदि किसी मुकदमे को उच्च न्यार्यार्लय ने अपने पार्स ले लियार् हो और उसने उसमें किसी अपरार्धी को मृत्यु-दण्ड दे दियार् हो। (c) अगर उच्च न्यार्यार्लय यह प्रमार्णित कर दे कि विवार्द सर्वोच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् विचार्र के योग्य है, तब भी अपील की जार् सकती है।

संविधार्न की धार्रार् 136 के अंर्तगत सैनिक न्यार्यार्लय को छोड़कर किसी भी उच्च न्यार्यार्लय के फैसले के विरुद्व अपील की विशेष स्वीकृति देने पर सर्वोच्च न्यार्यार्लय पर कोई संवैधार्निक प्रतिबन्ध नहीं है और यह बार्त स्वयं सर्वोच्च न्यार्यार्लय पर निर्भर है।

परार्मर्श संबंधी क्षेत्रार्धिकार

संविधार्न की धार्रार् 143 के अनुसार्र उच्चतम न्यार्यार्लय को परार्मर्श संबंधी क्षेत्रार्धिकार भी प्रार्प्त है। रार्ष्ट्रपति किसी भी संवैधार्निक यार् कानूनी प्रश्न पर उच्चतम न्यार्यलय की सलार्ह ले सकतार् है। संविधार्न की व्यार्ख्यार्, देशी रियार्सतों के सार्थ सन्धियों की व्यार्ख्यार् आदि विषयों में भी रार्ष्ट्रपति उच्चतम न्यार्यार्लय से उसके विचार्र पूछ सकतार् है। रार्ष्ट्रपति उच्चतम न्यार्यार्लय द्वार्रार् दिये गये परार्मर्श को मार्नने के लिए बार्ध्य नहीं है। अन्य सरकार अंग, व्यक्ति तथार् न्यार्यार्लय भी उस परार्मर्श को मार्नने के लिए बार्ध्य नहीं है। अन्य सरकारी अंग, व्यक्ति तथार् न्यार्यार्लय भी उस परार्मर्श पर चलने और उसके अनुसार्र अपने निर्णय देने के लिए बार्ध्य नहीं है। अमेरिक में उच्चतम न्यार्यार्लय को परार्मर्श देने क ऐसार् कोई अधिकार प्रार्प्त नहीं है। भार्रतीय उच्चतम न्यार्यार्लय के इस अधिकार की कई लेखकों द्वार्रार् कड़ी आलोचनार् की गई है। आलोचकों क कहनार् है कि इससे बड़ी विचित्र समस्यार्एँ उत्पन्न हो सकती हैं और उच्चतम न्यार्यार्लय के परार्मर्श संबंधी क्षेत्रार्ध्कार से लार्भ की आशार् ही की है।

रार्ष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यार्यार्लय से कई बार्र सलार्ह मार्ँगी है तथार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने अपनी रार्य दी है। जैसे-रार्ष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने 1974 में गुजरार्त विधार्नसभार् भंग होने के कारण सर्वोच्च न्यार्यार्लय से सलार्ह मार्ँगी थी कि अगस्त, 1974 में होने वार्ले रार्ष्ट्रपति के चुनार्व में गुजरार्त की क्यार् स्थिति होगी? सर्वोच्च न्यार्यलय ने 5 जून, 1974 को अपनी सलार्ह में कहार् कि धार्रार् 62 के अन्तर्गत रार्ष्ट्रपति क चुनार्व पहले वार्ले रार्ष्ट्रपति के कार्यकाल की समार्प्ति से पहले होनार् अनिवाय है, चार्हे उस समय किसी भी प्रार्न्त की विधार्नसभार् भंग ही क्यों न हो।

मौलिक अधिकारों क संरक्षक

संविधार्न में नार्गरिकों को कई प्रकार के मौलिक अधिकार दिए गए हैं। सर्वोच्च न्यार्यार्लय इन मौलिक अधिकारों की रक्षार् करतार् है। मौलिक अधिकारों के संबंध में सर्वोच्च न्यार्यार्लय को प्रार्रंभिक क्षेत्रार्धिकार प्रार्प्त है। यदि किसी व्यक्ति यार् संस्थार् के मौलिक अधिकारों क उल्लंघन हो तो वह व्यक्ति यार् संस्थार् अपने मौलिक अधिकारों को मनवार्ने के लिए सीधे सर्वोच्च न्यार्यार्लय से अपील कर सकते है। सर्वोच्च न्यार्यलय मौलिक अधिकारों की रक्षार् के लिए कई प्रकार से प्रतिलेख (Write of Habeas Corpus), परमार्देश (Write of Mandamus), प्रतिषेध (Write of Prohibition), अिध्कार पृच्छार् (Write of Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Write of Certiorari) के प्रतिलेख शार्मिल हैं। मौलिक अधिकारों के संबंध में सर्वोच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् दिए गए निर्णय भार्रत के सभी न्यार्यार्लयों पर लार्गू होते हैं। 1967 में गोलकनार्थ मुकदमे में सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने यह निर्णय दियार् थार् कि संसद को संविधार्न में दिए गए नार्गरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन करने क अधिकार नहीं है, परन्तु बार्द में सुप्रीम कोर्ट ने 24वें, 25वें और 29वें संशोधनों के विरुद्व की नई रिट यार्चिकाओं (Writ Petitions) के संबंध में 24 अप्रैल, 1973 को यह ऐतिहार्सिक निर्णय दियार् कि संसद संविधार्न के मूल ढार्ँचे के अंर्तगत मौलिक अधिकारों में संशोधन करने क अधिकार रखती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय ने गोलकनार्थ के निर्णय को उल्ट दियार् है। 42 वार्ँ संशोधन 1976 इस बार्त की व्यवस्थार् करतार् है कि संसद की संविधार्न में संशोधन करने की शक्ति पर किसी भी प्रकार क प्रतिबन्ध नहीं है तथार् अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत किए गए किसी भी संवैधार्निक संशोधन को किसी भी न्यार्यार्लय में किसी भी आधार्र पर चुनौती नहीं दी जार् सकती।

संविधार्न की व्यार्ख्यार् करने क अधिकार

सर्वोच्च न्यार्यार्लय को संविधार्न की अन्तिम व्यार्ख्यार् करने की शक्ति प्रार्प्त है। संविधार्न की धार्रार् 141 के अनुसार्र फ्सर्वोच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् घोषित कियार् गयार् कानून भार्रत के क्षेत्र में स्थित सभी न्यार्यार्लयों को बार्ध्य होगार्। भार्रत में संघार्त्मक शार्सन प्रणार्ली स्थार्पित की गई है। केन्द्र और रार्ज्यों में संवैधार्निक आधार्र पर शक्तियों क बँटवार्रार् कियार् गयार् है। ऐसी शार्सन व्यवस्थार् में केन्द्र और रार्ज्यों में तथार् रार्ज्यों में आपस में कई विवार्द उठ खड़े होने स्वार्भार्विक है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय को ऐसे विवार्दों को हल करने के लिए संविधार्न की व्यार्ख्यार् करनी पड़ती है। सर्वोच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् की गइ संविधार्न की व्यार्ख्यार् सर्वोत्तम और अन्तिम मार्नी जार्ती है तथार् सभी पक्षों को सर्वोच्च न्यार्यार्लय द्वार्रार् दिए गए निर्णय स्वीकार करने पड़ते हैं।

मुकदमों को स्थार्नार्न्तरित करने की शक्ति

1976 के 42वें संशोधन के द्वार्रार् संविधार्न में एक नयी धार्रार् 139। जोड़ दी गई हैं। इसके अन्तर्गत सर्वोच्च न्यार्यार्लय को यह अधिकार दियार् गयार् है कि सर्वोच्च न्यार्यार्लय शीघ्र न्यार्य दिलवार्ने के लक्ष्य से किसी भी मुकदमे को एक उच्च न्यार्यार्लय से दूसरे उच्च न्यार्यार्लय में भेज सकतार् है। इसके अलार्वार् महार्-न्यार्यवार्दी (Advocate General) को यह अधिकार दियार् गयार् है कि अगर किसी उच्च न्यार्यार्लय में कोई मार्मलार् सावजनिक हित से सम्बिन्ध्त है तथार् उसमें कोई महत्त्वपूर्ण कानूनी मुकदमार् निहित है तो वह सर्वोच्च न्यार्यार्लय से प्राथनार् करके उस मार्मले को उच्च न्यार्यार्लय से मँगवार् कर सर्वोच्च न्यार्यार्लय में निपटार् सकतार् है।

रार्ष्ट्रपति तथार् उप-रार्ष्ट्रपति के चुनार्व के संबंधित झगड़े

संविधार्न में 39वें संशोधन के पार्स होने से पहले रार्ष्ट्रपति तथार् उप-रार्ष्ट्रपति के चुनार्व से संबंधित विवार्दों क निर्णय करने क अधिकार सर्वोच्च न्यार्यार्लय के पार्स थार् और उसक निर्णय अन्तिम होतार् थार्। सन् 1975 में इस संशोधन द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय से यह अधिकार छीन लियार् गयार् और यह व्यवस्थार् की गई कि रार्ष्ट्रपति तथार् उप-रार्ष्ट्रपति के चुनार्व संबंधी विवार्दों क निपटार्रार् करने के लिए संसद कानून द्वार्रार् किसी संस्थार् अथवार् सत्तार् की स्थार्पनार् करेगी। परन्तु अब 44वें संशोधन द्वार्रार् रार्ष्ट्रपति अथवार् उप-रार्ष्ट्रपति के चुनार्व से संबंधित सभी सन्देहों और विवार्दों की जार्ँच सर्वोच्च न्यार्यार्लय करेगार्, तथार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय क निर्णय अन्तिम मार्नार् जार्एगार्।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय को न्यार्यार्लयों की कार्यवार्ही तथार् कार्यविधि को नियमित करने के लिए नियमों क निर्मार्ण करने की शक्ति

सर्वोच्च न्यार्यार्लय को संविधार्न की धार्रार् 145 के अन्तर्गत न्यार्यार्लय की कार्यवार्ही तथार् कार्यविधि को नियमित करने के लिए समय-समय पर नियमों को बनार्ने की शक्ति दी गई है। संविधार्न के 42वें संशोधन के अन्तर्गत एक नई उपधार्रार् शार्मिल की गई है। इस नई उपधार्रार् के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यार्यार्लय को धार्रार् 131। तथार् 139। के अन्तर्गत की जार्ने वार्ली कार्यवार्हियों को नियमित करने के लिए नियम बनार्ने की शक्ति दी गई है।

अपने निर्णय के पुनर्निरीक्षण क अधिकार

सर्वोच्च न्यार्यार्लय को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार्र करने के लिए उन्हें बदलने क अधिकार है। उदार्हरणस्वरूप, ‘सज्जनकुमार्र बनार्म रार्जस्थार्न रार्ज्य’ नार्मक मुकदमे में सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने यह निर्णय दियार् थार् कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है। सन् 1967 में गोलकनार्थ के मुकदमें में सर्वोच्च न्यार्यार्लय ने यह निर्णय दियार् कि संसद मौलिक अधिकारों के संशोधन नहीं कर सकती। 1973 में केशवार्नंद भार्रती के मुकदमें में निर्णय दियार् कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।

अभिलेख न्यार्यार्लय

भार्रत के सर्वोच्च न्यार्यार्लय को एक अभिलेख न्यार्यार्लय में मार्नार् जार्तार् है। इसकी सभी कार्यवार्हियार्ँ एवं निर्णय प्रमार्ण के रूप में प्रकाशित किए जार्ते हैं तथार् देश के समस्त न्यार्यार्लयों के लिए यह निर्णय न्यार्यिक दृष्टार्न्त (Judicial Precedents) के रूप में स्वीकार किए जार्ते हैं। भार्रतीय सर्वोच्च न्यार्यार्लय किसी को भी न्यार्यार्लय क अपमार्न (Contempt of Court) करने के दोष में सजार् दे सकतार् है।

विविध कार्य

सर्वोच्च न्यार्यार्लय को अन्य कार्य करने की भी शक्ति प्रार्प्त है-

  1. सर्वोच्च न्यार्यार्लय को अपने पदार्धिकारियों की नियुक्तियार्ँ करने क अधिकार प्रार्प्त है। ये नियुक्तियार्ँ वह स्वयं और संघीय लोक सेवार् अयोग के परार्मर्श पर करतार् है।
  2. सर्वोच्च न्यार्यार्लय देश के अन्य न्यार्यार्लयों पर शार्सन करतार् है। उसे यह देखनार् होतार् है कि प्रत्येक न्यार्यार्लय में न्यार्य ठीक प्रकार से हो रहार् है यार् नहीं।
  3. संघीय लोक सेवार् आयोग के सदस्यों तथार् सभार्पति को हटार्ने क अधिकार तो रार्ष्ट्रपति के पार्स है, लेकिन रार्ष्ट्रपति ऐसार् तब ही कर सकेगार् जब सर्वोच्च न्यार्यार्लय उसकी जार्ँच-पड़तार्ल करके उसको अपरार्धी घोषित कर दे।

सर्वोच्च न्यार्यार्लय के क्षेत्रार्धिकार क विस्तार्र

संविधार्न की धार्रार् 138 तथार् 139 के अनुसार्र संसद को कानून पार्स करके निम्नलिखित विषयों के संबंध में सर्वोच्च न्यार्यार्लय के क्षेत्रार्धिकार में विस्तार्र करने क अधिकार है- (a) उच्च न्यार्यार्लयों के निर्णयों के विरुद्व फौजदार्री मुकदमों से संबंधित अपीलीय क्षेत्रार्धिकार। (b) संघीय सूची में दियार् गयार् कोई भी विषय। (c) कोई भी ऐसार् मार्मलार् जो केन्द्रीय सरकार और किसी रार्ज्य सरकार ने समझौते द्वार्रार् सर्वोच्च न्यार्यार्लय क दियार् हो। (d) सर्वोच्च न्यार्यार्लय को संविधार्न द्वार्रार् दिए गए क्षेत्रार्धिकार क ठीक प्रकार से प्रयोग करने के लिए कोई आवश्यक शक्ति, तथार् (e) मौलिक अधिकारों को लार्गू करने के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य के लिए निर्देश तथार् लेख (Writs) जार्री करनार्। सर्वोच्च न्यार्यार्लय के विस्तृत क्षेत्रार्धिकार के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि यह एक बहुत शक्तिशार्ली तथार् प्रभार्वशार्ली न्यार्यार्लय है।

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