सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस के कारण, लक्षण एवं वैकल्पिक चिकित्सार्

हमार्री रीढ क निर्मार्ण छोटी छोटी विशेष आकार एवं संरचनार् की अस्थियों जिन्हे कशेरुक (Vertebra) कहार् जार्तार् है, के मिलने से होतार् है। इन कशेरुकाओं की कुल संख्यार् 26 होती है। इनमें से ऊपर की (सिर की और की) प्रथम सार्त कशेरुकाओं को सर्वार्इकल की संज्ञार् दी जार्ती हैं। जिन्हे अग्रेंजी भार्षार् के अक्षर सी-1 से लेकर सी-7 तक से प्रर्दशित कियार् जार्तार् है। रीढ की इन सी-1 से लेकर सी-7 तक की कशेरुकाओं के मूल स्थार्न, आकृति अथवार् संरचनार् में विकृति ही सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस (Cervical ) नार्मक रोग के नार्म से जार्नार् जार्तार् हैं।

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस के कारण

शरीर की गलत मुद्रार् अपनार्कर कार्य करने से रीढ की उपरोक्त कशेरुकाओं पर नकारार्त्मक प्रभार्व पडतार् है तथार् यह रोग उत्पन्न होतार् है। इसी प्रकार लम्बे समय तक झुककर बैठने से भी यह रोग उत्प्पन्न होतार् है। टेढे-मेढे होकर सोने, अधिक गहरे व लचीले गद्दों पर सोने एवं सोते समय मोटे तकिये को सिरार्हने के रुप में प्रयोग करने की आदत भी इस रोग को जन्म देती है। सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग के कुछ प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कारण इस प्रकार है-

  1. सोने में मोटार् तकियार् अथवार् अधिक मोटे फोम के गद्दों क प्रयोग करनार् (Older Age) : बिनार् तकियार् के प्रयोग किए हुए सीधे तक्त पर सोने से रीढ एवं मस्तिष्क से निकलने वार्ली तंत्रिकाएं अपनी सही स्थिति में रहती हैं किन्तु इसके विपरित सोने में अधिक मोटे तकियार् क प्रयोग करने तथार् मोटे, गहरे फोम अथवार् डनलफ के गद्दों क प्रयोग करने से रीढ की कशेरुकाओं की स्थिति पर नकारार्त्मक प्रभार्व पडतार् है, इसके सार्थ सार्थ मस्तिष्क से निकलने वार्ली तंत्रिकाएं पर भी कशेरुकाओं क अतिरिक्त दबार्व पडने लगतार् है। इससे प्रार्रम्भ में गर्दन दर्द एवं सिर दर्द प्रार्रम्भ होतार् है जो आगे चलकर रोग क रुप ग्रहण कर लेतार् है।
  2. गलत शार्रीरिक मुद्रार्एं ( Wrong body Postuer) : मार्नव शरीर र्इश्वर की एक ऐसी अद्भुत कृति है जो आज भी वैज्ञार्निकों की समझ से परे है। इसके अतिरिक्त संसार्र के अन्य प्रार्णियों से भिन्न दो पैरों पर खडे होकर चलने एवं कार्य करने की विलक्षण प्रतिभार् भी परमार्त्मार् ने मनुष्य को ही प्रदार्न की है। वैज्ञार्निक अथक प्रयार्सों के बार्द भी आज तक मार्नव शरीर के जैसार् नमूनार् नही बनार् पार्एं हैं। इस शरीर को सही प्रकार प्रयोग करने अर्थार्त इसके द्वार्रार् कार्य करने से यह लम्बे समय तक कार्य करने में सक्ष्म बनार् रहतार् है किन्तु इस शरीर को गलत मुद्रार् में रखकर कार्य करने से इसमें विकार अर्थार्त रोग उत्पन्न होने लगते है। सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की उत्पत्ति में भी शरीर की गलत मुद्रार्एं एक महत्वपूर्ण कारण हैं। झुककर बैठने, झुककर खडार् रहने, कमर झुकाकर पढने, टी0वी0 देखने अथवार् कम्पयूटर आदि पर कार्य करने से एवं कन्धें के सहार्रे मोबाइल फोन रखकर लम्बे समय तक बार्त करने के कारण सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग रोग उत्पन्न होतार् है। गलत मुद्रार् में सिर पर अधिक वजन उठार्कर चलने अथवार् एक हार्थ से अधिक वजन उठार्ने क रीढ की कशेरुकाओं पर दुष्प्रभार्व पडतार् है और इस रोग की संभार्वनार् बढ जार्ती है। प्रतिदिन काफी अधिक समय तक लेटकर टी0बी0 देखने अथवार् पत्र-पत्रिकाओं को पढने से भी जन्म लेतार् है। इस प्रकार शरीर की गलत मुद्रार्एं इस रोग की उत्पत्ति के महत्वपूर्ण कारण हैं। 
  3. अनियमित दिनचर्यार् ( Inactive or Sedentory life style) : रार्त्रि में देर तक जार्गनार्, सुबह देरी तक सोने की अनियमित दिनचर्यार् से शरीर की अस्थियों (रीढ की कशेरुकाओं ) में कडार्पन आतार् है। इसके अतिरिक्त असमय पर पोषक तत्वों से विहीन आहार्र करने से भी रीढ एवं शरीर की तंत्रिकाओं पर प्रतिकूल प्रभार्व पडतार् है जिससे इस रोग के उत्पन्न होने की संभार्वनार् बढती है। दिनचर्यार् में श्रम क पूर्ण अभार्व अथवार् एक स्थार्न पर अधिक समय तक एक मुद्रार् में बैठकर कार्य करने से भी इस रोग की संम्भार्वनार् बढ जार्ती है। 
  4. अत्यधिक श्रम एवं विश्रार्म क अभार्व ( More hard work without taking rest) : अत्यधिक शार्रीरिक श्रम करने से रीढ की कशेरुकाओं में कडार्पन बढतार् है तथार् बीच में विश्रार्म नही करने के कारण रीढ के आकार में विकृति उत्पन्न होने लगती है जो आगे चलकर सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग को जन्म देतार् है। 
  5. रीढ में झटक अथवार् चोट लगनार् (Jerk or injury of spine) : चलते समय ठोकर लगने के कारण अथवार् गार्डी में सफर करते समय रीढ में अचार्नक झटक लगने के कारण भी यह रोग उत्पन्न होतार् है। किसी कार्य करते समय बार्र बार्र रीढ में चोट लगने के कारण भी सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग पैदार् होतार् है।
  6. काम क अधिक बोझ एवं तनार्व (Work load and Stress) : काम क अधिक बोझ एवं तनार्व इस रोग की उत्पत्ति के महत्वपूर्ण कारण हैं। अधिक काम क बोझ, अधिक समय तक की लम्बी ड्राइविंग से यह रोग जन्म लेतार् है। इसके अतिक्ति मार्नसिक तनार्व से भी यह रोग बढतार् है। 
  7. र्दुव्यसन ( bad habbits) : धूम्रपार्न करने की आदत अथवार् एल्कोहल सेवन करने से अस्थियों पर नकारार्त्मक प्रभार्व पडतार् है, जिसके कारण इस रोग की संम्भार्वनार् बढ जार्ती है। अधिक समय तक धूम्रपार्न हड्डियों को कमजोर बनार्तार् है जिसके कारण कमर दर्द एवं सर्वार्इकल दर्द की संभार्वनार् बढ जार्ती है। इसी प्रकार तम्बार्कू, गुटका, पार्न मसार्ले के सेवन से भी यह रोग उत्पन्न होतार् है। 
  8. बढती उम्र (Age Factor) : मार्नव शरीर एक प्रकार क उपकरण ही है जिस पर समय क प्रभार्व पडनार् स्वार्भार्विक ही है। जिस प्रकार लगार्तार्र कार्य करते रहने से पुरार्नार् होकर उपकरण कमजोर हो जार्तार् है, ठीक उसी प्रकार लगार्तार्र कार्य करते रहने के कारण इस शरीर रुपी उपकरण में भी विकृतियार्ं उत्पन्न होती हैं। इन विकृतियों में ही एक विकृति सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग है जिसमें रीढ की अस्थियों के जोडों के मध्य उपस्थित गद्दियार्ं घिस जार्ती हैं और गर्दन में ऐठन व दर्द उत्पन्न होने लगतार् है इसीलिए 40 वर्ष की आयु के उपरार्न्त इस रोग की संभार्वनार् बढ जार्ती है। 
  9. यौगिक क्रियार् नही करने के कारण ( No Practice of Yoga) : यौगिक क्रियार्एं जैसे “ार्ट्कर्म, आसन, मुद्रार्-बंध, प्रार्णार्यार्म एवं ध्यार्न आदि नही करने के कारण शरीर में एक और जहार्ं वार्त, पित्त एवं कफ दोंषों की विषमतार् बढती है वहीं दूसरी और शरीर की अस्थियों अर्थार्त रीढ की कशेरुकाओं में भी कडार्पन आतार् है। इसके सार्थ सार्थ रीढ की कशेरुकाओं की चार्ल (Movement) कम होतार् है। रीढ की इन कशेरुकाओं में लचीलार्पन के स्थार्न पर कडार्पन होने एवं चार्ल कम के कारण सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग उत्पन्न होतार् है। 
  10. अनुवार्ंशिक एवं जन्मजार्त कारण (Genetic or Heritable Factor) : परिवार्र के अन्य सदस्यों के सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग से ग्रस्त होने पर आगे की पीढी में भी रोग की संभार्वनार् अधिक हो जार्ती है। इसके सार्थ सार्थ जन्मजार्त कारक अथवार् सिण्ड्रोम (Down Syndrome, Cerebral palsy, Congenital fused spine) भी सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग को उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते हैं।

इस प्रकार उपरोक्त दस महत्वपूर्ण कारणों में से किसी एक अथवार् अधिक के कारण शरीर सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग से ग्रस्त हो जार्तार् हैै किन्तु अब यह प्रश्न आतार् है कि यह कैसे पहचार्नार् जार्ए कि यह व्यक्ति सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग से ग्रस्त है ? अथवार् दूसरे शब्दों में इस रोग से ग्रस्त होने पर शरीर में क्यार् क्यार् लक्षण प्रकट होते हैं ? अत: अब हम सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग के लक्षणों एवं आधुनिक चिकित्सार् विज्ञार्न में होने वार्ली जार्ँचों ( Diagnosis) पर विचार्र करते हैं –

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग के लक्षण

शोध अनुसन्धार्न में यह तथ्य स्पष्ट होतार् है कि सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग से ग्रस्त रोगियों की संख्यार् महिलार्ओं की तुलनार् में पुरुषों में अधिक होती है अर्थार्त यह रोग महिलार्ओं की तुलनार् में पुरुषों में अधिक पार्यार् जार्तार् है जिसके शरीर में लक्षण प्रकट होते हैं –

  1. गर्दन में त्रीव वेदनार् एवं जकडन के सार्थ गर्दन क जार्म हो जार्नार् : गर्दन में त्रीव वेदनार् एवं जकडन के सार्थ गर्दन क जार्म होनार् इस रोग क वह मूल लक्षण है जिसके आधार्र पर इस रोग जार्नार् एवं पहचार्नार् जार्तार् है। रोग से ग्रस्त रोगी की गर्दन में ऐसी त्रीव वेदनार् होती है जिस पर दर्दनिवार्रक दवाइयों क प्रयोग प्रभार्वहीन सिद्ध होतार् है। इसके सार्थ सार्थ गर्दन में जकडन गंभीर रुप धार्रण करने लगती है जिस कारण गर्दन क दार्यें और बार्ंए घूमनार् बंद सार् हो जार्तार् है। रोगी व्यक्ति गर्दन को पूर्ण रुप से सीधी रखने पर ही कुछ आरार्म की अनुभूति करतार् है और इसीलिए वह अपनी गर्दन को असार्मार्न्य रुप से सीधी अवस्थार् में रखने क प्रयार्स करतार् है। सोने के उपरार्न्त रोगी के गर्दन में जकडन और अधिक बढ जार्ती है।
  2. इन्द्रिय बोध कम होनार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग मस्तिष्क से आने वार्ली तन्त्रिकाओं पर दबार्व आ जार्तार् है जिसके कारण रोगी को इन्द्रिय ज्ञार्न अथवार् इन्द्रिय ज्ञार्न कम हो जार्तार् है। इसके सार्थ सार्थ तंत्रिकाओं में कमजोरी तथार् सनसनी होनार् भी इस रोग के लक्षण हैं। इस रोग से ग्रस्त रोगी को हार्थ से लिखनें में भी कठिनाइ क अनुभव होने लगतार् है। 
  3. कन्धों में दर्द और जकडन के सार्थ हार्थों व अंगुलियों में सुन्नपन होनार् : बिनार् कोर्इ चोट लगे कन्धों एवं हार्थों में दर्द एवं भार्रीपन होनार् सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग के लक्षण हैं। इस रोग में कन्धों में दर्द एवं जकडन हार्थों की और बढने लगती है। यदि रोगार्वस्थार् लम्बे समय तक बनी रहें तो हार्थों में जकडन बढती हुर्इ की अंगुलियों में सुन्नपन आने लगतार् है। 
  4. कमर दर्द के सार्थ आगे को झुकने में त्रीव दर्द होनार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को कमर में दर्द रहतार् है और आगे की और झुकने में यह दर्द बढने लगतार् है। आगे की और झुककर कार्य करने अथवार् गलत मुद्रार् में कार्य करने यह दर्द और अधिक त्रीव और असहनीय हो जार्तार् है।
  5. आंखों के सार्मने अंधेरार् छार्ते हुए चक्कर आनार् एवं सिर दर्द रहनार् : चूंकि इस रोग में मस्तिष्क से आने वार्ली नार्डी पर दबार्व आ जार्तार् है जिसके कारण रोगी की आंखों के सार्मने अंधेरार् छार्ने लगतार् है और रोगी को चक्कर आने लगते हैं। इस रोग में रोगी के सिर में दर्द रहनार् प्रार्रम्भ हो जार्तार् है 
  6. गर्दन दर्द के कारण अनिन्द्रार् उत्पन्न होनार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को प्रतिक्षण गर्दन में त्रीव वेदनार् रहती है जिसके कारण अनिन्द्रार् रोग उत्पन्न हो जार्तार् है। गर्दन दर्द के कारण रोग से पिडित व्यक्ति शार्रीरिक श्रम करने में असमर्थ हो जार्तार् है तथार् अधिक समय तक बिस्तर में लेटे रहने से उसे बैचेनी और अनिन्द्रार् दोनों ही मार्नसिक व्यार्धियार्ं घेर लेती हैं। 

यद्यपि उपरोक्त लक्षणों के आधार्र पर भी सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की पहचार्न की जार् सकती है किन्तु आधुनिक चिकित्सार् विज्ञार्न में इस रोग की जॉच निम्न परीक्षणों के आधार्र पर की जार्ती है-

  1. गर्दन क X- ray : इसमें गर्दन पर X- ray : डार्ली जार्ती है जिसके द्वार्रार् गर्दन की कशेरुकाओं की स्थिति स्पष्ट की जार्ती है। कशेरुकाओं में उभरे हुए उकसार्न स्पोन्डिलार्इटिस रोग को प्रर्दशित करतें हैं।
  2. M.R.I. ( Magnetic Resonance Imaging): X- तंल की तुलनार् में M.R.I. के द्वार्रार् रोग की स्थिति अधिक स्पष्ट हो जार्ती है। इस प्रविधि में कशेरुकाओं की स्थिति एवं तंत्रिकाओं की स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जार्ती है तथार् यह भी पतार् चल जार्तार् है कि नार्डियों पर दबार्व पड रहार् है अथवार् नही। 
  3. E.M.G. ( Electromyelography): E.M.G. के द्वार्रार् यह स्पष्ट कियार् जार्तार् है कि तंत्रिकाओं अथवार् नार्डियों को कितनी हार्नि पहुॅची है। 
  4. C.T. Scan: कम्प्यूटरार्इज टोमोग्रार्फी स्केन द्वार्रार् गर्दन की छवि लेकर रोग को स्पष्ट कियार् जार्तार् है। 

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग सें सम्बन्धित उपरोक्त तथ्यों को जार्नने एवं समझार्ने के बार्द अब आपके मन में निष्चित ही इस रोग की चिकित्सार् को जार्नने की जिज्ञार्सार् अवश्य ही उत्पन्न हुर्इ होगी। इस रोग में प्रार्य: रोगी दर्दनिवार्रक दवाइयों क सेवन करतार् है किन्तु रोगी के दर्द में इन दवाइयों से कोर्इ प्रभार्व नही पडतार् है अपितु इस रोग में वैकल्पिक चिकित्सार् द्वार्रार् रोगी क चिरकालिक अथवार् स्थाइ लार्भ प्रार्प्त होतार् है अत: अब सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की वैकल्पिक चिकित्सार् पर विचार्र करते हैं –

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस की वैकल्पिक चिकित्सार्

1. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की योग चिकित्सार्

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग में योग चिकित्सार् अत्यन्त प्रभार्वी सिद्ध होती है। इसमें यौगिक क्रियार्ओं जैसे षट्कर्म, आसन, मुद्रार् बन्ध, प्रत्यार्हार्र, प्रार्णार्यार्म, ध्यार्न एवं समार्धि के द्वार्रार् रोग क उपचार्र कियार् जार्तार् है। सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की योग चिकित्सार् इस प्रकार है –

  1. षट्कर्म क प्रभार्व : यद्यपि षट्कर्मों की छह क्रियार्ओं क इस रोग पर प्रत्यक्ष प्रभार्व नही पडतार् है किन्तु धौति, बस्ति, नेति, नौली, त्रार्टक एवं कपार्लभार्ति नार्मक षट्कर्मों क रोग की स्थिति एवं रोगी की क्षमतार्नुसार्र अभ्यार्स करार्ने से रोगी के शरीर क शोधन अवश्य होतार् है। जिसके परिणार्म स्वरुप शरीर में हल्कापन आतार् है और रोग की त्रीवतार् कम होती है। 
  2. आसन क प्रभार्व : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग अस्थि संस्थार्न से जुडार् रोग है जिसे दूर करने में आसनों क अभ्यार्स एक महत्वपूर्ण भूमिक क वहन करतार् है। इस रोग से ग्रस्त रोगी को आसनों क अभ्यार्स बहुत धीरे धीरे एवं अत्यन्त सार्वधार्नीपूर्वक करार्नार् चार्हिए। विशेष रुप से रोगार्वस्थार् मे गर्दन को आगे की और झुकाने वार्ले अभ्यार्सों (Foreward bending) को पूर्णतयार् निषेध रखनार् चार्हिए इसके अतिरिक्त रोग की त्रीव अवस्थार् में रोगी को कठिन आसनों के स्थार्न पर हल्के सुक्ष्म अभ्यार्स ही करार्ने चार्हिए। सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को सन्धि संचार्लन के सुक्ष्म अभ्यार्सों से प्रार्रम्भ करार्ते हुए धीरे धीरे आसनों क अभ्यार्स करार्नार् चार्हिए। रोगी को प्रमुख रुप से गर्दन एवं कन्धों व हार्थों को गतिशील बनार्ने वार्ले सन्धि संचार्लन के सुक्ष्म अभ्यार्सों पर विशेष ध्यार्न केन्द्रित करनार् चार्हिए। रोगी को यह अभ्यार्स नियमित रुप से प्रार्त: और सार्ंयकाल दोनों समय करार्ने से रोग में लार्भ प्रार्प्त होतार् है। रोग की त्रीवतार् कम होने पर रोगी को आसनों के क्रम पर लार्ते हुए अभ्यार्सों से ही करनार् चार्हिए। रोगी को सर्पार्सन, भुजँगार्सन, मकारार्सन, मरकटार्सन, शलभार्सन, धनुरार्सन, मत्स्यार्सन, उष्ट्रार्सन, अर्द्धचन्द्रार्सन एवं शवार्सन आदि इस प्रकार के आसनों क अभ्यार्स करार्नार् चार्हिए जिनसे मेरुदण्ड में लचीलार्पन उत्पन्न हो। रोगी को नियमित रुप से मरकटार्सन के अलग अलग प्रकारों क अभ्यार्स रोगी को नियमित रुप से करार्ने से रोग में लार्भ मिलतार् है। इन आसनों के सार्थ सार्थ प्रत्येक आसन में शवार्सन एवं योग निन्द्रार् क अभ्यार्स करार्ने से भी रोग में लार्भ प्रार्प्त होतार् है। 
  3. मुद्रार् एवं बन्ध क प्रभार्व : मुद्रार्ओं एवं बन्धों क अभ्यार्स करार्ने से रोगी के शरीर में प्रार्ण तत्व क विस्तार्र होतार् है एवं अस्थियार्ं व मार्ँसपेशियार्ं मजबूत बनती हैं। अत: रोगी को उसकी स्थितिनुसार्र बन्धों एवं काकी, शार्म्भवी व महार्मुद्रार्ओं आदि मुद्रार्ओं क अभ्यार्स करार्नार् चार्हिए। 
  4. प्रत्यार्हार्र क प्रभार्व : इन्द्रिय संयम के सार्थ सार्थ अनुशार्सन पार्लन करने से रोग समूल नष्ट होतार् है। प्रत्यार्हार्र पार्लन के अन्र्तगत रोगी अपनी इन्द्रियों पर संयम करते हुए खार्नपार्न एवं बुरी आदतों पर नियंत्रण करतार् है जिससे रोग स्वत: ही ठीक होने लगतार् है।
  5. प्रार्णार्यार्म क प्रभार्व : रोगी को नार्डी शोधन, अनुलोम विलोम, उज्जार्यी एवं भ्रार्मरी आदि प्रार्णार्यार्मों क नियमित अभ्यार्स करार्ने से लार्भ मिलतार् है। प्रार्णार्यार्म क अभ्यार्स करार्ने से मेरुदण्ड एवं अन्य सम्बन्धित नार्डियों में प्रार्ण तत्व क विस्तार्र होतार् है जिससे रोग दूर होतार् है। 
  6. ध्यार्न एवं समार्धि क प्रभार्व : ध्यार्न एवं समार्धि के अन्र्तगत रोगी अपने मन से नकारार्त्मक विचार्रों एवं भार्वों को दूर करतार् हुआ सकारार्त्मक विचार्रों एवं भार्वों क चिन्तन करतार् है जिसक रोग पर सीधार् प्रभार्व पडतार् है। सर्मपण भार्व, दृढ इच्छार्शक्ति एवं शुभ संकल्पों को धार्रण से रोगी की आन्तरिक प्रतिरोधक क्षमतार् एवं जीवनी शक्ति तेजी से विकसित होती है जिससे यह रोग समूल नष्ट होतार् है।

इस प्रकार योग चिकित्सार् के द्वार्रार् सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग क दुष्प्रभार्वरहित उपचार्र कियार् जार्तार् है। इसके सार्थ सार्थ प्रार्कृतिक चिकित्सार् द्वार्रार् भी इस रोग भी इस रोग में प्रभार्वी रुप से कार्य करती है। सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की प्रार्कृतिक चिकित्सार् इस प्रकार है –

2. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की प्रार्कृतिक चिकित्सार्

प्रार्कृतिक चिकित्सार् में मिट्टी, जल, अग्नि, वार्यु और आकाश तत्व क प्रयोग निम्न लिखित रुप से करने से रोगी को लार्भ प्रार्प्त होतार् है-

  1. मिट्टी तत्व चिकित्सार् : रोगी को पेट के सार्थ सार्थ गीली मिट्टी की पट्टी देने से पेट क शोधन होतार् हैं। जिससे शरीर में वार्त दोष शार्न्त होतार् है एवं वार्त व्यार्धियार्ं दूर होती हैं। इस रोग में रीढ पर गर्म मिट्टी की पट्टी क प्रयोग करने से दर्द में आरार्म मिलतार् है। 
  2. जल तत्व चिकित्सार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग में जल तत्व क प्रयोग विशेष लार्भ प्रदार्न करतार् है। रोग की त्रीवार्वस्थार् में गर्म जल से सिकार्इ (रबर की बोतल में गर्म जल भरकर) करने से रोगी को दर्द में शीघ्र लार्भ मिलतार् है। रोगी को सम्पूर्ण शरीर क भार्प स्नार्न देने के अतिरिक्त नियमित रुप से स्थार्नीय भार्प (कमर एवं कन्धों पर) रोग में स्थाइ लार्भ प्रार्प्त होतार् है। इस रोग में गर्म बार्ह स्नार्न (Hot Arm Bath) भी लार्भकारी प्रभार्व रखतार् है। रोगी को वार्त दोष क शमन करने वार्ले औषध गुणों से युक्त द्रव्यों से एनीमार् देने से भी रोग में लार्भ मिलतार् है।
  3. अग्नि तत्व चिकित्सार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को सूर्य स्नार्न देने से रोग में लार्भ मिलतार् है। इसके सार्थ सार्थ नार्रंगी रंग की बोतल में आवेशित जल क सेवन रोगी को करार्ने एवं लार्ल अथवार् नार्रंगी रंग के प्रकाश अस्थियों पर डार्लने से रोग ठीक होतार् है।
  4. वार्यु तत्व चिकित्सार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग अत्यन्त सार्वधार्नीपूर्वक हल्के हार्थों से मार्लिश करने से तुरन्त आरार्म मिलतार् है किन्तु यहार्ँ पर अत्यन्त महत्वपूर्ण ध्यार्न देने क तथ्य यह है कि रोगी को गहरी अथवार् अवैज्ञार्निक रुप से मार्लिश करने से रोगी के दर्द तुरन्त बहुत अधिक बढ जार्तार् है। 
  5. आकाश तत्व चिकित्सार् : सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को छोटे उपवार्स अथवार् कल्प करार्ने से रोग में लार्भ मिलतार् है। इसके सार्थ सार्थ प्राथनार् एवं सकारार्त्मक भार्वों से रोग समूल दूर होतार् है।

इस प्रकार प्रार्कृतिक चिकित्सार् से सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को लार्भ प्रार्प्त होतार् है। अब वैकल्पिक चिकित्सार् के अन्र्तगत आयुर्वेद चिकित्सार् पर विचार्र करते हैं –

3. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की आयुर्वेद चिकित्सार्

आयुर्वेद शार्स्त्र में सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को शिलार्जीत, चन्द्रप्रभार्वटी एवं त्रियोदषार्म गुग्गुल नार्मक औषधियों के सेवन क निर्देश दियार् जार्तार् है। सार्मार्न्य रुप से सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को 1 से 3 ग्रार्म की मार्त्रार् में पीसी हल्दी क चूर्ण एवं सौंठ समार्न मार्त्रार् में मिलार्कर सुबह-शार्म नियमित सेवन करार्ने से दर्द एवं रोग में लार्भ प्रार्प्त होतार् है।

रोगी को अत्यन्त सार्वधार्नीपूर्वक बहुत हल्के हार्थों से एवं वैज्ञार्निक ढंग से महार्नार्रार्यण तेल से मार्लिश करने से दर्द में आरार्म मिलतार् है। किन्तु रोगी को गहरी अथवार् अवैज्ञार्निक ढंग से मार्लिश करने से दर्द तुरन्त एवं तेजी से बढ जार्तार् है। त्रिफलार् चूर्ण क सेवन करार्ने से भी सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को लार्भ प्रार्प्त होतार् है। रोगी को रार्त्रिकाल में एक चम्मच चूर्ण गुनगुने दूध के सार्थ अथवार् प्रार्त:काल खार्ली पेट एक चम्मच चूर्ण गर्म पार्नी के सार्थ सेवन करार्नार् चार्हिए। रोगी को एलोविरार् के जूस क सेवन भी लार्भकारी होतार् है। रोगी को चार्र चार्र चम्मच जूस प्रार्त:-सार्ंय दोनों समय पिलार्ने से रोग में आरार्म मिलतार् है।

4. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोग की आहार्र चिकित्सार् 

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को आहार्र पर विशेष नियंत्रण रखने की आवश्यक्तार् होती है। रोगी को शुद्ध सार्त्विक हल्क एवं सुपार्च्य आहार्र देने से शरीर की पूरी जीवनी शक्ति रोग को दूर करने में लग जार्ती है जिससे रोग शीघ्रतार् से दूर होतार् है। कैल्शियम की कमी भी अस्थि तंत्र के रोगों क मूल कारण होतार् है अत: रोगी को कैल्शियम युक्त पदाथो क अधिक से अधिक सेवन करार्नार् चार्हिए। रोगी को निम्न लिखित पथ्य और अपथ्य आहार्र पर ध्यार्न देनार् चार्हिए –

  1. पथ्य आहार्र – दूध, दही, मठ्ठार्, मख्खन, पनीर, अखरोट, बार्दार्म, चनार्, चौकरयुक्त आटार्, सन्तरार्, मौसमी, हरी पत्तेदार्र सब्जियार्ं विशेष रुप से करेलार्, मौसमी फल सलार्द एवं पोषक तत्वों से युक्त पौष्टिक आहार्र रोगी के लिए पथ्य है। इसके सार्थ सार्थ रोगी के लिए बिनार् फ्राइ कियार् हुआ उबलार् आहार्र पथ्य है। 
  2. अपथ्य आहार्र – नमक, चीनी, चार्य, कॉफी, सोफ्ट व कोल्ड डिंक्स जैसे पैप्सी व कोक, एल्कोहल, तलार् भुनार् चार्यनीज फूड, फार्स्ट फूड, जंक फूड, खट्टी दही, बार्सी, रुखार् एवं पोषक तत्व विहीन भोजन रोगी के लिए अपथ्य है। विशेष रुप से रोगी को खट्टे एवं अम्लीय पदाथों क सेवन पूर्ण रुप से त्यार्ग देनार् चार्हिए। 

इस प्रकार उपरोक्त पथ्य एवं अपथ्य आहार्र के अनुसार्र रोगी को आहार्र करार्ने से रोग में अत्यन्त सरलतार्, सहजतार् एवं शीघ्रतार्पूर्वक लार्भ प्रार्प्त होतार् है।

सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी के लिए सार्वधार्नियार्ं एवं सुझार्व

  1. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को गर्दन में अधिक दर्द अथवार् रोग की गंभीर अवस्थार् में गर्दन को अधिक से अधिक सीधार् एवं स्थिर रखने हेतु गर्दन में बैल्ट क प्रयोग करनार् चार्हिए। 
  2. रोग की त्रीव अवस्थार् में गर्दन को कम से कम गतिमार्न करते हुए अधिकतम समय तक गर्दन को सीधार् रखकर आरार्म देनार् चार्हिए। 
  3. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को कभी भी गर्दन अथवार् कमर झुकाकर अधिक देर तक कार्य नही करनार् चार्हिए। 
  4. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को सोते समय तकियार् क प्रयोग पूर्ण रुप से छोड देनार् चार्हिए।
  5. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को अपने सभी कार्य सही मुद्रार् में करने चार्हिए तथार् आगे की ओर झुककर करने वार्ले कार्यों को अधिक समय तक नही करने चार्हिए।
  6. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को टी0 वी0 अथवार् कम्पयूटर क स्थार्न ऊँचाइ पर रखनार् चार्हिए। 
  7. सर्वार्इकल स्पॉन्डिलार्इटिस रोगी को नियमित रुप से प्रार्त:काल गर्दन के सुक्ष्म अभ्यार्स अवश्य करने चार्हिए। इस प्रकार उपरोक्त सार्वधार्नियों को ध्यार्न में रखने से रोग जल्दी ठीक होतार् है।

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