सर्पगंधार् की खेती कैसे करें
भार्रतीय महार्द्वीप की जलवार्यु में सफलतार्पूर्वक उगार्ए जार् सकने वार्ले औषधीय पौधों में न केवल औषधीय उपयोग बल्कि आर्थिक लार्भ एवं मार्ंग की दृष्टि से भी सर्पगंधार् कुछ गिने चुने शीर्ष पौधों में अपनार् महत्वपूर्ण स्थार्न रखतार् है। दक्षिण पूर्वी एशियार् क यह मूल निवार्सी पौधार् भार्रतवर्ष के सार्थ-सार्थ बर्मार्, बार्ंग्लार्देश, श्री लंका, मलेशियार्, इंडोनेशियार् तथार् अंडमार्न द्वीप समूह में स्वयंजार्त पार्यार् जार्तार् है भार्रतवर्ष में यह मुख्यतयार् उत्तर प्रदेश, उत्तरार्ंचल के तराइ क्षेत्र, पूर्वी बिहार्र, उत्तर बंगार्ल, आसार्म, उड़ीसार्, आंध्रप्रदेश, हिमार्चल प्रदेश, झार्रखण्ड, छत्तीसगढ़ तथार् मध्य प्रदेश आदि रार्ज्यों के सार्थ-सार्थ गोवार्, कर्नार्टक तथार् केरल के कुछ भार्गों में वनों में प्रार्कृतिक रूप से पार्यार् जार्तार् है।

यूं तो भार्रतवर्ष के विभिन्न भार्गों में पार्यार् जार्ने वार्लार् सर्पगंधार् औषधीय दृष्टि से विश्व भर में सर्वश्रेष्ठ मार्नार् जार्तार् है परन्तु देश के विभिन्न भार्गों में पार्ए जार्ने वार्ले सर्पगंधार् देहरार्दून क्षेत्र में बोर्इ जार्ने वार्ली सर्पगंधार् में अजमेलीन समूह के एल्केलार्इड अधिक पार्ए जार्ते हैं जबकि बिहार्री मूल की सर्पगंधार् में सर्पेन्टार्इन समूह के एल्केलार्इड अधिक पार्ए जार्ते हैं। सर्पगंधार् क नार्म ‘‘सर्पगंधार्’’ क्यों पड़ार् होगार्, इसके पीछे कर्इ मत हैं। ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि क्योंकि प्रार्चीन समय से ही सर्पगंधार् क उपयोग सार्ंप काटे के इलार्ज के लिए कियार् जार्तार् रहार् है। इसलिए इसक नार्म सर्पगंधार् पड़ार् होगार्। हार्लार्ंकि सबसे ज्यार्दार् उपयुक्त मत इसके संस्कृत नार्म क लगतार् है जिसमें सर्पगंधार् क अभिप्रार्य ‘‘सर्पार्न् गन्धयति अर्दयति इति’’ है, अर्थार्त् ‘‘वह वस्तु (बूटी) जो सर्पों को पीडित करे अथवार् सर्पों को दूर भगार्ए’’। क्योंकि सर्पगंधार् की गंध से सार्ंप दूर भार्गते हैं अत: संभवतयार् इसी वजह से इसक नार्म सर्पगंधार् पड़ार् होगार्। इसक व्यवसार्यिक नार्म ‘‘रार्वोल्फियार्’’ सोलहवीं शतार्ब्दी के एक जर्म पार्दपविज्ञार्नी तथार् चिकित्सक लियोनाड रार्वोल्फियार् के नार्म पर पड़ार् हुआ मार्नार् जार्तार् है।

विभिन्न चिकित्सार् कार्यों हेतु भार्रतवर्ष में सर्पगंधार् क उपयोग लगभग 400 वर्षों से कियार् जार् रहार् है। यद्यपि परम्परार्गत चिकित्सार् पद्धतियों में इसक उपयोग सार्ंप अथवार् अन्य कीड़ों के काटने के इलार्ज हेतु, पार्गलपन एवं उन्मार्द की चिकित्सार् हेतु तथार् कर्इ अन्य रोगों के निदार्न हेतु कियार् जार्तार् रहार् है परन्तु वर्ष 1952 में जब सीबार् फामेस्यूटिकल्स स्विटजरलैण्ड के शिलर तथार् मुलर नार्मक वैज्ञार्निकों ने सर्पगंधार् की जड़ों में ‘‘रिसरपिन’’ नार्मक एल्कोलार्इड उपस्थित होने की खोज की तो यह पौधार् सम्पूर्ण विश्व की नज़रों में आ गयार्। फलत: उच्च रक्तचार्प की अचूक दवाइ मार्ने जार्ने वार्ले इस पौधे क जंगलों से अंधार्धुंध विदोहन प्रार्रंभ हो गयार् जिससे शीघ्र ही यह पौधार् लुप्तप्रार्य पौधों की श्रेणी में आ गयार्। वर्तमार्न में यह पौधार् भार्रत सरकार द्वार्रार् अधिसूचित किए गए लुप्तप्रार्य तथार् प्रतिबन्धित पौधों की श्रेणी में शार्मिल है जिसके कृषिकरण को बढ़ार्वार् देने हेतु प्रत्येक स्तर पर सर्र्पगंध्ंधार् के विभिन्न प्रज्रजार्तियोंं के पुष्प प्रयार्स किए जार् रहे हैं।

सर्पगंधार्

सर्पगंधार् लगभग 2 से 3 फीट तक उंचाइ प्रार्प्त करने वार्लार् एक अत्यधिक सुन्दर दिखने वार्लार् बहुवर्षीय पौधार् है जिसे कर्इ लोगों द्वार्रार् घरों में सजार्वट कार्य हेतु भी लगार्यार् जार्तार् है। भार्रतवर्ष के कर्इ प्रदेशों में ‘‘पार्गलपन की बूटी’’ अथवार् ‘‘पार्गलों की दवाइ’’ के नार्म से जार्ने जार्ने वार्ले इस पौधों क औषधीय दृष्टि से प्रमुख उपयोगी भार्ग इसकी जड़ होती है जो 2 वर्ष की आयु के पौधे में 30 से 50 से0मी0 तक विकसित हो जार्ती है लगभग छ: मार्ह की आयु प्रार्प्त कर लेने पर पौधों में हल्के गुलार्बी रंग के अति सुन्दर फूल आते हैं तथार् तदुपरार्न्त उन पर मटर के दार्ने के आकार के फल आते हैं जो कच्ची अवस्थार् में हरे रहते हैं तथार् पकने पर ऊपर से काले दिखते हैं। इन फलों को मसलने पर अंदर से सफेद भूरे रंग के चिरौंजी के दार्नों जैसे बीज निकलते हैं। यूं तो सर्पगंधार् की कर्इ प्रजार्तियार्ं जैसे रार्बोल्फियार्, वोमीटोरियार्, रार्वोल्फियार्, कैफरार्, रार्वोल्फियार् टैट्रफार्इलार् रार्वोल्फियार्, कैनोन्सिस आदि भी पाइ जार्ती हैं परन्तु सर्वार्धिक मार्ंग एवं उपयोगितार् वार्ली प्रजार्ति रार्बोल्फियार् सर्पेन्टार्इनार् ही हैं इसके अतिरिक्त भी सर्पगंधार् की कर्इ जार्तियार्ं हैं जो भार्रत के विभिन्न भार्गों में पाइ जार्ती है। उदार्हरणाथ इसकी रार्बोल्फियार् कानेसेंस नार्मक जार्ति बंगार्ल में प्रचुरतार् से मिलती है जबकि रार्बोल्फियार् डेन्सीफ्लोय नार्मक प्रजार्ति खार्सीपर्वत, पश्चिमी घार्ट तथार् कोंकण प्रदेश में ज्यार्दार् पाइ जार्ती हैं इसी प्रकार इसकी एक अन्य जार्ति रार्बोल्फियार् मीक्रार्न्थार् है जो कि मार्लार्वार्र के समुद्रतटीय मैदार्नों में अधिक पाइ जार्ती है तथार् दक्षिणी भार्रत के बार्जार्रों में इसकी जड़ें बिकने के लिए आती हैं।

सर्पगंधार् की रार्सार्यनिक संरचनार् 

सर्पगंधार् में लगभग 30 एल्केलार्इड्स पार्ए जार्ते हैं जिनमें प्रमुख हैं- रिसरपिन, सर्पेन्टार्इन, सर्पेन्टार्अनार्इन, अजमेलार्इन, अजमेलिसार्इन, रार्वोल्फिनार्इन, योहिम्बार्इन, रेसिनेमार्इन, डोज़रपिडार्इन आदि। ये एल्केलार्इड्स सर्पगंधार् की फसल मुख्यतयार् सर्पगंधार् की जड़ों में होते हैं। तथार् पौधे की सूखी जड़ों में इनकी उपस्थिति 1. 7 से 3 प्रतिशत तक पाइ जार्ती है। इसकी जड़ों से तैयार्र की जार्ने वार्ली भस्म में पोटेशियम, कार्बोनेट, फार्स्फेट, सिलिकेट, लोहार् तथार् मैंगेनीज़ पार्ए जार्ते हैं।

सर्पगंधार् के औषधीय उपयोग 

सर्पगंधार् भार्रतीय चिकित्सार् पद्धतियों में प्रयुक्त होने वार्ले प्रार्चीन एवं प्रमुख पौधों में से एक हैं परम्परार्गत ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ- आधुनिक चिकित्सार् विज्ञार्न के अनुसार्र भी यह विभिन्न विकारों के निदार्न में उपयोगी सिद्ध हुआ है। आधुनिक चिकित्सार् पद्धतियों में भार्रतवर्ष में जनसार्मार्न्य में इसे लोकप्रिय बनार्ने क श्रेय कोलकातार् के सुप्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सक डार्. गणपत सेन तथार् डार्. चन्द्रार् बोस को जार्तार् है। वर्तमार्न में जिन प्रमुख चिकित्सीय उपयोगों हेतु सर्पगंधार् प्रमुखतार् से प्रयुक्त की जार् रही है, वे निम्नार्नुसार्र हैं-

उच्च रक्त चार्प के निवार्रण हेतु 

उच्च रक्त चार्प अथवार् हाइ ब्लडप्रेशर के उपचार्र हेतु सर्पगंधार् सम्पूर्ण विश्व भर में सर्वोत्तम औषधि मार्नी जार्ती है। इसके उपयोग से उच्च रक्तचार्प में उल्लेखनीय कमी आती है, नींद भी अच्छी आती है तथार् भ्रम आदि मार्नसिक विकार भी शार्ंत होते हैं। वर्तमार्न चिकित्सार् पद्धतियों में, विशेषतयार् अमेरिक में इसके उन तत्वों को अलग (आर्इसोलेट) कर लियार् जार्तार् हैं जो उच्च रक्तचार्प को नियंत्रित करते हैं तथार् इन्हीं तत्वों क उपयोग कियार् जार्तार् है। इस प्रकार किन्हीं तत्वों को आर्इसोलेट करके सर्पगंधार् के उन्हीं तत्वों क सेवन करने के दुष्प्रभार्व नहीं देखे जार्ते। प्रार्य: उच्च रक्तचार्प में इसकी जड़ के चूर्ण क आधार् छोटार् चम्मच (एक ग्रार्म की मार्त्रार् में) दिन में दो यार् तीन बार्र सेवन करने से उच्च रक्तचार्प से सार्मार्न्यतार् आती है।

अनिद्रार् के उपचार्र हेतु 

अनिद्रार् की स्थिति में नींद लार्ने हेतु सर्पगंधार् काफी उपयोगी औषधि है। खार्ंसी वार्ले रोगियों की अनिद्रार् के निदार्न में भी यह अत्यधिक प्रभार्वी हैं अनिद्रार् की स्थिति में निद्रार् लार्ने हेतु इसकी जड़ क 0.60 से 1. 25 ग्रार्म चूर्ण किसी सुगंधीय द्रव्य के सार्थ मिलार्कर देनार् प्रभार्वी रहतार् है। वैसे रार्त को सोते समय इसके 0.25 ग्रार्म पार्वडर क सेवन घी के सार्थ करने से बहुत जल्दी नीद आ जार्ती हैं वैसे चिकित्सक के परार्मर्श पर ही इसक उपयोग करनार् हितकर है।

उन्मार्द के उपचार्र हेतु 

परम्परार्गत चिकित्सार् में सर्पगंधार् बहुधार् ‘‘पार्गल बूटी’’ अथवार् पार्गलपन की दवार् के रूप में भी जार्नी जार्ती हैं उन्मार्द और अपस्मार्र में जब रोगी बहुत अधिक उत्तेजित रहतार् है तो मन को शार्ंत करने के लिए इसक उपयोग कियार् जार्तार् है इससे मन शार्ंत रहतार् है तथार् धीरे-धीरे मस्तिष्क के विकार दूर हो जार्ते हैं। इस विकार के उपचार्र हेतु सर्पगंधार् की जड़ क एक ग्रार्म चूर्ण, 250 मि.ली. बकरी के दूध के सार्थ (सार्थ में गुड़ मिलार्कर) दिन में दो बार्र दियार् जार्नार् उपयोगी रहतार् हैं परन्तु यह केवल उन्हीं मरीजों को दियार् जार्नार् चार्हिए जो शार्रीरिक रूप से हष्ट पुष्ट हों। शार्रीरिक रूप से कमजोर मरीजों तथार् ऐसे मरीज़ जिनक रक्तचार्प पहले से असार्मार्न्य रूप में नीचार् हो (लो ब्लड प्रेशर वार्ले), को यह नहीं दियार् जार्नार् चार्हिए।

अनिद्रार्, उन्मार्द तथार् उच्च रक्तचार्प जैसे महत्वपूर्ण विकारों के निवार्रण के सार्थ-सार्थ शीतपित्त (यूर्टीकेरियार्) बुखार्र, कृमिरोगों के निवार्रण, सर्पविष एवं अन्य कीड़ों के काटने के उपचार्र आदि जैसे अनेकों विकारों के निवार्रण हेतु भी इसे प्रयुक्त कियार् जार्तार् है।

नि:सन्देह सर्पगंधार् एक अत्यधिक औषधीय उपयोग क पौधार् है जिसक उपयोग केवल परम्परार्गत ही नहीं बल्कि आधुनिक चिकित्सार् पद्धतियों में भी बखूबी से कियार् जार्तार् हैं इस पौधे के संदर्भ में सर्वार्धिक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसक उपयोग तो विश्व के सभी देशों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है चार्हे वे विकसित देश हों अथवार् अविकसित, परन्तु इसकी आपूर्ति क मुख्य स्त्रोत भार्रतवर्ष ही हैं हार्लार्ंकि कुछ मार्त्रार् में पार्किस्तार्न, बर्मार्, थाइलैण्ड, श्रीलंक आदि देशों से भी इसकी आपूर्ति होती है परन्तु भार्रतवर्ष में उपजी सर्पगंधार् को ज्यार्दार् अच्छार् मार्नार् जार्तार् है। एक अनुमार्न के अनुसार्र विश्व भर में सर्पगंधार् की सूखी जड़ों की वाषिक मार्ंग लगभग 20.000 टन की हैं इसी प्रकार देशीय बार्जार्र में इसके एक्सट्रेक्ट तथार् एलकोलार्इड्स निकालने हेतु लगभग 650 टन जड़ों की वाषिक मार्ंग है। जबकि समस्त स्त्रोतों को मिलार् करे इसकी कुल आपूर्ति मार्त्र 350 टन प्रतिवर्ष की है (फार्रूखी एवं श्री रार्मू, 2001) उल्लेखनीय है कि फार्उण्डेशन फॉर रीवार्इटलाइजेशन ऑफ लोक हेल्थ ट्रेडीशन्स बंग्लौर द्वार्रार् किये गये एक सर्वेक्षण के आधार्र पर उनके द्वार्रार् सर्पगंधार् को सर्वार्धिक मार्ंग वार्ले 20 प्रमुख भार्रतीय औषधीय पौधों (Top twenty indian medicinal Plants in trade) में स्थार्न दियार् गयार् है। ऐसी स्थिति में इसकी सुनिश्चित आपूर्ति तभी हो सकती है यदि इसके कृषिकरण को बहुत बड़े स्तर पर प्रोत्सार्हित कियार् जार्ए।

सर्पगंधार् की खेती की विधि 

सर्पगंधार् एक बहुवर्षीय औषधीय पौधार् है जिसकी खेती इसकी जड़ों की प्रार्प्ति के लिए की जार्ती है कर्इ जगहों पर इसे दो वर्ष की फसल के रूप में लियार् जार्तार् है तथार् कर्इ जगहों पर 3-4 वर्ष की फसल के रूप में। इसी प्रकार विभिन्न स्थार्नों पर इसकी फसल से होने वार्ली प्रार्प्तियों में भी भिन्नतार् होती है। एक अच्छी फसल प्रार्प्त करने के लिए इसकी कृषि तकनीक से संबंधित विकसित किए गए प्रमुख पहलू अपनार्नार् होगार्।

सर्पगंधार् की फसल

सर्पगंधार् की फसल की अवधि- 

सर्पगंधार् बहुवर्षीय फसल है तथार् इसे 2 मार्ह से 5 वर्ष तक के लिए खेत में रखार् जार्तार् है। परन्तु इन्दौर में हुए शोध कार्यों से यह पतार् चलतार् है कि 18 मार्ह की अवधि के उपरार्न्त फसल को उखार्ड़ लियार् जार्नार् चार्हिए। हार्ंलार्ंकि यह भी पार्यार् गयार् है कि जितने ज्यार्दार् समय तक पौधार् खेत में लगार् रहेगार् उसी के अनुरूप जड़ों की मार्त्रार् में बढ़ोत्तरी होती जार्एगी तथार् दो सार्ल की फसल की अपेक्षार् तीन सार्ल की फसल से ज्यार्दार् उत्पार्दन नर्सरी में तैयार्र हो रहे सर्पगंधार् के पौधे मिलतार् है, परन्तु अंतत: यह निष्कर्ष निकालार् गयार् है कि इसकी खेती 30 मार्ह अर्थार्त् ढाइ वर्ष की फसल के रूप में की जार्ए जिससे एल्केलार्इड भी पूर्णतयार् विकसित हो जार्एं तथार् उत्पार्दन भी अधिक हो। 

खेती के लिए उपयुक्त जलवार्यु 

भार्रतीय महार्द्वीप क मूल निवार्सी पौधार् होने के कारण सर्पगंधार् की खेती हेतु भार्रतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों की जलवार्यु काफी उपयुक्त पाइ जार्ती है। यूं तो ऐसे क्षेत्र जहार्ं की जलवार्यु में ज्यार्दार् उतार्र चढ़ार्व न हों वे इसके लिए ज्यार्दार् उपयुक्त हैं, परन्तु फिर भी देखार् गयार् है कि यह 100 से लेकर 450 तक के तार्पमार्न में सफलतार्पूर्वक उगाइ जार् सकती है। वैसे तो यह खुले क्षेत्रों में ज्यार्दार् अच्छी प्रकार पनपतार् है परन्तु आंशिक छार्यार् वार्ले क्षेत्रों में भी इसक अच्छार् विकास होतार् है। ज्यार्दार् पार्ले तथार् सर्दी के समय इसके पत्ते झड़ जार्ते हैं तथार् बसन्त आते ही पुन: नर्इ कोपलें आ जार्ती हैं। यद्यपि जलभरार्व वार्ले क्षेत्रों के लिए यह उपयुक्त नहीं है। परन्तु यदि 2-3 दिन तक जल भरार्व वार्ली स्थिति बनती है तो ऐसी स्थितियार्ं यह सहन करने की क्षमतार् रखतार् है। प्रकृति रूप में तो यह 250 से 500 सेमी. वाषिक वर्षार् वार्ले क्षेत्रों में अच्छी प्रकार उगतार् एवं बढ़तार् देखार् गयार् है। इस प्रकार सार्मार्न्य परिस्थितियों में सम्पूर्ण भार्रतीय महार्द्वीप की जलवार्यु, ऊपरी उत्तरार्ंचल, ऊपरी हिमार्चल, कश्मीर तथार् किन्हीं उत्तर पूर्वी रार्ज्यों तथार् रार्जस्थार्न एवं गुजरार्त के रेगिस्तार्न वार्ले क्षेत्रों को छोड़कर शेष भार्रत की जलवार्यु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। अभी वर्तमार्न में इसकी आपूर्ति मुख्यतयार् उत्तर प्रदेश, बिहार्र, झार्रखण्ड, उड़ीसार्, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आसार्म, पश्चिमी बंगार्ल, आंध्र प्रदेश, तमिलनार्डु, कर्नार्टक, केरल तथार् महार्रार्ष्ट्र आदि रार्ज्यों में हो रही है जो स्वार्भार्विक रूप से इसकी खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र मार्ने जार् सकते हैं। कटिंग (कलम) से तैयार्र कियार् गयार् सर्पगंधार् क पौधार्

 उपयुक्त मिट्टी 

सर्पगंधार् की जड़ें भूमि में 50 सेंमी. तक गहरी जार्ती हैं अत: इसकी खेती ऐसी मिट्टियों में ज्यार्दार् सफल हार्गी जिनमें जड़ों क सही विकास हो सके। इस दृष्टि से 6.5 पी.एच. वार्ली रेतीली दोमट तथार् काली कपार्सियार् मिट्टियार्ं इसकी खेती के लिए ज्यार्दार् उपयुक्त हैं।

सर्पगंधार् की उन्नत प्रजार्तियार्ँ 

सर्पगंधार् की खेती से संबंधित जवार्हर लार्ल नेहरू कृषि विश्वविद्यार्लय द्वार्रार् काफी अच्छार् कार्य कियार् गयार् हैं तथार् विश्वविद्यार्लय द्वार्रार् सर्पगंधार् की एक उन्नत प्रजार्ति विकसित की गर्इ है जिसे ‘‘आर.एस.1’’ क नार्म दियार् गयार् है। इस प्रजार्ति में सार्त मार्ह पुरार्ने बीजों में भी 50 से 60 प्रतिशत तक उगार्व होनार् पार्यार् गयार् है तथार् इस प्रजार्ति में 10 क्विंटल प्रति एकड़ सूखी जड़ों क उत्पार्दन रिपोर्ट कियार् गयार् है। सर्पगंधार् की इस प्रजार्ति के 18 मार्ह के पौधों से प्रार्प्त जड़ों में 1.64 प्रतिशत से 2.94 प्रतिशत तक एल्कोलार्इड होनार् पार्यार् गयार् है।

बिजाइ की विधि 

सर्पगंधार् की बिजाइ हेतु मुख्यतयार् तीन विधियार्ं प्रचलन में हैं- 1. तने की कलम से प्रवर्धन, 2. जड़ों से प्रवर्धन, 3. बीजों से बिजाइ करने की प्रक्रियार्एं निम्नार्नुसार्र है-

तने की कलमो से प्रवर्धन :-इस विधि में सर्पगंधार् की 6 से 9 इंच लम्बी ऐसी काट ली जार्ती हैं जिनमें कम से कम 3 नोड्स हो। इस सदर्भ में नर्म लकड़ी वार्ली कलमों की बजार्य सख्त लकड़ी (हाडवुड) वार्ली कलमें ज्यार्दार् उपयुक्त रहती हैं। इन कलमों को 30 पी.पी.एम. वार्ले एन्डोल एसिडटिक एसिड वार्ले घोल में 12 घंटे तक डुबोकर रखने के उपरार्न्त इनकी बिजाइ करने के अच्छे परिणार्म देखे गए हैं। इस प्रकार इस घोल में इन कलमों को शोधित करने के उपरार्न्त इन्हें मार्ह मर्इ-जून में नर्सरी में लगार् दियार् जार्तार् है। तथार् नर्सरी में नमी बनाइ रखी जार्ती है। यूं तो इनमें 3-4 दिन में उगार्व प्रार्रंभ हो जार्तार् है परन्तु ट्रार्ंसप्लार्ंटिंग के लिए पौधे लगभग 70-75 दिन में ही तैयार्र हो पार्ते हैं। प्रार्य: इस विधि से 40 से 65 प्रतिशत कलमों में ही उगार्व हो पार्तार् है।

जड़ों की कटिंग्स (रूट कटिंग्स)प्रवर्धन :- जड़ों की कटिंग्स से पौधों क प्रवर्धन तने की कटिंग्स की तुलनार् में ज्यार्दार् सफल रहतार् है। इस विधि से एक से दो इंच लंबी टेप रूट्स की कटिंग्स को खार्द, मिट्टी तथार् रेत मिश्रित पौलीथीन की थैलियों में इन्हें इस प्रकार रखार् जार्तार् है कि पूरी कटिंग मिट्टी से दब जार्ए तथार् यह मिट्टी से मार्त्र 1 से.मी. ही ऊपर रहे। इस प्रकार लगाइ गर्इ 50. प्रतिशत कटिंग्स लगभग एक मार्ह के अंदर अंकुरित हो जार्ती है। परीक्षणों में देखार् गयार् है कि इस प्रकार माच-जून मार्ह में लगाइ गर्इ लगभग 0.5 डार्यमीटर की कटिंग्स में 50 से 80 प्रतिशत तक उगार्व हो जार्तार् है। इस प्रकार से बिजाइ करने हेतु एक एकड़ की बिजाइ करने के लिए लगभग 40 कि.ग्रार्. रूट कटिंग्स की आवश्यकतार् होती है। हार्लार्ंकि इस विधि से बिजाइ करने पर तने की कलमों से बिजाइ करने की अपेक्षार् अधिक उत्पार्दन मिलतार् है परन्तु सर्वार्धिक उत्पार्दन तो बीज से बिजाइ करने पर ही प्रार्प्त होतार् है।

बीज से बिजाइ करनार् : व्यवसार्यिक खेती की दृष्टि से सर्पगंधार् के प्रवर्धन क सर्वोत्तम तरीक इसक बीजों से प्रवर्धन करनार् होतार् है, हार्लार्ंकि बीजों से प्रवर्धन करने के रार्स्ते में सबसे बड़ी समस्यार् बीजों की उगार्व क्षमतार् की है क्योंकि एक तो वैसे भी बीजों क उगार्व कम (10 से 60) प्रतिशत ही होतार् है।, दूसरे बीज जितने पुरार्ने होंगे उनकी उगार्व क्षमतार् उतनी घटती जार्एगी। वैसे यदि एकदम तार्जे बीजों की बिजाइ की जार्ए तो उगार्व क्षमतार् ज्यार्दार् रहती है तथार् 6 मार्ह से ज्यार्दार् पुरार्नार् बीज नहीं लेनार् चार्हिए।

बीज प्रार्प्त करने तथार् इनक ऊपरी छिलक (काले रंग वार्लार् आवरण) उतार्र लेने के उपरार्न्त इनको नर्सरी में तैयार्र कियार् जार्तार् है। इसके लिए लगभग 9 इंच से 1 फीट ऊंची उठी हूर्इ (रेज़्ड) बैड्स बनार् ली जार्ती हैं। इन बीजों को रार्त भर पार्नी में भिगोकर रखार् जार्तार् है तथार् कुछ बीज जो पार्नी के ऊपर तैरते दिखाइ देते हैं उन्हें निकाल दियार् जार्तार् है। बिजाइ से पूर्व इन बीजों को थीरम (3 ग्रार्म प्रति किलो ग्रार्म की दर से) उपचार्रित कियार् जार्नार् उपयोगी रहतार् है। एक एकड़ की खेती के लिए लगभग 500 वर्ग फीट की नर्सरी पर्यार्प्त होती है। नर्सरी के बजार्य बीजों को पोलीथीन की थैलियों में डार्लकर भी पौध तैयार्र की जार् सकती है। नर्सरी अथवार् पौलीथीन की थैलियों में हल्की नमी बनार्कर रखनार् चार्हिए। नर्सरी बनार्ए जार्ने क सर्वार्धिक उपयुक्त समय अप्रैल-मर्इ मार्ह क होतार् है। बीज से पौध तैयार्र करने में एक एकड़ के लिए 2 से 3 कि.ग्रार्. बीज की आवश्यकतार् होती है। प्रार्य: 20 दिन के उपरार्न्त बीजों से उगार्व होनार् प्रार्रंभ हो जार्तार् है तथार् उगार्व की प्रक्रियार् 50 दिन तक चलती है। नर्सरी में लगार्ए गए पौधों पर जब 4 से 6 तक पत्ते आ जार्एं तो उन्हें सुविधार्पूर्वक उखार्ड़ करके मुख्य खेत में लगार् दियार् जार्तार् है। मुख्य खेत में लगार्ने से पूर्व इन छोटे पौधों को गौमूत्र से उपचार्रित करनार् लार्भकारी रहतार् है।

खेत की तैयार्री 

सर्पगंधार् की फसल को कम से कम दो वर्ष तक खेत में रखनार् होतार् है। अत: मुख्य खेत की तैयार्री पर विशेष ध्यार्न दियार् जार्नार् आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम खेत तैयार्र करते समय गहरी जुताइ करके खेत में दो टन केंचुआ खार्द अथवार् चार्र टन कम्पोस्ट खार्द तथार् 15 किग्रार्. बार्योनीमार् जैविक खार्द प्रति एकड़ की दर से मिलार् दी जार्नी चार्हिए। तदुपरार्न्त 45-45 सेमी. की दूरी पर खेत में 15 सेमी. गहराइ के कुंड बनार् दिए जार्ते हैं।

सर्पगंधार् के पौधे

कर्इ बार्र बिनार् कुंड बनार्ए सीधे बजाइ भी की जार् सकती हैं। ऐसी स्थिति में खेत में खुरपी की सहार्यतार् से लगभग 6 इंच गहराइ के गड्ढे बनार्कर नर्सरी में तैयार्र किए गए पौधों को 30-30 सेमी. की दूरी पर रोपित कर दियार् जार्तार् है। इस प्रकार लगार्ए जार्ने पर लार्इन से लार्इन की दूरी 45-45 से.मी. तथार् पौधे से पौधे की दूरी 30-30 सेमी. रहती है। रोपण के तत्काल बार्द पौधों को सिंचाइ दे देनी चार्हिए।

सिंचाइ की व्यवस्थार् 

सर्पगंधार् लम्बे समय (2 सार्ल से अधिक) की फसल है अत: इसकी अच्छी बढ़त के लिए सिंचाइ की व्यवस्थार् होनार् आवश्यक है किन्तु सिंचाइ देने में ज्यार्दार् उदार्रतार् नहीं बरतनी चार्हिए तथार् पौधों को तरसार्-तरसार् करके पार्नी देनार् चार्हिए। यदि पौधे को किन्हीं निश्चित अंतरार्लों पर अपने आप पार्नी दे दियार् जार्ए तो जड़ें पार्नी की तलार्श में नीचे नहीं जार्एंगी अर्थार्त् जड़ों क सही विकास नहीं हो पार्एगार्। अत: सर्पगंधार् के पौधों की सिंचाइ के संदर्भ में विशेष ध्यार्न रखने की आवश्यकतार् होती है तथार् सिंचाइ तभी की जार्नी चार्हिए जब पौधों को इसकी वार्स्तविक आवश्यकतार् हो तथार् पौधे लगभग मुरझार्ने से लग जार्ऐं।

सर्पगंधार् के सार्थ अंर्तवर्तीय फसल 

सर्पगंधार् की खेती जहार्ं कर्इ अन्य फसलों के सार्थ ली जार् सकती है वहीं इसके बीज में कर्इ अन्य औषधीय तथार् अन्य फसलें भी ली जार् सकती हैं। अंतर्वतीय फसल के रूप में इसके सार्थ सोयार्बीन की कम फैलने वार्ली प्रजार्तियों की खेती काफी उपयुक्त रही हैं इसी प्रकार इसकी खेती बार्इबिडंग तथार् आंवलार् आदि जैसे बहुवर्षीय पौधों के सार्थ-सार्थ सफेद मूसली, कालमेघ तथार् भुर्इ आंवलार् आदि जैसे कम अवधि के औषधीय पौधों के सार्थ भी सफलतार्पूर्वक ली जार् सकती है।

सर्पगंधार् की फसल के प्रमुख रोग तथार् बीमार्रियार्ँ 

सर्पगंधार् की जड़ों पर कर्इ प्रकार के कश्मि तथार् नीमैटोड्स विकसित हो सकते हैं। जिससे जड़ों के ऊपर छल्ले जैसे बन जार्ते हैं। इनसे सुरक्षार् सर्पगंधार् की सूखी जड़े़ं के लिए प्रति एकड़ 15 कि.ग्रार्. बार्योनीमार् भूमि में डार्लनार् लार्भकारी रहतार् है। पौधों के पत्तों पर पत्ती लपेटने वार्ले कीड़ों (केटरपिलर्स) क प्रकोप भी हो सकतार् है जिसके लिए 0.2 प्रतिशत रोगोर क स्पे्र कियार् जार् सकतार् है। इसी प्रकार सिरकोस्पोरार् रार्वोल्फाइ नार्मक फफूँद द्वार्रार् पौधे की पत्तियों पर धब्बे डार्ले जार्ने की स्थिति में मार्नसून से पूर्व 0.2 प्रतिशत डार्यथेन जेड-78 अथवार् डार्यथेन एम-45 क छिड़काव करनार् लार्भकारी रहतार् है। इस ्रपकार यूं तो यह फसल बहुधार् कीड़ों तथार् बीमार्रियों के प्रकोप से मुक्त रहती है परन्तु फिर भी उपरोक्तार्नुसार्र वर्णित कुछ रोग फसल पर आ सकते हैं। जिनसे समय रहते सुरक्षार् की जार्नार् आवश्यक होती हैं। विभिन्न जैविक विधियों जैसे नीम की खली क घोल, जैविक कीटनार्शकों जैसे बार्योपैकुनिल तथार् बार्योधन क स्प्रे तथार् गोमूत्र क छिड़काव भी फसल को विभिन्न बीमार्रियों से सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है।

सर्पगंधार् की सूखी जड़े़ं

फसल की वृद्धि तथार् इसकी परिपक्वतार् 

रोपण के लगभग छ: मार्ह के उपरार्न्त सर्पगंधार् के पौधों पर फूल आने प्रार्रंभ हो जार्ते हैं जिन पर फिर फल तथार् बीज बनते हैं। इस संदर्भ में यदि फसल के प्रार्रंभिक दिनों में बीज बनने दिए जार्ए तो जड़ों क विकास प्रभार्वित हो सकतार् है क्योंकि ऐसे में सार्री खार्द्य सार्मग्री (फूड मेटेरियल) फलों तथार् बीजों को चली जार्ती है तथार् जड़ें कमजोर रह सकती हैं। अत: पहली बार्र आने वार्ली फूलों को नार्खून की सहार्यतार् से तोड़ दियार् जार्तार् है तथार् आगे आने वार्ले फूलों, फलों तथार् बीजों को फलने तथार् बढ़ने दियार् जार्तार् है। इनमें से पके हुए फलों को सप्तार्ह में दो बार्र चुन लियार् जार्तार् है। यह सिलसिलार् पौधों को अंतत: उखार्ड़ने तक निरन्तर चलतार् रहतार् है। इसी बीच मार्ह जून-जुलाइ में प्रति एकड़ एक टन केंचुआ खार्द तथार् 15 कि.ग्रार्बार्य ोनीमार् जैविक खार्द ड्रिलिंग करकें खेत में पौधों के पार्स-पार्स डार्ल दी जार्नी चार्हिए।

जैसार् कि पूर्व में वर्णित है, यूं तो सर्पगंधार् की 18 मार्ह की फसल में इसकी जड़ों में पर्यार्प्त तथार् वार्ंछित एल्केलार्इड विकसित हो जार्ते हैं परन्तु पर्यार्प्त मार्त्रार् में जड़ें प्रार्प्त करने के लिए इसे 2-3 अथवार् 4 सार्ल तक खेत में रखार् जार्तार् है। वैसे इसके लिए सर्वार्धिक उपयुक्त अवधि 30 मार्ह तक की है। अत: जब फसल 30 मार्ह अथवार् ढ़ाइ वर्ष की हो जार्ए तथार् सदी के मौसम में (दिसम्बर-जनवरी) में जब पौधों के पत्ते झड़ जार्एं तब जड़ों को खोद लियार् जार्नार् चार्हिए। वैसे भी जड़ों की हार्रवेस्टिंग सर्दी के समय करनार् ही ज्यार्दार् उपयुक्त होतार् है क्योंकि उस समय इनमें एल्केलार्इड्स की मार्त्रार् अधिकतम होती है।

जड़ेंं उखार्ड़ने में विशेष सार्वधार्नियार्ँ 

सर्पगंधार् की फसल के संदर्भ में इसकी जड़ों को उखार्ड़ने में कुछ विशेष सार्वधार्नियार्ं रखने की आवश्यकतार् होती है। क्योंकि इसकी जड़ों की छार्ल में सर्वार्धिक एल्केलार्इड्स की मार्त्रार् होती है तथार् जड़ों क 40 से 55 प्रतिशत भार्ग इस छार्ल क ही होतार् है अत: यह विशेष ध्यार्न रखने की आवश्यकतार् होती है कि जड़ों को उखार्ड़ते समय इनके सार्थ लगी छार्ल को हार्नि न पहुंचे। अत: जड़ों को सार्वधार्नी पूर्वक उखार्ड़ार् जार्नार् चार्हिए। जड़ों को उखार्ड़ने के लिए कुदार्ली क उपयोग भी कियार् जार् सकतार् है तथार् सब-सार्यलर क भी।

उखार्ड़ने से पूर्व खेत में एक हल्की सिंचाइ कर दी जार्ए तो जड़ों को उखार्ड़नार् आसार्न हो जार्तार् है। उखार्ड़ने के उपरार्न्त जड़ों के सार्थ लगी रेत अथवार् मिट्टी को सार्वधार्नी पूर्वक सार्फ करनार् आवश्यक होतार् है। यह भी यह ध्यार्न रखने की आवश्यकतार् होती है कि जड़ों की छार्ल को क्षति न पहुंचे। सार्फ कर लेने के उपरार्न्त इन्हें अच्छी प्रकार सुखार्यार् जार्तार् है। सुखार्ने के उपरार्न्त जड़ों में 8 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं बचनी चार्हिए। सूखने पर ये जड़ें इतनी सूख जार्नी चार्हिए कि तोड़ने पर ये ‘‘खट’’ की आवार्ज से टूट जार्ऐं। इन सूखी हुर्इ जड़ों को सूखी जगह पर जूट के बोरों में रख कर संग्रहित कर लियार् जार्तार् है।

सर्पगंधार् की खेती से कुल प्रार्प्तियार्ं 

विभिन्न विधियों से लगाइ जार्ने वार्ली सर्पगंधार् की फसल से मिलने वार्ली जड़ों की मार्त्रार् में पर्यार्प्त भिन्नतार् पाइ जार्ती है। इस संदर्भ में तने की कलमों की अपेक्षार् जड़ की कलमों (रूट कटिंग्स) तथार् जड़ की कलमों की अपेक्षार् बीज से लगाइ गर्इ फसल में जड़ों की मार्त्रार् ज्यार्दार् पाइ जार्ती है। इसी प्रकार यूं तो 18 मार्ह की फसल में पर्यार्प्त तथार् उपयुक्त एल्केलार्इड्स विकसित हो जार्ते हैं। परन्तु इन्हें जितने ज्यार्दार् समय तक खेत में लगार् रहने दियार् जार्ए उतनी ही उत्तरोत्तर जड़ों की मार्त्रार् बढ़ती जार्ती है। परीक्षणों में यह पार्यार् गयार् है कि दो वर्ष की फसल से प्रति एकड़ 880 किग्रार्. तथार् तीन वर्षार् की फसल से 1320 किग्रार्. सूखी जड़ें प्रार्प्त हुर्इ हैं। इस प्रकार यदि 30 मार्ह की फसल के अनुसार्र अनुमार्न लगार्यार् जार्ए तो एक एकड़ से लगभग 1000 किग्रार्. अथवार् 10 क्विंटल सूखी जड़ों की प्रार्प्ति होगी। वैसे यदि 8 क्विंटल जड़ें भी प्रार्प्त हों तथार् जड़ों की प्रार्प्ति हो तथार् जड़ों की बिक्री दर 80 रू. प्रति किग्रार्. मार्नी जार्ए तो इस फसल से किसार्न को लगभग 65000 रू. की प्रार्प्तियार्ं होगी। इसके सार्थ-सार्थ किसार्न को लगभग 25 किग्रार्. बीज भी प्रार्प्त होंगे जिसकी 1500 रू. प्रति कि.ग्रार्. की दर से बिक्री भी मार्नी जार्ए तो इससे किसार्न को लगभग 35000रू. की अतिरिक्त प्रार्प्तियार्ं होंगी। इस प्रकार इस 30 मार्ह की फसल से किसार्न को लगभग 1 लार्ख रू. प्रति एकड़ की प्रार्प्तियार्ं होंगी। इनमें से यदि विभिन्न कृषि क्रियार्ओं पर होने वार्लार् 24000 रू. क खर्च कम कर दियार् जार्ए तो सर्पगंधार् की फसल से किसार्न को प्रति एकड़ 77500रू. क शुद्ध लार्भ होने की संभार्वनार् है। 

Share:

Leave a Comment

Your email address will not be published.

TOP