समुदार्य क अर्थ एवं परिभार्षार्

हम सभी किसी एक गार्ँव अथवार् नगर में निवार्स करते हैं। प्रत्येक गार्ँव एवं नगर की निश्चित सीमार्एँ होती हैं। इसीलिए गार्ँव एवं नगर समुदार्य के दो प्रमुख उदार्हरण मार्ने जार्ते हैं। व्यक्ति क अपने गार्ँव अथवार् नगर में सार्मार्न्य जीवन व्यतीत होतार् है तथार् वह अपनी पहचार्न अपने गार्ँव यार् नगर के नार्म से करतार् है। यही पहचार्न उनमें ‘हम की भार्वनार्’ क विकास करने में सहार्यक होती है। समुदार्य को समार्जशार्स्त्र की एक प्रमुख अवधार्रणार् मार्नार् जार्तार् है। इसलिए न केवल समुदार्य की अवधार्रणार् को समझनार् आवश्यक है, अपितु यह जार्ननार् भी अनिवाय है कि समुदार्य किस प्रकार समार्ज एवं समिति से भिन्न है।

समुदार्य क अर्थ

समुदार्य’ शब्द अंग्रेजी भार्षार् के ‘कम्यूनिटी’ (Community) शब्द क हिन्दी रूपार्न्तर है जोकि लैटिन भार्षार् के ‘कॉम’ (Com) तथार् ‘म्यूनिस’ (Munis) शब्दों से मिलकर बनार् है। लैटिन में ‘कॉम’ शब्द क अर्थ ‘एक सार्थ’ (Together) तथार् ‘म्यूनिस’ क अर्थ ‘सेवार् करनार्’ (To serve) है, अत: ‘समुदार्य’ क शार्ब्दिक अर्थ ही ‘एक सार्थ सेवार् करनार्’ है। समुदार्य व्यक्तियों क वह समूह है जिसमें उनक सार्मार्न्य जीवन व्यतीत होतार् है। समुदार्य के निर्मार्ण के लिए निश्चित भू-भार्ग तथार् इसमें रहने वार्ले व्यक्तियों में सार्मुदार्यिक भार्वनार् होनार् अनिवाय है।

समुदार्य की परिभार्षार्

  1. बोगाडस (Bogardus) के अनुसार्र-’’समुदार्य एक ऐसार् सार्मार्जिक समूह है जिसमें कुछ अंशों तक हम की भार्वनार् होती है तथार् जो एक निश्चित क्षेत्र में निवार्स करतार् है।” 
  2. डेविस (Davis) के अनुसार्र-”समुदार्य सबसे छोटार् वह क्षेत्रीय समूह है, जिसके अन्तर्गत सार्मार्जिक जीवन के समस्त पहलू आ सकते हैं।” 
  3. ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार्र-”किसी सीमित क्षेत्र के अन्दर रहने वार्ले सार्मार्जिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन को समुदार्य कहार् जार्तार् है।”
  4. मैकाइवर एवं पेज (MacIver and Page) के अनुसार्र-”जहार्ँ कहीं एक छोटे यार् बड़े समूह के सदस्य एक सार्थ रहते हुए उद्देश्य विशेष में भार्ग न लेकर सार्मार्न्य जीवन की मौलिक दशार्ओं में भार्ग लेते हैं, उस समूह को हम समुदार्य कहते है।” 
  5. ग्रीन (Green) के अनुसार्र-”समुदार्य संकीर्ण प्रार्देशिक घेरे में रहने वार्ले उन व्यक्तियों क समूह है जो जीवन के सार्मार्न्य ढंग को अपनार्ते हैं। एक समुदार्य एक स्थार्नीय क्षेत्रीय समूह है।” 
  6. मेन्जर (Manzer) के अनुसार्र-”वह समार्ज, जो एक निश्चित भू-भार्ग में रहतार् है, समुदार्य कहलार्तार् है।”

अत: समुदार्य की विभिन्न परिभार्षार्ओं से स्पष्ट होतार् है कि समुदार्य व्यक्तियों क एक विशिष्ट समूह है जोकि निश्चित भौगोलिक सीमार्ओं में निवार्स करतार् है। इसके सदस्य सार्मुदार्यिक भार्वनार् द्वार्रार् परस्पर संगठित रहते हैं। समुदार्य में व्यक्ति किसी विशिष्ट उद्देश्य की अपेक्षार् अपनी सार्मार्न्य आवश्यकतार्ओं की पूर्ति हेतु प्रयार्स करते रहते हैं।

समुदार्य के आधार्र यार् अनिवाय तत्त्व

मैकाइवर एवं पेज ने समुदार्य के दो आवश्यक तत्त्व बतार्ए हैं-

  1. स्थार्पनीय क्षेत्र-समुदार्य के लिए एक अत्यन्त आवश्यक तत्त्व निवार्स स्थार्न यार् स्थार्नीय क्षेत्र (Locality) क होनार् है। इसकी अनुपस्थिति में समुदार्य जन्म नहीं ले सकतार्। क्षेत्र में निश्चिततार् होने के कारण ही वहार्ँ रहने वार्ले सदस्यों के मध्य घनिष्ठतार्, सहनशीलतार् तथार् सार्मंजस्यतार् की भार्वनार् जार्ग्रत होती है।
  2. सार्मुदार्यिक भार्वनार्-सार्मुदार्यिक भार्वनार् (Community sentiments) की अनुपस्थिति में समुदार्य की कल्पनार् ही नहीं की जार् सकती। सार्मुदार्यिक भार्वनार् को ‘हम की भार्वनार्’ (We feeling) भी कहार् जार्तार् है। इस भार्वनार् क जन्म होने क कारण एक निश्चित क्षेत्र, सदस्यों के कार्य करने क सार्मार्न्य ढंग तथार् प्रत्येक सदस्य क एक-दूसरे के दु:ख व सुख से परिचित हो जार्नार् है। दूसरे की खुशी उनकी खुशी व दूसरे क दु:ख उनक स्वयं क दु:ख होतार् है। वे अनुभव करते हैं कि ‘हम एक हैं’। वस्तुत: यह एक ऐसी भार्वनार् है जो समुदार्य से दूर चले जार्ने के बार्द भी बनी रहती है।

किंग्सले डेविस ने भी समुदार्य के दो आधार्रभूत तत्त्वों क विवेचन कियार् है-

  1. प्रार्देशिक निकटतार्-सदैव ही कुछ स्थार्नों पर आवार्सों के समूह पार्ए जार्ते हैं, किसी दूसरे समूह के व्यक्तियों की तुलनार् में व्यक्ति अपने समूह में ही अन्तर्क्रियार् करनार् सरल समझते हैं। निकटतार् सम्पर्क को सुगम बनार्ती है। यह सुरक्षार् की भार्वनार् भी प्रदार्न करती है तथार् समूह के संगठन को सुविधार्जनक बनार्ती है। बिनार् प्रार्देशिक निकटतार् (Territorial proximity) के किसी भी समुदार्य की कल्पनार् नहीं की जार् सकती है।
  2. सार्मार्जिक पूर्णतार्-डेविस के अनुसार्र समुदार्य सबसे छोटार् प्रार्देशिक समूह होतार् है। यह सार्मार्जिक जीवन के समस्त पहलुओं क आलिंगन करतार् है। यह उन समस्त विस्तृत संस्थार्ओं, समस्त दलों तथार् रुचियों को सम्मिलित करतार् है जो समार्ज क निर्मार्ण करती हैं। व्यक्ति अपनार् अधिकांश सार्मार्जिक जीवन समुदार्य में ही व्यतीत करतार् है। इसी को सार्मार्जिक पूर्णतार् (Social completeness) कहार् जार्तार् है।

सार्मुदार्यिक भार्वनार् के अनिवाय तत्व

  1. हम की भार्वनार्- हम की भार्वनार् (We feeling) सार्मुदार्यिक भार्वनार् क प्रमुख अंग है। इस भार्वनार् के अन्तर्गत सदस्यों में ‘मैं’ की भार्वनार् नहीं रहती है। लोग मार्नते हैं कि यह हमार्रार् समुदार्य है, हमार्री भलार्ई इसी में है यार् यह हमार्रार् दु:ख है। सोचने तथार् कार्य करने में भी हम की भार्वनार् स्पष्ट दिखार्ई देती है। इसके कारण सदस्य एक-दूसरे से अपने को बहुत समीप मार्नते हैं। इसी भार्वनार् के आधार्र पर कुछ वस्तुओं, स्थार्नों व व्यक्तियों को अपनार् मार्नार् जार्तार् है व उनके सार्थ विशेष लगार्व रहतार् है। यह भार्वनार् सार्मार्न्य भौगोलिक क्षेत्र में लम्बी अवधि तक निवार्स करने के कारण विकसित होती है।
  2. दार्यित्व की भार्वनार्-सदस्य समुदार्य के कार्यों को करनार् अपनार् दार्यित्व समझते हैं। वे अनुभव करते हैं कि समुदार्य के लिए कार्यों को करनार्, उनमें हिस्सार् लेनार्, दूसरे सदस्यों की सहार्यतार् करनार् आदि उनक कर्त्तव्य एवं दार्यित्व हैं। इस प्रकार, सदस्य समुदार्य के कार्यों में योगदार्न तथार् दार्यित्व की भार्वनार् (Role feeling) रखते हैं।
  3. निर्भरतार् की भार्वनार् –समुदार्य क प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्य के अस्तित्व को स्वीकार करतार् है। वह स्वीकार करतार् है कि वह दूसरे सदस्यों पर निर्भर है। सदस्य क स्वयं क अस्तित्व समुदार्य में पूर्णत: मिल जार्तार् है। वह बिनार् समुदार्य के अपनार् अस्तित्व नहीं समझतार् है। अन्य शब्दों में यह निर्भरतार् की भार्वनार् (Dependency feeling) ही है जिससे प्रत्येक सदस्य समुदार्य पर ही निर्भर करतार् है।

समुदार्य की प्रमुख विशेषतार्एँ

  1. व्यक्तियों क समूह-समुदार्य निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवार्स करने वार्ले व्यक्तियों क मूर्त समूह है। समुदार्य क निर्मार्ण एक व्यक्ति से नहीं हो सकतार् अपितु समुदार्य के लिए व्यक्तियों क समूह होनार् आवश्यक है।
  2. सार्मार्न्य जीवन-प्रत्येक समुदार्य में रहने वार्ले सदस्यों क रहन-सहन, भोजन क ढंग व धर्म सभी काफी सीमार् तक सार्मार्न्य होते हैं। समुदार्य क कोई विशिष्ट लक्ष्य नहीं होतार् है। समुदार्य के सदस्य अपनार् सार्मार्न्य जीवन समुदार्य में ही व्यतीत करते हैं।
  3. सार्मार्न्य नियम-जिन्सबर्ग ने इसे समुदार्य की प्रमुख विशेषतार् मार्नार् है। समुदार्य के समस्त सदस्यों के व्यवहार्र सार्मार्न्य नियमों द्वार्रार् नियन्त्रित होते हैं। जब सभी व्यक्ति सार्मार्न्य नियमों के अन्तर्गत कार्य करते हैं तब उनमें समार्नतार् की भार्वनार् क विकास होतार् है। यह भार्वनार् समुदार्य में पार्रस्परिक सहयोग की वृद्धि करतार् है।
  4. विशिष्ट नार्म-प्रत्येक समुदार्य क कोई न कोई नार्म अवश्य होतार् है। इसी नार्म के कारण ही सार्मुदार्यिक एकतार् क जन्म होतार् है। समुदार्य क नार्म ही व्यक्तियों में अपनेपन की भार्वनार् को प्रोत्सार्हित करतार् है।
  5. स्थार्यित्व-समुदार्य चिरस्थार्ई होतार् है। इसकी अवधि व्यक्ति के जीवन से लम्बी होती है। व्यक्ति समुदार्य में जन्म लेते हैं, आते हैं तथार् चले जार्ते हैं, परन्तु इसके बार्वजूद समुदार्य क अस्तित्व बनार् रहतार् है। इसी कारण यह स्थार्यी संस्थार् है।
  6. स्वत: जन्म-समुदार्य को विचार्रपूर्वक किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु निर्मित नहीं कियार् जार्तार् है। इसक स्वत: विकास होतार् है। जब कुछ लोग एक स्थार्न पर रहने लगते हैं तो अपनेपन की भार्वनार् क जन्म होतार् है। इससे समुदार्य के विकास में सहार्यतार् मिलती है। 
  7. निश्चित भौगोलिक क्षेत्र-समुदार्य क एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होतार् है। दूसरे शब्दों में यह कहार् जार् सकतार् है कि समुदार्य के सभी सदस्य निश्चित भौगोलिक सीमार्ओं के अन्तर्गत ही निवार्स करते हैं।
  8. अनिवाय सदस्यतार्-समुदार्य की सदस्यतार् अनिवाय होती है। यह व्यक्ति की इच्छार् पर निर्भर नहीं करती। व्यक्ति जन्म से ही उस समुदार्य क सदस्य बन जार्तार् है जिसमें उसक जन्म हुआ है। सार्मार्न्य जीवन के कारण समुदार्य से पृथक् रहकर व्यक्ति की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति नहीं हो सकती है।
  9. सार्मुदार्यिक भार्वनार्-सार्मुदार्यिक भार्वनार् ही समुदार्य की नींव है। समुदार्य के सदस्य अपने हितों की पूर्ति के लिए ही नहीं सोचते। वे सम्पूर्ण समुदार्य क ध्यार्न रखते हैं। हम की भार्वनार्, दार्यित्व तथार् निर्भरतार् की भार्वनार् हैं जोकि सार्मुदार्यिक भार्वनार् के तीन तत्त्व हैं, समुदार्य के सभी सदस्यों को एक सूत्र में बार्ँधने में सहार्यतार् देते हैं।
  10. आत्म-निर्भरतार्-सार्मार्न्य जीवन एवं आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के कारण समुदार्य में आत्म-निर्भरतार् पार्ई जार्ती है। प्रार्चीन समार्जों में समुदार्य काफी सीमार् तक आत्म-निर्भर थे, परन्तु आज यह विशेषतार् प्रार्य: समार्प्त हो गई है।

सीमार्वर्ती समुदार्यों के कुछ उदार्हरण

गार्ँव, कस्बार्, कोई नई बस्ती, नगर, रार्ष्ट्र, जनजार्ति (जोकि एक निश्चित क्षेत्र में निवार्स करती है) इत्यार्दि समुदार्यों के प्रमुख उदार्हरण हैं। इनमें समुदार्य के लगभग सभी आधार्रभूत तत्त्व तथार् विशेषतार्एँ पार्ई जार्ती हैं। परन्तु कुछ ऐसे समूह अथवार् संगठन भी हैं जिनमें समुदार्य की कुछ विशेषतार्एँ तो पार्ई जार्ती हैं परन्तु कुछ नहीं। ऐसे समूहों को सीमार्वर्ती समुदार्यों की संज्ञार् दी जार्ती है। समुदार्य की कुछ विशेषतार्एँ न होने के कारण इन्हें पूरी तरह से समुदार्य नहीं मार्नार् जार् सकतार् है। जार्ति, जेल, पड़ोस, तथार् रार्ज्य सीमार्वर्ती समुदार्यों के उदार्हरण हैं। ये समुदार्य तो नहीं हैं परन्तु समुदार्य की कुछ विशेषतार्ओं क इनमें समार्वेश होने के कारण इनके समुदार्य होने क भ्रम उत्पन्न होतार् है। आइए, अब हम ऐसे कुछ सीमार्वर्ती समुदार्यों पर विचार्र करें।

क्यार् जार्ति एक समुदार्य है?

जार्ति व्यवस्थार् भार्रतीय समार्ज में सार्मार्जिक स्तीकरण क एक प्रमुख स्वरूप है। जार्ति एक अन्तर्विवार्ही (Endogamous) समूह है। इसकी सदस्यतार् जन्म द्वार्रार् निर्धार्रित होती है। विभिन्नि जार्तियों की स्थिति एक समार्न नहीं होती। इनमें ऊँच-नीच क एक स्वीकृत क्रम होतार् है। इसमें एक जार्ति द्वार्रार् दूसरी जार्तियों से सम्पर्क की स्थार्पनार् को स्पर्श, सहयोग, भोजन, निवार्स आदि के प्रतिबन्धों द्वार्रार् बहुत सीमित कर दियार् जार्तार् है। परन्तु जार्ति में समुदार्य की अनेक विशेषतार्एँ (जैसे अनिवाय सदस्यतार् आदि) होने के बार्वजूद इसे समुदार्य नहीं कहार् जार् सकतार्। जार्ति क कोई निश्चित भौगोलिक क्षेत्र नहीं होतार् अर्थार्त् एक ही जार्ति के सदस्य एक स्थार्न पर नहीं रहते अपितु अनेक क्षेत्रों व प्रदेशों में रहते हैं। उसमें सार्मुदार्यिक भार्वनार् क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। निश्चित भौगोलिक क्षेत्र न होने के कारण इसमें व्यक्तियों क सार्मार्न्य जीवन भी व्यतीत नहीं होतार् है। अत: जार्ति को एक समुदार्य नहीं कहार् जार् सकतार् है।

क्यार् पड़ोस एक समुदार्य है?

आज पड़ोस समुदार्य नहीं है। पहले पड़ोस में हम की भार्वनार्, आश्रिततार् की भार्वनार् इत्यार्दि समुदार्य के लक्षण पार्ए जार्ते थे। इसीलिए कुछ विद्वार्न् पड़ोस को एक समुदार्य मार्नते थे। परन्तु आज जटिल समार्जों में अथवार् नगर-रार्ज्य प्रकृति वार्ले समार्जों में पड़ोस समुदार्य नहीं है। इसमें न ही तो सार्मुदार्यिक भार्वनार् पार्ई जार्ती है, न ही सार्मार्न्य नियमों की कोई व्यवस्थार् ही। पड़ोस क विकास भी समुदार्य की भार्ँति स्वत: नहीं होतार् है। अत्यधिक गतिशीलतार् के कारण पड़ोस में रहने वार्लों में स्थार्यीपन क भी अभार्व पार्यार् जार्तार् है।

क्यार् जेल एक समुदार्य है?

जेल (बन्दीगृह) को भी समुदार्य की अपेक्षार् सीमार्वर्ती समुदार्य क उदार्हरण मार्नार् जार्तार् है। जेल में समुदार्य के अनेक लक्षण पार्ए जार्ते हैं। यह व्यक्तियों क समूह है। इसक एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होतार् है, इसके सदस्यों में कुछ सीमार् तक हम की भार्वनार् पार्ई जार्ती है, इसमें रहने के कुछ सर्वमार्न्य नियम होते हैं तथार् इसक एक विशिष्ट नार्म होतार् है। मैकाइवर एवं पेज ने जेल को समुदार्य कहार् है क्योंकि यह (यथार् विहार्र व आश्रम जैसे अन्य समूह) प्रार्देशिक आधार्र पर बने होते हैं। वार्स्तव में ये सार्मार्जिक जीवन के क्षेत्र ही हैं। उन्होंने जेल में कार्यकलार्पों के सीमित क्षेत्र के तर्क को अस्वीकार कर दियार् क्योंकि मार्नवीय कार्यकलार्प ही सदैव समुदार्य की प्रकृति के अनुरूप परिणत होते हैं। परन्तु जेल को समुदार्य नहीं मार्नार् जार् सकतार्-एक तो इसमें कैदियों क सार्मार्न्य जीवन व्यतीत नहीं होतार् अर्थार्त् वे सार्मार्न्य जीवन में भार्गीदार्र नहीं होते हैं। दूसरे, उनमें सार्मुदार्यिक भार्वनार् क भी अभार्व पार्यार् जार्तार् है। तीसरे, जेल क विकास भी स्वत: नहीं होतार् है। अत: जेल एक समुदार्य नहीं है।

क्यार् रार्ज्य एक समुदार्य है?

रार्ज्य भी व्यक्तियों क समूह है। इसमें समुदार्य के अनेक अन्य लक्षण (जेसे विशिष्ट नार्म, निश्चित भौगोलिक क्षेत्र, मूर्त समूह, नियमों की व्यवस्थार् इत्यार्दि) पार्ए जार्ते हैं। परन्तु रार्ज्य को समुदार्य नहीं मार्नार् जार् सकतार् है। समुदार्य के विपरीत, रार्ज्य के निश्चित उद्देश्य होते हैं। रार्ज्य निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनार्यार् गयार् समूह है, न कि सार्मार्न्य व सर्वमार्न्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए। सार्थ ही, इसक विकास स्वत: नहीं होतार् अपितु यह व्यक्तियों के चेतन प्रयार्सों क परिणार्म है।

जार्ति, पड़ोस, जेल (बन्दीगृह) तथार् रार्ज्य की तरह रार्जनीतिक दल, धामिक संघ, क्लब, परिवार्र इत्यार्दि भी सीमार्वर्ती समुदार्यों के उदार्हरण हैं। इनमें भी कुछ विशेषतार्एँ समुदार्य की पार्ई जार्ती हैं तो कुछ विशेषतार्एँ समिति की होती हैं। ये समुदार्य तो नहीं हैं परन्तु कुछ विशेषतार्ओं के कारण इनके समुदार्य होने क भ्रम उत्पन्न होतार् है। गार्ँव, नगर, शरणाथियों के कैम्प, जनजार्ति तथार् खार्नार्बदोशी झुण्ड सीमार्वर्ती समुदार्य के प्रमुख उदार्हरण मार्ने जार्ते हैं क्योंकि इनमें समुदार्य के आधार्रभूत तत्त्व एवं प्रमुख विशेषतार्एँ पार्ई जार्ती हैं।

ग्रार्मीण एवं नगरीय समुदार्य में अन्तर

समुदार्य को दो प्रमुख श्रेणियों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-ग्रार्मीण समुदार्य तथार् नगरीय समुदार्य। प्रार्रम्भ में व्यक्ति को खेती करने क ज्ञार्न नहीं थार्। वह खार्ने-पीने की वस्तुएँ जुटार्ने के लिए इधर-उधर भटकतार् फिरतार् थार्। किन्तु शनै: शनै: उसने खेती करनार् सीखार्। जहार्ँ उपजार्ऊ जमीन थी, वहीं पर कुछ लोग स्थार्यी रूप से बस गए और खेती करने लगे। इस प्रकार कुछ परिवार्रों के लोगों के एक ही भू-खण्ड पर निवार्स करने, सुख-दु:ख में एक-दूसरे क हार्थ बँटार्ने और मिलकर प्रकृति से संघर्ष करने में उनमें सार्मुदार्यिक भार्वनार् क विकास हुआ। इसी से ग्रार्मीण समुदार्य की उत्पत्ति हुई। ग्रार्मीण समुदार्य की परिभार्षार् देनार् एक कठिन कार्य है क्योंकि गार्ँव की कोई एक सर्वमार्न्य परिभार्षार् नहीं है।

गार्ँव अथवार् ग्रार्मीण समुदार्य क अर्थ परिवार्रों क वह समूह कहार् जार् सकतार् है जो एक निश्चित क्षेत्र में स्थार्पित होतार् है तथार् जिसक एक विशिष्ट नार्म होतार् है। गार्ँव की एक निश्चित सीमार् होती है तथार् गार्ँववार्सी इस सीमार् के प्रति सचेत होते हैं। उन्हें यह पूरी तरह से पतार् होतार् है कि उनके गार्ँव की सीमार् ही उसे दूसरे गार्ँवों से पृथक् करती है। इस सीमार् में उस गार्ँव के व्यक्ति निवार्स करते हैं, कृषि तथार् इससे सम्बन्धित व्यवसार्य करते हैं तथार् अन्य कार्यों क सम्पार्दन करते हैं। सिम्स (Sims) के अनुसार्र, “गार्ँव वह नार्म है, जो कि प्रार्चीन कृषकों की स्थार्पनार् को सार्धार्रणत: दर्शार्तार् है।”

समार्जशार्स्त्रीय दृष्टिकोण से गार्ँवों क उद्भव सार्मार्जिक संरचनार् में आए उन महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों से हुआ जहार्ँ खार्नार्बदोशी जीवन की पद्धति, जो शिकार, भोजन संकलन तथार् अस्थार्यी कृषि पर आधार्रित थी, क संक्रमण स्थार्यी जीवन में हुआ। आर्थिक तथार् प्रशार्सनिक शब्दों में गार्ँव तथार् नगर बसार्वट के दो प्रमुख आधार्र जनसंख्यार् क घनत्व तथार् कृषि-आधार्रित आर्थिक क्रियार्ओं क अनुपार्त है। गार्ँव में जनसंख्यार् क घनत्व कम होतार् है तथार् अधिकांश जनसंख्यार् कृषि एवं इससे सम्बन्धित व्यवसार्यों पर आधार्रित होती है।

नगर अथवार् नगरीय समुदार्य से अभिप्रार्य एक ऐसी केन्द्रीयकृत बस्तियों के समूह से है जिसमें सुव्यवस्थित केन्द्रीय व्यार्पार्र क्षेत्र, प्रशार्सनिक इकाई, आवार्गमन के विकसित सार्धन तथार् अन्य नगरीय सुविधार्एँ उपलब्ध होती हैं। नगर की परिभार्षार् देनार् भी कठिन कार्य है। अनेक विद्वार्नों ने नगर की परिभार्षार् जनसंख्यार् के आकार तथार् घनत्व को सार्मने रखकर देने क प्रयार्स कियार् है। किंग्सले डेविस (Kingsley Davisद्ध इससे बिल्कुल सहमत नहीं हैं। उनक कहनार् है कि सार्मार्जिक दृष्टि से नगर परिस्थितियों की उपज होती है। उनके अनुसार्र नगर ऐसार् समुदार्य है जिसमें सार्मार्जिक, आर्थिक तथार् रार्जनीतिक विषमतार् पार्ई जार्ती है। यह कृत्रिमतार्, व्यक्तिवार्दितार्, प्रतियोगितार् एवं घनी जनसंख्यार् के कारण नियन्त्रण के औपचार्रिक सार्धनों द्वार्रार् संगठित होतार् है। सोमबर्ट (Sombart) ने घनी जनसंख्यार् पर बल देते हुए इस सन्दर्भ में कहार् है कि “नगर वह स्थार्न है जो इतनार् बड़ार् है कि उसके निवार्सी परस्पर एक-दूसरे को नहीं पहचार्नते हैं।” निश्चित रूप से नगरीय समुदार्य क विस्तार्र ग्रार्मीण समुदार्य की तुलनार् में अधिक बड़े क्षेत्र पर होतार् है।

ग्रार्मीण एवं नगरीय समुदार्यों में अन्तर करनार् एक कठिन कार्य है, क्योंकि इन दोनों में कोई स्पष्ट विभार्जन रेखार् नहीं खींची जार् सकती है। वार्स्तव में, ग्रार्मीण तथार् नगरीय समुदार्यों की विशेषतार्एँ आज इस प्रकार आपस में मिल गई हैं कि कुछ विद्वार्नों ने ग्रार्म-नगर सार्ंतत्यक (Rural-urban continuum) की बार्त करनी शुरू कर दी है। दोनों में अन्तर करने की कठिनार्इयों के बार्वजूद कुछ बिन्दुओं के आधार्र पर अन्तर कियार् जार् सकतार् है। ग्रार्मीण एवं नगरीय समुदार्यों में प्रमुख बिन्दुओं के आधार्र पर अन्तर पार्ए जार्ते हैं-

  1. व्यवसार्य-ग्रार्मीण समुदार्य में व्यक्ति अधिकतर कृषि व्यवसार्य पर आश्रित हैं। नगरीय समुदार्य में व्यवसार्यों में भिन्नतार् होती है। नगरीय समुदार्यों में एक ही परिवार्र के सदस्य भी भिन्न-भिन्न तरह के व्यवसार्य करते हैं।
  2. प्रकृति के सार्थ सम्बन्ध-ग्रार्मीण व्यक्तियों क प्रकृति से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है तथार् वे अपने व्यवसार्य के लिए भी प्रार्कृतिक सार्धनों पर आश्रित हैं। नगरीय समुदार्य में प्रकृति से पृथक्करण पार्यार् जार्तार् है एवं कृत्रिम वार्तार्वरण की प्रधार्नतार् पार्ई जार्ती है।
  3. समुदार्य क आकार-ग्रार्मीण समुदार्यों में सदस्यों की संख्यार् सीमित होती है। लघुतार् के कारण सम्बन्ध प्रत्यक्ष तथार् व्यक्तिगत होते हैं। नगरीय समुदार्य क आकार बड़ार् होतार् है तथार् सभी सदस्यों में प्रत्यक्ष सम्बन्ध सम्भव नहीं हैं।
  4. जनसंख्यार् क घनत्व-ग्रार्मीण समुदार्य में जनसंख्यार् कम होती है। विस्तृत खेतों के कारण जनसंख्यार् क घनत्व भी बहुत कम पार्यार् जार्तार् है। इससे अनौपचार्रिकतार्, प्रत्यक्ष एवं सहज सम्बन्ध स्थार्पित करने में सहार्यतार् मिलती है। नगरीय समुदार्य में जनसंख्यार् क घनत्व अधिक पार्यार् जार्तार् है। इसलिए बड़े नगरों में स्थार्न कम होने के कारण जनसंख्यार् के आवार्स की समस्यार् अधिक पार्ई जार्ती है।
  5. सजार्तीयतार् तथार् विजार्तीयतार्-ग्रार्मीण समुदार्य के सदस्यों क व्यवसार्य एक-सार् होतार् है। उनक रहन-सहन, खार्न-पार्न, रीति-रिवार्ज तथार् जीवन-पद्धति भी एक जैसी होती है, अत: उनके विचार्रों में भी समार्नतार् पार्ई जार्ती है। नगरीय समुदार्य में रहन-सहन में पर्यार्प्त अन्तर होतार् है। इसमें विजार्तीयतार् अधिक पार्ई जार्ती है। सदस्यों की जीवन-पद्धति एक जैसी नहीं होती है।
  6. सार्मार्जिक स्तरीकरण तथार् विभिन्नीकरण-ग्रार्मीण समुदार्य में आयु तथार् लिंग के आधार्र पर विभिन्नीकरण बहुत ही कम होतार् है। इसमें जार्तिगत स्तरीकरण की प्रधार्नतार् होती है। नगरीय समुदार्य में विभिन्नीकरण अधिक पार्यार् जार्तार् है। इसमें स्तरीकरण क आधार्र केवल जार्ति न होकर वर्ग भी होतार् है।
  7. सार्मार्जिक गतिशीलतार्-ग्रार्मीण समुदार्य के सदस्यों में सार्मार्जिक गतिशीलतार् बहुत कम पार्ई जार्ती है। व्यवसार्य तथार् सार्मार्जिक जीवन एक होने के कारण गतिशीलतार् की अधिक सम्भार्वनार् भी नहीं रहती। व्यक्ति की प्रस्थिति प्रदत्त आधार्र (जैसे जार्ति, परिवार्र इत्यार्दि) पर निर्धार्रित होती है। नगरीय समुदार्य में सार्मार्जिक तथार् व्यार्वसार्यिक गतिशीलतार् अधिक पार्ई जार्ती है। व्यक्ति अर्जित गुणों के आधार्र पर प्रस्थिति प्रार्प्त करतार् है।
  8. सार्मार्जिक अन्तर्क्रियार्ओं की व्यवस्थार्-ग्रार्मीण समुदार्य में अन्तर्क्रियार्ओं क क्षेत्र भी सीमित होतार् है। नगरीय समुदार्य में व्यक्तियों में सम्पर्क अधिक होते है तथार् अन्तर्क्रियार्ओं क क्षेत्र अधिक विस्तृत होतार् है।
  9. प्रार्थमिक तथार् द्वितीयक सम्बन्ध-सीमित आकार होने के कारण ग्रार्मीण समुदार्य में प्रार्थमिक सम्बन्ध पार्ए जार्ते हैं। सम्बन्धों में अनौपचार्रिकतार्, सहजतार् तथार् सहयोग पार्यार् जार्तार् है। सम्बन्ध स्वयं सार्ध्य हैं। ये किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्थार्पित नहीं किए जार्ते हैं। अधिक विस्तृत क्षेत्र होने के कारण नगरीय समुदार्य में द्वितीयक सम्बन्ध पार्ए जार्ते हैं। सम्बन्धों में औपचार्रिकतार् अथवार् कृत्रिमतार् पार्ई जार्ती है।
  10. धर्म की महत्तार्-ग्रार्मीण समुदार्य में धर्म अधिक महत्त्वपूर्ण स्थार्न रखतार् है। जीवन के प्रत्येक पहलू में धामिक विचार्रों की प्रभुतार् स्पष्ट देखी जार् सकती है। नगरीय समुदार्य में धर्म की महत्तार् कम होती है। वहार्ँ धर्मनिरपेक्ष विचार्रधार्रार्एँ अपेक्षार्कृत अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं। 
  11. सार्मार्जिक नियन्त्रण-ग्रार्मीण समुदार्य में परम्परार्ओं, प्रथार्ओं, जनरीतियों तथार् लोकाचार्रों की प्रधार्नतार् पार्ई जार्ती है। सार्मार्जिक नियन्त्रण भी इन्हीं अनौपचार्रिक सार्धनों द्वार्रार् रखार् जार्तार् है। नगरीय समुदार्य में प्रथार्ओं, परम्परार्ओं व लोकाचार्रों से नियन्त्रण करनार् सम्भव नहीं है। नगरों में औपचार्रिक नियन्त्रण के सार्धन जैसे रार्ज्य, कानून, शिक्षार् आदि अधिक महत्त्वपूर्ण हो जार्ते हैं।

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