समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन क्यार् है ?

सार्मार्जिक सेवार्ओं से सम्बन्धित विभिन्न समार्न अथ्री शब्दों जैसे सार्मार्जिक प्रशार्सन, समार्ज सेवार् प्रशार्सन, सार्मार्जिक सुरक्षार् प्रशार्सन, कल्यार्ण प्रशार्सन, लोक कल्यार्ण प्रशार्सन, सार्मार्जिक संस्थार् प्रशार्सन के कारण समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के वार्स्तविक अर्थ के सम्बन्ध भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती हैए परन्तु वार्स्तव में समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन उस क्रियार्विधि को कहते है जिसके द्वार्रार् सार्मार्जिक संस्थार् अपनी निर्धार्रित नीति और उद्देश्यों की पूर्ति के हेतु समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रमों के आयोजनों के लिए व्यार्वसार्यिक कुशलतार् और सार्मथ्र्य क उपयोग करती है। समुदार्य को प्रभार्वशार्ली और सुदृढ़ सेवार्एँ प्रदार्न करने के लिए सार्मार्जिक संस्थार् को कुछ प्रशार्सनिक, वित्तीय और विधि सम्बन्धी नियमों क पार्लन करनार् पड़तार् है। इन्ही तीनों के सम्मिश्रण को ‘समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन’ क नार्म दियार् गयार् है।

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के अन्तर्गत उन दुर्बल वर्गो के लिए आयोजित सेवार्एँ आती है, जो किसी सार्मार्जिक, आर्थिक, शार्रीरिक, यार् मार्नसिक बार्धार् के कारण उपलब्ध सार्मार्जिक सेवार्ओं क उपयोग करने में असमर्थ हो अथवार् परंपरार्गत धार्रणार्ओं और विश्वार्सों के कारण उनको इन सेवार्ओं से वार्ंिछत रखार् जार्तार् है। समार्ज कल्यार्ण के कार्यक्षेत्र में बार्लकों, महिलार्ओं, वृद्धों, अशक्तों, बार्धित व्यक्तियों, पिछड़ी हुर्इ जार्तियों, आदिवार्सियों आदि के लिए सार्मार्जिक सेवार्ओं और समार्ज कल्यार्ण उपार्यों की व्यवस्थार् आती है।

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की परिभार्षार् 

  1. जॉन किडनाइ (1957) समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन सार्मार्जिक नीति को समार्ज सेवार्ओं में बदलने की एक प्रक्रियार् है। 
  2. रार्जार् रार्म शार्स्त्री (1970)सार्मार्जिक अभिकरण तथार् सरकारी कल्यार्ण कार्यक्रमों से संबंधित प्रशार्सन को समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन कहते है। यद्यपि इसकी विधियार्ँ, प्रविधियार्ँ, तौर-तरीके, इत्यार्दि भी लोक प्रशार्सन यार् व्यार्पार्र प्रशार्सन की ही भार्ँति होते है। किन्तु इसमें एक बुनियार्दी भेद यह होतार् है कि इसमें सभी स्तरों पर मार्न्यतार्ओं और जनतंत्र क अधिक से अधिक ध्यार्न रखते हुए ऐसे व्यक्तियों यार् वर्ग से सम्बन्धित प्रशार्सन कियार् जार्तार् है जो बार्धित होते है। 
  3. डनहम (1949) समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन को उन क्रियार् कलार्पों में सहार्यतार् प्रदार्न करने तथार् आगे बढार्ने में योगदार्न देने के रूप में परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है जो किसी सार्मार्जिक संस्थार् द्वार्रार् प्रत्यक्ष सेवार् करने के लिए अनिवाय है। 

कल्यार्ण प्रशार्सन के प्रमुख क्षेत्र 

1. महिलार् कल्यार्ण –

केन्द्र और प्रार्न्तिय सरकारों तथार् केन्द्र शार्सित प्रदेशों ने महिलार्ओं की सार्मार्जिक और आर्थिक स्थिति को सुधार्रने के लिए अनेक कार्यक्रम आरम्भ किये और महिलार् दशक में उनकी सार्तत्यतार् को बनार्ये रखने के लिए, उनकी प्रगति और प्रसार्र के प्रयार्सों को तेज कियार्। बहुत सी प्रदेश की सरकारों ने आरम्भिक बार्ल सेवार्ओं के समेकित प्रदार्न की भूमिक को पहचार्नते हुए अपने प्रदेशों में केन्द्र द्वार्रार् समर्थित समेकित शिशु विकास सेवार्ओं को उनके क्रियार्न्वयन के लिए लियार्। इनक प्रभार्व शिशु ओं और मतार्ओं इन सब के जीवन पर पड़ार् है जिसक प्रमार्ण जन्म के समय शिशु क भार्र बढ़नार्, अपोषक अहार्र की घटनार्ओं में कमी उतनार्, टीकाकरण में वृद्धि होनार्, शिशु मृत्यु दर क घटनार् तथार् जन्म और मृत्यु दरों में घटार्व है।

2. बार्ल कल्यार्ण-

प्रत्येक वर्ष श्री जवार्हरलार्ल नेहरू क जन्म दिन 14 नवम्बर को प्रत्येक वर्ष बार्ल दिवस के रूप में मनार्यार् जार्तार् हैं। बार्ल कल्यार्ण बच्चों के प्रति रार्ष्ट्रीय चिन्तार् बच्चों के अधिकारों एवं उनके प्रति सरकार, समार्ज एवं परिवार्र के दार्यित्वों से सम्बन्धित एवं विधार्यी प्रार्वधार्नों से परिलक्षित है संविधार्न के अनचुछेद 15 में अंकित है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखार्ने अथवार् खार्न अथवार् किसी अन्य खतरनार्क रोजगार्र में नही लगार्यार् जार्येगार्। रार्ज्य नीति के निर्देषक सिद्धार्न्तों की धार्रार् 39 में इस बार्त को सुनिष्चितकियार् गयार् है कि आर्थिक आवश्यकतार् से बार्ध्य होकर बच्चों को उनकी आयु एवं शक्ति के आयोग किसी व्यवसार्य में कार्य न करनार् पडे़। इसमें यह भी वर्णित है कि बच्चों को स्वतंत्रतार् की स्थितियों में स्वस्थ्य ढ़ग से विकसित होने के अवसर एवं सुविधार्यें दी जार्एँ तथार् बचपन एवं यौवन की शोषण एवं नैतिक एवं भौतिक परित्यार्ग से रक्षार् की जार्ए। धार्रार् 45 के अंतर्गत रार्ज्यों से 14 वर्ष के आयु के सभी बच्चों के लिए निशुल्क एवं अनिवाय शिक्षार् प्रदार्न करने के लिए कहार् गयार् है।

3. रार्ष्ट्रीय बार्ल नीति-

विभिन्न पंचवष्रीय योजनार्ओं की विषय वस्तु बच्चों के प्रति सरकार की नीति क महत्वपूर्ण दर्पण है। प्रथम चार्र पंचवर्षिय योजनार्ओं से प्रार्प्त अनुभव, स्वतंत्रतार् उपरार्ंत अनेक विभिन्न समितियों यथार् भार्रत सरकार के द्वार्रार् 1959 में नियुक्ति स्वार्स्थ्य सर्वे एवं नियोजन समिति, केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण बोर्ड द्वार्रार् 1960 में स्थार्पित समार्ज कल्यार्ण एवं पिछड़े वर्गो के कल्यार्ण पर अध्ययन दल, समार्ज कल्यार्ण विभार्ग द्वार्रार् 1967 में नियुक्ति बार्ल कार्यक्रम-निर्मार्ण समिति, शिक्षार् आयोग 1964, शिक्षार् मंत्रार्लय के द्वार्रार् स्थार्पित पूर्व स्कूली बच्चों के बार्रे में अध्ययन समूह, की सिफार्रिषों, विकालार्ंग बच्चों से सम्बन्धित स्वयं सेवी अभिकरणों सेविका/पर्यवेक्षक करती है।

समेकित बार्ल विकास सेवार् योजनार् की प्रशार्सनिकइकार्इ ग्रार्मीण/आदिवार्सी क्षेत्रों में ब्लार्क। तार्लुक और शहरी क्षेत्रों में वाडो गन्दी बस्तियों क समूह होती है।

सयुक्त रार्ष्ट्र अंतर्रार्ष्ट्रीय बार्ल आपार्त निधि (यूनिसेफ) परार्मर्श सेवार्, प्रशिक्षण, संचार्र, आपूर्ति, उपकरण, प्रबोधन, अनुसंधार्न और मूल्यार्ंकन के क्षेत्र में समेकित बार्ल विकास सेवार् कार्यक्रम को सहार्यतार् प्रदार्न कर रहार् है। नोरार्ड (नावे एजेन्सी फार्र डिवलपमेंट) उ0 प्र0 के तीन जिलों अर्थार्त् लखनऊ, मिर्जार्पुर और रार्यबरेली में 31 समेकित बार्ल विकास परियोजनार्ओं को सहार्यतार् दे रहार् है। यू0 एस0 ए0 आर्इ0 डी0 गुजरार्त के पंचमहल जिले में 11 समेंकित बार्ल विकास सेवार् परियोजनार्ओं और महार्रार्ष्ट्र के चन्द्रपुर जिले में 10 समेकित बार्ल विकास सेवार् परियोजनार्ओं को सहार्यतार् दे रहार् है। कुछ समेकित बार्ल विकास सेवार् परियोजनार्ओं को पूरक पोषार्हार्र के लिए ‘‘केयर’’ और विश्व खार्द्य कार्यक्रम की सहार्यतार् क भी उपयोग कियार् जार् रहार् है।

4. वृद्धों के कल्यार्ण की आवश्यकतार्

संयुक्त रार्ष्ट्र संघ ने वृद्धों कें प्रति अपनी चिंतार् को व्यक्त करते हुए 1982 के दौरार्न वियनार् में आयोजित विश्व युद्ध महार्सभार् में वृद्धो के लिए अंतर्रार्ष्ट्रीय कार्य योजनार् अंगीकृत की थी। सयुक्त रार्ष्ट्र के अनुमार्नों के अनुसार्र, वर्ष 2.25 में विश्व में वृद्धों की जनसंख्यार् 1.2 विलियन हो जार्येगी, जिनमें से लगभग 71 प्रतिशतविकासशील प्रदेशों में होगी। 1950 एवं 2025 के मध्य विकासशील एवं विकसित प्रदेशों में 80 वर्ष के ऊपर के वृद्धों की संख्यार् से दोगुनी हो जार्येगी। क्योंकि महिलार्ओं की आयु पुरूषों से अधिक होती है, अतैव वृद्धो में महिलार्ओं क बार्हुल्य होगार्। यह सभी प्रवृत्तियों रार्ष्ट्रीय सरार्करों से मुख्य नीति संशोधन की मार्ँग करती है।

5. पेंशन न्यार्स कोष – 

चतुर्थ वेतन आयोग को पेंशन की नयी विचार्रणार् क एक सुझार्व ‘काँमन को’ द्वार्रार् दियार् गयार् थार्। इस विचार्रणार् में एक पेंशन न्यार्स कोष को विकसित करने क विचार्र निहित है। इस कोष में सरकार कर्मचार्री की सेवार् अवधि के अनुपार्त में पेंशन क अनुवर्ती भुगतार्न अथवार् सेवार् निवृत्ति पर उसकी कुल पेंशन क भुगतार्न करेगी। यह न्यार्स कम से कम 10 प्रतिशत ब्यार्ज की गार्रण्टी देगार्, जो पेंशन भोगी को मार्सिक भुगतार्न के रूप में मिलेगी। जब कभी महँगाइ भत्ते की नयी किश्त दी जार्येगी तो पेंशन भोगी के खार्ते में जमार् कर दी जार्येगी। कोष क प्रबन्ध न्यार्य मंडल द्वार्रार् कियार् जार्येगार् जिसमें ख्यार्ार्ति प्रार्प्त एवं निवेश अनुभवी लोग होंगे। पेंशन न्यार्स निधि के अनेक लार्भ है। सर्वप्रथम एवं सर्व महत्वपूर्ण यह पेंशन भोगी को अथवार् उसकी विधवार् को पेंशन पार्ने के लिए विभिन्न प्रक्रियार्ओं को पूरार् करने के लिए चक्कर नही काटने पडे़गे। इससें पेंशन निर्धार्रण भुगतार्न एवं लेखार् रखने हेतु विविध स्थार्पनों पर हुये विशार्ल व्यय की बचत होगी। न्यार्स के क्रियार्न्वन की प्रक्रियार् इतनार् सरलीकृत कियार् जार् सकतार् है जिससें सार्रार् कार्य थोड़े से स्टार्फ द्वार्रार् पूरार् कियार् जार् सके। इसके अतिरिक्त, सरकार न्यार्स निधि को लार्भदार्यक विकासीय उद्देश्यों हेतु प्रयोग कर सकती है।

5. हैल्पेज इंडियार् –

हैल्पेज इंडियार् वृद्धों को देखभार्ल प्रदार्न करने के कार्यक्रमों में संलग्न प्रार्देशिक स्वयं सेवी संगठनों के व्यक्तियों को प्रशिक्षण भी प्रदार्न करती है। इसके अतिरिक्त यह वृद्ध देखभार्ल परियोजनार्ओं हेतु तकनीकि विशेष ज्ञतार् भी प्रदार्न करती है। अपने प्रार्रम्भ में इसने लगभग 10 करोड़ की लार्गत से 700 ऐसी परियोजनार्ओं को प्रयोजित कियार् है। हैल्पेज स्वयं ऐसी परियोजनार्ओं को परिचार्लित नही करतार्, यह प्रार्देशिक वृद्धार्यु स्वयंसेवी संगठनों को तकनीकि एवं वित्तिय सहार्यतार् के द्वार्रार् ऐसी परियोजनार्ओं के द्वार्रार् एवं कार्यक्रमों के संचार्लन में सहार्यतार् करतार् है। हैल्पेज के द्वार्रार् प्रबंधित केवल चलती फिरती मैडीकेयर युनिट क संचार्लन है जो नर्इ दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में 150 से 200 रोगियों को प्रतिदिन मैडीकेयर सुविधार्एँ प्रदार्न करती है।

भार्रत में हेल्पेज इंडियार् की स्थार्पनार् 1980 में की गर्इ थी जिसके लक्ष्य एवं उद्देश्य थे – 50 वर्ष से ऊपर के आयु के पुरूषों एवं स्त्रियों को निवार्सिय, आवार्सीय एवं संस्थार्गत सुविधार्ओं के मार्ध्यम से शैक्षिक, मनोरंजनार्त्मक, सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक एवं आध्यार्त्मिक सेवार्एँ प्रदार्न करनार्, मेडिकल सेवार्ओं, अर्द्धकालिक रोजगार्र आय वृद्धि हेतु, भ्रमणों एवं यार्त्रार्ओं की व्यवस्थार्, करों, सम्पत्ति, पेंशनी एवं अन्य आर्थिक तथार् वित्तिय आवश्यकतार्ओं हेतु व्यवसार्यिक परार्मश्रीय सेवार्ओ की व्यवस्थार् करनार्, वृद्धों की समस्यार् के बार्रे में अध्ययन एवं अनुसंधार्न करार्नार्, एवं अध्ययन केन्द्रों, गोष्टियों, मनोरंजनार्त्मक समार्रोहों, रैलियों आदि की व्यवस्थार् करनार् तथार् एवं युवार् पीढ़ियों के मध्य बेहतर सार्मार्जिक एकीकरण एवं सद्भार्वनार् हेतु उचित वार्तार्वरण तैयार्र करनार्।

6. वृद्धार्यु आवार्स गृह –

केन्द्रीय एवं रार्ज्य सरकारों, नगरपार्लिकाओं, परोपकारी समितियों, स्वयंसेवी संगठनों एवं अन्य वरिष्ठ नार्गरिक कल्यार्ण समितियों ने वृद्ध एवं बुजुर्ग नार्गरिकों के लिए आवार्सीय सुविधार्ओं एवं अन्य सम्बद्ध आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए गृहों, शार्रीरिक एवं मार्नसिक गतिविधियों तथार् अकेले पन को दूर करने एवं अन्य लोगों के सार्थ अन्तक्रियार् करने एवं सम्पर्क बनार्ने हेतु मनोरंजन स्थलों की व्यवस्थार् की है। इस समय देशमें अधिकांशतयार् नगरीय क्षेत्रों में लगभग 300 ऐसे गृह है।

7. अनुसूचित जार्तियों एवं अनुसूचित जनजार्तियों क कल्यार्ण – 

हरिजनों की अधिकांष संख्यार् ग्रार्मीण क्षेत्रों में निवार्स करती है। कुछ समय पूर्व तक हरिजन अपनी बस्ती से बार्हर निकलने क सार्हस नही कर पार्तार् थार् परन्तु देषके कुछ एक भार्गों में कृषि विकास (विषेश तयार् हरित क्रार्न्ति), कुछेक प्रदेशों में औद्योगिक प्रगति, तेजी से बढ़ते हुए नगरीय करण एवं जनमार्नी प्रणार्ली के विघटन के कारण हरिजन गतिषील वर्ग बन गये है सभी अनुसूचित जार्ति श्रमिको क लगभग 52 प्रतिशत कृषिगत श्रमिक है तथार् 28 प्रतिशतलघु एवं सीमार्न्त कृषक है एवं फसल सहभार्गी हैं। देशके पश्चिम भार्ग में लगभग सभी बुनकर अनुसूचित जार्तियों से है एवं पूर्वी भार्ग में सभी मछुवार्रे अनुसूचित जार्ति के है। कुछ गंदे व्यवसार्य यथार् झार्डू लगार्नार्, चमड़ार् उतार्रनार्, तथार् परिषोधन तथार् चमड़ी उतार्रनार् पूर्णतयार् अनुसूचित जार्तियों के लिए है। नगरीय क्षेत्रों में रिक्शार् चार्लको, ठेलार् चार्लको, निर्मार्ण श्रमिकों, बीड़ी क्रमिकों एवं अन्य असंगठित गैर-कृषि श्रमिकों तथार् नगरीय सफाइ कर्मिकों, की पर्यार्प्त संख्यार् अनुसूचित जार्तियों से सम्बद्ध रखती है। वे उन निर्धनों में जो गरीबी रेखार् से नीचे रहते है, में सबसे निर्धन है।यद्यपि जनसंख्यार् के अन्य वर्गो में भी निर्धन एवं दलित है तदपि घोर निर्धनतार्, असार्मार्न्य अज्ञार्नतार् एवं गठन अन्धविश्वार्स में डूबी हुर्इ जनसंख्यार् की अधिक भार्ग अनुसूचित जार्तियों में से है। वंचित लोगों में भी हरिजन ही शतार्ब्दियों तक दार्सत, अपमार्न एवं नितार्ंत विवशतार् क जीवन व्यतीत करते रहै है।

8. अनुसूचित जार्ति विकास निगम – 

अनुसूचित जार्ति विकास निगम के सम्मेलन में समार्ज कल्यार्ण/अनुसूचित जार्ति कल्यार्ण विभार्गों के सचिवों, अनुसूचित जार्ति विकास निगमों के वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रबन्धक निदेशकों, भार्रतीय रिजर्व बंकै , भार्रतीय स्टेट, नार्बाड, जमार् बीमार् एवं ऋण गार्रण्टी निगम एवं बैकिंग संस्थार्नों, कल्यार्ण मंत्रार्लय एवं ग्रार्मीण विकास विभार्ग, अनुसूचित जार्ति एवं अनुसूचित जनजार्ति आयोग के प्रतिनिधित्व तथार् अनुसूचित जनजार्ति आयुक्त ने भार्ग लियार्। इस सम्मेलन क विषय थार्, अनुसूचित जार्ति विकास निगम के मार्ध्यम से अनुसूचित जार्तियों के परिवार्रों के आर्थिक विकास हेतु सहार्यतार् की नयी प्रणार्ली जिसे सीमार्न्त धन ऋण कार्यक्रम के विकल्प रूप में विकसित कियार् गयार् थार्।

9. संवैधार्निक सुरक्षार् 

संविधार्न में अनुसूचित जार्तियों एवं जनजार्तियों एवं अन्य कमजोर वर्गो के लिए विशेष तौर पर अथवार् नार्गरिक रूप से उनके अधिकारों को मार्न्यतार् देकर उनके शैक्षिक एवं आर्थिक हितो क विकास करने एवं उनकी सार्मार्जिक आयोग्यतार्ओं को दूर करने हेतु सुरक्षार्एँ प्रदार्न की गर्इ है। मुख्य सुरक्षार्एँ है-

  1. अस्पृष्यतार् उन्मूलन एवं किसी भी रूप मे इसके अभ्यार्स पर प्रतिबन्ध, (धार्रार् 17) 
  2. उनके शैक्षिक एवं आर्थिक हितों की उन्नति एवं सार्मार्जिक अन्यार्य एवं शोषण के सभी रूपों से उनकी सुरक्षार्, (धार्रार् 46) 
  3. सावजनिक स्वरूप की हिंदू धामिक संस्थार्ओं को सभी वर्गो एवं श्रेणियों के लिये खोल देनार् (25 बी) 
  4. . दुकानों, जन भोजनार्लयों, रेस्टोंरेन्टों एवं सावजनिक मनोरंजन के स्थार्नों, कुओं, तलार्बों, स्नार्नघार्टों, सड़कों एवं सावजनिक विश्रार्म स्थार्नों जो पूर्णतयार् अथवार् आंशिक रूप में रार्ज्य कोष से सहार्यतार् प्रार्प्त करते है अथवार् जन प्रयोग के लिए समर्पित कर दियें है, के प्रयोग के बार्रे में किसी अयोग्यतार्, बार्धार् अथवार् शर्त की समार्प्ति (धार्रार् 15 (2)), 
  5. अनुसूचित जार्तियों के हित में सभी नार्गरिकों को स्वतन्त्रार्पूर्वक घूमने, बसने अथवार् सम्पत्ति प्रार्प्त करने के सार्मार्न्य अधिकार पर कानून के द्वार्रार् प्रतिबन्ध (19 (5), संविधार्न में अनुसूचित जनजार्तियों के हितों के संरक्षण एवं वर्द्धन हेतु विभिन्न सुरक्षार्ओं की व्यवस्थार् है। अनुच्छेद 19, 46, 164, 244, 330, 332, 334, 338, 349, 342, तथार् संविधार्न की पार्ँचवी एवं छठी अनुसूचियार्ँ इस विशय पर प्रार्संगिक है। भार्रत सरकार कर दार्यित्व इस मार्मले में केवल उनके विकास के लिए वित्तिय व्यवस्थार् करने से ही समार्प्त नही हो जार्तार् अपितु यह रार्ज्य सरकारों के सहयोग एवं परार्मर्श से उनके शीघ्र एवं समन्वित विकास हेतु नीतियों एवं कार्यक्रमों क भी निर्णय करती है। 

10. अन्य पिछडें वर्गो क कल्यार्ण –

अन्य पिछडे वर्गो से अर्थ है ऐसे वर्गो से जो सार्मार्जिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछडे हैं ! इन वर्गो के लिए संवैधार्रिक एवं विधिक संरक्षण व्यवस्थार् रार्ज्य को पिछडे है । इन वर्गो के लिए संवैधार्निक एवं विधिक संरक्षण व्यवस्थार्  है :-

  1. संवैधार्निक व्यवस्थार् :-संविधार्न के अनुच्छेद की कोर्इ व्यवस्थार् रार्ज्य को पिछडे हुए नार्गरिकों के कियी वर्ग के पक्ष में निक रार्ज्य की रार्य में रार्ज्य की सेवार्ओं में पर्यार्प्त प्रतिनिधित्व नहीं है, नियुक्तियों यार् पदो के आरक्षण के लिए प्रार्वधार्न करने से नहीं रोकेगी !
  2. विधिक व्यवस्थार् :-विकलार्ंगों क कल्यार्ण रार्ष्ट्रीय संर्वेक्षण संगठन क्षरार् किये गये संर्वेक्षण के अनुसार्र भार्रत में बार्रह मिलियन कुल जनसंख्यार् क 18 प्रतिशत तक अथवार् अधिक विकलार्ंगतार् से पीड़ित है। इन व्यक्तियों में से लगभग 10 प्रतिशत को एक से अधिक शार्रीरिक विकलार्ंगतार् है। प्रत्येक प्रकार की विंकलार्गतार् को अलग लेते हुए गत्यार्त्मक विकंलार्गतार् सबसे अधिक (5.43 मिलियन) है, दृष्टिगत विकलार्ंगतार् (3.47 मिलियन) श्रवण विकलार्ंगतार् (3.02 मिलियन) एवं विकलार्ंगतार् (1.75 मिलियन) है। इस सर्वेक्षण में केवल दृष्टिहीनों, पंगुओं एंव गूँगे व्यक्तियों को ही सम्मिलित कियार् गयार् है। अन्य विकलार्ंगतों यथार् मार्नसिक मदार्ंधतार् को सम्मिलित नही कियार् गयार् है।

11. रार्ष्ट्रीय विकलार्ंग संस्थार्न –

कल्यार्ण मंत्री के आधीन विकलार्ंगतार् के प्रत्येक प्रमुख क्षेत्र के चार्र रार्ष्ट्रीय संस्थार्न है। ये है- रार्ष्ट्रीय अस्थि विकलार्ंग संस्थार्न कलकत्तार्, रार्ष्ट्रीय दृष्टि विकलार्ंग संस्थार्न, देहरार्दून, रार्ष्ट्रीय विकलार्ंग संस्थार्न सिकन्दरार्बार्द, तथार् अली यार्वर जंग रार्ष्ट्रीय श्रवण विकलार्ंग संस्थार्न बम्बर्इ। ये संस्थार्एँ व्यवार्सार्यिकों को प्रशिक्षण, विकलार्ंगों के लिए षिक्षण सार्मग्री एवं अन्य सहार्यकों के उत्पार्दन, पुर्नवार्स में अनुसंधार्न करने तथार् विकलार्ंगों के लिए उपर्युक्त प्रतिरूप सेवार्ओं क विकास करने के लिए शीर्ष संगठन है। यह संस्थार्न एक दूसरे एवं देशके अन्य प्रशिक्षण केन्द्रों, स्वयं सेवी संगठनों, रार्ज्य सरकारों, अन्तर्रार्ष्ट्रीय अभिकरणों के सार्थ मिलकर विभिन्न विकलार्ंग संस्थार्ओं में आधार्रिक प्रतिमार्नों को क्रियार्न्वित करार्ने एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उच्चस्तरीय बनार्ने के लिए कार्य करते है।विकलार्ंगों के लिए समेकित शिक्षार् कार्यक्रम क रार्ज्यों द्वार्रार् क्रियार्न्वन न किये जार्ने के प्रमुख कारण है। प्रथम रार्ज्य स्तर पर विकलार्ंगों की विभिन्न समस्यार्ओं से निपटने के लिए कोर्इ समन्वयक निकाय नही है। द्वितीय, स्कूल स्तर पर इस कार्यक्रम के अधीन अतिरिक्त कार्य सुपुर्द किये जार्ने क स्वार्गत नही कियार् गयार्। तृतीय, अध्यार्पकों में विकलार्ंग व्यक्तियों, बच्चों क प्रबन्ध करने के लिए योग्यतार् एवं प्रशिक्षण क अभार्व हं।ै चतुर्थ, मार्तार्-पितार् समझते है कि विकलार्ंगतार् र्इश्वर की देन है एवं इसके लिए कुछ नही कियार् जार् सकतार् है। वे इन बच्चों को स्कूल भी भेजनार् पंसद नही करते है इस आषंक से कि दूसरे बच्चे उनक उपहार्स करेगे। पार्ँचवें, विष्ेार्शज्ञों क विचार्र है कि विभिन्न रियार्यतों गहन सेवार्ओं, आरक्षण, यार्त्रार् रियार्यतें, टेलीफोन स्वीकृत में वरीयतार् आदि क विकलार्ंगों को जीवन की मुख्य धार्रार् में विलिन करने में अधिक प्रभार्व नही हुआ है। समस्यार् क मूल कारण अवसरों की उपलब्धतार् की समस्यार् में निहित है। विकलार्ंगों के लिए शैक्षिक सुविधार्एँ सीमित है, जिसके कारण रोजगार्र एवं प्रशिक्षण के अवसर सीमित हो जार्ते है। इस समय, इस कार्यक्रम के क्रियार्न्वय में केरल अग्रणी है।

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन क वर्गीकरण 

भार्रत में समार्ज कल्यार्ण क कार्य प्रार्चीन काल से ही शैक्षिक आधार्र पर ही होतार् आयार् है। मध्य काल में कतिपय शार्सकों द्वार्रार् जनहित में कुछ कार्य किये जार्ते थे। स्वतंत्रतार् के पश्चार्त् भार्रत ने कल्यार्णकारी रार्ज्य की अवधार्रणार् को स्वीकार कियार् तथार् जनहित को शार्सन क दार्यित्व स्वीकार कियार् गयार्। अंतर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त रार्ष्ट्र व अन्य संगठनों तथार् प्रजार्तार्ंत्रिक देशों ने समार्ज कल्यार्ण हेतु अनेक कार्यक्रम चलार्ये। वर्तमार्न में भार्रत में विभिन्न समार्ज कल्यार्ण योजनार्ओं को उनके प्रशार्सनिकवर्गीकरण के आधार्र पर निम्न वर्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-

  1. अंतर्रार्ष्ट्रीय समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन 
  2. केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन 
  3. रार्ज्य स्तरीय समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन 
  4. शार्सन द्वार्रार् सहार्यतार् प्रार्प्त अनुदार्न द्वार्रार् समार्ज कल्यार्ण करने वार्ली पंजीकृत गैर सरकारी संस्थार्ओं क प्रशार्सन 
  5. अंतर्रार्ष्ट्रीय संस्थार्ओं द्वार्रार् सहार्यतार् प्रार्प्त अनुदार्न द्वार्रार् समार्ज कल्यार्ण करने वार्ली पंजीकृत गैर सरकारी संस्थार्ओं क प्रशार्सन 6. निजी संस्थार्ओं के द्वार्रार् किये जार्ने वार्ले समार्ज कल्यार्ण क प्रशार्सन 
  6. स्वैच्छिक संस्थार्ओं द्वार्रार् किये जार्ने वार्ले समार्ज कल्यार्ण क प्रशार्सन 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की प्रक्रियार् 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन प्रक्रियार् में प्रक्रियार् समार्न उद्देश्य प्रार्प्ति के लिए समूह के पार्रस्परिक प्रयत्नों को सुविधार्जनक बनार्ती है। प्रशार्सन प्रक्रियार् निम्नार्किंत प्रकार के कार्यो के लिए प्रयोग में लाइ जार्ती है।

  1. प्रशार्सनिक विधि, प्रक्रियार्, कार्य की प्रगति और फल-प्रार्प्ति क समय-समय पर मूल्यार्ंकन होनार् चार्हिए। 
  2. संस्थार् के उद्देश्यों और कार्यक्रमों संबंधी आँकड़े इकट्ठे करके निर्णय लेने में सहार्यतार् करनार्। 
  3. उपलब्ध आँकड़ों के आधार्र पर आवश्यकतार्ओं क विश्लेषण करनार्।
  4. पूर्वार्नुमार्न के आधार्र पर संस्थार् के कार्य के लिए बहुत सी वैकल्पिक तकनीकों यार् प्रक्रियार्ओं में से एक क चुनार्व करनार्। 
  5. वैकल्पिक प्रक्रियार् के प्रयोग के द्वार्रार् संस्थार् की परियोजनार्ओं को क्रियार्न्वित करने की व्यवस्थार् करनार्। 
  6. संस्थार् के कार्य के आधार्र के अनुरूप आवश्यक कर्मचार्रियों की भर्ती, प्रशिक्षण, पर्यवेक्षण, कार्य-बँटवार्रार् आदि की व्यवस्थार् करनार्। 
  7. संस्थार् की उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिए समुचित उपार्यों, क्रियार् विधियों और तकनीकों के निरंतर प्रयोग की व्यवस्थार् करनार्। 
  8. कार्य-विधि के दौरार्न कार्य को सुदृढ़ बनार्ने के लिए आकड़ों क संग्रह, अभिलेखन और विश्लेषण करनार्। 
  9. सावजनिक धनरार्शि के सदुपयोग के हेतु वित्तिय क्रियार्विधियों क निर्धार्रण करनार् और उनको क्रियार्न्वित करनार्। 
  10. संचार्र और प्रभार्वशार्ली जन-सम्पर्क की व्यवस्थार् करनार्। 
  11. समय-समय में कार्य और प्रयोग में लाइ जार्ने वार्ली विधियों क मूल्यार्ंकन करवार्नार्।

1. वित्तीय प्रक्रियार् –

यद्यपि संस्थार् के  वित्तीय मार्मलों क दार्यित्व प्रबंध-समिति पर होतार् है, जो कोषार्ध्यक्ष के मार्ध्यम सें इसे कार्यार्न्वित करती है, तथार्पि बजट बनार्ने में संस्थार् के मुख्य कार्यपार्लक को पहल करनार् चार्हिए। यदि संस्थार् के अनेक अनुभार्ग अथार्वार् शार्खार्यें हो तो उन सब के अनुमार्नित व्यय क ब्यौरार् प्रार्प्त करनार् चार्हिए और फिर उसक इकट्ठार् विवरण तैयार्र करनार् चार्हिए। कर्मचार्री वर्ग और कार्यकत्त्ार्ार्ओं की चार्हिए वे कार्यार्लय में अगार्मी वर्ष के कार्यक्रमों संबंधी  वित्तीय आवश्यकतार्ओं के विषय में संपूर्ण टिप्पणी रखते जार्यँ। ऐसार् करते समय, संस्थार् के वित्तीय स्त्रोतों की क्षमतार् और कार्यक्रमों के विस्तार्र और सुधार्र के प्रस्तार्वों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए।

उपलब्ध सार्मग्री के आधार्र पर बजट के मसविदे पर कर्मचार्रियों की बैठक में विचार्र करने के बार्द उसे अंतिम रूप देकर कोषार्ध्यक्ष के द्वार्रार् प्रबंध समिति के सार्मने पेश कियार् जार्नार् चार्हिए। प्रबंध समिति के द्वार्रार् अनुमोदित बजट की सार्मार्न्य सभार् से स्वीकृति प्रार्प्त की जार्नी चार्हिए। प्रबंध समिति के द्वार्रार् बजट उप समिति बनाइ जार्नी चार्हिए, जिसमें  वित्तीय मार्मलों के विशेष ज्ञ, लेखार् निरीक्षण, लेखार्कार तथार् मूल्यार्ंकन पद्धति क ज्ञार्न रखने वार्ले व्यक्ति होने चार्हिए। कोषार्ध्यक्ष इस समिति क प्रधार्न और मंत्री इसक मंत्री होनार् चार्हिए।

बजट बनार्ने से पहले संस्थार् के आय व्यय क ब्यौरार् मदों के अनुसार्र बनार्नार् चार्हिए। बजट के दो भार्ग होते है आय और व्यय। बजट निम्नलिखित खण्डों में बनार्यार् जार्नार् चार्हिए :-

  1. पिछले वर्ष क अनुमार्नित आय-व्यय। 
  2. पिछले वर्ष क वार्स्तविक आय-व्यय। 
  3. चार्लू वर्ष क वार्स्तविक आय-व्यय। 
  4. अगार्मी वर्ष क अनुमार्नित आय-व्यय। 
    बजट के सार्थ व्यार्खार्त्मक टिप्पणी तैयार्र करनी चार्हिए, जिसमें पिछले वर्ष से अधिक और कम अनुमार्नों के कारार् दिये जार्ने चार्हिए और यह भी बतार्यार् जार्नार् चार्हिए कि मदों पर अतिरिक्त व्यय के लिए धन कहार्ँ से प्रार्प्त कियार् जार्ये। यदि कोर्इ नयार् कार्यक्रम चार्लू करनार् हो अथवार् वर्तमार्न कार्यक्रम में सुधार्र अथवार् विस्तार्र करनार् हो, तो उसके लिए अनुमार्नित व्यय के सबंध में व्यार्ख्यार्त्मक टिप्पणी देनार् चार्हिए।

    समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन क इतिहार्स 

    प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमतार्, कुशलतार् तथार् सार्मार्जिक परिस्थितियों के कारण एक दूसरे से भिन्न अस्तित्व रखतार् है। वह अपनी सभी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति नहीं कर सकतार् है। उसे अन्य व्यक्तियों की सहार्यतार् लेनी ही पड़ती है जिसके परिणार्मस्वरूप सार्मूहिक आवश्यकतार्ओं क जन्म होतार् है। व्यक्ति की ये आवश्यकतार्यें एक दूसरे को सहार्यतार् प्रदार्न करने के सिद्धार्न्त पर संगठित करती हं ै तथार् उनमें एकमततार्, सार्मूहिकतार् तथार् सहयोग की भार्वनार् क विकास करती हं ै जो एक सभ्य समार्ज की आधार्रशिलार् है। प्रार्रम्भ में समार्ज कल्यार्ण के विकास में धर्म के नार्म पर दिए जार्ने वार्ले दार्न की संगठित व्यवस्थार् क महत्वपूर्ण योगदार्न रहार् है। इसके बार्द आवश्यकतार्ग्रस्त सदस्यों की सहार्यतार् के लिए व्यार्वसार्यिक संघों की पार्रस्परिक सहार्यतार् समितियों की प्रमुख भूमिक रही है। इसके बार्द शहरों क विकास होने पर नगरपार्लिकाओं द्वार्रार् आवश्यकतार्ग्रस्त लोगों की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति की जार्ने लगी जो बार्द में रार्ज्य के दार्तव्य संगठनों के रूप में परिवर्तित हो गर्इ। इसके अतिरिकत जार्ँन हार्वड्र, एलिजार्वेथ फ्राइ, जोसफीन ब्टलर, फ्लोरेन्स नार्इटिंगेल जैसे समार्ज सुधार्रकों के प्रयार्सों के कारण सार्मार्जिक सहार्यतार् के समार्धार्न क विकास हुआ। अंग्रेजी निर्धन कानून क निर्मार्ण समार्ज के निर्बल वर्गों की समस्यार्ओ के समार्धार्न में रार्ज्य के उत्तरदार्यित्व की चेतनार् के विकास क प्रतिनिधित्व करतार् है और सार्थ-सार्थ इस बार्त को भी सार्मने लार्तार् है कि केवल सहार्यतार् मार्त्र से कल्यार्ण के लक्ष्यों की प्रार्प्ति नहीं हों सकती। उन्नीसवीं शतार्ब्दी के अन्त में चलार्ए गए दार्न संगठन आन्दोलन क उद्देश्य निर्धनों की स्थिति में सुधार्र और इस कार्य में लगे हुए संगठनों में समन्वय स्थार्पित करनार् थार्।

    भार्रतवर्ष में प्रार्चीन काल से ही व्यक्तियों को सहार्यतार् प्रदार्न करने अथवार् सेवार् की भार्वनार् के महत्व क अनुभव कियार् गयार् थार्। गीतार् के अनुसार्र सृष्टि के आरम्भ में ब्रºमार् ने त्यार्ग के सार्थ मनुष्य की रचनार् करने के बार्द कहार् कि पार्रस्परिक बलिदार्न तथार् पार्रस्परिक सहार्यतार् से उनक विकास तथार् उनकी समृद्धि एवं वृद्धि होगी। यह त्यार्ग कामधेनु के समार्न है जो सभी इच्छित वस्तुओं को प्रदार्न करेगार् (बनर्जी, 1967:150)। भार्रतीय दर्शन में यज्ञ को बहुत महत्व दियार् गयार् है जिसक अर्थ ऐसी किसी भी सार्मार्जिक, रार्ष्ट्रीय अथवार् व्यक्तिगत क्रियार् से है जिसमें व्यक्ति सेवार् की भार्वनार् से अपने को पूर्ण रूप से लगार्ने के लिए तैयार्र है। समार्ज कल्यार्ण में सेवार् की भार्वनार् क सर्वोपरि स्थार्न है। पंचतन्त्र में यह ठीक ही कहार् गयार् है, ‘सेवार् धर्म परम गहनो योगिनार्म् प्रिय गम्य:’ और इसीलिए जो व्यक्ति सेवार् की भार्वनार् से, लार्भ की भार्वनार् से नहीं, तथार् आत्मसन्तोष की भार्वनार् से, सफलतार् की भार्वनार् से नहीं, कार्य करतार् है, वही समार्ज कल्यार्ण में वार्स्तविक योगदार्न दे सकतार् है। कठोपनिषद् में व्यक्तियों द्वार्रार् सम्पन्न किए जार्ने वार्ले सभी कार्यों को पेय्र एवं श्रेय की श्रेणियों में वर्गीकृत कियार् गयार् है। समार्ज कल्यार्ण की दृष्टि से इस बार्त पर बल दियार् गयार् कि व्यक्ति को अपने लिए प्रेय न होने के बार्वजूद भी श्रेय कायार्ंरे को करनार् चार्हिए। प्रार्चीन भार्रतीय विचार्रधार्रार् के अनुसार्र प्रत्येक व्यक्ति को धर्म अर्थार्त् समार्ज के प्रति अपने निर्धार्रित कर्तव्यों क पार्लन करने के लिए कहार् गयार् है जो एक लम्बी अवधि के दौरार्न व्यक्ति में आत्मविश्वार्स और शुद्धीकरण को लार्ते हुए उसक भी कल्यार्ण करतार् है। इसके सार्थ ही सार्थ प्रत्येक व्यक्ति के स्वभार्व में अच्छाइयार्ँ तथार् बुराइयार्ँ दोनों ही पार्यी जार्ती हं ै और इन दोनों ही प्रकार की शक्तियों में अन्तर्द्वन्द होतार् रहतार् है। अपनी ताकिक शक्ति क उपयोग करते हुए व्यक्ति बुराइयों पर काबू पार्ने क प्रयार्स करतार् है तथार् अपने प्रयार्सों से समार्ज कल्यार्ण में अपनार् योगदार्न देतार् है।

    हिन्दू समार्ज में जीवन के लक्ष्यों के रूप में चार्र पुरुषाथों-धर्म, अर्थ, काम तथार् मोक्ष क वर्णन कियार् गयार् है। इनमें से इहलौकिक अर्थ तथार् काम की पूर्ति भी धर्म द्वार्रार् निर्धार्रित होती है और अन्तिम उद्देश्य मोक्ष को चरम उत्कर्ष वार्लार् मार्नार् जार्तार् थार् और पहले तीनों लक्ष्यों क उद्देश्य चौथे लक्ष्य अर्थार्त् मोक्ष को प्रार्पत करनार् होतार् थार्। हमार्रे मनीषियों द्वार्रार् कर्तव्यों के संपार्दन पर अधिक बल दियार् गयार् है और पंच महार्यज्ञों क प्रार्वधार्न करते हुए विभिन्न प्रकार के ऋणों से छुटकारार् पार्ने की बार्त कही गयी है। भार्रतवर्ष में सार्मार्जिक न्यार्य की विचार्रधार्रार् कभी भी व्यक्ति के अधिकारों पर केन्द्रित नहीं रही है बल्कि यह अन्य व्यक्तियों के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रतिपार्दन पर आश्रित रही है।

    इस प्रकार भार्रतवर्ष में त्यार्ग की भार्वनार् पर हमेशार् बल दियार् गयार् है किन्तु इसक अर्थ यह कदार्पि नहीं थार् कि व्यक्ति अकर्मण्य बन जार्ए। निष्काम कर्म क उपदेश इसीलिए दियार् गयार् थार् तार्कि व्यक्ति धर्म द्वार्रार् निर्धार्रित सीमार्ओं के अधीन कार्य करते हुए इहलौकिक लक्ष्यों-अर्थ एवं काम की प्रार्प्ति कर सके। बुद्धिमार्न व्यक्तियों को निष्काम कर्म करने की सलार्ह सम्पूर्ण विश्व क हित करने के लिए दी गर्इ थी। भार्रतवर्ष में प्रार्चीन काल में कलयार्ण की अवधार्रणार् केवल आवश्यकतार्ग्रस्त वगार्ंर् े तक ही सीमित नहीं थी बल्कि इसके विस्तार्र क्षेत्र में सभी वर्ग सम्मिलित थे। इसके सार्थ ही सार्थ कल्यार्ण की अवधार्रणार् शार्रीरिक अथवार् भौतिक कल्यार्ण तक ही सीमित नहीं थी और इसीलिए अनेकों ऐसे उदार्हरण मिलते हैं जिनमें व्यक्ति अथवार् समूह अपने सार्थियें की विभिन्न प्रकार की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति नार्नार् प्रकार के कार्य करते हुए करते थे जैसे कि कूँएं अथवार् तार्लार्ब खुदवार्नार्, विद्यार्लय खोलनार्, धर्मशार्लार्यें बनवार्नार्, अस्पतार्ल स्थार्पित करनार्, दाशनिक विचार्र-विमर्श के लिए मठों की स्थार्पनार् करनार्, इत्यार्दि।समार्ज कल्यार्ण की आवधार्रणार् अत्यन्त प्रार्चीन है। निर्धनतार्, बीमार्री, कष्ट आदि मार्नव जीवन में सदैव विद्यमार्न रहे है। प्रार्रम्भ में गिरोह तथार् कबीलों के रूप में जीवन व्यतीत करतार् थार्। किन्तु यह जीवन आरक्षित एवं अव्यवस्थित थार्। फलस्वरूप समुदार्य, समार्ज तथार् रार्ज्य के रूप में मनुष्य ने समष्टिगत व्यवस्थार् को जन्म दियार्। इस व्यवस्थार् के परिणार्मस्वरूप समार्ज मेंविश्ेार्षीकरण क विकास हुआ और श्रम विभार्जन ने जन्म लियार्। इस श्रम-विभार्जन के कारण समार्ज में उत्पार्दन के सार्धन एक दूसरे से पृथक हो गये। श्रम और पूँजी दो पृथक व्यक्तियों के हार्थ में चली गर्इ। इससे समार्ज में शोषण, उत्पीड़न तथार् सम्पत्ति व शक्ति क असमार्न वितरण प्रार्रम्भ हुआ। असमार्न वितरण के कारण ही अनेक सार्मार्जिक समस्यार्ओं क जन्म हुआ और इन समस्यार्ओं को हल करने के लिए समार्ज कल्यार्ण क विकास हुआ।

    इस प्रकार भार्रतीय परम्परार् के अनुसार्र व्यक्ति क उद्देश्य स्वाथ, लार्लच, तृष्णार् जैसी पार्शविक प्रवृत्तियों से नियन्त्रित सीमित व्यक्तिवार्द को सम्पूर्ण मार्नव-मार्त्र की भलाइ के लिए कार्यरत आत्मबोध करार्ने वार्ली सावभौमिकतार् में परिवर्तित करनार् थार् जो कि समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की प्रार्रम्भिक स्थिति कही जार् सकती है।

    समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन समार्ज के प्रत्येक समार्ज कल्यार्ण अभिकरण के सुचार्रू रूप से कार्य करने से सम्बन्धित है। इसक मुख्य उद्देश्य सार्मार्जिक, आर्थि, सार्ंस्कृतिक तथार् नैतिक विकास के लिए लोकतार्ंत्रिक नियोजन के द्वार्रार् कल्यार्णकारी समार्ज की स्थार्पनार् करनार् है। समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन विकास नीति के प्रतिपार्दन में सहार्यतार् करतार् है। इसके सार्थ ही अनेक प्रमुख समार्ज कल्यार्ण सेवार्ओं को समन्वित ढ़ग से नियोजित, व्यस्थित एवं कार्यार्न्वित करने में सहार्यतार् करतार् है। इन सेवार्ओं में रार्जकीय तथार् स्वयंसेवी अभिकरणों क मिलकर कार्य करनार् भी शार्मिल है, यद्यपि विविध समार्ज कल्यार्ण सेवार्ओं में इन दोनों क अनुपार्त भिन्न-भिन्न हो सकतार् है। इन सेवार्ओं को इन क्षेत्रों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है:-

    1. समार्ज सेवार्यें –

    1. शिक्षार्- इसके अन्तर्गत प्रार्थमिक, मार्ध्यमिक, विश्वविद्यार्लय स्तरीय, तकनीकि व्यार्वसार्यिक, श्रमिक तथार् सार्मार्जिक शिक्षार् सम्मिलित हैं। शिक्षार् क समन्वय जनषक्ति नियोजन द्वार्रार् होनार् चार्हिए। शिक्षार् मार्नव संसार्धन के विकास में निवेश मार्नी जार्ने लगी है। यह एक प्रशंसनीय प्रगति है, परन्तु शिक्षार् में सार्मार्जिक मूल्यों तथार् नैतिक विकास पर विशेष ध्यार्न देन की आवश्यकतार् है।
    2. स्वार्स्थ्य सेवार्यें एवं परिवार्र नियोजन – स्वार्स्थ्य सेवार्ओं में चिकित्सकीय, निरोधार्त्मक तथार् स्वस्थ्य वर्धक सेवार्यें आती है। जन्म दर में वृद्धि में विशेष कमी करने के लिउ परिवार्र नियोजन आवश्यक है। इस कार्य में स्वयंसेवी संस्थार्ओं क सहयोग निन्तार्त आवश्यक है। कृत्रिम सार्धनों के प्रयोग के सार्थ सार्थ संयम तथार् नैतिक जीवन पर भी ध्यार्न देनार् चार्हिए तार्कि वह प्रयार्स पार्श्चार्त्य देशों क अनुकरण मार्त्र ही बनकर न रह सके।
    3. आवार्स – निम्न आय वार्ले वर्ग के लिए ऋणमुक्त अनुदार्न की व्यवस्थार् की जार्ती है क्योकि सार्धनों के अभार्व के कारण आवार्स स्थिति में विशेष सुधार्र की आशार् नही की जार् सकती है। रार्ज्य की और से भी कम मूल्य के आवार्स बड़ी संस्थार् में बनार्ये जार् सकते है।

    2. सार्मार्जिक सुरक्षार् 

    सार्मार्जिक सुरक्षार् को सुदढ़ बनार्ने के लिए सार्मार्जिक बीमार् क महत्वपूर्ण योगदार्न हो सकतार् है। इन योजनार्ओं को एकीकृत करते हुए अधिक व्यार्पक बनार्यार् जार् सकतार् है। इससे निम्न आय वर्ग से प्रार्प्त धनरार्शि से योजनार् के सार्धनों में वृद्धि की जार् सकती है। सार्मार्जिक सहार्यतार् द्वार्रार् वृद्धों, अबलार्ओं आदि को रार्ज्य की ओर से आर्थिक सहार्यतार् दी जार्ती है। धन के आभार्व के कारण इन सेवार्ओं को और अधिक व्यार्पक बनार्ने में अभी भी कठिनाइ है। स्वयंसेवी संस्थार्यें इस ओर ध्यार्न दे तो अधिक सार्धन जुटार्ये जार् सकते है।

    3. सार्मुदार्यिक विकास 

    सार्मुदार्यिक विकास ग्रार्मीण तथार् नगरीय दोनों स्तर पर होतार् है। इन दोनों स्तरों क एकीकृत कर एक व्यार्पक सार्मुदार्यिक विकास योजनार् के चलार्ये जार्ने की आवश्यकतार् है जिससे संतुलित विकास सम्भव हो सके।

    4. श्रम सम्बन्ध 

    श्रमिक संघों की नियोजन की प्रक्रियार् में सहभार्गितार् आवश्यक है। रार्जकीय तथार् निजी क्षेत्रों में प्रबंधकों और श्रमिकों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थार्पित करते हुए उत्पार्दकतार् में वृद्धि की जार् सकती है।

    5. समार्ज कल्यार्ण 

    अनुसूचित जार्तियों, जनजार्तियों तथार् पिछड़ी जार्तियों की कल्यार्ण योजनार्ओं क विस्तार्र कियार् जार्नार् चार्हिए जिससे इस वर्ग में भी एकीकरण हो सकें। शार्रीरिक रूप से बार्धित जैसे अंधे, बधिर, अपार्हिज, आदि के लिए कल्यार्णकारी योजनार्ओं क निर्मार्ण होनार् चार्हिए। समार्ज में इनके पुनस्र्थार्पन को अधिक महत्व दियार् जार्नार् चार्हिए। मार्नसिक रोगियों के लिए मार्नवतार् वार्दी समार्ज की व्यवस्थार् की जार्नी चार्हिए तथार् एक रार्ष्ट्रवार्दी तथार् एक रार्ष्ट्रव्यार्पी मार्नव आरोग्य शार्स्त्र क विधिवत प्रचार्र कियार् जार्नार् चार्हिए। सार्मार्जिक चेतनार् के रचनार्त्मक कार्यो से मार्नसिक स्वार्स्थ्य में वृद्धि हो सकती है।

    6. सार्मार्जिक रक्षार् 

    वयस्क, युवार् तथार् बार्ल अपरार्धियों के लिए सुधार्र सम्बन्धी सेवार्ओं की व्यवस्थार् की जार्नी चार्हिये। इसमें बन्दीगृह, प्रोबेशन, पुनर्वार्स आदि सेवार्यें आती है। अनैतिक व्यार्पार्र से पीड़ित लड़कियों तथार् स्त्रियों के लिए नार्री निकेतन तथार् भिक्षुओं के लिए गृह स्थार्पित किये जार्ने चार्हिए।

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