समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की अवधार्रणार्, प्रकृति एवं कार्य

समार्ज के प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति उचित ढ़ग से करनार्, जिससे कि वह सुखी और सन्तोषजनक जीवन व्यतीत कर सके, कल्यार्णकारी रार्ज्य क प्रमुख उदेद्श्य है। प्रभार्वकारी सेवार्ओं को विस्तृत स्तर पर लार्गू करने के लिए, योजनार्, निर्देशन, समन्वय और नियंत्रण क सार्मूहिक प्रयार्स कियार् जार्तार् है। समार्ज कार्य की सेवार्ओं को व्यवसार्यिक स्वरूप प्रदार्न करने के लिए भी यह आवश्यक है कि समार्ज कार्यकर्तार्ओं को आवश्यक ज्ञार्न और कौशल प्रदार्न कियार् जार्ये। समार्ज कार्य सेवार्ओं को प्रदार्न करने में आवश्यक प्रशार्सनिक एवं नेतृत्व दक्षतार् के लिए कार्यकर्तार् को इस ज्ञार्न और कौशल क प्रयोग करके सेवार्ओं को और प्रभार्वकारी बनार्यार् जार् सकतार् है। अत: यह आवश्यक है कि समार्ज कार्यकर्तार्ओं को एक व्यवस्थित ज्ञार्न एवं तकनीकी कौशल प्रदार्न कियार् जार्ये।

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की अवधार्रणार् 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन समार्ज कार्य की एक प्रणार्ली के रूप में कार्यकतार्ओं को प्रभार्वकारी सेवार्ओं हेतु ज्ञार्न एवं कौशल प्रदार्न करतार् है। यद्यपि समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन , समार्ज कार्य की द्वितीयक प्रणार्ली मार्नी जार्ती है परन्तु प्रथम तीनों प्रार्थमिक प्रणार्लियों, वैयक्तिक सेवार् कार्य, सार्मूहिक सेवार् कार्य, तथार् सार्मुदार्यिक संगठन की सेवार्ओं में सेवार्थ्र्ार्ी को सेवार् प्रदार्न करने हेतु समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की आवश्यकतार् पड़ती है। समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन क आशय जन सार्मार्न्य के लिए बनार्यी गयी एवं सार्मुदार्यिक सेवार्ओं जैसे स्वार्स्थ्य, आवार्स शिक्षार् और मंनोरजन के प्रशार्सन से है। इसे समार्ज सेवार् प्रशार्सन के पर्यार्यवार्ची शब्द के रूप मे समझार् जार्तार् है।

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की प्रकृति 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन विज्ञार्न तथार् कलार् दोनों हैं। एक विज्ञार्न के रूप में इसके क्रमबद्ध ज्ञार्न होतार् है जिसक उपयोग सेवार्ओं को अधिक प्रभार्वी बनार् देतार् है। विज्ञार्न के रूप में इसके निम्न तत्व प्रमुख है नियोजन, संगठन, कार्मियों की भर्ती, निर्देशन, समन्वय, प्रतिवेदन, बजट तथार् मूल्यार्ंकन। कलार् के रूप में समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन में अनेक निपुणतार्ओं तथार् प्रविधियों क उपयोग होतार् है जिसके परिणार्म स्वरूप उपयुक्त सेवार्ओं को प्रदार्न सम्भव होतार् है। समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की निम्न प्रमुख विषेशतार्यें है:-

  1. प्रशार्सन कार्यो को पूरार् करने के लिए की जार्ने वार्ली एक प्रक्रियार् है। समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन में स्वार्स्थ्य, शिक्षार् आवार्गमन, आवार्स, स्वच्छतार्, चिकित्सार्, आदि सेवार्ओं को प्रभार्वकारी बनार्यार् जार्तार् है। 
  2. समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन की संरचनार् में एक उच्च-निम्न की संस्तरणार्त्मक व्यवस्थार् होती है। कर्मचार्रियों की स्थिति के अनुसार्र उनके कार्य तथार् शक्तियार्ँ निर्धार्रित होती है। 
  3. नेतृत्व निर्णय लेने की क्षमतार्, शक्ति, संचार्र आदि प्रशार्सकीय प्रक्रियार् के प्रमुख अंग है। 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन मूलरूप से निम्न क्रियार्ओं से सम्बन्धित है:- 

  1. रार्ज्य के सार्मार्जिक लक्ष्यों को प्रार्प्त करन के लिए ऐसी नीति निर्धार्रित करनार् जिससे संगठनल में कार्यरत जनशक्ति एकीकृत रूप से कार्य कर सके। 
  2. सेवार्ओं के प्रभार्वपूर्ण प्रार्वधार्न के लिए संगठनार्त्मक संरचनार् की रूपरेखार् तैयार्र करनार्। 
  3. संसार्धनों, कर्मचार्रीगण तथार् आवश्यक प्रविधियों क प्रबन्ध करनार्।
  4. आवश्यक ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं से युक्त मार्नव संसार्धन क प्रबन्ध करनार्।
  5. उन क्रियार्-कलार्पों को सम्पार्दित करवार्नार् जिनसे अधिकतम संतोषजनक ढ़ग से लक्ष्य की प्रार्प्ति हो सके। 
  6. ऐसार् वार्तार्वरण तैयार्र करनार् जहार्ँ आपसी मेल-मिलार्प तथार् प्रगार्ढ़तार् बढ़े एवं कर्मचार्री कार्य करने की प्रक्रियार् के दौरार्न में सुख अनुभव करें। 
  7. किये जार्ने वार्ले कार्यो को निरन्तर मूल्यार्ंकन करनार्। 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के कार्य 

समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन न केवल संस्थार् के कार्यो को सम्पार्दित करतार् है बल्कि वह संस्थओं को निरन्तर उन्नति की दिशार् में बढ़ार्ने क प्रयार्स भी करतार् है। वार्रहम के विचार्र से समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के निम्न कार्य है:-

  1. संस्थार् के उद्देश्य को पूरार् करनार् समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन संस्थार् की नीतियों को कार्यार्न्वित करतार् है। नीतियों को केवल प्रषार्सनिकप्रक्रियार् द्वार्रार् ही कार्यरूप प्रदार्न कियार् जार् सकतार् है। वह नीतियों के निर्धार्रण में भी भार्ग लेतार् है जिससे संस्थार् के उद्देश्यों तथार् नीतियों में एकरूपतार् बनी रहे। 
  2. संस्थार् की औपचार्रिक संरचनार् क निर्मार्ण करनार् समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन क दूसरार् कार्य सम्पेष््र ार्ण व्यवस्थार् को अधिक प्रभार्वी बनार्ने के लिए औपचार्रिक संरचनार् क निर्मार्ण करनार् होतार् है, कर्मचार्रियों के लिए मार्नदण्ड निर्धार्रित करनार् होतार् है, तथार् उन्ही के अनुसार्र कार्य सम्बन्ध विकसित करनार् होतार् है।
  3. सहयोगार्त्मक प्रयत्नों को प्रोत्सार्हन प्रदार्न करनार् प्रशार्सन क कार्य संस्थार् में ऐसार् वार्तार्वरण तैयार्र करनार् होतार् है जिससे कर्मचार्रीगण पार्रस्परिक सहयोग से अपने उत्तरदार्यित्वों को पूरार् कर सकें। यदि कहीं भी संघर्ष के बीज पनपने लगें तो उनकों तुरन्त नष्ट कर देनार् आवश्यक होतार् है। कर्मचार्रियों के मनोबल को ऊँचार् बनार्ये रखने के हर सम्भव प्रयत्न किये जार्ने आवश्यक होते है। 
  4. संसार्धनों की खोज तथार् उपयोग करनार् किसी भी संस्थार् के लिए अर्थ शक्ति तथार् मार्नव शक्ति दोनों आवश्यक होती है। संस्थार् तभी अपने उत्तरदार्यित्वों को पूरार् कर सकती है जब उसके पार्स पर्यार्प्त धन हो तथार् दक्ष कर्मचार्री हों। आर्थिक स्त्रोतों क पतार् लगार्कर उनके समुचित उपयोग करने की व्यवस्थार् क कार्य प्रशार्सन हो होतार् है। वित्त पर नियंत्रण रखने क कार्य भी उसी क होतार् है। वह अपनी शक्तियों को हस्तार्ंतरित भी करतार् है जिससे दूसरे अधिकारी इस शक्ति क उपयोग कर सके। 
  5. अधीक्षण क मूल्यार्ंकन प्रशार्सन संस्थार् के कार्यो के लिए उत्तरदार्यी होतार् है। अत: वह इसकी सभी गतिविधियों पर दृष्टि रखतार् है। वह संस्थार् के कर्मचार्रियों की आवश्यक तार्नुसार्र सहार्यतार् करतार् है तथार् दिशार् निर्देश देतार् है। वह सदैव कार्य प्रगति क लेखार्-जोख रखतार् है। वह कार्यो क मूल्यार्ंकन निरन्तर करतार् रहतार् है। 

लूथर गलिक ने समार्ज प्रशार्सन के कार्यो क वर्णन करने के लिए जार्दुर्इ सूत्र ‘पोस्डकार्ब’ प्रस्तुत कियार् है जिसक तार्त्पर्य है नियोजन करनार्, संगठन करनार्, कर्मचार्री नियुक्ति, निर्देशित करनार्, समन्वय करनार्, प्रतिवेदन प्रस्तुत करनार् तथार् बजट तैयार्र करनार्।

1. नियोजन

नियोजन क अर्थ है भार्वी लक्षित कार्य की रचनार्। इसमें वर्तमार्न दशार्ओं क मूल्यार्ंकन, समार्ज की समस्यार्ओं एवं आवश्यक तार्ओं क पहचार्न, लधु अथवार् दीर्घ अवधि के आधार्र पर प्रार्प्त किये जार्ने वार्ले उद्ेदश्य एवं लक्ष्य तथार् वार्छित सार्ध्यों की प्रार्प्ति के लिए क्रियार्न्वित किय जार्ने वार्ले कार्यक्रम क चित्रण निहित है। भार्रत में योजनार् आयोग की स्थार्पनार् काल से तथार् 1951 में नियोजन प्रक्रियार् के आरम्भ से समार्ज कल्यार्ण नीतियों, कार्यक्रमों एवं प्रशार्सकीय संयत्र पर यघपि आरम्भ में अधिक बल नही दियार् गयार्, परन्तु उसके बार्द क्रमिक पंचवर्षिय योजनार्ओं में उन्हें उचित वार्छित स्थार्न दियार् गयार् है। नियोजित विकास के गत चार्र दशकों के दौरार्न समार्ज कल्यार्ण को योजनार् के एक घटक के रूप में महत्व प्रार्प्त हुआ हैए जैसार् योजनार्ओं में परिलक्षित है। उदार्हरणार्तयार् प्रथम योजनार् में रार्ज्यों से लोगों के कल्यार्ण हेतु सेवार्एँ प्रदार्न करने के लिए बढ़ती हुर्इ योजनार् क आहृार्न कियार् गयार् है। दूसरी पंचवर्षिय योजनार् में समार्ज के पीड़ित वर्गो को समार्ज सेवार् प्रदार्न करने की धीमी गति के कारणों पर ध्यार्न दियार् गयार्। तीसरी योजनार् में महिलार् एवं बार्ल देखभार्ल, सार्मार्जिक सुरक्षार्, विकलार्ंग सहार्यतार् तथार् स्वयंसेवी संगठनों को सहार्यतार् अनुदार्न पर बल दियार् गयार्। चतुर्थ योजनार् में निरार्श्रित बच्चों की आवश्यक तार्ओं को बल मिलार्। पार्ँचवी योजनार् में कल्यार्ण एवं विकास सेवार्ओं के उचित समेकन को लक्ष्य बनार्यार् गयार्। छठी योजनार् में समार्ज कल्यार्ण के आकारचित्र के अन्दर बार्ल कल्यार्ण को उच्च प्रार्थमिकतार् दी गर्इ सार्तवीं योजनार् में समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रमों को इस प्रकार से आकार दियार् गयार् तार्कि वे मार्नव संचार्लन विकास की दिशार् में निर्देशित कार्यक्रमों के पूरक बने। आठवी पंचवष्र्ार्ीय योजनार् में, प्रत्यार्शार् है, वर्तमार्न कल्यार्ण कार्यक्रमों क विस्तार्र तथार् नये कार्यक्रमों को सम्मिलित कियार् जार्येगार्।

नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रियार् है जिसक उद्देश्य कार्यो को व्यवस्थित ढ़ग से सम्पार्दित करने की रूपरेखार् तैयार्र करनार् होतार् है। यह रूप रेखार् पूर्व उपलब्ध तथ्यों के आधार्र पर भविष्य के उद्देश्यों को ध्यार्न में रखकर तैयार्र की जार्ती है। बिनार् विस्तृत नियोजन के कार्यो को ठीक प्रकार के पूरार् करने में कठिनाइ आती है। नियोजन क प्रमुख कार्य उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से पार्रिभार्षित करनार् होतार् है। इसके पश्चार्त् इन लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिए नीति निर्धार्रित करनी होती है। तीसरार् कदम इन तरीकों तथार् सार्धनों की व्यवस्थार् करनी होती है। तदंपु रार्न्त उन ढ़गों तथार् सार्धनों की व्यवस्थार् करनी होती है जिनके द्वार्रार् नीतियों को कार्यार्न्वित कर लक्ष्यों को प्रार्प्त कियार् जार् सके। कार्य क निरन्तर मूल्यार्ंकन भी करनार् होतार् है।

2. संगठन

संगठन से तार्त्पर्य किसी निश्चित उदेद्श्यों हेतु मार्नवी कार्यक्रमों क सचेतन समेकन है। इसमें अन्तनिर्भर अंगों को क्रमबद्ध तौर पर इकट्ठार् करके एक एकत्रित समष्टि क रूप दियार् जार्तार् है। भूतकाल में समार्ज कल्यार्ण न्यूनार्धिक एक छितरार्यी एवं तदर्थ रार्हत क्रियार् थी जिसक प्रशार्सन किसी व्यार्पक संगठनार्त्मक संरचनार्ओंं के बिनार् कियार् जार्तार् थार्। जो कुछ भी कार्य कियार् जार्नार् होतार् थार्, उसक प्रबन्ध सरल, तदर्थ, अनौपचिरिक मार्ध्यम से सार्मुदार्यिक एवं लार्भ भोक्तार्ओं के स्तर पर ही हो जार्तार् थार्। एक अन्य तत्व जो समार्ज कल्यार्ण की अनौपचार्रिक एवं असंगठित प्रकृति क कारण बनार्, वह अषार्सकीय एवं स्वयंसेवी कार्य पर निर्भरतार् थार्। सरकारी प्रक्रियार्एँ जो विशार्ल संगठनार्त्मक संरचनार् तथार् भार्री नौकरशार्ही क रूप ले लेती है, से भिन्न अषार्सकीय क्रियार् समार्ज कल्यार्ण क मुख्य आधार्र रही जो अपनी प्रार्कृति के कारण अत्यार्धिक औपचार्रिक संगठित संयत्र पर कम आश्रित थी। परन्तु समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रमों के विस्तार्र तथार् प्रभार्वित व्यक्तियों की संख्यार् एवं व्यथित धनरार्षि की मार्त्रार् के कारण संगठन अपरिहाय हो गयार् है।

संगठन औपचार्रिक एवं अनौपचार्रिक हो सकतार् है। औपचार्रिक संगठन में सहकारी प्रयार्सों की नियोजित प्रणार्ली है जिसमें प्रत्येक भार्गीदार्र की निश्चित भूमिका, कर्तव्य एवं कार्य होते है। परन्तु कार्यरत व्यक्तियों में सद्भार्वनार् एवं पार्रस्परिक विश्वार्स की भार्वनार्एँ विकसित करने हेतु अनौपचार्रिक सम्बन्ध समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रमों के सुचार्रू संचार्लन के लिए आवश्यक है।

संगठन के अन्तर्गत इसकी प्रभार्वी क्रियार्शीलतार् के लिए कुछ सिद्धार्न्तों पर बल दियार् जार्तार् है। यह अपने सदस्यों के मध्य कार्य विभार्जन करतार् है। यह विस्तृत प्रक्रियार्ओं के द्वार्रार् मार्पक कार्यक्रमों की संस्थार्पनार् करतार् है, यह संचार्र प्रणार्ली की व्यवस्थार् करतार् है। इसकी पदोसोपार्नीय प्रक्रियार्यँ होती है जिससे सत्तार् एवं दार्यित्व की रेखार्एँ विभिन्न स्तरों के मध्य से शीर्ष तथार् नीचे की ओर आती जार्ती है तथार् आधार्र चौड़ार् एवं शीर्ष पर एक अकेलार् अध्यक्ष होतार् है। इसमें आदेश की एकतार् होती है जिसक अर्थ है कि कोर्इ भी व्यक्ति कर्मचार्री एक से अधिक तार्त्कालिक वरिष्ठ से आदेश प्रार्प्त नही करेगार्, तार्कि दार्यित्व स्पष्ट रहे और भ्रार्ँति उत्पन्न न हो।

समार्ज कल्यार्ण क स्वरूप संगठन कल्यार्ण मंत्रार्लय के संगठन में देखार् जार् सकतार् है। इसमें मंत्री इसक रार्जनीतिक अध्यक्ष तथार् सचिव प्रषार्सकीय मुख्य अधिकारी है। विभिन्न स्कीमों के लिए विभिन्न प्रभार्ग है, केन्द्रिय स्तर पर अधीनस्थ संगठन तथार् रार्ष्ट्रीय सार्मार्जिक सुरक्षार् संस्थार्न विकंलार्गों के लिए रार्ष्ट्रीय आयोग एवं अल्पसंख्यक आयोग है। रार्ज्यों एवं संघ क्षेत्रों के स्तरो पर समार्ज कल्यार्ण विभार्ग क संगठन कियार् गयार् है। तथार् केन्द्रीय एवं रार्ज्य दोनों स्तरो पर समार्ज के विभिन्न वर्गो, यथार् महिलार्, बार्लक, अनुसूचित जार्तियार्ँ एवं जनजार्तियार्ँ, भूतपूर्व सैनिकों के कल्यार्ण हेतु निगमों की स्थार्पनार् की जार्ती है, स्वयंसेवी संगठनों में भार्रतीय बार्ल कल्यार्ण परिषद मुख्य संस्थार् है। कल्यार्ण मंत्रार्लय कल्यार्णकारी क्रियार्कलार्पों में मूल एवं मुख्य रूप संलग्न स्वयं सेवी संगठनों को संगठनार्त्मक सहार्यतार् देती है जिनक क्रियार्क्षेत्र उनकी विभिन्न गतिविधियों के समन्वय हेतु केन्द्रीय कार्यार्लय की मार्ँग करतार् है। स्थार्नीय स्तर पर कल्यार्णकारी सेवार्ओं क संगठन विदेशों में उनके प्रतिभार्गों की तुलनार् में कमजोर है। संगठन क कार्य बहुत महत्वपूर्ण होतार् है क्योंकि संस्थार् के कार्यो क सम्पार्दन संगठन पर ही निर्भर होतार् है। भूमिकाओं तथार् परिस्थितियों क निर्धार्रण कियार् जार्तार् है। घटकों के बीच सम्बन्धों को पार्रिभार्षित कियार् जार्तार् है तथार् इसी के सार्थ उत्तरदार्यित्वों को भी स्पष्ट कियार् जार्तार् है। संस्थार् के लक्ष्यों को ध्यार्न में रखकर संगठन की रूपरेखार् तैयार्र की जार्ती है

3. कर्मचार्रियों क चयन

अच्छे संगठन की स्थार्नपार् के बार्द, प्रशार्सन की दक्षतार् एवं गुणवत्तार् प्रशार्सन में सुप्रस्थार्पित कार्मिको की उपर्युक्ततार् से प्रभार्वित हेार्ती है। दुर्बल तौर पर संगठित प्रशार्सन को भी चलार्यार् जार् सकतार् है यदि इसक स्टार्फ सुप्रशिक्षित बुद्धिमार्न कल्पनार्शील एवं लगनशील हो। दूसरी ओर, एक सुनियोजित संगठन क कार्य असंतोष जनक हो सकतार् है। इस प्रकार स्टार्फ शार्सकीय एवं अषार्सकीय दोनों प्रकार के संगठनों क अनिवाय अंगभूत आधार्र है। भर्ती, चयन, नियुक्ति, वर्गीकरण, प्रशिक्षण, वेतनमार्न एवं अन्य सेवार् शर्तो क निर्धार्रण, उत्प्रेरणार् एवं मनोबल, पदोन्नति आधार्र एवं अनुशार्सन, सेवार्निवृत्ति, संघ एवं समिति बनार्ने क अधिकार इन सब समस्यार्ओं की उचित देख भार्ल आवश्यक है। जिससे कि कर्मचार्री अपने कार्यो को सच्ची लगन से निष्पार्दन एवं संगठन क अच्छार् चित्र प्रस्तुत कर सके। संस्थार् के कर्मचार्रियों क चयन प्रशार्सक क एक आवश्यक कार्य होतार् है क्योंकि इसी विशेष तार् पर संस्थार् के कार्यो क सम्पार्दन निर्भर होतार् है। जिस प्रकार के कर्मचार्री होते है उसी के अनुसार्र संस्थार् सेवार्यें प्रदार्न करती है। इस कार्य में निम्नलिखित बिन्दु महत्वपूर्ण होते है।

  1. कर्मचार्री चयन, पदोन्नति आदि से सम्बन्धित नीति स्पष्ट होनी चार्हिए। 
  2. कर्मचार्रियों की शिकायतों क निपटार्रार् शीघ्र कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  3. निर्णय पर बल दियार् जार्नार् चार्हिए तथार् दबार्व के प्रभार्व से उसे बदलार् नही जार्नार् चार्हिए। 
  4. सभी कर्मचार्रियों के स्पष्ट कार्य होने चार्हिए तथार् उसक उत्तरदार्यित्व निश्चित होनार् चार्हिए। 
  5. कर्मचार्रियों में सहयोग की भार्वनार् विकसित करने के निरन्तर प्रयत्न किये जार्ने चार्हिए। 
  6. सम्पेष््र ार्ण द्विमख्ु ार्ी होनार् चार्हिए अर्थार्त् प्रशार्सन तथार् कर्मचार्रियों की और से विचार्रों क परस्पर आदार्न-प्रदार्न होनार् चार्हिए। 

4. निर्देशन 

निर्देशन से तार्त्पर्य है -संगठनों के कार्यक्रमों के क्रियार्न्वयन हेतु आवश्यक निर्देश एवं दिशार् निर्देश जार्री करनार् तथार् बार्धार्ओं को दूर करनार्। कार्यक्रम के क्रियार्न्वन से सम्बन्ध निर्देशों में क्रियार्विधि नियमों क भी उल्लेख होतार् है तार्कि निर्धार्रित उदेद्श्य की उपलब्धि संक्षम एवं सुगम ढ़ग से हो सके। क्रियार्विधि नियमों में यह भी वर्णित कियार् जार्तार् है कि अभिकरण की किसी विशिष्ट गतिविधि से सम्बन्धित किसी प्राथनार् अथवार् जार्ँच-पड़तार्ल पर किस प्रकार कार्यवार्ही की जार्ए। समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन में निर्देश अपरिधर्म है। क्योंकि ये लार्भभोक्तार्ओं को कल्यार्ण सेवार्एँ प्रदार्न करने में संलग्न अधिकारियोंं को दिशार् निर्देश तथार् योग्य प्राथियों को कोर्इ लार्भ दिये जार्ने से पूर्व अनुपार्लित क्रियार्विधि के बार्रे में जार्नकारी प्रदार्न करते है। परन्तु क्रियार्विधि की कठोरतार् से अनुपार्लन लार्लफितार् शार्ही को जन्म दे सकतार् है जिसमें जरूरतमंद व्यक्तियों को वार्छिंत लार्भ प्रदार्न करने में अनार्वष्यक देरी तथार् परेशार्नी हो जार्ती है। समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के कार्मिकों द्वार्रार् अपने दार्यित्व पर कोर्इ निर्णय लेने से बचनार् तथार् दार्यित्व दूसरे पर थोपनार् व्यक्तियों एवं समुदार्यों की प्रभार्वी सेवार् को बार्धित करने वार्लार् दोष है जिसके विरूद्ध सुरक्षार् की जार्नी आवश्यक है। संस्थार् के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कर्मचार्रियों को दिशार्-निर्देश देनार् आवश्यक होतार् है। निर्देशन के निम्नलिखित उद्देश्् य है:-

  1. यह देखनार् कि कार्य नियमों तथार् निर्देशों के अनुरूप हो रहार् है।
  2. कर्मचार्रियों की कार्य सम्पार्दन में सहार्यतार् प्रदार्न करनार्। 
  3. कर्मचरियों में हीन भार्वनार् एवं सहयोग की भार्वनार् बनार्ये रखनार्। 
  4. कार्य क स्तर बनार्ये रखनार्। 
  5. कार्यक्रम की कमियों से परिचित होनार् तथार् उसको दूर करने क प्रयार्स करनार्। 
  6. समन्वय क तार्त्पर्य एक सार्मार्न्य क्रियार्, आन्दोलन यार् दशार् को प्रार्प्त करने के लिए भिन्न-भिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध स्थार्पित करनार् होतार् है। 
    संस्थार् में समन्वय के दो महत्वपूर्ण कार्य है : उद्देश्यों तथार् क्रियार्ओं में एक रूपतार् स्थार्पित करनार् तथार् किये जार्ने वार्ले कार्यो में एकतार् लार्नार् लेकिन यह तभी सम्भव है जब संस्थार् क प्रत्येक सदस्य सार्मार्न्य दृष्टिकोण रखतार् हो।

    प्रत्येक संगठन में कार्य विभार्जन एवं विषिष्टिकरण होतार् है। इससे कर्मियों के विभिन्न कर्तव्य नियत कर दिए जार्ते है तथार् उनसे प्रत्यार्शार् की जार्ती है कि वे अपने सहकर्मियों के कार्य में कोर्इ हस्तक्षेप न करे। इस प्रकार प्रत्येक संगठन में कर्मिकों के मध्य समूह भार्वनार् से कार्य करने तथार् कार्यो के टकरार्व एवं दोहरेपन को दूर करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। कर्मचार्रियों में सहयोग एवं टीम वर्क को विश्वस्त करने के इस प्रबन्ध केार् समन्वय कहते है। इसक उदे्दश्य सार्ंमजस्य, कार्य की एकतार् एवं संघर्ष से बचार्व को प्रार्प्त करनार् है। इसके उद्ेदश्य को दृष्टि में रखते हुए, मूने एवं रेले समन्वय को संगठन क प्रथम सिद्धार्न्त तथार् अन्य सब सिद्धार्न्तों को इसके अधीन समझते है। क्योकि यह संगठन के सिद्धार्न्तों क यौगिक तौर पर प्रकटीकरण करतार् है। चार्ल्र्सवर्थ के अनुसार्र ‘‘समन्वय क अर्थ है उपक्रम के उदे्देश्य को प्रार्प्त करने के लिए कर्इ भार्गों को एक सुव्यवस्थित समग्रतार् में समेकन।

    न्यूमैन के अनुसार्र ‘‘समन्वय क अर्थ है प्रयार्सों क व्यवस्थित ढ़ग से मिलार्नार् तार्कि निर्धार्रित उदेद् “यों की प्रार्प्ति के लिए निष्पदन कार्य की मार्त्रार् तथार् समय को ठीक ढ़ग से निर्देषित कियार् जार् सके। समार्ज कल्यार्ण में समन्वय क केन्द्रीय महत्व है क्योंकि समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रमों में अनेक मंत्रार्लय, विभार्ग एवं अभिकरण कार्यरत है जिनमें कार्य के टकरार्व एवं दोहरेपन के दोष पार्ये जार्ते है जिससे मार्नव प्रयार्स एवं संसार्धनों क अपव्यय होतार् है। इस समय केन्द्रीय स्तर पर कल्यार्ण सेवार्ओं में कार्यरत 6 मंत्रार्लय है तथार् कल्यार्ण प्रशार्सन के क्रियार्न्वन में विषयों की छिन्न भिन्नतार्, अनुदार्न देने वार्ले निकायों की बहुलतार्, संचार्र में देरी तथार् सहयोगी प्रयार्सों के प्रति विमुखतार् अधिक दिखाइ देती है। इसी प्रकार, रार्ज्य स्तर पर विभिन्न रार्ज्यों में सार्त में सत्रह तक विभार्ग कल्यार्णकारी मार्मलों में सम्बद्ध है एवं कल्यार्णकारी सेवार्ओं के कार्यक्रमों में उपार्गम की एकतार्, संगठन में समरूपतार् एवं क्रियार्न्विति में समन्वय क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। स्वयंसेवी संगठन भी कल्यार्णकारी सेवार्ओं में कार्यरत है। उनके मध्य तथार् उनके एवं सरकारी विभार्गों के मध्य समन्वय की समस्यार्एँ जटिल से जटिलतर होती जार् रही है, जैसे-जैसे सहार्यतार् अनुदार्नों में उदार्रतार् आने के कारण उनकी संख्यार् में निरन्तर वृद्धि होती जार् रही है।

    विभिन्न मंत्रार्लयों, विभार्गों एवं स्वयंसेवी संगठनों के मध्य समन्वय को अन्र्तविभार्गीय एवं विभार्गार्ंतर्गत सम्मेलनों, विभिन्न हित समूहों के गैर-सरकारी प्रतिनिधियों को परार्मर्श हेतु सम्मिलित करके द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। अत: कल्यार्ण मंत्रार्लय रार्ज्य सरकारों एवं केन्द्रषार्सित प्रदेशों के समार्ज कल्यार्ण मंत्रियों तथार् विभार्ग सचिवों क वाषिक सम्मेलन समार्ज कल्यार्ण के विविध मार्मलों एवं कार्यक्रमों पर विचार्र विमर्श एवं उनके प्रभार्वी क्रियार्न्वयन को आष्वस्त करने तथार् दोहरेपन से बचने हेतु बुलार्तार् है। संस्थार्गत अथवार् संगठनार्त्मक विधियों, यथार् अन्तर्विभार्गीय समितियों एवं समन्वय अधिकारियों, प्रक्रियार्ओं एवं विधियों के मार्नकीकरण, कार्यकलार्पों के विकेन्द्रीकरण आदि के द्वार्रार् भी समन्वय प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। 1953 में स्थार्पित केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण बोर्ड जिसमें सरकारी अधिकारी तथार् गैर-सरकारी समार्जिक कार्यकर्तार् सम्मिलित है, को समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रमों में कार्यरत सरकारी संगठनों एवं स्वयंसेवी संगठनों के मध्य उचित समन्वय प्रार्प्त करने क एक मार्ध्यम बनार्यार् गयार् है। रार्ज्यीय समार्ज कल्यार्ण परार्मर्शदार्त्री बोर्डो को भी रार्ज्य सरकार एवं केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण बोर्ड के कार्यकलार्पों के मध्य अन्य कार्यार् सहित समन्वय लार्ने तथार् दोहरेपन को दूर करने क कार्य सुर्पुद कियार् गयार्। परन्तु समन्वय हेतु इन संस्थार्गत प्रबन्धों के बार्वजूद भी सरकारी एवं स्वयंसेवी संगठनों के क्षेत्रार्धिकारों मे कल्यार्ण कार्यक्रमों में टकरार्व एवं दोहरार्व के दोष पार्ये जार्ते है। सरकारी एवं स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकलार्पों के क्षेत्रों क सुस्पष्ट सीमार्ंकन, कल्यार्ण सेवार्ओं की समेकित विकास नीति एवं प्रेरक नेतृत्व कल्यार्ण सम्बन्धी उद्देश्यों की अधिकतम प्रार्प्ति हेतु उचित समन्वय विश्वस्त करने में काफी सहार्यक होगे।

    5. प्रतिवेदन

    प्रतिवेदन क अर्थ है, वरिष्ट एवं अधिनस्थ अधिकारियों को गतिविधियों से सूचित रखनार् तथार् निरीक्षण, अनुसंधार्न एवं अभिलेखों के मार्घ्यम से तत्सम्बधी सूचनार् एकत्रित करनार्। प्रत्येक समार्ज कल्यार्ण कार्यक्रम के कुछ लक्ष्य एवं उद्देश्य होते है। संगठन की सोपार्नार्त्मक प्रणार्ली में मुख्य कार्यकारी निचले स्तरों पर कार्य कर रहे कर्मचार्रियों की नीति, वित्तिय परिव्यय एवं निर्धार्रित उद्देश्य की प्रार्प्ति हेतु समय सीमार् से अवगत करार्तार् है अधीनस्थ कर्मचार्री उच्च अधिकारियों को समय-समय पर मार्सिक, त्रैमार्सिक एवं वाषिक, लक्ष्यों के सार्पेक्ष में प्रार्प्त उपलब्धि, व्ययित रार्शि, एवं सार्मने आयी समस्यार्ओं, यदि कोर्इ है, तथार् इन समस्यार्ओं के समार्धार्न हेतु उनक मागदर्शन प्रार्प्त करने के लिए रिपोट भेजते है। विभिन्न मार्मलों के समार्धार्न हेतु अभिकरण एवं अन्तर्भिकरण स्तर पर आयोजित सम्मलनों एवं विचार्र विमर्शो की सूचनार् भी भेजी जार्ती है। उच्च अधिकारी अधीनस्थ कार्यार्लयों क निरीक्षण उनके कार्यकलार्पों की जार्नकारी प्रार्प्त करने एवं अनियमिततार्ओं को पकड़ने तथार् इनको भविष्य में दूर करने हेतु सुझार्व देने के लिए समय-समय पर करते है। कभी-कभी किसी शिकायत की प्रार्प्ति पर समार्ज कल्यार्ण अभिकरणों की गतिविधियों की जार्ँच पड़तार्ल करनी होती है जिसके निष्कर्षो से सम्बन्धित अधिकारियों को सूचित कियार् जार्तार् है। कुछ कल्यार्ण संगठन शोधकार्य भी करते हैं जिसके निष्कर्षो एवं सुझार्वों को नीतियों एवं कार्यक्रमों में संशोधन अथवार् अन्य नयें कार्यक्रमों के निर्मार्ण में प्रयोग हेतु प्रतिवेदन कर दियार् जार्तार् है।

    6. रिपोटिंग

    सभी समार्ज कल्यार्ण एजेंन्सियार्, बिनार् किसी अपवार्द के सम्बन्धित मंत्रार्लय विभार्ग को अपनार् वाषिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते है जो रार्ज्य के अध्यक्ष को विधार्नमंडल की सूचनार् हेतु अन्तत: भेज दी जार्ती है। विभिन्न प्रकार की रिपोर्टो के द्वार्रार् जनतार् को कल्यार्ण एजेन्सियों के क्रियार्कलार्पों की सूचनार् मिल जार्ती है। इस प्रकार रिपोटिंग किसी भी समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन क एक महत्वपूर्ण घटक है।प्रतिवेदन के मार्ध्यम से तथ्यों को प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। इसमें एक निश्चित अवधि में किये गये कार्यो क सार्रार्ंश लिखार् जार्तार् है एक निश्चित अवधि के आधार्र पर प्रतिवेदन तैयार्र कियार् जार्तार् है। संस्थार् के कायोर् की प्रगति क मूल्यार्ंकन करने की दृष्टि से प्रतिवेदन क विशेष महत्व है। संस्थार् में उपलब्ध आलेखों के आधार्र पर प्रतिवेदन तैयार्र कियार् जार्तार् है।

    7. वित्तीय प्रबन्ध

    वित्तीय प्रबन्ध बजट से अभिप्रार्य उस प्रक्रियार् से है जिसके द्वार्रार् सावजनिक अभिकरण की वित्तिय नीति कर निर्मार्ण, विधिकरण एवं क्रियार्न्वन कियार् जार्तार् है। व्यक्तिवार्द के युग में, बजट अनुमार्नित आय एवं व्यय क सधार्रण विवरण मार्त्र थार्। परन्तु आधुनिक कल्यार्ण रार्ज्य में सरकार के क्रियार्कलार्पों में तेजी से वृद्धि हो रही है जो सार्मार्जिक जीवन के सभी पक्षों को आवंटित करती है। सरकार अब सकारार्त्मक कार्यो के द्वार्रार् नार्गरिकों के सार्मार्न्य कल्यार्ण को उत्पन्न करने क एक अभिकरण है। अतएव बजट को अब एक प्रमुख प्रक्रियार् समझार् जार्तार् है जिसके द्वार्रार् जनसंसार्धनों के प्रयोग केार् नियोजित एवं नियंत्रित कियार् जार्तार् है। बजट निर्मार्ण वित्तिय प्रबन्ध क एक प्रमुख घटक है जिसमें विनियोग अधिनियम, व्यव क कार्यकारिणी द्वार्रार् निरीक्षण, लेखार् एवं रिपोटिंग प्रणार्ली क नियंत्रण, कोष प्रबन्ध एवं लेखार् परीक्षण सम्मिलित है। प्रशार्सक क कार्य प्रतिवर्ष वाषिक बजट तैयार्र करनार् तथार् उसे अनुमोदित करनार् होतार् है। संस्थार् के लक्ष्यों के अनुरूप ही बजट तैयार्र कियार् जार्तार् है यह संस्थार् कि आय तथार् व्यय क कथन होतार् है।

    समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के सिद्धार्न्त 

    यद्यपि समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन में किसी आधिकारिक अथवार् सरकारी तौर पर संस्थार्पित प्रशार्सकीय मार्पदण्डों क अभार्व है, तदार्पि निम्नलिखित सिद्धार्न्तों को समार्ज कल्यार्ण व्यवहार्र एवं अनुभव होने के कारण सार्मार्न्य मार्न्यतार् दी गर्इ है एवं जिनक पार्लन सुप्रशार्सित सार्मार्जिक अभिकरणों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है-

    1. समार्ज कल्यार्ण अभिकरण के उद्देश्यों कार्यो क स्पष्ट रूप से वर्णन होनार् चार्हिए। 
    2. इसक कार्यक्रम वार्स्तविक आवश्यक तार्ओं पर आधार्रित होनार् चार्हिए, इसक कार्यक्षेत्र एवं भू-क्षेत्र उस सीमार् तक जिसमें यह प्रभार्री तौर पर कार्य कर सकती है सीमित होनार् चार्हिए, यह समुदार्य के संसार्धनों, प्रतिरूपों एवं समार्ज कल्यार्ण अवार्ष्यकतार्ओं से सम्बन्धित होनार् चार्हिए, यह स्थिर होने की अपेक्षार् गतिमार्न होनार् चार्हिए तथार् इसे बदलती हुर्इ आवश्यक तार्ओं को पूरार् करने के लिए बदलते रहनार् चार्हिए। 
    3. अभिकरण सुसंगठित होनार् चार्ार्हिए, नीति निर्मार्ण एवं क्रियार्न्वन में स्पष्ट अन्तर होनार् चार्हिए, आदेश की एकतार्, अर्थार्त् एक ही कार्यकारी अध्यक्ष द्वार्रार् प्रषार्सकीय निदेषन, प्रशार्सन की सार्मार्न्य योजनार् अनुसार्र कार्यो क तर्कयुक्त विभार्जन, सत्तार् एवं दार्यित्व क स्पष्ट एवं निश्चित सममनुदेशन, तथार् संगठन की भी इकाइयों एवं स्टार्फ सदस्यों क प्रभार्री समन्वय।
    4. अभिकरण को उचित कार्मिक, नीतियों एवं अच्छी कार्यदशार्ओं के आधार्र पर कार्य करनार् चार्हिए। कर्मचार्रियों की नियुक्ति योग्यतार् के आधार्र पर होनी चार्हिए तथार् उन्हें समुचित वेतन दियार् जार्नार् चार्हिए। कर्मचार्रियों वर्ग अभिकरण की आवश्यक तार्ओं को पूरार् करने के लिए मार्त्रार् एवं गुण में पर्यार्प्त होनार् चार्हिए। 
    5. भिकरण मार्नक सेवार् की भार्वनार् से ओतप्रोत होकर कार्य करे, इसे उन व्यक्तियों एवं उनकी आवश्यक तार्ओं की समुचित जार्नकारी होनी चार्हिए जिनकी यह सेवार् करनार् चार्हतार् है। इसमें स्वतंत्रतार्, एकतार् एवं प्रजार्तंत्र की भार्वनार् भी होनी चार्हिए। 
    6. अभिकरण से सम्बन्धित सभी में कार्य की ऐसी विधियों एवं मनोवृत्तियों विकसित होनी चार्हिए जिससे उचित जन सम्पर्क क निमार्ण हो।
    7. अभिकरण क वाषिक बजट होनार् चार्हिए। लेखार् रखने की प्रणार्ली ठीक होनी चार्हिए। एवं इसके लेखों क सुयोगय व्यार्वसार्यिक एजेंसी द्वार्रार् जिसक अपनार् कोर्इ हित नही है, परीक्षण होनार् चार्हिए। 
    8. यह अपने रिकार्ड को ठीक प्रकार से सरल एवं विस्तार्र से रखे जो आवश्यक तार् के समय सुगमतार् ये उपलब्ध हो सके। 
    9. इसकी लिपिकिय एवं अनुरक्षण सेवार्एँ भी मार्त्रार् एवं गुण में पर्यार्प्त तथार् क्रियार्न्वयन में दक्ष होनी चार्हिए। 
    10.  अभिकरण उपयुक्त अन्तरार्ल पर स्वमृल्यार्ंकन करे। गत वर्ष की अपनी सफलतार्ओं एव असफलतार्ओं क अपनी वर्तमार्न प्रस्थिति एवं कार्यक्रमों का, उद्देश्यों एवं संस्थार्पित मार्नदण्डों के अनुसार्र मार्पित अपने निष्पार्दन का, अपनी शक्ति एवं कमजोरियों क अपनी वर्तमार्न समस्यार्ओं क तथार् अपनी सेवार् को बेहतर बनार्ने के लिए अगले उपार्यों क लेखार्-जोखार् लेने के लिए। 

    समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन में अनुश्रवण व मूल्यार्ंकन 

    समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन के अनुश्रवण व मूल्यार्ंकन से हमार्रार् अभिप्रार्य है संस्थार् द्वार्रार् अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनाइ गर्इ क्रियार्विधियों की उपयोगितार् और प्रभार्वितार् की जार्ँच मूल्योकन मुख्यत: किसी संस्थार् के विगत अनुभवों क अध्ययन और आलोचनार् है। इसके अंतर्गत अनेक समूहों के बीच विकसित परस्पर सबंधों क क आलोचनार्त्मक विश्लेषण आतार् है।  इसक उद्देष्य है परिणार्मों को मार्पनार् आरै संग्रहीत प्रतिमार्नों के आधार्र पर लक्ष्यों और पद्धतियों में परिवर्तन लार्नार्। अनुश्रवण व मूल्यार्ंकन संस्थार् में कार्य काने वार्ले व्यक्तियों और समूहों में निरंतर दृढ़तार् उत्पन्न करने क सार्धन बनतार् है। मूल्यार्ंकन के कुछ कार्य निम्नलिखित है-

    1. संस्थार् की प्रगति को मार्पनार्। 
    2. आयोजन और नीति निर्धार्रण के लिए आवश्यक आँकड़ों क संग्रहण, 
    3. सार्मजिक परिवर्त्त्ार्नों के संदर्भ में संस्थार् के कार्यक्रमों की प्रभार्वित की जार्ँच करनार्, 
    4. भार्वी गलतियों और कमजोरियों से बचने के लिए उपलब्धियों क मूल्यार्ंकन करनार्। 
    5. इसक अध्ययन करनार् कि संस्थार् की नीति और उद्देश्य की पूर्ति किस सीमार् तक हो रही है।
    6. संस्थार् के कार्य में प्रयोग मे लाइ जार्ने वार्ली तकनीकों और कुशलतार्ओं में सुधार्र लार्ने के लिए उनक अध्ययन करनार्। 
    7. एक संस्थार् क दूसरी संस्थार्ओं के सार्थ संबंध को समझनार् और समार्ज कल्यार्ण कार्यो में जन-सहयोग की मार्ख क पतार् चलार्नार् तार्कि सेवार्ओं के दोहरार्व को रोक जार् सके,
    8. यह देखनार् कि संस्थार् के कार्यक्रम क लार्भ सेवाथियों को पहुँच रहार् है यार् नही। 
    9. संगृहीत आँकड़ों के आधार्र पर संस्थार् के आगार्मी कार्यक्रम क आयोजन करने के लिए मूल्यार्ंकन उपयोगी है। 
    10. संस्थार् के कार्यक्रम में सुधार्र लार्ने के लिए उसके उद्देष्यों और कार्यक्रमों क व्यार्पक अध्ययन करनार्। 

    1. कार्मिक प्रबंध 

    स्वैच्छिक संस्थार्ओं में कार्मिक प्रबंध की स्थिति बहुत असंतोषजनक है। कार्यकर्त्त्ार्ार्ओं में से केवल 18 प्रतिषतसमार्ज कार्य पर्यवेक्षक के कार्य में संलग्न है। शेष 82 प्रतिषतसमार्ज कार्य के अतिरिक्त कर्मचार्री है- जैसे दफ्तर में कार्य करने वार्ले लिपिक तथार् निम्नवर्गीय कर्मचार्री। उपर्युक्त 82 प्रतिषतमें से 20 प्रतिषतस्नार्तकोत्त्ार्र और और 7 प्रतिषतस्नार्तक है। तीन-चौथाइ के लगभग कार्मिक मार्ध्यमिक स्तर तक भी शिक्षार् प्रार्प्त नही है।

    कर्मवार्री वर्ग श्रेष्ठ प्रशार्सन क महत्वपूर्ण और आधुनिक उपकरण मार्नार् जार्तार् है। समार्ज कार्य के क्षेत्र में भी, जो व्यवसार्यों की तरह एक व्यवसार्य है, उसक महत्व कम नही है। समार्ज कार्य में प्रशिक्षित कार्यकत्त्ार्ार्ओं की उतनी ही आवश्यक तार् है जितनी की दूसरे व्यवसार्यों में। प्रत्येक समार्ज कार्य संस्थार् में सेवार् के स्तर को ऊँचार् रखने के लिए प्रशिक्षित और अनुभवी कार्यकत्त्ार्ार्ओं को नियुक्ति करनार् आवश्यक ही नही, अनिवाय है।

    2. कार्मिक नीति

    प्रत्येक संस्थार् की प्रबंध-समिति द्वार्रार् कार्मिक-संबंधी सुदृढ़ और स्पष्ट बनाइ जार्नी चार्हिए। पश्चिमी देशों में संस्थार्ओं की कार्मिक-संबंधी नीति क विवरण संस्थार् की नियम-पुस्तिक में दियार् जार्तार् है। भार्रत में संस्थार्ओं को ऐसी नियम पुस्तिक बनार्नी चार्हिए, जिसमें कार्मिक प्रबंध के नियम, पद्धति कर्मचार्रियों के प्रकार, नियुक्ति, वेतन, प्रशिक्षण, परस्पर संबंध आदि के विषय में विस्तृत ब्यौरार् हो। इस पुस्तिक में कर्मचार्रियों के कार्य, उनके मूल्यार्ंकन, परियोग्यतार्ओं, कार्मिक के सहयोग आदि के विषय में चर्चार् होनी चार्हिए।

    3. कार्मिकों की नियुक्ति 

    संस्थार् में आवश्यक कर्मचार्रियों की नियुक्ति संस्थार् की नीति के अनुसार्र करनी चार्हिए। प्रत्येक कार्य के लिए न्यूनतम शिक्षार्, प्रशिक्षण तथार् व्यार्वहार्रिक अनुभव आदि की शर्ते निर्धार्रित करनी चार्हिए। योग्य कर्मचार्रियों के चुनार्व के लिए समार्चार्र पत्रों में पदों क विज्ञार्पन देनार् चार्हिए। समार्ज कार्य विद्यार्लय तथार् दूसरी सार्मार्जिक संस्थार्ओं को भी खार्ली पदों के विषय में सूचित करके प्राथनार् पत्र मगँवार्ये जार् सकते है। संस्थार् में कार्य करने वार्ले कर्मचार्रियों को भी इस खार्ली पदों के लिए आवेदन करने के लिए अनुमति होनी चार्हिए।

    समार्ज कार्य के पदों के लिए समार्ज कार्य में प्रशिक्षण एक आवश्यक शर्त होनी चार्हिए। पदों के लिए प्राथियों क लिखित प्राथनार्-पत्र संस्थार् को भेजने चार्हिए, जिसमें उनकी शिक्षार्, प्रशिक्षण, पिछले अनुभवों, आयु आदि के विषय में विस्तृत विवरण हो। इन प्राथनार् पत्रों को जार्ँच के बार्द चुने हुए योग्य प्राथियों को संस्थार् के द्वार्रार् बनाइ कार्मिक समिति के समक्ष सार्क्षार्त्कार के लिए बुलार्नार् चार्हिए। इस समिति में संस्थार् के अध्यक्ष, मंत्री तथार् मुख्य कार्यपार्लक के अतिरिक्त समार्ज-कार्य के विशेष ज्ञ होने चार्हिए। यदि प्रार्थमिक चुनार्व कार्यपार्लक अथवार् उप-समिति के द्वार्रार् कियार् गयार् हो तो दो तीन चुने हुए प्राथियों के प्राथनार् पत्र उप-समिति को सिफार्रिश सहित संस्थार् की प्रबंध/कार्यकारी समिति के सार्मने अंतिम नियुक्ति के लिए रखने चार्हिए। औपचार्रिक तौर पर, उन प्राथियों को, जिनकी नियुक्ति समिति के द्वार्रार् नही की गर्इ हैं इस विषय में सूचित कर देनार् चार्हिए।

    4. प्रशिक्षण, अभिनवीकरण तथार् पुनष्चर्यार् 

    प्रत्येक नवनियुक्ति कर्मचार्री को बार्तचीत द्वार्रार् और संस्थार् की प्रकाषितपुस्तिकाओं और प्रतिवेदनों द्वार्रार् संस्थार् के संगठनार्त्मक ढ़ार्ँचे और कार्यक्र के विषय में जार्नकारी देनी चार्हिए। नए कार्यकर्त्त्ार्ार् को उस भवन में ले जार्कर, जहार्ँ कार्यक्रम चल रहार् हो, कार्यक्रम, कार्यकर्त्त्ार्ार्ओं के दार्यित्व, काम के समय आदि के विषय में बतार्नार् चार्हिए और दूसरे कार्यकत्त्ार्ार्ओं से उनकी भेंट करवार्नी चार्हिए। इस प्रकार प्रत्येक नवनियुक्ति कार्यकर्त्त्ार्ार् का, संस्थार् और उसको सार्ंपै े गए काम के बार्रे में परिचय करवार्कर अभिनवीकरण करवार्नार् लार्भदार्यक होगार्। यह जार्नकारी, उसके लिए संस्थार् में अपनार् दार्यित्व भलीभार्ँति निभार्ने में सहार्यक सिद्ध होगी। संस्थार् के मुख्य अधिकारी के सार्थ बार्तचीत और दूसरे संबद्ध कार्यकत्त्ार्ार्ओं के सार्थ बंठै के अभिनवीकरण के कार्य को सरल बनार्एँगी। यही नही, संस्थार् के विभिन्न अनुभार्गों और दूसरी संस्थार्ओं के सार्थ मेलजोल और बैठकें करने से कर्मचार्रियों के व्यार्वसार्यिक विकास में सहार्यतार् मिलेगी।

    5. प्रशिक्षण 

    पुरार्ने जमार्ने में जरूरतमंदों की समस्यार्ओं क समार्धार्न स्वैच्छिक कार्यकत्त्ार्ार्ओं द्वार्रार् चलाइ जोन वार्ली संस्थार्एँ करती थी। अब यह तार्न लियार् गयार् है कि सार्मार्जिक संस्थार्ओं में सेवाथियों तक सेवार्एँ पहुँचार्ने क कार्य केवल प्रशिक्षित कार्यकर्त्त्ार्ार् को ही करनार् चार्हिए। इसलिए यह कहार् जार् सकतार् है कि हमार्रे देयार् में समार्ज कार्य के व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण की आवश्यकतार् के प्रति जार्गरूकतार् हार्ल ही में उत्पन्न हुर्इ है। अब यह विश्वार्स पुरार्नार् हो चुक है कि समार्ज कार्य के केवल समय, सद्भार्वनार् और त्यार्ग की ही जरूरत है। अब स्वैच्छिक कार्यकर्त्त्ार्ार् भी इस बार्त को स्वीकार करने लगे है कि समार्ज कार्यो के लिए प्रशिक्षित कार्यत्त्ार्ार्ओं होने चार्हिए। संस्थार्ओं में प्रशिक्षित कार्यकत्त्ार्ार्ओं की नियुक्ति की आवश्यक तार् के प्रति जन-जार्ग्रति के सार्थ-सार्थ बदलती हुर्इ परिस्थितियों के कारण ऐसे कार्यकत्त्ार्ार्ओं की मार्ँग बढ़ी है। तेजी से हुर्इ सार्मजिक समस्यार्ओं और सार्मार्जिक विज्ञार्न की प्रगति के कारण समस्यार्ओं क अध्ययन, विश्लेषण और समार्धार्न वैज्ञार्निक तरीके से करनार् अब आवश्यक हो गयार् है। इसलिए प्रशिक्षित कार्यकत्त्ार्ार्ओं की मार्ँग पैदार् हो रही है।

    भार्रत में समार्ज-कार्य क पहलार् महार्विद्यार्लय सन् 1936 र्इ0 में बंबर्इ में स्थार्पित हुआ। वर्तमार्न में बहुत से प्रदेषों में स्वैच्छिक संस्थार्ओं अथवार् विश्वविद्यार्लयों द्वार्रार् ऐसे महार्विद्यार्लय स्थार्पित किये गये है। प्रत्येक वर्ष 500 के लगभग स्नार्तक इन प्रशिक्षण-संस्थार्ओं में तैयार्र किये जार्ते है। कर्इ कारणों से स्वैच्छिक संस्थार्एँ ऐसे प्रशिक्षित कार्यकत्त्ार्ार्ओं की नियुक्ति नही कर पाइ है। समार्ज कार्य के क्षेत्र में कार्यकत्त्ार्ार्ओं की मार्ँग को दृष्टिगत रखते हुए कर्इ स्वैच्छिक संस्थार्ओं के अवर-स्नार्तक-स्तरपर समार्ज कार्य क प्रशिक्षण आरंभ कियार् है। दिल्ली, नार्गपुर, पूनार् और शार्ंति-निकेतन ऐसी संस्थार्एँ काम कर रही है।

    इसके अतिरिक्त केन्द्रीय समार्ज-कल्यार्ण बोर्ड द्वार्रार् स्थार्पित किये गये प्रशिक्षण केन्द्रों में बार्ल सेविकाओं और मुख्य सेविकाओं को प्रशिक्षण दियार् जार् रहार् है। भार्रतीय बार्ल कल्यार्ण परिषद केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण विभार्ग के अनुदार्न के द्वार्रार् कर्इ स्थार्नों पर बार्ल सेंविक प्रशिक्षण-केन्द्र चलार् रही है। नन्ही दुनियार्, देहरार्दून, बार्लकन-जी-बार्री, बंबर्इ, बार्ल निकेतन संघ, इन्दौर, नूतन बार्ल शिक्षण-संघ, कोसबार्द, दक्षिणार्मूर्ति, भार्वनगर आदि कर्इ संस्थार्ओं में बार्लबार्ड़ी-कार्यकत्त्ार्ार्ओं के प्रशिक्षण की व्यवस्थार् है। लखनऊ और हैदरार्बार्द में सार्क्षरतार् निकेतन ने प्रौढ़-सार्क्षरतार् की व्यवस्थार् की है। इस प्रकार, समार्ज कल्यार्ण के अनेक कार्यकत्त्ार्ार्ओं के प्रशिक्षण की व्यवस्थार् स्वैच्छिक संस्थार्ओं ने ही की है।

    संस्थार् को किस प्रकार के कार्यकत्त्ार्ार्ओं की आवश्यक तार् हैं, यह संस्थार् के कार्यो पर निर्भर है। यहार्ँ सभी प्रकार के प्रशिक्षणों के विषय में पूरार् विवरण देनार् सम्भव नही है। अखिल भार्रतीस स्वैच्छिक, समार्ज कल्यार्ण विभार्गों, केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण बोर्ड, जन सहयोग में प्रशिक्षण और अनुसंधार्न के केन्द्रीय संस्थार्न आदि संस्थार्ओं में प्रशिक्षित कार्यकर्त्त्ार्ार् के विषय में जार्नकारी मिल सकती है। समार्ज कार्य के कार्यकत्त्ार्ार्ओं के अतिरिक्त दूसरे कर्इ कार्यकर्त्त्ार्ार्, जैसे दाइ, मिडवार्इफ, शिल्प-शिक्षक, नर्स परिवार्र नियोजन कार्यकर्त्त्ार्ार् आदि, संस्थार्ओं के लिए आवश्यक है। इन कार्यकत्त्ार्ार्ओं के समार्ज की पद्धतियों में अभीनवीनीकरण की आवश्यक तार् है।

    6. सेवार्ंतर्गत प्रशिक्षण 

    यद्यपि संस्थार्ओं की कार्य-पद्धतियों को सुधार्रने के लिए उनके कार्यकत्त्ार्ार्ओं को सेवार्ंतर्गत प्रशिक्षण देनार् एक आवश्यक कदम थार्, तथार्पि केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण बोर्ड ने, जिस पर इसकी जिम्मेदार्री थी, ऐसार् कोर्इ कार्य आरम्भ नही कियार्। केन्द्रीय समार्ज कल्यार्ण विभार्ग ने स्वैच्छिक संस्थार्ओं के कार्यकत्त्ार्ार्ओं को समार्ज-कार्य में अभिनवीनीकरण प्रशिक्षण देने के लिए समार्ज-महार्विद्यार्लयों और संस्थार्ओं को अनुदार्न देकर गोष्ठियों क आयोजन कियार् थार्।

    जन सहयोग में अनुसंधार्न और प्रशिक्षण के केन्द्रीय संस्थार्न की स्थार्पनार् के पश्चार्त् कर्मचार्रियों के प्रशिक्षण क कार्य इस संस्थार्न को सौंपार् गयार् है। संस्थार्न स्वैच्छिक संस्थार्ओं के कार्यकत्त्ार्ार्ओं के लिए गोष्ठियार्ँ तथार् सेवार्ंतर्गत प्रशिक्षण क आयोजन करतार् है। संस्थार्ओं के कार्यपार्लको के लिए संस्थार्न के पार्ठ्यक्रमों क आयोजन कियार्। बार्ल-कल्यार्ण संस्थार्ओं के पर्यवेक्षकों के भी लगभग चार्र प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरे हो चुके है। स्वैच्छिक नेतार्ओं के लिए भी गोष्ठियों क आयोजन कियार् गयार् है। युवार् नेतार्ओं के प्रशिक्षण-पार्ठ्यक्रमों की भी व्यवस्थार् संस्थार्न करतार् है। ऐसे प्रशिक्षण प्रत्येक प्रकार के कार्यकत्त्ार्ार्ओं की आवश्यक तार्ओं को पूरार् करने के लिए आयोजित किये जार्ते है। समार्ज कार्य महार्विद्यार्लयों की सहार्यतार् से संस्थार्न की स्थार्नीय भार्षार्ओं के मार्ध्यम से क्षेत्रीय स्तर पर ऐसे ही पार्ठ्यक्रमों क आयोजन कियार् गयार् थार्। संस्थार्न स्वैच्छिक कार्य संस्थार्ओं के कार्यकत्त्ार्ार्ओं के प्रशिक्षण के क्षेत्र में विद्यमार्न बहुत बड़ी को पार्टने की दिशार् में प्रयत्नशील है।

    7. सेवार् की शर्ते

    स्वैच्छिक संस्थार्ओं द्वार्रार् अपने कार्यकत्त्ार्ार्ओं के विकास के लिए संभवत: कोर्इ योजनार् नही बनाइ गर्इ है। समार्न्यतयार् संस्थार्ओं में सेवार् की शर्ते बहुत ही असंतोषजनकहै।  विशेष कर वेतनमार्न इतने अधिक नही है कि अच्छे कार्यकत्त्ार् इन संस्थार्ओं में सेवार् के लिए आगे आएँ। जो व्यक्ति इन संस्थार्ओं में भर्ती भी होते है, वे शीघ्र ही सेवार्मुक्त होने क प्रयत्न करते है। संस्थार्ओं में योग्य और अनुभवी कर्मचार्रियों के अभार्व क मुख्य कारण उनकी सेवार् की असंतोषजनक शर्ते है। इसके अतिरिक्त चूँकि स्वैच्छिक संस्थार्ओं में पर्यवेक्षक क कार्य स्वैच्छिक कार्यकर्त्त्ार्ार् करते है, इसलिए भी बहुत से प्रशिक्षित स्वैच्छिक संस्थार्ओं में नौकरी के लिए प्रार्थ्र्ार्ी नही होते है। इसलिए यह आवश्यक है कि स्वैच्छिक संस्थार्ओं में कार्मिक नीति के अंतर्गत कर्मचार्रियों की सेवार् की शर्तो क विवरण होनार् चार्हिए। इन शर्तो में वेतनमार्न तथार् भत्त्ार्ार्, नियुक्ति, प्रोन्नति, काम क समय, अवकाश की शर्ते, सेवार्-विमुक्ति दंड, परीविक्षार् काल आदि सम्मिलित होने चार्हिए। वे शर्ते संस्थार् की नियम पुस्तिक में दर्ज होनी चार्हिए।

    8. उपस्थिति एवं कार्यकाल 

    कर्इ बार्र देखार् गयार् है कि स्वैच्छिक संस्थार्ओं के कर्मचार्रियों के लिए काम की कोर्इ अनिश्चित अवधि नही है। कही-कहीं तो वे 10-12 घंटे तक कार्य करते है और कहीं-कहीं 6 घंटे से भी कम। कर्मचार्रियों के काम के समय क निर्धार्रण कर देनार् चार्हिए तार्कि वे लगभग 8 घंटे तक कार्य कर सके, जिसमें एक घंटे क विश्रार्म भी सम्मिलित हो। क्षेत्रीय कार्यकत्त्ार्ार्ओं के कार्य क समय उनके काम के स्वरूप पर निर्भर करतार् है। प्रत्येक अनुभार्ग अथवार् शार्खार् में यदि आवश्यक हो तो संस्थार् के कर्मचार्रियों के लिए एक हार्जिरी रजिस्टर भी रखनार् चार्हिए, जिसमें काम पर पहुँचने के निर्धार्रित समय के अधिक से अधिक 10 मिनट पश्चार्त् तक कर्मचार्री अपने हस्तार्क्षर कर दे। यदि कोर्इ कर्मचार्री समय पर नही पहुँचतार् है तो उसके नार्म के समार्ने अनुपस्थिति क चिह्न लगार् देनार् चार्हिए। तीन बार्र से अधिक समय पर न पहुँचने पर एक दिन की छुट्टी काट लेनी चार्हिए। अनुपस्थिति क ब्यौरार् रखने कि लिए और इस बार्त पर ध्यार्न रखने के लिए कि कर्मचार्री काम पर निर्धार्रित समय पर पहुँचते है, संस्थार् के पर्यवेक्षक को हार्जिरी रजिस्टर निर्धार्रित समय के 15 मिनट के बार्द देख लेनार् चार्हिए। जो कर्मचार्री आदतन देर से आते हों, उन पर नजर रखनी चार्हिए और उनकी कठिनाइयों को दूर करने में सहार्यतार् करनी चार्हिए। कार्यकर्त्त्ार्ार् को यह बार्त अच्छी तरह समझ लेनी चार्हिए कि उनक काम निर्धार्रित समय से आरंभ हो जार्नार् चार्हिए। हार्जिरी-रजिस्टर एक आवश्यक अभिलेख है। इसके आधार्र पर ही कर्मचार्रियों के वेतन बिल बनते है। इसलिए इसके अनुरक्षण के लिए पर्यवेक्षक को विशेष ध्यार्न देनार् चार्हिए।

    9. मध्यार्हृन-अवकाश

    तीन-चार्र घंटे कार्य करने के पश्चार्त् कमचार्रियों को आधे घंटे के लगभग मध्यार्हृ-अवकाश मिलनार् चार्हिए तीन घंटे लगार्तार्र कार्य करने के उपरार्ंत यह विश्रार्म अत्यार्वार्श्यक है। इससे कार्यकर्त्त्ार्ार् की दक्षतार् बढ़ती है। पर्यवेक्षक को इस बार्त को भी ध्यार्न में रखनार् चार्हिए कि सभी कर्मचार्री इस समय क सदुपयोग करे।

    10. अवकाश नियम

    संस्थार् को अवकाश नियम बनार्ने चार्हिए, जिनकी जार्नकारी कर्मचार्रियों को होंनी चार्हिए। यह कोर्इ जरूरी नही है कि प्रत्येक संस्थार् सरकारी अवकाश-नियमों क पार्लन करे। किन्तु संस्थार् को कुछ सरल नियम बनार् ही लेने चार्हिए, जिसमें अल्प और दीर्घकालीन अवकाश की व्यवस्थार् होनी चार्हिए। कर्मचार्रियों के अवकाश की व्यवस्थार् के लिए निम्नलिखित मोटी-मोटी बार्तों क ध्यार्न रखनार् चार्हिए:-

    1. अवकाश स्थार्नीय सरकार के द्वार्रार् स्वीकृत अवकाश-सूची संस्थार्ओं को अपनार्नी चार्हिए। इसके अतिरिक्त सप्तार्ह में किसी एक दिन संस्थार् को पूर्ण अवकाश रखनार् चार्हिए और उससे एक दिन पहले अर्द्ध-अवकाश की व्यवस्थार् करनी चार्हिए। 
    2. आकस्मिक छुट्टी अल्पार्वधि की बीमार्री, निजी आवश्यक कार्य आदि के लिए प्रत्येक कर्मचार्री को दस से पन्द्रह दिन तक की आकस्मिक छुट्टी मिलनी चार्हिए। यह छुट्टी कर्मचार्री की प्राथनार् पर स्वीकृत की जार्नी चार्हिए । 
    3. अर्जित छुट्टी आकस्मिक छुट्टी के अतिरिक्त, कर्मचार्रियों की लम्बी बीमार्री, निजी काम, विश्रार्म और मंनोरजन के लिए प्रत्येक मार्स की सेवार् पश्चार्त् एक दिन और वर्ष पूरार् होने के बार्द 20 दिनों की अर्जित छुट्टी मिलनी चार्हिए। प्रार्य: तीन मार्स से अधिक छुट्टी जमार् करने की अनुमति नही होनी चार्हिए। 
    4. विषेश अवकाश कर्इ संस्थार्ओं में एक मार्स के अनिवाय वाषिक अवकाश की व्यवस्थार् होती है। इन संस्थार्ओं में आकस्मिक तथार् अर्जित अवकाश की दर कम कर दी जार्ती है। कर्इ संस्थार्ओं में आकस्मिक अवकाश तथार् अर्जित अवकाश के एवज में वेतन दियार् जार्तार् है। यदि कर्मचार्री अपनी अर्जित अवकाश क उयोग नही करते है तो उसे उसके सार्मार्न्य दर के वेतन से उतने दिनों क वेतन दे दियार् जार्तार् है। कर्इ संस्थार्ओं में विष्ेार्श अवकाश, बीमार्री की छुट्टी, अध्ययन अवकाश अथवार् अर्ध-वेतन अवकाश की व्यवस्थार् भी है। 

    यह देखार् गयार् है कि हमार्री सार्मार्जिक संस्थार्ओं ने कर्मचार्रियों के अवकाश की ओर कोर्इ विशेष ध्यार्न नही दियार् है। यदि संस्थार् लंबे चौडे़ अवकाश न बनार्नार् चहार्ती हो तो मोटे तौर पर उसे वर्ष में कम से कम कुल मिलार्कर एक मार्स के अवकाश की व्यवस्थार् तो कर ही देनी चार्हिए। जिस कर्मचार्री को अवकाश की सुविधार् मिलेगी, उसकी दक्षतार् बढे़गी और वह अधिक कार्य करेगार्।

    11. कार्य की परिस्थितियार्ँ 

    कार्य की परिस्थितियों क प्रभार्व कर्मचार्रियों के स्वार्स्थ्य, दक्षतार् और निष्पार्दन पर पड़तार् है। प्रत्येक ऐसी संस्थार् को, जो कि वैतनिक कार्यकत्त्ार्ार्ओं को नियुक्ति करती है अपने कर्मचार्रियों के लिए कार्य की समुचित परिस्थितियों की व्यवस्थार् करनी चार्हिए। कार्य की परिस्थितियों में शार्मिल है- कार्य स्थल क पर्यार्वरण, जैसे प्रकाश, उचित तार्पमार्न, पार्नी, सफाइ, शौचार्लय, आग से बचार्व क प्रबंध, कैंटीन, विश्रार्म की सुविधार् आदि। सेवार्ाथियों के सार्थ भेंट करने और गुप्त वात्त्ार्ार्लार्प के लिए संस्थार् में व्यवस्थार् होनी चार्हिए।

    परिवीक्षार् काल:नियुक्ति के बार्द कर्मचार्रियों के लिए परिवीक्षार् काल को संतोषजनक ढ़ग से पूरार् करनार् अनिवाय होतार् है। इस व्यवस्थार् ये कर्मचार्री तथार् दोनों को एक दूसरे के विषय में समुचित ज्ञार्न हो जार्तार् है। यदि कोर्इ कर्मचार्री परिवीक्षार्-अवधि में संतोषजनक कार्य करतार् है तो उसकी नौकरी पक्की कर दी जार्ती है। किन्तु, परिवीक्षार् संबंधी नियम विभिन्न संस्थार्ओं में विभिन्न पदों के लिए विभिन्न है। संस्थार्ओं को चार्हिए कि नौकरी की शर्ते निर्धार्रित करते समय वे निम्नलिखित बार्तों को ध्यार्न में रखे:-

    1. किन पदों के लिए परिवीक्षार् काल की शर्त हो। 
    2. परिवीक्षार् की अवधि कितनी हो। 
    3. इस अवधि को बढ़ार्ने की विधि। 
    4. परिवीक्षार् काल में कर्मचार्री के कार्य क मूल्यार्ंकन और उसके पक्क करने की पद्धति। 

    नौकरी के स्वरूप और प्रकारों को ध्यार्न में रखकर परिवीक्षार् काल तीन मार्स से दो वर्ष तक होतार् है। यह शर्त संस्थार् के उन कर्मचार्रियों पर भी लार्गू होनी, चार्हिए जिनकों प्रोन्नति दी गर्इ हो।

    प्रोन्नति तथार् पद पर पुष्टि :संस्थार् को प्रोन्नति तथार् पुष्टि की शर्तो और विधि के विषय में नियम बनार्ने चार्हिए, जिनकी जार्नकारी सब कर्मचार्रियों को हो। प्रोन्नति और पद पर पुष्टि शिक्षार् स्तर, कार्य के अनुभव, कार्य निष्पार्दन के मूल्यार्ंकन और अधिक दार्यित्व उठार्ने की क्षमतार् आदि के आधार्र पर होनी चार्हिए। नये पदों को भरने के लिए संस्थार् में कार्य कर रहें कर्मचार्री को प्रोन्नति के अवसर भी दिये जार्ने चार्हिए। 

    वेतन तथार् भत्ते:पदों के वेतनमार्न, उनके लिए निर्धार्रित शिक्षार् स्तर कार्य के अनुभव की अवधि, दार्यित्व के स्वरूप आदि बार्तों को ध्यार्न में रखकर नियत करने चार्हिए। प्रत्येक पद के लिए वेतनमार्न की न्यूनतम और अधिकतम सीमार् होनी चार्हिए, जिसमें अच्छे निष्पार्दन अथवार् कार्य के फलस्वरूप वेतन-वृद्धि की व्यवस्थार् हो। कर्मचार्रियों के संतोषजनक कार्य के फलस्वरूप उनकी नियुक्ति बनार्ये रखने और उसके वेतन में वृद्धि के लिए व्यवस्थार् होनी चार्हिए। किसी पद के लिए वेतनमार्न निर्धार्रित करते समय निम्नलिखित बार्तों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए-

    1. कर्मचार्री के दार्यित्व की मार्त्रार्
    2. सेवार् को समुदार्य क लार्भ
    3. दार्यित्व निभार्ने के लिए कुशलतार् की मार्त्रार्। 
    4. सरकारी तथार् स्वैच्छिक संस्थार्ओं में ऐसे तुलनार्त्मक पदों के लिए नियत वेतनमार्न, 
    5. पद के लिए निर्धार्रित शिक्षार्, प्रशिक्षण तथार् पिछले अनुभव की शर्ते। 

    सरकारी संस्थार्ओं में कर्मचार्रियों को दिये जार्ने वार्ले महँगाइ भत्त्ो, मकान किरार्यार्, प्रतिपूरक भत्त्ो आदि की दरों के अनुसार्र स्वैच्छिक संस्थार्ओं में भी भत्ते देने क प्रयत्न करनार् चार्हिए। वेतन और भत्ते क भुगतार्न मार्स के समार्प्त होने के एक सप्तार्ह के भीतर कर्मचार्रियों को कर देनार् चार्हिए। कर्इ संस्थार्एँ कर्मचार्रियों को वेतन और भत्त्ार्ार् देने में विलम्ब कर देती है। जहार्ँ तक सम्भव हो वेतन और भत्त्ों के भुगतार्न में विलम्ब नही करनार् चार्हिए। इसके अतिरिक्त भविष्य निधि और सेवार् निवृत्ति उपदार्न की व्यवस्थार् करने क यत्न भी संस्थार् को करनार् चार्हिए। ऐसी सुविधार्एँ देने से कर्मचार्रियों मे कार्य के प्रति रूचि बनी रहेगी और वे संस्थार् संस्थार् की सेवार् में टिके रहेगें।

    दण्ड, सेवार्-निवृित्त्ार् तथार् छँटनी :प्रार्य: यह देखने में आयार् है कि स्वैच्छिक संस्थार्ओं में कार्यकर्त्त्ार्ार् इसलिए काम नही करनार् चार्हते है कि वहार्ँ सेवार् सुरक्षार् नही है। संस्थार् के लिए सुनिश्चितकार्यकत्त्ार्ार्ओं की नियुक्ति के लिए यह जरूरी है कि संस्थार् में दंड़ देने, सेवार् निवृित्त्ार्, छटनी और त्यार्ग पत्र देने के लिए नियम बनार्ये जार्यें। इन नियमों में निम्नलिखित बार्तों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए:- 

    1. किस कर्मचार्री को कौन अधिकारी, कब, कैसे और कितनार् दंड दे सकतार् है, 
    2. अपनी सेवार् की शर्तो के विषय में वह किस अधिकारी से अपील कर सकतार् है। 
    3. उसे त्यार्ग-पत्र किसको देनार् चार्हिए और उसकी सूचनार् अवधि कितनी होनी चार्हिए। 
    4.  कर्मचार्रियों की छँटनी किन परिस्थितियों में हो सकती है और उसे मुआवजार् किस दर से मिलनार् चार्हिए, 
    5. कर्मचार्री की किस आयु में सेवार्-निवृित्त्ार् होनी चार्हिए और उसे क्यार्-क्यार् सुविधार्एँ दी जार्नी चार्हिए। 

    इन शर्तो क उल्लेख संस्थार् की नियम पुस्तिक में होनार् चार्हिए तार्कि प्रत्येक कर्मचार्री को इसकी जार्नकारी प्रार्प्त हो सके। 

    मूल्यार्ंकन और पर्यवेक्षण :कर्मचार्रियों के निष्पार्दन और उनके विकास के विषय में मूल्यार्ंकन की व्यवस्थार् प्रत्येक संस्थार् को करनी चार्हिए। कर्मचार्रियों को इस मूल्यार्ंकन में भार्गीदार्र होनार् चार्हिए। मूल्यार्ंकन अभिलेख गुप्त रखनार् चार्हिए। यदि कार्यकर्त्त्ार्ार् में कुछ भी कमी क अनुभव हो तो उसके विषय में उसे बतार् देनार् चार्हिए। मूल्यार्ंकन क अधिकार एक से अधिक व्यक्ति को होनार् चार्हिए। मूल्यार्ंकन और पर्यवेंक्षण, कार्यकर्त्त्ार्ार् के विकास और दार्यित्व को बेहतर तरीके से निभार्ने में उसके लिए सहार्यक सिद्ध होते है। 

    कार्मिक विधि :स्वैच्छिक संस्थार्ओं के नेतार्ओं के विषय में प्रार्य: यह शिकायत की जार्ती है कि वे कार्मिको के काम की शर्तो के विषय में कोर्इ कायदार्-कानून प्रयोग में नही लार्ते और अपने व्यक्तिगत पूर्वार्ग्रहों तथार् पक्षपार्त के अनुसार्र कार्मिकों के विषय में सोंचते है। अब यह सम्भव नही है, क्योकि कार्मिकों के कार्य की शर्ते, वेतनमार्न, सेवार् निवृित्त्ार्, मुआवजार् आदि के विषय में सरकार ने कानून बनार् दिये है। अब कार्मिकों के लिए श्रम-न्यार्यार्लयों के दरवार्जे खुले है और वे संस्थार् से संतुष्ट न होने पर अपनी व्यथार् निवार्रण के लिए कानून क सहार्रार् ले सकते है। इसलिए यह आवश्यक है कि संस्थार्ओं को इन श्रम विधियों की जार्नकारी होनी चार्हिए। 

    कार्मिक अभिलेख :संस्थार्ओं के लिए श्रम-विधियों क पार्लन करनार् अनिवाय है। इसलिए उनकों चार्हिए कि प्रत्येक कर्मचार्री के विषय में कानून के अनुसार्र अभिलेख तैयार्र करे। कार्यकर्त्त्ार्ार् की व्यक्तिगत फार्इल में उसक प्राथनार् पत्र, नियुक्ति पत्र, उसकी शिक्षार् और पिछले अनुभवों के विषय में प्रमार्ण-पत्रों की प्रमार्णित प्रतिलिपियार्ँ, उसक अवकाश अभिलेख और सम्बन्धित पत्र व्यवहार्र, कर्मचार्रियों के मूल्यार्ंकन क प्रतिवेदन आदि सम्मिलित होने चार्हिए। कार्मिक अभिलेख कर्मचार्री के सार्थ विवार्द की हार्लत में बहुत उपयोगी सिद्व होगे। 

    सुनिश्चित और अनुभवी कर्मचार्री प्रार्प्त करने के लिए प्रत्येक संस्थार् को कार्मिक नीति निर्धार्रण करनी चार्हिए, जिसमें काम काज की ऐसी शर्ते सम्मिलित हो, जो कार्यकत्त्ार्ार्ओं को आकर्षित करे। वेतन, भत्त्ो, काम क समय, नियुक्ति, दंड देने आदि की शर्ते उस क्षेत्र में कार्य करने वार्ली दूसरी संस्थार्ओं की नीति और शर्तो से कम नही होनी चार्हिए तार्कि संस्थार् के कर्मचार्री दूसरी संस्थार्ओं के कर्मचार्रियों से तुलनार् करके हीन भार्वनार् क अनुभव न करे।

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