समार्चार्र क अर्थ, महत्व एवं स्रोत
समार्चार्र क सीधार् सम्बन्ध मनुष्य की सतत जिज्ञार्सार् से है। नयार् जार्नने की इच्छार् ही समार्चार्र क प्रमुख आकर्षण है और समार्चार्र प्रार्य: हमें कुछ न कुछ नयार् ही देतार् है। जो कुछ नयार् होतार् है वह एक तरह से समार्चार्र है और जो कुछ जार्नने की यह जिज्ञार्सार् मनुश्य में सदार् सर्वदार् से रही है। नयार् जार्नने के लिए मनुश्य को अन्वेशक बनन पड़तार् है। खोजी बननार् पड़तार् है, यार्त्रार्एं करनी पड़ती हैं, विष्लेशण करने पड़ते हैं, चीजों की गहराइ में जार्नार् पड़तार् है, एक पत्रकार को भी यही सब करनार् पड़तार् है। इस तरह जो कुछ नयार् है वह अगर समार्चार्र है तो जो उस नए को प्रस्तुत कर रहार् है वह पत्रकार है। भार्रतीय परम्परार् में देवऋशि नार्रद को एक तरह से पहलार् पत्रकार इसलिए मार्नार् जार्तार् है कि वो जहार्ं जार्ते थे, दूसरी जगह क समार्चार्र वहार्ं पहुंचार् देते थे। रार्मचरितमार्नस में हनुमार्न जब लंक से वार्पस लौटे तो उनसे सबसे पहलार् सवार्ल यही थार् कि वहार्ं क समार्चार्र क्यार् है ? महार्भार्रत की कथार् में संजय धृतरार्श्ट्र को युद्ध क जो हार्ल बैठे-बैठे सुनार्ते हैं वह एक प्रकार क समार्चार्र ही है। हमार्री चिटिठयों में भी प्रार्य: यह लिखार् जार्तार् है, यहार्ं सब ठीक ही हैं, वहार्ं के समार्चार्र क्यार् हैं ?

जार्नने की हमार्री इस जिज्ञार्सार् को आधुनिक रूप में न्यूज यार् समार्चार्र संतुश्ट करते हैं। अलग-अलग रूपों में कभी रेडियो के जरिए, कभी अखबार्रों के जरिए और कभी टीवी यार् अन्य आधुनिक मार्ध्यमों के जरिए। समार्चार्र प्रार्प्त करने के तरीके आज लगार्तार्र बदल रहे हैं और नए-नए तरीके विकसित होते जार् रहे हैं लेकिन इस बार्त से इनकार नहीं कियार् जार् सकतार् कि समार्चार्र अथवार् न्यूज क वर्तमार्न स्वरूप छपे हुए अक्षरों और उन अक्षरों से पैदार् हुए अखबार्रों की ही देन है। तरह – तरह की सूचनार्ओं, के मुंह से सुने यार्त्रार् अनुभवों के विवरण, किस्से कहार्नियों और व्यार्पार्र की जार्नकारियों से “ार्ुरू आधुनिक पत्रकारितार् की यार्त्रार् आज नेट पत्रकारितार् तक जार् पहुंची है। लेकिन इनफोटेनमेंट के इस युग में खबर यार्नी न्यूज क महत्व सबसे ऊपर है और समार्चार्र की यही विषेशतार् उसे आज सूचनार् क्रार्ंति के इस दौर में भी सर्वार्धिक महत्वपूर्ण बनार्ए हुए है।

समार्चार्र की प्रकृति व अर्थ

क्यार् कभी आपने समार्चार्र की प्रकृति एवं उसके अर्थ के बार्रे में में विचार्र कियार् है। देश एवं सार्रे विश्व में घटित होने वार्ली विभिन्न घटनार्ओं की जार्नकारी प्रार्प्त करने के लिए हर व्यक्ति रेडियो सुनतार् है, टी. वीदेख् ार्तार् है एवं अख़बार्र भी पढ़तार् है। ऐसार् आप क्यों करते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में आप यही कहेंगे कि ‘सूचनार्ऐं प्रार्प्त करने के लिए’। सूचनार्ओं के अभार्व में आप शेष विश्व से अपने आपको अलग-थलग पार्ते हं।ै सूचनार्ओं की जार्नकारी के बिनार् आप अपने आप को समार्ज से नहीं जोड़ सकते हैं- न रार्जनैतिक रूप से, न सार्मार्जिक रूप से और न आर्थिक रूप से। प्रार्य: कोर्इ भी व्यक्ति सोमवार्र क समार्चार्र शुक्रवार्र को पढ़नार् पसन्द नहीं करतार्। क्यों ? हम किसी जार्नकारी यार् घटनार् को पुष्ट करने के लिए पुरार्ने अखबार्र जरूर देखते हैं लेकिन सार्मार्न्य रूप से हम ऐसार् प्रतिदिन नहीं करते। अत: समार्चार्र वह है जो नवीन है और सार्थ ही सार्थ समार्चार्र वह भी है जो हमें पूरे विश्व से जोड़तार् है।

समार्चार्र की परिभार्षार्

समार्चार्र अर्थार्त खबर के बार्रे में एक निश्चित विचार्र नहीं मिलतार्। उसकी एक निश्चित परिभार्षार् नहीं दी जार् सकती है। क्योंकि समार्चार्र वस्तुत: एक भार्वजन्य अभिधार्रणार् है जिसक अर्थ मार्नवीय मूल्य व अभिरूचि के अनुसार्र बदलतार् है। इसलिए यह समझ लेनार् चार्हिए कि समार्चार्र सार्पेक्ष होते हैं पूर्ण नहीं। समार्चार्र अपने से जुड़े कारकों एवं तथ्यों के परिवर्तित होने के सार्थ ही परिवर्तित होते रहते हैं। अत: समार्चार्र की परिभार्षार् निम्न कारकों पर आधार्रित होती है।

  1. पार्ठक वर्ग के आकार पर। 
  2. समार्चार्र पत्र/पत्रिक की आवृत्ति (दैनिक/सार्प्तार्हिक/पार्क्षिक आदि) पर। 
  3. पार्ठक वर्ग के सार्मार्जिक व आर्थिक प्रकार पर। 
  4. पार्ठक वर्ग की मार्ंग के अनुसार्र (जैसे स्थार्नीयतार् और मुद्दों से जुड़ी वरीयतार् आदि)। 

जौन बोगाट की प्रसिद्ध परिभार्षार् से सभी परिचित होंगे जिसमें वे कहते हैं कि ‘‘कुत्ते ने आदमी को काटार् यह समार्चार्र नहीं है बल्कि समार्चार्र यह है कि आदमी ने कुत्ते को काटार्’’। अर्थार्त कुछ असार्मार्न्य यार् असार्धार्रण ही समार्चार्र क हिस्सार् होतार् है यार् समार्चार्र बन सकतार् है।

सन् पत्रिक के सम्पार्दक समार्चार्र को परिभार्षित करते हुए लिखते हैं- ‘‘समार्चार्र हर वह घटनार् है जो पर्यार्प्त रूप से जनतार् क ध्यार्न आकर्षित करे और जनतार् से जुड़ी हो।’’ न्यूयाक वल्र्ड के प्रकाशक जोसेफ पुलित्जर के अनुसार्र- ‘‘समार्चार्र मौलिक, स्पष्ट, नार्टकीय, रोमार्ंस से परिपूर्ण, अद्भुत, अनोखार्, विलक्षण, हार्स्यपूर्ण, असार्मार्न्य एवं उत्तेजित करने वार्लार् हो, जिसके बार्रे में चर्चार् हो सके। समार्चार्र को विभिन्न विद्वार्नों ने अलग – अलग तरह से परिभार्षित कियार् है।

  1. प्रो. विलियम जी ब्लेयर के अनुसार्र- अनेक व्यक्तियों की अभिरूचि जिन बार्त में होती है वह समार्चार्र है। सर्वश्रेष्ठ समार्चार्र वह है, जिसमें बहुसंख्यक लोगों की अधिकतम रूचि हो। 
  2. जाज एच. मैरिस के अनुसार्र- समार्चार्र जल्दी में लिखार् गयार् इतिहार्स है। बूलस्ले और कैम्पवेल के अनुसार्र- समार्चार्र किसी वर्तमार्न विचार्र, घटनार् यार् विवार्द क ऐसार् विवरण है, जो उपभोक्तार्ओं को आकर्षित करे। 
  3. ए. लार्इल स्पेंसर के अनुसार्र- वह सत्य घटनार् यार् विचार्र समार्चार्र है जिसमें बहुसंख्यक पार्ठकों की रूचि हो। 
  4. न्यूयाक टार्इम्स के पूर्व प्रबन्ध सम्पार्दक के अनुसार्र- समार्चार्र, जिसे आप अभी आज जार्न रहे हैं और जिसे आप पहले नहीं जार्नते थे। 
  5. डॉ. नन्दकिशोर के अनुसार्र- समार्चार्र पत्र क मौलिक कच्चार् मार्ल न कागज है, न स्यार्ही- वह है समार्चार्र। फिर चार्हे प्रकाशित सार्मग्री ठोस संवार्द के रूप में हो यार् लेख के रूप में, सबके मूल में वही तत्व रहतार् है जिसे हम समार्चार्र कहते हैं। 
  6. श्री खडिलकर के अनुसार्र- दुनियार् में कहीं भी किसी समय कोर्इ भी छोटी-मोटी घटनार् यार् परिवर्तन हो उसक शब्दों में जो वर्णन होगार्, उसे समार्चार्र यार् खबर कहते हैं। 
  7. प्रवीण के अनुसार्र- पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित और रेडियो टेलीविजन जैसे इलैक्ट्रॉनिक जनसंचार्र मार्ध्यमों में प्रसार्रित होने वार्ले समार्न महत्व के सावजनिक विचार्रों, घटनार्ओं और क्रियार्कलार्पों के उस विवरण को ‘समार्चार्र’ कहते हैं जिससे हमें किसी तरह की शिक्षार्, सूचनार् अथवार् मनोरंजन प्रार्प्त होने की अनुभूति होगी। 

समार्चार्र के प्रमुख तत्व

  1. सार्मयिकतार्- किसी भी समार्चार्र अथवार् खबर को एकदम नवीन होने के सार्थ-सार्थ सही समय से जनसार्मार्न्य तक पहुँचनार् चार्हिए। 
  2. स्थार्नीयतार्/निकटतार्- सार्मार्न्यतयार् पार्ठक वर्ग अपने आस-पार्स गार्ँव, कस्बे यार् देश की खबरों में रूचि रखतार् है, बजार्य इसके कि खबर दूर की हो। सार्थ ही वह उन खबरों में ज्यार्दार् रूचि लेतार् है जिसक उस पर प्रत्यक्ष प्रभार्व पड़तार् है और जिन खबरों से वह अपनार् तार्रतम्य कर सकतार् है। उदार्हरणाथ- पार्ठक वर्ग वर्ग को महंगाइ क मुद्दार्, रुपये के अवमूल्यन अथवार् बैंक के रार्ष्ट्रीयकरण की अपेक्षार् ज्यार्दार् प्रभार्वित करतार् है। 
  3. वैशिष्ट्य- विशिष्ट लोगों के सार्थ जब कुछ घटित होतार् है तो वह भी समार्चार्र क अहम् हिस्सार् बन जार्तार् है। लोग इस तरह की घटनार्ओं के बार्रे में अधिक से अधिक जार्नने को आतुर हो जार्ते हैं। 
  4. विवार्द, हिंसार् अथवार् संघर्ष- जब कभी गली मुहल्लों अथवार् विभिन्न सम्प्रदार्यों में विवार्द होतार् है तो जनसार्मार्न्य स्वत: ही इन विवार्दों से जुड़ जार्तार् है। अत: सभी प्रकार के विवार्द, हिंसार् यार् संघर्ष भी खबर बन जार्ते हैं। 
  5. सरकारी एवं रार्जनैतिक गतिविधियार्ँ- समय-समय पर सरकारी गजट, कानून, बिल, एक्ट अध्यार्देश नियमन आदि जिनसे आम जन प्रभार्वित होते हैं। अच्छी खबर बनते हैं। क्योंकि इन खबरों क सीधार् असर लोगों के जीवन पर होतार् है और उनके निजी हार्नि-लार्भ भी इससे जुड़े होते हैं। 
  6. विकासशील परियोजनार्एं एवं मुद्दे- विज्ञार्न के क्षेत्र में किसी अन्वेषण क समार्चार्र जिनसे किसी समुदार्य यार् समार्ज के किसी हिस्से की जीवनशैली में बदलार्व आतार् हो अथवार् किसी असार्ध्य रोग की कारगर दवार् की खोज क समार्चार्र भी समार्चार्र क महत्वपूर्ण तत्व है। 
  7. मार्नवीय अभिरूचि- ऐसी घटनार् जो सार्हस, शौर्य, हार्स्य, विजय, मनोरंजन, कौतूहल अथवार् जिज्ञार्सार् से भरपूर हो एवं ऐसार् समार्चार्र जो मार्नव-हित में हो और अनुकरणीय हो, अच्छार् समार्चार्र बन जार्तार् है। पार्ठक ऐसी घटनार् अथवार् सूचनार् को कौतूहल से पढ़ते हैं जो अन्य लोगों पर घटित हो रहार् हो जैसे- खार्प पंचार्यतों ने एक ही गोत्र में शार्दी करने पर पति-पत्नी को सजार् देने क फैसलार् कियार्। 
  8. मौसम एवं खेल- चक्रवार्त, मार्नसून की पूर्व सूचनार् एवं खेल आदि भी समार्चार्र के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
  9. प्रतिक्रियार्त्मकतार्- किसी घटनार् क समार्चार्र के तौर पर आनार् फिर सिलसिलेवार्र उसकी तार्जगी बनार्ए रखते हुए समार्चार्र को सार्मयिक रखनार् समार्चार्र की विशेषतार् बनतार् है। 

समार्चार्रों क वर्गीकरण

1. ठोस समार्चार्र – 

इस प्रकार के समार्चार्र सीधे एवं सरल होते हैं ये वे समार्चार्र होते हैं जिसमें घटनार् क सरल स्पष्ट और सही तथ्यार्त्मक विवरण प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। इनमें तथ्यों को जैसे क तैसार् प्रस्तुत कियार् जार्तार् है, तथ्यों को तोड़ार्-मरोड़ार् नहीं जार्तार् है। ऐसे समार्चार्रों में दुर्घटनार्एं दंगार्, प्रार्कृतिक आपदार्एं, आपरार्धिक घटनार्एं, किसी महत्वपूर्ण खेल गतिविध की जीत-हार्र, लोकप्रिय व्यक्तियों के निजी जीवन की कोर्इ आकस्मिक घटनार् आदि विशय प्रमुख होते हैं। अर्थार्त वे सभी घटनार् प्रधार्न समार्चार्र जिनमें कोर्इ वैचार्रिक उलझार्व नहीं होतार्। इन समार्चार्रों को लिखते समय संवार्ददार्तार् के लिए यह आवश्यक होतार् है कि वह घटनार्स्थल, समय, सत्यतार् और स्पष्टतार् क ध्यार्न रखे। 

घटनार् क क्यार्, कब, कहार्ँ, कौन द्वार्रार् प्रस्तुतिकरण अर्थार्त यह इतने बजे यहार्ँ इसके सार्थ घटित हुआ, हाड अथवार् ठोस समार्चार्र क जरूरी हिस्सार् है। कब, क्यार्, कहार्ँ (घटनार् के सम्बन्ध में) के सार्थ-सार्थ यदि क्यार् (what), कहार्ँ (where), कब (when), कौन (who) आदि क संतोषजनक उत्तर यदि संवार्ददार्तार् नहीं दे रहार् है तो समार्चार्र अपने में पूर्ण नहीं है। क्यार् (what) क अभिप्रार्य है कि जो घटनार् घटी है और जिसकी जार्नकारी पार्ठक को दी जार् रही है वह वार्स्तव में क्यार् है? यदि घटनार् क वर्णन स्पष्ट नहीं कियार् गयार् है यार् उसमें शार्ब्दिक उलझार्व हं,ै तो यह समार्चार्र की सबसे बड़ी असफलतार् होगी। दूसरार् बिन्दु है कहार्ँ (where)। अनजार्ने में ही पार्ठक वैज्ञार्निक तौर पर यह जार्नने क इच्छुक होतार् है कि जो घटनार् उसके सम्मुख लाइ जार् रही है वह कहार्ँ घटित हुर्इ है। यदि स्थार्न क विवरण यार् घटनार्स्थल की निशार्नदेही स्पष्ट रूप से नहीं हुर्इ है, तो इससे पार्ठक को संतुष्टि नहीं होगी और उसके मन में जिज्ञार्सार् बनी रहेगी। उदार्हरण के तौर पर अगर कोर्इ समार्चार्र लेखक खबर क आरम्भ करते हुए जनपद क नार्म लिखतार् है और यह उल्लेख करते हुए कि अमुक जनपद के एक गार्ँव में अमुक घटनार् हुर्इ यह अच्छी पत्रकारितार् क उदार्हरण नहीं है। तीसरार् प्रमुख बिन्दु है कब (when)। यह सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है क्योंकि अगर संवार्ददार्तार् यह नहीं बतार्तार् कि जिस घटनार् की वह जार्नकारी दे रहार् है वह कब घटित हुर्इ तो यह नितार्ंत अधूरार् समार्चार्र होगार्। संवार्ददार्तार् को तिथि और दिन ही नहीं, जहार्ँ तक सम्भव हो घटनार् क समय भी बतार्नार् चार्हिए क्योंकि प्रत्येक पार्ठक सूचनार् यार् समार्चार्र को जल्दी से जल्दी प्रार्प्त करनार् चार्हतार् है। यदि रार्त के दस बजे घटित घटनार् उसे सुबह 6 बजे मिल जार्ती है तो यह उसकी संतुष्टि क करण बनतार् है। अत: यह जरूरी है कि कब क जवार्ब समार्चार्र में मौजूद हो। इलेक्ट्रार्निक मीडियार् के लिए यह परिभार्शार्एं कुछ अलग हो जार्ती है। क्योंकि घटनार्स्थल के सजीव चित्र बहुत कुछ खुद ही कह देते हैं। ऐसे में वहार्ं पत्रकार को घटनार् की और अधिक बार्रीकी से छार्नबीन कर नए तथ्यों के सार्मने लार्नार् जरूरी हो जार्तार् है। 

अगलार् प्रमुख बिन्दु है कौन (who) अर्थार्त घटनार् किसके सार्थ घटित हुर्इ। जरूरी नहीं कि घटनार् से प्रभार्वित व्यक्ति यार् व्यक्तियों से पार्ठक परीचित हो लेकिन फिर भी उसकी पार्ठक यार् दर्षक की इच्छार् होती है कि उसे यह पतार् चले कि यह घटनार् किसके सार्थ घटी है। अगर यह जार्नकारी उसे नहीं मिलती तो यह समझ लेनार् चार्हिए कि समार्चार्र अधूरार् है। अत: क्यार् (what), कहार्ँ (where), कब (when), कौन (who) ये कुछ बिन्दु हैं जो समार्चार्र क निर्मार्ण करते हैं।

2. व्यार्ख्यार्त्मक समार्चार्र –

 लेकिन पार्ठक मार्त्र क्यार्, कहार्ँ, कब, कौन से ही संतुष्ट नहीं होतार् उसे घटनार् के पीछे विद्यमार्न कारकों क्यों (why), कैसे (how) की जार्नकारी यार् विश्लेषण भी चार्हिए। प्रत्येक पार्ठक अप्रत्यक्ष रूप से यह जिज्ञार्सार् बनार्ए रखतार् है कि जो घटनार् उसके सार्मने लाइ जार् रही है वह क्यों और कैसे घटित हुर्इ। यही विश्लेषण विवेचनार् सौफ्ट न्यूज अथवार् व्यार्ख्यार्त्मक खबर बन जार्ती है। व्यार्ख्यार्त्मक खबर (Soft News) वह समार्चार्र है जिसमें घटनार् की गहन खोजबीन की जार्ती है, उस पर समग्र रूप से प्रकाश डार्लार् जार्तार् है।

समार्चार्र लेखन की शैली

1. विलोम पिरार्मिड – 

पिरार्मिड दरअसल प्रार्चीन मिस्र के वे स्मार्रक हैं जो वहार्ँ के तत्कालीन रार्जार्ओं को दफनार्ने के लिए बनार्ए जार्ते थे। इन पिरार्मिडों की चोटी पतली होती है और ज्यों-ज्यों नीचे आते जार्ते हैं ये पिरार्मिड अपनार् आकार बढ़ार्ते जार्ते हैं। यदि हम इस पिरार्मिड को उल्टार् कर दें अर्थार्त इसकी चोटी नीचे और आधार्र ऊपर तो यह एक विलोम पिरोमिड टार्इप समार्चार्र लिखने की शैली बन जार्येगी। इस शैली के अन्तर्गत संवार्ददार्तार् प्रमुख घटनार् क सार्रार्ंश पहली पंक्तियों में देगार् और शेष विस्तृत जार्नकारी तए पैरार्ग्रार्फ से आरम्भ कर नीचे तक देतार् चलार् जार्एगार्। इस शैली के अन्तर्गत पार्ठक प्रथम दृष्टि में मुख्य घटनार् क सार्रार्ंश पहले जार्न लेतार् है और बार्द में वह पूरी जार्नकारी प्रार्प्त करने के लिए नीचे दियार् गयार् ब्यौरार् पढ़तार् है। अधिकतर घटनार्ओं के समार्चार्र इसी विलोम पिरार्मिड प्रणार्ली के अन्तर्गत दिए जार्ते हैं। 

विलोम पिरार्मिड शैली क प्रचलन उस समय शुरू हुआ जब संवार्ददार्तार्ओं को प्रमुख घटनार्ओं क समार्चार्र टेलीग्रार्म द्वार्रार् भेजने क माग अपनार्नार् पड़ार्। टेलीग्रार्म के मार्ध्यम से भेजे जार्ने वार्ले समार्चार्रों के लिए यह आवश्यक थार् कि घटनार् क प्रमुख सार्रार्ंश सबसे पहले दर्ज कियार् जार्ए, तार्कि यदि तार्र की लार्इन खरार्ब भी है तब मुख्य कार्यार्लय तक घटनार् क प्रमुख सार्रार्ंश पहुँच जार्ए। 

2. सीधे पिरार्मिड – 

समार्चार्रों की यह शैली सीधे पिरार्मिड की तरह अपनाइ जार्ती है जो विलोम पिरार्मिड की शैली से बिल्कुल उलट है। इसमें समार्चार्र के सबसे महत्वपूर्ण तत्व को सबसे पहले न देकर मध्य यार् अन्त में दियार् जार्तार् है। समार्चार्र के प्रार्रम्भ में कम महत्व के ऐसे तत्व दिए जार्ते हैं, जो पार्ठक की अभिरूचि जार्गृत कर सकते हैं। यह शैली अधिकतार् फीचर समार्चार्रों, रिपोटोर्ं तथार् मार्नवीय संवेदनार् से सम्बन्धित समार्चार्रों में प्रयोग में लाइ जार्ती है। 

समार्चार्र के स्रोत 

पत्रकार/संवार्ददार्तार् की सफलतार् के लिए आवश्यक है कि उसके सम्पर्क सूत्र विश्वसनीय और उच्चस्तरीय हो जिनके द्वार्रार् प्रार्प्त सूचनार् उपयोगी और विष्वसनीय हो। समार्चार्र में प्रयुक्त कुछ ऐसे स्रोत सर्वसुलभ भी होते हैं जैसे जनसभार्, रेडियो, टी0वी0 कार्यक्रम, प्रेस कान्फ्रेंस, गोष्ठियार्ँ आदि। पर रिपोर्टर जब आम लीक से हटकर कोर्इ खबर अपने विश्वसनीय संम्पर्क स्रोत की मदद से सार्मने रखतार् है तो उसक प्रभार्व विशिष्ट हो जार्तार् है। ऐसार् सम्पर्क स्रोत कहीं भी और कोर्इ भी हो सकतार् है। सरकारी तन्त्र में निजी अथवार् सावजनिक क्षेत्र में यार् व्यार्पार्र में कभी-कभी मन्त्री यार् किसी विषिश्ट अतिथि के ड्रार्इवर यार् किसी स्थार्न के चौकीदार्र आदि से मिली सूचनार्एं भी महत्वपूर्ण हो जार्ती हैं। समार्चार्र प्रार्प्त करने के मुख्य स्रोत हैं – 

  1. सरकारी स्रोत 
  2. पुलिस विभार्ग एवं अदार्लत 
  3. व्यक्तिगत स्रोत
  4. अस्पतार्ल 
  5. भेंटवातार् 

1. सरकारी स्रोत- 

संवार्ददार्तार् के लिए सूचनार्एँ प्रार्प्त करने क महत्वपूर्ण सार्धन सरकारी स्रोत हैं। रार्जधार्नी दिल्ली के अलार्वार् विभिन्न रार्ज्यों की रार्जधार्नियार्ँ और महत्वपूर्ण जिलार् मुख्यार्लयों पर सरार्करी सूचनार् विभार्ग के कार्यार्लय कार्य करते हैं। इन कार्यार्लयों से सरकारी गतिविधियों की जार्नकारी प्रार्प्त की जार् सकती है। सरकारी विभार्गों से भी समय-समय पर सूचनार्एं और समार्चार्र जार्री किए जार्ते हैं। विभिन्न सरकारी विभार्गों से भी समय-समय पर सूचनार्एं और समार्चार्र जार्री किए जार्ते हैं। इन सूचनार्ओं और आंकड़ों की छार्नबीन कर पत्रकार एक अलग और जनोपयोगी खबरें बनार् सकतार् है। 

2. पुलिस विभार्ग एवं अदार्लत- 

संवार्ददार्तार्ओं के लिए खबरों क सबसे बड़ार् भण्डार्र होतार् है पुलिस विभार्ग। किसी भी आपरार्धिक घटनार् हत्यार् अथवार् मार्रपीट के मार्मले, नशार्बंदी और यार्तार्यार्त के उल्लंघन आदि के मार्मलों की जार्नकारी पुलिस विभार्ग के सम्पर्क में रहकर ही मिल सकती है। पुलिस के उच्चार्धिकारियों से व्यक्तिगत सम्पर्क बनार् कर विश्वसनीय जार्नकारियार्ँ प्रार्प्त की जार् सकती है। 

पुलिस थार्नों में दर्ज मार्मले चलते-चलते अदार्लतों में पहुँच जार्ते हैं। संवार्ददार्तार् को इन मार्मलों में गहरी जार्नकारी प्रार्प्त करने के लिए अदार्लत के चक्कर लगार्ने पड़ते हैं। सार्मार्न्य रूप से तो अदार्लतों में कर्इ छोटे-छोटे दीवार्नी और फौजदार्री मुकदमे चलते ही रहते हैं लेकिन ये सभी मुकदमे अखबार्र की खबर बनने की योग्यतार् नहीं रखते हैं। इनमें से जनसार्मार्न्य की अभिरूचि के मार्मले कौन से हो सकते हैं इसक निर्णय संवार्ददार्तार् को अपनी चतुराइ से करनार् चार्हिए। 

3. व्यक्तिगत स्रोत- 

व्यक्तिगत सम्पर्क भी समार्चार्र प्रार्प्त करने क प्रमुख सार्धन होतार् है। सार्ंसद, मन्त्री, सचिव और निजी सहार्यकों से अच्छे सम्बन्ध बनार्ने वार्लार् संवार्ददार्तार् कर्इ बार्र गोपनीय और महत्वपूर्ण समार्चार्र दूसरों से पहले ही ले आतार् है और लोगों को चौंक देतार् है। 

4. अस्पतार्ल व अन्य सावजनिक स्थार्न- 

संवार्ददार्तार्ओं को प्रतिदिन के समार्चार्रों को एकत्रित करने के लिए कुछ खार्स स्थार्नों की कवरेज करनी पड़ती है। अस्पतार्ल भी ऐसार् ही एक क्षेत्र है। शहर में जितनी भी हत्यार्एं, दंगे, दुर्घटनार्एं यार् आत्महत्यार् आदि होती हैं उन सब की जार्नकारी अस्पतार्ल से मिल सकती है। इसी तरह नगर निगम कार्यार्लय, आवार्स विभार्ग, प्रमुख बार्जार्र, घटनार् स्थल, स्कूल, कालेज और विष्वविद्यार्लय, प्रमुख क्षेत्रीय संस्थार्न आदि इस तरह के अन्य स्थार्न हैं जहार्ं से नियमित रूप से महत्वपूर्ण समार्चार्र खोजे जार् सकते हैं। 

5. भेंटवातार्- 

भेंटवातार् समार्चार्र संकलन क ही एक मार्ध्यम है। कभी-कभी भेंटवातार् से नये समार्चार्र निकल आते हैं। उदार्हरणाथ जब किसी महत्वपूर्ण नेतार् क सार्क्षार्त्कार लियार् जार्तार् है और वह अपनी भविष्य की कार्य योजनार् को बतार्तार् है तो ऐसे सार्क्षार्त्कार महत्वपूर्ण हो जार्ते हैं। 

कभी-कभी सम्पर्क स्रोत स्वयं को आगे रखनार् चार्हतार् है और कर्इ बार्र सम्पर्क स्रोत मुसीबत में भी पड़ जार्तार् है ऐसे में पत्रकार के लिए उसक ध्यार्न रखनार् आवश्यक हो जार्तार् है। कभी-कभी स्रोत अपनी बार्त से पलट भी जार्तार् है। इसलिए समार्चार्र की विश्वसनीयतार् के लिए संवार्ददार्तार् के पार्स स्रोत द्वार्रार् कही यार् बताइ गर्इ बार्त के सबूत जरूर होने चार्हिए। जिससे आवश्यकतार् पड़ने पर समार्चार्र की सत्यतार् को िसेद्ध कियार् जार् सके। 

समार्चार्र एकत्र करने में विशेषतयार् खोजी पत्रकारितार् के दौरार्न सरकार/शार्सन से टकरार्व की स्थिति बनी रहती है। कोर्इ भी रार्जनेतार् अपने जिन कायोर्ं को सही समझतार् है एक पत्रकार जब उसकी असलियत जनतार् के समक्ष रख देतार् है और जनतार् रार्जनेतार् की नीतियों व कायोर्ं की आलोचनार् करने लगती है और उस पर अपनी प्रतिक्रियार् देती है। तो पत्रकार के लिए ऐसे रार्जनेतार् से सीधे टकरार्व की स्थिति आ जार्ती है। पत्रकार को ऐसी स्थिति में विवेक से काम करनार् चार्हिए और खबर की सत्यतार् पर दृढ़ रहकर स्थिति क मुकाबलार् करनार् चार्हिए। 

प्रार्य: पत्रकार के लिए अपने सूचनार् स्रोत को बचार्ए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयार्स करने पड़ते हैं। कर्इ बार्र न्यार्यपार्लिक और कार्यपार्लिक ऐसे स्रोत क खुलार्सार् चार्हते हैं। लेकिन अपने स्रोतों की सुरक्षार् पत्रकारितार् के मूल्य में शमिल है इसलिए पत्रकार को स्त्रोत की सुरक्षार् क खार्स ध्यार्न रखनार् चार्हिए।

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