समार्चार्र क अर्थ, परिभार्षार् एवं लेखन प्रक्रियार्

मनुष्य एक सार्मार्जिक प्रार्णी है। इसलिए वह एक जिज्ञार्सु है। मनुष्य जिस समूह में, जिस समार्ज में और जिस वार्तार्वरण में रहतार् है वह उस बार्रे में जार्नने को उत्सुक रहतार् है। अपने आसपार्स घट रही घटनार्ओं के बार्रे में जार्नकर उसे एक प्रकार के संतोष, आनंद और ज्ञार्न की प्रार्प्ति होती है।

आज ‘समार्चार्र’ शब्द हमार्रे लिए कोर्इ नयार् शब्द नहीं है। मनुष्य ने घटनार्ओं के बार्रे में जार्नकारी हार्सिल करने के लिए प्रार्चीन काल से ही तमार्म तरह के तरीको, विधियो  और मार्ध्यमों को खोजार् आरै विकसित कियार्। पत्र के जरिए समार्चार्र प्रार्प्त करनार् इन मार्ध्यमों में सर्वार्धिक पुरार्नार् मार्ध्यम है जो लिपि और डार्क व्यवस्थार् के विकसित होने के बार्द अस्तित्व में आयार्। पत्र के जरिए अपने प्रियजनार्ं,े मित्रों और शुभार्कांक्षियों को अपनार् समार्चार्र देनार् और उनक समार्चार्र पार्नार् आज भी मनुष्य के लिए सर्वार्धिक लोकप्रिय सार्धन है। समार्चार्र पत्र, रेडियार्, टेलीविजन समार्चार्र प्रार्प्ति के आधुनिक सार्धन हैं जो मुद्रण, रेडियार् और टेलीविजन जैसी वैज्ञार्निक खोज के बार्द अस्तित्व में आए हैं। तो आइए समार्चार्र के अर्थ, परिभार्षार्, तत्व एवं प्रकार के बार्रे में विस्तार्र से जार्नें।

समार्चार्र क अर्थ 

सार्मार्जिक जीवन में चलनेवार्ली घटनार्ओं के बार्रे में लोग जार्ननार् चार्हते हैं, जो जार्नते हैं वे उसे बतार्नार् चार्हते हैं। यह जिज्ञार्सार् क भार्व मनुष्य में प्रबल होतार् है। यही जिज्ञार्सार् समार्चार्र और व्यार्पक अर्थ में पत्रकारितार् क मूल तत्व है। जिज्ञार्सार् नहीं रहेगी तो समार्चार्र की भी जरूरत नहीं रहेगी। अपने रोजमर्रार् के जीवन के बार्रे में सार्मार्न्य कल्पनार् कीजिए तो पार्एंगे कि दो लोग आसपार्स रहते हैं और लगभग रार्जे मिलते हैं। इसके बार्वजदू वह दोनों जब भी मिलते हैं एक दूसरे को एक सार्मार्न्य सार् सवार्ल पूछते हैं क्यार् हार्लचार्ल है? यार् फिर क्यार् समार्चार्र है? इस सवार्ल को ध्यार्न से देखार् जार्ए तो उन दोनो में एक जिज्ञार्सार् बनी रहती है कि जब हम नहीं मिले तो उनके जीवन में क्यार् क्यार् घटित हुआ है। हम अपने मित्रों, रिश्तेदार्रो  और सहकर्मियो  से हमेशार् उनकी कुशलक्षेम यार् उनके आसपार्स की घटनार्ओं के बार्रे में जार्ननार् चार्हते हैं। यही जार्नने की इच्छार् ने समार्चार्र को जन्म दियार् है।

इस जार्नने की इच्छार् ने हमें अपने पार्स-पड़ोस, शहर, रार्ज्य और देश दुनियार् के बार्रे में बहुत कुछ सूचनार्एँ प्रार्प्त होती है। ये सूचनार्एँ हमार्रे दैनिक जीवन के सार्थ सार्थ पूरे समार्ज को प्रभार्वित करती हैं। ये सूचनार्एँ हमार्रार् अगलार् कदम क्यार् होगार् तय करने में सहार्यतार् करती है। यही कारण है कि आधुनिक समार्ज में सूचनार् और संचार्र मार्ध्यमों क महत्व बहुत बढ़ गयार् है। आज देश दुनियार् में क्यार् घटित हो रहार् है उसकी अधिकांश जार्नकारियार्ँ हमें समार्चार्र मार्ध्यमो  से मिलती है।

विभिन्न समार्चार्र मार्ध्यमों के जरिए दुनियार्भर के समार्चार्र हमार्रे घरों तक पहुंचते हैं चार्हे वह समार्चार्र पत्र हो यार् टेलीविजन और रोड़ियो यार् इटंरनेट यार् सोशल मीडियार्। समार्चार्र संगठनों में काम करनेवार्ल े पत्रकार देश-दुनियार् में घटनेवार्ली घटनार्ओं को समार्चार्र के रूप में परिवर्तित कर हम तक पहुँचार्ते हैं। इसके लिए वे रोज सूचनार्ओं क संकलन करते हैं और उन्हे  समार्चार्र के प्रार्रूप में ढार्लकर पेश करते हैं। यार् यो  कहें कि व्यक्ति को, समार्ज को, देश-दुनियार् को प्रभार्वित करनेवार्ली हर सूचनार् समार्चार्र है। यार्नी कि किसी घटनार् की रिपोर्ट ही समार्चार्र है।

समार्चार्र शब्द अंग्रेजी शब्द ‘न्यूज’ क हिन्दी अनुवार्द है। शब्दाथ की „ दृष्टि से ‘न्यूज’ शब्द अग्रेंजी के जिन चार्र अक्षरों से बनतार् है उनमें ‘एन’, ‘र्इ’, ‘डब्ल्यू’, ‘एस’ है। यह चार्र अक्षर ‘नाथ’ उत्तर, ‘र्इष्ट’ पूर्व, ‘वेस्ट’ पश्चिम और ‘सार्उथ’ दक्षिण के संकेतक हैं। इस तरह ‘न्यूज’ क भार्व चतुर्दिक में उसकी व्यार्पकतार् से है। अगर न्यूज को अंग्रेजी शब्द ‘न्यू’ के बहुबचन के रूप में देखार् जार् सकतार् है जिसक अर्थ ‘नयार्’ होतार् है। यार्नी समार्ज में चार्रों आरे जो कुछ नयार्, सार्मयिक घटित हो रहार् है,उसक विवरण यार् उसकी सूचनार् समार्चार्र कहलार्तार् है। यहार्ं उल्लेखनीय है कि कोर्इ भी घटनार् स्वयं में समार्चार्र नहीं होती है, बल्कि उस घटनार् क वह विवरण जो समार्चार्र पत्रो  यार् अन्य मार्ध्यमो  से पार्ठको  यार् श्रोतार्ओं तक पहुंचतार् है तो समार्चार्र कहलार्तार् है।

हिन्दी में भी समार्चार्र क अर्थ भी लगभग यही है। ‘सम’ ‘आचार्र’ से इसे समझार् जार् सकतार् है। वृहत हिन्दी शब्दकोश के अनुसार्र ‘सम’ क अर्थ एक ही, अभिन्न, सृश, एक सार्, बरार्बर, चैरस, जो दो से पूरार् पूरार् बंट जार्ए, विषम नहीं, पक्षपार्त रहित, निष्पक्ष, र्इमार्नदार्र, सच्चार्, सार्धार्रण है। ‘आचार्र’ क अर्थ चरित्र, चार्ल, अच्छार् चार्ल चलन, व्यवहार्र, शार्स्त्रोक्त आचार्र, व्यवहार्र क तरीक है। और ‘समार्चार्र’ क अर्थ होतार् है समार्न आचरण, पक्षपार्त रहित व्यवहार्र, बरार्बर क आचरण, जो विषम नहीं होगार्। इस तरह वृहत शब्दकोश में सार्फ है कि सम क अर्थ एक समार्न, बरार्बर क है और आचार्र क अर्थ व्यवहार्र से है। दूसरे शब्दों में कहार् जार्ए तो जो पक्षपार्त रहित इर्म ार्नदार्री से सभी को एक सार् समार्ज की चार्ल चलन, आचार्र व्यवहार्र को बार्ंटे उसे समार्चार्र कहार् जार्एगार्।

समार्चार्र की परिभार्षार् 

विषय कोर्इ भी हो परिभार्षार्एं भार्ंति भार्ंति की और प्रार्यत: अपूर्ण हुआ करती है। ठीक यही स्थिति समार्चार्र के विषय में भी है। जिस तरह समार्चार्र पत्र में छपी हर चीज समार्चार्र नहीं हुआ करती है, ठीक वैसे ही प्रत्येक घटनार् भी समार्चार्र की शक्ल नहीं ले सकती है। किसी घटनार् की रिपोर्ट समार्चार्र है जो व्यक्ति, समार्ज एवं देश दुनियार् को प्रभार्वित करती है। इसके सार्थ ही इसक उपरोक्त से सीधार् संबंध होतार् है। इस कर्म से जुड़े मर्मज्ञ विभिन्न मनीषियों द्वार्रार् पत्रकारितार् को अलग-अलग शब्दो  में परिभार्षित किए हैं। पत्रकारितार् के स्वरूप को समझने के लिए यहार्ँ कुछ महत्वपूर्ण परिभार्षार्ओं क उल्लेख कियार् जार् रहार् है :

(क) पार्श्चार्त्य चिन्तन 

  1. री सी हार्पवुड:- उन महत्वपूर्ण घटनार्ओं की जिसमें जनतार् की दिलचस्पी हार्,े पहली रिपोर्ट को समार्चार्र कह सकते हैं। 
  2. विलियम जी ब्लेयर:- किसी सार्मयिक घटनार् क विवरण जिसक किसी समार्चार्र पत्र के संपार्दकीय विभार्ग ने संपार्दन कर्मियों द्वार्रार् चयन कियार् गयार् हो, क्योंिक वह पार्ठकों के लिए रूचिकर एवं महत्वपूर्ण है, अथवार् उसे बनार्यार् गयार् है। 
  3. हापर लीच:- और जार्न सी कैरोल समार्चार्र एक गतिशील सार्हित्य है। 
  4. जार्न बी बोगाट:- जब कुत्तार् आदमी को काटतार् है तो वह समार्चार्र नहीं है परंतु यदि कोर्इ आदमी कुत्त को काट ले तो वह समार्चार्र होगार्। 
  5. जे जे सिडलर:- पर्यार्प्त सख्यार् में मनुष्य जिसे जार्ननार् चार्हे, वह समार्चार्र है शर्त यह है कि वह सुरूचि तथार् प्रतिष्ठार् के नियमों क उल्लंघन न करे। 

इस तरह टूरी सी हार्पवूड एवं विलियम जी ब्लेयर घटनार् की रिपोर्ट, पार्ठको की रूचि को महत्वपूर्ण मार्नार् है। हार्पर्र और जार्न ने जो सार्हित्य गतिशीलतार् लिए हुए उसे समार्चार्र मार्नार् है। सार्मार्न्य से हटकर कुछ बार्त हो तो उसे समार्चार्र मार्नते हैं जार्न बी बोगाट। जे जे सिडलर ने जिज्ञार्सार् को शार्ंत करनेवार्लार् कोर्इ भी विषय जो नियम के दार्यरे में रहकर पार्ठको तक पहुंचे उसे समार्चार्र की कोटी में मार्नार् है।

(ख) भार्रतीय चिन्तन 

  1. डार्. निशार्ंत सिंह:- किसी नर्इ घटनार् की सूचनार् ही समार्चार्र है 
  2. नवीन चंद्र पंत:- किसी घटनार् की नर्इ सूचनार् समार्चार्र है। 
  3. नंद किशोर त्रिखार्:- किसी घटनार् यार् विचार्र जिसे जार्नने की अधिकाधिक लोगों की रूचि हो समार्चार्र है। 
  4. संजीव भवार्वत:- किसी घटनार् की असार्धार्रणतार् की सूचनार् समार्चार्र है 
  5. रार्मचंद्र वर्मार्:- ऐसी तार्जार् यार् हार्ल की घटनार् की सूचनार् जिसके संबंध में लोगों को जार्नकारी न हो समार्चार्र है। 
  6. सुभार्ष धूलिआ:- समार्चार्र ऐसी सम सार्मयिक घटनार्ओ, समस्यार्ओं और विचार्रों पर आधार्रित होते हैं जिन्हें जार्नने की अधिक से अधिक लोगों में दिलचस्पी होती है और जिनक अधिक से अधिक लोगों पर प्रभार्व पड़तार् है। 
  7. मनुकोडार्ं चेलार्पति रार्व:- समार्चार्र की नवीनतार् इसी में है कि वह परिवर्तन की जार्नकारी दे। वह जार्नकारी चार्हे रार्जनीतिक, सार्मार्जिक अथवार् आर्थिक कोर्इ भी हो। परिवर्तन में भी उत्तेजनार् होती है। 
  8. केपी नार्रार्यणन:- समार्चार्र किसी सार्मयिक घटनार् क महत्वपूर्ण तथ्यों क परिशुद्ध तथार् निष्पक्ष विवरण होतार् है जिससे उस समार्चार्रपत्र में पार्ठकों की रूचि होती है जो इस विवरण को प्रकाशित करतार् है। 

भार्रतीय विद्वार्नों ने समार्चार्र की परिभार्षार् में लगभग एक सी बार्त कही है। डार्. निशार्ंत सिंह एवं नवीन चंद्र पंत ने नर्इ घटनार् को समार्चार्र मार्नार् है। नंद किशोर त्रिखार् ने जिस घटनार् के सार्थ लोगों की रूचि हो उसे समार्चार्र मार्नार् है। संजीव भवार्वत ने भी घटनार् की असार्धार्रण की सूचनार् को समार्चार्र मार्नार् है। रार्मचंद्र वर्मार् ने घटनार् की सूचनार् जिसक लोगों से संबंधित हो को समार्चार्र मार्नार् है। सुभार्ष धूलिआ ने सार्मयिक घटनार्, विचार्र जिसक अधिक से अधिक लोगों से संबंधित हो तो मनुकोडार्ं चेलार्पति रार्व ने नवीनतार् लिए कोर्इ भी विषय हो समार्चार्र मार्नार् है जो परिवर्तन को सूचित करतार् है। केपी नार्रार्यणन ने निष्पक्ष होकर किसी सार्मयिक घटनार् को पार्ठकों की रूचि अनुसार्र पेश करनार् ही समार्चार्र है। इस तरह विभिन्न विद्वार्नों ने समार्चार्र की परिभार्षार् अपने हिसार्ब से दियार् है।

समार्चार्र के तत्व 

समार्चार्र के मूल में सूचनार्एं होती है। और यह सूचनार्एं समसार्मयिक घटनार्ओं की होती है। पत्रकार उस घटित सूचनार्ओं को एकत्रित कर समार्चार्र के प्रार्रूप में ढार्लकर पार्ठको ं की जिज्ञार्सार् को पूिर्त करने लार्यक बनार्तार् है। पार्ठको की जिज्ञार्सार् हमेशार् ही कौन, क्यार्, कब, कहार्ं, क्यों और कैसे प्रश्नों क उत्तर उस समार्चार्र में ढूढंने की कोशिश करतार् है। लेकिन समार्चार्र लिखते समय इन्हीं प्रश्नों क उत्तर तलार्शनार् आरै पार्ठकों तक उसके संपूर्ण अर्थ में पहुंचार्नार् सबसे बड़ी चुनौती क कार्य होतार् है। समार्चार्रो को लेकर हार्ने ेवार्ली हर बहस क केद्रं यही होतार् है कि इन छह प्रश्नो क उत्तर क्यार् है और कैसे दियार् जार् रहार् है। समार्चार्र लिखते वक्त भी इसमें शार्मिल किए जार्नेवार्ले तमार्म तथ्यों और अंतर्निहित व्यार्ख्यार्ओं को भी एक ढार्ंचे यार् संरचनार् में प्रस्तुत करनार् होतार् है।

समार्चार्र संरचनार् 

समार्चार्र संरचनार् की बार्त करे  तो मुख्य रूप से तीन खंडो  में विभार्जित कर सकते हैं। पहले में इंट्रो होतार् है जिसमें ‘क्यार् हुआ’ के प्रश्न क उत्तर दियार् जार् सकतार् है जो क्यार् हुआ को स्पष्ट करतार् है। दूसरार् में जो कुछ बचार् उसे रखार् जार्तार् है। और अंत में समार्चार्र को पूरार् करने के लिए जो कुछ आवश्यक है उसे रखार् जार्तार् है। 

इस तरह समार्चार्र में सबसे पहले समार्चार्र क ‘इंट्रो’ यार्नी इंट्रोडक्षन होतार् है। यह असली समार्चार्र है जो चंद शब्दों में पार्ठकों को बतार्तार् है कि क्यार् घटनार् घटित हुर्इ है। इसके बार्द के पैरार्गार््र फ में इटं्रो की व्यार्ख्यार् करनी होती है। इंट्रो में जिन प्रश्नों क उत्तर अधूरार् रह गयार् है उनक उत्तर देनार् होतार् है। इसलिए समार्चार्र लिखते समय इंट्रो के बार्द व्यार्ख्यार्त्मक जार्नकारी देनार् जरूरी होतार् है। इसके बार्द विवरणार्त्मक यार् वर्णनार्त्मक जार्नकारियार्ं दी जार्नी चार्हिए। घटनार्स्थल क वर्णन करनार्, इस दृष्टि से यह कहार् जार् सकतार् है कि यह घटनार् के स्वभार्व पर निर्भर करतार् है कि विवरणार्त्मक जार्नकारियो  क कितनार् महत्व है। 

जैसे अगर कहीं कोर्इ उत्सव हो रहार् हो जिसमें अनेक सार्ंस्कृतिक और सार्मार्जिक कार्यक्रम चल रहे हों तो निश्चय ही इसक समार्चार्र लिखते समय घटनार्स्थल क विवरण ही सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर कोर्इ रार्जनेतार् पत्रकार सम्मेलन करतार् है तो इसमें विवरण देने(पत्रकार सम्मेलन के मार्हौल के बार्रे में बतार्ने) के लिए कुछ भी नहीं होतार् है।  हार्ं एक पत्रकार यह कर सकतार् है कि रार्जनेतार् जो कुछ भी कहार् उसके बार्रे में पड़तार्ल कर सकतार् है कि इस पत्रकार सम्मेलन बुलार्ने क मकसद क्यार् थार्। यहार्ं यह समार्चार्र बन सकतार् है कि समार्चार्र में कुछ छिपार्यार् तो नहीं जार् रहार् है। 

विवरण के बार्द पार्ंच डब्ल्यू और एक एच को पूरार् करने के लिए आवश्यक होती है और जिन्हें समार्चार्र लिखते समय पहले के तीन खंडों में शार्मिल नहीं कियार् जार् सका। इसमें पहल े तीन खंडो  से संबंधित अतिरिक्त जार्नकारियार्ं दी जार्ती है। हर घटनार् को सही दिशार् में पेश करने के लिए इसक पृष्ठभूमि में जार्नार् भी आवश्यक होतार् है।  पार्ठक भी इस तरह की किसी घटनार् की पृष्ठभूमि भी जार्नने के लिए इच्छार् रखतार् है। जैसे कि अगर किसी नगर में असुरक्षित मकान गिरने से कुछ लोगों की मृत्यु हो जार्ती है तो यह भी प्रार्संिगक ही होतार् है कि पार्ठकों को यह भी बतार्यार् जार्ए कि पिछले एक वर्ष में इस तरह की कितनी घटनार्एं हो चुकी है और कितने लोग मरे हैं। प्रशार्सन द्वार्रार् इस तरह की घटनार्ओं को रोकने के लिए क्यार् कदम उठार्ए गए और वे कहार्ं तक सफल रहे हैं। और अगर सफल नहीं हुए तो क्यों? आदि। 

इस तरह कहार् जार् सकतार् है कि समार्चार्र संरचनार् में यह क्रम होतार् है-इंट्रो, व्यार्ख्यार्त्मक जार्नकारियार्ं, विवरणार्ार्त्मक जार्नकारियार्ं, अतिरिक्त जार्नकारियार्ं और पृष्ठभूमि। 

छ ‘क’ कार 

समार्चार्र के अर्थ में हमने देखार् समार्चार्र क स्वरूप क्यार् है। उसके प्रमुख तत्वो ं को आसार्नी से समझार् जार् सकतार् है। शुष्क तथ्य समार्चार्र नहीं बन सकते पर जो तथ्य आम आदमी के जीवन आरै विचार्रों पर प्रभार्व डार्लते हैं उसे पसंद आते हैं और आंदोलित करते हैं, वे ही समार्चार्र बनते हैं। समार्चार्र के इस आवश्यकतार् को ध्यार्न में रखते हुए समार्चार्र में छह तत्वों क समार्वेश अनिवाय मार्नार् जार्तार् है । ये हैं-क्यार्, कहार्ं, कब, कौन, क्यो और कैसे। 

अंग्रेजी में इन्हें पार्ंच ‘डब्ल्यू’, हू, वट, व्हेन, व्हार्इ वºे अर और एक ‘एच’ हार्उ कहार् जार्तार् है। इन छह सवार्लों के जवार्ब में किसी घटनार् क हर पक्ष सार्मने आ जार्तार् है लेकिन समार्चार्र लिखते वक्त इन्हीं प्रश्नों क उत्तर तलार्शनार् आरै पार्ठको  तक उसे उसके संपूर्ण अर्थ में पहुंचार्नार् सबसे बड़ी चुनौती क कार्य है। यह एक जटिल प्रक्रियार् है। 

  1. क्यार् – क्यार् हुआ? जिसके संबंध में समार्चार्र लिखार् जार् रहार् है। 
  2. कहार्ं – कहार्ं? ‘समार्चार्र’ में दी गर्इ घटनार् क संबंध किस स्थार्न, नगर, गार्ंव प्रदेश यार् देश से है। 
  3. कब – ‘समार्चार्र’ किस समय, किस दिन, किस अवसर क है। 
  4. कौन – ‘समार्चार्र’ के विषय (घटनार्, वृत्तार्ंत आदि) से कौन लोग संबंधित हैं। 
  5. क्यों – ‘समार्चार्र’ की पृष्ठभूमि। 
  6. कैसे – ‘समार्चार्र’ क पूरार् ब्योरार्। 

यह छह ककार (’’क’’ अक्षर से शुरू होनेवार्ले छ प्रश्न) समार्चार्र की आत्मार् है। समार्चार्र में इन तत्वो  क समार्वेश अनिवाय है। 

समार्चार्र बनने योग्य तत्व 

छह ककार के सवार्लों के जवार्ब में किसी घटनार् क हर पक्ष सार्मने आ जार्तार् है लेकिन समार्चार्र लिखते वक्त इन्हीं प्रश्नों क उत्तर तलार्शनार् और पार्ठकों तक उसे उसके संपूर्ण अर्थ में पहुंचार्नार् सबसे बड़ी चुनौती क कार्य है। यह एक जटिल प्रक्रियार् है। लोग आमतौर पर अनेक काम मिलजुल कर करते हैं। सुख-दु:ख की घड़ी में वे सार्थ होते हैं। मेलो और उत्सवों में वे सार्थ होते हैं। दुर्घटनार्ओं और विपदार्ओं के समय वे सार्थ होते हैं। इन सबको हम घटनार्ओं की श्रेणी में रख सकते हैं। फिर लोगों को अनेक छोटी-बड़ी समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। गार्ंव, कस्बे यार् शहर में बिजली-पार्नी के न होने से लेकर बेरोजगार्री और आर्थिक मंदी जैसी समस्यार्ओं से उन्हे जूझनार् होतार् है। इसी तरह लोग अपने समय की घटनार्ओ, रुझार्नों और प्रक्रियार्ओं पर सोचते हैं। उन पर विचार्र करते हैं और इन सब को लेकर कुछ करते हैं यार् कर सकते हैं। इस तरह की विचार्र मंथन की प्रक्रियार् के केद्रं में इनके कारणो, प्रभार्व और परिणार्मों क संदर्भ भी रहतार् है। विचार्र, घटनार्एं और समस्यार्ओं से ही समार्चार्र क आधार्र तैयार्र होतार् है। किसी भी घटनार्, विचार्र और समस्यार् से जब काफी लोगों क सरोकार हो तो यह कह सकते हैं कि यह समार्चार्र बनने के योग्य है। किसी घटनार्, विचार्र और समस्यार् के समार्चार्र बनने की संभार्वनार् तब बढ़ जार्ती है, जब उनमें निम्रलिखित में से कुछ यार् सभी तत्व शार्मिल हों – तथ्यार्त्मकतार्, नवीनतार्, जनरुचि, सार्मयिकतार्, निकटतार्, प्रभार्व, पार्ठक वर्ग, नीतिगत ढार्ंचार्, अनोखार्पन, उपयोगी जार्नकारियार्ं। 

तथ्यार्त्मकतार् 

समार्चार्र किसी की कल्पनार् की उड़ार्न नहीं है। समार्चार्र एक वार्स्तविक घटनार् पर आधार्रित होती है। एक पत्रकार के सार्मने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह ऐसे तथ्यों क चयन कैसे करे, जिससे वह घटनार् उसी रूप में पार्ठक के सार्मने पेश की जार् सके जिस तरह वह घटी। घटनार् के समूचे यथाथ क प्रतिनिधित्च करनेवार्ले इस तथ्यों को पत्रकार खार्स तरह क बौद्धिक कौशल के जरिए पार्ठको  के समक्ष पेश करतार् है। समार्चार्र में तथ्यो  के सार्थ कोर्इ छेड़छार्ड़ नहीं होनी चार्हिए और न ही उनकी प्रस्तुति और लेखन में अपने विचार्रों को घुसार्नार् चार्हिए। 

नवीनतार् 

किसी भी घटनार्, विचार्र यार् समस्यार् के समार्चार्र बनने के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह नयार् हो। कहार् भी जार्तार् है न्यू है इसलिए न्यूज है। समार्चार्र वही है जो तार्जी घटनार् के बार्रे में जार्नकारी देतार् है। एक दैनिक समार्चार्रपत्र के लिए आम तार्रै पर पिछले 24 घंटों की घटनार्एं समार्चार्र होती हैं। एक चौबीस घंटे के टेलीविजन और रेडियो चैनल के लिए तो समार्चार्र जिस तेजी से आते हैं, उसी तेजी से बार्सी भी होते चले जार्ते हैं। लेकिन अगर द्वितीय विश्व युद्ध जैसी किसी ऐतिहार्सिक घटनार् के बार्रे में आज भी कोर्इ नर्इ जार्नकारी मिलती है जिसके बार्रे में हमार्रे पार्ठकों को पहले जार्नकारी नहीं थी तो निश्चय ही यह उनके लिए समार्चार्र है। दुनियार् के अनेक स्थार्नों पर अनेक ऐसी चीजें होती हैं जो वर्षों से मौजदू हैं लेकिन यह किसी अन्य देश के लिए कोर्इ नर्इ बार्त हो सकती है और निश्चय ही समार्चार्र बन सकती है। 

जनरुचि 

किसी विचार्र, घटनार् और समस्यार् के समार्चार्र बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि लोगों की उसमें दिलचस्पी हो। वे उसके बार्रे में जार्ननार् चार्हते हों। कोर्इ भी घटनार् समार्चार्र तभी बन सकती है, जब लोगों क एक बड़ार् तबक उसके बार्रे में जार्नने में रुचि रखतार् हो। स्वभार्वतरू हर समार्चार्र संगठन अपने लक्ष्य समूह (टागेट ऑडिएंस) के संदर्भ में ही लोगों की रुचियो  क मूल्यार्ंकन करतार् है। लेकिन हार्ल के वर्षों में लोगों की रुचियों आरै प्रार्थमिकतार्ओं में भी तार्डे -मरोड  की प्रक्रियार् काफी तेज हुर्इ है और लोगों की मीडियार् आदतों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। कह सकते हैं कि रुचियार्ं कोर्इ स्थिर चीज नहीं हैं, गतिशील हैं। कर्इ बार्र इनमें परिवर्तन आते हैं तो मीडियार् में भी परिवर्तन आतार् है। लेकिन आज मीडियार् लोगों की रुचियों में परिवर्तन लार्ने में बहुत बड़ी भूमिक अदार् कर रहार् है। 

सार्मयिकतार् 

एक घटनार् को एक समार्चार्र के रूप में किसी समार्चार्र संगठन में स्थार्न पार्ने के लिए इसक समय पर सही स्थार्न यार्नि समार्चार्र कक्ष में पहुंचनार् आवश्यक है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि उसक समयार्नुकूल होनार् जरूरी है। एक दैनिक समार्चार्रपत्र के लिए वे घटनार्एं सार्मयिक हैं जो कल घटित हुर्इ हैं। आमतौर पर एक दैनिक समार्चार्रपत्र की अपनी एक डेडलार्इन (समय सीमार्) होती है जब तक के समार्चार्रों को वह कवर कर पार्तार् है। मसलन अगर एक प्रार्तरूकालीन दैनिक समार्चार्रपत्र रार्त 12 बजे तक के समार्चार्र कवर करतार् है तो अगले दिन के संस्करण के लिए 12 बजे रार्त से पहले के चैबीस घंटे के समार्चार्र सार्मयिक होंगे। इसी तरह 24 घंटे के एक टेलीविजन समार्चार्र चैनल के लिए तो हर पल ही डेडलार्इन है और समार्चार्र को सबसे पहले टेलीकास्ट करनार् ही उसके लिए दौड़ में आगे निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है। इस तरह एक चैबीस घंटे के टेलीविजन समार्चार्र चैनल, एक दैनिक समार्चार्रपत्र, एक सार्प्तार्हिक और एक मार्सिक के लिए किसी समार्चार्र की समय सीमार् क अलग-अलग मार्नदंड होनार् स्वार्भार्विक है, कहीं समार्चार्र तार्त्कालिक है, कहीं सार्मयिक तो कहीं समकालीन भी हो सकतार् है। 

निकटतार् 

किसी भी समार्चार्र संगठन में किसी समार्चार्र के महत्व क मूल्यार्ंकन यार्नी उसे समार्चार्रपत्र यार् बुलेटिन में शार्मिल कियार् जार्एगार् यार् नहीं, क निर्धार्रण इस आधार्र पर भी कियार् जार्तार् है कि वह घटनार् उसके कवरेज क्षेत्र और पार्ठक/दर्शक/श्रोतार् समूह के कितने करीब हुर्इ? हर घटनार् क समार्चार्रीय महत्व काफी हद तक उसकी स्थार्नीयतार् से भी निर्धार्रित होतार् है। सबसे करीब वार्लार् ही सबसे प्यार्रार् भी होतार् है। यह मार्नव स्वभार्व है। स्वार्भार्विक है कि लोग उन घटनार्ओं के बार्रे में जार्नने के लिए अधिक उत्सुक होते हैं जो उनके करीब होती हैं। इसक एक कारण तो करीब होनार् है और दूसरार् कारण यह भी है कि उसक असर उन पर भी पड़तार् है। जैसे किसी एक खार्स कालोनी में चैरी-डकैती की घटनार् के बार्रे में वहार्ं के लोगों की रुचि होनार् स्वार्भार्विक है। रुचि इसलिए कि घटनार् उनके करीब हुर्इ है और इसलिए भी कि इसक संबंध स्वयं उनकी अपनी सुरक्षार् से है। 

प्रभार्व 

किसी घटनार् के प्रभार्व से भी उसक समार्चार्रीय महत्व निर्धार्रित होतार् है। अनेक मौको  पर किसी घटनार् से जुड़े लोगों के महत्वपूर्ण होने से भी उसक समार्चार्रीय महत्व बढ़ जार्तार् है। स्वभार्वत: प्रख्यार्त और कुख्यार्त अधिक स्थार्न पार्ते हैं। इसके अलार्वार् किसी घटनार् की तीव्रतार् क अंदार्जार् इस बार्त से भी लगार्यार् जार्तार् है कि उससे कितने सार्रे लोग प्रभार्वित हो रहे हैं यार् कितने बड़े भू भार्ग पर असर हो रहार् है, आदि। सरकार के किसी निर्णय से अगर दस लोगो  को लार्भ हो रहार् हो तो यह उतनार् बड़ार् समार्चार्र नहीं जितनार् कि उससे लार्भार्न्वित होने वार्ले लोगों की संख्यार् एक लार्ख हो। सरकार अनेक नीतिगत फैसले लेती हैं जिनक प्रभार्व तार्त्कालिक नहीं होतार् लेकिन दीर्घकालिक प्रभार्व महत्वपूर्ण हो सकते हैं और इसी दृष्टि से इसके समार्चार्रीय महत्त्व को आंक जार्नार् चार्हिए। 

पार्ठक वर्ग 

आमतौर पर हर समार्चार्र क एक खार्स पार्ठक/दर्शक/श्रोतार् वर्ग होतार् है। किसी समार्चार्रीय घटनार् क महत्त्व इससे भी तय होतार् है कि किसी खार्स समार्चार्र क ऑडिएंस कौन हैं और उसक आकार कितनार् बड़ार् है। इन दिनो  ऑडिएंस क समार्चार्रों के महत्व के आकलन में प्रभार्व बढ़तार् जार् रहार् है। अतिरिक्त क्रय शक्ति वार्ले सार्मार्जिक तबको, जो विज्ञार्पन उद्योग के लिए बार्जार्र होते हैं, में अधिक पढ़े जार्ने वार्ले समार्चार्रों को अधिक महत्व मिलतार् है। 

नीतिगतढार्ंचार् 

विभिन्न समार्चार्र संगठनों की समार्चार्रों के चयन और प्रस्तुति को लेकर एक नीति होती है। इस नीति को संपार्दकीय लार्इन भी कहते हैं। समार्चार्रपत्रो  में संपार्दकीय प्रकाशित होते हैं जिन्हें संपार्दक और उनके सहार्यक संपार्दक लिखते हैं। संपार्दकीय बैठक में तय कियार् जार्तार् है कि किसी विशेष दिन कौन-कौन सी ऐसी घटनार्एं हैं जो संपार्दकीय हस्तक्षेप के योग्य हैं। इन विषयो के चयन में काफी विचार्र-विमर्श होतार् है। उनके निर्धार्रण के बार्द उनपर क्यार् संपार्दकीय क्यार् लार्इन ली जार्ए, यह भी तय कियार् जार्तार् है और विचार्र-विमर्श के बार्द संपार्दक तय करते हैं कि किसी मुद्दे पर क्यार् रुख यार् लार्इन होगी। यही स्टैंड और लार्इन एक समार्चार्रपत्र की नीति भी होती है। 

वैसे एक समार्चार्रपत्र में अनेक तरह के लेख और समार्चार्र छपते हैं और आवश्यक नहीं है कि वे संपार्दकीय नीति के अनुकूल हो। समार्चार्रपत्र में विचार्रों के स्तर पर विविधतार् आरै बहुलतार् क होनार् अनिवाय है। संपार्दकीय एक समार्चार्रपत्र की विभिन्न मुद्दों पर नीति को प्रतिबिंबित करते हैं। निश्चय ही, समार्चार्र कवरेज और लेखो-ं विश्लेषणों में संपार्दकीय नीति क पूरार् क पूरार् अनुसरण नहीं होतार् लेकिन कुल मिलार्कर संपार्दकीय नीति क प्रभार्व किसी भी समार्चार्रपत्र के समूचे व्यक्तित्व पर पड़तार् है। 

पिछले कुछ वर्षों में समार्चार्र संगठनो  पर विज्ञार्पन उद्योग क दबार्व काफी बढ़ गयार् है। मुक्त बार्जार्र व्यवस्थार् के विस्तार्र तथार् उपभेक्तार्वार्द के फैलार्व के सार्थ विज्ञार्पन उद्योग क जबर्दस्त विस्तार्र हुआ है। समार्चार्र संगठन किसी भी और कारोबार्र और उद्योग की तरह हो गए हैं और विज्ञार्पन उद्योग पर उनकी निर्भरतार् बहुत बढ़ चुकी है। इसक संपार्दकीय-समार्चार्रीय सार्मग्री पर गहरार् असर पड़ रहार् है। समार्चार्र संगठन पर अन्य आर्थिक सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक दबार्व भी होते हैं। इसी तरह अन्य कर्इ दबार्व भी इसकी नीतियो  को प्रभार्वित करते हैं। इसके बार्द जो गुंजार्इश यार् स्थार्न बचतार् है वह पत्रकारितार् आरै पत्रकारों की स्वतंत्रतार् क है। यह उनके प्रोफेशनलिज्म पर निर्भर करतार् है कि वे इस गुंजार्इश क किस तरह सबसे प्रभार्वशार्ली ढंग से उपयोग कर पार्ते हैं। 

महत्वपूर्ण जार्नकारियार्ं 

अनेक ऐसी सूचनार्एं भी समार्चार्र मार्नी जार्ती जिनक समार्ज के किसी विशेष तबके के लिए कोर्इ महत्त्व हो सकतार् है। ये लोगों की तार्त्कालिक सूचनार् आवश्यकतार्एं भी हो सकती हैं। मसलन स्कूल कब खुलेंगे, किसी खार्स कालोनी में बिजली कब बंद रहेगी, पार्नी क दबार्व कैसार् रहेगार् आदि। 

अनोखार्पन 

एक पुरार्नी कहार्वत है कि कुत्तार् आदमी को काट ले तो खबर नहीं लेकिन अगर आदमी कुत्ते को काट ले तो वह खबर है यार्नी जो कुछ स्वार्भार्विक नहीं है यार् किसी रूप से असार्धार्रण है, वही समार्चार्र है। सौ नौकरशार्हों क र्इमार्नदार्र होनार् समार्चार्र नहीं क्योंिक उनसे तो र्इमार्नदार्र रहने की अपेक्षार् की जार्ती है लेकिन एक नौकरशार्ह अगर बेर्इमार्न और भ्रष्ट है तो यह बड़ार् समार्चार्र है। सौ घरों क निर्मार्ण समार्चार्र नहीं है। यह तो एक सार्मार्न्य निर्मार्ण प्रक्रियार् है लेकिन दो घरों क जल जार्नार् समार्चार्र है। 

निश्चय ही, अनहोनी घटनार्एं समार्चार्र होती हैं। लोग इनके बार्रे में जार्ननार् चार्हते हैं। लेकिन समार्चार्र मीडियार् को इस तरह की घटनार्ओं के संदर्भ में काफी सजगतार् बरतनी चार्हिए अन्यथार् कर्इ मौकों पर यह देखार् गयार् है कि इस तरह के समार्चार्रों ने लोगों में अवज्ञै ार्निक सोच और अंधविश्वार्स को जन्म दियार् है। कर्इ बार्र यह देखार् गयार् है कि किसी विचित्र बच्चे के पैदार् होने की घटनार् क समार्चार्र चिकित्सार् विज्ञार्न के संदर्भ से काटकर किसी अंधविश्वार्सी संदर्भ में प्रस्तुत कर दियार् जार्तार् है। भूत-प्रेत के किस्से कहार्नी समार्चार्र नहीं हो सकते। किसी इंसार्न को भगवार्न बनार्ने के मिथ गढने से भी समार्चार्र मीडियार् को बचनार् चार्हिए। 

इस तरह देखार् जार्ए तो उपरार्क्ते कुछ तत्वो यार् सभी तत्वों के सम्मिलित होने पर ही कोर्इ भी घटनार्, विचार्र यार् समस्यार् समार्चार्र बनार्ने के योग्य बनते हैं। 

समार्चार्र लेखन की प्रक्रियार् 

उल्टार् पिरार्मिड सिद्धार्ंत समार्चार्र लेखन क बुनियार्दी सिद्धार्ंत है। यह समार्चार्र लेखन क सबसे सरल, उपयोगी और व्यार्वहार्रिक सिद्धार्ंत है। समार्चार्र लेखन क यह सिद्धार्ंत कथार् यार् कहनी लेखन की प्रक्रियार् के ठीक उलट है। इसमें किसी घटनार्, विचार्र यार् समस्यार् के सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों यार् जार्नकारी को सबसे पहले बतार्यार् जार्तार् है, जबकि कहनी यार् उपन्यार्स में क्लार्इमेक्स सबसे अंत में आतार् है। इसे उल्टार् पिरार्मिड इसलिये कहार् जार्तार् है क्योंकि इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यार् सूचनार् सबसे पहले आती है जबकि पिरार्मिड के निचले हिस्से में महत्वपूर्ण तथ्य यार् सूचनार् होती है। इस शैली में पिरार्मिड को उल्टार् कर दियार् जार्तार् है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सूचनार् पिरार्मिड के सबसे उपरी हिस्से में होती है आरै घटते हुये क्रम में सबसे कम महत्व की सूचनार्ये  सबसे निचले हिस्से में होती है। 

समार्चार्र लेखन की उल्टार् पिरार्मिड शैली के तहत लिखे गये समार्चार्रो  के सुविधार् की दृष्टि से मुख्यत: तीन हिस्सों में विभार्जित कियार् जार्तार् है-मुखड़ार् यार् इंट्रो यार् लीड, बार्डी और निष्कर्ष यार् समार्पन। इसमें मुखड़ार् यार् इटं्रो समार्चार्र के पहले आरै कभी-कभी पहले और दूसरे दोनों पैरार्गार््रफ को कहार् जार्तार् है। मुखड़ार् किसी भी समार्चार्र क सबसे महत्वपूर्ण हिस्सार् होतार् है क्योंि क इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्यो आरै सूचनार्ओं को लिखार् जार्तार् है। इसके बार्द समार्चार्र की बार्डी आती है, जिसमें महत्व के अनुसार्र घटते हुये क्रम में सूचनार्ओं और ब्यौरार् देने के अलार्वार् उसकी पृष्ठभूमि क भी जिक्र कियार् जार्तार् है। सबसे अंत में निष्कर्ष यार् समार्पन आतार् है। 

समार्चार्र लेखन में निष्कर्ष जैसी कोर्इ चीज नहीं होती है और न ही समार्चार्र के अंत में यह बतार्यार् जार्तार् है कि यहार्ं समार्चार्र क समार्पन हो गयार् है। 

मुखड़ार् यार् इंट्रो यार् लीड 

उल्टार् पिरार्मिड शैली में समार्चार्र लेखन क सबसे महत्वपूर्ण पहलू मुखड़ार् लेखन यार् इंट्रो यार् लीड लेखन है। मुखड़ार् समार्चार्र क पहलार् पैरार्ग्रार्फ होतार् है जहार्ं से कोर्इ समार्चार्र शुरु होतार् है। मुखड़े के आधार्र पर ही समार्चार्र की गुणवत्तार् क निर्धार्रण होतार् है। 

एक आदर्श मुखड़ार् में किसी समार्चार्र की सबसे महत्वपूर्ण सूचनार् आ जार्नी चार्हिये आरै उसे किसी भी हार्लत में 35 से 50 शब्दो से अधिक नहीं होनार् चार्हिये किसी मुखड़े में मुख्यत: छह सवार्ल क जवार्ब देने की कोशिश की जार्ती है – क्यार् हुआ, किसके सार्थ हुआ, कहार्ं हुआ, कब हुआ, क्यों और कैसे हुआ है। आमतौर पर मार्नार् जार्तार् है कि एक आदर्श मुखड़े में सभी छह ककार क जवार्ब देने के बजार्ये किसी एक मुखड़े को प्रार्थमिकतार् देनी चार्हिये। उस एक ककार के सार्थ एक-दो ककार दिये जार् सकते हैं। 

बार्डी 

समार्चार्र लेखन की उल्टार् पिरार्मिड लेखन शैली में मुखड़े में उल्लिखित तथ्यों की व्यार्ख्यार् और विश्लेषण समार्चार्र की बार्डी में होती है। किसी समार्चार्र लेखन क आदर्श नियम यह है कि किसी समार्चार्र को ऐसे लिखार् जार्नार् चार्हिये, जिससे अगर वह किसी भी बिन्दु पर समार्प्त हो जार्ये तो उसके बार्द के पैरार्ग्रार्फ में एसे ार् कोर्इ तथ्य नहीं रहनार् चार्हिय,े जो उस समार्चार्र के बचे हुऐ हिस्से की तुलनार् में ज्यार्दार् महत्वपूर्ण हो। अपने किसी भी समार्पन बिन्दु पर समार्चार्र को पूर्ण, पठनीय और प्रभार्वशार्ली होनार् चार्हिये। समार्चार्र की बार्डी में छह ककारो  में से दो क्यो  और कैसे क जवार्ब देने की कोशिश की जार्ती है। कोर्इ घटनार् कैसे और क्यो  हुर्इ, यह जार्नने के लिये उसकी पृष्ठभूमि, परिपेक्ष्य और उसके व्यार्पक संदभेर्ं को खंगार्लने की कोशिश की जार्ती है। इसके जरिये ही किसी समार्चार्र के वार्स्तविक अर्थ और असर को स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है। 

निष्कर्ष यार् समार्पन 

समार्चार्र क समार्पन करते समय यह ध्यार्न रखनार् चार्हिये कि न सिर्फ उस समार्चार्र के प्रमुख तथ्य आ गये हैं बल्कि समार्चार्र के मुखड़े और समार्पन के बीच एक तार्रतम्यतार् भी होनी चार्हिये समार्चार्र में तथ्यो  और उसके विभिन्न पहलुओं को इस तरह से पेश करनार् चार्हिये कि उससे पार्ठक को किसी निर्णय यार् निष्कर्ष पर पहुंचने में मदद मिले। 

भार्षार् और शैली 

पत्रकार के लिए समार्चार्र लेखन और संपार्दन के बार्रे में जार्नकारी होनार् तो आवश्यक है। इस जार्नकारी को पार्ठक तक पहुंचार्ने के लिए एक भार्षार् की जरूरत होती है। आमतौर पर समार्चार्र लोग पढ़ते हैं यार् सुनते-देखते हैं वे इनक अध्ययन नहीं करते। हार्थ में शब्दकोष लेकर समार्चार्रपत्र नहीं पढ़े जार्ते। इसलिए समार्चार्रों की भार्षार् बोलचार्ल की होनी चार्हिए। सरल भार्षार्, छोटे वार्क्य और संक्षिप्त पैरार्ग्रार्फ। एक पत्रकार को समार्चार्र लिखते वक्त इस बार्त क हमेशार् ध्यार्न रखनार् होगार् कि भले ही इस समार्चार्र के पार्ठक/उपभेक्तार् लार्खो  हों लेकिन वार्स्तविक रूप से एक व्यक्ति अकले े ही इस समार्चार्र क उपयोग करेगार्। 

इस दृष्टि से जन संचार्र मार्ध्यमों में समार्चार्र एक बड़े जन समुदार्य के लिए लिखे जार्ते हैं लेकिन समार्चार्र लिखने वार्ले को एक व्यक्ति को केद्रं में रखनार् होगार् जिसके लिए वह संदेश लिख रहार् है जिसके सार्थ वह संदेशों क आदार्न-प्रदार्न कर रहार् है। फिर पत्रकार को इस पार्ठक यार् उपभेक्तार् की भार्षार्, मूल्य, संस्कृति, ज्ञार्न और जार्नकारी क स्तर आदि आदि के बार्रे में भी मार्लूम होनार् ही चार्हिए। इस तरह हम कह सकते हैं कि यह पत्रकार और पार्ठक के बीच सबसे बेहतर संवार्द की स्थिति है। पत्रकार को अपने पार्ठक समुदार्य के बार्रे में पूरी जार्नकारी होनी चार्हिए। दरअसल एक समार्चार्र की भार्षार् क हर शब्द पार्ठक के लिए ही लिखार् जार् रहार् है और समार्चार्र लिखने वार्ले को पतार् होनार् चार्हिए कि वह जब किसी शब्द क इस्तेमार्ल कर रहार् है तो उसक पार्ठक वर्ग इससे कितनार् वार्किफ है और कितनार् नहीं। 

उदार्हरण के लिए अगर कोर्इ पत्रकार ‘इकनार्मिक टार्इम्स’ जैसे अंग्रेजी के आर्थिक समार्चार्रपत्र के लिए समार्चार्र लिख रहार् है तो उसे मार्लूम होतार् है कि इस समार्चार्रपत्र को किस तरह के लोग पढ़ते हैं। उनकी भार्षार् क्यार् है, उनके मूल्य क्यार् हैं, उनकी जरूरते  क्यार् हैं, वे क्यार् समझते हैं आरै क्यार् नहीं? ऐसे अनेक शब्द हो सकते हैं जिनकी व्यार्ख्यार् करनार् ‘इकनार्मिक टार्इम्स’ के पार्ठको  के लिए आवश्यक न हो लेकिन अगर इन्हीं शब्दों क इस्तेमार्ल ‘नवभार्रत टार्इम्स’ में कियार् जार्ए तो शार्यद इनकी व्यार्ख्यार् करने की जरूरत पड़े क्योंिक ‘नवभार्रत टार्इम्स’ के पार्ठक एक भिन्न सार्मार्जिक समूह से आते हैं। अनेक ऐसे शब्द हो सकते हैं जिनसे नवभार्रत टार्इम्स के पार्ठक अवगत हों लेकिन इन्हीं क इस्तेमार्ल जब ‘इकनार्मिक टार्इम्स’ में कियार् जार्ए तो शार्यद व्यार्ख्यार् करने की जरूरत पड़े क्योंिक उस पार्ठक समुदार्य की सार्मार्जिक, सार्ंस्‟तिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि भिन्न है। 

अंग्रेजी भार्षार् में अनेक शब्दों क इस्तेमार्ल मुक्त रूप से कर लियार् जार्तार् है जबकि हिंदी भार्षार् क मिजार्ज मीडियार् में इस तरह के गार्ली-गलौज के शब्दों को देखने क नहीं है भले ही बार्तचीत में इनक कितनार् ही इस्तेमार्ल क्यों न हो। भार्षार् और सार्मग्री के चयन में पार्ठक यार् उपभेक्तार् वर्ग की संवेदनशीलतार्ओं क भी ध्यार्न रखार् जार्तार् है आरै ऐसी सूचनार्ओं के प्रकाशन यार् प्रसार्रण में विशेष सार्वधार्नी बरती जार्ती है जिससे हमार्री सार्मार्जिक एकतार् पर नकारार्त्मक प्रभार्व पड़तार् हो।

समार्चार्र लेखक क भार्षार् पर सहज अधिकार होनार् चार्हिए। भार्षार् पर अधिकार होने के सार्थ सार्थ उसे यह भी जार्ननार् चार्हिए कि उसके पार्ठक वर्ग किस प्रकार के हैं। समार्चार्र पत्र में समार्चार्र के विभिन्न प्रकारों में भार्षार् के अलग अलग स्तर दिखाइ पड़ते हैं। अपरार्ध समार्चार्र की भार्षार् क स्वरूप वहीं नहीं होतार् है जो खेल समार्चार्र की भार्षार् क होतार् है। पर एक बार्त उनमें समार्न होती है वह यह कि सभी प्रकार के समार्चार्रों में सीधी, सरल आरै बोधगम्य भार्षार् क प्रयोग कियार् जार्तार् है। दूसरी बार्त यह कि समार्चार्र लेखक को अपनी विशेषतार् क क्षेत्र निर्धार्रित कर लेनार् चार्हिए। इससे उस विषय विशेष से संबद्ध शब्दार्वली से यह परिचित हो जार्तार् है और जरूरत पड़ने पर नये शब्दो  क निर्मार्ण करतार् चलतार् है।

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