सफेद मूसली की खेती कैसे करें
सफेद मूसली को मार्नव मार्त्र के लिए प्रकृति द्वार्रार् प्रदत्त अमूल्य उपहार्र कहार् जार्ए तो शार्यद अतिश्योक्ति नहीं होगी। अनेकों आयुर्वेदिक एलोपैथिक तथार् यूनार्नी दवाइयों के निर्मार्ण हेतु प्रयुक्त होने वार्ली इस दिव्य जड़ी-बूटी की विश्वभर में वाषिक उपलब्धतार् लगभग 5000 टन है जबकि इसकी मार्ँग लगभग 35000 टन प्रतिवर्ष आँकी गर्इ है। यह औषधीय पौधार् प्रार्कृतिक रूप से हमार्रे देश के जंगलों में पार्यार् जार्तार् है, परन्तु अंधार्धुंध तथार् अपरिपक्व विदोहन के कारण अब यह पौधार् लुप्त होने की कगार्र पर है, यही कारण है कि अब इसकी विधिवत् खेती करने की ओर लोगों क ध्यार्न आकर्षित हुआ है। इसकी खेती करने की दिशार् में किए गए प्रयोग न केवल अत्यार्धिक सफल रहे हैं, बल्कि व्यार्वसार्यिक रूप से इसकी खेती लार्भकारी भी है।

सफेद मूसली एक कंदयुक्त पौधार् होतार् है, जिसकी अधिकतम ऊँचाइ डेढ़ फीट तक होती है तथार् इसकी कंदिल जड़ें (जिन्हें कंद अथवार् फिंगर्स कहार् जार्तार् है) जमीन में अधिकतम 10 इंच तक नीचे जार्ती है। भार्रतवर्ष के विभिन्न भार्गों में जंगलों में प्रार्कृतिक रूप में पार्यार् जार्ने वार्लार् यह पौधार् क्लोरोफार्इटम बोरिविलिएनम के नार्म से जार्नार् जार्तार् है परंतु ‘‘इंडियन मेटीरियार् मेडिका’’ में इसक नार्म क्लोरोफार्इटम अरुंडीनेशियम दर्शार्यार् गयार् है। गुजरार्ती भार्षार् सफेद मूसली क पौधार् में यह पौधार् धेली मूसली के नार्म से, उत्तरप्रदेश में खैरुवार् के नार्म से, मरार्ठी में सुफेद अथवार् सुफेतार् मूसली के नार्म से, मलयार्लम में शेदेवेली के नार्म से, तमिल भार्षार् में तार्निरवितार्ंग के नार्म से तथार् अरबी भार्षार् में यह शकेक्वेले हिन्दी के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। उ0 प्र0 एवं मध्यप्रदेश के जंगलों में यह पौधार् बरसार्त के समय अपने आप उग जार्तार् है तथार् आदिवार्सी लोग इसे उखार्ड़ कर सस्ती दरों पर बार्जार्र में बेच देते हैं। बहुधार् यह मूसली ठीक से तैयार्र नहीं हो पार्ती (मैच्योर नहीं हो पार्ती),

सफेद मूसली क पौधार्

अत: इसके औषधीय गुणों में भी कमी रहती है। इसके फलस्वरूप बार्जार्र में इसके उचित दार्म नहीं मिल पार्ते तथार् यह बार्जार्र में 15 से 150 रुपये प्रति किग्रार्0 की दर से बेच दी जार्ती है जबकि अच्छी गुणवत्तार् वार्ली विधिवत सुखाइ हुर्इ मूसली की बार्जार्र में 1500 रु0 प्रति कि.ग्रार्. तथार् इससे अधिक कीमत भी मिल जार्ती है।

सफेद मूसली की विभिन्न प्रजार्तियार्ँ /किस्में 

मूसली की विभिन्न प्रजार्तियार्ँ पाइ जार्ती हैं जैसे-क्लोरोफार्इटम बोरिविलिएनम, क्लोरार्फार्इटम ट्यूबरोजम, क्लोरोफार्इटम अरुन्डीनेशियम, क्लोरोफार्इटम एटेनुएटम, क्लोरोफार्इटम ब्रीविस्केपम आदि, परन्तु मध्यप्रदेश के जंगलों में अधिकांशत: उपलब्धतार् क्लोरोफार्इटम बोरिविलिएनम तथार् ट्यूबरोज़म की ही है। इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि ट्यूबरोज़म में क्रार्उन के सार्थ एक धार्गार् जैसार् लगार् होतार् है तथार् उसके उपरार्ंत इसकी मोटाइ बढ़ती है, जबकि बोरिविलिएनम में कंद के फिंगर की मोटाइ ऊपर ज्यार्दार् होती है यार् तो पूरी फिंगर की मोटाइ एक जैसी रहती है अथवार् यह नीचे की ओर घटती जार्ती है। चूँकि ट्यूबरोज़म के संदर्भ में छिलक उतार्रनार् कठिन होतार् है अत: यह खेती के लिए उपयुक्त नहीं मार्नी जार्ती अस्तु अधिकांशत: क्लोरोफार्इटम बोरिविलिएनम की ही खेती की जार्ती है।

मूसली के औषधीय उपयोग

 विभिन्न दवाइयों के निर्मार्ण हेतु सफेद मूसली (कार्बोहार्इड्रेट – 42 प्रतिशत, प्रोटीन्स – 8 प्रतिशत, फार्इबर – 4 प्रतिशत, सैपोनिन्स – 17 प्रतिशत) क उपयोग हमार्रे देश में बरसों से होतार् आ रहार् है। मूलत: यह एक ऐसी जड़ी-बूटी मार्नी गर्इ है जिसमें किसी भी प्रकार की तथार् किसी भी कारण से आर्इ शार्रीरिक शिथिलतार् को दूर करने की क्षमतार् पाइ गर्इ है। यही कारण है कि कोर्इ भी आयुर्वेदिक टॉनिक (जैसे-च्यवनप्रार्श, शिलार्जीत आदि) इसके बिनार् संपूर्ण नहीं मार्नार् जार्तार्। नपुंसकतार् दूर करने, यौनशक्ति एवं बलवर्धन हेतु इसक उपयोग अधिक हो रहार् है। यह इतनी पौष्टिक तथार् बलवर्धक होती है कि इसे ‘‘दूसरे शिलार्जीत’’ की संज्ञार् दी गर्इ है तथार् इसे चीन/उत्तरी अमेरिक में पार्ये जार्ने वार्ले पौधे जिन्सेंग जिसक वनस्पतिक नार्म ‘‘पेनेक्स’’ है,Phone …………………………………. जैसार् बलवर्धक मार्नार् गयार् है। विदेशों में इससे कैलॉग जैसे फ्लेक्स बनार्ए जार्ने पर भी कार्य चल रहार् है जो नार्श्ते के रूप में प्रयुक्त किए जार् सकेंगें। इसके अतिरिक्त इससे मार्तार्ओं क दूध बढ़ार्ने, प्रसवोपरार्न्त होने वार्ली बीमार्रियों तथार् शिथिलतार् को दूर करने तथार् मधुमेह आदि जैसे अनेकों रोगों के निवार्रण हेतु भी दवाइयार्ँ बनाइ जार्ती हैं। इसी प्रकार ऐसी अनेकों आयुर्वेदिक, एलोपैथिक तथार् यूनार्नी औषधियार्ँ हैं जो इस जड़ी-बूटी से बनाइ जार्ती हैं तथार् जिसके कारण यह एक उच्च मूल्य जड़ी-बूटी बन गर्इ है तथार् भार्रत के सार्थ-सार्थ अंतर्रार्ष्ट्रीय बार्जार्र में भी इसकी प्रचुर मार्ँग है। वर्तमार्न में सफेद मूसली क उपयोग करके प्रमुख उत्पार्द एवं औषधियार्ं जैसे- शिवोजार्इम, सूर्यार्शक्ति कैप्सूल, सीमेन्टो टेबलेट, मेमोटोन सिरप, मूसली पार्क, कामदेव चूर्ण, दिव्य रसार्यन चूर्ण, केसरी जीवन, जोश शक्ति आदि।

मूसली की खेती की आवश्यकतार् क्यों ? 

सफेद मूसली विभिन्न औषधियों के निर्मार्ण हेतु प्रयुक्त होने वार्ली एक अमूल्य जड़ी-बूटी है जिसकी देशीय तथार् अंतर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर व्यार्पक मार्ँग है। परन्तु जिस तेजी से यह मार्ँग बढ़ रही है उसकी तुलनार् में इसके उत्पार्दन तथार् आपूर्ति में बढ़ोत्तरी नहीं हो पाइ है। अभी तक इसकी आपूर्ति क एक ही सार्धन थार् – जंगलों से इसकी प्रार्प्ति। परन्तु निरंतर तथार् अंधार्धुंध दोहन के कारण एक तो उपयुक्त गुणवत्तार् वार्ली मूसली मिल पार्नार् मुश्किल हो गयार् है, दूसरे इसकी आपूर्ति में भी निरंतर कमी आ रही है जबकि मार्ँग निरंतर बढ़ रही है। एक अनुमार्न के अनुसार्र अंतर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर मूसली की कुल वाषिक उपलब्धतार् 5000 टन है जबकि इसकी वाषिक मार्ँग 35000 टन है। इस बढ़ती हुर्इ मार्ँग की आपूर्ति तभी संभव है यदि इसकी विधिवत् खेती की जार्ए। हमार्रे देश के विभिन्न भार्गों में मूसली की विधिवत् खेती प्रार्रंभ हुर्इ है वैज्ञार्निक तरीके से मूसली की खेती किसी भी प्रकार की खेती की तुलनार् में कर्इ गुनार् ज्यार्दार् लार्भकारी है तथार् इसकी खेती से औसतन प्रति एकड़ 4 से 5 लार्ख रुपये तक क शुद्ध लार्भ कमार्यार् जार् सकतार् है। इसकी खेती के लिए मध्यप्रदेश, महार्रार्ष्ट्र, उत्तरप्रदेश, बिहार्र, उड़ीसार्, हरियार्णार्, दिल्ली आदि प्रदेशों की जलवार्यु काफी अनुकूल है।

मूसली की खेती कैसे करें ? 

मूसली मूलत: एक कंदरुपी पौधार् है जो कि हमार्रे देश के जंगलों में प्रार्कृतिक रूप से उगतार् है। स्वभार्व से भी यह एक ‘‘हाडी’’ पौधार् है जिसकी विधिवत् खेती काफी सफल है। इसकी खेती से संबंधित किये गए सफल प्रयोगों के आधार्र पर इसकी खेती के लिए विकसित की गर्इ बार्योवेद कृषि तकनीक वर्तमार्न में काफी लार्भदार्यक सिद्ध हुर्इ है।

सफेद मूसली की खेती

खेती के लिए उपयुक्त भूमि

मूसली मूलत: एक कन्द है जिसकी बढ़ोत्तरी जमीन के अन्दर होती है अत: इसकी खेती के लिए प्रयुक्त की जार्ने वार्ली जमीन आदर््र (नमी) होनी चार्हिए। अच्छी जल निकासी वार्ली रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें जीवार्श्म की पर्यार्प्त मार्त्रार् उपस्थित हो, इसकी खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्नी जार्ती है। भूमि ज्यार्दार् गीली भी नहीं होनी चार्हिए अन्यथार् कन्द की फिंगर्स पतली रह जार्एगीं जिससे इसक उत्पार्दन प्रभार्वित होगार्।

फसल के लिए पार्नी की आवश्यकतार् 

मूसली की अच्छी फसल के लिए पार्नी की काफी आवश्यकतार् होती है। जून मार्ह में लगार्ए जार्ने के कारण जून-जुलाइ, अगस्त के महीनों में प्रार्कृतिक बरसार्त होने के कारण इन महीनों में कश्ित्रार्म रूप से सिंचाइ करने की आवश्यकतार् नहीं होती, फिर भी यह ध्यार्न दियार् जार्नार् आवश्यक है कि जब तक फसल उखार्ड़ न ली जार्ए तब तक भूमि गीली रहनी चार्हिए। अत: बरसार्त के उपरार्ंत लगभग प्रत्येक 10 दिन के अंतरार्ल पर खेत में पार्नी देनार् उपयुक्त होगार्। पौधों के पत्ते सूखकर झड़ जार्ने के उपरार्ंत भी जब तक कंद खेत में हो, हल्की-हल्की सिंचाइ प्रत्येक दस दिन में करते रहनार् चार्हिए जिससे भूमिगत कन्दों की विधिवत् बढ़ोत्तरी होती रहे। सिंचाइ के लिए यदि खेत में ‘‘िस्प्रंकलर्स’’ लगे हो तो यह सर्वार्धिक उपयुक्त होगार् परन्तु ऐसार् अनिवाय नहीं है। सिंचाइ क मार्ध्यम तो कोर्इ भी प्रयुक्त कियार् जार् सकतार् है परन्तु सिंचाइ नियमित रूप से होते रहनार् चार्हिए। यद्यपि सिंचाइ कियार् जार्नार् आवश्यक है परन्तु खेत में पार्नी रुकनार् नहीं चार्हिए अन्यथार् इससे फसल क उत्पार्दन प्रभार्वित होगार्। सिंचाइ के लिए कुआं, ट्यूबवेल, नहर आदि जो भी संभव हो, मार्ध्यम क उपयोग कियार् जार् सकतार् है।

मूसली की खेती के प्रमुख लार्भ 

अत्यार्धिक लार्भकारी फसल – मार्त्र 6 से 8 मार्ह में प्रति एकड़ चार्र से पार्ंच लार्ख रुपये क शुद्ध लार्भ देने वार्ली और कोर्इ फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसैसिंग करने की आवश्यकतार् नहीं-कोर्इ मशीन लगार्ने की जरूरत नहीं। सीधे उखार्ड़ कर, छील कर तथार् सुखार् कर बेच सकते हैं। बार्जार्र की समस्यार् नहीं – व्यार्पक बार्जार्र उपलब्ध है। मूसली की खेती के लिए बार्योवेद कृषि तकनीक विकसित हो चुकी है। बार्योवेद शोध संस्थार्न में मूसली की खेती के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध है। अधिक लोगों को रोजगार्र उपलब्ध हो सकेगार्। मौसम के परिवर्तन क फसल पर ज्यार्दार् प्रभार्व नहीं पड़तार्। यदि प्रार्रंभिक स्तर पर किसार्न मंहगार् बीज न ले सकें तो कम बीज लेकर इनक विकास स्वयं भी कर सकते है।

खेत की तैयार्री

मूसली की फसल के लिए खेत की तैयार्री करने के लिए सर्वप्रथम खेत में गहरार् हल चलार् दियार् जार्तार् है। यदि खेत में ग्रीन मैन्यूर के लिए पहले से कोर्इ अल्पार्वधि वार्ली फसल उगाइ गर्इ हो तो उसे काट कर खेत में डार्ल कर मिलार् दियार् जार्तार् है। तदुपरार्न्त इस खेत में गोबर की पकी हुर्इ खार्द 5 से 10 ट्रार्ली प्रति एकड़ भुरक कर इसे खेत में मिलार् दियार् जार्तार् है। बार्योनीमार् 15 किग्रार्0 एवं बार्योधन 1/2 किग्रार्0 प्रति एकड़ की दर से डार्लकर बीज बोनार् चार्हिए। आवश्यकतार् पड़ने पर 32 किग्रार्. यूरियार् 24 किग्रार्. डी.ए.पी. प्रति एकड़ डार्लनार् चार्हिए।

वेड्स बनार्नार् 

मूसली की अच्छी फसल के लिए खेत में बेड्स बनार्ये जार्नार् आवश्यक होतार् है। इस संदर्भ में 1 से 1.5 फीट चौड़े सार्मार्न्य खेत से कम से कम 6 इंच से 1.5 फीट ऊँचे बेड्स बनार् दिये जार्ते है। इनके सार्थ-सार्थ पार्नी के उचित निकास हेतु नार्लियों की पर्यार्प्त व्यवस्थार् की जार्ती है तथार् बेड्स के किनार्रों पर आने-जार्ने के लिए पर्यार्प्त जगह छोड़ार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। यदि ज्यार्दार् चौड़े बेड्स न बनार्ने हो तो आलू की तरह के सिंगल बैड्स भी बनार्ए जार् सकते है। हार्लार्ँकि इसमें काफी ज्यार्दार् जगह घिरेगी परन्तु मूसली उखार्ड़ते समय यह ज्यार्दार् सुविधार्जनक रहेगार्।

मूसली की बिजाइ हेतु प्रयुक्त होने वार्लार् बीज अथवार् प्लार्ंटिंग मटेरियल 

मूसली की बिजाइ इसके घनकंदों अथवार् ट्यूबर्स अथवार् फिंगर्स से की जार्ती है। इस संदर्भ में पूर्व की फसल से निकाले गये कंदों/फिंगर्स क उपयोग भी कियार् जार् सकतार् है अथवार् जंगलों से भी इस प्रकार के कंद एकत्रित किये अथवार् करवार्ये जार् सकते है। बीज के लिए ट्यूबर्स अथवार् फिंगर्स क उपयोग करते हुए यह बार्त अवश्य ध्यार्न में रखनी चार्हिए कि फिंगर्स के सार्थ पौधे के डिस्क अथवार् क्रार्उन क कुछ भार्ग अवश्य सार्थ में लगार् रहे अन्यथार् पौधे के उगने में परेशार्नी आ सकती है। इसके सार्थ-सार्थ प्रयुक्त किये जार्ने वार्ले ट्यूबर अथवार् फिंगर क छिलक भी क्षतिग्रस्त नहीं होनार् चार्हिए। इस प्रकार मार्न लो एक पौधे में 20 फिंगर्स हैं तो उससे 20 बीज बन सकते हैं, परन्तु डिस्क अथवार् क्रार्उन क कुछ भार्ग सभी के सार्थ लगार् होनार् चार्हिए। यदि कंद छोटे हो तो पूरे के पूरे पौधे क उपयोग भी बिजाइ हेतु कियार् जार् सकतार् है। ऐसार् भी कियार् जार् सकतार् है कि जब फसल उखार्ड़ी जार्ये तो पौधे के जो लम्बे-लम्बे अथवार् पूर्ण विकसित फिंगर्स अथवार् ट्यूबर्स हों उन्हें तो अलग करके तथार् छील करके बिक्री के लिए भिजवार् दियार् जार्ये तथार् जो फिंगर्स छोटे रह गये हों उन्हें बीज के रूप में प्रयुक्त कर लियार् जार्ये। फिंगर्स तभी तक अलग-अलग किए जार् सकते हैं जब तक पौधों में से पत्ते न निकलें अन्यथार् इन्हें अलग-अलग करनार् फार्यदेमन्द नहीं रहेगार्। प्रार्य: एक ट्यूबर (बीज) क वज़न 0.5 ग्रार्म से 20 ग्रार्म तक हो सकतार् है परन्तु अच्छी फसल की प्रार्प्ति हेतु ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि प्रार्य: ट्यूबर 5 ग्रार्म से 10 ग्रार्म तक के वजन क हो। अच्छी फसल की प्रार्प्ति के लिए अच्छी गुणवत्तार् तथार् प्रार्मार्णिक बीज बार्योवेद शोध फाम यार् विश्वार्सपार्त्र शोध संस्थार्न अथवार् सीमैप, लखनऊ से लेनार् (कम से कम प्रथम फसल के लिए) अत्यार्वश्यक होतार् है।

जंगलों से प्रार्प्त किये जार्ने वार्ले बीज 

मूसली एक उच्च मूल्य उत्पार्द है इसलिए इसक बीज भी काफी मंहगार् होतार् है। प्रार्य: बार्जार्र में इसकी कीमत 300 रु0 से 600 रु0 प्रति कि0ग्रार्0 तक ली जार्ती है। एक एकड़ में लगभग 4 से 6 क्विंटल बीज लगेगार् अत: बीज की न्यूनतम लार्गत लगभग 1.5 लार्ख रु0 आएगी जिसको खरीदनार् प्रत्येक किसार्न के लिए संभव नहीं होगार्। इस समस्यार् क एक हल यह हो सकतार् है कि पहले वर्ष में किसार्न जंगलों से मूसली एकत्रित कर लें। प्रार्य: बरसार्त के प्रार्रंभ होते ही मूसली के पौधे उगने लगते हैं जिन्हें बनवार्सी लोग जंगलों से उखार्ड़ कर बेचने के लिए बार्जार्रों में लार्ते हैं। इस प्रकार उनसे ये पौधे खरीद करके इनकी खेतों में ट्रार्ंसप्लार्ंटिंग की जार् सकती है। इस प्रकार से जंगल से उखार्ड़ी हुर्इ मूसली काफी सस्ते दार्मों (प्रार्य: 25 रु0 से 100 रु0 प्रति किग्रार्0 तक) प्रार्प्त हो जार्ती है। इस प्रकार की मूसली को सीधे (पूरे के पूरे पौधे को) खेत में लगार् दियार् जार्तार् है। क्योंकि यह मूसली अपेक्षार्कश्त काफी कमजोर होती है, अत: इसे पूर्णतयार् विकसित होने में समय लग सकतार् है। इस प्रकार की लगाइ गर्इ मूसली से प्रार्य: पहले सार्ल फसल नहीं ली जार्ती अथवार् इसकी कीमत काफी कम मिलती है। परन्तु अगले वर्ष में ये अच्छी तरह विकसित हो जार्ते है तथार् अच्छार् उत्पार्दन देने के काबिल हो जार्ते है। तीसरे वर्ष में तो ये बीज तथार् उत्पार्दन दोनों के लिए तैयार्र हो जार्ते है। इस प्रकार जंगल से मूसली के पौधे प्रार्प्त करके मंहगें बीज की समस्यार् भी हल की जार् सकती है। दूसरार् हल यह है कि पहले वर्ष किसार्न कम मार्त्रार् में मूसली की खेती करें। अपने यहार्ँ तैयार्र किये गये बीजों से मूसली की खेती को आगे बढ़ार्यें। यह सर्वोत्तम तरीक है।

क्यार् बीजो से भी मूसली की बिजाइ की जार् सकती है ? 

मूसली के पौधे जब लगभग 2 मार्ह से अधिक अवधि के हो जार्ते हैं तो उन पर पहले फूल तथार् बार्द में छोटे-छोटे बीज आते हैं जो पकने पर काले रंग के (प्यार्ज के बीजों जैसे) हो जार्ते हैं। ये बीज काफी छोटे होते है तथार् इनक संग्रहण काफी मुश्किल होतार् है। प्रार्य: पौधों पर पोलीथीन की थैलियार्ँ बार्ँध कर इनक संग्रहण कियार् जार्तार् है। यद्यपि बीजो से मूसली के पौधे तैयार्र करने की दिशार् में भी शोध कार्य चल रहे हैं परन्तु अभी इस क्षेत्र में ज्यार्दार् सफलतार् प्रार्प्त नहीं हो पाइ है। बीजों से पौध तैयार्र करने में एक परेशार्नी यह भी देखी गर्इ है कि इसमें पौधार् तैयार्र होने में काफी समय (2 वर्ष तथार् इससे अधिक भी) लग जार्तार् है तथार् पौधे पर्यार्प्त हष्ट-पुष्ट भी नहीं हो पार्ते। अत: अच्छी फसल की प्रार्प्ति हेतु तथार् कम समयार्वधि की आवश्यकतार् को देखते हुए सीधे डिस्क अथवार् क्रार्उन युक्त कंदों/फिंगर्स से बिजाइ करनार् ही सर्वश्रेष्ठ पार्यार् गयार् है।

(अ) प्लार्ंटिंग मेटेरियल की मार्त्रार्: मूसली की बिजाइ हेतु 5 से 10 ग्रार्म वजन की क्रार्उन युक्त फिंगर्स सर्वार्धिक उपयुक्त रहेंगी जिनक 6’’ × 6’’ की दूरी पर रोपण कियार् जार्तार् है। एक एकड़ के क्षेत्र में अधिकतम 80, 000 बीज (क्रार्उनयुक्त फिंगर्स) लगेगें जिनमें से कुछ बीज 2 ग्रार्म के भी हो सकते हैं, कुछ 3 ग्रार्म के, कुछ 3.5 ग्रार्म के अथवार् कुछ 10 ग्रार्म के। इस प्रकार एक एकड़ के क्षेत्र हेतु लगभग 4 से 6 क्विंटल प्लार्ंटिंग मेटेरियल की आवश्यकतार् होगी।

(ब) बिजाइ से पूर्व प्लार्टिंग मेटेरियल क ट्रीटमेण्ट : लगार्ये जार्ने वार्ले पौधे रोगमुक्त रहें तथार् इनके नीचे किसी प्रकार की बीमार्री आदि न लगे इसके लिए प्लार्ंटिंग मेटेरियल को लगार्ने से पूर्व 2 मिनट तक बार्बस्टीन के घोल में अथवार् एक घंटार् गौमूत्र में डुबोकर रखार् जार्नार् चार्हिए जिससे ये रोगमुक्त हो जार्ते है।

बिजाइ की विधि 

खेत की तैयार्री करने के उपरार्ंत 3 से 3.5 फीट चौड़े, जमीन से 1-1) फीट ऊँचे बैड बनार् लिए जार्ते है। बरसार्त प्रार्रंम्भ होते ही (15 जून से 15 जुलाइ के लगभग) इन बैड्स में लकड़ी की सहार्यतार् से (जोकि इस कार्य हेतु विशेष रुप से बनाइ जार् सकती है), कतार्र से कतार्र तथार् पौधे से पौधार् 6 × 6 इंच की दूरी रखते हुए छेद कर लिए जार्ते हैं। छेद करने के पूर्व यह देखनार् आवश्यक है कि हार्ल ही में बार्रिश हुर्इ हो अथवार् उसमें पार्नी दियार् गयार् हो (जमीन गीली होनी चार्हिए)। इस प्रकार एक बैड में छ: कतार्रें बन जार्ती है। फिर इस प्रत्येक छेद में हार्थ से एक-एक डिस्क युक्त अथवार् क्रार्उन युक्त फिंगर अथवार् सम्पूर्ण पौधे क रोपण कर दियार् जार्तार् है। यदि फिंगर बहुत छोटी हो तो 2-2 फिंगर्स को मिलार्कर भी रोपण कियार् जार् सकतार् है परन्तु सभी फिंगर्स में क्रार्उन क कुछ भार्ग संलग्न रहनार् चार्हिए। यदि बीज बड़ार् हो (5 ग्रार्म से अधिक हो) तो 6 × 6 इंच वार्ली दूरी को बढ़ार्यार् भी जार् सकतार् है। रोपण करते समय यह ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि फिंगर जमीन में 1 इंच से ज्यार्दार् गहरी न जार्ये। फिंगर जमीन में सीधी लगाइ जार्नी चार्हिए अर्थार्त् क्रार्उन वार्लार् भार्ग ऊपर तथार् फिंगर क अंतिम सिरार् नीचे। रोपण के उपरार्न्त इस पर हार्थ से ही मिट्टीडार्ल देनी चार्हिए अथवार् छेद ऊपर से बंद कर दियार् जार्नार् चार्हिए। इस प्रक्रियार् में प्रार्य: एक व्यक्ति लकड़ी से आगे-आगे छेद बनार्तार् चलतार् है तथार् दूसरार् फिंगर्स क रोपण करतार् जार्तार् है।

पौधों क उगनार् तथार् बढ़नार् 

बिजाइ के कुछ दिनों के उपरार्ंत ही पौधार् उगने लगतार् है तथार् इसमें पत्ते आने लगते है। इसी बीच फूल तथार् बीज आते हैं तथार् अक्टूबर-नवम्बर मार्ह में पत्ते अपने आप सूखकर गिर जार्ते हैं और पौधे के कन्द जमीन के नीचे रह जार्ते है।

मूसली की फसल से होने वार्ले उत्पार्दन की मार्त्रार् 

मूसली की फसल में होने वार्ले उत्पार्दन की मार्त्रार् अनेकों कारकों पर आधार्रित होती है, जिनमें सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है इसक बीज ऐसार् पार्यार् गयार् है कि छोटे बीजों से (प्रार्य: 5 ग्रार्म से कम वजन वार्ले बीजों से) प्रार्य: 4-5 गुनार् बड़ार् कन्द तैयार्र होतार् है, (अर्थार्त् इसमें लगने वार्ली सभी फिंगर्स को मिलार्कर कंद क वजन प्रयुक्त किये गए बीज की तुलनार् में 4-5 गुनार् बड़ार् होगार्) जबकि इससे ज्यार्दार् वजन वार्ले कन्दों प्रार्य: 3 गुनार् बड़ार् कन्दों से प्रार्य: 3 गुनार् बड़ार् कन्द तैयार्र होतार् है। 2 ग्रार्म से लेकर 270 ग्रार्म तक के कन्द पार्ये जार्ते है परन्तु एक अच्छी फसल से औसतन 20-25 ग्रार्म वज़न वार्ले कन्द प्रार्प्त होने है। इसी प्रकार एक पौधे में लगने वार्ले फिंगर्स की संख्यार् भी 2 से लेकर 65 तक देखी गर्इ है परन्तु औसतन एक पौधे में 10 से 12 फिंगर्स होनार् पार्यार् गयार् है। इस प्रकार ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि डार्ले गये बीज की तुलनार् में मूसली क 5 से 10 गुनार् ज्यार्दार् उत्पार्दन होगार्।

मूसली की फसल में होने वार्ली प्रमुख बीमार्रियार्ँ तथार् प्रार्कृतिक आपदार्ऐ 

मूसली की फसल में प्रार्य: कोर्इ विशेष बीमार्री नहीं देखी गयी है अत: इसमें किसी प्रकार के कीटनार्शकों क उपयोग करने की आवश्यकतार् नहीं होती। क्योंकि पौधे क कन्द भूमि में रहतार् है अत: इस फसल पर किन्हीं प्रार्कृतिक आपदार्ओं जैसे ओलार्वृष्टि आदि क प्रभार्व भी नहीं हो पार्तार्। फिर भी कोर्इ रोग होने पर बार्योपैकुनिल एवं बार्योधन क पण्र्ार्ीय छिड़काव करनार् चार्हिए। यदि पार्नी के उचित निकास की व्यवस्थार् न हो तथार् पौधे की जड़ों के पार्स पार्नी ज्यार्दार् दिन तक खड़ार् रहे, तो पैदार्वार्र पर प्रभार्व पड़ सकतार् है तथार् कन्द पतले हो सकते है। कवक की बीमार्री के कारण सड़ सकते हैं इसलिए ट्रार्इकोडरमार् 2 से 3 कि.ग्रार्. प्रति एकड़ अथवार् बार्योनीमार् 15 कि.ग्रार्प्रति एकड़ क भू प्रयोग करनार् उचित होगार्। वैसे यह पौधार् किसी प्रकार की बीमार्री अथवार् प्रार्कृतिक आपदार्ओं के प्रभार्व से लगभग मुक्त है।

पतली मूसली की फिंगर्स/टूयूबर्स क उत्पार्दन पर प्रभार्व

मूसली की फसल क प्रमुख उत्पार्द उसकी फिंगर्स ही है जिन्हें छीलकर तथार् सुखार्कर सूखी मूसली तैयार्र की जार्ती है, अत: ये फिंगर्स मोटी तथार् अधिक से अधिक गूदार्युक्त होनी चार्हिए तार्कि छीलने पर ज्यार्दार् मार्त्रार् में गूदार्युक्त फिंगर्स प्रार्प्त हो सकें (फिंगर्स के पतले होने पर ज्यार्दार् गूदार् प्रार्प्त नहीं होगार्) प्रार्य: भूमि के ज्यार्दार् नर्म (पोलार्) होने पर फिंगर्स जमीन में ज्यार्दार् गहरी चली जार्ती है तथार् पतली रह जार्ती है। अत: खेत को तैयार्र करते समय इस बार्त क ध्यार्न रखार् जार्नार् चार्हिए कि भूमि ज्यार्दार् नर्म (पोली) न हो, दूसरे यदि खुदाइ के उपरार्ंत पौधे में ऐसी फिंगर्स निकलती हैं तो उन्हें उत्पार्दन के रूप में प्रयुक्त करने के बजार्य प्लार्ंटिंग मेटेरियल के रूप में प्रयुक्त कर लियार् जार्नार् चार्हिए।

जमीन से पौधों/कन्दों को उखार्ड़नार् 

पौधों के पत्ते सूख जार्ने पर (बिजाइ से लगभग 90-95 दिन के उपरार्ंत) ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि फसल तैयार्र हो गर्इ है तथार् कन्द निकाले जार् सकते है, परन्तु ऐसार् कदार्पि नहीं करनार् चार्हिए। पत्तों के सूखकर गिर जार्ने के उपरार्ंत भी एक-दो महीने तक के लिए कन्दों को जमीन में ही रहने दियार् जार्नार् चार्हिए तथार् पत्तों के सूख जार्ने के उपरार्ंत प्रार्रंभ में (कच्चे) कन्दों क रंग सफेदी लिए हुए होतार् है जो कि धीरे-धीरे भूरार् होने लगतार् है। जमीन में जब कन्द पूर्णतयार् पक जार्ते हैं तो इनक रंग गहरार् भूरार् हो जार्तार् है। अत: जबकंदों क रंग गहरार्-भूरार् हो जार्ए तो कुदार्ली की सहार्यतार् से एक-एक करके कन्दों को निकालार् जार् सकतार् है। प्रार्य: कंद निकालने क कार्य माच-अप्रैल मार्ह में कियार् जार्तार् है। कंदों को निकालने क कार्य हार्थ से ही (ट्रैक्टर आदि से नहीं) करनार् चार्हिए जिससे सभी कन्द बिनार् क्रार्उन से अलग हुए निकाले जार् सकें तथार् जिन कन्दों क उपयोग बीज बनार्ने हेतु करनार् हो, वे बीज के रूप में प्रयुक्त किय जार् सकें तथार् जिनको तोड़कर, छीलकर तथार् सुखार्कर सूखी मूसली के रूप में बेचार् जार्नार् हो, उन्हें बिक्री हेतु प्रयुक्त कियार् जार् सके।

कंदों को जमीन से उखार्ड़ने क उपयुक्त समय 

कर्इ बार्र फसल तैयार्र हो जार्ने के उपरार्ंत भी किसार्न को कन्दों को जमीन से उखार्ड़नार् नहीं चार्हिए तथार् इन्हें जमीन में ही रहने देनार् चार्हिए। ऐसार् कर्इ बार्र चार्ह कर भी कियार् जार् सकतार् है अथवार् मजबूरी वश भी हो सकतार् है (उदार्हरणाथ समय पर श्रमिक न मिलें अथवार् किसार्न के पार्स समय न हो)। परन्तु इसमें कोर्इ ज्यार्दार् परेशार्नी की बार्त नहीं होती क्योंकि बरसार्त में ये कंद (जो उखार्ड़े नहीं गए थे) जमीन में पड़े-पड़े गल जार्येगें तथार् अगली बरसार्त में इनमें से अपने आप नये पौधे निकल आयेंगे। परन्तु इसमें कमी यह रहती है कि अगलार् पौधार् (पिछले कंद की तुलनार् में जो जमीन में ही गल गयार् थार्) की तुलनार् में मार्त्रार् 50 से 100 प्रतिशत तक ही बढ़ पार्तार् है। उदार्हरणाथ यदि पहलार् कंद 10 ग्रार्म क थार् तो यह एक सार्ल के उपरार्ंत यह मार्त्रार् 15 से 20 ग्रार्म तक ही हो पार्एगार् जबकि यदि इसे उखार्ड़ कर लगार्यार् जार्तार् है तो इसमें 3 से 4 गुनार् की बढ़ोत्तरी हो जार्ती। फिर भी यह तय है कि यदि कंद न भी उखार्ड़ार् जार्ये तो उसमें कोर्इ हार्नि नहीं होगी तथार् इसमें प्रतिवर्ष अपने आप कुछ न कुछ वृद्धि होती रहेगी। ऐसी वृद्धि प्रार्य: सार्त सार्ल तक देखी गर्इ है तथार् सार्त सार्ल के बार्द इन कंदों क बढ़नार् रुक जार्तार् है।

कंदो की धुलाइ 

जमीन से कंद उखार्ड़ने पर उनके सार्थ मिट्टी आदि लगी रहती है अत: छीलने से पूर्व उन्हें धोयार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। इस संदर्भ में उखार्ड़े हुए कंदों की टोकरियों को पार्नी के बहार्व के नीचे रखकर कंदों की धुलाइ की जार् सकती है। इसके उपरार्ंत धुले हुए कंदोंकी छिलाइ की प्रक्रियार् प्रार्रंभ होती है।

मूसली के कंदों की छिलाइ 

जिन कंदों क उपयोग बीज हेतु करनार् हो, उन्हें छोड़कर शेष मूसली को विपणन हेतु भिजवार्ने से पूर्व उसके कंदों/ट्यूबर्स/ंिफंगर्स की छिलाइ करनार् अथवार् उनक छिलक उतार्रनार् अत्यार्वश्यक होतार् है तार्कि छिलक उतार्रने पर यह अच्छी तरह से सूख जार्ए तथार् इसे बिक्री हेतु प्रस्तुत कियार् जार् सके। यद्यपि यह कार्य अत्यार्धिक आसार्न है तथार् अकुशल श्रमिक/बच्चे भी इसे कर सकते है परन्तु यह काफी अधिक श्रमसार्ध्य है तथार् इसमें काफी समय लगतार् है, क्योंकि मूसली के प्रत्येक कंद/फिंगर को छीलनार् पड़तार् है। वर्तमार्न में मूसली की छिलाइ हेतु प्रचलित प्रमुख विधियार्ँ निम्नार्नुसार्र हैं-

(क) पत्थर से घिसाइ :प्रार्य: परम्परार्गत रुप से जंगलों से एकत्रित की जार्ने वार्ली मूसली क छिलक उतार्रने हेतु मूसली को पत्थर से घिसार् जार्तार् है जिससे उसक छिलक उतर जार्तार् है। परन्तु यह विधि ज्यार्दार् उपयुक्त नहीं है, क्योंकि (1) पत्थर से घिसने पर मूसली में से कर्इ बार्र छिलके के सार्थ काफी ज्यार्दार् मार्त्रार् में गूदार् निकल जार्तार् है जिससे अनार्वश्यक हार्नि होती है, (2) कर्इ बार्र मूसली के कुछ एक स्थार्नों पर गूदार् सार्थ ही रह जार्तार् है जिससे उत्पार्द की गुणवत्तार् प्रभार्वित होती है, (3) इस प्रकार से छिली हुर्इ मूसली की बार्जार्र में मार्ँग भी प्रार्य: कम रहती है।

(ख) मूसली को गीलार् करके उसक छिलक उतार्रनार् :प्रार्य: ग्रार्मीण क्षेत्रों में जहार्ँ जंगलों से मूसली एकत्रित की जार्ती है, कच्ची मूसली को जंगल से उखार्ड़ने के उपरार्न्त उनक ढेर लगार् दियार् जार्तार् है तथार् उन पर प्रतिदिन पार्नी क हल्का-हल्क छिड़काव कियार् जार्तार् है। कुछ समय के उपरार्न्त यह मूसली यार् तो स्वयं ही छिलक छोड़ने लगती है यार् इसे आसार्नी से मसल कर छिलक निकाल दियार् जार्तार् है। यह विधि विशेष रूप से जंगलोंसे उखार्ड़ी हुर्इ कच्ची मूसली क छिलक उतार्रने के लिए उपयोगी हो सकती है। परन्तु इस विधि से पूर्णतयार् पकी हुर्इ मूसली से छिलक उतार्रने क सुझार्व देनार् शार्यद उपयुक्त नहीं होगार्।

(ग) चार्कू से छिलाइ : पत्थर पर घिसाइ की बजार्ए चार्कू से मूसली की छिलाइ करनार् ज्यार्दार् सुविधार् जनक होतार् है। इसमें वेस्टेज भी कम होतार् है तथार् इससे उत्पार्द भी अच्छी गुणवत्तार् क तैयार्र होतार् है। यह विधि काफी आसार्न भी है तथार् कोर्इ भी अकुशल मजदूर भी ऐसी छिलाइ क कार्य कर सकतार् है। यहार्ँ तक कि बच्चे भी यह कार्य कर सकते है। इस प्रकार एक दिन में एक व्यक्ति लगभग 1 किलोग्रार्म से 5 किग्रार्0 तक मूसली छील लेतार् है। नि:संदेह छिलाइ क कार्य काफी श्रमसार्ध्य कार्य है परन्तु यह कार्य हार्थ से ही कियार् जार्तार् है तथार् इसक अभी कोर्इ विकल्प उपलब्ध नहीं हो पार्यार् है। यद्यपि इस संदर्भ में किन्हीं रसार्यनों के प्रयोग पर शोध चल रहार् है जिनमें मूसली को भिगोने पर इसक छिलक स्वत: ही निकल सके परन्तु ऐसार् अभी व्यवहार्रिक नहीं हो सक है। इस प्रकार के रसार्यनों के उपयोग से मूसली के औषधीय गुण भी प्रभार्वित होनार् संभार्वित हैं अत: इस दिशार् में अभी विशेष प्रगति नहीं हो पाइ है तथार् अच्छी गुणवत्तार् की सूखी मूसली प्रार्प्त करने हेतु अभी तक हार्थ से छिलाइ करनार् ही सर्वश्रेष्ठ विधि मार्नी जार् रही है। इसकी छिलाइ हेतु मशीन बनार्ने की दिशार् में भी कार्य चल रहार् है परन्तु अभी तक इस संदर्भ में कोर्इ सफलतार् नहीं मिल पाइ है।

छिली हुर्इ मूसली को सुखार्नार् 

छीलने के उपरार्ंत छिली हुर्इ मूसली को सुखार्यार् जार्तार् है तार्कि उसमें उपस्थित नमी पूर्णतयार् सूख जार्ए। ऐसार् प्रार्य: छिली हुर्इ मूसली को धूप में डार्लकर कियार् जार्तार् है। प्रार्य: दो-तीन दिन तक खुली धूप में रखने से मूसली में उपस्थित नमी पूर्णतयार् सूख जार्ती है।

मूसली की पैकिंग 

सूखी हुर्इ मूसली को विपणन हेतु प्रस्तुत करने से पूर्व उसकी विधिवत् पैकिंग की जार्ती है। यह पैकिंग प्रार्य: पॉलीथीन की थैलियों में की जार्ती है तार्कि यह सुरक्षित रह सके तथार् इस पर किसी प्रकार से नमी आदि क प्रभार्व न पड़े।

जमीन से उखार्ड़ने से लेकर सुखार्ने तक में मूसली के वजन में कमी 

जमीन से उखार्ड़ने के उपरार्ंत मूसली की छिलाइ करने तथार् उसे सुखार्ने की प्रक्रियार् में मूसली के वजन में अंतर होनार् स्वभार्विक है परन्तु सूखने के उपरार्न्त बचने की मार्त्रार् मूसली के फिंगर्स की मोटाइ (मार्ंसलतार्) पर ज्यार्दार् निर्भर करती है क्योंकि कुछ फिंगर्स ज्यार्दार् मोटी होती है जबकि अन्य पतली होती है। यदि फिंगर्स ज्यार्दार् मोटी होगी तो छिलाइ के उपरार्ंत अंतत: सूखने पर इनक वजन उन फिंगर्स की अपेक्षार् अधिक रहेगार् जो पतली फिंगर्स को छीलने तथार् सुखार्ने के उपरार्ंत प्रार्प्त होगी। वैसे इसे छीलने तथार् सुखार्ने की प्रक्रियार् में तार्जी मूसली (खेत से उखार्ड़ी हुर्इ मूसली) क लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक सूखी मूसली के रूप में प्रार्प्त होतार् है।

आगार्मी फसल हेतु मूसली के बीज क संग्रहण कैसे कियार् जार्ए ?

मूसली के कंदों की खुदाइ के उपरार्ंत कंदों के सार्थ लगी हुर्इ बड़ी फिंगर्स को तोड़कर, छीलकर तथार् सुखार्कर बिक्रय कियार् जार् सकतार् है जबकि शेष बची हुर्इ क्रार्उन सहित फिंगर्स, जो प्रार्य: आकार में छोटी होती है, क उपयोग बीज के रूप में कियार् जार् सकतार् है। क्योंकि ये कंद माच-अप्रैल मार्ह में निकाले जार्ते हैं तथार् इन्हें मर्इ-जून तक सुरक्षित रखार् जार्नार् आवश्यक होतार् है (क्योंकि इनकी बिजाइ मर्इ-जून में ही होगी) अत: तब तक के लिए इनक भण्डार्रण सार्वधार्नीपूर्ण करनार् आवश्यक होतार् है। इन कंदों को कोल्ड स्टोरेज में रखनार् भी ज्यार्दार् उपयुक्त नहीं पार्यार् गयार् है क्योंकि इससे पौधों क उगार्व प्रभार्वित होतार् है। यद्यपि यदि बीजों के संग्रहण के लिए एक विशेष चैम्बर बनार्यार् जार् सके जिसमें 70 से 80 अंश तक आदर््रतार् स्थिर की जार् सके तो यह सर्वश्रेष्ठ होगार् परन्तु सभी किसार्नों के लिए ऐसार् मँहगार् चैम्बर बनार् पार्नार् संभव नहीं हो पार्तार्। अत: कम लार्गत में इस प्रकार की व्यवस्थार् स्थार्पित किये जार्ने की दिशार् में शोध कार्य चल रहे है। वैसे इन कंदों को एक छार्यार् वार्ले स्थार्न में एक गढ्डे में रखकर ऊपर से मिट्टी डार्लकर सुरक्षित रखे जार्ने हेतु प्रयोग कियार् जार् सकतार् है।

सार्गौन, पार्पुलर अथवार् पपीते के सार्थ अंर्तवर्तीय फसल के रूप में मूसली की खेती 

यद्यपि मूसली अपने आप में इतनी अधिक लार्भकारी फसल है कि इसकी खेती मुख्य फसल के रूप में ही की जार्नी चार्हिए परन्तु अंर्तवर्तीय फसल के रूप में भी इसकी खेती काफी सफलतार्पूर्वक की जार् सकती है। अभी कर्इ कृषकों द्वार्रार् सार्गौन के बीचों-बीच मूसली की खेती करके प्रार्रंभिक वर्ष में ही (बिनार् कोर्इ विशेष खर्च किये) लार्भ कमार्यार् जार् सकतार् है। पपीते के सार्थ भी अंर्तवर्तीय फसल के रूप में मूसली की खेती की जार् सकती है। इस संदर्भ में विशेषज्ञों क विचार्र है कि टीक के बीचों-बीच 1. 5 फीट के दार्यरे में मूसली के 11 पौधे रोपित कर दिये जार्यें तथार् इन पर मिट्टी चढ़ार् कर इन्हें 18 महीने तक पड़ार् रहने दियार् जार्ए (प्रथम वर्ष में न निकालार् जार्ए)। यदि ड्रिप अथवार् िस्प्रंकलर्स से इनकी सिंचाइ व्यवस्थार् हो सके तो यह और भी ज्यार्दार् लार्भकारी होगार्। ऐसी जगह में से घार्स आदि निकालने की भी आवश्यकतार् नहीं होगी। इस प्रकार 18 महीने के उपरार्ंत बिनार् किसी अतिरिक्त खर्च के मूसली के पौधों में स्वत: ही 4 से 5 गुनार् बढ़ोत्तरी हो जार्एगी। इस प्रकार टीक, नींबू, पपीतार्, पोपुलर आदि के सार्थ अंतवर्तीय फसल के रूप में मूसली की खेती करनार् व्यवसार्यिक रूप से काफी लार्भकारी हो सकतार् है।

मूसली क उत्पार्दन तथार् इसकी खेती से अनुमार्नित लार्भ 

प्रार्य: एक एकड़ क्षेत्र में मूसली के लगभग 80,000 पौधे लगार्ए जार्ते है। यदि इनमें से 70,000 अच्छे पौधे भी अंत में बचते हैं जिनमें एक पौधे क औसतन वजन 30 ग्रार्म होतार् है तो किसार्न को लगभग 2100 किलोग्रार्म मूसली प्रार्प्त होगी जो कि छीलने तथार् सूखने के उपरार्ंत लगभग 4 क्विंटल रह जार्एगी (सूखने पर मूसली क वजन 20 से 25 प्रतिशत रह जार्तार् है)। इसके अतिरिक्त इसमें एक एकड़ की बिजाइ हेतु प्लार्ंटिंग मेटेरियल भी बच जार्एगार्। वैसे जो लोग मूसली की वार्स्तविक रूप से खेती कर रहे है वं प्रति एकड़ औसतन 3 से 5 क्विंटल सूखी मूसली की पैदार्वार्र होनार् बतार्ते हैं जबकि विशेषज्ञों क विचार्र है कि यदि मूसली की फसल वैज्ञार्निक ढंग से सही रूप से ली जार्ए तो इससे प्रति एकड़ 16 क्ंिवटल तक सूखी मूसली प्रार्प्त हो सकती है। यदि वर्तमार्न बार्जार्र मूल्य (जो कि 1000 रुपये से 1700 रुपये प्रति किलोग्रार्म तक है), के अनुसार्र देखार् जार्ए तो प्रार्प्त 4 क्ंिवटल सूखी मूसली से औसतन 5 लार्ख रुपये की प्रार्प्तियार्ँ होगी। मूसली को छीलने के उपरार्न्त इसकी गुणवत्तार् के अनुसार्र ग्रेडिंग की जार्ती है जिसमें

Share:

Leave a Comment

Your email address will not be published.

TOP