संस्कृति क अर्थ, परिभार्षार् एवं प्रकार
संस्कृति शब्द क प्रयोग हम दिन-प्रतिदिन के जीवन में (अक्सर) निरन्तर करते रहते हैं। सार्थ ही संस्कृति शब्द क प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में भी करते हैं। उदार्हरण के तौर पर हमार्री संस्कृति में यह नहीं होतार् तथार् पश्चिमी संस्कृति में इसकी स्वीकृति है। समार्जशार्स्त्र विज्ञार्न के रूप में किसी भी अवधार्रणार् क स्पष्ट अर्थ होतार् है जो कि वैज्ञार्निक बोध को दर्शार्तार् है। अत: “संस्कृति” क अर्थ समार्जशार्स्त्रीय अवधार्रणार् के रूप में “सीखार् हुआ व्यवहार्र” होतार् है। अर्थार्त् कोई भी व्यक्ति बचपन से अब तक जो कुछ भी सीखतार् है, उदार्हरण के तौरे पर खार्ने क तरीका, बार्त करने क तरीका, भार्षार् क ज्ञार्न, लिखनार्-पढनार् तथार् अन्य योग्यतार्एँ, यह संस्कृति है।
मनुष्य क कौन सार् व्यवहार्र संस्कृति है?

मनुष्य के व्यवहार्र के कई पक्ष हैं-

  1. जैविक व्यवहार्र (Biological behaviour) जैसे- भूख, नींद, चलनार्, दौड़नार्।
  2. मनोवैज्ञार्निक व्यवहार्र (Psychological behaviour) जैसे- सोचनार्, डरनार्, हँसनार् आदि।
  3. सार्मार्जिक व्यवहार्र (Social behaviour) जैसे- नमस्कार करनार्, पढ़नार्-लिखनार्, बार्तें करनार् आदि।

क्यार् आप जार्नते हैं कि मार्नव संस्कृति क निर्मार्ण कैसे कर पार्यार् ?

लेस्ली ए व्हार्ईट (Leslie A White) ने मार्नव में पार्ँच विशिष्ट क्षमतार्ओं क उल्लेख कियार् हैं, जिसे मनुष्य ने प्रकृति से पार्यार् है और जिसके फलस्वरुप वह संस्कृति क निर्मार्ण कर सक है :-

  1. पहली विशेषतार् है- मार्नव के खड़े रहने की क्षमतार्, इससे व्यक्ति दोनों हार्थों द्वार्रार् उपयोगी कार्य करतार् है।
  2. दूसरार्-मनुष्य के हार्थों की बनार्वट है, जिसके फलस्वरुप वह अपने हार्थों क स्वतन्त्रतार्पूर्वक किसी भी दिशार् में घुमार् पार्तार् है और उसके द्वार्रार् तरह-तरह की वस्तुओं क निर्मार्ण करतार् है।
  3. तीसरार्-मार्नव की तीक्ष्ण दृष्टि, जिसके कारण वह प्रकृति तथार् घटनार्ओं क निरीक्षण एवं अवलोकन कर पार्तार् है और तरह-तरह की खोज एवं अविष्कार करतार् है।
  4. चौथार्-विकसित मस्तिष्क, जिसकी सहार्यतार् से मनुष्य अन्य प्रार्णियों से अधिक अच्छी तरह सोच सकतार् है। इस मस्तिष्क के कारण ही वह तर्क प्रस्तुत करतार् है तथार् कार्य-कारण सम्बन्ध स्थार्पित कर पार्तार् है।
  5. पार्ँचवार्ँ-प्रतीकों के निर्मार्ण की क्षमतार्। इन प्रतीकों के मार्ध्यम से व्यक्ति अपने ज्ञार्न व अनुभवों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तार्ंतरित कर पार्तार् है। प्रतीकों के द्वार्रार् ही भार्षार् क विकास सम्भव हुआ और लोग अपने ज्ञार्न तथार् विचार्रों के आदार्न-प्रदार्न में समर्थ हो पार्ये हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट होतार् है कि प्रतीकों क संस्कृति के निर्मार्ण, विकास, परिवर्तन तथार् विस्तार्र में बहुत बड़ार् योगदार्न है।

संस्कृति क अर्थ एवं परिभार्षार्

प्रसिद्ध मार्नवशार्स्त्री एडवर्ड बनाट टार्यलर (1832-1917) के द्वार्रार् सन् 1871 में प्रकाशित पुस्तक Primitive Culture में संस्कृति के संबंध में सर्वप्रथम उल्लेख कियार् गयार् है। टार्यलर मुख्य रूप से संस्कृति की अपनी परिभार्षार् के लिए जार्ने जार्ते हैं, इनके अनुसार्र, “संस्कृति वह जटिल समग्रतार् है जिसमें ज्ञार्न, विश्वार्स, कलार् आचार्र, कानून, प्रथार् और अन्य सभी क्षमतार्ओं तथार् आदतो क समार्वेश होतार् है जिन्हें मनुष्य समार्ज के नार्ते प्रार्प्त करार्तार् है।” टार्यलर ने संस्कृति क प्रयोग व्यार्पक अर्थ में कियार् है। इनके अनुसार्र सार्मार्जिक प्रार्णी होने के नार्ते व्यक्ति अपने पार्स जो कुछ भी रखतार् है तथार् सीखतार् है वह सब संस्कृति है। इस परिभार्षार् में सिर्फ अभौतिक तत्वों को ही सम्मिलित कियार् गयार् है।

रार्बर्ट बीरस्टीड (The Social Order) द्वार्रार् संस्कृति की दी गयी परिभार्षार् है कि “संस्कृति वह संपूर्ण जटिलतार् है, जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं, जिन पर हम विचार्र करते हैं, कार्य करते हैं और समार्ज के सदस्य होने के नार्ते अपने पार्स रखते हैं।”

इस परिभार्षार् में संस्कृति दोनों पक्षों भौतिक एवं अभौतिक को सम्मिलित कियार् गयार् है। हर्शकोविट्स(Man and His Work) के शब्दों में “संस्कृति पर्यार्वरण क मार्नव निर्मित भार्ग है”

इस परिभार्षार् से स्पष्ट होतार् है कि पर्यार्वरण के दो भार्ग होते हैं- पहलार्-प्रार्कृतिक और दूसरार्-सार्मार्जिक। सार्मार्जिक पर्यार्वरण में सार्री भौतिक और अभौतिक चीजें आती हैं, जिनक निर्मार्ण मार्नव के द्वार्रार् हुआ है। उदार्हरण के जिए कुर्सी, टेबल, कलम, रजिस्टर, धर्म, शिक्षार्, ज्ञार्न, नैतिकतार् आदि। हर्शकोविट्स ने इसी सार्मार्जिक पर्यार्वरण, जो मार्नव द्वार्रार् निर्मित है, को संस्कृति कहार् है।

बोगाडस के अनुसार्र, “किसी समूह के कार्य करने और विचार्र करने के सभी तरीकों क नार्म संस्कृति है।”

इस पर आप ध्यार्न दें कि, बोगाडस ने भी बीयरस्टीड की तरह ही अपनी भौतिक एवं अभौतिक दोनों पक्षों पर बल दियार् है।

मैलिनोस्की-”संस्कृति मनुष्य की कृति है तथार् एक सार्धन है, जिसके द्वार्रार् वह अपने लक्ष्यों की प्रार्प्ति करतार् है।” आपक कहनार् है कि “संस्कृति जीवन व्यतीत करने की एक संपूर्ण विधि है जो व्यक्ति के शार्रीरिक, मार्नसिक एवं अन्य आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करती है।”

संस्कृति के प्रकार

ऑगर्बन एवं निमकॉफ ने संस्कृति के दो प्रकारों की चर्चार् की है- भौतिक संस्कृति एवं अभौतिक संस्कृति।

भौतिक संस्कृति – 

भौतिक संस्कृति के अन्र्तगत उन सभी भौतिक एवं मूर्त वस्तुओं क समार्वेश होतार् है जिनक निर्मार्ण मनुष्य के लिए कियार् है, तथार् जिन्हें हम देख एवं छू सकते हैं। भौतिक संस्कृति की संख्यार् आदिम समार्ज की तुलनार् में आधुनिक समार्ज में अधिक होती है, प्रो.बीयरस्टीड ने भौतिक संस्कृति के समस्त तत्वों को मुख्य 13 वर्गों में विभार्जित करके इसे और स्पष्ट करने क प्रयार्स कियार् है- i.मशीनें ii.उपकरण iii.बर्तन iv.इमार्रतें v.सड़कें vi. पुल vii.शिल्प वस्तुऐं viii.कलार्त्मक वस्तुऐं ix.वस्त्र x.वार्हन xi.फर्नीचर xii.खार्द्य पदाथ xiii.औशधियार्ं आदि।

भौतिक संस्कृति की विशेषतार्एँ

  1. भौतिक संस्कृति मूर्त होती है।
  2. इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है।
  3. भौतिक संस्कृति मार्पी जार् सकती है।
  4. भौतिक संस्कृति में परिवर्तन शीघ्र होतार् है।
  5. इसकी उपयोगितार् एवं लार्भ क मूल्यार्ंकन कियार् जार् सकतार् है।
  6. भौतिक संस्कृति में बिनार् परिवर्तन किये इसे ग्रहण नहीं कियार् जार् सकतार् है। 

अर्थार्त् एक स्थार्न से दूसरे स्थार्न पर ले जार्ने तथार् उसे अपनार्ने में उसके स्वरूप में कोई फर्क नहीं पड़तार्। उदार्हरण के लिए मोटर गार्ड़ी, पोशार्क तथार् कपड़ार् इत्यार्दि।

अभौतिक संस्कृति – 

अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत उन सभी अभौतिक एवं अमूर्त वस्तुओं क समार्वेश होतार् है, जिनके कोई मार्प-तौल, आकार एवं रंग आदि नहीं होते। अभौतिक संस्कृति समार्जीकरण एवं सीखने की प्रक्रियार् द्वार्रार् एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तार्न्तरित होती रहती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अभौतिक संस्कृति क तार्त्पर्य संस्कृति के उस पक्ष में होतार् है, जिसक कोई मूर्त रूप नहीं होतार्, बल्कि विचार्रों एवं विश्वार्सों कि मार्ध्यम से मार्नव व्यवहार्र को नियन्त्रित, नियमित एवं प्रभार्वी करतार् है। प्रोñ बीयरस्टीड ने अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत विचार्रों और आदर्श नियमों को सर्वार्धिक महत्वपूर्ण बतार्यार् और कहार् कि विचार्र अभौतिक संस्कृति के प्रमुख अंग है। विचार्रों की कोई निश्चित संख्यार् हो सकती है, फिर भी प्रोñ बीयरस्टीड ने विचार्रों के कुछ समूह प्रस्तुत किये हैं-
i.वैज्ञार्निक सत्य ii-धामिक विश्वार्स iii.पौरार्णिक कथार्एँ iv.उपार्ख्यार्न v.सार्हित्य vi.अन्ध-विश्वार्स vii.सूत्र viii.लोकोक्तियार्ँ आदि।

ये सभी विचार्र अभौतिक संस्कृति के अंग होते हैं। आदर्श नियमों क सम्बन्ध विचार्र करने से नहीं, बल्कि व्यवहार्र करने के तौर-तरीकों से होतार् है। अर्थार्त् व्यवहार्र के उन नियमों यार् तरीकों को जिन्हें संस्कृति अपनार् आदर्श मार्नती है, आदर्श नियम कहार् जार्तार् है। प्रो. बीयरस्टीड ने सभी आदर्श नियमों को 14 भार्गों में बार्ँटार् है-
1.कानून 2.अधिनियम 3.नियम 4.नियमन 5.प्रथार्एँ 6.जनरीतियार्ँ 7. लोकाचार्र 8.निशेध 9.फैशन 10. संस्कार 11.कर्म-काण्ड 12.अनुश्ठार्न 13.परिपार्टी 14.सदार्चार्र।

अभौतिक संस्कृति की विशेषतार्एँ

  1. अभौतिक संस्कृति अमूर्त होती है।
  2. इसकी मार्प करनार् कठिन है।
  3. अभौतिक संस्कृति जटिल होती है।
  4. इसकी उपयोगितार् एवं लार्भ क मूल्यार्ंकन करनार् कठिन कार्य है।
  5. अभौतिक संस्कृति में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से होतार् है।
  6. अभौतिक संस्कृति को जब एक स्थार्न से दूसरे स्थार्न में ग्रहण कियार् जार्तार् है, तब उसके रूप में थोड़ार्-न-थोड़ार् परिवर्तन अवश्य होतार् है।
  7. अभौतिक संस्कृति मनुष्य के आध्यार्त्मिक एवं आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित होती है।

संस्कृति की प्रकृति यार् विशेषतार्एँ 

संस्कृति के सम्बन्ध में विभिन्न समार्जशार्स्त्रियों के विचार्रों को जार्नने के बार्द उसकी कुछ विशेषतार्एँ स्पष्ट होती है, जो उसकी प्रकृति को जार्नने और समझने में भी सहार्यक होती है। यहार्ँ कुछ प्रमुख विशेषतार्ओं क विवेचन कियार् जार् रहार् है-

  1. संस्कृति सीखार् हुआ व्यवहार्र है – संस्कृति एक सीखार् हुआ व्यवहार्र है। इसे व्यक्ति अपने पूर्वजों के वंशार्नुक्रम के मार्ध्यम से नहीं प्रार्प्त करतार्, बल्कि समार्ज में समार्जीकरण की प्रक्रियार् द्वार्रार् सीखतार् है। यह सीखनार् जीवन पर्यन्त अर्थार्त् जन्म से मृत्यु तक अनवरत चलतार् रहतार् है। आपको जार्ननार् आवश्यक है कि संस्कृति सीख हुआ व्यवहार्र है, किन्तु सभी सीखे हुए व्यवहार्र को संस्कृति नहीं कहार् जार् सकतार् है। पशुओं द्वार्रार् सीखे गये व्यवहार्र को संस्कृति नहीं कहार् जार् सकतार्, क्योंकि पशु जो कुछ भी सीखते हैं उसे किसी अन्य पशु को नहीं सीखार् सकते। संस्कृति के अंतर्गत वे आदतें और व्यवहार्र के तरीके आते है, जिन्हें सार्मार्न्य रूप से समार्ज के सभी सदस्यों द्वार्रार् सीखार् जार्तार् है। इस सन्दर्भ में लुन्डबर्ग (Lundbarg) ने कहार् है कि,”संस्कृति व्यक्ति की जन्मजार्त प्रवृत्तियों अथवार् प्रार्णीशार्स्त्रीय विरार्सत से सम्बन्धित नहीं होती, वरन् यह सार्मार्जिक सीख एवं अनुभवों पर आधरित रहती है।”
  2. संस्कृति सार्मार्जिक होती है –  संस्कृति में सार्मार्जिकतार् क गुण पार्यार् जार्तार् है। संस्कृति के अन्तर्गत पूरे समार्ज एवं सार्मार्जिक सम्बन्धों क प्रतिनिधित्व होतार् है। इसलिए यह कहार् जार् सकतार् है कि किसी एक यार् दो-चार्र व्यक्तियों द्वार्रार् सीखे गये व्यवहार्र को संस्कृति नहीं कहार् जार् सकतार्। कोई भी व्यवहार्र जब तक समार्ज के अधिकतर व्यक्तियों द्वार्रार् नहीं सीखार् जार्तार् है तब तक वह संस्कृति नहीं कहलार्यार् जार् सकतार्। संस्कृति एक समार्ज की संपूर्ण जीवन विधि (Way of Life) क प्रतिनिधित्व करती है। यही कारण है कि समार्ज क प्रत्येक सदस्य संस्कृति को अपनार्तार् है। संस्कृति सार्मार्जिक इस अर्थ में भी है कि यह किसी व्यक्ति विशेष यार् दो यार् चार्र व्यक्तियों की सम्पत्ति नहीं है। यह समार्ज के प्रत्येक सदस्य के लिए होतार् है। अत: इसक विस्तार्र व्यार्पक और सार्मार्जिक होतार् है।
  3. संस्कृति हस्तार्न्तरित होती है – संस्कृति के इसी गुण के कारण ही संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जार्ती है तो उसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी के अनुभव एवं सूझ जुड़ते जार्ते हैं। इससे संस्कृति में थोड़ार्-बहुत परिवर्तन एवं परिमाजन होतार् रहतार् है। संस्कृति के इसी गुण के कारण मार्नव अपने पिछले ज्ञार्न एवं अनुभव के आधार्र पर आगे नई-नई चीजों क अविष्कार करतार् है। आपको यह समझनार् होगार् कि- पशुओं में भी कुछ-कुछ सीखने की क्षमतार् होती है। लेकिन वे अपने सीखे हुए को अपने बच्चों और दूसरे पशुओं को नहीं सिखार् पार्ते। यही कारण है कि बहुत-कुछ सीखने की क्षमतार् रहने के बार्द भी उनमें संस्कृति क विकास नहीं हुआ है। मार्नव भार्षार् एवं प्रतीकों के मार्ध्यम से बहुत ही आसार्नी से अपनी संस्कृति क विकास एवं विस्तार्र करतार् है तथार् एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में हस्तार्न्तरित भी करतार् है। इससे संस्कृति की निरन्तरतार् भी बनी रहती है।
  4. संस्कृति मनुष्य द्वार्रार् निर्मित है – संस्कृति क तार्त्पर्य उन सभी तत्वों से होतार् है, जिनक निर्मार्ण स्वंय मनुष्य ने कियार् है। उदार्हरण के तौर पर हमार्रार् धर्म, विश्वार्स, ज्ञार्न, आचार्र, व्यवहार्र के तरीके एवं तरह-तरह के आवश्यकतार्ओं के सार्धन अर्थार्त् कुर्सी, टेबल आदि क निर्मार्ण मनुष्य द्वार्रार् कियार् गयार् है। इस तरह यह सभी संस्कृति हर्शकाविट्स क कहनार् है कि “संस्कृति पर्यार्वरण क मार्नव-निर्मित भार्ग है।”
  5. संस्कृति मार्नव आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करती है – संस्कृति में मार्नव आवश्यकतार्-पूर्ति करने क गुण होतार् है। संस्कृति की छोटी-से-छोटी इकाई भी प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य की आवश्यकतार् पूर्ति करती है यार् पूर्ति करने में मदद करती है। कभी-कभी संस्कृति की कोई इकाई बार्हरी तौर पर निरर्थक यार् अप्रकार्य प्रतीत होती है, लेकिन सम्पूर्ण ढार्ँचे से उसक महत्वपूर्ण स्थार्न होतार् है। मैलिनोस्की के विचार्र – प्रसिद्ध मार्नवशार्स्त्री मैलिनोस्की क कथन है कि संस्कृति के छोटे-से-छोटे तत्व क अस्तित्व उसके आवश्यकतार् पूर्ति करने के गुण पर निर्भर करतार् है। जब संस्कृति के किसी भी तत्व में आवश्यकतार्पूर्ति करने क गुण नहीं रह जार्तार् तो उसक अस्तित्व भी समार्प्त हो जार्तार् है। उदार्हरण के तौर पर प्रार्चीनकाल में जो संस्कृति के तत्व थे वे समार्प्त हो गए क्योंकि वे आवश्यकतार् पूति में असमर्थं रहे, इसमें सतीप्रथार् को उदार्हरण के रूप में देखार् जार् सकतार् है। इसी प्रकार, व्यवस्थार् में कोई इकाई कभी-कभी बहुत छोटी प्रतीत होती है मगर व्यवस्थार् के लिए वह इकाई भी काफी महत्वपूर्ण होती है। इस प्रकार, संस्कृति क कोई भी तत्व अप्रकार्यार्त्मक नहीं होतार् है बल्कि किसी भी रूप में मार्नव की आवश्यकतार् की पूर्ति करती है।
  6. प्रत्येक समार्ज की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है – प्रत्येक समार्ज की एक विशिष्ट संस्कृति होती है। हम जार्नते हैं कि कोई भी समार्ज एक विशिष्ट भौगोलिक एवं प्रार्कृतिक वार्तार्वरण लिये होतार् है। इसी के अनुरूप सार्मार्जिक वार्तार्वरण एवं संस्कृति क निर्मार्ण होतार् है। उदार्हरण के तौर पर पहार्ड़ों पर जीवन-यार्पन करने वार्ले लोगों क भौगोलिक पर्यार्वरण, मैदार्नी लोगों के भौगोलिक पर्यार्वरण से अलग होतार् है। इसी प्रकार, इन दोनों स्थार्नों में रहने वार्ले लोगों की आवश्यकतार्एं अलग-अलग होती है। जैसे-खार्नार्, रहने-सहने क तरीका, नृत्य, गार्यन, धर्म आदि। अत: दोनों की संस्कृति भौगोलिक पर्यार्वरण के सार्पेक्ष में आवश्यकतार् के अनुरूप विकसित होती है।
  7. संस्कृति में अनुकूलन क गुण होतार् है – संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषतार् होती है कि यह समय के सार्थ-सार्थ आवश्यकतार्ओं के अनुरूप् अनुकूलित हो जार्ती है। संस्कृति समार्ज के वार्तार्वरण एवं परिस्थिति के अनुसार्र होती है। जब वार्तार्वरण एवं परिस्थिति में परिवर्तन होतार् है तो संस्कृति भी उसके अनुसार्र अपने क ढ़ार्लती है। यदि यह विशेषतार् एवं गुण न रहे तो संस्कृति क अस्तित्व ही नहीं रह जार्येगार्। संस्कृति में समय एवं परिस्थिति के अनुसार्र परिवर्तन होने से उसकी उपयोगितार् समार्प्त नहीं हो पार्ती।
  8. संस्कृति अधि-सार्वयवी है – मार्नव ने अपनी मार्नसिक एवं शार्रीरिक क्षमतार्ओं के प्रयोग द्वार्रार् संस्कृति क निर्मार्ण कियार्, जो सार्वयव से ऊपर है। संस्कृति में रहकर व्यक्ति क विकास होतार् है और फिर मार्नव संस्कृति क निर्मार्ण करतार् है जो मार्नव से ऊपर हो जार्तार् है। मार्नव की समस्त क्षमतार्ओं क आधार्र सार्वयवी होतार् है, किन्तु इस संस्कृति को अधि-सार्वयवी से ऊपर हो जार्ती है। इसी अर्थ में संस्कृति को अधि-सार्वयवी कहार् गयार् है।
  9. संस्कृति अधि-वैयक्तिक है – संस्कृति की रचनार् और निरन्तरतार् दोनों ही किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं है। इसलिए यह अधि-वैयक्तिक(Super-individual) है। संस्कृति क निर्मार्ण किसी व्यक्ति-विशेष द्वार्रार् नहीं कियार् गयार् है बल्कि संस्कृति क निर्मार्ण सम्पूर्ण समूह द्वार्रार् होतार् है। प्रत्येक सार्ंस्कृतिक इकाई क अपनार् एक इतिहार्स होतार् है, जो किसी एक व्यक्ति से परे होतार् है। संस्कृति सार्मार्जिक अविष्कार क फल है, किन्तु यह अविष्कार किसी एक व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज नहीं है।
  10. संस्कृति में संतुलन तथार् संगठन होतार् है – संस्कृति के अन्तर्गत अनेक तत्व एवं खण्ड होते हैं किन्तु ये आपस में पृथक नहीं होते, बल्कि इनमें अन्त: सम्बन्ध तथार् अन्त: निर्भरतार् पार्यी जार्ती है। संस्कृति की प्रत्येक इकाई एक-दूसरे से अनग हटकर कार्य नहीं करती, बल्कि सब सम्मिलित रूप से कार्य करती है। इस प्रकार के संतुलन एवं संगठन से सार्ंस्कृतिक ढ़ार्ँचे क निर्मार्ण होतार् है।
  11. संस्कृति समूह क आदर्श होती है – प्रत्येक समूह की संस्कृति उस समूह के लिए आदर्श होती है। इस तरह की धार्रण सभी समार्ज में पार्यी जार्ती है। सभी लोग अपनी ही संस्कृति को आदर्श समझते हैं तथार् अन्य संस्कृति की तुलनार् में अपनी संस्कृति को उच्च मार्नते हैं। संस्कृति इसलिए भी आदर्श होती है कि इसक व्यवहार्र-प्रतिमार्न किसी व्यक्ति-विशेष क न होकर सार्रे समूह क व्यवहार्र होतार् है।

    संस्कृति के प्रकार्य

    1. व्यक्ति के लिए
    2. समूह के लिए

    व्यक्ति के लिए-

    1. संस्कृति मनुष्य को मार्नव बनार्ती है।
    2. जटिल स्थितियों क समार्धार्न।
    3. मार्नव आवश्यकतार्ओं की पूर्ति
    4. व्यक्तित्व निर्मार्ण
    5. मार्नव को मूल्य एवं आदर्श प्रदार्न करती है।
    6. मार्नव की आदतों क निर्धार्रण करती है।
    7. नैतिकतार् क निर्धार्रण करती है।
    8. व्यवहार्रों में एकरूपतार् लार्ती है।
    9. अनुभव एवं कार्यकुशलतार् बढ़ार्ती है।
    10. व्यक्ति की सुरक्षार् प्रदार्न करती है।
    11. समस्यार्ओं क समार्धार्न करती है।
    12. समार्जीकरण में योग देती है।
    13. प्रस्थिति एवं भूमिक क निर्धार्रण करती है।
    14. सार्मार्जिक नियन्त्रण में सहार्यक।

    समूह के लिए-

    1. सार्मार्जिक सम्बन्धों को स्थिर रखती है।
    2. व्यक्ति के दृश्टिकोण को विस्तृत करती है।
    3. नई आवश्यकतार्ओं को उत्पन्न करती है।

    सभ्यतार् और संस्कृति में अन्तर

    सभ्यतार् और संस्कृति शब्द क प्रयोग एक ही अर्थ में प्रार्य: लोग करते हैं, किन्तु सभ्यतार् और संस्कृति में अन्तर है। सभ्यतार् सार्धन है जबकि संस्कृति सार्ध्य। सभ्यतार् और संस्कृति में कुछ सार्मार्न्य बार्तें भी पार्ई जार्ती हैं। सभ्यतार् और संस्कृति में सम्बन्ध पार्यार् जार्तार् है। मैकाइवर एवं पेज ने सभ्यतार् और संस्कृति में अन्तर कियार् है। इनके द्वार्रार् दिये गये अन्तर इस प्रकार हैं-

    1. सभ्यतार् की मार्प सम्भव है, लेकिन संस्कृति की नहीं- सभ्यतार् को मार्पार् जार् सकतार् है। चूँकि इसक सम्बन्ध भौतिक वस्तुओं की उपयोगितार् से होतार् है। इसलिए उपयोगितार् के आधार्र पर इसे अच्छार्-बुरार्, ऊँचार्-नीचार्, उपयोगी-अनुपयोगी बतार्यार् जार् सकतार् है। संस्कृति के सार्थ ऐसी बार्त नहीं है। संस्कृति की मार्प सम्भव नहीं है। इसे तुलनार्त्मक रूप से अच्छार्-बुरार्, ऊँचार्-नीचार्, उपयोगी-अनुपयोगी नहीं बतार्यार् जार् सकतार् है। हर समूह के लोग अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बतार्ते हैं। हर संस्कृति समार्ज के काल एवं परिस्थितियों की उपज होती है। इसलिए इसके मूल्यार्ंकन क प्रश्न नहीं उठतार्। उदार्हरण स्वरूप हम नई प्रविधियों को देखें। आज जो वर्तमार्न है और वह पुरार्नी चीजों से उत्तम है तथार् आने वार्ले समय में उससे भी उन्नत प्रविधि हमार्रे सार्मने मौजूद होगी। इस प्रकार की तुलनार् हम संस्कृति के सार्थ नहीं कर सकते। दो स्थार्नों और दो युगों की संस्कृति को एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं कहार् जार् सकतार्।
    2. सभ्यतार् सदैव आगे बढ़ती है, लेकिन संस्कृति नहीं- सभ्यतार् में निरन्तर प्रगति होती रहती है। यह कभी भी पीछे की ओर नहीं जार्ती। मैकाइवर ने बतार्यार् कि सभ्यतार् सिर्फ आगे की ओर नहीं बढ़ती बल्कि इसकी प्रगति एक ही दिशार् में होती है। आज हर समय नयी-नयी खोज एवं आविष्कार होते रहते हैं जिसके कारण हमें पुरार्नी चीजों की तुलनार् में उन्नत चीजें उपलब्ध होती रहती हैं। फलस्वरूप सभ्यतार् में प्रगति होती रहती है।
    3. सभ्यतार् बिनार् प्रयार्स के आगे बढ़ती है, संस्कृति नहीं- सभ्यतार् के विकास एवं प्रगति के लिए विशेष प्रयत्न की आवश्यकतार् नहीं होती, यह बहुत ही सरलतार् एवं सजगतार् से आगे बढ़ती जार्ती है। जब किसी भी नई वस्तु क आविष्कार होतार् है तब उस वस्तु क प्रयोग सभी लोग करते हैं। यह जरूरी नहीं है कि हम उसके सम्बन्ध में पूरी जार्नकारी रखें यार् उसके आविष्कार में पूरार् योगदार्न दें। अर्थार्त् इसके बिनार् भी इनक उपभोग कियार् जार् सकतार् है। भौतिक वस्तुओं क उपयोग बिनार् मनोवृत्ति, रूचियों और विचार्रों में परिवर्तन के कियार् जार्तार् है, किन्तु संस्कृति के सार्थ ऐसी बार्त नहीं है। संस्कृति के प्रसार्र के लिए मार्नसिकतार् में भी परिवर्तन की आवश्यकतार् होती है। उदार्हरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करनार् चार्हतार् है, तो उसके लिए उसे मार्नसिक रूप से तैयार्र होनार् पड़तार् है, लेकिन किसी वस्तु के उपयोग के लिए विशेष सोचने की आवश्यकतार् नहीं होती।
    4. सभ्यतार् बिनार् किसी परिवर्तन यार् हार्नि के ग्रहण की जार् सकती है, किन्तु संस्कृति को नहीं-सभ्यतार् के तत्वों यार् वस्तुओं को ज्यों-का-त्यों अपनार्यार् जार् सकतार् है। उसमें किसी तरह की परिवर्तन की आवश्यकतार् नहीं पड़ती। इस एक वस्तु क जब आविष्कार होतार् है, तो उसे विभिन्न स्थार्नों के लोग ग्रहण करते हैं। भौतिक वस्तु में बिनार् किसी परिवर्तन लार्ये ही एक स्थार्न से दूसरे स्थार्न में ले जार्यार् जार् सकतार् है। उदार्हरण के लिए, तब ट्रैक्टर क आविष्कार हुआ तो हर गार्ँव में उसे ले जार्यार् गयार्। इसके लिए उसमें किसी तरह के परिवर्तन की आवश्यकतार् नहीं पड़ी। किन्तु संस्कृति के सार्थ ऐसी बार्त नहीं है। संस्कृति के तत्वों को जब एक स्थार्न से दूसरे स्थार्न में ग्रहण कियार् जार्तार् है तो उसमें थोड़ार् बहुत परिवर्तन हो जार्तार् है। उसके कुछ गुण गौण हो जार्ते हैं, तो कुछ गुण जुड़ जार्ते हैं। यही कारण है कि धर्म परिवर्तन करने के बार्द भी लोग उपने पुरार्ने विश्वार्सों, विचार्रों एवं मनोवृत्तियों में बिल्कुल परिवर्तन नहीं लार् पार्ते। पहले वार्ले धर्म क कुछ-न-कुछ प्रभार्व रह जार्तार् है।
    5. सभ्यतार् बार्ध्य है, जबकि संस्कृति आन्तरिक- सभ्यतार् के अन्तर्गत भौतिक वस्तुऐं आती हैं। भौतिक वस्तुओं क सम्बन्ध बार्ºय जीवन से, बार्हरी सुख-सुविधार्ओं से होतार् है। उदार्हरण के लिए, बिजली-पंखार्, टेलीविजन, मोटरगार्ड़ी, इत्यार्दि। इन सार्री चीजों से लोगों को बार्हरी सुख-सुविधार् प्रार्प्त होती है। किन्तु संस्कृति क सम्बन्ध व्यक्ति के आन्तरिक जीवन से होतार् है। जैसे -ज्ञार्न, विश्वार्स, धर्म, कलार् इत्यार्दि। इन सार्री चीजों से व्यकित को मार्नसिक रूप से सन्तुष्टि प्रार्प्त होती है, इस प्रकार स्पष्ट होतार् है कि सभ्यतार् बार्ºय है, लेकिन संस्कृति आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित होती है।
    6. सभ्यतार् मूर्त होती है, जबकि संस्कृति अमूर्त- सभ्यतार् क सम्बन्ध भौतिक चीजों से होतार् है। भौतिक वस्तुऐं मूर्त होती हैं। इन्हें देखार् व स्पर्श कियार् जार् सकतार् है। इससे प्रार्य: सभी व्यक्ति समार्न रूप से लार्भ उठार् सकते हैं, किन्तु संस्कृति क सम्बन्ध भौतिक वस्तुओं से न होकर अभौतिक चीजों से होतार् है। इन्हें अनुभव कियार् जार् सकतार् है, किन्तु इन्हें देखार् एवं स्पर्श नहीं कियार् जार् सकतार्। इस अर्थ में संस्कृति अमूर्त होती है।
    7. सभ्यतार् सार्धन है जबकि संस्कृति सार्ध्य-सभ्यतार् एक सार्धन है जिसके द्वार्रार् हम अपने लक्ष्यों व उद्देश्यों तक पहुँचते हैं। संस्कृति अपने आप में एक सार्ध्य है। धर्म, कलार्, सार्हित्य, नैतिकतार् इत्यार्दि संस्कृति के तत्व हैं। इन्हें प्रार्प्त करने के लिए भौतिक वस्तुऐं जैसे-धामिक पुस्तकें, चित्रकलार्, संगीत, नृत्य-बार्द्य इत्यार्दि की आवश्यकतार् पड़ती है। इस प्रकार सभ्यतार् सार्धन है और संस्कृति सार्ध्य।

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