संवेग क अर्थ, परिभार्षार् एवं विशेषतार्एँ

जीवन में संवेग की महत्वपूर्ण भूमिक होती है तथार् व्यक्ति के वैयक्तिक एवं सार्मार्जिक विकास में संवेगों क योगदार्न होतार् है। लगार्तार्र संवेगार्त्मक असन्तुलन/अस्थिरतार् व्यक्ति के वृद्धि एवं विकास को प्रभार्वित करती है तथार् अनेक प्रकार की शार्रीरिक, मार्नसिक और समार्जिक समस्यार्ओं को उत्पन्न करती है। दूसरी ओर संवेगार्त्मक रूप से स्थिर व्यक्ति खुशहार्ल, स्वस्थ एवं शार्न्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करतार् है। अत: संवेग व्यक्ति के व्यक्तित्व के सभी पक्षों को प्रभार्वित करते है। अंग्रेजी क ‘Emotion’ शब्द लेटिन भार्षार् के शब्द ‘Emovere’ से लियार् गयार् है। ‘Emovere’ क अर्थ होतार् है- Stir up, to agitate यार् to excite अर्थार्त – उत्तेजित होनार्।

संवेग की परिभार्षार्

इगंलिश तथार् इगंलिश (1958) के अनुसार्र- “संवेग एक जटिल भार्व की अवस्थार् होती है जिसमें कुछ खार्स-खार्स शार्रीरिक व ग्रन्थीएँ क्रियार्एँ होती हैं।” बेरार्न, बर्न तथार् कैण्टोविल (1980) के अनुसार्र- “ संवगे से तार्त्पर्य एक एसी आत्मनिष्ठ भार्व की अवस्थार् से होतार् है जिसमें कुछ शार्रीरिक उत्तेजनार् पैदार् होती है और फिर जिसमें कुछ खार्स-खार्स व्यवहार्र होते है।” परिभार्षार्ओं के आधार्र पर निष्कर्ष निकालार् जार् सकतार् है कि संवेग-

  1. जटिल मार्नसिक अवस्थार् है जिसमें शार्रीरिक व मार्नसिक पक्षों क समार्वेश होतार् है।
  2. किसी व्यक्ति, वस्तु एवं स्थिति के सम्बन्ध में सुख-दुख की अनुभूति कम यार् अधिक मार्त्रार् में होती है।
  3. संवेग की अवस्थार् में आंगिक प्रक्रियार्ओं जैसे नार्ड़ी, श्वसन, ग्रन्थिस्त्रार्वों क एक विसरित उद्दीपन होतार् है।
  4. व्यक्ति की चिन्तन एवं तर्क शक्ति क्षीण हो जार्ती है।
  5. व्यक्ति आवेगी बल क अनुभव करतार् है।

संवेगो के विकास के सन्दर्भ में दो मत है-

  1. संवेग जन्मजार्त होते है इस मत को मार्नने वार्लो में वके विन तथार् हार्ंलिगवर्थ आदि है। हार्ंलिगवर्थ क मार्ननार् है कि प्रार्थमिक संवेग जन्मजार्त होते है। वार्टसन ने बार्तार्यार् कि जन्म के समय बच्चे में तीन प्रार्थमिक संवेग भय, क्रोध व प्रेम होते है।
  2. संवेग अर्जित किए जार्ते है – कुछ मनोवैज्ञनिको क मत है कि संवेग विकास एवं वृद्धि की प्रक्रियार् के दौरार्न प्रार्प्त किए जार्ते है। इस सम्बन्ध में हुए प्रयोग स्पष्ट करते है कि जन्म के समय संवेग निश्चित रूप से विद्यमार्न नही होते है। बार्द में धीरे-धीरे बच्चार् ऐसी निश्चित प्रतिक्रियार्एँ करतार् है जिससे ज्ञार्त होतार् है कि उसे सुखद व दुखद अनुभूति हो रही है।

संवेग की विशेषतार्एँ

  1. संवेगार्त्मक अनुभव किसी मूल प्रवृति यार् जैविकीय उत्तेजनार् से जुड़े होते है।
  2. सार्मार्न्यत: संवेग प्रत्यक्षीकरण क उत्पार्द होते हैं।
  3. प्रत्येक संवेगार्त्मक अनुभव के दौरार्न प्रार्णी में अनेक शार्रीरिक परिवर्तन होते है।
  4. संवेग किसी स्थूल वस्तु यार् परिस्थिति के प्रति अभिव्यक्त किए जार्ते है।
  5. प्रत्येक जीवित प्रार्णी में संवेग होते है।
  6. विकास के सभी स्तरों में संवेग होते है और बच्चे व बूड़ो में उत्पन्न किए जार् सकते है
  7. एक ही संवेग को अनेक प्रकार के उतेजनार्ओं (वस्तुओं यार् परिस्थितियों) से उत्पन्न कियार् जार् सकतार् है
  8. संवेग शीघ्रतार् से उत्पन्न होते है और धीरे-धीरे समार्प्त होते है।

बच्चो के संवेग की विशेषतार्एँ

  1. बच्चों के संवेग थोडे़ समय के लिए होते है बच्चे अपने संवेगो की अभिव्यक्ति बार्हरी व्यवहार्र द्वार्रार् तुरन्त कर देते है जब कि बड़े होने पर बार्हरी व्यवहार्र पर सार्मार्जिक नियन्त्रण होतार् है।
  2. बच्चों के संवेग तीव्र होते है। बच्चे डर, क्रोध व खुशी आदि की अभिव्यक्ति अत्यधिक तीव्रतार् से करते है।
  3. बच्चों के संवेग अस्थिर होते है। बच्चों के संवेगो में शीघ्रतार् से बदलार्व होतार् है उदार्हरणाथ अभी लड़ार्ई और थोड़ी ही देर में तुरन्त दोस्ती कर लेते है।
  4. बच्चों के संवेग बार्र-बार्र दिखार्यी देते है क्योकि वे अपने संवेगों को छिपार्ने में असमर्थ होते है। बच्चे दिन में अनेक बार्र गुस्सार् करते है यार् खुश होते है।
  5. बच्चों की संवेगार्त्मक प्रतिक्रियार् में भिन्नतार् पार्यी जार्ती है एक ही संवेग की अवस्थार् में प्रत्येक बच्चार् अलग-अलग प्रतिक्रियार् देतार् है-

उदार्हरणाथ :- अजनबी के सार्मने एक बच्चार् भार्ग जार्एगार् व दूसरार् रोने लगेगार्।

बच्चों में पार्ये जार्ने वार्ले संवेगार्त्मक ढंग

डर –प्रथम वर्ष के अन्त के पहले ही डर से सम्बन्धित उत्तेजनार्एॅ बच्चे पर प्रभार्व डार्लने लगती है। समय के सार्थ-सार्थ उन वस्तुओं की संख्यार् बढती जार्ती है जो बच्चे को डरार्ती है। मार्नसिक विकास के सार्थ-सार्थ वह इस योग्य होतार् है कि उन वस्तुओं और व्यक्तियों को पहचार्न सके जो उसे डरार्ती हैं। डर चार्हे ताकिक हो यार् अताकिक इसकी जड़ बच्चों के अनुभवों में होती है। छोटार् बच्चार् सार्मार्न्यत: जोर की आवार्ज, अजनबी – लोग, -जगह, -वस्तुएँ, अंधेरी जगह व अकेले रहने से डरते है। यह डर अवस्थार् के सार्थ-सार्थ कम हो जार्तार् है। डर के प्रति बच्चे की प्रतिक्रियार् इस बार्त पर निर्भर करती है कि उसकी शार्रीरिक व मार्नसिक दशार् क्यार् है। यदि बच्चार् थक हुआ है तो ऐसी स्थितियार् डर को और बढ़ार्ती है। Boston ने अपने अध्ययनों में पार्यार् कि बुद्धिमार्न बच्चे डर अधिक प्रदर्शित करते है क्योंकि वे खतरे की सम्भार्वनार्ओं को समझते है। डर तब उपयोगी होतार् है जब यह खतरे से सार्वधार्न करतार् है।

क्रोध – यह संवेगार्त्मक प्रतिक्रियार् बच्चे ज्यार्दार् करते है क्योंकि वार्तार्वरण में क्रोध दिलार्ने वार्ले उत्तेजक डर की अपेक्षार् अधिक होते है। अधिकतर बच्चे शीघ्र ही यह समझ जार्ते है कि क्रोध ध्यार्न आकृष्ड करने क अच्छार् तरीक है। इससे उनकी इच्छार् की पूर्ति होती है। छोटे बच्चे को आरार्म न मिलने पर क्रोध आतार् है। जैसे-जैसे बच्चार् बड़ार् होतार् है तो वह स्वयं काम करनार् चार्हतार् है और कार्य न कर पार्ने पर गुस्सार् दिखार्तार् है। विद्यार्लय जार्ने से पूर्व की आयु के बच्चे उन पर गुस्सार् करते है जो उनके खेल की चीजो को छूते है व उनके खेलने में बार्धार् उत्पन्न करते है। उत्तर बार्ल्यार्वस्थार् में बच्चे की मजार्क उड़ार्ने, उनकी गलती निकालने व दूसरे बच्चो से तुलनार् करने पर उनके गुस्सार् आतार् है। क्रोध को अभिव्यक्त करने क ढ़ंग वार्तार्वरण से सीखार् जार्तार् है।

ईर्ष्यार् – ईर्ष्यार् बच्चे तब दिखार्ते है जब प्यार्र की कभी के लिए वार्स्तव में कोई स्थिति जिम्मेदार्र होती है यार् बच्चार् प्यार्र की कमी महसूस करतार् है। ईर्ष्यार् इस बार्त पर निर्भर करती है कि दूसरे उससे कैसार् व्यवहार्र करते है व बच्चे को कैसार् प्रशिक्षण मिलार् है। कभी-कभी मार्तार्-पितार् दूसरो की प्रशंसार् अत्यार्धिक करते है उस प्रकार वे अपने बच्चों में प्रतिद्वन्दितार् व स्पर्धार् उत्पन्न करते है। ईष्र्यार् की स्थिति में बच्चे विभिन्न प्रतिक्रियार् देते है।

  1. गुस्सार् करनार्:- यह दो पक्रार्र से पक्रट कियार् जार्तार् है –
    1. प्रत्यक्ष रूप से जिससे ईष्र्यार् होती है उसके रार्स्ते में मिल जार्ने पर उस पर प्रहार्र करनार्
    2. अप्रत्यक्ष रूप से जिससे ईर्ष्यार् होती है उसकी अनुपस्थिति में उसके बस्ते से उसकी कापी यार् कितार्ब चुरार्नार् लेनार्।
  2. आत्मीकरण करनार्:- जिससे ईर्ष्यार् होती है उससे बच्चार् आत्मीकरण कर लेते है।
  3. अधिक प्यार्र मिलने वार्ले से स्वयं को अलग करनार्
  4. दमन:- बच्चार् अपनी भार्वनार्ओं को यह कहते हएु दबार् देतार् है कि मैं परवार्ह नही करतार्
  5. मागार्न्तीकरण- यदि बच्चार् पढने में तजे बच्चे से ईष्र्यार् करतार् है तो वह खेल में स्वयं को आगे कर लेतार् है।

हर्ष, सन्तोष एवं सुख-

ये तीनो सुखद संवेग है। इनमें मार्त्रार् क अन्तर है। ये निश्चयार्त्मक संवेग है। क्योकि व्यक्ति उस परिस्थिति को स्वीकार करतार् है जो इस संवेग को उत्पन्न करती है। छोटे बच्चों में ये संवेग शार्रीरिक कष्ट न होने पर देखार् जार्तार् है। बडे बच्चों को सन्तोष व हर्ष तब होतार् है जब उन्हे सफलतार् मिलती है, दूसरें से प्रशंसार् मिलती है व दूसरो से उच्चतार् यार् श्रेष्ठतार् क अनुभव होतार् है।

स्नेह – स्नेह बच्चे किसी व्यक्ति यार् वस्तु के प्रति दिखार्ते है। छोटे बच्चे उनके प्रति स्नेह दिखार्ते है जो उनकी आवश्यमतार्ओं की परवार्ह करते है, उनसे खेलते है, सार्मार्न्यत: जो उन्हे हर्ष एवं सन्तोष प्रदार्न करते है। परिवार्र के सदस्यों एवं ऐसे लोग जिनसे खून क सम्बन्ध नही है, बच्चार् स्नेह दिखार्एगार् यार् नही यह इस बार्त पर निर्भर करतार् है कि बच्चे के प्रति इन लोगो क व्यवहार्र कैसार् है।

उत्सुकतार् यार् कौतुहल – छ: से सार्त महीने के बार्द बच्चे नई चीजों को पकड़नार् चार्हते है। पकड़ने के बार्द सब तरफ से देखकर, छूकर, पटककर, हिलार्डुलार् कर, मुहँ में डार्लकर विभिन्न ऐन्द्रिय ज्ञार्न प्रार्प्त करते है। जैसे ही बच्चे बोलनार् सीखते है वे अपने कौतुहल को प्रश्न पूछकर कौतुहल को शार्न्त करते है आठ से नौ वर्ष के बच्चे इसी इच्छार् के कारण अपनार् अधिक समय पढ़ने में लगार्ते है।

किशोर में पार्ये जार्ने वार्ले संवेगार्त्मक व्यवहार्र

डर- किशोर सार्मार्जिक परिस्थितियों, अपरिचित व्यक्तियों एवं नर्इ स्थिति में जार्ने से डरते है। डर की अभिव्यक्ति में लिंग भेद पार्यार् जार्तार् है । क्योकि लड़के व लड़कियों के मूल्यों में अन्तर होतार् है। लड़कियार् व्यक्तिगत सुरक्षार् को विशेष महत्व देती है इसलिए अपरिचित के सार्मने डरती है जबकि लड़कों में ऐसार् नही पार्यार् जार्तार्। डर पर सार्मार्जिक – आर्थिक स्तर क भी प्रभार्व पड़तार् है।

चिन्तार्- चिन्तार् डर से उत्पन्न होती है। ये काल्पनिक कारणों से होती है। इसमें वार्स्तविकतार् क अंश भी होतार् है लेकिन ये अनार्वश्यक रूप से बड़ी छुपी अवस्थार् है अर्थार्त् परेशार्नी अभी है नही, लेकिन आ सकती है इस बार्त की चिन्तार् होती हैं। चिन्तार् किसी वस्तु, व्यक्ति एवं स्थिति से सम्बन्धित हो सकती है। जैसे परीक्षार् में अच्छे नम्बर आयेगें यार् नही, नौकरी मिलेगी यार् नही यार् फिर दूसरों के सार्मने बोलने से डरते है। लड़के व लडकियों के मूल्यों में अन्तर अलग-अलग होते है। जैसे लड़के नौकरी व व्यवसार्य को लेकर चिन्तित होते है जबकि लड़कियार्ं बार्हय आकृति एवं सार्मार्जिक मार्न्यतार् को लेकर अधिक चिन्तित रहती है।

दुश्चिन्तार्- दुश्चिन्तार् आन्तरिक द्वन्द्व के कारण उत्पन्न होती है। यह लगार्तार्र रहने वार्ली कष्टकारी मार्नसिक दशार् है। व्यक्ति बेचैनी क अनुभव करतार् है। उसे यह स्पष्ट नही होतार् है कि वह क्यार् करे और क्यार् न करें। जब अनेक चिन्तार्एं एकत्रित होती है तो वह दुश्चिन्तार् क रूप धार्रण कर लेती है। उदार्हरण के लिए यदि किशोर ऐसे सार्ंस्कृतिक समूह में रहतार् है जहार्ं वार्हृ आकृति, प्रसिद्धि, अध् ययन व सम्प्रार्प्ति को महत्व दियार् जार्तार् है और किशोर स्वयं को इन सार्ंस्कृतिक आशार्ओं के अनुरूप नही पार्तार् तो दुश्चिन्तार् हो जार्ती है।

क्रोध- किशोरो को पक्षपार्तपूर्ण व्यवहार्र से गुस्सार् आतार् है। यह पक्षपार्तपूर्ण व्यवहार्र घर पर भी हो सकतार् है। यदि कोर्इ उन पर रोब जमार्तार् है तो गुस्सार् आतार् हैं। भाइ बहनों द्वार्रार् एक दूसरे क सार्मार्न प्रयोग करने पर, व्यग्ंयार्त्मक बार्तों क प्रयोग करने पर, आदतों मे बार्धार् होने पर, योजनार् को सफलतार्पूर्वक सम्पन्न न करने पर क्रोध आतार् है। क्रोध की अभिव्यक्ति में किशोर चीजों को तोड़ते, फेंकते है, तेज बोलते है। कभी कभी बोलनार् बन्द कर देते है।

ईर्ष्यार्- इसमें दो संवेग शार्मिल होते है। सार्मार्जिक स्तर खोने क डर और क्रोध। किशोरार्वस्थार् में ईर्ष्यार् भाइ बहनों के प्रति कम और संगी सार्थियों के प्रति ज्यार्दार् होती है। जितनार् अधिक किशोर सार्मार्जिक स्थितियों में असुरक्षार् क अनुभव करेगार् उतनार् अधिक उन लोगों से ईर्ष्यार् करेगार् जिनकों सार्मार्जिक मार्न्यतार् प्रार्प्त है। असन्तुष्ट बच्चार् ईर्ष्यार् क शिकार होतार् है। इस संवेग की अनुभूति पर मौखिक अभिव्यक्ति होती है। जैसे मजार्क उड़ार्नार् यार् व्यंग्य करनार्।

जलन की भार्वनार् – जलन की भार्वनार् व्यक्ति की चीजों के प्रति होती है जैसे कोर्इ अमीर घर क लड़क कार में आतार् है, अच्छे कपड़े पहनतार् है, अच्छे खिलौने रखतार् है। तो गरीब घर के लड़के को उसकी इन सुविधार्ओं से जलन होती है।

नार्रार्ज होनार्- यह गुस्से से कम तीव्र संवेग है। किशोर गुस्से की तुलनार् में नार्रार्ज अक्तिार्क होते है। किशोर उन चीजों के बार्रे में बार्त करके सुख क अनुभव करते है। जो उसे नार्रार्ज करती है। किशोर दूसरें लोगों के भार्षण, व्यवहार्र करने के तरीके से अधिक नार्रार्ज होते है। किशोर जब आशार् के अनुरूप कार्य नही कर पार्तार्, उसक समार्योजन अच्छार् नही होतार् वे नार्रार्ज होते है।

जिज्ञार्सार्/उत्सुकुकतार्- किशोर लिंग, वैज्ञार्निक चीजों, संसार्र की घटनार्ओं, धर्म व नैतिकतार् में उत्सुकतार् दिखार्ते है और इन विषयों पर वे प्रश्न भी करते है। वे कितार्बें, पत्र पत्रिकाएं पढ़कर अपनी जिज्ञार्सार् को शार्न्त करते है।

स्नेह- यह व्यक्ति, वस्तु यार् जार्नवर के प्रति कोमल लगार्व है। यह सुखद अनुभवों पर आधार्रित होतार् है। किशोरार्वस्थार् व बार्ल्यार्वस्थार् के इस संवेग में अन्तर होतार् है। किशोर स्नेह निर्जीव व जार्नवरों की तुलनार् में व्यक्तियों के प्रति अधिक करते है। किशोर के लिए स्नेह में भी तीव्रतार् होती है। लेकिन किशोर बच्चों की तरह केवल घर के लोगों से भी स्नेह नही करते वरन संग-सार्थी व बार्हर के लोगों से भी करते है।

दु:ख- इस संवेग की अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति ऐसी चीज खो देतार् है जिसको वो बहुत महत्व देतार् है। तथार् उससे उसे संवेगार्त्मक लगार्व होतार् है। किशोर को इस संवेग क अनुभव बार्र-बार्र होतार् है क्योकि किशोर में अब सोचने समझने की शक्ति बढ़ जार्ती है। किशोर बच्चों की तरह रोते नही है वरन् अपने चार्रों तरफ के लोगों व चीजों में रूचि नही लेते है। एकान्त में रहते है। भूख कम लगती हैं व नींद कम आती है। इसक किशोर के स्वार्स्थ्य पर बुरार् प्रभार्व पड़तार् है।

खुशी- किशोर खुशी क अनुभव तब करतार् है जब उसक समार्योजन अच्छार् होतार् है। प्रशिक्षण व योग्यतार् से किशोर इस योग्य होतार् है कि वह परिस्थिति के सार्थ ठीक से समार्योजन कर सके। अच्छार् समार्योजन व्यक्ति को आत्म सन्तोष देतार् है। यदि किशोर समार्ज द्वार्रार् मार्न्यतार् प्रार्प्त कार्यो को सफलतार्पूर्वक करतार् है तो उसमें उच्चतार् की भार्वनार् आती है उससे भी उसे सन्तोष मिलतार् है। अन्तत: वह खुशी क अनुभव करतार् है।

संवेगार्त्मक विकास को प्रभार्वित करने वार्ले कारक

  1. परिपक्वतार् – व्यक्ति के विकास पर संवेगार्त्मक विकास निर्भर करतार् है विशेष रूप से स्नार्यु तन्त्र के विकास पर। यदि Frontal Lobe को हटार् दियार् जार्ए तो संवेगों में स्थिरतार् नही रहती है।
  2. स्वार्स्थ्य और शार्रीरिक विकास – बच्चे के स्वार्स्थ्य, शार्रीरिक विकास एवं संवेगार्त्मक विकास में धनार्त्मक सहसम्बन्ध होतार् है। स्वार्स्थ्य में गिरार्वट से संवेगार्त्मक विकास पर बुरार् प्रभार्व पड़तार् है।
  3. बुद्धि – Hurlock ने अध्ययनों में पार्यार् कि सार्मार्न्य व कम बुद्धि के लोगों में अपने संवेगों पर नियन्त्रण कम होतार् है। चूंकि बुद्धिमार्न व्यक्ति के पार्स चिन्तन व तर्क की योग्यतार् होती है इसलिए संवेगों पर नियन्त्रण कर लेते है।
  4. सीखनार् – व्यक्ति समार्ज व संस्कृति द्वार्रार् मार्न्य ढंग से संवेगों को व्यक्त करनार् सीखतार् है। उदार्हरण के लिए नीग्रों के डर को व्यक्त करने क तरीक भार्रतीयों से भिन्न प्रकार क होतार् है। बच्चे संवेगार्त्मक व्यवहार्र को दो प्रकार से सीखते है –
    1. अनुबन्धन द्वार्रार् – Watson us Albert नार्मक बच्चे पर प्रयोग कियार्। यह बच्चार् खरगोश से बहुत प्यार्र करतार् थार् और उसके सार्थ खेलतार् थार्। Watson ने इस बच्चे को खरगोश से डरनार् सिखार्यार्। अत: जब कभी बच्चार् खरगोश के सार्थ खेलतार् थार् तो वे जोर की आवार्ज (जो डरार्वनी थी) करते थे। इससे बच्चार् डरने लगार्। ध ार्ीरे-धीरे बच्चार् खरगोश से डरने लगार्। बार्द में वह सफेद फर वार्ली सभी चीजों से डरनार् सीख गयार्
    2. अनुकरण – यदि मार्तार्-पितार् चिन्तित रहते है तो बच्चे चिन्तित रहनार् सीख जार्ते है। इसी प्रकार मार्तार्-पितार् शार्न्त तो बच्चे भी शार्न्त होते है। Turner ने पार्यार् कि शिक्षकों के संवेगार्त्मक व्यवहार्र क प्रभार्व छार्त्रों पर पड़तार् है।
  5. विद्यार्लयी वार्तार्वरण – शिक्षकों क अपने व्यवसार्य एवं छार्त्रों के प्रति मनोवृत्ति, विद्यार्लय अनुशार्सन, विद्यार्लय में अकादमिक सुविधार्ए, भौतिक सुविधार्ए, शिक्षण विधि, पार्ठ्य सहगार्मी क्रियार्एं आदि क बच्चे के संवेगार्त्मक विकास पर प्रभार्व पड़तार् है। उदार्हरण के लिए यदि विद्यार्लय में अत्यन्त कठोर अनुशार्सन होतार् है यार् अनुशार्सन विहीन विद्यार्लय दोनों क बच्चे के संवेगार्त्मक विकास पर बुरार् प्रभार्व पड़तार् है।
  6. संगी-सार्थी – संवेगार्त्मक व्यवहार्र अनुकरण द्वार्रार् सीखे जार्ते है। सार्थ ही कहार्वत है- संगत क असर पड़तार् है। अत: बच्चों के संवेगार्त्मक विकास पर मित्रों, संगी सार्थियों व सह पार्ठियों के व्यवहार्र क प्रभार्व पड़तार् है।
  7. परिवार्रिक वार्तार्वरण – मार्तार्-पितार् व बच्चे के मध्य सम्बन्ध, बच्चे क जन्म क्रम, लड़क व लड़की, परिवार्र क आकार, परिवार्र क सार्मार्जिक आर्थिक स्तर, अनुशार्सन, मार्तार्-पितार् क बच्चे के प्रति मनोवृत्ति, आदि बच्चे के संवेगार्त्मक विकास को प्रभार्वित करते है।

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