संप्रत्यार्त्मक विकास क्यार् है ?
सभी प्रकार के सीखने क आधार्र प्रत्यय है। शैशवार्वस्थार् से वृद्धार्वस्थार् तक मनुष्य अनेक नए प्रत्ययों क निर्मार्ण करतार् है तथार् प्रतिदिन के जीवन में पुरार्ने निर्मित प्रत्ययों क प्रयोग करतार् है। व्यक्ति स्वयं आयु, अनुभव व बुद्धि के आधार्र पर प्रत्यय निर्मार्ण के अलग-अलग स्तर पर होते है। उदार्हरणाथ – एक चार्र सार्ल के बच्चे क पौधे क प्रत्यय जीवविज्ञार्न के शिक्षक के पौधे के प्रत्यय से भिन्न होगार्। प्रत्यय चिन्तन प्रक्रियार् में सहार्यक होते है। यह चिन्तन शक्ति बच्चे में अचार्नक उत्पन्न नही होती है, इसक विकास क्रमिक व नियमित होतार् है। जन्म के समय बच्चे को अपने वार्तार्वरण क ज्ञार्न नही होतार् है। धीरे-धीरे परिपक्वतार् व सीखने के परिणार्मस्वरूप बच्चार् जो देखतार् है उसे समझनार् आरम्भ करतार् है। इस प्रकार उसक वार्तार्वरण उसके लिए अर्थपूर्ण हो जार्तार् है। अलग-अलग ज्ञार्नेन्दियों से प्रार्प्त अनुभव को एक में बार्धने से प्रत्यय बनते है।
डी सीको के अनुसार्र – उत्तेजनार्ओं क वर्ग जिसमें समार्न विशेषतार्एँ हो प्रत्यय कहलार्ते है।
उदार्हरणाथ- वर्गएक विशेष वस्तु को बतार्तार् है जो घेरार् तथार् त्रिभुज से भिन्न है।

प्रत्यय निर्मार्ण की प्रक्रियार्

बच्चे क ज्ञार्न ऐन्द्रिय ज्ञार्न से आरम्भ होतार् है अर्थार्त वह वार्तार्रवरण क अनुभव इन्द्रियों द्वार्रार् ग्रहण करतार् है। इसी को संवेदनार् कहते है। संवेदनार् व्यक्ति के दिमार्ग की चेतन प्रतिक्रियार् है। प्रत्ययों क निर्मार्ण संवेदनार् से प्रार्रम्भ होतार् है। जैसे-जैसे बच्चार् बड़ार् होतार् है उसक ऐन्द्रिय ज्ञार्न प्रत्यक्ष ज्ञार्न में परिवर्तित हो जार्तार् है। बच्चार् जो कछ देखतार्, सुनतार् व चखतार् है उसक अर्थ समझने लगतार् है। इसी को प्रत्यक्षीकरण कहते है। प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रियार् द्वार्रार् विभिन्न प्रकार की संवेदनार्ओं को अर्थ मिलतार् है। संवेदनार् व प्रत्यक्षीकरण दोनो एक सार्थ घटित होते है। संवेदनार् व प्रत्यक्षीकरण के पश्चार्त प्रत्यय निर्मार्ण होतार् है। सार्मार्न्य प्रत्यय निर्मार्ण की प्रक्रियार् के पॉच चरण होते है-

  1. निरीक्षण – एक जार्ति के सभी पदाथो क भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में निरीक्षण कियार् जार्तार् है। उदार्हरणाथ- बच्चार् एक विशिष्ट परिस्थिति में विशेष कार को देखतार् है और उसक चित्र उसके मस्तिष्क में अंकित हो जार्तार् है। भविष्य में ‘कार’ शब्द सुनकर उसके मस्तिष्क में वही कार की प्रतिमार् आ जार्ती है। यही से प्रत्यय निर्मार्ण क आरम्भ होतार् है।
  2. तुुलनार्- उस पदाथ के विभिन्न गूणों क विश्लेषण करतार् है तथार् विभिन्न पदाथो से उसकी तुलनार् समार्नतार् व असमार्नतार् के आधार्र पर करतार् है। जैसे-बच्चार् विभिन्न कारों को आपस में तुलनार् करतार् है। 
  3. प्रत्यार्हार्र- समार्न गुणों को प्रथक कर लेतार् है। अथात बच्चार् सभी पक्र ार्र की कारों में समार्न गुणों क विश्लेषण व संश्लेषण करके उसमें एकरूपतार् क ज्ञार्न प्रार्प्त करतार् हैं। 
  4. सार्मार्न्यीकरण- समार्न गुणों क संयार्जेन कर लियार् जार्तार् है। 
  5. नार्मकरण – उस पदाथ को एक विशेष नार्म से पुकारार् जार्तार् है। नार्मकरण ऐसे शब्दों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है जो उसके नार्म क बोध करार्ते है। प्रत्यय के विकास के सम्बन्ध में मनोवैज्ञार्निकों के अलग-अलग मत है। कुछ के अनुसार्र प्रत्यय क विकास भार्षार् विकास से पहले ही हो जार्तार् है। कुछ अन्य मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र भार्षार् एवं प्रत्यय क विकास सार्थ-सार्थ होतार् है।

बच्चों के प्रत्ययों की विशेषतार्एँ

बड़ो के प्रत्ययों से बच्चों के प्रत्ययों में अन्तर प्रकार क नही, वरन मार्त्रार् क होतार् है। क्योकि बच्चों को कम अनुभव व ज्ञार्न होतार् है। जैसे-जैसे बच्चे की अवस्थार् बढ़ती है बच्चों के प्रत्ययों में धीरे-धीरे परिवर्तन आतार् है। ये परिवर्तन इस प्रकार होतार् है-

  1. प्रत्यय सरल से जटिल की ओर विकसित होते है। प्रार्रम्भ में बच्चे सार्मार्न्य प्रत्यय रखते है जैसे पहले वे प्रत्येक खार्ने की चीज को एक समार्न समझते है बार्द में रोटी, दार्ल, चार्वल आदि को अलग-अलग समझते है। 
  2. प्रत्यय सार्मार्न्य से विशिष्ट की ओर विकसित होते है। सर्वप्रथम बच्चार् सम्पूर्ण परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रियार् करतार् है उसके अलग-अलग भार्गों को नही। जब बच्चार् वस्तु को सम्पूर्ण रूप में देखतार् है तो उसके बार्रीकियों को इतनी जल्दी नही देख पार्तार् है। Binet ने शब्दों के अर्थ परीक्षण के आधार्र पर बतार्यार् कि बच्चों बडो की प्रतिक्रियार् में अन्तर थार् जैसे- गार्उन क अर्थ बच्चों ने बतार्यार् “यह एक पोशार्क है” जब कि बडे़ बच्चों ने कहार् “यह एक रार्त में पहनने वार्ली पोशार्क है”। 
  3. प्रत्यय संचंयी होते है- कभी-कभी एक प्रत्यय को समझने के लिए दूसरे प्रत्यय क ज्ञार्न आवश्यक होतार् है जैसे- रेखार्गणित में त्रिभुज क ज्ञार्न होने से पहले भुजार् एवं कोण क प्रत्यय स्पष्ट होनार् चार्हिए।

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