संत रविदार्स जी क इतिहार्स

संत रविदार्स क जन्म वर्तमार्न उत्तर प्रदेश के तत्कालीन अवध प्रार्न्त के
प्रसिद्ध ऐतिहार्सिक धर्मस्थली काशी नगरी (बनार्रस) छार्वनी से लगभग 04
किलोमीटर दूर मार्ण्डूर (मंडवार्डीह) नार्मक गार्ँव में श्री हरिनन्द (दार्दार्) जी के
परिवार्र में हुआ थार्। जन्म के समय उनके पितार् श्री रघु जी व मार्तार् श्रीमती
करमार् देवी जी को यह नहीं मार्लूम थार् कि उनके घर में जन्मार् यह पुत्र भार्रतीय
समार्ज की उन सच्चार्ईयों को पहचार्नने वार्लार् वह सार्हसी बार्लक भार्रतीय समार्ज
क समार्ज वैज्ञार्निक बनकर परम्परार्गत अच्छार्ईयों और बुरार्ईयों को लोगों के
समक्ष रखने में महार्नतार् और विद्वतार् क परिचय देगार्।संत रविदार्स क जन्म पऱदार्दार्-श्री कालूरार्म जी, पऱदार्दी श्रीमती लखपती
देवी जी, दार्दार्-श्री हरिनन्द जी, दार्दी-श्रीमती चतर कौर जी के परिवार्र में 25
जनवरी सन् 1376 ई0 में हुआ थार्। चौदहवीं शतार्ब्दी में जन्में संत रविदार्स की
जन्मतिथि के बार्रे में विद्वार्नों में मत भिन्नतार् देखने को मिलती है। उनके जन्म
तिथि के संदर्भ में अनेकों मत विभिन्न ग्रन्थों, सार्हित्यों में इस प्रकार उल्लिखित
हैं-

  1. डॉ धर्मपार्ल मैनी संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1441 तदनुसार्र 27
    जनवरी सन् 1385 ई0 मार्नते हैं।
  2. डॉ0 आर0एल0 हार्ंडार् संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1444, 24
    जनवरी सन् 1388 ई0 मार्नते हैं।
  3.  डॉ0 गंगार्रार्य गर्ग संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1444, 24 जनवरी
    सन् 1388 ई0 मार्नते हैं।
  4. डॉ0 रार्म कुमार्र वर्मार् संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1445, 12
    जनवरी सन् 1389 ई0 मार्नते हैं।
  5. डॉ0 रार्मार्नन्द शार्स्त्री संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1454 से पहले
    मार्नते हैं।
  6. डॉ0 भगवत मिश्र ने संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1455, 12
    जनवरी सन् 1399 ई0 मार्नी है।
  7. डॉ0 विष्णुदत्त रार्केश ने संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1455, 12
    जनवरी सन् 1399 ई0 मार्नी है।
  8. डॉ0 दर्शन सिंह ने संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1471, 25 जनवरी
    सन् 1415 ई0 मार्नार् है।
  9. डॉ0 गोविन्द त्रिगुणार्यक संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1471
    तदनुसार्र 25 जनवरी सन् 1415 ई0 मार्नते हैं।
  10. डॉ0 वी0पी0 शर्मार् ने संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1455 तदनुसार्र
    12 जनवरी सन् 1399 ई0 मार्नार् है।
  11. सं0 रार्म प्रसार्द त्रिपार्ठी ने संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1455, 12
    जनवरी सन् 1399 ई0 मार्नी है।
  12. महन्त सत्य दरबार्री संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1456, 12
    जनवरी सन् 1400 ई0 मार्नते हैं।
  13. ज्ञार्नी बरकत सिंह भी संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1471 तदनुसार्र
    25 जनवरी सन् 1415 ई0 मार्नते हैं।
  14. महार्त्मार् रार्मचरण कुरील ने संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1471, 25
    जनवरी सन् 1415 ई0 मार्नी है।आचाय पृथ्वी सिंह आजार्द संत रविदार्स की जन्मतिथि वि0सं0 1433, सन्
    1376 ई0 मार्नते हैं।

इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अधिकांश विद्वार्न संत
रविदार्स क जन्म 14वीं शतार्ब्दी के उत्तराद्ध में होनार् मार्नते हैं। इसलिए संत
रविदार्स क जन्म 14वीं शतार्ब्दी में ही हुआ। सिर्फ दिन और वर्ष में मतभेद है।
इसके लिए हम डॉ0 पृथ्वी सिंह आजार्द द्वार्रार् स्वीकृत सन् 1376 ई0 ही मार्ननार्
चार्हेंगे क्योंकि डॉ0 शक्ति सिंह ने भार्षार्-विभार्ग, पटियार्लार् के संगणक विभार्ग में
गणनार् के आधार्र पर वि0सं0 1433, 25 जनवरी सन् 1376 ई0 को रविवार्र पड़तार्
है। अर्थार्त् वि0सं0 1433 मार्घ पूर्णिमार्, फार्ल्गुन प्रविष्टे 1 दिन रविवार्र थार्। इसी
दिन अर्थार्त् 25 जनवरी सन् 1376 ई0 को संत रविदार्स इस संसार्र में अवतरित
हुए।

संत रविदार्स के पितार्श्री रघुजी चमड़े के जूते बनार्ने क कार्य करते थे।
शैक्षिक दृष्टि से संत रविदार्स की पार्रिवार्रिक पृष्ठभूमि अच्छी नहीं थी। भार्रत में
संत रविदार्स के समकालीन परिवेश में शिक्षार् जैसी सुविधार्यें मुहैयार् नहीं थी।
सार्मार्न्यत: योग्यतार् और ज्ञार्न क आकलन डिग्री अथवार् स्कूल, कालेजों की
व्यवस्थार् पर आधार्रित न होकर व्यक्ति के वैयक्तिक ज्ञार्न और समझ पर निर्भर
थार्। प्रौद्योगिकीय विकास क प्रार्दुर्भार्व नहीं हो पार्यार् थार् परन्तु सार्मार्जिक व्यवस्थार्
की दृष्टि से सार्मार्जिक प्रतिबन्ध और निषेध की जड़ें अत्यन्त ही गहरी और
कठोर थी। सम्पूर्ण सार्मार्जिक व्यवस्थार् वर्ण व्यवस्थार् में विद्यमार्न नियमों और
प्रतिबन्धों पर ही निर्भर थी। संत रविदार्स के पितार् शूद्र वर्ण के थे। शूद्र वर्ण का
समार्ज में निम्न और अन्तिम स्थार्न थार्।

अनेको ऐतिहार्सिक ग्रन्थों और सार्हित्यों
में उल्लिखित है कि श्ूार्द्रों को समार्ज से अलग (दूर) रखार् जार्तार् थार्। छुआछूत के
नियम अत्यन्त ही कठोर थे। संत रविदार्स के पितार् इन सार्मार्जिक प्रतिबन्धों से
अछूते नहीं थे। ऐसी व्यवस्थार् से संत रविदार्स बिल्कुल सहमत नहीं थे परन्तु
सार्मार्जिक व्यवस्थार् में विद्यमार्न कठोर नियमों और प्रतिबन्धों पर काशी नगरी के
महार्रार्जार् क कोई हस्तक्षेप नहीं थार्। यह कहनार् अतिषयोक्ति नहीं होगार् कि
तत्कालीन शार्सन व्यवस्थार् से जुड़े शार्सक भी ऐसी ही व्यवस्थार् के हिमार्यती और
प्रतिपार्लक थे। ऐसी परिस्थिति में संत रविदार्स द्वार्रार् विद्रोह भी कियार् जार्नार्
सम्भव नहीं थार्। यही कारण है कि संत रविदार्स ने समार्ज में विद्यमार्न सार्मार्जिक
व्यवस्थार् के निषेधों में घुटन महसूस कियार् और वह सार्धु-संतों की जमार्त में
सम्मिलित हो गए जहार्ँ छुआछूत भेदभार्व के प्रतिबन्ध कम और कठोर नहीं थे।

संत रविदार्स जी की आर्थिक स्थिति

संत रविदार्स समार्ज वैज्ञार्निक के रूप में वह ऐतिहार्सिक पुरोधार् है,
जिनके समकालीन परिवेश में प्रौद्योगिकीय विकास नगण्य थार्। व्यवसार्य के रूप
में कृषि प्रमुख व्यवसार्य थार्। जजमार्नी व्यवस्थार् सुदृढ़ रूप में विद्यमार्न थी।
व्यवसार्य क निर्धार्रण योग्यतार् के आधार्र पर नहीं जार्ति के आधार्र पर होतार् थार्।
सार्मार्जिक पद और प्रतिष्ठार् भी जार्ति के आधार्र पर निर्धार्रित होती थी।
सार्मार्जिक प्रतिबन्धों और निषेधों के कारण व्यवसार्य परिवर्तन कियार् जार्नार् सम्भव
नहीं थार्। आर्थिक स्थिति क निर्धार्रण पूर्णत: व्यवसार्यिक स्थिति पर निर्भर थार्।
सार्मार्जिक व्यवस्थार् इस प्रकार थी कि सम्पूर्ण समार्ज सार्मार्जिक निषेधों के
नियंत्रण में जकड़ार् हुआ थार्। जिसके कारण निम्न पद वार्ले व्यक्ति की आर्थिक
स्थिति भी निम्न ही होती थी। संत रविदार्स की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं
थी परन्तु उनक स्वार्भिमार्न, ईमार्नदार्री और मेहनत के सार्थ-सार्थ ही आत्मबल
इतनार् दृढ़ थार् कि वह भूखे रहकर भी यथार् सम्भव दूसरों की मदद करते थे।
कुछ सार्हित्यों में उल्लेख है कि संत रविदार्स ने किसी एक नंगे पैर व्यक्ति को
पितार् द्वार्रार् मेहनत से बनार्ये हुए जूते दार्न कर दियार्। जिसके कारण वह घर से
निकाल दिये गये। फिर भी उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर अपने परिवार्र का
भरण-पोषण कियार् तथार् समार्ज में विद्यमार्न असमार्नतार्ओं के प्रति मुखर होते
गए। संत रविदार्स तत्कालीन परिवेश की सार्मार्जिक विषमतार्ओं और
असमार्नतार्ओं के प्रति अधिक चिन्तित थे। आर्थिक सम्पन्नतार् और विपन्नतार् का
उन पर कोई प्रभार्व नहीं पड़ार्।

संत रविदार्स को जन्म से ही आर्थिक परेषार्नियों क सार्मनार् करनार् पड़ार्।
उनक जन्म एक ऐसे परिवार्र में हुआ जो आर्थिक दृष्टि से निर्बल और दलित
थार्। परिवार्र क पार्लन-पोषण भी बड़ी मुश्किल से चल पार्तार् थार्। सम्पूर्ण भार्रत
छोटी-छोटी रियार्सतों में बंटकर रार्जनीतिक दृष्टि से महत्वहीन हो गयार् थार्। इस
रार्जनीतिक व्यवस्थार् क प्रभार्व भार्रत की अर्थव्यवस्थार् पर भी पड़ार्। संत रविदार्स
समार्ज के उस हिस्से से सम्बन्ध रखते थे जो शतार्ब्दियों से शोषण क शिकार
होकर छटपटार् रहार् थार्। इस प्रकार परिवार्र भी पूरी तरह से आर्थिक यार्तनार् का
शिकार थार्। इस प्रकार मुगल शार्सनकाल में भार्रत की अर्थव्यवस्थार् सुदृढ़ नहीं
थी। वह विभिन्न रियार्सतों में बंटकर सिमट चुकी थी और उस पर भी आपस में
लड़ार्ई झगड़े के कारण भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् समार्प्ति के कगार्र पर थी। ऐसे
समय में अछूत कही जार्ने वार्ली जार्ति शूद्र को उनके जार्ति के आधार्र पर
जार्तीय व्यवसार्य अपनार्नार् पड़तार् थार्। इस प्रकार संत रविदार्स की आर्थिक दशार्
के विषय में वैसे ही अनुमार्न लगार्यार् जार् सकतार् है कि उनकी आर्थिक दशार् कैसी
रही होगी।

संत रविदार्स जी क रार्जनीतिक परिदृश्य

सैद्धार्न्तिक दृष्टि से शार्सन व्यवस्थार् और समार्ज व्यवस्थार् के मध्य प्रभार्वित
करने वार्ले सह-सम्बन्धों के दो प्रमुख आधार्र हैं –


1. महार्त्मार् गार्ँधी के अनुसार्र-
कोई भी समार्ज यदि सार्मार्जिक आधार्र पर
सुदृढ़ और सम्पन्न हो तो रार्जनीतिक व्यवस्थार् स्वत: सुदृढ़ हो जार्येगी।
सार्मार्न्यत: यह धार्रणार् लोकतार्ंत्रिक व्यवस्थार् में उपयुक्त और प्रभार्वी हो सकती है
परन्तु रार्जतन्त्रार्त्मक/नृपतंत्रार्त्मक व्यवस्थार् में सार्मार्जिक सुदृढ़तार् क रार्जनीतिक
सुदृढ़तार् से कोई सह-सम्बन्ध नहीं है।

2. वर्तमार्न धार्रणार्ओं में डॉ0 बी0आर0 अम्बेदकर और काँशीरार्म जैसे
समार्ज विचार्रकों के अनुसार्र- सार्मार्जिक सुदृढ़तार् से रार्जनीतिक सुदृढ़तार् की
परिकल्पनार् उपयुक्त नहीं रही। इसके विपरीत इन विचार्रकों क यह मार्ननार् है
कि यदि रार्जनीतिक व्यवस्थार् सुदृढ़ हो तो सार्मार्जिक व्यवस्थार् स्वत: सुदृढ़ होगी।
उपरोक्त दोनों धार्रणार्ओं क यह तार्त्पर्य हुआ कि (1) गार्ँधी जी के
अनुसार्र – ‘‘सार्मार्जिक सम्पन्नतार् से रार्जनीतिक सम्पन्नतार् की स्वत: प्रार्प्ति हो
सकती है’’। जबकि (2) डॉ0 अम्बेदकर और काँशीरार्म के अनुसार्र-
‘‘रार्जनीतिक सम्पन्नतार् सार्मार्जिक सम्पन्नतार् क स्वार्भार्विक आधार्र है’’।
तत्कालीन परिवेष में नृपतंत्रार्त्मक रार्जनीतिक व्यवस्थार्, वर्ण व्यवस्थार् तथार्
सार्मार्जिक व्यवस्थार् से प्रभार्वित थी। फलस्वरूप वर्ण व्यवस्थार् में विद्यमार्न कठोर
सार्मार्जिक नियमों और प्रतिबन्धों तथार् रार्जनीतिक व्यवस्थार् में नृपतंत्रार्त्मक “ार्ार्सन
व्यवस्थार् के कारण किसी भी तरह के परिवर्तन की (असीमित समय तक)
सम्भार्वनार् नहीं थी।

संत रविदार्स चौदहवीं शतार्ब्दी के योग्य विचार्रक, समार्ज वैज्ञार्निक व
चिंतक थे। यह एक ऐसार् समय थार् जब इस देष में मुस्लिम सार्म्रार्ज्य/षार्सकों
क सार्म्रार्ज्य थार्। इस समय भार्रतवर्ष पर मुसलमार्नों के अत्यार्चार्रों, अनार्चार्रों का
बोलवार्लार् थार्। हिन्दुओं की आँखों के सार्मने उनके देवार्लय घोषणार्एँ करके
गिरार्ए जार्ते थे। उनके आरार्ध्य देवतार्ओं क अपमार्न कियार् जार्तार् थार्। ऐसे समय
में जनतार् न तो विद्रोह ही कर सकती थी और न ही वे ‘सिर झुकाए बिनार्’ जी
ही सकती थी। अत: ऐसे समय में हृदय के आक्रोश को अपनी असहार्यतार्
निरार्शार् और दीनतार् से प्रभु के सम्मुख रखकर मन को शक्ति देने के अतिरिक्त
और रार्स्तार् ही क्यार् थार्?

भार्रत की सार्मार्जिक दशार् हिन्दू शार्सकों के समय से ही अव्यवस्थित थी।
समार्ज में प्रचलित चतुर वर्ण व्यवस्थार् एक अभिशार्प थी। जिसने समार्ज को
संगठन की अपेक्षार् विघटन की ओर अग्रसर कियार्। इसक परिणार्म यह हुआ कि
भार्रत विभिन्न ईकाइयों में विभक्त हो गयार्। इस आपसी फूट के कारण भार्रत में
मुस्लिम सार्म्रार्ज्य की नींव पड़ी। समार्ज में चतुर वर्ण यार् शूद्र कही जार्ने वार्ली
इन जार्तियों को इस शार्सन व्यवस्थार् के परिवर्तन से अपमार्न और तिरस्कार की
दोहरी नीति क सार्मनार् करनार् पडाऱ्। एक ओर सवर्ण हिन्दू अपने अत्यार्चार्रों की
श्रृंखलार् में मनोरंजन तक भी कभी नहीं करते, दूसरी ओर रार्जतंत्र ने भी चतुर
वर्ण के हितों की ओर कोई ध्यार्न नहीं दियार्। चतुर वर्ण को समार्ज और शार्सन
दोनों की यार्तनार्ओं और अत्यार्चार्रों की चक्की में पिसनार् पड़ार्। इस भीषण
समस्यार् क समार्धार्न समार्ज और रार्जतंत्र के पार्स असम्भव हो गयार् तो एक
सार्मार्जिक क्रार्न्ति ने जन्म लियार् जो पुनर्जार्गरण यार् संतों क भक्ति आन्दोलन के
नार्म से लोकप्रिय हुआ। इस पुनर्जार्गरण (भक्ति आन्दोलन) के जनक संत
रविदार्स हुए।

संत रविदार्स को तत्कालीन परिवेष में अनेकों समस्यार्ओं क सार्मनार्
करनार् पड़ार्। एक बार्र तत्कालीन रार्जार् सिकन्दर लोदी को संत रविदार्स की
महिमार् ज्ञार्त हुई तो लोदी ने उन्हें अपने दरबार्र में बुलार्यार् तथार् उनको धर्म
परिवर्तन के लिए विवष कियार्। संत रविदार्स ने ताकिकतार् पूर्ण जवार्ब देते हुए
कहार् ‘‘मुझे मिटार्यार् जार् सकतार् है परन्तु धर्म परिवर्तन नहीं करार्यार् जार् सकतार्।’’
इस प्रकार संत रविदार्स को अनेकों रार्जनीतिक कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार्
पड़ार् परन्तु सार्मार्जिक चेतनार् की भार्वनार् को जगार्ने में उन्हें इन कठिनार्इयों की
कोई परवार्ह नहीं थी।

संत रविदार्स जी क विभिन्न नार्म तथार् व्यक्तित्व

यद्यपि 14वीं शतार्ब्दी के काल में भार्रत में संचार्र संसार्धनों क विकास
नहीं हो पार्यार् थार् परन्तु शैक्षिक दृष्टि से पुस्तकों, पार्ण्डुलिपियों, वक्तव्यों,
शिलार्लेखों आदि के मार्ध्यम से शैक्षिक जार्गरूकतार् क प्रार्दुर्भार्व हो चुक थार्।
संत रविदार्स काल में आवार्गमन के संसार्धनों के अभार्वों के बार्वजूद संत रविदार्स
के विचार्रों क प्रचार्र-प्रसार्र भार्रत के अनेकों प्रार्न्तों में प्रचलित भार्षार्ओं, बोलियों,
लिपियों और वक्तव्यों तथार् व्यार्ख्यार्नों के मार्ध्यम से हो चुक थार्। चौदहवीं
“ार्तार्ब्दी में संत रविदार्स जैसे समार्ज विदत्तार् के विचार्रों की स्वीकारोक्ति उनके
स्पष्ट और निष्पक्ष वार्णियों के मार्ध्यम से सम्पूर्ण भार्रत में प्रचलित हो चुकी थी।
चूँकि विभिन्न प्रार्न्तों और क्षेत्रों की भार्षार् और बोली क प्रचलन अलग-अलग
शब्दों में आज भी सम्पूर्ण भार्रतवर्ष में देखने को मिलतार् है, यही कारण है कि
संत रविदार्स क नार्म विभिन्न प्रार्न्तों की बोलियों और भार्षार्ओं के आधार्र पर
निम्न प्रकार थार्।

लोकप्रियतार् की दृष्टि से उनक नार्म देश के विभिन्न भार्गों में आज भी
अनेक नार्मों से प्रचलित हैं। पंजार्ब में ‘रैदार्स’, बंगार्ल में ‘रुईदार्स’, महार्रार्ष्ट्र में
‘रोहिदार्स’ रार्जस्थार्न में ‘रार्यदार्स’, गुजरार्त में ‘रोहिदार्स’ अथवार् ‘रोहीतार्स’ मध्य
प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में ‘रविदार्स’ अथवार् ‘रैदार्स’ नार्मों से उनके नार्मों का
उल्लेख मिलतार् है। इस प्रकार उनके अनेक नार्म देखने को मिलते हैं। उच्चार्रण
में अन्तर जरूर देखने को मिलतार् है। परन्तु ये सभी नार्म ‘रविदार्स’ यार् ‘रैदार्स’
के बिगड़े हुए रूप हैं। स्थार्न-स्थार्न की बोली एवं भार्षार् से प्रभार्वित होकर
असली नार्म में कुछ न कुछ परिवर्तन हो जार्नार् स्वार्भार्विक है। यों तो रैदार्स को
भी ‘रविदार्स’ क अपभ्रंश मार्नार् जार् सकतार् है किन्तु अनुमार्न के सहार्रे निर्णय
लेनार् उचित नहीं है। बेलवेडियर प्रेस, इलार्हार्बार्द से प्रकाशित ‘‘रैदार्स की
बार्नी’’ (1971) में संकलित पदों में ‘रैदार्स’ एवं ‘रविदार्स’ नार्म की छार्प मिलती
है। गुरु-ग्रन्थ सार्हिब में संत रविदार्स के 40 पद हैं, जिनमें अधिकांश पदों में
उनक नार्म ‘रैदार्स’ ही मिलतार् है, लेकिन कहीं-कहीं ‘रविदार्स’ नार्म क भी
उल्लेख हुआ है। समकालीन संतों की वार्णियों में भी उनक नार्म ‘रैदार्स’ एवं
रविदार्स दोनों मिलते हैं।

गुरु ग्रन्थ सार्हिब की प्रार्मार्णिकतार् में भी संदेह नहीं कियार् जार् सकतार्।
‘रैदार्स रार्मार्यण’ तथार् ‘रैदार्स की बार्नी’ में भी ‘रविदार्स’ नार्म क समर्थन मिलतार्
है। अत: यह बार्त स्वीकार की जार् सकती है कि संत रविदार्स क पुकारने का
नार्म ‘रैदार्स’ भले ही प्रचलित हो, किन्तु उनक असली नार्म ‘रविदार्स’ ही थार्।
नार्म के अपभ्रंश रूप में प्रचलित हो जार्ने क एक कारण यह भी हो सकतार् है
कि इनके पन्थ के अनुयार्यी अधिकांशत: उपेक्षित, दलित और अशिक्षित वर्ग के
लोग ही रहे हैं। उनके लिए यह कठिन ही नहीं असम्भव भी थार् कि वे इनके
नार्म क शुद्ध उच्चार्रण कर सकते।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होतार् है कि संत रविदार्स के नार्म की प्रसिद्धि
विभिन्न प्रार्न्तीय भार्षार्ओं से प्रभार्वित होकर विभिन्न शब्द जैसे- रविदार्स,
रार्यदार्स, रूईदार्स, रोहिदार्स, रोहीतार्स आदि संज्ञार् के रूपार्न्तर है। जो अन्य नार्म
देश और काल के भेद से उन्हीं के परिवर्तित और विकसित रूप मार्ने जार् सकते
हैं। काव्य-ग्रन्थों में रैदार्स क तत्सम रूप रविदार्स प्रयुक्त हुआ है, जिसे लोक
प्रचलन और सुविधार् की दृष्टि से अधिकांश विद्वार्नों ने उनक नार्म रविदार्स ही
स्वीकार कियार् है।।

संत रविदार्स क व्यक्तित्व त्यार्ग, तपस्यार् से ओतप्रोत थार्। यह कहनार्
अतिशयोक्ति नहीं होगार् कि भगवार्न बुद्ध ने सम्पूर्ण रार्जपार्ठ और विलार्सितार् के
सार्धनों को छोड़कर योग, त्यार्ग और तपस्यार् में अपनार् सम्पूर्ण जीवन विलीन कर
दियार् थार्। इसी प्रकार संत रविदार्स ने ज्ञार्न की प्रार्प्ति के लिए प्रार्चीन भार्रतीय
परम्परार्ओं और मूल्यों क अनुसरण करते हुए भोग और विलार्सितार् से दूर योग
और सार्धनार् को अंगीकृत कियार् तथार् एक कल्यार्णकारी समार्ज व्यवस्थार् की
कल्पनार् में तत्कालीन समार्ज में विद्यमार्न कमियों को उल्लिखित और उद्धृत करते
हुए बेहतर समार्ज के निर्मार्ण की कल्पनार् की। आधुनिकतार् की अंधी दौड़ में
संस्कारों की उपेक्षार् करनार् हम सभी के लिए कष्टकारी होगार्। इससे मार्नव मूल्यों
क हृार्स होतार् है, जो सार्मार्जिकतार् के लिए बहुत ही घार्तक है। मार्नव मूल्यों की
रक्षार् के लिए संत-महार्पुरुषों क इतिहार्स त्यार्ग, तपस्यार् से भरार् पड़ार् है।।

‘समन्वय क संदेश’ संत रविदार्स के व्यक्तित्व की साथकतार् को दर्शार्तार् है।
अपनी इसी विशिष्टतार् के कारण वह मध्यकालीन इतिहार्स में मार्नव-समार्ज के
प्रेरणार्स्रोत बने। संत रविदार्स के समन्वय क ढंग भी उनके अनुरूप निरार्लार् थार्।
अपने इस समन्वय के लिए उन्होंने कभी भी किसी पक्ष के अवगुणों से समझौतार्
नहीं कियार् और न ही कभी उसकी कमियों को छिपार्यार्, बल्कि वे तो अपनी
सीधी-सरल ताकिक वार्णी से सत्य कहने से कभी नहीं चूके।।

भार्रतीय मध्य युग के इतिहार्स में समार्ज के निम्न वर्ग से उद्धत संत
रविदार्स को समार्ज ने ठुकरार्ने क दु:सार्हस कियार्, लेकिन उन्होंने उस
आडम्बरपूर्ण समार्ज को ही ठुकरार्कर अपने पीछे लगार् लियार्। समय ने उनके
सार्मने जो भी चुनौती रखी, उससे वे भार्गे नहीं, बल्कि उससे जूझे। उन्होंने एक
नहीं अनेको कष्ट सहे, पर सच्चार्ई कहने से कभी चूके नहीं। उनक झगड़ार् तो
समार्ज को गुमरार्ह करने वार्लों से थार्, किसी जार्ति, धर्म यार् वर्ग विशेष से नहीं।
यही कारण है कि समार्ज के सभी वर्ग के लोग उनके अपने हुए, सभी ने उन्हें
अपनार्यार्।।

संत रविदार्स ने ईश्वर कृपार् पार्ने के लिए किसी भी प्रकार के जप, तप
और व्रत क पार्लन नहीं कियार्। उन्होंने अपने शरीर को किसी प्रकार क कष्ट
भी नहीं दियार्। उन्होंने जीवन में मध्यम माग अपनार्यार्। उन्होंने अपने मन की
चंचलतार् को रोक और उस पर अंकुश लगार्यार्। उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह
और अहंकार को शार्ंत कर संयमित और पवित्र जीवन बितार्यार्। उन्होंने कुशल
कर्म अपनार्ये और लोभ, द्वेष तथार् आलस्य को त्यार्ग कर ‘‘अत्त दीपो भव’’ को
अपने जीवन में अपनार्यार्। संत रविदार्स ने मनुष्य के चरित्र की पवित्रतार् को ही
मार्नव कल्यार्ण क आधार्र मार्नार्। यही पवित्र सन्देश बुद्ध ने भी संसार्र को दियार्
थार्। संत रविदार्स नि:स्वाथ भार्व से स्वयं कार्य करते और दूसरों को भी नि:स्वाथ
भार्व से कार्य करने की सलार्ह देते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर
नहीं थार्। उनके उपदेश सरल, सहज और सभी को सुलभ थे। उनक संदेश थार्
कि बुरार् काम न करे, बुरी बार्त न सोचे, अपनी जीविक के लिए बुरे काम का
सहार्रार् न लें। किसी भी काम को छोटार्-बड़ार् और किसी भी व्यक्ति को
छोटार्-बड़ार् न समझे। किसी को भी न सतार्यें, प्रार्णी मार्त्र पर दयार् रखें और सभी
को समार्न समझकर उससे प्रेम करें।।

संत रविदार्स जी की अष्टार्ँग सार्धनार्

मनुश्य संसार्र में रहकर सार्ंसार्रिकतार् की चकाचौंध में अनेकों समार्ज
विरोधी कार्य करतार् रहतार् है। जिसके कारण उसे तथार् समार्ज को अनेकों
समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। जिससे वह दु:खी होतार् है। इन दु:खों के
निवार्रण के लिए क्रमार्नुसार्र आन्तरिक चेतनार् के विकास क एक सरल उपार्य
‘अष्टार्ँग योग है’। जब तक मनुष्य के चित्त्ार् में विकार भरार् रहतार् है और उसकी
बुद्धि दूषित रहती है, तब तक वह तत्व ज्ञार्न नहीं प्रार्प्त कर सकतार्। शुद्ध हृदय
और निर्मल बुद्धि से ही आत्म-ज्ञार्न उपलब्ध होतार् है। चित्त की “ार्ुद्धि और
पवित्रतार् के लिए संत रविदार्स ने योग के आठ प्रकार के सार्धन बतलार्ये हैं। ये
निम्न प्रकार से हैं-।

(1) यम, (2) नियम, (3) आसन, (4) प्रार्णार्यार्म, (5) प्रत्यार्हार्र, (6) धार्रणार्, (7)
ध्यार्न और (8) समार्धि। ये आठों ‘योगार्ंग’ कहलार्ते हैं।
योग क प्रथम अंग है यम। इसके निम्नलिखित अंग हैं- (1) अहिंसार्
(अर्थार्त् किसी जीव को किसी प्रकार क कश्ट नहीं पहुँचार्नार्); (2) सत्य (अर्थार्त्
किसी से किसी तरह क झूठ नहीं बोलनार्), (3) अस्तेय (अर्थार्त् चोरी नहीं
करनार्), (4) ब्रºमचर्य (अर्थार्त् विषय वार्सनार् की ओर नहीं जार्नार्), और (5)
अपरिग्रह (अर्थार्त् लोभवश अनार्वश्यक वस्तु ग्रहण नहीं करनार्), ये सब सार्धन
सर्वविदित हैं अत: योगी के लिए इनक सार्धन अत्यार्वश्यक है, क्योंकि मन को
सबल बनार्ने के लिए शरीर को सबल बनार्नार् आवश्यक है। जो काम, क्रोध, लोभ
आदि विकारों पर विजय प्रार्प्त नहीं कर सकतार्, उसक मन यार् शरीर सबल नहीं
रह सकतार्। इसी तरह जब तक मनुष्य क मन पार्प-वार्सनार्ओं से भरार् और
चंचल रहतार् है तब तक वह किसी विषय पर चित्त एकाग्र नहीं कर सकतार्।।

योग क दूसरार् अंग है नियम यार् सदार्चार्र क पार्लन। इसके
निम्नलिखित अंग हैं- ।

(1) शौच (वार्ºय शुद्धि अर्थार्त् शार्रीरिक शुद्धि, जैसे स्नार्न
और पवित्र ) भोजन के द्वार्रार् आभ्यंतर शुद्धि अर्थार्त् मार्नसिक शुद्धि जैसे, मैत्री,
करूणार्, मुदितार् आदि के द्वार्रार्। (2) संतोष (अर्थार्त् उचित प्रयार्स से जितनार् ही
प्रार्प्त हो उससे संतुष्ट रहनार्)। (3) तप (जैसे गर्मी-सर्दी आदि सहने क अभ्यार्स,
कठिन व्रत क पार्लन करनार्, आदि)। (4) स्वार्ध्यार्य (नियम पूर्वक धर्मग्रन्थों का
अध्ययन करनार्)। (5) ईश्वर प्रणिधार्न (ईश्वर क ध्यार्न और उनपर अपने को
छोड़ देनार्)।

आसन शरीर क सार्धन है। इसक अर्थ है शरीर को ऐसी स्थिति में
रखनार् जिससे निष्चल होकर सुख के सार्थ देर तक रह सकते हैं। नार्नार् प्रकार
के आसन होते हैं, जैसे पद्यार्सन, वीरार्सन, भद्रार्सन, सिद्धार्सन, “ार्ीर्शार्सन,
गरुणार्सन, मयूरार्सन, श्वार्सन आदि। चित्त की एकाग्रतार् के लिए शरीर का
अनुशार्सन भी आवश्यक है जितनार् मन का। यदि शरीर रोगार्दि बार्धार्ओं से पूर्णत:
मुक्त नहीं रहे तो समार्धि लगार्नार् बड़ार् ही कठिन है। अतएव आरोग्य सार्धन के
लिए बहुत से नियम निर्धार्रित करनार् है, जिससे शरीर समार्धि क्रियार् के योग्य बन
सके। शरीर और मन को शुद्ध तथार् सबल बनार्ने के लिए तथार् दीर्धार्यु प्रार्प्त
करने के लिए योग में नार्नार् प्रकार के नियम बतलार्ए गए। योगार्सन शरीर को
निरोग तथार् सबल बनार्ए रख्ने के लिए उत्तम सार्धन है। इन आसनों के द्वार्रार्
सभी अंगों, विशेषत: स्नार्युमण्डल इस तरह वश में किए जार् सकते हैं कि वे मन
में कोई विकास उत्पन्न नहीं कर सकें।

प्रार्णार्यार्म क अर्थ है श्वार्स पर नियंत्रण। इस क्रियार् में तीन अंग होते है
(1) पूरक (पूरार् श्वार्स भीतर खींचनार्), (2) कुंभक (श्वार्स को भीतर रोकनार्) और
(3) रेचक (नियमित विधि से श्वार्स छोड़नार्)। श्वार्स के व्यार्यार्म से हृदय पुष्ट
होतार् है और उसमे बल आतार् है, इसे चिकित्सार् विज्ञार्न भी स्वीकार करतार् है।
प्रार्णार्यार्म के द्वार्रार् शरीर और मन में दृढ़तार् आती है। जब तक श्वार्स की क्रियार्
चलती रहती है तब तक चित्त भी उनके सार्थ चंचल रहतार् है। जब श्वार्स वार्यु
की गति स्थगित हो जार्ती है तब मन भी निस्पंद यार् स्थिर हो जार्तार् है। इस
तरह प्रार्णार्यार्म के अभ्यार्स से योगी समार्धि की अवधि को बढ़ार् सकतार् है।

प्रत्यार्हार्र क अर्थ है इंन्द्रियों को अपने-अपने वार्ºय विषयों से खींचकर
हटार्नार् और उन्हे मन के वश में रखनार्। जब इंन्द्रिय पूर्णत: मन के वष में आ
जार्ते हैं तब वे अपने स्वार्भार्विक विषयों से हटकर मन की ओर लग जार्ते हैं।
इस अवस्थार् में आँख-कान के सार्मने सार्ंसार्रिक विषय रहते हुए भी हम
देख-सुन नहीं सकते। रूप, रस, गंध, शब्द यार् स्पर्ष क कोई भी प्रभार्व मन पर
नहीं पड़तार्। यह अवस्थार् कठिन है, यद्यपि असंभव नहीं है। इसके लिए अत्यंत
दृढ़ संकल्प और प्रौढ़ इंद्रिय-निग्रह की सार्धनार् आवश्यक है।

उपर्युक्त पार्ँच अनुशार्सन- यम, नियम, आसन, प्रार्णार्यार्म और प्रत्यार्हार्र
बहिरंग सार्धन कहलार्ते हैं। “ोश तीन- धार्रणार्, ध्यार्न और समार्धि- अंतरंग सार्धन
कहलार्ते हैं, क्योंकि उनक योग (समार्धि) से सीधार् संपर्क है।

धार्रणार् क अर्थ है चित्त को अभीष्ट विषय पर जमार्नार्। यह विषय वार्ºय
पदाथ भी हो सकतार् है। (जैसे, सूर्य यार् किसी देवतार् की प्रतिमार्) और अपनार्
शरीर भी (जैसे, अपनी नार्भि यार् भौहों क मध्य भार्ग) किसी विषय पर दृढ़तार्पूर्वक
चित्त को एकाग्र करने की शक्ति ही योग की असल कुंजी है। इसी को सिद्ध
करने वार्लार् समार्धि अवस्थार् तक पहुँच सकतार् है।

इसके बार्द अगली सीढ़ी है ध्यार्न। ध्यार्न क अर्थ है ध्येय विषय का
निरंतर मनन। अर्थार्त् उसी विषय को लेकर विचार्र क अनवच्छिन्न (लगार्तार्र)
प्रवार्ह। इसके द्वार्रार् विषय क सुस्पष्ट ज्ञार्न हो जार्तार् है। पहले भिन्न-भिन्न अंशों
यह स्वरूपों क बोध होतार् है। तदनंतर अविरार्म ध्यार्न के द्वार्रार् संपूर्ण चित्त आ
जार्तार् है और उस वस्तु के असली रूप क दर्षन हो जार्तार् है। इस तरह योगी
के मनमें ध्यार्न के द्वार्रार् ध्येय वस्तु क यथाथ स्वरूप प्रकट हो जार्तार् है।
योगार्सन की अंतिम सीढ़ी है समार्धि। इस अवस्थार् में मन ध्येय विषय में
इतनार् लीन हो जार्तार् है कि वह उसमें तन्मय हो जार्तार् है और अपनार् कुछ भी
ज्ञार्न नहीं रहतार्। ध्यार्न की अवस्थार् में ध्येय विषय और ध्यार्न की क्रियार्- ये
दोनो पृथक: प्रतीत होते हैं। परन्तु समार्धि की अवस्थार् में ध्यार्न की क्रियार् का
पृथक अनुभव नही होतार् , वह ध्येय विषय में डूबकर अपने को खो बैठती है।
धार्रणार्, ध्यार्न और समार्धि – ये तीनो योग के अंतरंग सार्धन है। इन तीनो
क विषय एक ही रहनार् चार्हिए अर्थार्त एक ही विषय को लेकर पहले चित्त में
धार्रणार्, तब ध्यार्न और अंत में समार्धि होनी चार्हिए। ये तीनो मिलकर ‘संयम’
कहलार्ते हैं जो योगी के लिए अत्यार्वष्यक है।

रविदार्स की भक्ति भार्वनार् एवं सार्धनार्

ईश्वरीय शक्ति अथवार् ईश्वर पर विश्वार्स ही ईश्वरीय भक्ति कहलार्ती है।
इस आस्थार् और विश्वार्स क मार्ध्यम आकार-प्रकार, स्वरूप किसी भी रूप में हो
सकतार् है। कभी कभी ईश्वरी आस्थार् में तल्लीन व्यक्ति ज्ञार्न को प्रार्प्त करने में
उस शिखर तक पहुँच सकतार् है जो सोच और सैद्धार्न्तिक दृष्टि से पूर्णतयार्
उपयुक्त और वैज्ञार्निकतार् की कसौटी पर खरार् उतरतार् हो।

ईश्वर के प्रति आस्थार् और विश्वार्स को ईश्वरीय भक्ति के नार्म से
सम्बोधित कियार् जार्तार् है। सार्हित्यिक दृष्टि से ईश्वरीय आस्थार् में विश्वार्स रखने
वार्ले लोगों को समूह/धार्रार् के रूप में सम्बोधित कियार् जार्तार् है। सार्मार्न्यत:
इसके दो रूप हो सकते हैं। (1) सगुण (2) निर्गुण। सगुण क अर्थ है वे लोग
जो ईश्वर के प्रति अटूट विश्वार्स रखते हैं परन्तु उनमें तर्क और ज्ञार्न क बोध
है। दूसरे वे लोग जो ईश्वर के प्रति आस्थार् रखते हैं परन्तु उनमें ज्ञार्न और
योग्यतार् क अभार्व है। ऐसे लोग मार्त्र एक दूसरे को देखकर उसी कार्य व्यवहार्र
को अपनार्ते हैं जैसार् दूसरों से देखार् सुनार् है। ऐसे लोगों में ज्ञार्न/तर्क का
पूर्णतयार् अभार्व होतार् है।

यद्यपि परम्परार्गत सार्हित्यों में सगुण और निर्गुण की अवधार्रणार् क अर्थ
यह मार्नार् जार्तार् रहार् है कि सगुण क तार्त्पर्य मूर्ति आकार-प्रकार से है वहीं
निर्गुण क अर्थ निरार्कार से है परन्तु समार्जषार्स्त्ररय सिद्धार्न्तों क वैज्ञार्निक
विश्लेषण यह स्पष्ट करतार् है कि सगुण क तार्त्पर्य उस विचार्रधार्रार् से है जिसमें
ज्ञार्न और तर्क क समार्वेश हो तथार् निर्गुण क अर्थ अज्ञार्नतार् की उस स्थिति से
है जिसमें ईश्वर पर आस्थार् कल्पनार्ओं पर आधार्रित है। सत्यतार् यह है कि
ईश्वरीय आस्थार् क तार्त्पर्य उन प्रार्कृतिक शक्तियों से है जो स्वार्भार्विक रूप से
नियमार्नुसार्र स्वार्भार्विक रूप में संचार्लित हो रही है। इन प्रार्कृतिक व्यवस्थार्ओं के
संचार्लन में निश्चित रूप से कोई ऐसी शक्ति है जो व्यवस्थार् क संचार्लन
स्वार्भार्विक रूप में करती है। उदार्हरणाथ दिन-रार्त क होनार्, सर्दी, गर्मी व
बरसार्त क परिवर्तन आदि ऐसी स्वार्भार्विक घटनार्एँ हैं जिससे ईश्वर के प्रति
आस्थार् अधिक दृढ़ और प्रगार्ढ़ होती है। दुख्र्ार्ीम और काम्ट ने इसी मत का
समर्थन कियार् है।

दुख्र्ार्ीम के अनुसार्र ‘‘सार्धनार् चेतनार् क्षेत्र क ऐसार् पुरुषाथ है, जिसमें
सार्मार्न्य श्रम एवं मनोयोग क नियोजन भी असार्मार्न्य विभूतियों एवं शक्तियों को
जन्म देतार् है। सार्धार्रण स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है पर यदि उसे उत्कृष्ट बनार्
दियार् जार्ए, तो उससे ऐसार् कुछ मिलतार् है, जिसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण कहार् जार्
सकतार् है।’’ मार्नव जीवन मोटी दृष्टि से ऐसार् ही एक खिलवार्ड़ है। मनुष्यों के
बीच पार्ए जार्ने वार्ले आकाष-पृथ्वी जैसे अन्तर क यही कारण नजर आतार् है
कि जीवन की ऊपरी परतों तक ही जिन्होंने मतलब रखार्, उन्हें छिलक ही हार्थ
लगार्, किन्तु जिन्होंने गहरे उतरने की चेष्टार् की, उन्हें एक के बार्द एक बहुमूल्य
उपलब्धियार्ँ मिलती चली गयीं। गहरार्ई में उतरने को अध्यार्त्म की भार्षार् में
‘सार्धनार्’ कहते हैं।

संत रविदार्स की सार्धनार् न तो रहस्यवार्द है, नार् पलार्यनवार्द। उसमें कायार्
कष्ट क वैसार् विधार्न नहीं है, जैसार् कि कई अतिवार्दी अपनार् दुस्सार्हस दिखार्कर
भार्वुक जनों पर विशिष्टतार् क आतंक जमार्ते और उस आधार्र पर शोषण करते
देखे गए हैं। उसमें कल्पनार् लोक में अवार्स्तविक विवरण भी नहीं है, और न उसे
जार्दू चमत्कारों की श्रेणी में गिनार् जार् सकतार् है। देवतार्ओं को वशवर्ती बनार्कर
यार् भूत-प्रेतों की सहार्यतार् लेकर मनोकामनार् पूरी करने-करार्ने जैसी ललक
लिप्सार् पूरी करने जैसार् भी इस विद्यार् में कोई आधार्र नहीं है। संत रविदार्स की
सार्धनार् एक विशुद्ध विज्ञार्न है, जिसक वार्स्तविक आधार्र है- आत्मार्नुशार्सन का
अभ्यार्स और क्षमतार्ओं क उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए सफल नियोजन। जो
इतनार् कर सकते हैं उन्हें सच्चे अर्थों में सिद्ध पुरुष कहार् जार् सकतार् है।

संत रविदार्स जी क विवार्ह

संत रविदार्स भार्रतीय समार्ज के सार्मार्जिक नियमों और मार्नकों के पार्लक
रहे हैं। वह कोई ऐसे पार्खण्डी और दिखार्वटीपन वार्ले व्यक्ति नहीं थे जो
सार्मार्जिक नियमों के विपरीत संस्थार्ओं और व्यवस्थार्ओं से परे ब्रह्मचर्य जीवन को
आधार्र स्तम्भ मार्नकर संत अथवार् महार्त्मार् कहलार्ये, वह ऐसे महार्पुरुष थे जो
सार्मार्जिक व्यवस्थार् और नियमों की परिधि में सार्मार्न्य नार्गरिक के रूप में
सार्मार्न्य जीवन व्यतीत करने वार्ले निर्धन परिवार्र से जुड़े हुए सार्मार्जिक
व्यवस्थार्ओं के अनुकूल चलने वार्ले महार्पुरुष थे। वार्स्तव में उनके विचार्र उन
व्यवस्थार्ओं के प्रतिकूल थे जो समार्ज में विद्यमार्न कमियों और अमार्नवीयतार् को
इंगित करते रहे। उन्होंने बहुत ही सहजतार् और सरलतार् से समार्ज में विद्यमार्न
उन कमियों और अव्यवस्थार्ओं को लोगों के समक्ष प्रस्तुत कियार्। संत रविदार्स
ऐसे महार्पुरुष थे जिनके विचार्रों को लोगों ने न केवल स्वीकार कियार् अपितु
उपयुक्त भी मार्नार्। यह उनकी बुद्धिमत्तार् और योग्यतार् क परिचय ही मार्नार्
जार्येगार् कि वर्तमार्न में सत्य अथवार् मार्नवीयतार् के विरूद्ध पक्षों को रखने वार्ले
विचार्रकों क अताकिक रूप से पुरजोर विरोध कियार् जार्तार् है। परन्तु संत
रविदार्स ऐसे योग्य और सार्मार्जिकतार् की नस को समझने वार्ले महार्पुरुष थे
जिन्होंने अव्यवस्थार् और समार्ज में विद्यमार्न कमियों को लोगों के समक्ष इतनी
ताकिकतार् और बुद्धिमत्तार् के सार्थ प्रस्तुत कियार् कि न केवल लोगों ने उसे
स्वीकार कियार् अपितु किसी भी तरह क विरोध भी नहीं कियार्। उनके द्वार्रार्
प्रस्तुत किये गये सार्मार्जिक व्यवस्थार् के उपयुक्त पक्षों को लोगों ने न केवल
स्वीकार कियार् अपितु उनकी योग्यतार् और ताकिकतार् की स्वीकारोक्ति के सार्थ
सरार्हनार् भी की।

संत रविदार्स क विवार्ह बार्ल्यकाल में ही ‘लोनार्’ के सार्थ सम्पन्न हुआ
थार्। मेजर ब्रिग्स ने संत रविदार्स की पत्नी क नार्म ‘लोनार्’ बतार्यार् है। ‘रैदार्स
रार्मार्यण’ में भी इसी नार्म क उल्लेख हुआ है। संत रविदार्स ने सार्मार्जिक
व्यवस्थार् के विवार्ह संस्थार् को स्वार्भार्विक रूप से स्वीकृति मार्नते हुए स्वयं इस
संस्थार् के परिपार्लक बने इससे यह स्पष्ट होतार् है कि संत रविदार्स भार्रतीय
सार्मार्जिक व्यवस्थार् के न केवल हिमार्यती रहे बल्कि इस व्यवस्थार् के पोषक भी
रहे हैं, उन्होंने स्वप्न चिन्तक के रूप में व्यवस्थार् परिवर्तन के पक्ष को कभी
उपयुक्त नहीं मार्नार् बल्कि सार्मार्जिक व्यवस्थार् में विद्यमार्न कमियों को दूर करने
की वैचार्रिकी को उपयुक्त मार्नार् है।

संत रविदार्स क सम्पूर्ण जीवन उनक व्यक्तित्व, कार्य और विचार्र
समार्जशार्स्त्रीय सिद्धार्न्तों की दृष्टि से यह स्पष्ट करतार् है कि वह सार्मार्जिक
परिवर्तन के हिमार्यती रहे हैं, परन्तु सार्मार्जिक परिवर्तन क वह आधार्र जो
Utopian ;यूटोपियन विचार्रधार्रार्) वार्ले महार्पुरुष न हो करके प्कमवसवहपबंस
Thinking ;वैचार्रिकी विचार्रधार्रार्) के महार्पुरुष रहे हैं। यह उनकी विद्वतार् ही रही
है कि उन्होंने अपनी योग्यतार् और क्षमतार् से उन्हीं पक्षों को उद्ध्त कियार् और
उपयुक्त मार्नार् जो सर्वथार् सम्भव रही हो। सार्मार्जिक जार्गरूकतार् की दृष्टि से
21वीं शतार्ब्दी में भी सम्पूर्ण सार्मार्जिक व्यवस्थार् परिवर्तन की परिकल्पनार्,
जार्गरूकतार् के 21वीं शतार्ब्दी के परिवेश में भी कियार् जार्नार् सम्भव नहीं है। फिर
भी 14वीं दशक में सम्पूर्ण सार्मार्जिक व्यवस्थार् परिवर्तन कहार्ँ तक उपयुक्त होगार्?
संत रविदार्स ने सत्य और असत्य, अच्छार्ई और बुरार्ई, मार्नवीयतार् और
अमार्नवीयतार्, ताकिकतार् और अताकिकतार् जैसे पक्षों में उपयुक्त को ही समार्ज
क सर्वोत्कृष्ट व्यवस्थार् क आधार्र मार्नार् और उनमें विद्यमार्न कमियों को समार्ज
के समक्ष प्रस्तुत कियार्। सत्य और उचित की रार्ह पर चलते हुए उन्होंने
तत्कालीन अनेकों तथार्कथित संतो और महार्त्मार्ओं को अपने विचार्रों और तर्कों से
शार्स्त्राथों और वातार्ओं में परार्जित कियार्। सज्जनतार् और सरलतार् के प्रतिरूप
संत रविदार्स ने भार्रतीय सार्मार्जिक व्यवस्थार् के न केवल विवार्ह जैसी संस्थार् को
उपयुक्त और उचित मार्नार् बल्कि सार्मार्जिक व्यवस्थार् में विद्यमार्न सभी संस्थार्ओं
के वह हिमार्यती और पोषक भी रहे। यह दुर्भार्ग्य की बार्त है कि वर्तमार्न परिवेश
में कुछ स्वार्थ्र्ार्ी तथार्कथित महार्पण्डितों ने व्यवस्थार् में अवधार्रणार्ओं और धार्रणार्ओं
को व्यक्तिगत लार्भ में दूषित और दो अथ्र्ार्ी बनार् दियार् है।

संत रविदार्स के व्यक्तित्व संदर्भित प्रार्प्त सार्क्ष्यों और प्रमार्णों के आधार्र पर
उनके जीवन संदर्भित जो तथ्य दृष्टिगोचित होते हैं, उसके अनुसार्र महार्त्मार् बुद्ध,
स्वार्मी विवेकानन्द, सुभार्षचन्द्र बोस जैसे महार्पुरुषों की भार्ँति उनक सम्पूर्ण जीवन
ब्रह्मचर्य यार् त्यार्ग-तपस्यार् में ही व्यतीत हुआ। संत रविदार्स ने समार्ज में विवार्ह
जैसी संस्थार् को स्वीकृति देने हेतु स्वीकार जरूर कियार् परन्तु उन पर विवार्ह का
कोई प्रभार्व नहीं पड़ार् और उन्होंने सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य और समार्ज सेवार् में ही
बितार्यार्।

यह एक सावभौमिक पक्ष है कि जिस व्यक्ति ने सार्धार्रण व सार्मार्न्य से
ऊपर उठकर जीवन के किसी भी क्षेत्र में असार्धार्रण कार्य किये हों वह समार्ज में
असार्धार्रण व्यक्तियों में गिने गये उनकी ख्यार्ति उनके असार्धार्रण योग्यतार् और
क्षमतार् के कारण की गयी। संत रविदार्स ऐसे ही महार्पुरुष थे जिनकी असार्धार्रण
योग्यतार् और क्षमतार् तथार् उनक जीवन आज लोगों के लिए प्रेरणार् और प्रेरक
बनार् हुआ है।

अन्तर्मुखी अनुभव

इच्छार्ओं को नियंत्रित कर व्यक्ति अपनी आंतरिक प्रकृति को समझ सकतार्
है। जब व्यक्ति इस योग्यतार् को प्रार्प्त कर लेतार् है, तब वह अपने अंत:करण से
परिचित हो जार्तार् है और जब वह अपने अंत:करण को समझ लेतार् है तो उसे
अनुभव होतार् है कि वह उस दर्पण के समार्न है जो उसकी वार्स्तविकतार् है।
हमार्रे अंतस् में अनंत सम्भार्वनार्एँ प्रत्येक समय व्यार्प्त रहती हैं। आवश्यकतार् है
हमें उनकी सही समय पर पहचार्न करके अपनी आत्म चेतनार् की उस विकसित
ऊर्जार् के मार्ध्यम से अपनार् और समार्ज क विकास करनार्।

संत रविदार्स क युग अत्यन्त जटिलतार्ओं से भरपूर विषमतार्ओं क युग
थार् उनके विचार्रों में विश्व बन्धुत्व, धामिक सार्दगी के सार्थ सार्मार्जिक बुरार्ईयों के
प्रति प्रतिक्रियार् मिलती है। धर्म के नार्म पर होने वार्ले पार्खण्डों को संत रविदार्स
ने अस्वीकार कियार् है। इसीलिए उन्होंने अन्तर्मन की सार्धनार् को महत्व दियार् है।
जब हमें अपनी चेतनार् क आभार्स और अस्तित्व क बोध होतार् है तब
संसार्र के सार्रे रिश्ते बौने प्रतीत होते हैं सार्थ ही स्वयं में ऐसी विरार्टतार् का
अनुभव होतार् है, जिसके अंदर संसार्र के समस्त रिश्ते समार्हित होते हैं। व्यक्ति
क यह चेतन स्वरूप ईश्वर क दिव्य अंश है। इस सत्य क आभार्स जब तक
हम करते रहेंगे तब तक हम स्वयं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शक्तिशार्ली
अनुभव करेंगे, सार्थ ही ईश्वर की निकटतार् क आभार्स होने से आत्मबल मजबूत
होगार्, जिससे अपनार् तथार् समार्ज क कल्यार्ण होगार्।

आज व्यक्ति अपने अंत:करण को कुचलने क लगार्तार्र प्रयार्स कर रहार्
है। वह दूसरों के समर्थन और सहार्रे पर विश्वार्स करतार् है तथार् अपने वार्स्तविक
स्वरूप को जार्नने व समझने की ओर उसक ध्यार्न ही नहीं जार्तार् है। जिसके
कारण वह अपने को असहार्य समझतार् है। चूँकि जब व्यक्ति अपने जीवन के उस
रूप को समझने की कोशिश करतार् है तो वह अपने व्यक्तित्व के ऐसे पक्ष से
परिचित होतार् है जो उसको सत्य क वह ज्ञार्न करार्तार् है जिससे वह अभी तक
अनभिज्ञ थार्।

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