संचार्र की अवधार्रणार्, परिभार्षार् एवं महत्व

संचार्र की अवधार्रणार्

मनुष्य एक सार्मार्जिक प्रार्णी है और संचार्र करनार् उसकी प्रकृति है । अपने भार्वों व विचार्रों क अदार्न-प्रदार्न करनार् उसकी जन्मजार्त प्रकृति है । ऐसार् मार्नार् जार् सकतार् है कि मार्नव के अस्तित्व में आने के सार्थ ही संचार्र की आवश्यकतार् क अनुभव हो गयार् हो गयार् होगार् । जोकि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकतार् हो गयार्। संचार्र किसी भी समार्ज के लिए अति आवश्यक है । जो स्थार्न शरीर के लिये भोजन क है, वही समार्ज व्यवस्थार् में संचार्र क है । मार्नव क शार्रीरिक एवं मार्नसिक विकास पूरी तरह से संचार्र-प्रक्रियार् से जुड़ार् रहतार् है । जन्म से मृत्यु तक मनुष्य एक दूसरे से बार्तचीत के मार्ध्यम से सम्बद्ध रहतार् है, एक दूसरे को जनतार् है, समझतार् है तथार् परिपक्व होतार् है। संचार्र को मार्नव सम्बन्धों की नींव कहार् जार् सकतार् है । समार्ज वैज्ञार्निकों क मार्ननार् है कि किसी भी परिवार्र, समूह, समुदार्य तथार् समार्ज में यदि मनुष्यों के बीच परस्पर वातार्लार्प बन्द हो जार्ये तो सार्मार्जिक विघटन की प्रक्रियार् आरम्भ हो जार्येगी एवं मार्नसिक विकृतियार्ँ जन्म लेने लगेंगी।

संचार्र की परिभार्षार् 

कम्युनिकेशन (Communication) शब्द लैटिन भार्षार् के कम्युनिस (Communis) से बनार् है जिसक अर्थ है to impart, make common । मन के विचार्रों व भार्वों क आदार्न-प्रदार्न करनार् अथवार् विचार्रों को सर्वसार्मार्न्य बनार्कर दूसरों के सार्थ बार्ँटनार् ही संचार्र है ।संचार्र शब्द, अंग्रेजी भार्षार् के शब्द क हिन्दी रूपार्न्तरण है । जिसक विकास Commune शब्द से हुआ है । जिसक अर्थ है अदार्न-प्रदार्न करनार् अर्थार्त बार्ँटनार् ।संचार्र एक आधुनिक विषय है । मनोविज्ञार्न, समार्जशार्स्त्र, शिक्षार्शार्स्त्र, समार्ज कार्य जैसे विषयों से इसक प्रत्यक्ष सम्बन्ध है । विभिन्न विचार्रकों ने इसकी परिभार्षार् को परिभार्षित करने क प्रयार्स कियार् है ।

  1. चेरी के अनुसार्र संचार्र उत्प्रेरक क अदार्न प्रदार्न है ।
  2. शेनन ने संचार्र को परिभार्षित करते हुए कहार् है कि एक मस्तिक क दूसरे मस्तिक पर प्रभार्व है ।
  3. मिलेन ने संचार्र को प्रशार्सनिक दृष्टिकोण से परिभार्षित कियार् है । आपके अनुसार्र, संचार्ार्र प्रशार्सनिक संगठन की जीवन-रेखार् है ।
  4. डार्. श्यार्मार्रचरण के शब्दों में :-संचार्र सार्मार्जीकरण क प्रमुख मार्ध्यम है । संचार्र द्वार्रार् सार्मार्जिक और सार्ंस्कृतिक परम्परार्ए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है । सार्मार्जीकरण की प्रत्येक स्थिति और उसक हर रूप संचार्र पर आश्रित है । मनुष्य जैविकीय प्रार्णी से सार्मार्जिक प्रार्णी तब बनतार् है, जब वह संचार्र द्वार्रार् सार्ंस्कृतिक अभिवृत्तियों, मूल्यों और व्यवहार्र-प्रकारों को आत्मसार्त कर लेतार् है।
  5. बीबर के अनुसार्र, वे सभी तरीके जिनके द्वार्रार् एक मार्नव दूसरे को प्रभार्वित कर सकतार् है, संचार्र के अन्तर्गत आते है ।
  6. न्यूमैन एवं समर के दृष्टिकोण में, संचार्र दार् यार् दो से अधिक व्यक्तियों के तथ्यों, विचार्रों तथार् भार्वनार्ओं क पार्रस्परिक अदार्न-प्रदार्न है ।
  7. विल्वर के अनुसार्र संचार्र एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् स्रोत से श्रोतार् तक सन्देश पहुँचतार् है ।

इस प्रकार उपरोक्त परिभार्षार्ओं के विश्लेषण के आधार्र पर निष्कर्ष निकालार् जार् सकतार् है कि संचार्र एक प्रकार की सार्झेदार्री है, जिसमें ज्ञार्न, विचार्रों, अनुभूतियों और सूचनार्ओं क अर्थ समझते हुए पार्रस्परिक आदार्न-प्रदार्न कियार् जार्तार् है । यह सार्झेदार्री प्रेषक और प्रार्प्तिकर्तार् के मध्य होती है। संचार्र में निहित संवार्द क प्रभार्वकारी और अर्थपूर्ण होनार् आवश्यक है । संचार्र हमें एक सूत्र में बार्ँधतार् है। संचार्र को समार्ज-निर्मार्ण की धुरी भी कहार् जार् सकतार् है, जिसे जीवन से परित्यार्ग करने से मनुष्य की भार्वनार्त्मक हार्नि हो सकती है।

संचार्र क महत्व 

संचार्र एक द्वि-मागीय प्रक्रियार् है जहार्ँ पर विचार्रों क आदार्न-प्रदार्न होतार् है । बिनार् संचार्र के मार्नवीय संसार्धनों को गतिमार्न कियार् जार्नार् असंभव है । संचार्र को प्रेषित करने के अनेक मार्ध्यम है । संचार्र को तभी सफल मार्नार् जार् सकतार् है जब प्रेषित सन्देश को प्रार्प्तकर्तार् अर्थनिरूपण कर उसकी प्रतिपुष्टि करें । मार्नवीय जीवन के विभिन्न पहलुओं में संचार्र क अत्यार्धिक महत्व है । संचार्र को व्यार्वहार्रिक तत्व भी मार्नार् जार् सकतार् है क्योंकि एक व्यक्ति क व्यवहार्र दूसरे व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभार्वित करतार् है । प्रशार्सन एवं संगठन में संचार्र केन्द्रीय स्तर पर रहतार् है जो मार्नवीय एवं संगठन की गतिविधयों को संचार्लित करतार् है । सचार्ंर की गतिविधियों को संचार्लित करतार् है । संचार्र के महत्व के सन्दर्भ में यह भी कहार् जार् सकतार् कि विश्व की सभी समस्यार्ओं क कारण एवं समार्धार्न है । प्रभार्वी संचार्र के अभार्व में प्रबन्ध को कल्पनार् तक नहीं की लार् सकती । प्रशार्सन में संचार्र के महत्व को स्वीकारते हुए एल्विन डार्ड लिखते है कि ‘‘संचार्र प्रबन्ध की मुख्य समस्यार् है ।’’ थियो हैमेन क कहनार् है कि ‘‘प्रबन्धकीय कार्यों की सफलतार् कुशल संचार्र पर निर्भर करती है। टेरी के शब्दों में’’ संचार्र उस चिकने पदाथ क कार्य करतार् है जिससे प्रबन्ध प्रक्रियार् सुगम हो जार्ती है। सुओजार्निन के अनुसार्र’ अच्छार् संचार्र प्रबन्ध के एकीकृत दृष्टिकोण हेतु बहुत महत्वपूर्ण है। संचार्र के महत्व को इन बिन्दुओं के सन्दर्भ में भली प्रकार समझार् जार् सकतार् है-

  1. नियोजन एवं संचार्र – नियोजन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रार्थमिक कार्य है लक्ष्य की प्रार्प्ति कुशल नियोजन के प्रभार्वी क्रियार्न्वयन पर निर्भर करती है। संचार्र योजनार् के निर्मार्ण एवं उसके क्रियार्न्वयन दोनों के लिये अनिवाय ह। कुशल नियोजन हेतु अनेक प्रकर की आवश्यक एवं उपयोगी सूचनार्ओं, तथ्यों एवं आँकड़ों और कुशल क्रियार्न्वयन हेतु आदेश, निर्देश एवं मागदर्शन की आवश्यकतार् होती है । 
  2. संगठन एवं संचार्र –अधिकार एवं दार्यित्वों क निर्धार्रण एवं प्रत्यार्योजन करनार् और कर्मचार्रियों को उनसे अवगत करार्नार् संगठन के क्षेत्र में आते है ये कार्य भी बिनार् संचार्र के असम्भव है। बर्नार्ड के शब्दों में’’ संचार्र की एक सुनिश्चित प्रणार्ली की आवश्यकतार् संगठनकर्तार् क प्रथम कार्य है।’’ 
  3. अभिपे्ररणार् एवं संचार्र- प्रबन्धकों द्वार्रार् कर्मचार्रियों को अभिपे्ररित कियार् जार्तार् है, जिसके लिए संचार्र की आवश्यकतार् पड़ती है। ड्रकर के शब्दों में’’ सूचनार्यें प्रबन्ध क एक विशेष अस्त्र है प्रबन्धक व्यक्तियों को हॉकने क कार्य नहीं करतार् वरन वह उनको अभिप्रेरित, निदेर् िशत और संगठित करतार् है। ये सभी कार्य करने हेतु मौखिक अथव लिखित शब्द अथवार् अंकों की भार्षार् ही उसक एकमार्त्र औजार्र होती है ।’’ 
  4. समन्वय एवं संचार्र – समन्वय एक समूह द्वार्रार् किये जार्ने वार्ले प्रयार्सों को एक निश्चित दिशार् प्रदार्न करने हेतु आवश्यक होतार् है । न्यूमैन के अनुसार्र’’ अच्छार् संचार्र समन्यव में सहार्यक होतार् है।’’ कुशिग नार्इलस लिखती है कि समन्वय हेतु अच्छार् संचार्र अनिवायतार् है । बर्नाड के शब्दों में ‘‘ संचार्र वह सार्धन है जिसके द्वार्रार् किसी संगठन में व्यक्तियों को एक समार्न-उद्देश्य की प्रार्प्ति हेतु परस्पर संयोजित कियार् जार् सकतार् है’’ ।
  5. नियन्त्रण एंव संचार्र – नियन्त्रण द्वार्रार् कुशल प्रबंधन यह जार्नने प्रयार्स करतार् है कि कार्य पूर्व निश्चित योजनार्नुसार्र हो रहार् है अथवार् नही ? इसके अतिरिक्त वह त्रुटियों एवं विचलनों को ज्ञार्त कर यथार्शीध्र ठीक करने और उनकी पुनरार्वृत्ति को रोकने क प्रयार्स करतार् है । ये सभी कार्य बिनार् कुशल संचार्र प्रणार्ली के सम्भव नहीं होतार् है । 
  6. निर्णयन एवं संचार्र – सही निर्णयन लेने हेतु प्रबंन्धकों को सही समय पर सही एवं पर्यार्प्त सूचनार्ओं, तथ्यों एवं आंकड़ों क ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् अनिवाय होतार् है । यह कार्य भी बिनार् प्रभार्वी संचार्र प्रणार्ली के सम्भव नही होतार् है । 
  7. प्रभार्वशीलतार् – प्रभार्वी सेवार्एं उपलबध करने के लिये जरूरी है कि स्टार्फ के सदस्यों के बीच विचार्रों एवं मुक्त अदार्न-प्रदार्न बनार् रहे है । किसी संगठन की प्रभार्वशीलतार् इसी बार्त पर निर्भर होती है कि वहार्ं के कर्मचार्री आपस में विचार्रों को कितनार् आदार्न-प्रदार्न करते है और वे एक दूसरे की बार्त कितनी समझते हैं 
  8. न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पार्दन- समस्त विवेकशील प्रबंधकों क लक्ष्य अधिकतम, श्रेष्ठतम् व सस्तार् उत्पार्दन करनार् होतार् है। उत्पार्दकतार् बढाऱ्ने के लिये आवश्यक है कि संगठन में मतभेद न हो, परस्पर सद्भार्व हो , जिसमें संचार्र’ बहुत सहार्यक सिद्ध हुआ है । 

    संचार्र में चरण 

    1. प्रथम चरण:- प्रेषक संदेश को कूटसंकेत करतार् है एवं भेजने के लिये उपयुक्त मार्ध्यम क चयन करतार् है । प्रेषत किये जार्ने सन्देश क प्रेषक मौखिक, अमार्ैि खक अथवार् लिखित रूप में उचित मार्ध्यम से भेजनार् है ।
    2. द्वितीय चरण-प्रेषक दूसरे चरण में सन्देश को भेजतार् है तथार् यह प्रयार्स करतार् है कि सन्देश प्रेषित करते समय किसी भी प्रकार क व्यवधार्न न उत्पन्न हो तथार् प्रार्प्तकर्तार् बिनार् किसी व्यवधार्न के संदेश को समझ सकें ।
    3. तृतीय चरण- प्रार्प्तकर्तार् प्रार्प्त सन्देष क अर्थ निरूपण करतार् है तथार् आवश्यकतार् के अनुसार्र उसकी प्रतिपुष्टि करने क प्रयार्स करतार् है ।
    4. चर्तुथ चरण- प्रतिपुष्टि चरण में प्रार्प्तकर्तार् प्रार्प्त सन्देश क अर्थनिरूपण करने के पश्चार्त् प्रेषक के पार्स प्रतिपुष्टि करतार् है ।

    संचार्र के ढंग

    वर्तमार्न समय में संचार्र की अनेक ढंगों क उपयोग कियार् जार् रहार् है जो कि है –

    1. ज्ञार्पन :- ज्ञार्पन विधि क प्रयोग अधिकतर आन्तरिक संचार्र के लिये कियार् जार्तार् है जहार्ँ पर सदस्यों तथार् सदस्यों से सम्बन्धित फर्म के मध्य संक्षिप्त रूप में सूचनार् क अदार्न-प्रदार्न होतार् है। 
    2. पत्र :-वार्हय संचार्र के अधिकतर पत्रों के मार्ध्यमों से सूचनार् अथवार् सन्देश क आदार्न-प्रदार्न कियार् जार्तार् है । यथार्-आदेश, व्यार्पार्र से सम्बन्धित अभिलेख इत्यार्दि।
    3. फैक्स :- फैक्स भी संचार्र की विधि है जिसके द्वार्रार् त्वरित संन्देश प्रार्प्तकर्तार् तक पहुँचतार् है ।
    4. र्इ-मेल :- सूचनार्ओं को हस्तार्ंतरित करके के लिये र्इ-मेल के द्वार्रार् त्वरित एवं सुविधार्जनक रूप में सन्देश को प्रेषित कियार् जार्तार् है ।
    5. सूचनार् :- सूचनार् भी संचार्र की एक प्रविधि है । उदार्हरण के लिये किसी संगठन में कर्मचार्रियों को उनसे सम्बन्धित रोजगार्र, सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य, नियम, कानून तथार् कल्यार्णकारी सुविधार्यें सूचनार्ओं द्वार्रार् प्रदार्न की जार्ती है । 
    6. सार्रार्ंश :- सार्रार्ंश प्रविधिक प्रयोग संचार्र के लिये अधिकतर मींिटंग में कियार् गयार् जार्तार् है।
    7. प्रतिवेदन :- प्रतिवेदन भी संचार्र की एक प्रविधि है यथार् वित्तीय प्रतिवेदन, समितियों की सिफार्रिशें, प्रौधोगिकी प्रतिवेदन इत्यार्दि । 
    8. दूरभार्ष :- मौखिक संचार्र के लिये दूरभार्ष क प्रयोग कियार् जार्तार् है । दूरभार्ष प्रविधि क प्रयोग वहार्ँ पर अधिक कियार् जार्तार् है जहार्ँ पर आमने-सार्मने सम्पर्क स्थार्पित नहीं हो पार्तार् है । 
    9. सार्क्षार्त्कार :- सार्क्षार्त्कार प्रविधि क प्रयोग कर्मचार्रियों के चयन उनकी प्रोन्नति तथार् व्यक्तिगत विचार्र विमर्श के लिये कियार् जार्तार् है । 
    10. रेडियो :- एक निश्चित आवृत्ति पर रेडियो के द्वार्रार् संचार्र को प्रेषित कियार् जार्तार् है । 
    11. टी0वी0 :- टी0वी0 क भी प्रयोग संचार्र के लिये कियार् जार्तार् है । जिसे एक उचित नेटवर्क के द्वार्रार् देखार् व सुनार् जार्तार् है । 
    12. वीडियों कान्फ्रेन्सिंग :- वर्तमार्न समय में वीडियो कान्फ्रेन्सिंग एक महत्वपूर्ण विधि है । जिसमें फोन के तार्र के द्वार्रार् वीडियों के सार्थ आवार्ज को सुनार् जार् सकतार् है । इसके अतिरिक्त योजनार्, चित्र, नक्शार्, चाट, ग्रार्फ आदि ऐसे ढंग है जिससे संचार्र को प्रेषित कियार् जार्तार् है ।

    संचार्र में कारक 

    संचार्र में कारकों को मुख्य दो भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है । एक वे कारक जो संचार्र को प्रभार्वी बनार्ने में सहार्यक होते है दूसरे जैसे कारक जो कि संचार्र व्यवस्थार् में नकारार्त्मक भूमिक निभार्ते है। संचार्र को प्रोत्सार्हित करने वार्ले कारक है :-

    1. विषय क ज्ञार्न: – संचार्रक को संचार्रित किये जार्ने वार्ले विषय की पूरी जार्नकारी होनी आवश्यक है। विषय के गहन अध्ययन के अभार्व में संचार्र सफल नहीं हो सकतार् है। 
    2. संचार्र कौशल: – संचार्र प्रक्रियार् के दो महत्वपूर्ण पहलू है संकेतीकरण एवं संकेत को समझनार्। संकेतीकरण के अन्तर्गत लेखन एवं वार्क्शक्ति आते है तथार् संकेत के अर्थनिरूपण में पठन एवं श्रवण जैसी विधार्ए शार्मिल है । इसके अतिरिक्त सोचनार् तथार् तर्क करनार् सफल संचार्र के लिये आवश्यक है ।
    3. संचार्र मार्ध्यमों क ज्ञार्न: – संचार्र कार्य विन्नि मार्ध्यमों से सम्पन्न होतार् है । संचार्र मार्ध्यमों की प्रकृति, प्रयोज्यतार् एवं उपयोग की विधि के विषय में संचार्रक को ज्ञार्न होनार् चार्हिए । 
    4. रूचि: – किसी भी कार्य के सफल क्रियार्न्वयन के लिये आवश्यक है कि कार्यकर्तार् अपने कार्य में रूचि ले तथार् पूरी तन्मयतार् के सार्थ उसक निर्वार्ह करें । रूचिपूर्वक कार्य सम्पार्दित करके संचार्रक न केवल अपनी उन्नति के द्वार्र खोलनार् है बल्कि दूसरों की प्रगति क मागदर्शक भी बनतार् है । 
    5. अभिवृत्ति – हर व्यक्ति की अपने कार्य, स्थल तथार् सहकर्मियों के प्रति कुछ अभिवृत्तियार्ँ होती है । ये अभिवृत्तियार्ँ व्यक्ति की कार्य-सम्पार्दन शैली को प्रभार्वित करती है । यदि संचार्रक अपने कार्य, कार्य-स्थल, सहकर्मियों तथार् संचार्र ग्रहणकर्तार् के प्रति आस्थार्वार्न हो और सार्मार्न्य सौहादपूर्ण अभिवृत्ति रखतार् हो तो वह निश्चित रूप में अपने कार्य में सफल होगार् । 
    6. विश्वसनीयतार् – विश्वसनीयतार् संचार्रक क अति महत्वपूर्ण गुण है । संचार्रक के प्रति विश्वसनीयतार् सन्देश ग्रार्ºयतार् में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ती है । संचार्रक के प्रति ग्रहणकर्तार्ओं में जितनार् ही अटूट विश्वार्स होगार्, ग्रहणकर्तार् उतनी ही तत्परतार्, तन्मयतार् तथार् सम्पूर्णतार् के सार्थ सन्देश को ग्रहण करेगें । 
    7. अच्छार् व्यवहार्र – संचार्रक की भूमिक एक माग-दर्शक की होती है । ग्रहणकर्तार् के सार्थ उसक अच्छार् व्यवहार्र सफल संचार्र-सम्बन्ध को स्थार्पित कर सकतार् है ।
    8. संदेश स्पष्ट एवं सरल होने चार्हिये । संचार्र व्यवस्थार् में नकारार्त्मक भूमिक को निभार्ने वार्ले कारक निम्न है :- 1. उपयुक्त एवं उचित संचार्र प्रक्रियार् क आभार्व 2. वैधार्निक सीमार्यें एवं अनुपयुक्त संचार्र नीति 3. अनुपयुक्त वार्तार्वरण 4. उचित रणनीति क आभार्व 5. सरल एवं स्पष्ट भार्षार् क आभार्व 6. प्रेरणार् क आभार्व 7. संचार्र कुशलतार् क आभार्व 

    संचार्र-प्रक्रियार् एवं तत्व 

    संचार्र एक द्विमागीय प्रक्रियार् है जिसमें दो यार् दो से अधिक लोगों के बीच विचार्रों, अनुभवों, तथ्यों तथार् प्रभार्वों क प्रेषण होतार् है । संचार्र प्रक्रियार् में प्रथम व्यक्ति संदेश स्रोत (Source) यार् प्रेषक (Sender) होतार् है । दूसरार् व्यक्ति संदेश को ग्रहण करने वार्लार् अर्थार्त प्रार्प्तकर्तार् यार् ग्रहणकर्तार् होतार् है । इन दो व्यक्तियों के मध्य संवार्द यार् संदेश होतार् है जिसे प्रेषित एवं ग्रहण कियार् जार्तार् है प्रेषित किये शब्दों से तार्त्पर्य ‘अर्थ’ से होतार् है तथार् ग्रहणकर्तार् शब्दों के पीछे छिपे ‘अर्थ’ को समझने के पश्चार्त् प्रतिक्रियों व्यक्त करतार् है। सार्मार्न्यत: संचार्र की प्रक्रियार् तीन तत्वों क्रमश: प्रेषक (Sender) सन्देश (Message) तथार् प्रार्प्तकर्तार् (Reciver) के मार्ध्यम से सम्पन्न होती है। किन्तु इसके अतिरिक्त सन्देश प्रेषक को किसी मार्ध्यम की भी आवश्यकतार् होती है जिसकी सहार्यतार् से वह अपने विचार्रों को प्रार्प्तिकर्तार् तक पहुंचार्तार् है।

    अत: कहार् जार् सकतार् है कि संचार्र प्रक्रियार् में अर्थों क स्थार्नार्न्तरण होतार् है । जिसे अन्त: मार्नव संचार्र व्यवस्थार् भी कह सकते है। एक आदर्श संचार्र-प्रक्रियार् के प्रार्रूप को  समझार् जार् सकतार् है :-

    1. स्रोत/प्रेषक . संचार्र प्रक्रियार् की शुरूआत एक विशेष स्रोत से होतार् है जहार्ं से सूचनाथ कुछ बार्ते कही जार्ती है। स्रोत से सूचनार् की उत्पत्ति होती है और स्रोत एक व्यक्ति यार् व्यक्तियों क समूह भी हो सकतार् है। इसी को संप्रेषक कहार् जार्तार् है । 
    2. सन्देश . प्रक्रियार् क दूसरार् महत्वपूर्ण तत्व सूचनार् सन्देश है। सन्देश से तार्त्पर्य उस उद्दीपन से होतार् है जिसे स्रोत यार् संप्रेषक दूसरे व्यक्ति अर्थार्त सूचनार् प्रार्प्तकर्तार् को देतार् है। प्रार्य: सन्देश लिखित यार् मौखिक शब्दों के मार्ध्यम से अन्तरित होतार् है । परन्तु अन्य सन्देश कुछ अशार्ब्दिक संकेत जैसे हार्व-भार्व, शार्रीरिक मुद्रार्, शार्रीरिक भार्षार् आदि के मार्ध्यम से भी दियार् जार्तार् है । 
    3. कूट संकेतन . कूट संकेतन संचार्र प्रक्रियार् की तीसरार् महत्वपूर्ण तथ्य है जसमें दी गयी सूचनार्ओं को समझने योग्य संकेत में बदलार् जार्तार् है । कूट संकेतन की प्रक्रियार् सरल भी हो सकती है तथार् जटिल भी । घर में नौकर को चार्य बनार्ने की आज्ञार् देनार् एक सरल कूट संकेतन क उदार्हरण है लेकिन मूली खार्कर उसके स्वार्द के विषय में बतलार्नार् एक कठिन कूट संकेतन क उदार्हरण है क्योंकि इस परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति (स्रोत) अपने भार्व को उपयुक्त शब्दों में बदलने में असमर्थ पार्तार् है। 
    4. मार्ध्यम . मार्ध्यम संचार्र प्रक्रियार् क चौथार् तत्व है । मार्ध्यम से तार्त्पर्य उन सार्धनों से होतार् है जिसके द्वार्रार् सूचनार्ये स्रोत से निकलकर प्रार्प्तकर्तार् तक पहुँचती है । आमने सार्मने क विनियम संचार्र प्रक्रियार् क सबसे प्रार्थमिक मार्ध्यम है । परन्तु इसके अलार्वार् संचार्र के अन्य मार्ध्यम जिन्हें जन मार्ध्यम भी कहार् जार्तार् है, भी है । इनमें दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, समार्चार्रपत्र, मैगजीन आदि प्रमुख है । 
    5. प्रार्प्तिकर्तार् . प्रार्प्तकर्तार् से तार्त्पर्य उस व्यक्ति से होतार् है । जो सन्देश को प्रार्प्त करतार् है । दूसरे शब्दों में स्रोत से निकलने वार्ले सूचनार् को जो व्यक्ति ग्रहण करतार् है, उसे प्रार्प्तकर्तार् कहार् जार्तार् है । प्रार्प्तकर्तार् की यह जिम्मेदार्री होती है कि वह सन्देश क सही -सही अर्थ ज्ञार्त करके उसके अनुरूप कार्य करे । 
    6. अर्थपरिवर्तन . अर्थपरिवर्तन संचार्र प्रक्रियार् क छठार् महत्वपूर्ण पहलू है । अर्थपरिर्वन वह प्रक्रियार् है जिसके मार्ध्यम से सूचनार् में व्यार्प्त संकेतों के अर्थ की व्यार्ख्यार् प्रार्प्तकर्तार् द्वार्रार् की जार्ती है । अधिकतर परिस्थिति में संकेतों क सार्धार्रण ढंग से व्यार्ख्यार् करके प्रार्प्तकर्तार् अर्थपरिवर्तन कर लेतार् है परन्तु कुछ परिस्थिति में जहार्ं संकेत क सीधे-सीधे अर्थ लगार्नार् कठिन है । अर्थ परिवर्तन एक जठिल एवं कठिन कार्य होतार् है । 
    7. प्रतिपुष्टि . संचार्र क सार्तवार्ँ तत्व है । प्रतिपुष्टि एक तरह की सूचनार् होती है जो प्रार्प्तिकर्तार् की ओर से स्रोत यार् संप्रेषक को प्रार्प्त स्रोत है। जब स्रोत को प्रार्प्तकर्तार् से प्रतिपुष्टि परिणार्म ज्ञार्न की प्रार्प्ति होती है । तो वह अपने द्वार्रार् संचरित सूचनार् के महत्व यार् प्रभार्वशीलतार् को समझ पार्तार् है । प्रतिपुष्टि के ही आधार्र पर स्रोत यह भी निर्णय कर पार्तार् है कि क्यार् उसके द्वार्रार् दी गयी सूचनार् में किसी प्रकार क परिमाजन की जरूरत है यहार्ँ ध्यार्न देने वार्ली बार्त यह है कि केवल द्विमागी संचार्र में प्रतिपुष्टि तत्व पार्यार् जार्तार् है । 
    8. आवार्ज – संचार्र प्रक्रियार् में आवार्ज भी एकतत्व है यहॉं आवार्ज से तार्त्पर्य उन बार्धार्ओं से होतार् है जिसके कारण स्रोत द्वार्रार् दी गयी सूचनार् को प्रार्प्तकर्तार् ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पार्तार् है यार् प्रार्प्तकर्तार् द्वार्रार् प्रदत्त पुनर्निवेशत सूचनार् के स्रोत ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पार्तार् है । अक्सर देखार् गयार् है कि स्रोत द्वार्रार् दी गर्इ सूचनार् को व्यक्ति यार् प्रार्प्तकर्तार् अनार्वश्यक शोरगुल यार् अन्य कारणों से ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पार्तार् है । इससे संचार्र की प्रभार्वशार्ली कम हो जार्ती है । 

    उपरोक्त सभी तत्व एक निश्चित क्रम में क्रियार्शील होते है और उस क्रम को संचार्र क एक मौलिक प्रार्रूप कहार् जार्त है ।

    संचार्र नेटवर्क 

    संचार्र नेटवर्क (Wheel Network)– संचार्र नेटवर्क से तार्त्पर्य किसी समूह के सदस्यों के बीच विभिन्न पैटर्न से होती है । संचार्र नेटवक्र क अध्ययन लिमिट्ट, तथार् शॉ द्वार्रार् कियार् गयार् है । लिमिट्ट तथार् शॉ द्वार्रार् किये अध्ययन के आधार्र पर पार्ँच तरह के संचार्र नेटवर्क को पहचार्न की गयी है । संचार्र नेट वर्क इस प्रकार है ।

    1. चक्र नेटवर्क –

    इस तरह के नेटवर्क में समूह में एक व्यक्ति ऐसार् होतार् है जिसकी स्थिति अधिक केन्द्रित होती है । उसे लोग समूह के नेतार् के रूप में प्रत्यक्षण करते है ।

    चक्र नेटवर्क

    2. श्रंखलार् नेटवर्क – 

    श्रंखलार् नेटवर्क में समूह क प्रत्येक सदस्य अपने निकटमत सदस्य के सार्थ ही कुछ संचार्र कर सकतार् हे । इस तरह के नेटवर्क में सूचनार् ऊपरी तथार् निचली किसी भी दिशार् में प्रवार्हित हो सकती है।

    श्रंखलार् नेटवर्क

    3. वृत्त नेटवर्क – 

    इस तरह के नेटवर्क में समूह क कोर्इ सदस्य केन्द्रित स्थिति में नहीं होतार् तथार् संचार्र सभी दशार्ओं में प्रवार्हित होतार् है।

    वृत्त नेटवर्क

    4. वाइ नेटवर्क – 

    वाइ नेटवर्क एक केन्द्रित नेटवर्क होतार् है जिसमें व्यक्ति ऐसार् होतार् है जो अन्य व्यक्तियों की तुलनार् में अधिक महत्वपूर्ण होतार् है।

    वाइ नेटवर्क

    5. कमकन नेटवर्क  –

    कमकन नेटवर्क एक तरह क खुलार् संचार्र होतार् है जसमें समूह क प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्य से सीधे संचार्र स्थार्पित कर सकतार् है ।

    कमकन नेटवर्क

    संचार्र, सोच-विचार्र करने की प्रक्रियार् के रूप में 

    संचार्र की प्रक्रियार् संचार्रक, सन्देश, संचार्र मार्ध्यम, प्रार्प्तकर्तार् तत्वों से मिलकर पूर्ण होती है। संचार्र प्रक्रियार् में संचार्रक महत्वपूर्ण बिन्दु होतार् है जिसे प्रार्रम्भ बिन्दु भी कहार् जार् सकतार् है। किसी तथ्य यार् सत्य को प्रस्तुत करनार् और लोगों को उसके द्वार्रार् प्रभार्वित करनार् अत्यन्त चुनौती भरार् तथार् दार्यित्वपूर्ण कृत्य है। संचार्रक क कर्तव्य सार्मार्जिक जिम्मेदार्रियों से परिपूर्ण होतार् है उसकी प्रस्तुति मार्त्र तथ्यों, विचार्रों, सूचनार्ओं को प्रेषित ही नहीं करती वरन् लोगों को परिवर्तन की ओर अग्रसर होने को उत्पे्ररित करती है। अत: संचार्रक को सोच-विचार्र के कार्य करनार् पड़तार् है संचार्रक को संतुलित व्यक्तित्व क होनार् चार्हिए, उसे अपने विषय क विस्तृत, विविध संचार्र मार्ध्यमों क ज्ञार्न, विवेकपूर्ण निर्णय करने की क्षमतार् तथार् अपने काम के प्रति रूचि व र्इमार्नदार्री होनी चार्हिये।

    संचार्र एक सुनियोजित एवं व्यवस्थित प्रक्रियार् है। जिसके लिए सोच-विचार्र से परिपूर्ण पूर्व नियोजित कार्यक्रम महत्वपूर्ण है  संचार्रक विषय क जन्मदार्तार् होने कारण संचार्र प्रक्रियार् प्रार्रम्भ करने से पूर्व उसे कर्इ महत्वपूर्ण निर्णय लेने होते है जो कि है :-

    1. सन्देश क चयन
    2. सन्देश की विवेचनार् 
    3. संचार्र मार्ध्यम क चयन 
    4. प्रार्प्तकर्तार् क चयन 

    संचार्र प्रक्रियार् में संचार्रक क प्रथम कार्य संदेश यार् उसकी विषय वस्तु क चयन करनार् होतार् है। यह कार्य प्रार्य: मार्नसिक धरार्तल पर प्रार्रम्भ होतार् है एतदर्थ गहन सोच-विचार्र आवश्यक है। सन्देश की विषय-वस्तु महत्वपूर्ण, उपयोगी, समसार्मयिक तथार् सर्वार्नुकूल होने के सार्थ रूचिकर भी होनी चार्हिए।

    विषय-वस्तु के चयन के पश्चार्त् विषय-वस्तु की विवेचनार् अर्थार्त् उसकी प्रस्तुति तथार् उसक प्रतिपार्दन महत्वपूर्ण चरण होतार् है। प्रस्तुति सदैव सजीव एवं आकर्षक होनी चार्हिये जो लोगों को सहज आकर्षित कर सके। संचार्रक को अपनी बार्त नपे तुले शब्दों में प्रस्तुत करनी चार्हिए। विषयवस्तु के विभिन्न पक्षों को बतार्ने के पश्चार्त् सभी बिन्दुओं को समेटते हुए संदेश क समार्पन करनार् चार्हिये जिससे पूरी प्रस्तुति एक सूत्र में बँध जार्ये। सार्थ ही, संचार्र मे प्रतिपुष्टि के महत्व को देखते हुए, संचार्रक को प्रार्प्तकर्तार् के विचार्र यार् जिज्ञार्सार् को आमन्त्रित करनार् चार्हिये।

    संचार्र मार्ध्यम में लोकमार्ध्यम जैसे- लोकगीत, लोकनार्टक, लोक नृत्य, कठपुतली इत्यार्दि तथार् आधुनिक मार्ध्यम में रेडियो, टेलीविजन, समार्चार्र पत्र पत्रिकायें, फिल्म पोस्टर, विज्ञार्पन, इत्यार्दि क चयन संचार्रक के लिए महत्वपूर्ण होतार् है। सफल संचार्र-प्रक्रियार् के लिए आवश्यक है कि संचार्रक संचार्र के मार्ध्यमों क चयन सोच-विचार्र के करे।

    संचार्र को प्रार्प्त करने वार्ले प्रार्य: संचार्र मार्ध्यम से सम्बद्ध होते है। सन्देश प्रेषण के लिए सन्देश की भार्षार् और जार्नकारियों क स्तर सार्मार्न्य होनार् चार्हिये। यदि सन्देश स्तरीय हो तो सन्देश मार्ध्यम के द्वार्रार् ज्ञार्नवार्न प्रार्प्तकर्तार्ओं क चयन कियार् जार्नार् चार्हिये।

    इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संचार्रक ही वह मुख्य केन्द्र बिन्दु होतार् है जो संचार्र प्रक्रियार् को सफल बनार् सकतार् है। संचार्रक द्वार्रार् सोच-विचार्र कर कियार् गयार् संचार्र ताकिक एवं व्यवस्थित होतार् है। अत: संचार्र प्रक्रियार् में ताकिक सोच-विचार्र बिंदु सफल संचार्र क द्योतक है।

    संचार्र प्रेषण के रूप में 

    संचार्र एक द्विमागीय प्रक्रियार् है जिसमें प्रेषक सूचनार् को प्रार्त्तकर्तार् के पार्स भेजतार् है तथार् प्रार्प्तकर्तार् प्रार्प्त सूचनार् की प्रतिपुष्टि करतार् है। संचार्र प्रक्रियार् में पे्रषण महत्वपूर्ण योगदार्न होतार् है। यह एक ऐसी क्रियार् है जिसमें प्रेषक द्वार्रार् भेजी गयी सूचनार् मार्ध्यमों से पे्रषित होकर प्रार्प्तकर्तार् को प्रार्प्त होती है। संचार्र और प्रेषण को यदि अलग-अलग रूप में परिभार्षित कियार् जार्ये तो संचार्र संकेतो के द्वार्रार् प्रेषित होकर प्रार्प्त की जार्ती है जबकि प्रेषण में सूचनार् को केवल भेजार् जार्तार् है उसकी प्रतिपुष्टि नहीं हो पार्ती है।

    इसलिए प्रेषण को एक मागीय क्रियार् मार्नार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए मोबार्इल, फोन के द्वार्रार् संचार्र की प्रक्रियार् द्विमागीय होती है जिसमें संचार्रक तथार् प्रार्प्तकर्तार् दोनों सूचनार् क आदार्न-प्रदार्न करते है। जबकि रेडियों, टेलीविजन, जनसंचार्र के ऐसे मार्ध्यम है, जिससे सूचनार् को प्रेषित कियार् जार्तार् है परन्तु उसकी प्रतिपुष्टि नहीं हो पार्ती है। संचार्र प्रक्रियार् में प्रेषण के लिए उपयुक्त मार्ध्यम की आवश्यकतार् होती है जिससे कि प्रार्प्तकर्तार् बिनार् किसी अवरोध के सन्देश को प्रार्प्त कर सके। यह तभी सम्भव है जब संचार्रक उचित मार्ध्यम क चयन करे। प्रेषण के लिए आवश्यक है कि संचार्रक आमने-सार्मने के सम्बन्ध के द्वार्रार् यार् पत्र द्वार्रार् यार् टेलीफोन द्वार्रार् यार् फैक्स के द्वार्रार् संचार्र करें। एक शिक्षक लिए आवश्यक है कि वह अच्छार् लिखे बल्कि यह भी जरूरी है कि मौखिक संचार्र तथार् उसके हार्व-भार्व सभी एक सार्थ मिलकर के पढ़ाइ को अत्यधिक प्रभार्वी बनार् सकते हैं।

    संचार्र एक सार्ंस्कृतिक उत्पार्दक के रूप में 

    संचार्र एक सुनियोजित प्रक्रियार् है। इसके निमित सूझ-बूझ से परिपूर्ण पूर्व नियोजित कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। संचार्रक यार् प्रेषक इस प्रक्रियार् क केन्द्र बिन्दु होतार् है। संचार्र को प्रार्रम्भ करने से पूर्व कर्इ महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते  है जो संचार्र को प्रभार्वी बनार्तार् है।

    प्रत्येक व्यक्ति सार्मार्जिक बन्धनों और सार्ंस्कृतिक रीति-रिवार्जों, विश्वार्स के दार्यरे में बंधार् रहतार् है ये सब उसके जीवन में आदत क रूप धार्रण कर लेते है संचार्रक क यह कर्तव्य होतार् है कि जब कोर्इ सन्देश प्रेषित करे तो व्यक्ति के सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक विश्वार्सों क किसी प्रकार से हनन न हो। सन्देशों में सार्ंस्कृतिक मार्न्यतार्ओं के प्रति अनुरूपतार् होनी चार्हिये। किसी भी सार्ंस्कृतिक मार्न्यतार् को स्पष्ट रूप से गलत यार् बुरार् कहनार् संचार्र प्रक्रियार् में बार्धक हो सकतार् है। इनमें यदि परिवर्तन लार्नार् हो तो परोक्ष तरीकों को अपनार्यार् जार्नार् चार्हिये। संस्कृति ही एक ऐसार् मार्ध्यम होती है जो हमें नैतिकतार् क ज्ञार्न करार्ती है। संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर हस्तार्ंतरित होती रहती है। संस्कृति के द्वार्रार् ही मनुष्य मूल्यवार्न होतार् है। सार्ंस्कृतिक अवमूल्यन की स्थिति में हस्तार्ंतरण की प्रक्रियार् अवरूद्ध हो जार्ती है। सार्ंस्कृतिक हस्तार्ंतरण के लिये एक उपयुक्त भार्षार् की आवश्यकतार् होती है। वार्चक अथवार् लिखित प्रार्रूप के द्वार्रार् संस्कृति निरन्तर आगे बढ़ती है। जिसके लिए एक उचित संचार्र मार्ध्यम की आवश्यकतार् पड़ती है।

    संचार्रक द्वार्रार् पे्रषित कियार् जार्ने वार्लार् सन्देश जन सार्मार्न्य अथवार् समार्ज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभार्वित करतार् है अत: ऐसार् प्रयार्स होनार् चार्हिये कि जिससे सार्ंस्कृतिक मार्न्यतार्यें एवं विश्वार्स प्रभार्वित न हों। संचार्र सार्मार्जिक, परिवर्तन के लिए आवश्यक है। संचार्र प्रक्रियार् में दो यार् दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचार्रों, अनुभूतियों, ज्ञार्न, विश्वार्सों, मूल्यों, भार्वनार्ओं क प्रभार्वकारी आदार्न-प्रदार्न है। संचार्र में निहित संवार्द क प्रभार्वकारी और अर्थपूर्ण होनार् आवश्यक है। प्रेषक जिस भार्वाथ के सार्थ सन्देश प्रेषित कियार् जार्तार् है ग्रहणकर्तार् द्वार्रार् उस शब्द को उसी भार्वाथ के सार्थ ग्रहण किये जार्ने पर संचार्र सफल होतार् है। लोग संचार्र के मार्ध्यम से दूसरों के विचार्रों, मार्न्यतार्ओं और व्यवहार्र में परिवर्तन लार्ने की चेष्टार् करते हैं।

    पार्रस्परिक प्रक्रियार्यें लोगों को एक-दूसरे को समीप लार्ती है तथार् एक दूसरे को समझने में सहार्यतार् प्रदार्न करती है। मार्नवीय संबंधों, मार्नवीय मूल्यों, मार्नवीय विश्वार्सों को सुरक्षार् प्रदार्न करने तथार् संस्थार्पित करने में संचार्र महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है। जिस प्रकार सार्मार्जिक सम्बन्धों, मूल्यों, विश्वार्सों, परम्परार्ओं तथार् संस्कृति के बिनार् जीवन की परिकल्पनार् नहीं की जार् सकती है, ठीक उसी प्रकार संचार्र जीवन के सार्थ प्रार्रंभ होतार् है तथार् जीवन की समार्प्ति के सार्थ समार्प्त होतार् जार्तार् है। मनुष्य को सार्मार्जिक प्रार्णी बनार्ने में तथार् उसे यथोचित स्थार्न दिलार्ने में जो स्थार्न संस्कृति क है वहीं स्थार्न संचार्र क है। सच मार्नार् जार्ए तो सभ्यतार् एवं संस्कृति क उद्भव एवं विकास वार्स्तव में संचार्र क उद्भव एवं विकास है। हमार्री सार्मार्जिक मार्न्यतार्यें, आस्थार् एवं विश्वार्स, रीति-रिवार्ज जैसी धरोहरें संचार्र के मार्ध्यम से ही निरन्तरतार् बनार्ये हुए हैं। तार्त्पर्य यह है कि संचार्र में अपनार् अस्तित्व बनार्ये रखने के लिए मनुष्य को संचार्र क आधार्र प्रार्प्त है और संचार्र के अभार्व में मनुष्य के अस्तित्व की कल्पनार् भी नहीं की जार् सकती है।

    प्रभार्वी संचार्र की विशेषतार्एँ

    1. संचार्र क उद्देश्य स्पष्ट होनार् चार्हिए 
    2. संचार्र की भार्षार् बोधगम्य, सरल व आसार्नी से समझ में आने वार्ली होनी चार्हिये । 
    3.  संचार्र यथार् सम्भव स्पष्ट एवं सभी आवश्यक बार्तों से युक्त होनार् चार्हिए । 
    4. संचार्र प्रार्प्तकर्तार् की प्रत्यार्शार् के अनुरूप होने चार्हिए । 
    5. संचार्र यथार्समय अर्थार्त् सही समय पर होनार् चार्हिये । 
    6. संचार्र पे्रषित करने के पूर्व सम्बन्धित विषय में पूर्ण जार्नकारी क ज्ञार्न होनार् आवश्यक है । 
    7. संचार्र करने से पूर्व परस्पर विश्वार्स स्थार्पित करनार् आवश्यक है । 
    8. संचार्ार्र में लोचशीलतार् होनी चार्हिये अर्थार्त् आवश्यकतार्नुसार्र उसमें परिवर्तन कियार् जार् सके । 
    9. संचार्र को प्रभार्वी बनार्ने के लिये उदार्हरणों तथार् श्रव्य दृश्य सार्धनों क प्रयोग कियार् जार्नार् चार्हिए । 
    10. विलम्बकारी प्रवृत्तियों अथवार् प्रतिक्रियार्ओं को व्यवहार्र में नहीं लार्नार् चार्हिए । संचार्र सन्देशों की एक निरन्तर श्रंखलार् होनी चार्हिये । 
    11. एक मागीगीय संचार्र की अपेक्षार् द्विमागीय संचार्र श्रेष्ठ होतार् है । 
    12. सन्देश प्रेषित करते समय ऐसार् प्रयार्स कियार् जार्नार् चार्हिये कि सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक विश्वार्सों पर किसी प्रकार क कुठार्रार्घार्त न हो । 
    13. संचार्र हमेशार् लार्भप्रद होनार् चार्हिये क्योकि मनुष्य क स्वभार्व है कि किसी भी बार्त में लार्भप्रद सम्भार्वनार्ओं को देखतार् है । 
    14.  संचार्र में प्रयोग की जार्ने वार्ली विधियार्ँ यार् कार्य खर्चीले नहीे होने चार्हिये अर्थार्त मितव्यियतार् के सिद्धार्न्त क पार्लन करनार् चार्हिए । 
    15.  संचार्र में विभार्ज्यतार् क गुण होनार् चार्हिये क्योंकि प्रेषित सन्देश क उद्ेश्य पूरे समुदार्य यार् वर्ग के कल्यार्ण में निहित होतार् है । 
    16. संचार्र बहुहितकारी होनार् चार्हिये अर्थार्त बहुजन हितार्य बहुजन सुखार्य की भार्वनार् होनी चार्हिये ।

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