संघर्ष क अर्थ, परिभार्षार् एवं प्रकार

संघर्ष मार्नव सम्बन्धों में सतत रहने वार्ली एक प्रक्रियार् है। जब व्यक्ति व्यक्ति के बीच सहयोग नहीं होतार् अथवार् जब वे एक दूसरे के प्रति तटस्थ भी नहीं होते, तो संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो ही जार्ती है। संघर्ष को समार्ज में अस्वार्भार्विक भी नहीं कहार् जार् सकतार् क्योंकि जब सीमित लक्ष्यों को अनेक व्यक्ति प्रार्प्त करनार् चार्हें तो संघर्ष स्वार्भार्विक ही है।

Conflict शब्द लेटिन भार्षार् के Con+Fligo से मिलकर बनार् है Con क अर्थ है together तथार् Fligo क अर्थ है-To Strike. अत: संघर्ष क अर्थ है-लड़नार्, प्रभुत्व के लिए संघर्ष करनार्, विरोध करनार्, किसी पर काबू पार्नार् आदि। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार्र-दो वर्गों में यार् समूहों के बीच सशस्त्र प्रतिरोध, लड़ाइ यार् युद्ध संघर्ष है। विपरीत सिद्धार्न्तों, कथनों, तर्कों आदि सेविरोध भी संघर्ष है तथार् विचार्रों, मतों और पसन्द के बीच असार्मंजस्यपूर्ण व्यवहार्र भी संघर्ष है।गिलीन एवं गिलीन के अनुसार्र-संघर्ष वह सार्मार्जिक प्रक्रियार् है, जिसमें व्यक्ति अथवार् समूह अपने उद्देश्यों को प्रार्प्त करने के लिए विरोधी के प्रति प्रत्यक्ष हिंसार् यार् हिंसार् की धमकी क प्रयोग करते ह®। अर्थार्त् किसी सार्ध्य प्रार्प्ति हेतु किये जार्ने वार्ले संघर्ष की प्रकृति में ही विरोधी के प्रति घृणार् और हिंसार् की भार्वनार् विद्यमार्न होती है। प्रो. ग्रीन के अनुसार्र-’’संघर्ष जार्नबूझकर कियार् गयार् वह प्रयत्न है, जो किसी की इच्छार् क विरोध करने, उसके आड़े आने अथवार् उसको दबार्ने के लिए कियार् जार्तार् है।’’ अर्थार्त् ग्रीन ने हिंसार् व आक्रमण के सार्थ उत्पीड़न को भी संघर्ष क एक प्रमुख तत्त्व स्वीकार कियार् है। किंग्सले डेविस ने प्रतिस्पर्धार् को ही संघर्ष मार्नार् है। उनके अनुसार्र प्रतिस्पर्धार् व संघर्ष में केवल मार्त्रार् क ही अन्तर है।

संघर्ष की विशेषतार्एँ

संघर्ष के लिए दो यार् दो से अधिक व्यक्तियों यार् समूहों क होनार् जरूरी है जो एक-दूसरे के हितों को हिंसार् की धमकी, आक्रमण, विरोध यार् उत्पीड़न के मार्ध्यम से चोट पहुँचार्ने की कोशिश करते हैं।

  1. संघर्ष एक चेतन प्रक्रियार् है जिसमें संघर्षरत व्यक्तियों यार् समूहों को एक-दूसरे की गतिविधियों क ध्यार्न रहतार् है। वे अपने लक्ष्य की प्रार्प्ति के सार्थ-सार्थ विरोधी को माग से हटार्ने क प्रयत्न भी करते हैं।
  2. संघर्ष एक वैयक्तिक प्रक्रियार् है। इसक तार्त्पर्य यह है कि संघर्ष में ध्यार्न लक्ष्य पर केन्द्रित न होकर प्रतिद्विन्द्वयों पर केन्द्रित हो जार्तार् है।
  3. संघर्ष एक अनिरन्तर प्रक्रियार् है। इसक अर्थ यह है कि संघर्ष सदैव नहीं चलतार् बल्कि रूक-रूक कर चलतार् है। इसक कारण यह है कि संघर्ष के लिए शक्ति और अन्य सार्धन जुटार्ने पड़ते हैं जो किसी भी व्यक्ति यार् समूह के पार्स असीमित मार्त्रार् में नहीं पार्ए जार्ते। कोर्इ भी व्यक्ति यार् समूह सदैव संघर्षरत नहीं रह सकते हैं। 
  4. संघर्ष एक सावभौमिक प्रक्रियार् है। इसक तार्त्पर्य यह है कि संघर्ष किसी न किसी रूप में प्रत्येक समार्ज और प्रत्येक काल में कम यार् अधिक मार्त्रार् में अवश्य पार्यार् जार्तार् है। 
  5. समार्ज की रचनार् इस तरह की होती है जिसमें व्यक्तियों व समूहों में विभिन्न स्वाथ और हित होते हैं। व्यक्ति और समूह अपने हित की पूर्ति के लिए प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष रूप से संघर्ष करते रहते हैं। 
  6. संघर्ष आंतरिक व बार्ह्य प्रक्रियार्ओं के कारण होतार् है। आंतरिक प्रक्रियार्- जब स्त्रियों को शिक्षार् में प्रवेश दियार् तो वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गयी और फिर उन्होंने अपने अधिकारों की मार्ंग की। आज नार्री आंदोलन क जो स्वरूप दिखाइ देतार् है वह व्यवस्थार् यार् समार्ज क आंतरिक संघर्ष है। सार्म्प्रदार्यिक दंगे, आतंकवार्द, भ्रष्टार्चार्र, विद्यार्थ्र्ार्ी और श्रमसंघ आंदोलन आदि आंतरिक संघर्ष हैं। बार्ह्य प्रक्रियार्- दो रार्ष्ट्रों के मध्य युद्ध, अन्तर्रार्ष्ट्रीय बार्जार्र व मंडी में युद्ध, तकनीकी सार्धनों के उत्पार्दन में जार्पार्न व अमेरिक में जो होड़ है वह भी बार्ह्य संघर्ष है। 
  7. कोजर व उसकी परम्परार् के विचार्रकों क मार्ननार् है कि संघर्ष हमेशार् समार्ज के लिए हार्निकारक नहीं होतार्। जब एक समार्ज दूसरे समार्ज के सार्थ संघर्ष में होतार् है तो समार्ज की सुदृढ़तार् बढ़ती है।

संघर्ष क स्वरूप

मूलत: संघर्ष परिवर्तन क एक सार्धन है। परिवर्तन की आवश्यकतार् और इच्छार् को नकारार् नहीं जार् सकतार् और यह भी स्वीकार करनार् ही होगार् कि परिवर्तन के सार्धनों से ही परिवर्तन होगार्। अतएव संघर्ष को सदैव हिंसक रूप में ही न देखकर उसे परिवर्तन के संदर्भ में भी देखनार् चार्हिए। यह धार्रणार् यार् विचार्र मिथ्यार् है कि ‘‘संघर्ष नैतिक रूप से गलत व सार्मार्जिक रूप से अनचार्हार् है, संघर्ष सदैव त्यार्ज्य यार् विध्वंसार्त्मक ही नहीं होतार्, यह समूहों के बीच तनार्व को समार्प्त भी करतार् है, जिज्ञार्सार्ओं व रुचियों को प्रेरित करतार् है तथार् यह एक ऐसार् मार्ध्यम भी हो सकतार् है जिसके द्वार्रार् समस्यार्एं उभार्रकर उनके समार्धार्न तक पहुंचार् जार् सकतार् है अर्थार्त् यह व्यक्तिगत और सार्मार्जिक परिवर्तन क आधार्र भी हो सकतार् है। संघर्ष क अनिवायत: यह अर्थ नहीं है कि यह समुदार्य व सम्बन्धों के टूटने क कारण है। कोजर ने सार्मार्जिक संघर्षों की महत्तार् को प्रकाशित करते हुए लिखार् है- संघर्ष असंतुष्टि के स्रोतों को खत्म कर तथार् परिवर्तन की आवश्यकतार् की पूर्व चेतार्वनी तथार् नवीन सिद्धार्न्तों क परिचय देकर समुदार्य पर एक स्थिर एवं प्रभार्वशार्ली छार्प छोड़तार् है।मूल रूप से संघर्ष की दो स्थितियार्ं हैं-

  1. न्यार्योचित लक्ष्य के लिए प्रतिस्पर्धार् में शार्मिल होनार् एवं
  2. ऐसार् लक्ष्य जो न्यार्योचित नहीं है, उसकी प्रार्प्ति के लिए प्रतिस्पर्धार् में शार्मिल होनार्।

प्रथम यथाथवार्दी संघर्ष है, जो एक विशेष परिणार्म की प्रार्प्ति के लिए होतार् है। इसलिए यह संघर्ष यार् तो मूल्यों की संरक्षार् के लिए यार् उन जीवनदार्यिनी चीजों के लिए होतार् है जिनकी आपूर्ति कम होती है।

उपर्युक्त अर्थ में संघर्ष कुछ परिणार्म की प्रार्प्ति क सार्धन है। समार्जशार्स्त्रियों क मार्ननार् है-संघर्षविहीन समार्ज की कल्पनार् भी नहीं की जार् सकती। मेक्स वेबर के अनुसार्र-’’सार्मार्जिक जीवन से हम संघर्ष को अलग नहीं कर सकते। हम जिसे शार्ंति कहते है। वह और कुछ नहीं है अपितु संघर्ष के प्रकार व उद्देश्यों तथार् विरोधी में परिवर्तन है।’’ रोबिन विलियम्स के अनुसार्र-किसी भी परिस्थिति में हिंसार् पूर्ण रूप से उपस्थित यार् अनुपस्थित नहीं हो सकती। यहार्ं भगवार्न् महार्वीर की दृष्टि ज्ञार्तव्य है-उनके अनुसार्र समार्ज केवल हिंसार् यार् केवल अहिंसार् के आधार्र पर नहीं चल सकतार्। प्रोमहेन्द्र कुमार्र के अनुसार्र-हिंसार् की पूर्ण अनुपस्थिति असंभव है क्योंकि अंतर्रार्ष्ट्रीय समार्ज से संघर्ष क पूर्ण विलोपन सम्भव नहीं है और न ही यह वार्ंछनीय है क्योंकि हिंसार् की अहिंसक-समार्ज निर्मार्ण में महत्त्वपूर्ण भूमिक है यार् हो सकती है। अतएव संघर्ष को नियंत्रित यार् इच्छित दिशार् में गतिशील कियार् जार् सकतार् है, उसे पूर्ण रूप से हटार्यार् नहीं जार् सकतार्।महार्त्मार् गार्ंधी ने भी संघर्ष की अनिवायतार् को स्वीकार कियार् है। जे.डी. टार्टार् ने जब गार्ंधीजी से यह पूछार्-बार्पू! आप तमार्म उम्र संघर्ष करते रहे ह® (ब्रिटिश लोगों से), उनके चले जार्ने के बार्द आपकी संघर्ष की आदत क क्यार् होगार्? क्यार् आप इसे छोड़ देंगे? गार्ंधीजी क उत्तर थार्-नहीं म® इसे अपने जीवन से कभी अलग नहीं कर सकतार्। लेकिन गार्ंधीजी ने कार्लमार्क्र्स की तरह संघर्ष को सार्मार्जिक कानून के रूप में नहीं मार्नार्। उन्होंने संघर्ष की अहिंसक पद्धति विकसित करने पर बल दियार्।

द्वितीय अयथाथवार्दी संघर्ष है जो ऐसे लक्ष्यों की प्रार्प्ति के लिए कियार् जार्तार् है जिन्हें किसी भी परिस्थिति में न्यार्योचित नहीं कहार् जार् सकतार्। जैसे उग्रवार्दी हिंसार्। ऐसार् कोर्इ भी संघर्ष अथवार् इसके लिए किये जार् रहे प्रयत्न सदैव त्यार्ज्य है।

1. विध्वंसार्त्मक बनार्म उत्पार्दक संघर्ष-

संघर्ष विध्वंसार्त्मक भी हो सकतार् है और उत्पार्दक भी। एक संघर्ष को उस समय विध्वंसार्त्मक कहार् जार् सकतार् है जब इस संघर्ष में सहभार्गी व्यक्ति इसके परिणार्मों से असंतुष्ट हों तथार् वे यह अनुभव करते हों कि संघर्ष के परिणार्मस्वरूप उन्होंने कुछ खोयार् है। यही उत्पार्दक होगार्, जब संघर्ष में सहभार्गी व्यक्ति इसके परिणार्मों से संतुष्ट हों तथार् वे यह अनुभव करते हों कि संघर्ष के परिणार्मस्वरूप उन्होंने कुछ प्रार्प्त कियार् है।

2. दृष्टिकोण, व्यवहार्र और संघर्ष-

विध्वंसार्त्मक दृष्टिकोण और व्यवहार्र को संघर्ष के समकक्ष यार् संघर्ष मार्ननार् भ्रार्मक है। तीनों क स्वतंत्र अस्तित्व है। संघर्ष एक प्रकार से विरोध व एक ऐसार् लक्ष्य है जो दूसरे की लक्ष्य प्रार्प्ति में बार्धक है। सार्मार्न्य रूप से संघर्ष के दो रूप है।

  1.  समार्ज के विभिन्न समूहों की वस्तुनिष्ठ रूचियों में भेद एवं
  2. सार्मार्जिक गतिविधियों के आत्मनिष्ठ लक्ष्यों में विरोध।

दृष्टिकोण व व्यवहार्र जब संघर्ष से जुड़ जार्ते ह® तब उन्हें निषेधार्त्मक दृष्टिकोण व व्यवहार्र कहार् जार्तार् है। इस प्रकार के निषेध अचार्नक घृणार् यार् प्रत्यक्ष हिंसार् के रूप में प्रकट होते है। जार्तीय और प्रजार्तीय संघर्षों में सार्मार्जिक दूरी पूर्वार्ग्रहों के कारण होती है जबकि संरचनार्त्मक हिंसार् में यह भेदभार्व के रूप में प्रकट होती है।

3. सम्बन्ध न होने की अपेक्षार् संघर्षपूर्ण सम्बन्ध अच्छे है-

प्रसिद्ध उक्ति है-’पार्प से घृणार् करो, पार्पी से नहीं।’ अन्यार्य से घृणार् यार् विरोध आवश्यक है क्योंकि यह अन्यार्य के संस्थार्करण को रोकतार् है लेकिन अन्यार्यी से घृणार् संबंधों के सुधार्र को रोकतार् है। इसी संदर्भ में यह कहार् जार् सकतार् है-संघर्ष पर आधार्रित सम्बन्ध किसी प्रकार के संबंध न होने से अच्छे है। मेरे और आपके बीच संघर्ष यह दर्शार्तार् है कि कोर्इ एक चीज हम दोनों में सार्मार्न्य है। हमार्री समस्यार् मेरी और आपकी है इसलिए हम इस समस्यार् से लड़ें न कि एक दूसरे से। संघर्ष के सार्वधार्नीपूर्ण प्रयोग से समार्ज में सार्मंजस्यपूर्ण सम्बन्ध स्थार्पित किये जार् सकते है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के दो आधार्र है।

  1. मार्नवीय एकतार्
  2. कर्त्तार् बनार्म व्यवस्थार् 

प्रत्येक मनुष्य एक दूसरे से अनेक बन्धनों व सार्मार्जिक सम्बन्धों से जुड़े ह®। उनके बीच के सम्बन्ध सार्मंजस्यपूर्ण है। तो वे उन्हें प्रदर्शित कर और अधिक प्रगार्ढ़ कर सकते है। यदि उनके बीच सार्मंजस्य नहीं है तो हम उन्हें यह समझार् सकते है। कि सार्मंजस्यपूर्ण संबंध मार्नवीय एकतार् के लिए आवश्यक है। यदि उनके बीच किसी प्रकार के सम्बन्ध ही नहीं है।, तो यह मार्नवीय एकतार् क बहिष्कार है। किसी व्यक्ति के अन्यार्यी बनने में परिस्थितियों व व्यवस्थार् क भी योगदार्न होतार् है। सम्बन्धों को स्वीकार न करनार् अन्यार्यी की अस्वीकृति है जबकि असार्मंजस्यपूर्ण सम्बन्धों क स्वीकरण व्यवस्थार् व व्यक्ति सुधार्र की दिशार् में प्रस्थार्न है।

संघर्ष  के प्रकार

1. वैयक्तिक संघर्ष –

वैयक्तिक संघर्ष उसे कहते हैं जब संघर्षशील व्यक्तियों में व्यक्तिगत रूप से घृणार् होती है तथार् वे अपने स्वयं के हितों के लिए अन्य को शार्रीरिक हार्नि पहुंचार्ने तक भी तैयार्र हो जार्ते हैं। परस्पर विरोधी लक्ष्यों को लेकर घृणार्, द्वेष, क्रोध, शत्रुतार् आदि के कारण इस प्रकार क संघर्ष हो सकतार् है।

वैयक्तिक संघर्ष आंतरिक व बार्ह्य दोनों प्रकार के हो सकते हैं। जब व्यक्ति क संघर्ष स्वयं से होतार् है तो वह आंतरिक संघर्ष क रूप है व जब व्यक्ति क संघर्ष किसी अन्य व्यक्ति यार् समूह से होतार् है तो वह बार्ह्य संघर्ष क रूप है। उदार्हरण के लिए किसी कार्य को करने यार् न करने क मार्नसिक द्वन्द्व आंतरिक संघर्ष है व जमीन, जार्यजार्द आदि के लिए होने वार्लार् संघर्ष बार्ह्य संघर्ष है।

व्यक्ति के भीतर होने वार्ले संघर्ष- आंतरिक संघर्ष के मुख्य रूप से तीन कारक हैं जो इसे जन्म देते हैं- कुण्ठार्, स्वाथपरकतार् व हितों क टकरार्व।व्यक्ति स्वयं जब कोर्इ लक्ष्य निर्धार्रित करतार् है व किसी अवरोध से यदि वह लक्ष्य बार्धित हो जार्तार् है तो व्यक्ति की वह असफलतार्, कुण्ठार् क रूप ले लेती है और जिसके परिणार्म से व्यक्ति की कुछ प्रतिक्रियार्एं होती है जो उसके आंतरिक संघर्ष को प्रदर्शित करती है।

व्यक्ति में आंतरिक संघर्ष उत्पन्न होने के जो कारण हैं उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कारण व्यक्ति की स्वाथपरकतार् है। अपने स्वाथों की पूर्ति वह उचित-अनुचित, वैध-अवैध सभी तरीकों से करनार् चार्हतार् है। फलत: व्यक्तिगत र्इष्र्यार् उत्पन्न हो जार्ती है जिसके परिणार्मस्वरूप व्यक्ति की कुछ आंतरिक प्रतिक्रियार्एं होती हैं जो आंतरिक संघर्ष को दर्शार्ती हैं।व्यक्ति कभी स्वयं के हितों के कारण भी दुविधार् में पड़ जार्तार् है। व्यक्ति के पार्स स्वयं के हित के अनेक विकल्प होते हैं और उनमें से जब उसे यह चयन करनार् होतार् है कि क्यार् उसके लिए अच्छार् होगार् व क्यार् गलत, कौन-सार् विकल्प हितकर होगार् व कौन-सार् अहितकर, कौन-सार् सुगम होगार् व कौन-सार् जटिल तो यह असमंजस व ऊहार्पोह की सिथति संघर्ष पैदार् करती है।

जब व्यक्ति क संघर्ष अन्य व्यक्तियों व समूहों से होतार् है तो वह बार्ह्य संघर्ष होतार्है। यह भी दो प्रकार क होतार् है- वार्स्तविक व अवार्स्तविक। जब संघर्ष किसी न्यार्यपूर्ण यार् न्यार्योचित उद्देश्यों को लेकर होते हैं तथार् सार्मार्जिक व कानूनी स्वीकृति को लेकर होते हैं तो वे वार्स्तविक संघर्ष कहलार्ते हैं। हितों क टकरार्व सार्मार्जिक, आर्थिक, रार्जनैतिक, व्यक्ति क अहम व स्तर आदि कर्इ कारक होते हैं जो इसे प्रभार्वित करते हैं।जब संघर्ष अन्यार्यपूर्ण व अनुचित उद्देश्यों को लेकर होते हैं तो वे अवार्स्तविक संघर्ष कहलार्ते हैं। इनमें ‘जैसे को तैसे’ की प्रवृत्ति रहती है। ये संघर्ष कानूनी प्रक्रियार्ओं के द्वार्रार् भी होते हैं।

अत: यह स्पष्ट है कि वैयक्तिक संघर्ष शीघ्र ही उत्पन्न हो जार्ते हैं। इनकी प्रकृति में निरन्तरतार् नहीं रहती, कभी संघर्ष चलतार् है तो कभी बंद हो जार्तार् है व फिर चल सकतार् है। जब तक संघर्ष की परिणति सहयोग में न हो जार्ए यह चलतार् ही रहतार् है। ये संघर्ष अत्यधिक कटु नहीं होते हैं क्योंकि सार्मार्जिक नियम उन्हें किसी न किसी रूप में नियंत्रित रखते हैं। इसमें शार्रीरिक हिंसार् तुलनार्त्मक रूप से कम होती है।

2. प्रजार्तीय संघर्ष –

जब आनुवार्ंशिक शार्रीरिक भेदभार्व के कारण व्यक्तियों क वर्गीकरण कियार् जार्तार् है तो उसे प्रजार्ति कहते हैं। वैयक्तिक संघर्ष के अतिरिक्त सार्मूहिक संघर्ष भी हो सकतार् है। प्रजार्तीय संघर्ष भी इसमें से एक है। प्रजार्तीय संघर्ष क आधार्र प्रजार्तीय श्रेष्ठतार् व हीनतार् जैसी वैज्ञार्निक अवधार्रणार् है। श्रेष्ठतार् व हीनतार् क मुख्य आधार्र संस्तरण है व उच्चतार् व निम्नतार् की भार्वनार् होती है। संस्तरण के कारण उच्च स्तर के व्यक्ति को अधिकार प्रार्प्त हो जार्ते हैं व उन अधिकारों क प्रयोग जब संस्तरण के निचले स्तर के व्यक्तियों पर कियार् जार्तार् है यार् प्रदर्शित किए जार्ते हैं तो यह प्रजार्तीय संघर्ष है। भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नतार्, जीन संरचनार्, विशिष्ट शार्रीरिक लक्षण, सार्ंस्कृतिक भिन्नतार् आदि ऐसे कर्इ तत्त्व हैं तो प्रजार्ति की उच्चतार् व निम्नतार् निर्धार्रण में सहार्यक होते हैं। इन तत्त्वों के परिणार्मस्वरूप निर्धार्रित होने वार्ली प्रजार्ति की श्रेष्ठतार् व हीनतार् में व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार्र नहीं होतार् है पर उस आधार्र पर व्यक्ति को ही श्रेष्ठ व हीन ठहरार् दियार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए अमेरिक में नीग्रो व श्वेत प्रजार्ति के बीच, श्वेत प्रजार्ति व जार्पार्नी प्रजार्तियों के बीच और अफ्रीक में श्वेत व श्यार्म प्रजार्तियों के बीच अक्सर जो संघर्ष होतार् है वह प्रजार्तीय संघर्ष के अनुपम उदार्हरण हैं।

वर्तमार्न प्रगतिशील युग में प्रजार्तीय भेदभार्व रार्जनैतिक, आर्थिक, सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक आदि क्षेत्रों में कानून के रूप में व व्यवहार्र में जार्तीय भेदभार्व के रूप में विद्यमार्न है। प्रजार्तीय संघर्ष कहीं सरकारी नीतियों से पुष्ट है तो कहीं प्रच्छन्न रूप में, जिससे विभिन्न वर्गों के बीच विषमतार् पार्यी जार्ती है। रार्जनैतिक क्षेत्र में विश्व के किसी भी देख में प्रजार्तीय भेदभार्व को मार्न्यतार् नहीं है परन्तु रार्ष्ट्रों में वहार्ं की नीतियों व दशार्ओं के कारण सभी लोगों क मत देने, सरकारी सेवार् में प्रवेश पार्ने एवं सावजनिक पदों के लिए चुनार्व लड़ने क अधिकार नहीं है। आर्थिक क्षेत्र में प्रजार्तीय भेदभार्व के परिणार्म से कुछ विशेष प्रजार्ति के लोग कम वेतन पर मजदूर के रूप में सदैव उपलब्ध रहते हैं। प्रजार्तीय भेदभार्व सावजनिक स्थल, स्वार्स्थ्य व चिकित्सार् सम्बन्धी सुविधार्ओं, सार्मार्जिक सुरक्षार् व पार्रस्परिक सम्बन्धों में भी देखार् जार् सकतार् है। सार्ंस्कृतिक क्षेत्र में जार्तीय भेदभार्व जीवन स्तर की विभिन्नतार् से जन्म लेतार् है। वर्तमार्न समय में हर प्रजार्ति अपने को श्रेष्ठ व सुरक्षित बनार्ए रखनार् चार्हती है इसलिए इस आधार्र के संघर्ष होते रहते हैं। अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर होने वार्ले संघर्षों क एक प्रमुख कारण यह भी है।

भेदभार्व की यह भार्वनार् उस समार्ज में अधिक पार्यी जार्ती है जहार्ं सार्ंस्कृतिक, सार्मार्जिक व आर्थिक जीवन में बहुत अधिक विरोधार्भार्स होतार् है। नस्ल, रंग व वंश की दृष्टि से जिन रार्ष्ट्रों में अलगार्व की भार्वनार् है एवं जहार्ं संस्कृति, रीति-रिवार्ज व परम्परार्ओं के कारण भिन्नतार्एं हैं वहार्ं की स्थितियार्ं वार्स्तव में ही शोचनीय है। जार्तीय पृथक्करण की नीतियार्ं विश्व के लिए एक बड़ार् कलंक है।

3. वर्ग संघर्ष –

वर्ग संघर्ष क इतिहार्स समार्ज के निर्मार्ण से ही प्रार्रम्भ हो गयार् थार्। कार्लमार्क्र्स ने लिखार् थार् कि ‘‘आज तक अस्तित्व में रहे समार्ज क इतिहार्स, वर्ग-संघर्ष क इतिहार्स है।’’ समूचे समार्ज क इतिहार्स वर्ग संघर्ष में ढूंढार् जार् सकतार् है। प्रार्चीन काल में जब मुखियार् सर्वेसर्वार् थार् तब से वर्ग प्रणार्ली क प्रार्दुर्भार्व हुआ। प्रार्चीनकाल में मार्लिक व दार्स, मध्ययुग में सार्मन्त व सेवक यार् कामदार्र, आधुनिक युग में मजदूर व पूंजीपति आदि वर्ग रहे हैं। विभिन्न समूहों की सार्मार्जिक व आर्थिक स्थिति में परस्पर भिन्नतार्एँ पार्यी जार्ती है, फलत: उनके जीवन प्रतिमार्न एक-दूसरे से मेल नहीं खार्ते व ये समूह कालार्न्तर में विभिन्न वर्गों क रूप ले लेते हैं। प्रत्येक वर्ग सार्मार्जिक व आर्थिक उपयोगितार् की दृष्टि से स्वयं को सर्वार्धिक महत्त्वपूर्ण मार्नतार् है। इस प्रकार की स्थिति उनके बीच विवार्दों व संघर्ष को जन्म देती है। उदार्हरण के लिए वर्तमार्न में मजदूरों व मिल मार्लिकों क संघर्ष देखने को मिलतार् है। मजदूर अधिक से अधिक वेतन व सुविधार्एं लेनार् चार्हते हैं जबकि पूंजीपति उनक अधिक से अधिक शोषण करनार् चार्हते हैं। परिणार्मत: उनमें संघर्ष होतार् है। इस संघर्ष में मजदूर मिल-मार्लिकों को उनकी मार्ंग न मार्नने पर तोड़फोड़ की धमकी देते हैं व अनेक बार्र ऐसार् कर भी देते हैं। कुछ वर्ग के लोग आजकल अधिकारियों, मंत्रियों आदि क अपनी मार्ंगों के समर्थन में घेरार्व करते हैं तथार् हड़तार्ल व नार्रेबार्जी करते हैं। ये सभी वर्ग संघर्ष के ही लक्षण हैं।
कार्ल माक्स ने कहार् कि ‘‘समार्ज सदैव दो आर्थिक वर्गों में बंटार् रहेगार्- शोषक व शोषित। ये वर्ग सदैव एक दूसरे के सार्थ संघर्षरत रहेंगे जब तक कि वर्ग विहीन समार्ज की स्थार्पनार् न हो जार्ए।’’ मनोवैज्ञार्निक रूप से इस संघर्ष को कभी समार्प्त नहीं कियार् जार् सकतार् है क्योंकि व्यक्ति विशेष में श्रेष्ठतार् व हीनतार् की भार्वनार् स्वभार्वत: होती ही है। चूंकि वर्ग विहीन समार्ज क अस्तित्व वर्ग स्वाथों के कारण व्यार्वहार्रिक रूप में कठिन है अत: वर्ग संघर्ष एक सावभौमिक प्रघटनार् है। ऐसे संघर्षों क अंत प्रत्येक बार्र यार् तो समग्र समार्ज के क्रार्ंतिकारी पुनर्निर्मार्ण में होतार् है यार् संघर्षरत वर्गों की बर्बार्दी में निहित होतार् है।

4. जार्तीय संघर्ष-

जार्तीय संकीर्णतार् सार्मार्जिक संघर्षों क एक प्रमुख कारण बनी है। यह समस्यार् अर्द्धविकसित व विकासशील देशों में अधिक पार्यी जार्ती है। हम कुछ जार्तीय पूर्वार्ग्रहों को पार्लते हैं, क्योंकि इनसे हमार्री सुरक्षार्, प्रतिष्ठार् व मार्न्यतार् जैसी कतिपय गहन आवश्यकतार्ओं की संतुष्टि होती है। सार्मार्जिक व्यवस्थार् में जार्ति विशेष की श्रेष्ठतार् व हीनतार् को मार्नने की प्रवृत्ति जार्तीय संघर्ष क कारण बनती है। ऐसे संघर्ष भी संस्तरण की मार्नसिकतार् से जुड़े रहते हैं। आज कट्टरपंथी व उदार्रवार्दी लोगों के बीच जो संघर्ष होतार् है वह जार्तीय संघर्ष क ही एक भार्ग है। एक जार्ति क शार्सन के सार्थ, कट्टरपंथी क जार्तीय समीकरणों के सार्थ, किसी जार्ति विशेष क जार्ति विशेष के सार्थ, उदार्रवार्दी व कट्टरपंथी आदि के बीच होने वार्ले संघर्ष जार्तीय संघर्ष के विभिन्न स्वरूप हैं। भार्रत में जार्तीय तनार्व अधिक देखने को मिलते हैं। जैसे मणिपुर में नार्गार् व हुकी जार्ति क विवार्द, बिहार्र में लार्लार् व ब्रार्ह्मण जार्ति क विवार्द आदि।

ये संघर्ष परम्परार्गत रूप से लम्बे समय से एक सार्मार्जिक बुराइ के रूप में स्थार्पित होते रहे हैं। यद्यपि कानूनी रूप से विभिन्न जार्तियों के बीच ऊंच-नीच की भार्वनार् को अस्वीकार कियार् गयार् है फिर भी ऊंच-नीच की भार्वनार् के कारण विभिन्न जार्तियों में बैर-भार्व रहतार् है व जार्तीय संघर्ष चलते रहते हैं। इन जार्तीय विवार्दों के कारण आज भार्रतीय रार्जनीति क मुख्य आधार्र ही जार्तिवार्द बन गयार् है जिससे जनतार् सदैव आपसी संघर्षों में उलझी रहती है। एक पूर्ण विकसित समार्ज में ऐसे संघर्षों के खत्म होने की संभार्वनार् रहती है अन्यथार् ये संघर्ष निरन्तर चलते रहते हैं।

5. रार्जनैतिक संघर्ष –

रार्जनैतिक संघर्ष के दो रूप हैं-रार्ष्ट्रीय संघर्ष एवं अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष। जार्तिवार्द, सार्म्प्रदार्यिक तनार्व, रार्जनैतिक तनार्व, उग्रवार्द, पृथक्करण, विभार्जन आदि रार्ष्ट्रीय संघर्षों के प्रमुख कारण बनते हैं। अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष की अभिव्यक्ति के भी अनेक रूप हैं- जैसे घृणार् तथार् आक्रार्मकतार् की अभिवृत्ति, जिसके फलस्वरूप समार्चार्र पत्रों, रेडियो व दूरदर्शन पर भड़कीले समार्चार्र प्रसार्रित कर मनोवैज्ञार्निक युद्ध कियार् जार्तार् है। स्वजार्तिवार्द की पृष्ठभूमि भी अन्तर्रार्ष्ट्रीय तनार्व क एक प्रमुख कारण है। अडोर्नो ने यह दर्शार्यार् है-जिन व्यक्तियों में यह सोचने की अतिरंजित प्रवृत्ति है कि उनक अपनार् समूह अथवार् जार्ति, अन्य जार्तियों से अत्यन्त श्रेष्ठ है, उनक सार्मार्न्य दृष्टिकोण रुढ़िवार्दी होतार् है तथार् वे शक्ति की प्रशंसार् व परार्जितों से घृणार् करते हैं जिससे वे दूसरों को अपने समार्न स्थार्न देने को तैयार्र नहीं होते। फलत: विदेशियों व अल्पसंख्यकों को हीन दृष्टि से देखार् जार्तार् है तथार् उनमें असुरक्षार् की भार्वनार् उत्पन्न होती है। इससे सैनिक संगठनों को बल मिलतार् है। रार्ष्ट्रवार्दी अभिवृत्तियों के सार्थ-सार्थ अन्य देशों के प्रति प्रबल नकारार्त्मक भार्वनार् हो और प्रबल अंतर्रार्ष्ट्रीय भार्वनार् क अभार्व हो तो उस स्थिति में अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष उत्पन्न हो ही जार्तार् है और वह स्थिति शार्ंति तथार् एकतार् की बजार्ए युद्ध की प्रेरक होती है।

उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त वैचार्रिक भिन्नतार्एं, विस्तार्रवार्दी नीतियार्ं, व्यार्पार्रिक एवं सीमार् विवार्द, अस्त्र-शस्त्र आदि भी अन्तर्रार्ष्ट्रीय विवार्दों के प्रमुख कारण बनते हैं।

6. अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष-

यह भी रार्जनैतिक संघर्ष क ही एक विस्तृत रूप है। रार्जनैतिक संघर्ष क क्षेत्र जब एक रार्ष्ट्र की सीमार् पार्र करके अन्य रार्ष्ट्रों तक फैल जार्तार् है तो उसे अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब रार्ष्ट्रीय सीमार्ओं के पार्र संघर्ष होतार् है तो वह अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष कहलार्तार् है। इसक सबसे स्पष्ट रूप युद्ध है जो कि भार्रत और चीन के बीच, भार्रत-पार्किस्तार्न के बीच व अन्य रार्ष्ट्रों के बीच होते हैं।

उपरोक्त समस्त विवेचन के आधार्र पर यह निष्कर्ष निकालार् जार् सकतार् है कि संघर्ष अनेक स्वरूपों/प्रकारों में दृष्टिगोचर होतार् है। वैयक्तिक संघर्ष से प्रार्रम्भ होकर संघर्ष प्रजार्तीय व वर्ग संघर्ष की सीढ़ियार्ं चढ़ते-चढ़ते जार्तीय संघर्ष परिवर्तित होतार् है व अंतत: संघर्ष के विभिन्न रूप रार्जनैतिक स्तर के रार्ष्ट्रीय व अन्तर्रार्ष्ट्रीय संघर्ष में परिवर्तित हो जार्तार् है। भार्रत के संदर्भ में संघर्ष के इन स्वरूपों की विवेचनार् की जार् सकती है। धर्म के आधार्र पर भार्रत क विभार्जन हुआ व पार्किस्तार्न के रूप में एक नए रार्ष्ट्र की स्थार्पनार् हुर्इ। विभार्जन के बार्द धर्म को लेकर जो दंगे हुए वे धामिक आधार्र पर निर्मित थे व स्वतंत्रतार् के बार्द भी कहीं-कहीं समार्ज विरोधी तत्त्वों के द्वार्रार् धामिक भार्वनार्ओं के आधार्र पर दंगे फसार्द किए गए। धर्म निरपेक्ष रार्ष्ट्र में ऐसी घटनार्एं रार्ष्ट्र विरोधी मार्नी जार्ती हैं। इसके अतिरिक्त सिक्ख धर्म पर कुछ व्यक्तियों की अलग सिक्ख रार्ष्ट्र की मार्ंग को लेकर भी भार्रत के एक भू-भार्ग में संघर्ष की स्थिति को जन्म दियार् है। इन संघर्षों में तर्क व व्यार्पक दृष्टिकोण क अभार्व रहतार् है व निहित स्वाथ वार्ले तत्त्व संकीर्णतार् के आधार्र पर अपनी स्वाथ सिद्धि क प्रयार्स करते हैं। क्षेत्र को लेकर भी भार्रत में संघर्ष के कतिपय उदार्हरण मिलते हैं। आसार्म व देश के कुछ अन्य भार्गों में आंदोलन व संघर्ष इसके उदार्हरण मार्ने जार् सकते हैं। भार्षार् के आधार्र पर भी यदार्-कदार् संघर्ष की स्थितियार्ं उत्पन्न हो जार्ती है। भार्षार्, संस्कृति क प्रमुख अंग है। अत: इसको संचार्र की प्रमुख व्यवस्थार् के रूप में नहीं मार्नकर भार्वनार्त्मक आवेग से जोड़ने क दुरार्ग्रह कियार् है। अनुसूचित जार्ति व तथार्कथित उच्च जार्तियों के मध्य संघर्ष के उदार्हरण अनुसूचित जार्तियों के लोगों में जार्गरूकतार् क प्रतीक है। धर्म निरपेक्ष, वर्ग विहीन, जार्ति विहीन आधार्र पर बनार् भार्रतीय संविधार्न देश के प्रत्येक निवार्सी को समार्न अधिकार प्रदार्न करतार् है। ऐसी दशार् में किसी विशेष जार्ति को नीचार् मार्नकर उनसे सार्मार्जिक विभेद अनुचित है। ये संघर्ष रार्ष्ट्र एकतार् में बार्धक होते हैं व सार्थ ही सार्थ व्यार्पक व दुरगार्मी दृष्टिकोण से व्यक्ति व समार्ज के लिए घार्तक भी होते हैं।

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