संगीत चिकित्सार् की अवधार्रणार् एवं उपयोगितार्

ध्वनि चिकित्सार् के जितने भी रूप है, उनमें संगीत चिकित्सार् सर्वार्धिक लोकप्रिय है। यदि हम गहराइ से अनुभव करें तो पार्येंगे कि ब्रह्मार्ण्ड की सम्पूर्ण संरचनार् ही संगीतमय है। सृष्टि के आदि में भी सर्वप्रथम अनार्हत नार्द अर्थार्त् ऊँकार की ध्वनि ही उत्पन्न हुयी थी और उसके बार्द फिर सृष्टि रचनार् क क्रम आरींार् हुआ। इस प्रकार सृश्टि क प्रत्येक पदाथ लयबद्ध गति से गतिमार्न् हो रहार् है। मार्नव जीवन भी अपने प्रार्कृत स्वरूप में संगीतमय है, किन्तु वर्तमार्न समय में भौतिकवार्दी जीवनशैली एवं इंसार्न के अपने स्वाथ, अज्ञार्न एवं अहंकार के कारण जीवन क संगीत कहीं खो गयार् है। रार्ग बेसुरार् हो गयार् है, जीवन की लय बिगड़ गर्इ है। जिस शरीर एवं मन से संगीत प्रवार्हित होनार् चार्हिये, वह शरीर व्यार्धियों से ग्रस्त और मन विक्षिप्त हो गयार् है। अत: आप संगीत चिकित्सार् के मार्ध्यम से पुन: जीवन संगीत को लयबद्ध करने की आवश्यकतार् हेै।

संगीत चिकित्सार् की अवधार्रणार् अत्यन्त व्यार्पक है। इसमें संगीत सुनने से लेकर संगीत लिखनार्, सुर बनार्नार्, संगीत के मार्ध्यम से प्रस्तुति देनार्, संगीत की चर्चार् करनार्, संगीत के मार्ध्यम से प्रशिक्षण इत्यार्दि सभी शार्मिल है। इस प्रकार कहार् जार् सकतार् है कि स्वार्स्थ्य संवर्द्धन हेतु संगीत क किसी भी रूप में उपयोग संगीत चिकित्सार् के अन्तर्गत आतार् है।

संगीत के प्रकार –

संगीत के अनेक प्रकार है और भिन्न – भिन्न प्रकार के संगीतों क प्रभार्व भी भिन्न – भिन्न होतार् है। संगीत के विभिन्न प्रकार हैं – क) भक्ति संगीत ख) वार्द्य संगीत एवं शार्स्त्रीय संगीत ग) लोक संगीत घ) फिल्मी संगीत ड़) पॉप संगीत

1. भक्ति संगीत – 

भक्ति संगीत भी दो प्रकार क मार्नार् गयार् है। एक, वह जिसके मार्ध्यम से हम र्इश्वर को पुकारते है, उनक भार्वभय स्मरण करते हैं। भार्रतीय संस्कृति में यह मार्न्यतार् है कि सुबह और सार्ंयकाल सन्धिबेलार् में भक्तिसंगीत गार्ने और सुनने से हमार्री भार्वनार्यें र्इश्वर तक पहुँचती है ? और ऐसार् संगीत प्रार्णिमार्त्र के हृदय में पवित्रतार् क संचार्र करके आत्मिक शार्न्ति एवं आनन्द प्रदार्न करतार् है। इसलिये हमार्रे यहार्ँ सुबह से मन्दिरों में, टी0वी0, रेडियों इत्यार्दि में भक्ति संगीत सुनने को मिल जार्ते है। इसके सार्थ ही यह भी मार्न्यतार् है कि दिन की शुरूआत भक्ति संगीत से करने पर पूरार् दिन अच्छार् बीततार् है। सुबह के समार्न सार्ंयकलार् भी मन्दिरों में भी मन्दिरों में भगवार्न् की आरती की जार्ती है। विभिन्न प्रकार के वार्द्ययंत्र बजार्ये जार्ते है, लोग अपने घरों में भी आरती करते है। इससे सम्पूर्ण वार्तार्वरण भक्तिमय और संगीतमय हो जार्तार् है। जो हमें तनार्वमुक्त करके अत्यन्त शार्ंति एवं प्रसन्नतार् प्रदार्न करतार् है।

भक्ति संगीत क दूसरार् प्रकार देशभक्ति संगीत है, जो प्रार्य: किसी विशिश्ट रार्श्ट्रीय पर्व पर गार्ये – बजार्ये जार्ते हैं और जिनको गार्ने और सुनने से हमार्रे मन में देशभक्ति की भार्वनार् उत्पन्न होती है, क्योंकि इन संगीतों में हमार्रे देश की स्वतंत्रतार् की अनेक घटनार्यें होती है, अनेक महार्पुरूशों की बलिदार्न की गार्थार्यें होती है। उदार्हरण के तौर पर 15 अगस्त (स्वतंत्रतार् दिवस), 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस), 02 अक्टूबर (गार्ँधी जयन्ती एवं शार्स्त्री जयन्ती) को हमार्रे टी0वी0 चैनलो, रेडियो, विद्यार्लयों आदि में इस प्रकार के देशभक्ति से ओतप्रोत संगीत सुनने को मिलते हैैं। जिनको सुनने – गार्ने मार्त्र से रार्ष्ट्रप्रेम क संचार्र होने लगतार् है।

2. वार्द्य संगीत एवं शार्स्त्रीय संगीत –

भिन्न – भिन्न प्रकार के वार्द्ययंत्रों जैसे तबलार्, बार्सुरी, हार्रमोनियम, सितार्र, वीणार् आदि द्वार्रार् बजार्यार् जार्ने वार्लार् संगीत वार्द्य संगीत और शार्स्त्रीय संगीत कहलार्तार् है।

3. लोक संगीत –

यह संगीत क ऐसार् प्रकार है जो अलग – अलग रार्ज्यों में और अलग-अलग क्षेत्रों में उस रार्ज्य की भार्शार्, उस क्षेत्र की भार्शार् में गार्यार् – बजार्यार् जार्तार् है। इस प्रकार संगीत क लोग विभिन्न समार्रोहों तथार् विवार्ह आदि उत्सवों में भी गार्यन – वार्दन करते है।

4. फिल्मी संगीत – 

वर्तमार्न समय में फिल्मी संगीत अत्यन्त लोकप्रिय है। प्रत्येक उम्र क व्यक्ति चार्हे वह बच्चार् हो, युवक हो, प्रौढ़ हो यार् वृद्ध हो, स्त्री हो यार् पुरूष हो सभी इसे गार्नार् एवं सुननार् पसन्द करते हैं। विभिन्न समार्रोहों, उत्सवों में इस प्रकार के संगीत गार्ये-बजार्ये जार्ते हैं। इससे मन तनार्व एवं चिन्तार् से मुक्त होकर प्रसन्न रहतार् है।

5. पॉप संगीत – 

वर्तमार्न समय में युवार् पीढ़ी के बीच पॉप संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हो रहार् है। युवार् प्रार्य: अपने कैरियर, रोजगार्र आदि को लेकर अत्यधिक तनार्वग्रस्त रहते है। पॉप संगीत इन्हें तनार्वमुक्त करके इनमें जोश, उमंग उत्सार्ह क संचार्र करतार् है। वर्तमार्न समय में अनेक युवक – युवतियार्ँ पॉप संगीत के क्षेत्र में भी अपनार् कैरियर बनार् रहे हैं और तलार्श रहे हैं, जिससे पॉप गार्यकों की संख्यार् दिनों दिन बढ़ती जार् रही है। इस प्रकार स्पश्ट है कि संगीत के अनेक प्रकार हैं, जिनक भिन्न – भिन्न प्रकार से उपयोग करके स्वार्स्थ्य पर अनुकूल प्रभार्व डार्ले जार् सकते हैं।

संगीत के चिकित्सार् की उपयोगितार्

संगीत क हमार्रे जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थार्न है। संगीत प्रार्णीमार्त्र के जीवन में आनन्द, उल्लार्स, प्रसन्नतार्, स्वार्स्थ्य एवं शार्ंति क संचार्र करतार् है। संगीत में अद्भुत सार्मथ्र्य है। यह प्रार्णी को आनन्द की गहरार्इयों में ले जार्तार् है। संगीत के मार्ध्यम से अचेतन में दमित इच्छार्यें, भार्वनार्यें, बार्हर निकल जार्ती है और व्यक्ति क मन आनन्द तथार् प्रसन्नतार् से भर जार्तार् है। संगीत द्वार्रार् व्यक्ति तनार्व मुक्त होकर स्वयं को प्रफुल्लित एवं उत्सार्हित अनुभव करतार् है।

‘‘ध्वनि और संगीत क मार्नव के स्वार्स्थ्य पर अत्यधिक प्रभार्व पड़तार् है। ध्वनि चिकित्सार् क उपयोग अस्पतार्लों, विद्यार्लयों, कॉरपोरेट कार्यार्लयों और मनोवैज्ञार्निक उपचार्रों में कियार् जार्तार् है। इससे खिंचार्व कम होतार् है। रक्तचार्प कम होतार् है, दर्द दूर होतार् है। सीखने की अयोग्यतार् दूर होती है, गतिशीलतार् व संतुलन में वृद्धि होती है और सहनशक्ति तथार् क्षमतार् में वृद्धि होती है।’’ (वैकल्पिक चिकित्सार् पद्धतियार्ँ)

‘‘ हमार्रे शरीर पर ध्वनियों क एक निश्चित प्रभार्व पड़तार् है। तेज आवार्जें तनार्व, उच्च रक्तचार्प, दबार्व तथार् अनिद्रार् जैसे विकार उत्पन्न करती है, परन्तु यदि गंधव संगीत को कर्णप्रिय स्वरों तथार् रार्गों के सार्थ बजार्यार् जार्ये तो वह रोगियों को निश्चित रूप से लार्भ पहुँचार्येगार्।’’ (आयुर्वेद और स्वस्थ जीवन) संगीत चिकित्सार् के प्रभार्वों काार् विवेचन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत कियार् जार् सकतार् है – 1. शार्रीरिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से 2. मार्नसिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से 3. आध्यार्त्मिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से 4. सार्मार्जिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से 5. वनस्पतियों पर संगीत क प्रभार्व 6. पशुओं पर संगीत क प्रभार्व

1. शार्रीरिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से – 

 शार्रीरिक स्वार्स्थ्य की दृश्टि से संगीत चिकित्सार् क अत्यन्त महत्व है। विभिन्न रोगों को दूर करने में यह चिकित्सार् पद्धति अत्यन्त कारगर सिद्ध हुयी है। ‘‘ध्वनि चिकित्सार् के सभी रूपों में संगीत चिकित्सार् सर्वार्धिक प्रचलित है। संगीत चिकित्सार् हृदय गति को संतुलित कर सकती है रक्तचार्प को सार्मार्न्य बनार् सकती हैं और दर्द व चिन्तार् से मुक्त करती है। अस्पतार्लों में इसक उपयोग दर्द से मुक्ति देने में, रोगी की मनोवैज्ञार्निक स्थिति को सुधार्रने के लिये और निरार्शार् से छुटकारार् दिलार्ने के लिये, शार्रीरिक गतिशीलतार् को बढ़ार्वार् देने के लिये, शार्ंतचित्ततार् लार्ने के लिये, निद्रार् को प्रभार्वित करने के लिये भयमुक्त करने के लिये और मार्ँसपेशीय तनार्व को दूर करने के लिये कियार् जार्तार् है। इसके अलार्वार् चिकित्सार्लयों में भर्ती मरीज की शार्रीरिक, मार्नसिक और सार्मार्जिक गतिविधियों में रूचि बढ़ार्ने के लिये इसक उपयोग कियार् जार्तार् है। (वैकल्पिक चिकित्सार् पद्धतियार्ँ) शार्रीरिक स्वार्स्थ्य लार्भ की दृश्टि से संगत चिकित्सार् क प्रयोग अनेक प्रकार से कियार् जार् सकतार् है। जैसे –

  1. रक्तचार्प को नियंत्रित करने के लिये।
  2. श्वसन गति क नियमन।
  3. रोग प्रतिरोधक क्षमतार् में वृद्धि के लिये।
  4. नींद संबधी समस्यार्ओं को दूर करने में।
  5. रक्त संचार्र को संतुलित करने में।
  6. दर्द में रार्हत देने के लिये।
  7. मार्ँसपेषीय तनार्व को दूर करने मेंं।
  8. शल्य चिकित्सार् के पहले तथार् बार्द की चिंतार् से छुटकारार् दिलार्ने में।
  9. रसार्यनोपचार्र के दौरार्न मिचली तथार् उल्टी से छुटकारार् दिलार्ने में।
  10. प्रसव के दौरार्न एनेस्थीसियार् को त्यार्गने में।
  11. पार्चन प्रणार्ली के नियमन के लिये।
  12. विभिन्न शार्रीरिक रोगों को दूर करने में इत्यार्दि।

वर्तमार्न समय में संगीत चिकित्सार् अत्यधिक लोकप्रिय होती जार् रही है। अब तक विश्व के अनेक देशों में इस चिकित्सार् पद्धति के प्रभार्व क अध्ययन टी0बी0, कब्ज, टार्यफार्इड, मार्इग्रेन, हृदयरोग, अनिद्रार्, दार्ँतरोग, मिरगी, मलेरियार्, बेहोशी, वीर्यदोश, श्वेत प्रदर आदि क सफलतार्पूर्वक कियार् जार् चुक है। अध्ययनों के अनुसार्र नये तथार् तीव्र रोगों में संगीत चिकित्सार् से शीघ्र स्वार्स्थ्य लार्भ होतार् है, जबकि जीर्ण रोगों में संगीत चिकित्सार् के सार्थ-सार्थ अन्य वैकल्पिक चिकित्सार्ओं जैसे – योग एवं प्रार्कृतिक चिकित्सार्, आयुर्वेद चिकित्सार् आदि क उपयोग फार्यदेमंद होतार् है। संगीत चिकित्सार् पर हुये एक प्रयोगार्त्मक अध्ययन के अनुसार्र कैंसर पीड़ित 19 बच्चों को जब मार्त्र 30 मिनट की एक संगीत चिकित्सार् दी गर्इ तो इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमतार् में आश्चर्यजनक वृद्धि हुयी, जबकि उन 17 बच्चों की रोगप्रतिरोधक क्षमतार् में वृद्धि नहीं हुयी। जिनको संगीत चिकित्सार् नहीं दी गर्इ थी। संगीत से मस्तिश्क की विकृत मार्ँसपेशियार्ँ सशक्त एवं सक्रिय होकर संतुलित होती हैें, जिससे तनार्व दूर होतार् है। अमेरिक में दार्ँतसंबधी समस्यार्ओं और रोगों क दूर करने में संगीत चिकित्सार् क सफलतार्पूर्वक प्रयोग कियार् जार् रहार् है।

भिन्न – भिन्न रोगों क स्वार्स्थ्य पर भिन्न – भिन्न प्रभार्व पड़तार् है। संगीत विशेशज्ञों के अनुसार्र कुछ प्रमुख रार्ग जो विभिन्न रोगों में उपयोगी हैं, वे निम्नार्नुसार्र हैं – वार्तरोग में मेघमल्हार्र, खार्ँसी में भैरव, वीर्यरोग में आसार्वरी, टी0बी0 में रार्मकली, मुलतार्नी, तिलंग, विलार्वल रार्ग, सिरदर्द, दार्ँत दर्द, अनिद्रार्, उच्च रक्तचार्प आदि उद्दीपक प्रभार्वक रोगों में मुलतार्नी, भैरवी, मार्लकौंस, तोड़ी पूर्वी, यूरियार्, धार्नी, विहार्गखमार्ज रार्ग, आलस्य एवं शौथिल्य की स्थिति में कामोद, अड़ार्नार्, सोरठ आदि रार्गों को प्रभार्वी मार्नार् गयार् है। इस प्रकार स्पश्ट है कि शार्रीरिक स्वार्स्थ्य की दृश्टि से संगीत चिकित्सार् अत्यन्तउपयोगी है।

2. मार्नसिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से – 

 संगीत क पभार्व हमार्रे शरीर के सार्थ – सार्थ मन पर भी पड़तार् है। तन और मन दोनों को प्रभार्वित करके संगीत हमार्रे जीवन में एक नयार् उल्लार्स और आनंद भर देतार् है। संगीत शोध विशेशज्ञों के अनुसार्र जब सुरतार्ल के सार्थ संगीत बजार्यार् यार् गार्यार् जार्तार् है तो एक विशेश आवृत्ति की ध्वनि तरंगे निकलती हैं, जो मार्नव मस्तिष्क की रार्सार्यनिक विद्युतीय संरचनार् पर प्रभार्व डार्लती है। मस्तिष्क में प्रशार्मक शार्ंतिदार्यक रसार्यन बीटार् एडार्रेत्फिन क समुचित मार्त्रार् में स्रार्व होने लगतार् है। लिम्बिक सिस्टम जिसक संबध हमार्रे संवेगों से है, उसके न्यूरॉन एडोरफिन को संगृहित कर लेते हैं। जिसके कारण मनोरोगों और मार्नसिक समस्यार्ओं के कारण अव्यवस्थित जैसे – विद्युतीय परिपथ (Short Circuit) सार्मार्न्य अवस्थार् में आ जार्ते हैं और व्यक्ति की मनोदशार् में सुधार्र होने लगतार् हैै।

रूसी वैज्ञार्निक प्रो0 एस0 बी0 कोदार्फ ने स्नार्यविक एवं मार्नसिक रोगों से ग्रस्त लोगों पर संगीत चिकित्सार् क सफलतार्पूर्वक प्रयोग कियार् है। शिकागो के मनश्चिकित्सक डार्ँ0 बंकर, पीटर, न्यूमैन एवं मार्इकेल सेण्डर्ड के अनुसार्र मनोरोगों को दूर करने में संगीत चिकित्सार् अन्य चिकित्सार् पद्धतियों की तुलनार् में अधिक प्रभार्वी एवं निरार्पद है। संगीत की तरंगों से व्यक्ति की अचेतन में दमित भार्वनार्यें चेतन में आकर निश्कासित हो जार्ती है। जिससे व्यक्ति स्वयं को हल्क और तनार्वमुक्त महसूस करतार् है।

‘‘संगीत ध्वनि तरंगों क प्रभार्व मस्तिश्क के बार्ँये तथार् दार्यें गोलाद्ध पर पड़तार् है और वहार्ँ से उत्पन्न होने वार्ले रोगों को नियंत्रित तथार् ठीक कियार् जार् सकतार् है।’’

संगीत विशेशज्ञों ने विभिन्न मनोरोगों के उपचार्र में कुछ विशेश रार्गों को प्रभार्वी बतार्यार् है। जैसे – उन्मार्द में बहार्र एवं बार्गेश्री, मिरगी में धार्नी एवं बिहार्ग, हिस्टीरियार् में यूरियार्, दरबार्री कान्हड़ार्, खमार्ज आदि को उपयोगी मार्नार् गयार् है। ‘‘सुबह क संगीत मस्तिश्क को शार्ंत करतार् है। शार्स्त्रीय संगीत को रोगों में अधिक प्रभार्वी पार्यार् गयार् है। आनंद भैरवी उच्च रक्तचार्प को कम करने में लार्भदार्यक है। हिंडेलार्, भूपति, वसंत, कंदार्, नीलार्ंबरी, असार्वेक संगीत उत्तेजिज दिमार्ग को शार्न्त करते हैं। पार्गलपन के लिये सार्रंग रार्ग उत्तम है। तोड़ी तथार् शिवरंजिनी भी मनोरोगों में उपयोगी है। सुप्रभार्त प्राथनार् शरीर तथार् मस्तिष्क के लिये अच्छी है।’’ (आयुर्वेद और स्वस्थ जीवन)

‘‘जब चिन्तार्मुक्त होने के लिये संगीत क उपयोग कियार् जार्तार् है तो वह धीमार्, नियमित, लयबद्ध, मध्यम स्वर, हल्के वार्द्य और शार्ंतिदार्यक मधुरतार् से युक्त होनार् चार्हिये।’’ (वैकल्पिक चिकित्सार् पद्धतियार्ँ)

संगीत चिकित्सार् मुख्यत: निम्न मार्नसिक समस्यार्ओं और मनोरोगों में उपयोगी है –

  1. तनार्व
  2. दुष्चिंतार्
  3. मिरगी
  4. हिस्टीरियार्
  5. अवसार्द
  6. उन्मार्द इत्यार्दि

इस प्रकार स्पश्ट होतार् है कि संगीत चिकित्सार् क मार्नसिक स्वार्स्थ्य पर भी बहुत अच्छार् प्रभार्व पड़तार् है।

3. आध्यार्त्मिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से –

आध्यार्त्मिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से भी संगीत क मार्नव जीवन में अनिर्वचीनय महत्व है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय परब्रºम ने स्वयं को सर्वप्रथम शब्द के रूप में ही अभिव्यक्त कियार् थार्। इसलिये कहार् भी गयार् है – ‘‘शब्दो वै ब्रºम’’ अर्थार्त् ‘‘शब्द ही ब्रºम है।’’ सृष्टि के आदि में गुंजित होने वार्लार् प्रथम स्वर ‘‘ऊँकार’’ है और इसी ऊँकार से सार्तों स्वर (सार्, रे, ग, म, प, ध, नि) जन्में। स्वर के उत्पन्न होते ही सम्पूर्ण सृष्टि में उल्लार्स छार् गयार् और प्रार्णीमार्त्र खुशी से झूम उठार्।

यदि आध्यार्त्मिक दृश्टि से संगीत की बार्त की जार्ये तो शार्स्त्रों में इसक वर्णन ‘‘नार्द सार्धनार्’’ के रूप में मिलतार् है। नार्द क अर्थ है – ‘‘ध्वनि’’, जो मूलत: दो प्रकार की मार्नी गयी है – 1) आहत और 2. अनार्हत। आहत से तार्त्पर्य प्रयार्सपूर्वक उत्पन्न की जार्ने वार्ली ध्वनि से है और अनार्हत से आशय बिनार् प्रयार्स के स्वत: उत्पन्न होने वार्ली ध्वनि से है। नार्दसार्धनार् में सार्धक धीरे – धीरे स्वयं को पहले अपने अन्दर उत्पन्न होने वार्ली स्थूल ध्वनियों पर एकाग्र करतार् है, जैसे श्वार्स की , रक्त संचार्र की ध्वनि। इसके बार्द जैसे – जैसे उसकी एकाग्रतार् बढ़ती जार्ती है, वैसे – वैसे वह अपने अन्दर और अधिक सूक्ष्म ध्वनियार्ँ सुनतार् है और सबसे अंतिम में अनार्हत नार्द के रूप में ऊँकार की ध्वनि सुनार्यी पड़ती है। जिससे सार्धक परमार्नंद को प्रार्प्त होतार् है। यदि विश्व इतिहार्स पर भी हम दृष्टिपार्त करें तो अनेक ऐसे भक्त सार्धकों के उदार्हरण हमें मिलते हैं, जिन्होंने भक्ति संगीत द्वार्रार् उस परमार्त्मार् क सार्क्षार्त्कार कियार् । जैसे – महार्न् भक्त चैतन्य महार्प्रभु, कृष्ण भक्ति में लीन मीरार्बाइ आदि। आज भी उनके भक्तिपूर्ण संगीत को सुनकर प्रार्णीमार्त्र में आध्यार्त्मिक भार्वनार्यें हिलोरें लेने लगती हैं। अत: स्पष्ट है कि संगीत हमार्रे आध्यार्त्मिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थार्न रखतार् है।

4. सार्मार्जिक स्वार्स्थ्य की दृष्टि से –

मनुष्य एक सार्मार्जिक प्रार्णी है और एक अच्छार् समार्जिक जीवन व्यतीत करने के लिये उसक सार्मार्जिक दृश्टि से स्वस्थ होनार् अत्यन्त आवश्यक है और संगीत इसमें महत्वपूर्ण भमिक निभार्तार् है। एक ओर तो संगीत से व्यक्ति में उत्सार्ह क संचार्र होतार् है, जो उसे सक्रिय बनार्कर सार्मार्जिक गतिविधियों में भार्ग लेने के लिये अभिप्रेरित करती है। दूसरी ओर संगीत हमार्री भार्वनार्ओं में सकारार्त्मक परिवर्तन लार्तार् है। इससे हमार्रे मन में दूसरों के प्रति सद्भार्व उत्पनन होते हैं और इससे हमार्रे मन में दूसरों के प्रति सद्भार्व उत्पन्न होते हैं और इससे हम संतोशजनक सार्मार्जिक संबध कायम करने में सफल होते हैं।
इस प्रकार संगीत सम्पूर्ण समार्ज को प्रभार्वित करतार् है।

5. वनस्पतियों पर संगीत क प्रभार्व –

संगीत मनुष्यों को ही नहीं वरन् वनस्पतियों को भी प्रभार्वित करतार् है। प्रार्णीमार्त्र पर इसक प्रभार्व पड़तार् है। संगीत के वनस्पतियों पर प्रभार्व को लेकर वैज्ञार्निकों द्वार्रार् अनेक शोध कार्य किये गये हैं और इनके परिणार्म अत्यन्त आशार्जनक रहे हैं।

चेन्नर्इ के अन्नार्मलाइ विश्वविद्यार्लय में वनस्पति विभार्ग के अध्यक्ष डार्ँ0 टी0एन0 सिंह ने चेन्नर्इ तथार् पार्ंडिचेरी कृशिफार्मोर्ं में मूटर, धार्न, चनार्, सेम, सरसों आदि के पौधों पर संगीत के प्रभार्व क अध्ययन कियार्। इन अध्ययनों के परिणार्मों में पार्यार् गयार् कि संगीत से अन्नोत्पार्दन में वृद्धि होती है तथार् फलों की गुणवत्तार् तथार् आकार में भी वृद्धि होती है। अत: स्पश्ट है कि संगीत क प्रयोग करके विभिन्न वनस्पतियों की मार्त्रार् एवं गुणवत्तार् दोनों ही बढ़ार्यी जार् सकती है।

6. पशुओं पर संगीत क प्रभार्व –

पशुओं पर भी संगीत के प्रभार्वों को लेकर अनेक प्रयोगार्त्मक अध्ययन किये गये हैं। इस संबध में सोवियत रूस में एक प्रयोग कियार् गयार्, जिसके परिणार्म में पार्यार् गयार् कि संगीत के प्रभार्व से दुधार्रू जार्नवरों की दुग्ध उत्पार्दन की क्षमतार् में वृद्धि हुयी तथार् उनकी उत्तेजनार् एवं उद्विग्नतार् के स्तर में कमी आयी। रूस के महार्न् वैज्ञार्निक गलोनार् हुगी थार् और विक्टर कोनकोव ने अपने अध्ययन के आधार्र पर बतार्यार् कि मार्नसिक रूप से शार्ंत होने पर पशु अधिक दूध देते है। इसी प्रकार अन्य अध्ययनों के अनुसार्र संगीत से पशुओं के स्वार्स्थ्य में भी शीघ्र सुधार्र होतार् है।

संगीत के स्वरों क स्वार्स्थ्य पर प्रभार्व –

संगीतशार्स्त्र यार् गार्न्धर्ववेद में सार्त प्रकार के स्वर बतार्ये गये हैं ? जिनसे मिलकर ही सभी प्रकार की रार्ग – रार्गनियार्ँ बनी है। ये सार्त स्वर हैं – सार्, रे, ग, म, प, ध, नि। इन स्वरों क हमार्रे स्वार्स्थ्य से गहरार् संबध है। विभिन्न प्रकार के शार्रीरिक एवं मार्नसिक रोगों को दूर करने के लिये संगीत चिकित्सार् के रूप में इन स्वरों को अलग – अलग ढंग से प्रयोग कियार् जार्तार् है। ये सार्त स्वर किस प्रकार हमार्रे स्वार्स्थ्य को प्रभार्वित करते हैं –

  1. स (शड्ज) – सार् को शड्ज भी कहार् जार्तार् है क्योंकि यह स्वर नार्सिका, कण्ठ, उर, तार्लु, जिº्वार् एवं दार्ँत – इन छ: स्थार्नों के सहयोग से उत्पन्न होतार् है तथार् शेश छ: स्वरों की उत्पत्ति क आधार्र है। इस स्वर क स्थार्न नार्भि – प्रदेश है तथार् प्रकृति ठंडी एवं रंग गुलार्बी है। इसक देवतार् अग्नि मार्नार् जार्तार् है। अत: पित्तज रोगों के शमन में लार्भकारी है। उदार्हरण – मोर क स्वर शड्ज मार्नार् जार्तार् है। 
  2. रे (ऋष्भ) – नार्भि प्रदेश से उठती हुयी वार्यु जब कण्ठ एवं शीर्श प्रदेश से टकरार्कर ध्वनि उत्पन्न करती है तो वह स्वर ऋशभ यार् रे कहलार्तार् है। इस स्वर क स्थार्न हृदय – प्रदेश है तथार् स्वभार्व शीतल एवं शुश्क, वर्ण हरार् और पीलार् मिलार् हुआ है। ब्रºमार् इसके देवतार् है। यह स्वर कफज एवं पित्तज रोगों को दूर करतार् है। उदार्हरण – पपीहे क स्वर ऋशभ मार्नार् जार्तार् है। 
  3. ग (गन्धार्र) – नार्भि से उठती हुयी वार्यु जब कण्ठ एवं शीर्श प्रदेश से टकरार्कर नार्सिक की गंध से मिश्रित होकर निकलती है, तब वह गन्धार्र कहलार्ती है। इसक स्थार्न फेफड़े हैं। स्वभार्व शीतल, रंग नार्रंगी और देवतार् सरस्वती है। यह पित्तज रोगों के शमन में विशेश लार्भकारी है। उदार्हरण – बकरे क स्वर गन्धार्र मार्नार् गयार् है। 
  4. म (मध्यम) – नार्भि प्रदेश से उठती हुयी वार्यु जब वक्ष – प्रदेश (उर- प्रदेश) तथार् हृदय से टकरार्कर मध्य भार्ग में ध्वनि करती है, तब उसे मध्यम स्वर कहार् जार्तार् है। इसक स्थार्न कंठ है। प्रकृति शुश्क, वर्ण गुलार्बी एवं पीलार् मिश्रित है। इसकी प्रकृति चंचल मार्नी गयी है और देवतार् महार्देव है। मध्यम स्वर वार्तज एवं कफज रोगों क शमन करतार् है। उहार्रण – कौआ क स्वर। 
  5. प (पंचम्) – सार्त स्वरों में पार्ँचवे क्रम पर होने के कारण तथार् पार्ँच स्थार्न (नार्भि, उर, हृदय, कण्ठ एवं शीर्श) क स्पर्श करने के कारण यह स्वर पंचम् कहलार्तार् है। पंचम स्वर क देवतार् लक्ष्मी को मार्नार् गयार् है। इसक स्वभार्व उत्सार्हपूर्ण, वर्ण लार्ल एवं स्थार्न मुख है। यह कफज रोगों के शमन में विशेश रूप से उपयोगी है। 
  6. ध (धैवत) – पहले के पार्ँच स्वरों क अनुसंधार्न करने वार्ले इस स्वर क स्वभार्व मन को प्रसन्न ओर उदार्सीन दोनों बनार्तार् है। इसक स्थार्न तार्लु मार्नार् गयार् है। इसके देवतार् गणेश हैं और यह पित्तज रोगों को दूर करने में लार्भकारी है। उदार्हरण – जैसे मेंढक क स्वर। 
  7. नि (निषार्द) – अपनी तीव्रतार् से अन्य सभी स्वरों को दबार् देने के कारण यह स्वर निषार्द कहलार्तार् है।

इसकी प्रकृति शीतल एवं शुश्क तथार् रंग कालार् है। इसक स्थार्न नार्सिक है। सूर्य इसके देवतार् मार्ने गये है। इसक स्वभार्व जोशीलार् एवं आहार्दकारी है। वार्तज रोगों के शमन के लिये इसक प्रयोग कियार् जार्तार् है। उदार्हरण – हार्थी क स्वर निषार्द मार्नार् गयार् है।

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