श्री अरविन्द क जीवन परिचय

श्री अरविन्द क जन्म 15 अगस्त, 1872 को कलकत्तार् में हुआ थार्। वे तीन भाइयों में कनिष्ठ थे। उनके पितार् कृष्णधन घोष एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे। उन्होंने इंग्लैंड में चिकित्सार्शार्स्त्र क अध्ययन कियार् थार्। वे पार्श्चार्त्य संस्कृति को श्रेष्ठ मार्नते थे और उसी रंग में रंगे हुए थे। उनकी मार्तार् श्रीमती स्र्वणलतार् देवी प्रसिद्ध रार्ष्ट्रवार्दी रार्जनार्रार्यण बोस की पुत्री थी। अरविन्द के पितार् ने प्रार्रम्भ से यह प्रयार्स कियार् कि उनके बच्चों पर भार्रतीय संस्कृति क प्रभार्व न पड़े- वे पश्चिमी संस्कृति के अनुरूप पलें-बढ़ें। अत: उन्होंने बार्ल्यवस्थार् में ही अरविन्द को दाजिलिंग के आइरिश र्इसाइ स्कूल, लॉरेटो कान्वेन्ट में प्रवेश दिलार्यार् जहार्ँ अधिकांशत: अंग्रेजों के बच्चे थे। जब अरविन्द केवल सार्त वर्ष के ही थे तो उनके पितार् ने उन्हें दोनों भाइयों सहित इंग्लैंड में श्रीमती ड्रेवेट के संरक्षण में आचार्र-विचार्र और शिक्षार् ग्रहण करने के लिए छोड़ दियार्। 1885 र्इ0 में अरविन्द क प्रवेश लन्दन के प्रसिद्ध सेन्टपॉल स्कूल में करार्यार् गयार्। पार्ँच वर्ष की अल्पअवधि में ही उन्होंने पार्श्चार्त्य शार्स्त्रीय भार्षार्ओं- ग्रीक और लैटिन में दक्षतार् प्रार्प्त कर ली। सार्थ ही यूरोप की आधुनिक भार्षार्ओं अंग्रेजी, फ्रेंच, इटार्लियन, जर्मन और स्पेनिश क भी उन्होंने अध्ययन कियार्। इतनी भार्षार्ओं पर अधिकार कोर्इ अत्यन्त ही कुशार्ग्र बुद्धि क छार्त्र कर सकतार् है।

1889 र्इ0 में उन्होंने कैम्ब्रिज के किंग्स कालेज में प्रवेश लियार्। यहार्ँ अध्ययन के दौरार्न उन्होंने आर्इ0सी0एस0 की परीक्षार् की तैयार्री की। आर्इ0सी0एस0 की नौकरी को अधिक सम्मार्न प्रार्प्त थार्- वस्तुत: भार्रत में ये सर्वोच्च नौकरशार्ह होते थे। और इसमें प्रार्य: अंग्रेज ही सफल होते थे। इस परीक्षार् में अरविन्द ने ग्यार्रहवार्ं स्थार्न प्रार्प्त कर उल्लेखनीय सफलतार् पाइ। पितार् क स्वप्न तो पूरार् हो रहार् थार् पर पुत्र को अंग्रेजों की दार्सतार् स्वीकार नहीं थी। अत: वे जार्नबूझ कर घुड़सवार्र की परीक्षार् में अनुपस्थित रहे- इस तरह से उन्होंने आर्इ0सी0एस0 की नौकरी क स्वेच्छार् से त्यार्ग कर दियार्।

अरविन्द विद्यार्थ्री जीवन से ही भार्रत की परतंत्रतार् को अत्यन्त ही दुर्भार्ग्यपूर्ण मार्नते थे। स्वतंत्रतार् हेतु संघर्षरत रार्जनीतिक संस्थार्ओं ‘इंडियन मजलिस’ तथार् ‘द लौटस एण्ड डैगर’ के सम्पर्क में इंग्लैंड में आये। इंग्लैंड के प्रभुत्व के विरूद्ध संघर्ष कर रहे आयरिश स्वतंत्रतार् सेनार्नियों ने भी अरविन्द को उत्कट देशप्रेम की भार्वनार् से ओत-प्रोत कर दियार्।

1893 में भार्रत लौटने पर अरविन्द ने बड़ौदार् के उदार्र एवं प्रगतिशील महार्रार्जार् सयार्जीरार्व के यहार्ँ तेरह वर्षों तक विभिन्न प्रशार्सनिक एवं अकादमिक पदों पर कार्य कियार्। इस दौरार्न उन्होंने बंगलार् एवं संस्कृत क गहन अध्ययन कियार्। उन्होंने कालिदार्स एवं भतर्श्हरि के कार्यों क अंग्रेजी में अनुवार्द कियार्।

उपनिषदों, पुरार्णों और भार्रतीय दर्शन के अध्ययन ने उनके मार्नस को गहराइ से प्रभार्वित कियार्। वे अपनी स्थिति के बार्रे में लिखते है ‘‘मुझमें तीन तरह के पार्गलपन हैं- प्रथम, मैं मार्नतार् हूँ कि सार्री सम्पत्ति प्रभु की है और उसे प्रभु के कार्य में लगार्नार् चार्हिए। दूसरार् पार्गलपन यह है कि चार्हे जैसार् हो, मैं भगवार्न क सार्क्षार्त् दर्शन करनार् चार्हतार् हूँ और तीसरार् पार्गलपन यह है कि मैं अपने देश की नदियों, पहार्ड़ों, भूमि एवं जंगलों को एक भौगोलिक सत्तार्मार्त्र नहीं मार्नतार्। मैं इसे मार्तार् मार्नतार् हूँ और इसकी पूजार् करतार् हूँ।’’

1901 में अरविन्द क विवार्ह मृणार्लिनी देवी से हुआ। अरविन्द क जीवन अब भी योगी की तरह सार्दगी पूर्ण रहार्। बंगार्ल में बढ़ती रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् को दबार्ने के लिए 1905 में लाड कर्जन ने बंगार्ल क विभार्जन कर दियार्। पूरे भार्रत और विशेषकर बंगार्ल में अंग्रेजी सरकार के इस कदम क उग्र विरोध हुआ। अरविन्द बंगार्ल लौट आए और सक्रिय रार्जनीति में कूद पड़े। स्वदेशी आन्दोलन और रार्ष्ट्रीय शिक्षार् के प्रसार्र में अरविन्द ने अहम भूमिक निभाइ। कल्र्क पैदार् करने वार्ली औपनिवेशिक शिक्षार् के विकल्प के रूप में रार्ष्ट्रवार्दी भार्रतीयों ने कलकत्तार् में ‘‘नेशनल कौंसिल ऑफ एजुकेशन’’ क गठन कियार्। श्री अरविन्द एक रार्ष्ट्रीय महार्विद्यार्लय के प्रार्चाय बने। विपिन चन्द्र पार्ल द्वार्रार् शुरू की गयी रार्ष्ट्रीय पत्रिक वन्दे मार्तरम् के सम्पार्दक श्री अरविन्द नियुक्त किए गए। इनके सम्पार्दकत्व में वन्दे मार्तरम रार्ष्ट्रीय पुनरूत्थार्न एवं क्रार्न्तिकारी विचार्रों क सर्वप्रमुख वार्हक बन गयार्। सार्थ ही ‘युगार्न्तर’ जैसी क्रार्न्तिकारी विचार्रधार्रार् की पत्रिकाओं में भी वे लगार्तार्र अपने ओजस्वी विचार्र रख रहे थे। इसी दौरार्न उन्होंने स्वंय अंग्रेजी में ‘कर्मयोगिन’ नार्मक पत्रिक क सम्पार्दन और प्रकाशन प्रार्रम्भ कियार्। बार्द में बंगलार् भार्षार् में ‘धर्म’ नार्मक सार्प्तार्हिक क सम्पार्दन एवं प्रकाशन कियार्। अब श्री अरविन्द की ख्यार्ति पूरे देश में एक अग्रणी रार्जनेतार् और प्रखर विचार्रक के रूप में होने लगी। स्वतंत्रतार् सेनार्नी उनसे प्रेरणार् ग्रहण करते थे। 1908 में मुजफ्फरपुर में खुदीरार्म बोस द्वार्रार् अंग्रेजों पर बम फेंके जार्ने वार्ले मार्मले में श्री अरविन्द को भी गिरफ्तार्र कर लियार् गयार्। 1909 में जेल से रिहार् हुए। कर्मयोगिन में प्रकाशित एक लेख के आधार्र पर अरविन्द पर रार्जद्रोह के मुकदमे की तैयार्री होने लगी। इस दौरार्न वे रार्जनीति से सन्यार्स लेकर पहले चन्द्रनगर फिर पार्ण्डिचेरी चले गए। पार्ण्डिचेरी अब उनकी कर्मभूमि एवं तपोभूमि बन गर्इ।

1910 से 1917 तक सावजनिक जीवन क पूर्णत: त्यार्ग कर अरविन्द गम्भीर सार्धनार् में लीन रहे। फ्रार्ंस में जन्मी मीरार् रिचाड 1914 में श्री अरविन्द के सम्पर्क में आर्इ। 1920 से आश्रम उन्हीं की देख रेख में आगे बढ़तार् गयार्। उन्हें ‘श्री मार्ँ’ के नार्म से पुकारार् जार्ने लगार्। उन्हीं के सुझार्व पर श्री अरविन्द ने ‘आर्य’ नार्मक एक मार्सिक पत्रिक निकालनार् प्रार्रम्भ कियार्। इसमें अरविन्द के प्रमुख कार्यों क प्रकाशन हुआ। पार्ण्डिचेरी में अरविन्द के सार्थ अनेक उपार्सक, सार्धक एवं उनके अनुगार्मी रहने लगे। 1926 र्इ0 में अरविन्द आश्रम की स्थार्पनार् की गर्इ। अरविन्द पार्ण्डिचेरी में चार्र दशक तक सर्वार्ंग योग की सार्धनार् में रत रहे। इस महार्योगी ने 5 दिसम्बर, 1950 को रार्त्रि में चिर- समार्धि ले ली।

महर्षि अरविन्द एक महार्न लेखक थे। उनकी पहली पुस्तक कवितार्-संग्रह थी जो सन् 1995 में प्रकाशित हुर्इ और अंतिम कृति ‘सार्वित्री’ थी जो 1950 में प्रकाशित हुर्इ। उन्होंने कवितार्ओं एवं नार्टकों के अतिरिक्त धर्म, अध्यार्त्म, योग, संस्कृति एवं समार्ज पर अनेक पुस्तकों एवं निबन्धों को लिखार्। उनकी प्रमुख कृतियार्ँ हैं दि लार्इफ डिवार्इन, दि सिन्थिसि ऑफ योग, एसेज ऑन दि गीतार्, दि फार्उन्डेशन्स ऑफ इन्डियन कल्चर, दि फ्यूचर पोयट्री, दि ह्यूमन सार्इकिल, दि आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी, सार्वित्री आदि।

श्री अरविन्द क भार्रत आगमन

बड़ौदार् के महार्रार्जार् सार्यार्जी रार्व गार्यकवार्ड़ इंग्लैण्ड गये हुये थे। वह भार्रत के रार्जार्ओं में सर्वार्धिक प्रबुद्ध और प्रतिभार् सम्पन्न रार्जार् थे और अपने कर्मचार्रियों क सार्वधार्नी और विवेक से चुनार्व करने के लिए प्रसिद्ध थे। मार्हार्रार्जार् ने श्री अरविन्द क इन्टरव्यू लियार् और परिणार्मस्वरूप श्री अरविन्द बड़ौदार् रार्जय की सेवार् में लिये गये। इस प्रकार भार्रत आने के पूर्व ही उनकी नियुक्ति हो गयी।

चौदह वर्ष तक विदेष में रहकर 1893 में श्री अरविन्द भार्रत लौट आये और नौकरी करने बड़ौदार् पहुँचे। वह 1907 तक लगार्तार्र तेरह वर्ष वहार्ँ नौकरी करते रहे। जब तक श्री अरविन्द बड़ौदार् की नौकरी में रहे, प्रत्यक्ष रूप से रार्जनीति में भार्ग नहीं ले सके थे। यद्यपि बार्द के वर्षों में रार्ष्ट्रीय गतिविधियों में भार्ग लेने के लिये वह लम्बी-लम्बी छुिट्ट्यार्ँ लेते थे। उन्होंने प्रच्छन्न रूप से रार्जनीतिक गतिविधियों क संचार्लन करनार् उचित समझार् तार्कि प्रकट रूप से उनक नार्म भी मार्लूम न हो सके।

बड़ौदार् में दो-तीन सरकारी पदों पर काम करने के पष्चार्त् उनको वहार्ँ के कालेज में फ्रार्ंसीसी भार्षार् क प्रोफेसर बनार् दियार् गयार्। कॉलेज में भी वे निरन्तर उन्नति करते गये और सन् 1906 में जब रार्जनैतिक कार्य करने के लिये उन्होंने कॉलेज को छोड़ार् तब वे वार्इस प्रिंसिपल के पद पर काम कर रहे थे। उन्हें उस समय 750 रू मार्सिक वेतन मिल रहार् थार् जो आज के सार्पेक्ष लगभग 95000 (पंचार्नवे हजार्र रूपये) थार्। बड़ौदार् पहुंचते ही अरविन्द भार्रतीय भार्षार्ओं संस्कृति, इतिहार्स और धर्म के अध्ययन में मग्न हो गये वह पार्ष्चार्त्य परम्परार् के प्रकाण्ड थे ही। उन्होंने हिन्दी क भी अध्ययन कियार्। उन्होंने संस्कृत भार्षार् के मार्ध्यम से बंगलार् भार्षार् ही नहीं सीखी बल्कि अंग्रजी भार्षार् के मार्ध्यम से संस्कृत सीखी।

बड़ौदार् में सभी सार्हित्यों क ऐतिहार्सिक तुलनार्त्मक अध्ययन करने के उपरार्न्त उन्होंने बेदों के महत्व को अनुभव करनार् आरम्भ कर दियार् थार्। पार्रस्परिक पार्श्चार्त्य बौद्धिक परम्परार् में रंगे श्री अरविन्द के मन पर भार्रतीय दर्शन के मूल स्त्रोत के अध्ययन क गहरार् असर पड़ार्। बड़ौदार् रहते हुए भी बंगार्ल के क्रार्ंतिकारी आन्दोलन के बौद्धिक नेतार् श्री अरविन्द ही थे। बड़ौदार् रार्ज्य की नौकरी 8 फरवरी 1893 को स्वीकार की थी और से वहार्ँ से 18 जून 1907 को त्यार्गपत्र देकर वह सेवार्मुक्त हुये। इस तरह बड़ौदार् में उनक कुल आवार्स काल 13 वर्ष 5 महीने और 18 दिनों क रहार् जो सम्भवत: उनके इंग्लैण्ड प्रवार्स के लगभग ही थार्।

वैवार्हिक जीवन

सन् 1907 में श्री अरविंद क विवार्ह रार्ँची, बिहार्र के निवार्सी श्री भूपार्लचन्द्र बोष की कन्यार् मृणार्लिनी देवी से हो गयार्। यद्यपि अपनी पत्नी के सार्थ श्री अरविन्द क व्यवहार्र सदैव प्रेम पूर्ण रहार्, पर ऐसे असार्धार्रण व्यक्तित्व वार्ले महार्पुरूष की सहधर्मिणी होने से उसे सार्ंसार्रिक दृष्टि से कभी इच्छार्नुसार्र सुख की प्रार्प्ति नहीं हुर्इ। प्रथम तो रार्जनीतिक जीवन की हलचल के कारण उन्हें पति के सार्थ रहने क अवसर कम ही मिल सक फिर आर्थिक दृष्टि से भी श्री अरविन्द क जीवन जैसार् सीधार्-सार्दार् थार्, उसमें उसे कभी वैभवपूर्ण जीवन के अनुभव करने क अवसर नहीं मिलार्, केवल जब तक वे बड़ौदार् में रहे, वह कभी-कभी उनके सार्थ सुखपूर्वक रह सकीं। लेकिन जब समय तथार् परिस्थितियों की मार्ँग के अनुसार्र पॉण्डिचेरी जार्कर रहने लगे तो उनकी बढ़ी हुर्इ योग-सार्धनार् की दृष्टि से पत्नी क सार्थ निरार्पद नहीं थार् तो भी कर्तव्य भार्वनार् से उन्होंने पॉण्डिचेरी आने को कह दियार् पर उसी अवसर पर इनफ्लुएंजार् की महार्मार्री से आक्रमण से उनक देहार्वसनार् हो गयार्। श्री अरविन्द ने प्रार्रम्भ में ही मृणार्लिनी को अपने तीन पार्गलपन के बार्रे में बतार्यार् थार्-

  1. मुझे जो र्इष्वर ने दियार् है उसमें से केवल निर्वार्ह हेतु अपने पार्स रखकर बार्कि सब दुसरों को देनार् चार्हतार् हूँ यदि र्इष्वर क अस्तित्व सत्य है तो। 
  2. मैं र्इष्वर क सार्क्षार्त्कार करनार् चार्हतार् हूँ। 
  3. मैं भार्रत को अपनी मार्ँ मार्नतार् हूँ और उसे पूजनार् चार्हतार् हूँ। मेरे पार्स जो कुछ भी वह भार्रत मार्तार् क ही है। ये तीन पार्गलपन अरविन्द के जीवन में अत्यन्त उल्लेखनी प्रसंग है। 

रार्जनैतिक जीवन से अध्यार्त्मिक जीवन में प्रवेश

श्री अरविन्द की जीवन यार्त्रार् में अब रार्जनैतिक क्रार्न्ति की अग्नि प्रज्वलित होने लगी। उनके व्यक्तित्व में भरे हुए सार्हस, कौषल तथार् देषप्रेम की भार्वनार् इस घटनार्ओं से मुखरित होते हैं। 30 अप्रैल को एक घोड़ार् गार्ड़ी पर यह समझ कर बम फेंक गयार् कि उसमें किंग्स फोर्ड बैठे हैं जबकि मुजफ्फरपुर नगर कल्ब से दो महिलार्यें अपने घर जार् रही थीं। मि. फोर्ड तो बच गये पर दोनों महिलार्ओं की मृत्यु हो गर्इ। इस उपद्रव से क्षुब्ध होकर ब्रिटिष सरकार ने 2 मर्इ को कलकत्तार् में उन अनेक स्थार्नों की तलार्ष करवार्यी जिन पर पहले से ही निगरार्नी की जार् रही थी। ये विभिन्न स्थार्न थे 32 मुरार्री पुक्कुर गाडन, 15 गोपी मोहन दत्तार् लेन, 33/4 रार्जार्नार्वार्क्रिस्तार् स्ट्ीट, 430/2 तथार् 134 हैरीसन रोड, 48 ग्रे स्टीट रोड इत्यार्दि। इन सबमें श्री अरविन्द क कलकत्तार् क निवार्स स्थार्न सबसे ऊँचार् थार्। बार्ग में श्री अरविन्द घोष सहित 13 षड्यंत्रकारियों को पकड़ार् गयार्।

8 मर्इ प्रार्त: 5 बजे अरविन्द को उसके घर से गिरफ्तार्र कर लियार् गयार्। जिसक वर्णन उन्होंने कारार्-कहार्नी नार्मक पत्र में कियार् थार्। एक दिन हवार्लार्त में रहने के पष्चार्त श्री अरविन्द को अलीपुर जेल भेजार् गयार्। अरविन्द को जमार्नत में भी नहीं छोड़ार् गयार्। 19 अगस्त 1908 मुकदमार् सेषन के सुपुर्द कियार् गयार् पैसार् खत्म होने के कारण अरविन्द के वकील ने पैरवी करनी छोड़ दी। ऐसे में चितरंजन दार्स नार्मक वकील ने नि:षुल्क मुकदमें की पैरवी की। इस मुकदमें में 206 सार्क्षियों के बयार्न लिये गये 4000 दस्तार्वेज पेष किये गये बम, बन्दूक, गोलार् आदि विस्फोटक विषैले अम्ल और अन्य प्रस्फोटक मिलार्कर 5000 वस्तुऐ सार्क्ष्य सार्मग्री के रूप में प्रस्तुत की गर्इ थी मुकदमार् सेषन जज की बीच कम्पार्ट की अदार्लत में थार् जो कि कैम्ब्रिज में अरविन्द के सहपार्ठी थे ग्रीक की परीक्षार् में उनके बार्द दूसरार् स्थार्न पार् सके थे। 136 दिन तक सुनवाइ चली 9 दिन तक चितरंजन दार्स ने भार्षण दियार् जो कि अद्वितीय थार्। 6 मर्इ 1909 को अदार्ल ने अपनार् निर्णय दियार् जिसमें अरविन्द को बरी कर दियार् गयार्।

श्री अरविन्द के जीवन को भी अलीपुर कारार्गार्र के ‘ आश्रमवार्स’ ने एक नयी दिषार् दी। जेल में श्री अरविन्द क योगार्भ्यार्स, दैवी अनुभूतियार्ँ, आत्मचिन्तन और गीतार् उपनिषद् पर विचार्र चलतार् रहार्। वहार्ं ध्यार्नस्थ मुद्रार् में उन्हें विवेकानन्द की वार्णी भी सुनाइ दी। अपने सब अनुभवों क विवरण श्री अरविन्द ने बार्द में पार्ंडिचेरी में सार्धकों के सार्थ बार्तचीत करते हुए समय-समय पर सुनार्यार् थार्। 14 मर्इ 1909 को उन्होंने देषवार्सियों के नार्म एक पत्र में कृतज्ञतार् व्यक्त की और लिखार् कि जिन लोगों ने प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष रूप में मेरे प्रवार्स के दौरार्न मेरी मदद की हैं, मैं उनक अभार्री हूँ। यदि देष के प्रति मेरे प्रेम ने मुझे खतरे में डार्लार् थार् तो देषवार्सियों के प्रेम ने मुझे उस खतरे से सुरक्षित निकाल लियार् है।

30 मर्इ 1909 को श्री अरविन्द में उत्तरपार्ड़ार् अभिभार्षण में एक जनसभार् को सम्बोधित कियार्। उनक यह उत्तरपार्ड़ार् अभिभार्षण बहुत प्रसिद्ध है। अपने जेल प्रवार्स की अनुभूतियों क विवरण और भार्वी कार्यक्रम की रूपरेखार् क संकेत करते हुए श्री अरविन्द ने उत्तरपार्ड़ार् में कहार् थार्- भार्रत क उठनार् दूसरे देषों की तरह नहीं है। वह अपने लिये नहीं उठ रहार् है कि दुर्बलों को कुचले। वह संसार्र पर उस शार्ष्वत प्रकाष को फैलार्ने के लिए उठ रहार् है, जो उसे सौंपार् गयार् है। भार्रत क अस्तित्व सदार् से ही मार्नवतार् के लिए रहार् है, अपने लिए नहीं, अत: यह आवष्यक है कि वह महार्न- बने अपने लिए नहीं मार्नवतार् के लिए।

बार्द में भार्रत के वार्यसरार्य लाड मिन्टों के अरविन्द को देष निकालार् दियार् जार्ने क प्रस्तार्व ठुकरार् दियार् गयार्। अरविन्द ने एक दिन की घटनार् को बतार्ते हुए कहार् है कि- मै आगार्मी घटनार्ओं के बार्रे में अपने मित्रों की जोषपूर्ण टिप्पणियार्ँ सुन रहार् थार् कि मुझे,ऊपर से मेरे सुपरिचित स्वर में एक आज्ञार् मिली, केवल तीन शब्दों में ‘चन्द्रनगर को जार्ओं’। बस, कोर्इ 10 मिनट के अन्दर में चन्द्रनगर जार्ने वार्ली नार्व में सवार्र थार्। उसके बार्द उसी ‘ आज्ञार्’ के अनुसार्र मैं चन्द्रनगर भी छोड़कर 4 अप्रैल 1910 को पॉडिचेरी जार् पहुँचार्, पॉडिचेरी पहुँच कर श्री अरविन्द ने रार्जनीतिक गतिविधियों में भार्ग लेनार् छोड़ दियार्। वह पुन: भार्र आने के उद्देष्य से गये थे परन्तु मार्नव जार्ति के लिए 19वीं शतार्ब्दी में होने वार्ली भौतिक क्रार्न्ति के सार्थ वह बौद्धिक क्रार्न्ति की आवष्यकतार् क अनुभव कर रहे थे। उनकी दृष्टि में भार्रत अब भी अपने गौरवमय अतीत में मार्नवतार् के भविष्य में कुंजी लिये हुए थार्। अत: उन्होंने अपनी शक्ति को रार्जनीतिक गतिविधियों से हटार्कर इस दूसरी दिषार् में लगार् दियार्। 1905 से 1910 तक की अपनी क्रार्न्तिकारी गतिविधियों के परिणार्मों पर प्रकाष डार्लते हुए 1914 में हिन्दू पत्र के संवार्ददार्तार् को बतार्ते हुए उन्होंने कहार्-1905 से 1910 तक की गतिविधयों की उपलब्धि भार्रत में संपूर्ण मार्नवतार् से अलग रार्ष्ट्रीय स्तर को प्रार्प्त करनार् थार्। उस आन्दोलन ने उस कार्य की पूर्ति कर दी। भविष्य के लिए एक अच्छी नींव क निर्मार्ण कर दियार्। वार्स्तव में कहार् जार् सकतार् है कि 1910 तक वह संकुचित अर्थवार्ली रार्जनीति से ऊपर उठ गये थे। इस तरह श्री अरविन्द के रार्नीतिक दर्शन की टेक, आध्यार्त्मिक रार्ष्ट्रवार्द-अन्त में उनको यहार्ं तक ले गर्इ कि वह रार्नीति को ही त्यार्गकर आध्यार्त्मिक उन्नति के मार्ध्यम से अन्तिम समार्धार्न की खोज में लग गए केवल अपने लिए नहीं, बंगार्ल के लिये नहीं, भार्रत के लिये नहीं बल्कि सम्पूर्ण मार्नवतार् के लिये। 1910 से 1950 तक उनके जीवन के अन्तिम चार्लीस वर्ष इस महार्न और उच्च आदर्ष को यथार्षीघ्र प्रार्प्त करने के प्रयत्न में ही बीते। 18 वर्ष की उम्र में श्री अरविन्द ने ‘हकोवार्’ नार्मक ग्रीक अनुच्छेद क अनुवार्द कियार् थार्। अकसर वह ग्रीक और लैटिन भार्षार् में लिखार् करते थे। इंग्लैण्ड में लिखी गयी उनकी प्रार्रम्भिक कवितार्ओं के संग्रह क नार्म ‘सार्ंग्स टू मर्टिलार्’ है।

पत्रकारितार् के क्षेत्र में योगदार्न

श्री अरविन्द ने पत्रकारितार् के क्षेत्र में आष्चर्य जनक ख्यार्ति प्रार्प्त की थी। उनक एक-एक लेख ऐसार् प्रतीत होतार् थार् जैसे कि शीघ्र ही ब्रिटिष शार्सन की नींव भार्रत से लिने वार्ली है। 1886 में लन्दन के स्कूल से ही उन्होंने कवितार्ऐं लिखनी शुरू कर दी थीं, 64 वर्ष की आयु में 1950 में उन्होंने सार्वित्री महार्काव्य ग्रन्थ क प्रकाषन कियार्। अलीपुर केन्द्रीय जेल के अनुभव पर कारार् कहार्नी नार्मक लेख बंगार्ली भार्षार् में लिखार् जहार्ँ पर वे 1908-1909 तक बन्दी रहे थे।

1893-1909 तक समस्त लेख बंगार्ली में ही होते थे। इसके अतिरिक्त अपने जीवन के 78 वर्ष के दौरार्न अंग्रेजी भार्षार् में ही लेख लिखे थे। 1893-94 के दौरार्न उन्होंने बहुत से लेख एक सार्मार्न्य शीर्षक पुरार्नों के लिये नये दीप के अन्तर्गत इन्दुप्रकाष बम्बर्इ के मरार्ठी पत्र को दिए। 1905 में उन्होंने बंगार्ल में बन्दे मार्तरम् पत्र क सम्पार्दन भी कियार्। वीरेन्द्र कुमार्र घोष द्वार्रार् प्रकाषित बंगार्ल के प्रसिद्ध क्रार्ंतिकारी सार्प्तार्हिक ‘युगार्न्तर’ में भी अरविन्द के पत्र छपते थे। अलीपुर बम केस से मुक्त होने के बार्द 9 जून 1909 अरविन्द ने सार्प्तार्हिक पत्रिक ‘कर्मयोगिनी’ क पहलार् अंक प्रार्रम्भ की। 1909 में सार्प्तार्हिक पत्रिक धर्म जो की बंगार्ली में भी प्रार्रम्भ थी। 

अरविन्द ने 1906-1910 तक 5 वर्ष तक सम्पार्दन कार्य कियार्। यत्र-तत्र वह विभिन्न पत्रिकाओं में बिनार् अपनार् नार्म दिये हुऐ सम्पार्दकीय देते रहे। अपने लेख और पत्रिकाओं के मार्ध्यम से अरविन्द क स्वरूप सार्मने आयार् उसने उन्हें रार्ष्ट्रीय पत्रकारों की प्रथम श्रेणी में लार्कर खड़ार् कर दियार्। उनक लोहार् अंग्रजी सरकार के पत्र और प्रषार्सन भी मार्नने लगे।

श्री अरविन्द एक रार्ष्ट्रीय पत्रकार के रूप में अग्रणी और सर्वमार्न्य ही नहीं, वह प्रतीक के रूप में है। उन्होंने अपने लेखों और पत्रकारितार् के मार्ध्यम से नवचेतनार् को जार्ग्रत की ही, नवयुवकों और देष को एक नयार् दृष्टिकोण प्रदार्न कियार्। अरविन्द द्वार्रार् लिखित प्रमुख ग्रन्थ के नार्म है- दिव्य जीवन, योग समन्वय, वेद रहस्य, गीतार् प्रबन्धन, केन उपनिषद्, र्इशोपनिषद्, योग के आधार्र, मार्नव एकतार् क आदर्ष, मार्नव विकास चक्र, भार्वी कवितार् दिसम्बर, द सैसार्ंज इन इण्डिसार्, इज इण्डिजार् सिविलार्इज्ड, भार्रतीय संस्कृति की तर्क बुद्धि परक समीक्षार्, भार्रतीय संस्कृति के बचार्व में आदि।

यौगिक एवं सार्धनार्त्मक जीवन

श्री अरविन्द जब भार्रत आये तब वे आध्यार्त्मिक विषयों से बिल्कुल अनजार्न थे। हिन्दू धर्म संस्कति से उन्हें जरार् भी परिचय नहीं थार्। श्री अरविन्द फरवरी 1893 में भार्रत लौटे। भार्रत की धरती पर पार्ंव रखते ही श्री अरविन्द ने अनुभव कियार् के उन पर एक गंभीर शार्ंति क अवतरण हुआ है और वह शार्ंति उन्हें चार्रों ओर से लपेटे रहती थी। स्वयं उन्होंने एक चर्चार् में बतार्यार् थार् “भार्रत में आने के बार्द से मेरार् जीवन और मेरार् योग दोनों ही, एक सार्थ लौकिक और परलौकिक रहे हैं, अपोलो बंदरगार्ह पर पैर रखते ही मुझे आध्यार्त्मिक अनुभूतियार्ं होने लगी थीं लेकिन ये संसार्र से अलग ले जार्ने वार्लीं न थीं।” यह 1893 क वर्ष भार्रतवर्ष के लिए शुभ वर्ष सिद्ध हुआ। क्योंकि इसी वर्ष में श्री अरविन्द ने भार्रत में पदापण कियार् थार्, इसी वर्ष में स्वार्मी विवेकानन्द षिकागों के सर्वधर्म सम्मेलन में भार्ग लेने के लिए अमेरिक गये और इसी वर्ष गार्ंधीजी भार्रतीयों के मार्मले को हार्थ में लेकर दक्षिण अफ्रीक गये और इसी वर्ष भगिनी निवेदितार् भार्रतवर्ष आयी।

एक समय श्री अरविन्द घोड़ार्-गार्ड़ी में बैठकर कहीं जार् रहे थे। घोड़ार्-गार्ड़ी कमार्टी बार्ग के पार्स आर्इ तब उनके अंतर में अचार्नक ऐसार् लगार् कि घोड़ार् एक कदम आगे बढ़ार् तो दुर्घटनार् हो जार्येगी। उनके अंतर में इस दुर्घटनार् क दृष्य एक क्षण में स्पष्ट हो गयार्, परंतु उनके आष्चर्य के बीच, उनके अंदर से तेजोमय पुरूष बार्हर आयार् और घोड़े की लगार्म हार्थ में लेकर खींच ली, घोड़े पर काबू कर लियार् और घोड़ार् रूक गयार्। वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सका।

श्री अरविन्द क भार्रत में आगमन ही आध्यार्त्मिक अनुभूति से हुआ। इस सपरम शार्ंति के अपने भीतर अवतरण के सार्थ एक दूसरी अनुभूति भी हुर्इ। दाजलिंग के स्कूल में जिस तमस ने घेर लियार् थार् और जो पूरे इंग्लैण्ड में निवार्स के दौरार्न समयार् रहार्। वह इस शार्न्ति के आते ही चलार् गयार्। शरीर छोड़कर चली गयी आत्मार्ओं क जगत में से बुलार्कर उनके सार्थ संपर्क हो सकतार् हैं इसक अनुभव भी श्री अरविन्द को बड़ौदार् में हुआ। प्लेन्चेट के प्रयोग द्वार्रार् टेबल पर टकोर करके, उसके द्वार्रार् प्रश्नों के उत्तर प्रार्प्त करते थे। वे प्लेन्चेट द्वार्रार् आत्मार्ओं को बुलार्ते थे। एक बार्र श्रीरार्मकृष्ण परमहंस की आत्मार् को बुलार्यार् गयार् थार्। वे कुछ बोले नहीं थे, जार्ते-जार्ते उन्होंने मार्त्र इतनार् कहार् थार्, ‘मंन्दिर बनार्ओ-मन्दिर बनार्ओ’। उस समय भवार्नी मन्दिर की योजनार् सबके मन में चल रही थी। इसलिए इन शब्दों क अर्थ ‘भवार्नी’ मन्दिर क निर्मार्ण करों ऐसार् सबने लियार्, परंतु वर्ष बार्द यौगिक सिद्धियार्ँ प्रार्प्त करने के बार्द श्री अरविन्द में इन शब्दों क सही अर्थ करते हुए बतार्यार् कि ‘मन्दिर बनार्ओ’, इसक अर्थ है कि तुम अपने अंदर मार्ँ क मन्दिर बनार्ओ। अपने आप को ऐसार् रूपार्न्तरिक कर दो कि वह मार्ँ के मन्दिर क रूप बन जार्ये।

अनन्त ब्रह्म के सार्क्षार्त्कार की अनुभूति भी उनके जीवन में अनार्यार्स उत्तर आयी थी। उस समय वे महार्रार्जार् सयार्जीरार्व गार्यकवार्ड़ के सार्थ कष्मीर गये थे, तब उन्हें निर्वार्ण यार् ब्रह्म के विषय कोर्इ ज्ञार्न नहीं थार्। उन्होंने शार्स्त्रों क ऐसार् कोर्इ अध्ययन भी नहीं कियार् थार् फिर भी तख्त-ए-सुलेमार्न की टेकरी, जिसे शंकर आचाय की टेकरी भी कहते हैं उसी पर अनन्त ब्रह्म क अनुभव हुआ। इस अनुभूति के विषय में उन्होंने षिष्यों से वातार्लार्प में कहार् थार्, काष्मीर में तख्त-ए-सुलेमार्न की टेकरी पर शून्य में सभी वस्तुएँ लोप होने लगीं, मैं स्वयं और समग्र विष्व एक सर्व-व्यार्पी अगम्य शून्य में विलीन हो रहे हैं, ऐसार् मुझे लगार् थार्। इस अनुभव क व्यक्त करते हुए उन्होंने अद्वैत नार्म की कवितार् भी लिखी थी।

इसी प्रकार पत्थर की मूर्ति में भगवार्न हो सकते हैं, ऐसार् पहले श्री अरविन्द को स्वीकार नहीं थार्। परंतु चार्ंदौर-करनार्ली में एक छोटे काली मन्दिर में गये वहार्ँ उन्होंने मार्ँ काली की पार्षार्ण प्रतिमार् की ओर देखार् तो वह मार्त्र पार्षार्ण प्रतिमार् न थी, अपितु सार्क्षार्त मार्ँ काली थीं। इस आध्यार्त्मिक अनुभव से मूर्तिपुजार् के विषय में उनकी शंक निर्मूल हो गर्इ। तो इस प्रकार अनार्यार्स हुए सब आध्यार्त्मिक अनुभवों ने श्री अरविन्द के यूरोपियन संस्कार संपन्न मार्नस में आध्यार्त्मिक जगत के प्रति आकर्षण जगार् दियार्। उनके अंतर को मोड़ दी जिसने उन्हें योग के माग पर सहज रूप में अतंत: लार् ही दियार्।

श्री अरविन्द की मौन सार्धनार्

इस आध्यार्त्मिक अनुभूतियों ने श्री अरविन्द को योग के गहरे आयार्मों को जार्नने के लिए प्रेरित कियार्, जिससे योग में श्री अरविन्द की रूचि जार्गी। श्री अरविन्द जगत क त्यार्ग करके योग माग पर जार्ने के बिलकुल भी इच्छुक न थे। उस समय तो उनक एकमार्त्र ध्येय भार्रत की स्वतंत्रतार् थार् और इस कार्य के लिए उन्हें आध्यार्त्मिक शक्ति की आवष्यकतार् महसूस होने लगी थी। इस बार्त के लिए तब वे और अधिक प्रेरित हुए, जब उनके छोटे भाइ वीरेन्द्र, भवार्नी मन्दिर की स्थार्पनार् के लिए विन्ध्य के जंगल गये थे। वहार्ँ से विषैलार् बुखार्र लेकर बड़ौदार् आये। यह बुखार्र किसी भी प्रकार से उतर नहीं रहार् थार्। उसी समय एक नार्गार् संन्यार्सी श्री अरविन्द के घर आयार्। वीरेन्द्र की बिगड़ी स्थिति में वहीं सोये पड़े थे तभी नार्गार् सन्यार्सी की दृष्टि उन पर पड़ी और श्री अरविन्द से पूछार् कौन सोयार् है। तब श्री अरविन्द ने बतार्यार् कि वीरेन्द्र के स्वार्स्थ्य की स्थिति काफी चिंतार्जनक है। तब नार्गार् सार्धु ने एक प्यार्लार् भर जल मंगार्यार् तथार् उसे मंत्र शंक्ति से अभिमंत्रित कियार् और उसे वीरेन्द्र को पीने के लिए दे दियार्, तत्पष्चार्त वीरेन्द्र क बुखार्र उतर गयार्। इस घटनार् से श्री अरविंद ने अनुभव कियार् कि योग शक्ति क व्यवहार्र में उपयोग कर सकते हैं तो क्यों न इस शक्ति क प्रयोग देष की स्वतंत्रतार् के लिए कियार् जार्ये।

श्री अरविन्द ने विधिवत रूप से योग सार्धनार् आरंभ करने क संकल्प लियार् उस समय प्रार्णार्यार्म को विषेष योग पद्धति के रूप में जार्नार् जार्तार् थार्। तो फिर श्री अरविन्द ने अपनी योग सार्धनार् क प्रार्रंभ प्रार्णार्यार्म से ही कियार्। उनके मित्र बार्बार्जी देवधर इंजीनियर स्वार्मी ब्रह्मार्नन्द के षिष्य थे। वे प्रार्णार्यार्म के सत्त अभ्यार्सी थे, श्री अरविन्द ने इनसे ही प्रार्णार्यार्म की विधित पद्धति सीख ली थी। वे प्रतिदिन लगभग पार्ंच घण्टे प्रार्णार्यार्म करते थे। सुबह तीन घंटे तथार् शार्म को दो घंटे अभ्यार्स कियार् करते थे इस प्रार्णार्यार्म की शक्ति क अनुभव बतार्ते हुए वे बतार्ये थे- “ मेरार् अनुभव है कि इससे बुद्धि और मस्तिष्क प्रकाषमय बनते हैं। जब मै बड़ौदार् में प्रार्णार्यार्म क अभ्यार्स करतार् थार् तो प्रतिदिन 5-6 घंटे करतार् थार्। तब मन में बहुत प्रकाष और शार्न्ति छार् गर्इ हो ऐसार् लगतार् थार्। मैं उस समय कवितार् लिखतार् थार् पहले रोग 5-6 पंक्तियार्ँ और महीनें में दो सौ पंक्तियार्ँ लिखी जार्ती थी। प्रार्णार्यार्म के बार्द में दो सौ पक्तियार्ँ आधे घंटे में लिख सकतार् थार्। मेरी स्मरण शक्ति पहले मंद थीं प्रार्णार्यार्म के अभ्यार्स के बार्द जब प्रेरणार् होती तब सभी पंक्तियार्ँ अनुक्रम के अनुसार्र यार्द रख लेतार् थार्। सार्थ ही मुझे मस्तिष्क के चार्रों ओर विद्युतषक्ति क चक्र अनुभव होतार् थार्। प्रार्णार्यार्म के करने के बार्द अथक परिश्रम करने की शक्ति भी आ गर्इ थी। पहले बहुत काम करने पर थकान लगती थी प्रार्णार्यार्म से शरीर स्वस्थ हो गयार्। एक बार्त और प्रार्णार्यार्म करते समय मच्छर बहुत हो तो भी मेरे पार्स फटकते भी नहीं थे।” अब अनुभूतियार्ं इतनी प्रगार्ढ़ होने लगीं कि विश्वार्स हो गयार् कि हिन्दू धर्म क माग सत्यार्न्वेषण क ही माग है तथार् उन्होंने मार्ँसार्हार्र क भी त्यार्ग कर दियार् तथार् एक मार्ह के भीतर ही सूक्ष्म जगत आंखों के सार्मने प्रकट होने लगार्। अन्र्तदृष्टि जार्ग्रत होने लगी।

30 दिसम्बर 1907 में श्री अरविन्द बड़ौदार् आये और यही पर उनकी मुलार्कात महार्रार्ष्ट्र के सिद्ध योगी श्री विष्णु भार्स्कर लेले से हुर्इ। गिरनार्र पर्वत पर उन्होंने कठोर सार्धनार् की थी। भगवार्न दत्तार्त्रेय की सार्धनार् करते हुए उन्हें भगवार्न दत्तार्त्रेय के बार्ल स्वरूप के दर्शन हुए थे तथार् योग विद्यार् भी उनकी कृपार् से ही मिली थी। वे वीरेन्द्र को नवसार्री में मिले थे। बड़ौदार् में खार्सीरार्व यार्दव के घर पर श्री अरविन्द तथार् योगी लेले की मुलार्कत हुर्इ वहार्ं दोनों ने लगभग आधे धंटे पर बार्तचीत की तथार् श्री अरविन्द को उन्होंने कहार् कि सार्धनार् में निष्चित परिणार्म प्रार्प्त करने के लिए तुम्हें रार्जनीतिक प्रवृतियों को छोड़नार् पड़ेगार्। तब श्री अरविन्द ने कुछ दिनों के लिए रार्जनीतिक प्रवृत्ति बन्द कर दी, और उनकी योगसार्धनार् नये आयार्मों की ओर मुड़ चली । इस विषय में श्री अरविन्द ने स्वयं लिखार् है- ‘ योगी लेले ने मुझसे कहार्, बैठ जार्ओ, देखार् और तुम्हें पतार् चलेगार् कि तुम्हार्रे विचार्र बार्हर से तुम्हार्रे भीतर आते हैं। उनके घुसने से पहले ही उन्हें दूर फेंक दो, मैं बैठ गयार् और देखार्, यह जार्नकर चकित रह गयार् कि सचमुच बार्त ऐसी ही है, मैंने स्पष्ट रूप से देखार् और अनुभव कियार् कि विचार्र पार्स आ रहार् है, मार्नों सिर के भीतर से यार् ऊपर से घुसनार् चार्हतार् हो और उसके भीतर आने के पूर्व ही मैं स्पष्ट रूप में उसे पीछे धकेल देने में सफल हुआ। तीन दिन में वस्तुत: एक ही दिन में मेरार् मन शार्ष्वत शार्ंति से परिपूरित हो गयार्- वह शार्ंति अभी तक विद्यमार्न है।’ इस प्रकार उन्होंने बतार्यार् की किस प्रकार अकल्पनीय ढंग से मुझे निर्वार्ण क अनुभव हो गयार्, बहुत लम्बे समय तक यह अनुभव मेरे अंदर रहार्। मुझे लगार् कि अब मैं चार्हूँ तो भी उससे छूट नहीं सकतार् थार्। दूसरी प्रवृत्तियों में लगार् रहने पर भी यह अनुभव मुझमें स्थार्यी रूप से बनार् रहार्। इस अनुभव से श्री अरविन्द क मार्नस जगत समार्प्त हुआ तथार् ब्रह्म जगत अब उद्घटित हो गयार्। अब उनकी विचार्र करने की पद्धति ही बदल गयी। तीन ही दिन में चेतनार् इतनी परिवर्तित हो जार्येगी, इसक ध्यार्न न लेले को थार् नार् ही स्वयं श्री अरविन्द को। इस बार्रे में श्री अरविन्द ने लिखार् है- “ प्रथम फल थार् अत्यंत शक्तिशार्ली अनुभूतियों की एक श्रृंखलार् और चेतनार् में कुछ ऐसे आमूल परिवर्तन, जिनकी लेले ने कल्पनार् भी न की थी और जो मेरे निजी विचार्रों के सर्वथार् विपरीत थी, क्योंकि उन्होंने मुझे विस्मय जनक तीव्रतार् सहित स्पष्ट दिखार् दिखार् दि कि यह संसार्र परब्रह्म निरार्कार सर्वव्यार्पकतार् में चलचित्रवत् शून्य आकृतियों की लीलार् के समार्न है।”

वेदार्न्त दर्शन की चरमार्वस्थार् की सार्धनार् क प्रथम सोपार्न बनार् परंतु उन्हें एक प्रकार की समस्यार् क भी अनुभव हुआ क्योंकि ज्योंही वे तीन दिन बार्द बार्हर आये उन्हें मुम्बर्इ के रार्ष्ट्रीय पक्ष की ओर से भार्षण देने क निमंत्रण मिलार्, परंतु श्री अरविन्द की समग्र चेतनार् नीरव ब्रह्म के सार्थ एकाकार थी, वे बोलते भी तो क्यार् बोलते? यह समस्यार् श्री अरविन्द ने योगी लेले के समक्ष रखी। उन्होंने कहार् कि सभी जार्कर श्रोतार्ओं को नार्रार्यण मार्नकर नमस्कार करो और फिर ऊपर से आने वार्ली प्रेरणार् के लिये शार्ंत होकर प्रतीक्षार् करों, तुम्हें जो बोलनार् होगार् वह वार्णी अपने आप उतर आयेगी। फिर इसके बार्द श्री अरविन्द ने जो भी व्यार्ख्यार्न दिये वे सब इसी प्रकार ऊध्र्व से उतर आयी। योगी लेले और श्री अरविन्द दोनों में से किसी को यह पतार् नहीं थार् कि परमार्त्मार् क महार्न कार्य करने की पूर्व तैयार्री क तो यह प्रथम चरण है। अब श्री अरविन्द चौबीसों घंटे ध्यार्न की स्थिति में रहते थे और सार्रे कार्य अंतर्यार्मी के आदेश से होने लगे। श्री अरविन्द ने अपने इस बदली हुर्इ स्थिति के बार्रे में एक पत्र में मृणार्लिनी को बतार्यार् थार्-” तुमसे मिलने के लिये 4 जनवरी क दिन निश्चित थार्, पर मैं आ नहीं सका, यह मेरी अपनी इच्छार् से नहीं हुआ हैं जहार्ँ भगवार्न मुझे ले जार्नार् चार्हते हैं, वहार्ँ मुझे जार्नार् पड़तार् है, उस समय मैं अपने काम से नहीं गयार् थार्, भगवार्न के काम से गयार् थार्, मेरे मन की दषार् एकदम बदल गयी है अभी तो इतनार् ही कह सकतार् हूँ कि मैं मेरार् स्वार्मी नहीं हूँ। भगवार्न मुझे जहार्ँ ले जार्एं वहार्ं कठपुतली की तरह जार्नार् है। भगवार्न जो कुछ करवार्नार् चार्हते हैं मुझे कठपुतली की तरह करनार् है। अब से मैं बिल्कुल मुक्त नहीं हूँ। अब से जो कुछ कर रहार् हूँ उसक आधार्र मेरे संकल्प से नहीं परंतु यह सब भगवार्न की आज्ञार् से हो रहार् है।” र्इ.सं. 1910 से 1914 तक क समय श्री अरविन्द की मौन सार्धनार् क काल थार्। श्री अरविन्द ने सन् 1908 में योग में पद्धतिपूर्वक प्रवेश कियार् थार्। र्इ.सं. 1914 तक छ: वर्ष के अन्तरार्ल में उनके समझ नर्इ चेतनार् क अवतरण की सार्धनार् क कार्य स्पष्ट हो गयार्। 

उत्कट सार्धनार् के लिए श्री अरविन्द 1926 में एकान्त में चले गए थे। 1926 से 1938 तक क बार्रह वर्ष के उनके जीवन क कालखण्ड अभेद्य थार्। उनके सेवक श्री चंपकललार् और श्री मार्तार् जी के सिवार्य उस एकांत में किसी क प्रवेष नहीं थार्। दुर्घटनार् जिसमें उनके जार्ंघ की हड्डी टूट गर्इ थी, कुछ षिष्यों क उनके करीब जार्ने क अवसर मिलार् थार्। छ: मार्ह में वे पूर्ण स्वस्थ हो गए थे किन्तु प्रार्णपण से सेवार् करने वार्ले षिष्यों को वह विदार् नहीं कर सके। 1938 से 1950 दूसरार् बार्रह वर्ष क समय श्री अरविन्द की सार्धनार् काल क अनोखार् समय थार्। सुबह नौ, दस बजे तक वे हिन्दू समार्चार्र पत्र पढ़ते थे और फिर दोपहर तीन, चार्र बजे तक लम्बार् विरार्म होतार् थार्, जिसमें वे विशेष योग सार्धनार्यें करते थे। वे अक्सर आरार्म कुर्सी पर यार् बिस्तर यार् खुली आँखों से जार्ग्रत समार्धि में करते थे।

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