श्री अरविन्द क जीवन-दर्शन एवं शिक्षार्-दर्शन

श्री अरविन्द ने योग दर्शन के महत्व को रेखार्ंकित करते हुए आधुनिक परिवेश के अनुरूप उसकी पुनव्र्यार्ख्यार् की। उनके दर्शन को अनुभवार्तीत सर्वार्ंग योग दर्शन के नार्म से जार्नार् जार्तार् है क्योंकि उन्होंने अपने विचार्र को योग की संकुचित व्यार्ख्यार् तक सीमित रखने की जगह सत्य तक पहुँचने के लिए विभिन्न मागों को समन्वित रूप में बार्ँधकर देखने क प्रयार्स कियार्।

अरविन्द के अनुसार्र जीवन एक अखण्ड प्रक्रियार् है। चेतनार् के अनेक स्तर हैं। इसे निम्नत्तर स्तर से उठार्कर उच्चतम स्तर तक ले जार्यार् जार् सकतार् है। उन्होंने अनुभव कियार् कि आधुनिक युग में मस्तिष्क एवं बुद्धि की दृष्टि से विकास चरम को प्रार्प्त कर चुक है। अब दैवी समार्ज की कल्पनार् सार्कार की जार् सकती है। अगर इससे आगे नहीं बढ़ार् गयार् तो ह्रार्स यार् परार्भव निश्चित है। अत: इस चेतन तत्व को प्रकाश, शक्ति एवं सत्य से समन्वित करनार् आवश्यक है। क्योंकि इसी के मार्ध्यम से वह मार्नव जीवन के प्रमुख उद्देश्य अनुभवार्तीत सत्य-चेतन-तत्व में संपूर्ण रूप से रूपार्न्तरित हो सकती है।

श्री अरविन्द के अनुसार्र इस सृष्टि के रचयितार्, पार्लनकर्तार् और संहार्रक र्इश्वर है। जिसे धर्म में र्इश्वर कहार् जार्तार् है उसे ही दर्शन में ब्रह्म कहार् गयार् है। र्इश्वर सृष्टि क कर्तार्, सनार्तन और सर्वार्त्मार् है। र्इश्वर परमपुरूष है, ब्रह्म निर्विकार एवं निरार्कार है किन्तु अन्तत: दोनों एक हैं। र्इश्वर द्वार्रार् इस जगत के निर्मार्ण की प्रक्रियार् क विश्लेषण श्री अरविन्द ने दो प्रकार से कियार् है। विकास की दो विपरीत दिशार्एँ हैं- अवरोहण एवं आरोहण। ब्रह्म अवरोहण द्वार्रार् अपने को वस्तु जगत में परिवर्तित करतार् है। इसके सार्त सोपार्न हैं- सत्, चित्त, आनन्द, अतिमार्नस, मार्नस, प्रार्ण एवं द्रव्य। दूसरी प्रक्रियार् है आरोहण की। इसमें द्रव्य रूप इस जगत में मनुष्य अपने द्रव्य रूप से आरोहण द्वार्रार् सत् की ओर क्रमश: चलार्यमार्न होतार् है। इसके भी सार्त चरण हैं द्रव्य, प्रार्ण, मार्नस, अतिमार्नस, आनन्द, चित्त और सत्। अरविन्द आत्मार् को परमार्त्मार् से इस अर्थ में भिन्न मार्नते हैं कि आत्मार् में परमार्त्मार् के दो गुण- आनन्द और चित्त तो होते हैं पर सत् नहीं। विभिन्न योनियों से होते हुए आत्मार् मनुष्य योनि में प्रवेश करती है और आनन्द और चित्त के सार्थ सर्वोच्च उद्देश्य सत् को प्रार्प्त करती है। श्री अरविन्द भौतिक एवं आध्यार्त्मिक दोनों ही तत्वों के मूल में ब्रह्म को पार्ते हैं। अत: दोनों ही तरह के ज्ञार्न के एकात्मकतार् को जार्ननार् ही ज्ञार्न है। व्यार्वहार्रिक दृष्टि से ज्ञार्न को उन्होंने अन्य भार्रतीय मनीषियों की तरह दो भार्गों में बार्ँटार् है- द्रव्यज्ञार्न (यार् अपरार् विद्यार्) एवं आत्म ज्ञार्न (परार् विद्यार्)। द्रव्यज्ञार्न प्रार्रम्भ है जिसकी परिणति आत्मज्ञार्न में होनी चार्हिए। द्रव्यज्ञार्न प्रार्प्त करने क सार्धन इन्द्रियार्ँ हैं और आत्मज्ञार्न प्रार्प्त करने क सार्धन अन्त:करण है। आत्मतत्व क ज्ञार्न योग के द्वार्रार् ही संभव है। श्री अरविन्द के अनुसार्र मार्नव जीवन क उद्देश्य सत् चित्त एवं आनन्द की प्रार्प्ति है। इस महार्न लक्ष्य को गीतार् में प्रतिपार्दित कर्मयोग एवं ध्यार्नयोग द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् सकतार् है। संसार्र से पलार्यन की जगह निष्काम भार्व से कर्म करने से ही सत्, चित्त एवं आनन्द की प्रार्प्ति की जार् सकती है। पर इसके लिए स्वस्थ शरीर, विकार रहित मन एवं संयमित आचार्र-विचार्र आवश्यक है। योग के द्वार्रार् मार्नव अपने शरीर, सोच , विचार्र एवं कार्य पर नियंत्रण रख उन्हें उचित दिशार् में ले जार् सकतार् है।

श्री अरविन्द क दर्शन इस धार्रणार् पर आधार्रित है कि मार्नव क बौद्धिक विकास अपने चरम बिन्दु पर पहँुच गयार् है। इसके आगे आन्तरार्त्मिक और आध्यार्त्मिक विकास होनार् चार्हिए। यदि मार्नव इस दिशार् में नहीं बढ़तार् है तो न केवल उसक विकल्प क्रम अवरूद्ध होगार् वरन् वह पतन की ओर अग्रसर हो जार्येगार्।

इन्द्रियार्नुभव को श्री अरविन्द सर्वोच्च ज्ञार्न नहीं मार्नते थे, वरन् उसे निम्न कोटि क ज्ञार्न मार्नते थे। उनके अनुसार्र ज्ञार्न की अनेक कोटियार्ँ है और सर्वोच्च कोटि आध्यार्त्मिक अनुभूति है जिसे हम इस जगत में प्रार्प्त कर सकते हैं।

अरविन्द मनुष्य के एकांगी विकास को हार्निप्रद मार्नते थे। वे स्वस्थ समार्ज के निर्मार्ण हेतु मार्नव के सर्वार्ंगीण विकास पर जोर देते थे। इसके लिए उन्होंने प्रार्च्य एवं पार्श्चार्त्य संस्कृतियों के समन्वय पर जोर दियार्। उनके दर्शन में न तो प्रार्चीन भार्रतीय संस्कृति से पलार्यन क भार्व है न ही पार्श्चार्त्य संस्कृति क अन्धार्नुकरण। दोनों क समन्वित रूप ही बेहतर शिक्षार् व्यवस्थार् क विकास कर सकतार् है।

1907 में श्री अरविन्द ने ‘ए सिस्टम ऑफ नेशनल एडुकेशन’ नार्मक निबन्ध लिखार्। इसमें उन्होंने अपनी शिक्षार् की अवधार्रणार् को स्पष्ट करते हुए कहार् ‘‘प्रत्येक मार्नव के अन्दर कुछ र्इश्वर प्रदत्त दिव्य शक्ति है, कुछ जो उसक अपनार् है, जिसे पूर्णतार् की ओर अग्रसर कियार् जार् सकतार् है। शिक्षार् क कार्य है इसे चिन्हित करनार्, विकसित करनार् एवं उपयोग में लार्नार्। शिक्षार् क सर्वप्रमुख लक्ष्य होनार् चार्हिए विकसित होती आत्मार् की अन्तर्निहित शक्ति को पूर्णत: विकसित कर श्रेष्ठ कार्य हेतु तैयार्र करनार्।’’ 1910 में अपने एक दूसरे बहुचर्चित लेख में अरविन्द ने एक ऐसार् वार्क्य लिख जो शिक्षार् क सूत्र वार्क्य बन गयार्। उन्होंने लिखार् ‘‘सही शिक्षार् क प्रथम सिद्धार्न्त है कि कुछ भी पढ़ार्यार् नहीं जार् सकतार् है।’’

इस प्रकार स्पष्ट है कि श्री अरविन्द के विचार्र में हर व्यक्ति की आत्मार् में ज्ञार्न अन्तर्निहित है। उन्होंने सही शिक्षार् को उद्घार्टित करने क सार्धन अन्त:करण को मार्नार्। श्री अरविन्द के अनुसार्र अन्त:करण के चार्र पटल हैं- चित्त, मार्नस, बुद्धि और अन्तदर्ृष्टि। चित्त वस्तुत: भूतकालिक मार्नसिक संस्कार है। जब कोर्इ व्यक्ति कोर्इ बार्त यार्द करतार् है तो वह छन कर चित्त में संग्रहित होती है। इसी से क्रियार्शील स्मृति आवश्यकतार् एवं क्षमतार्नुसार्र कभी-कभी कुछ चीजों को चुन लेती है। सही चुनार्व हेतु उपयुक्त शिक्षार् एवं प्रशिक्षण की आवश्यकतार् पड़ती है। दूसरे पटल मार्नस को मस्तिष्क कहार् जार् सकतार् है। यह ज्ञार्नेन्द्रियों से तथ्यों को प्रार्प्त कर उसे विचार्र क रूप देतार् है। ज्ञार्नेन्द्रियों के अतिरिक्त मस्तिष्क स्वंय भी तथ्यों यार् संप्रत्ययों को ग्रहण करतार् है। अत: ज्ञार्नेन्द्रियों एवं मस्तिष्क क प्रशिक्षण लार्भदार्यक है। अन्त:करण के तीसरे पटल ‘बुद्धि’ की भूमिक शिक्षार् में अधिक महत्वपूर्ण है। मस्तिष्क द्वार्रार् प्रार्प्त किए ज्ञार्न को व्यवस्थित करनार् उनक विश्लेषण एवं संश्लेषण कर निष्कर्ष पर पहुँचने क कार्य बुद्धि क है। अन्त:करण क चतुर्थ पटल ‘अन्तदर्ृष्टिपरक प्रत्यक्षीकरण’ की शक्ति है। इससे ज्ञार्न क प्रत्यक्ष दर्शन होतार् है और मार्नव भविष्य के बार्रे में भी जार्न सकतार् है। पर मार्नव क अन्त:करण इस शक्ति को अभी तक जार्गृत नहीं कर सक है। यह विकास की अवस्थार् में है और भविष्य में सद्शिक्षार् द्वार्रार् इस अन्तर्निहित शक्ति को मार्नव प्रार्प्त कर सकतार् है।

श्री अरविन्द ने शिक्षार् के निम्नलिखित महत्वपूर्ण उद्देश्य बतार्यें-

बार्लक क सर्वार्ंगीण विकास-श्री अरविन्द के अनुसार्र शिक्षार् क उद्देश्य शरीर, मस्तिष्क तथार् आत्मार् क सर्वार्ंगीण विकास करनार् है। तार्कि इनक उपयोग वे स्वंय में निहित दैवी सत्य को प्रार्प्त करने में उपकरण के रूप में कर सकें। शिक्षार् छार्त्रों को स्वंय क समग्र रूप से विकास करने में सहार्यतार् प्रदार्न करती है। वे बार्लक के शरीर, प्रार्ण, मन, बुद्धि, आत्मार् आदि विभिन्न पक्षों के समन्वित विकास पर बल देते हैं। श्री अरविन्द एसेज ऑन द गीतार् में लिखते हैं ‘‘बार्लक की शिक्षार् उसकी प्रकृति में जो कुछ सर्वोत्तम, सर्वार्धिक शक्तिशार्ली, सर्वार्धिक अन्तरंग और जीवन पूर्ण है, उसको अभिव्यक्त करने वार्ली होनी चार्हिए। मार्नस की क्रियार् और विकास जिस सार्ँचे में ढ़लनी चार्हिए, वह उनके अन्तरंग गुण और शक्ति क सार्ँचार् है। उसे नर्इ वस्तुएँ अवश्य प्रार्प्त करनी चार्हिए, परन्तु वह उनको सर्वोत्तम रूप से और सबसे अधिक प्रार्णमय रूप में स्वयं अपने विकास, प्रकार और अन्तरंग शक्ति के आधार्र पर प्रार्प्त करेगार्।’’

आत्म-तत्व की शिक्षार्-अरविन्द शिक्षार् क उद्देश्य सूचनार्ओं को एकत्र करनार् नहीं मार्नते। उनके अनुसार्र शिक्षार् क उद्देश्य है आत्म-तत्व की शिक्षार् यार् आत्म-शिक्षार् प्रदार्न करनार्। जिससे मार्नव आत्म तत्व को परमार्त्मार् के सार्थ एकाकार कर सके।

विद्यार्थ्री क सार्मार्जिक विकास-अरविन्द ने शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बार्लकों में सार्मार्जिक पक्ष के विकास को मार्नार्। वे एक दैवी समार्ज और दैवी मार्नव की कल्पनार् करते हैं। उनकी दृष्टि में शिक्षार् क उद्देश्य ऐसे सर्वार्ंग पूर्ण मनुष्य क विकास करनार् है, जो केवल व्यक्ति के रूप में ही नहीं बल्कि समार्ज के सदस्य के रूप में विकसित होतार् है।

रार्ष्ट्रीयतार् की शिक्षार्-श्री अरविन्द क दृढ़ विश्वार्स थार् कि मार्नव की ही तरह प्रत्येक रार्ष्ट्र की भी आत्मार् होती है जो मार्नव-आत्मार् एवं सावभौमिक-आत्मार् के मध्य की कड़ी है। बीसवीं शतार्ब्दी के प्रथम दशक में चल रहे रार्ष्ट्रीय शिक्षार् आन्दोलन को अरविन्द ने नेतृत्व प्रदार्न कियार् थार्। अत: वे एक ऐसी रार्ष्ट्रीय शिक्षार् पद्धति क विकास करनार् चार्हते थे जो भार्रतीय संस्कृति एवं परम्परार्ओं के अनुरूप हों। उनक कहनार् थार् कि ‘‘हम जिस शिक्षार् की खोज में हैं, वह एक भार्रतीय आत्मार् और आवश्यकतार् तथार् स्वभार्व और संस्कृति के उपयुक्त शिक्षार् है, केवल ऐसी शिक्षार् नहीं है जो भूतकाल के प्रति भी आस्थार् रखती हो, बल्कि भार्रत की विकासमार्न आत्मार् के प्रति, उसकी भार्वी आवश्यकतार्ओं के प्रति, उसकी आत्मोत्पत्ति की महार्नतार् के प्रति और उसकी शार्श्वत आत्मार् के प्रति आस्थार् रखती है।’’

सार्मन्जस्य की शिक्षार्-श्री अरविन्द बार्ह्य रूप से विरोधी दिख रहे तत्वों में एक व्यार्पक सार्मन्जस्य की संभार्वनार् देखते थे। उनके विचार्रों में हम ज्ञार्न, भक्ति, कर्म क समन्वय, निर्गुण और सगुण क समन्वय, द्वैत और अद्वैत क समन्वय आसार्नी से देख सकते है। श्री अरविन्द शिक्षार् के द्वार्रार् सार्मन्जस्य और समन्वय की प्रक्रियार् को मार्नव मार्त्र के कल्यार्ण के लिए और आगे ले जार्नार् चार्हते थे। इस प्रकार से श्री अरविन्द ने शिक्षार् के द्वार्रार् व्यक्तित्व के सर्वार्ंगीण और समन्वित विकास पर बल दियार्। वे शिक्षार् को सौंदर्य पर आधार्रित करनार् चार्हते थे तार्कि सत्य की अनुभूति हो सके। इस प्रकार उनकी शिक्षार् क लक्ष्य सत्य, शिव और सुन्दर के समन्वित रूप को प्रार्प्त करनार् थार्।

पार्ठ्यक्रम 

पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण के सन्दर्भ में अरविन्द के आधार्रभूत तीन सिद्धार्न्त हैं:-

  1. बार्लक स्वयं सीखतार् है, अध्यार्पक उसकी सहार्यतार् सुषुप्त शक्तियों के समझने में करतार् है। 
  2. पार्ठ्यक्रम बच्चे की विशिष्टतार्ओं को ध्यार्न में रख कर बनार्नार् चार्हिए। यह आत्मार्नुभूति के महार्न उद्देश्य को प्रार्प्त करने के लिए आवश्यक है। 
  3. पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण में वर्तमार्न से भविष्य तथार् समीप से दूर क सिद्धार्न्त अपनार्नार् चार्हिए। शिक्षार् ‘स्वदेशी’ सिद्धार्न्तों पर आधार्रित होनी चार्हिए। पूर्व तथार् पश्चिम के ज्ञार्न के समन्वय पर अरविन्द जोर देते थे- पर उनक मार्ननार् थार् कि पहले स्वदेशी ज्ञार्न में विद्यार्थ्री की नींव मजबूत कर ही पार्श्चार्त्य ज्ञार्न की शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। वे कहते हैं ‘‘सच्ची रार्ष्ट्रीय शिक्षार् क लक्ष्य और सिद्धार्न्त निश्चय ही आधुनिक सत्य और ज्ञार्न की अवहेलनार् करनार् नहीं है, बल्कि हमार्री नींव को हमार्रे अपने विश्वार्स, हमार्रे अपने मस्तिष्क, हमार्री अपनी आत्मार् पर आश्रित करनार् है।’’ 

श्री अरविन्द ने अपनी सर्वार्ंग विचार्रधार्रार् के अनुरूप शिक्षार् क्रम की एक वश्हद पन्चमुखी योजनार् प्रस्तुत की। ये पार्ँच पक्ष हैं- भौतिक, प्रार्णिक, मार्नसिक, अन्तरार्त्मिक तथार् आध्यार्त्मिक। ये पार्ँचों पक्ष उत्तरोत्तर विकास की अवस्थार्एँ हैं। सार्थ ही प्रार्रम्भ होने के उपरार्ंत प्रत्येक पक्ष क विकास आजीवन होतार् रहतार् है।

  • शार्रीरिक शिक्षार्:- शरीर मार्नव के सभी कर्मों क मार्ध्यम है। श्री अरविन्द क योग दर्शन में स्वस्थ शरीर को बहुत महत्व दियार् गयार् है। शार्रीरिक शिक्षार् के तीन पक्ष हैं- (अ) शार्रीरिक क्रियार्ओं को संयमित करनार् (ब) शरीर के सभी अंगों और क्रियार्ओं क समन्वित विकास (स) शार्रीरिक दोषों को खत्म करनार्। शार्रीरिक विकास हेतु श्री अरविन्द आश्रम में योग, व्यार्यार्म और विभिन्न प्रकार के खेलों की समुचित व्यवस्थार् है।
  • प्रार्णिक शिक्षार्:- प्रार्णिक शिक्षार् के अन्तर्गत इच्छार्-शक्ति को दृढ़ करने क अभ्यार्स करार्यार् जार्तार् है। तथार् चरित्र निर्मार्ण पर जोर दियार् जार्तार् है। इन दोनों उद्देश्यों की प्रार्प्ति उपदेशों यार् व्यार्ख्यार्नों से नहीं हो सकती है। अध्यार्पकों को आदर्श-व्यवहार्र प्रस्तुत करनार् होतार् है तार्कि छार्त्र उनकी अच्छार्इयों को ग्रहण कर सकें। सार्थ ही महार्पुरूषों के आदर्श उपस्थित करने होते हैं। छार्त्र स्वार्ध्यार्य एवं संयम से भी इन गुणों को प्रार्प्त करतार् है।
  • मार्नसिक शिक्षार्:- मन अत्यधिक चंचल होतार् है इसलिए इसे नियंत्रित करनार् कठिन है। पुस्तकीय ज्ञार्न यार् तथ्यों के संकलन से यह कार्य नहीं हो सकतार् है। मार्नसिक शिक्षार् स्वस्थ संस्कृति के निर्मार्ण एवं बेहतर सार्मार्जिक सम्बन्धों के लिए आवश्यक है। श्री मार्तार्जी के अनुसार्र मन की शिक्षार् के पार्ँच अंग हैं- 
    1. एकाग्रतार् की क्षमतार् को जार्ग्रत करनार्। 
    2. मन को व्यार्पक, विस्तृत और समृद्ध बनार्नार्। 
    3. उच्चतम लक्ष्य क निर्धार्रण कर समस्त विचार्रों को उसके सार्थ सुव्यवस्थित करनार्। 
    4. विचार्रों पर संयम रखनार् तथार् गलत विचार्रों क त्यार्ग करनार्। 
    5. मार्नसिक स्थिरतार्, पूर्ण शार्न्ति तथार् सर्वोच्च सत्तार् से आने वार्ली अंत:प्रेरणार्ओं को सही स्वरूप में ग्रहण करने की क्षमतार् क विकास करनार्। 

मार्नसिक विकास के लिए योग को अपनार्नार् आवश्यक है। यम, नियम, आसार्न और प्रार्णार्यार्म विद्यार्थ्री की एकाग्रतार् बढ़ार्ने में सहार्यक होते हैं।

  • आन्तरार्त्मिक शिक्षार्:- आन्तरार्त्मिक शिक्षार् के अन्तर्गत उन शार्श्वत दाशनिक प्रश्नों क उत्तर प्रार्प्त करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है जो मार्नव मन में प्रार्रम्भ से ही मथतार् रहार् है जैसे जीवन क लक्ष्य क्यार् है? पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व क क्यार् कारण है? मार्नव और शार्श्वत सत्तार् क क्यार् सम्बन्ध है? आदि। अन्तरार्त्मार् के विकास के बिनार् मार्नव के संपूर्ण विकास की कल्पनार् नहीं की जार् सकती है। अन्तरार्त्मार् के विकास से ही मार्नव जीवन-लक्ष्य को प्रार्प्त कर सकतार् है। अन्तरार्त्मार् के विकास के लिए योग-सार्धनार् आवश्यक है। 
  • आध्यार्त्मिक शिक्षार्:- आध्यार्त्मिक शिक्षार् शिक्षार् प्रक्रियार् क उच्चतम शिखर है। इसके मार्ध्यम से शिक्षार्थ्री सावभौम सत्तार् के सार्थ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थार्पित करतार् है। श्री मार्तार्जी के अनुसार्र आध्यार्त्मिक शिक्षार् प्रार्प्त कर लेने पर ‘‘सहसार् एक आन्तरिक कपार्ट खुल जार्एगार् और तुम सब ऐसी ज्योति में प्रवेश करोगे जो तुम्हें अमरतार् क आश्वार्सन प्रदार्न करेगी तथार् स्पष्ट अनुभव करार्एगी कि तुम सदार् ही जीवित रहे हो और सदार् ही जीवित रहोगे। नार्श बार्ह्य रूपों क होतार् है और अपनी वार्स्तविक सत्तार् के सम्बन्ध में तुम्हें यह भी पतार् लगेगार् कि ये रूप वस्त्रों के समार्न हैं, जिन्हें पुरार्ने पड़ जार्ने पर फेंक दियार् जार्तार् है।’’ 

श्री अरविन्द मार्तृभार्षार् के मार्ध्यम से शिक्षार् देने के प्रबल पक्षधर थे। उनक मार्ननार् थार् कि विदेशी भार्षार् के शब्दों क संदर्भ भिन्न होतार् है अत: विदेशी भार्षार् क उपयोग विद्यार्थ्री क ध्यार्न शिक्षण-तत्व से हटार्ती है और वह एकाग्र होकर शिक्षार् ग्रहण नहीं कर पार्तार् है। पर श्री अरविन्द अन्तर्रार्ष्ट्रीय भार्षार्ओं के विरोधी भी नहीं थे। वे चार्हते थे छार्त्र अन्तर्रार्ष्ट्रीय भार्षार्ओं को सीखें।

विभिन्न विषयों के शार्ब्दिक ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ श्री अरविन्द ने पार्ठ्यक्रम में विभिन्न क्रियार्ओं को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार्। उन्होंने विद्यार्लय को समुदार्य के सार्मार्जिक-आर्थिक परिवेष से जोड़ने पर बल दियार्। वे शिल्प की शिक्षार् पर बल देते थे। वे काव्य, कलार् और संगीत की शिक्षार् आवश्यक मार्नते थे। इन सबसे सृजनार्त्मकतार् और कल्पनार्शीलतार् क विकास होतार् है। श्री अरविन्द विज्ञार्न की शिक्षार् के महत्व को स्वीकार करते हैं। विज्ञार्न से अन्वेषण, विश्लेषण, संश्लेषण तथार् समार्लोचनार् की शक्ति क विकास होतार् है। प्रकृति के विभिन्न जीवों, पार्दपों एवं पदाथों के अवलोकन एवं अध्ययन से मार्नसिक शक्तियों क विकास होतार् है और संवेदनशीलतार् बढ़ती है।

वस्तुओं के उपरार्ंत शब्दों और विचार्रों पर ध्यार्न केन्द्रित करने की आवश्यकतार् है। वे रार्ष्ट्रीय सार्हित्य और इतिहार्स क शिक्षण आवश्यक मार्नते थे। वे रार्ष्ट्र को भूमि के टुकड़े से बहुत अधिक मार्नते थे। इतिहार्स के मार्ध्यम से वे विद्याथियों में रार्ष्ट्रप्रेम की भार्वनार् क विकास करनार् चार्हते थे। उन्होंने रार्ष्ट्रीय शिक्षार् आन्दोलन के दौरार्न विद्याथियों की एक सभार् को सम्बोधित करते हुए कहार्: ‘‘एक रार्ष्ट्र के इतिहार्स में कभी-कभी ऐसे समय भी आते है, जबकि दैव उसके सम्मुख एक ऐसार् कार्य, एक ऐसार् लक्ष्य उपस्थित कर देतार् है जिसके सार्मने प्रत्येक वस्तु त्यार्ग देनी होती है- चार्हे वह कितनी भी ऊँची और पवित्र क्यों न हो। हमार्री मार्तृभूमि के लिए भी ऐसार् समय आ गयार् है, जबकि उसकी सेवार् से अधिक प्रिय और कुछ नहीं है, जबकि अन्य सबकुछ को इसी लक्ष्य की ओर निर्देशित कियार् जार्नार् चार्हिये। तुम अध्ययन करते हो तो उसी के लिए अध्ययन करो। अपने शरीर, मन और आत्मार् को उसी की सेवार् के लिए प्रशिक्षित करो। तुम अपनी आजीविक कमार्ओगे, तार्कि तुम उसके लिए जीवित रह सको। तुम विदेशों को जार्ओगे तार्कि तुम ज्ञार्न के सार्थ वार्पस लौट सको जिससे कि तुम उसकी सेवार् कर सको।’’

श्री अरविन्द नैतिक शिक्षार् को आवश्यक मार्नते हैं। वे रार्जनीति को भी नीति पर आधार्रित करनार् चार्हते थे। वे धर्म के मूल तत्वों को पार्ठ्यक्रम में सम्मिलित करने क सुझार्व देते हैं। वे धर्म को आत्मार् और प्रकृति के बीच मध्यस्थ के रूप में देखते हैं। जैसार् कि हम देख चुके हैं श्री अरविन्द शार्रीरिक शिक्षार् पर बल देते हैं क्योंकि शरीर ही सार्रे धर्म और कर्म क आधार्र है। वे योग के द्वार्रार् मन, मस्तिष्क और शरीर तीनों क सही दिशार् में सार्मन्जस्यपूर्ण विकास पर बल देते हैं।

शिक्षण-विधि 

यद्यपि अरविन्द ने शिक्षण विधि के बार्रे में स्पष्ट नीति यार् कार्ययोजनार् क विकास नहीं कियार् पर उनके कार्यों से उनकी शिक्षण विधि के संदर्भ में मूलभूत सिद्धार्न्तों क विश्लेषण कियार् जार् सकतार् है।

श्री अरविन्द क यह मार्ननार् थार् कि छार्त्र को कुछ भी ऐसार् नहीं सिखार्यार् नहीं जार् सकतार् जो पहले से उसमें निहित नहीं है। छार्त्र को सीखने की स्वतंत्रतार् होनी चार्हिए- शिक्षक क कर्तव्य है कि वह उपयुक्त परिस्थितियों क निर्मार्ण करे। शिक्षण-अधिगम प्रक्रियार् में बच्चे की इच्छार् एवं रूचि अधिक महत्व रखतार् है। विद्यार्थ्री जिस विषय की शिक्षार् में रूचि रखतार् हो उसे उस विषय की शिक्षार् देनी चार्हिए। सार्थ ही शिक्षण विधि क चयन छार्त्र की रूचि के अनुसार्र होनी चार्हिए। शिक्षक को इस तरह से शिक्षण कार्य करनार् चार्हिए कि छार्त्र पढ़ार्ये जार् रहे पार्ठ एवं विषय में रूचि ले।

श्री अरविन्द ने इस बार्त पर जोर दियार् कि बच्चे की शिक्षार् वर्णमार्लार् से प्रार्रम्भ नहीं होनी चार्हिए। उसे प्रार्रम्भ में प्रकृति के विभिन्न रूपों- पेड़- पौधों, सितार्रों, सरितार्, वनस्पतियों एवं अन्य भौतिक पदाथों क निरीक्षण करने क अवसर देनार् चार्हिए। इससे विद्याथियों में निरीक्षण शक्ति, संवेदनशीलतार्, सहयोग एवं सहअस्तित्व क भार्व विकसित होतार् है। इसके बार्द अक्षरों यार् वर्णों को सिखार्नार् चार्हिए। फिर शब्दों क अर्थ बतार्कर उनक विभिन्न तरीकों से प्रयोग करनार् सिखार्नार् चार्हिए। शब्द प्रयोग द्वार्रार् सार्हित्यिक क्षमतार् क विकास होतार् है।

विज्ञार्न-शिक्षण में छार्त्र की जिज्ञार्सार् प्रवृत्ति को प्रोत्सार्हित करनार् चार्हिए। इसके लिए आस-पार्स के वार्तार्वरण में स्थित जीव-जन्तु, पेड़- पौधे, मिÍी-पत्थर, तार्रे-नक्षत्र आदि क निरीक्षण कर प्रकृति के रहस्यों क उद्घार्टन कर विभिन्न विज्ञार्नों की शिक्षार् ग्रहण करने की प्रवृत्ति को बढ़ार्नार् चार्हिए।

छार्त्रों को दर्शन पढ़ार्ते समय छार्त्रों में बौद्धिक चेतनार् क विकास करने क प्रयार्स करनार् चार्हिए। इतिहार्स इस तरह से पढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए कि विद्याथियों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास हो। श्री अरविन्द शिक्षार् के मार्ध्यम के रूप में मार्तृभार्षार् के उपयोग पर बल देते थे। इससे रार्ष्ट्रीय सार्हित्य एवं इतिहार्स को समझने में आसार्नी होती है, सार्थ ही चार्रों ओर के परिवेश क भी बेहतर ज्ञार्न मिलतार् है।

अरविन्द ने ऐसी शिक्षण-विधि अपनार्ने पर जोर दियार् जिससे छार्त्र शिक्षार् क अर्थ केवल सूचनार्ओं क संग्रह न मार्ने। वह रटने पर जोर न दे वरन् ज्ञार्न प्रार्प्त करने के कौशलों को महत्वपूर्ण मार्नकर उनक विकास करे। विद्याथियों में समझ, स्मृति, निर्णय क्षमतार्, कल्पनार्, तर्क, चिन्तन जैसी शक्तियों क विकास कियार् जार्नार् चार्हिए।

श्री अरविन्द धामिक शिक्षार् को आवश्यक मार्नते थे, पर उनक यह स्पष्ट मत है कि सप्तार्ह के कतिपय दिनों में कुछ कालार्ंशों को धामिक शिक्षार् के लिए तय कर उसकी शिक्षार् देनार् उचित यार् लार्भदार्यक नहीं है। धामिक शिक्षार् बार्ल्यार्वस्थार् से ही पवित्र, शार्न्त एवं शुद्ध प्रार्कृतिक वार्तार्वरण में दी जार्नी चार्हिए। आस्थार् से पूर्ण जीवन ही धामिक शिक्षार् क बेहतर मार्ध्यम है।

अरविन्द की दृष्टि में अध्यार्पक 

अध्यार्पक मार्त्र ‘इन्स्ट्रक्टर’ नहीं है। उसक सर्वार्धिक महत्वपूर्ण कार्य ‘‘अपने आपको समझने’’ में छार्त्र की सहार्यतार् करनार् है। वह सूचनार्ओं को विद्याथियों के समक्ष परोसने वार्लार् नहीं वरन् माग-दर्शक है। अध्यार्पक विद्याथियों की क्रियार्त्मक एवं रचनार्त्मक शक्तियों के विकास में सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है।

महर्षि अरविन्द के अनुसार्र शिक्षक को रार्ष्ट्रीय संस्कृति के मार्ली के रूप में कार्य करनार् चार्हिए। उसक कर्तव्य है संस्कार की जड़ों में खार्द देनार्। और जड़ों को सींच-सींच कर विद्यार्थ्री को महार्-मार्नव बनार्नार्।

महर्षि अरविन्द की शिष्यार् श्री मार्ँ ने मार्तार्-पितार् के कर्तव्यों के संदर्भ में जो बार्ते कहीं वह अध्यार्पकों पर भी पूर्णत: लार्गू होती है। वे कहती हैं ‘‘बच्चे को शिक्षार् देने की योग्यतार् प्रार्प्त करने के लिए प्रथम कर्तव्य है अपने आप को शिक्षित करनार्, अपने बार्रे में सचेतन होनार् और अपने ऊपर नियन्त्रण रखनार्, जिससे हम अपने बच्चे के सार्मने कोर्इ बुरार् उदार्हरण प्रस्तुत न करें। उदार्हरण द्वार्रार् ही शिक्षार् फलदार्यी होती है। अगर तुम चार्हते हो कि तुम्हार्रार् बच्चार् तुम्हार्रार् आदर करे, तो अपने लिए आदर भार्व रखो और हर क्षण सम्मार्न के योग्य बनो। कभी भी स्वेच्छार्चार्री, अत्यार्चार्री, असहिष्णु और क्रोधित मत होओ। जब तुम्हार्रार् बच्चार् तुमसे कोर्इ प्रश्न पूछे, तब तुम यह समझकर कि वह तुम्हार्री बार्त नहीं समझ सकतार्, उसे जड़तार् और मूर्खतार् के सार्थ कोर्इ उत्तर मत दो। अगर तुम थोड़ार् कष्ट उठार्ओ तो तुम्हार्री बार्त वह हमेशार् समझ सकेगार्।’’

अरविन्द आश्रम, पार्ण्डिचेरी में कार्य करने वार्ले अध्यार्पकों को अलग से कोर्इ वेतन नहीं दियार् जार्तार् है। श्री अरविन्द शिक्षार् को धन के आदार्न प्रदार्न से जोड़ कर इसे व्यार्पार्र क रूप देने के विरोधी थे। अत: आश्रम- विद्यार्लय और विश्वविद्यार्लय के कार्यरत अध्यार्पकों की आवश्यकतार् को आश्रम उसी तरह से पूरार् करतार् है जैसे अन्य सार्धकों की। यह प्रार्चीन भार्रतीय शिक्षार् व्यवस्थार् के महार्न आदर्श पर आधार्रित है जब गुरू शिष्यों से अध्ययन काल के दौरार्न कोर्इ आर्थिक मार्ँग नहीं करते थे।

छार्त्र-संकल्पनार् 

श्री अरविन्द विद्यार्थ्री को प्रछन्न रूप में ‘सर्वशक्तिमार्न चैतन्य’ मार्नते हैं। वे विद्यार्थ्री को केवल शरीर के रूप में ही नहीं देखते हैं। शरीर के सार्थ-सार्थ प्रार्ण, मन, बुद्धि, आत्मार् आदि विभिन्न पक्षों को समार्न महत्व देते हैं। इन सबक वे समन्वित विकास चार्हते हैं। महर्षि अरविन्द शिक्षार् में अन्त:करण को महत्वपूर्ण मार्नते हैं। जैसार् कि हम लोग पहले ही देख चुके हैं अन्त:करण के कर्इ स्तर होते हैं। अन्त:करण क प्रथम स्तर ‘‘चित्त’’ कहलार्तार् है। यह स्मृतियों क संचय स्थल है। द्वितीय स्तर ‘‘मन’’ कहलार्तार् है। यह इन्द्रियों से सूचनार्ओं एवं अनुभवों को ग्रहण कर उन्हें संप्रत्ययों एवं विचार्रों में परिवर्तित करतार् है। अन्त:करण क तृतीय स्तर ‘‘बुद्धि’’ है। जिसक शिक्षार् प्रक्रियार् में अत्यधिक महत्व है। यह सूचनार्ओं एवं ज्ञार्न-सार्मग्रियों को व्यवस्थित करतार् है, निष्कर्ष निकालतार् है और सार्मार्न्यीकरण करतार् है। इस तरह से बुद्धि सिद्धार्न्त निरूपण करतार् है। अन्त:करण क सर्वोच्च स्तर ‘‘सार्क्षार्त अनुभूति’’ है। श्री अरविन्द क स्पष्ट मत है कि ‘‘मस्तिष्क को ऐसार् कुछ भी सिखार्यार् नहीं जार् सकतार्, जो कि बार्लक में सुप्त ज्ञार्न के रूप में पहले से ही विद्यमार्न न हो।’’ अध्यार्पक इन अन्तर्निहित शक्तियों को जार्गृत करतार् है, बार्हर से वह कुछ भी आरोपित नहीं कर सकतार् है।

बार्लक के सभी शार्रीरिक तथार् मार्नसिक अंग उसके स्वयं के वश में होने चार्हिए, न कि अध्यार्पक के नियन्त्रण में। बार्लक की रूचियों एवं आवश्यकतार्ओं के अनुरूप उन्हें कार्य मिलनार् चार्हिए।

अरविन्द आश्रम की सार्री शिक्षार्-व्यवस्थार् नि:शुल्क है। विद्यार्थ्री एक बार्र अगर प्रवेश पार् लेतार् है तो उसे कोर्इ शुल्क नहीं देनार् पड़तार् है। यह प्रार्चीन गुरूकुल व्यवस्थार् के अनुरूप है। श्री अरविन्द विद्याथियों में स्वअनुशार्सन की भार्वनार् जगार्नार् चार्हते थे। आश्रम क सम्पूर्ण वार्तार्वरण आध्यार्त्मिक है अत: स्वभार्विक है कि यहार्ँ के विद्याथियों की चेतनार् क स्तर ऊँचार् हो।

शिक्षण-संस्स्थार्यें 

रार्जनीति से सन्यार्स ग्रहण करने के उपरार्ंत 1910 में श्री अरविन्द पार्ण्डिचेरी आ गये। वे यहीं सार्धनार्-रत हो गये। धीरे-धीरे सार्धकों एवं अरविन्द के अनुगार्मियों की संख्यार् बढ़ती गर्इ। 1926 में यहार्ँ अरविन्द आश्रम की स्थार्पनार् की गर्इ। 1940 से सार्धकों को आश्रम में बच्चों को रखने की अनुमति दे दी गर्इ। बच्चों की आवश्यकतार् को देखते है श्री अरविन्द ने 1943 में आश्रम विद्यार्लय की स्थार्पनार् की।

6 जनवरी, 1952 को श्री मार्ँ ने ‘श्री अरविन्दो इन्टरनेशनल यूनिवर्सिटी सेन्टर’ की स्थार्पनार् की- जिसे बार्द में ‘श्री अरविन्द इन्टरनेशनल सेन्टर ऑफ एडुकेशन’ के नार्म से जार्नार् गयार्। यह पार्ण्डिचेरी के योगार्श्रम क अविभार्ज्य अंग है क्योंकि योग और शिक्षार् क उद्देश्य समार्न है- सम्पूर्णतार् की प्रार्प्ति कर शार्श्वत सावभौमिक सत्तार् से आत्मतत्व क मिलन। इस तरह यहार्ँ प्रार्रम्भिक शिक्षार् से लेकर उच्च स्तर की शिक्षार् एवं शोध की व्यवस्थार् है।

चूँकि शिक्षार् क उद्देश्य है आत्मतत्व की जार्गश्ति एवं विकास, अत: लड़कों एवं लड़कियों की शिक्षार् के केन्द्र में कोर्इ कश्त्रिम अन्तर नहीं कियार् जार्तार् है। अत: अरविन्द अन्तर्रार्ष्ट्रीय शिक्षार् के केन्द्र में लड़कियों के लिए भी वही शैक्षिक कार्यक्रम है जो लड़कियों के लिए। यहार्ँ तक कि शार्रीरिक शिक्षार् में भी भिन्नतार् नहीं है। इसके बार्वजूद विकल्प बहुत अधिक हैं पर चयन क आधार्र लिंग यार् परम्परार्गत निषेध न होकर आन्तरिक अभिरूचि है।

आधुनिक शिक्षार् व्यवस्थार् बहुत हद तक वार्णिज्य क रूप ले चुकी है जहार्ँ अध्यार्पक अर्थिक लार्भ के लिए अध्यार्पन करतार् है और छार्त्र पैसार् चुक कर अन्य चीजों की तरह शिक्षार् को खरीदते हैं। आश्रम में एक बार्र प्रवेश के बार्द शिक्षार् पूर्णत: नि:शुल्क है। और अध्यार्पक भी अन्य सार्धकों की ही तरह आश्रम की व्यवस्थार् से अपनी आवश्यकतार्ओं को पूरार् करतार् है। उन्हें अलग से कोर्इ वेतन नहीं दियार् जार्तार् है। वे प्रेम और सत्य की खोज के सहयार्त्री हैं न कि ज्ञार्न क बेचने और खरीदने वार्ले। शिक्षार् केन्द्र एक समुदार्य एवं एक चेतनार् के रूप में कार्य करतार् है जिसके केन्द्र में समर्पण क भार्व है। 1973 में अपने शरीर-त्यार्ग के पूर्व श्री मार्ँ ने शिक्षार् केन्द्र की जड़ें मजबूत कर दी थी। उनके बार्द भी अरविन्द के आदर्शों के अनुरूप शिक्षार् केन्द्र शिक्षण- अधिगम के क्षेत्र में नये-नये प्रयोग कर रहार् है।

1968 में श्री मार्ँ ने ‘ओरोविले’ की स्थार्पनार् की। यह जार्ति, धर्म, भार्षार्, प्रजार्ति से ऊपर उठकर संपूर्ण नगर के सार्मूहिक निवार्स एवं शिक्षार् क अद्भुत प्रयोग है। यह मार्नव के भविष्य में विश्वार्स की अभिव्यक्ति है। ओरोविले जीने की एक ‘नर्इ शैली’ के विकास क प्रयार्स है जो श्री अरविन्द के ‘नर्इ मार्नवतार्’ के संप्रत्यय पर आधार्रित है।

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श्री अरविन्द क जीवन-दर्शन एवं शिक्षार्-दर्शन

श्री अरविन्द ने योग दर्शन के महत्व को रेखार्ंकित करते हुए आधुनिक परिवेश के अनुरूप उसकी पुनव्र्यार्ख्यार् की। उनके दर्शन को अनुभवार्तीत सर्वार्ंग योग दर्शन के नार्म से जार्नार् जार्तार् है क्योंकि उन्होंने अपने विचार्र को योग की संकुचित व्यार्ख्यार् तक सीमित रखने की जगह सत्य तक पहुँचने के लिए विभिन्न मागों को समन्वित रूप में बार्ँधकर देखने क प्रयार्स कियार्।

अरविन्द के अनुसार्र जीवन एक अखण्ड प्रक्रियार् है। चेतनार् के अनेक स्तर हैं। इसे निम्नत्तर स्तर से उठार्कर उच्चतम स्तर तक ले जार्यार् जार् सकतार् है। उन्होंने अनुभव कियार् कि आधुनिक युग में मस्तिष्क एवं बुद्धि की दृष्टि से विकास चरम को प्रार्प्त कर चुक है। अब दैवी समार्ज की कल्पनार् सार्कार की जार् सकती है। अगर इससे आगे नहीं बढ़ार् गयार् तो ह्रार्स यार् परार्भव निश्चित है। अत: इस चेतन तत्व को प्रकाश, शक्ति एवं सत्य से समन्वित करनार् आवश्यक है। क्योंकि इसी के मार्ध्यम से वह मार्नव जीवन के प्रमुख उद्देश्य अनुभवार्तीत सत्य-चेतन-तत्व में संपूर्ण रूप से रूपार्न्तरित हो सकती है।

श्री अरविन्द के अनुसार्र इस सृष्टि के रचयितार्, पार्लनकर्तार् और संहार्रक र्इश्वर है। जिसे धर्म में र्इश्वर कहार् जार्तार् है उसे ही दर्शन में ब्रह्म कहार् गयार् है। र्इश्वर सृष्टि क कर्तार्, सनार्तन और सर्वार्त्मार् है। र्इश्वर परमपुरूष है, ब्रह्म निर्विकार एवं निरार्कार है किन्तु अन्तत: दोनों एक हैं। र्इश्वर द्वार्रार् इस जगत के निर्मार्ण की प्रक्रियार् क विश्लेषण श्री अरविन्द ने दो प्रकार से कियार् है। विकास की दो विपरीत दिशार्एँ हैं- अवरोहण एवं आरोहण। ब्रह्म अवरोहण द्वार्रार् अपने को वस्तु जगत में परिवर्तित करतार् है। इसके सार्त सोपार्न हैं- सत्, चित्त, आनन्द, अतिमार्नस, मार्नस, प्रार्ण एवं द्रव्य। दूसरी प्रक्रियार् है आरोहण की। इसमें द्रव्य रूप इस जगत में मनुष्य अपने द्रव्य रूप से आरोहण द्वार्रार् सत् की ओर क्रमश: चलार्यमार्न होतार् है। इसके भी सार्त चरण हैं द्रव्य, प्रार्ण, मार्नस, अतिमार्नस, आनन्द, चित्त और सत्। अरविन्द आत्मार् को परमार्त्मार् से इस अर्थ में भिन्न मार्नते हैं कि आत्मार् में परमार्त्मार् के दो गुण- आनन्द और चित्त तो होते हैं पर सत् नहीं। विभिन्न योनियों से होते हुए आत्मार् मनुष्य योनि में प्रवेश करती है और आनन्द और चित्त के सार्थ सर्वोच्च उद्देश्य सत् को प्रार्प्त करती है। श्री अरविन्द भौतिक एवं आध्यार्त्मिक दोनों ही तत्वों के मूल में ब्रह्म को पार्ते हैं। अत: दोनों ही तरह के ज्ञार्न के एकात्मकतार् को जार्ननार् ही ज्ञार्न है। व्यार्वहार्रिक दृष्टि से ज्ञार्न को उन्होंने अन्य भार्रतीय मनीषियों की तरह दो भार्गों में बार्ँटार् है- द्रव्यज्ञार्न (यार् अपरार् विद्यार्) एवं आत्म ज्ञार्न (परार् विद्यार्)। द्रव्यज्ञार्न प्रार्रम्भ है जिसकी परिणति आत्मज्ञार्न में होनी चार्हिए। द्रव्यज्ञार्न प्रार्प्त करने क सार्धन इन्द्रियार्ँ हैं और आत्मज्ञार्न प्रार्प्त करने क सार्धन अन्त:करण है। आत्मतत्व क ज्ञार्न योग के द्वार्रार् ही संभव है। श्री अरविन्द के अनुसार्र मार्नव जीवन क उद्देश्य सत् चित्त एवं आनन्द की प्रार्प्ति है। इस महार्न लक्ष्य को गीतार् में प्रतिपार्दित कर्मयोग एवं ध्यार्नयोग द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् सकतार् है। संसार्र से पलार्यन की जगह निष्काम भार्व से कर्म करने से ही सत्, चित्त एवं आनन्द की प्रार्प्ति की जार् सकती है। पर इसके लिए स्वस्थ शरीर, विकार रहित मन एवं संयमित आचार्र-विचार्र आवश्यक है। योग के द्वार्रार् मार्नव अपने शरीर, सोच , विचार्र एवं कार्य पर नियंत्रण रख उन्हें उचित दिशार् में ले जार् सकतार् है।

श्री अरविन्द क दर्शन इस धार्रणार् पर आधार्रित है कि मार्नव क बौद्धिक विकास अपने चरम बिन्दु पर पहँुच गयार् है। इसके आगे आन्तरार्त्मिक और आध्यार्त्मिक विकास होनार् चार्हिए। यदि मार्नव इस दिशार् में नहीं बढ़तार् है तो न केवल उसक विकल्प क्रम अवरूद्ध होगार् वरन् वह पतन की ओर अग्रसर हो जार्येगार्।

इन्द्रियार्नुभव को श्री अरविन्द सर्वोच्च ज्ञार्न नहीं मार्नते थे, वरन् उसे निम्न कोटि क ज्ञार्न मार्नते थे। उनके अनुसार्र ज्ञार्न की अनेक कोटियार्ँ है और सर्वोच्च कोटि आध्यार्त्मिक अनुभूति है जिसे हम इस जगत में प्रार्प्त कर सकते हैं।

अरविन्द मनुष्य के एकांगी विकास को हार्निप्रद मार्नते थे। वे स्वस्थ समार्ज के निर्मार्ण हेतु मार्नव के सर्वार्ंगीण विकास पर जोर देते थे। इसके लिए उन्होंने प्रार्च्य एवं पार्श्चार्त्य संस्कृतियों के समन्वय पर जोर दियार्। उनके दर्शन में न तो प्रार्चीन भार्रतीय संस्कृति से पलार्यन क भार्व है न ही पार्श्चार्त्य संस्कृति क अन्धार्नुकरण। दोनों क समन्वित रूप ही बेहतर शिक्षार् व्यवस्थार् क विकास कर सकतार् है।

1907 में श्री अरविन्द ने ‘ए सिस्टम ऑफ नेशनल एडुकेशन’ नार्मक निबन्ध लिखार्। इसमें उन्होंने अपनी शिक्षार् की अवधार्रणार् को स्पष्ट करते हुए कहार् ‘‘प्रत्येक मार्नव के अन्दर कुछ र्इश्वर प्रदत्त दिव्य शक्ति है, कुछ जो उसक अपनार् है, जिसे पूर्णतार् की ओर अग्रसर कियार् जार् सकतार् है। शिक्षार् क कार्य है इसे चिन्हित करनार्, विकसित करनार् एवं उपयोग में लार्नार्। शिक्षार् क सर्वप्रमुख लक्ष्य होनार् चार्हिए विकसित होती आत्मार् की अन्तर्निहित शक्ति को पूर्णत: विकसित कर श्रेष्ठ कार्य हेतु तैयार्र करनार्।’’ 1910 में अपने एक दूसरे बहुचर्चित लेख में अरविन्द ने एक ऐसार् वार्क्य लिख जो शिक्षार् क सूत्र वार्क्य बन गयार्। उन्होंने लिखार् ‘‘सही शिक्षार् क प्रथम सिद्धार्न्त है कि कुछ भी पढ़ार्यार् नहीं जार् सकतार् है।’’

इस प्रकार स्पष्ट है कि श्री अरविन्द के विचार्र में हर व्यक्ति की आत्मार् में ज्ञार्न अन्तर्निहित है। उन्होंने सही शिक्षार् को उद्घार्टित करने क सार्धन अन्त:करण को मार्नार्। श्री अरविन्द के अनुसार्र अन्त:करण के चार्र पटल हैं- चित्त, मार्नस, बुद्धि और अन्तदर्ृष्टि। चित्त वस्तुत: भूतकालिक मार्नसिक संस्कार है। जब कोर्इ व्यक्ति कोर्इ बार्त यार्द करतार् है तो वह छन कर चित्त में संग्रहित होती है। इसी से क्रियार्शील स्मृति आवश्यकतार् एवं क्षमतार्नुसार्र कभी-कभी कुछ चीजों को चुन लेती है। सही चुनार्व हेतु उपयुक्त शिक्षार् एवं प्रशिक्षण की आवश्यकतार् पड़ती है। दूसरे पटल मार्नस को मस्तिष्क कहार् जार् सकतार् है। यह ज्ञार्नेन्द्रियों से तथ्यों को प्रार्प्त कर उसे विचार्र क रूप देतार् है। ज्ञार्नेन्द्रियों के अतिरिक्त मस्तिष्क स्वंय भी तथ्यों यार् संप्रत्ययों को ग्रहण करतार् है। अत: ज्ञार्नेन्द्रियों एवं मस्तिष्क क प्रशिक्षण लार्भदार्यक है। अन्त:करण के तीसरे पटल ‘बुद्धि’ की भूमिक शिक्षार् में अधिक महत्वपूर्ण है। मस्तिष्क द्वार्रार् प्रार्प्त किए ज्ञार्न को व्यवस्थित करनार् उनक विश्लेषण एवं संश्लेषण कर निष्कर्ष पर पहुँचने क कार्य बुद्धि क है। अन्त:करण क चतुर्थ पटल ‘अन्तदर्ृष्टिपरक प्रत्यक्षीकरण’ की शक्ति है। इससे ज्ञार्न क प्रत्यक्ष दर्शन होतार् है और मार्नव भविष्य के बार्रे में भी जार्न सकतार् है। पर मार्नव क अन्त:करण इस शक्ति को अभी तक जार्गृत नहीं कर सक है। यह विकास की अवस्थार् में है और भविष्य में सद्शिक्षार् द्वार्रार् इस अन्तर्निहित शक्ति को मार्नव प्रार्प्त कर सकतार् है।

श्री अरविन्द ने शिक्षार् के निम्नलिखित महत्वपूर्ण उद्देश्य बतार्यें-

बार्लक क सर्वार्ंगीण विकास-श्री अरविन्द के अनुसार्र शिक्षार् क उद्देश्य शरीर, मस्तिष्क तथार् आत्मार् क सर्वार्ंगीण विकास करनार् है। तार्कि इनक उपयोग वे स्वंय में निहित दैवी सत्य को प्रार्प्त करने में उपकरण के रूप में कर सकें। शिक्षार् छार्त्रों को स्वंय क समग्र रूप से विकास करने में सहार्यतार् प्रदार्न करती है। वे बार्लक के शरीर, प्रार्ण, मन, बुद्धि, आत्मार् आदि विभिन्न पक्षों के समन्वित विकास पर बल देते हैं। श्री अरविन्द एसेज ऑन द गीतार् में लिखते हैं ‘‘बार्लक की शिक्षार् उसकी प्रकृति में जो कुछ सर्वोत्तम, सर्वार्धिक शक्तिशार्ली, सर्वार्धिक अन्तरंग और जीवन पूर्ण है, उसको अभिव्यक्त करने वार्ली होनी चार्हिए। मार्नस की क्रियार् और विकास जिस सार्ँचे में ढ़लनी चार्हिए, वह उनके अन्तरंग गुण और शक्ति क सार्ँचार् है। उसे नर्इ वस्तुएँ अवश्य प्रार्प्त करनी चार्हिए, परन्तु वह उनको सर्वोत्तम रूप से और सबसे अधिक प्रार्णमय रूप में स्वयं अपने विकास, प्रकार और अन्तरंग शक्ति के आधार्र पर प्रार्प्त करेगार्।’’

आत्म-तत्व की शिक्षार्-अरविन्द शिक्षार् क उद्देश्य सूचनार्ओं को एकत्र करनार् नहीं मार्नते। उनके अनुसार्र शिक्षार् क उद्देश्य है आत्म-तत्व की शिक्षार् यार् आत्म-शिक्षार् प्रदार्न करनार्। जिससे मार्नव आत्म तत्व को परमार्त्मार् के सार्थ एकाकार कर सके।

विद्यार्थ्री क सार्मार्जिक विकास-अरविन्द ने शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बार्लकों में सार्मार्जिक पक्ष के विकास को मार्नार्। वे एक दैवी समार्ज और दैवी मार्नव की कल्पनार् करते हैं। उनकी दृष्टि में शिक्षार् क उद्देश्य ऐसे सर्वार्ंग पूर्ण मनुष्य क विकास करनार् है, जो केवल व्यक्ति के रूप में ही नहीं बल्कि समार्ज के सदस्य के रूप में विकसित होतार् है।

रार्ष्ट्रीयतार् की शिक्षार्-श्री अरविन्द क दृढ़ विश्वार्स थार् कि मार्नव की ही तरह प्रत्येक रार्ष्ट्र की भी आत्मार् होती है जो मार्नव-आत्मार् एवं सावभौमिक-आत्मार् के मध्य की कड़ी है। बीसवीं शतार्ब्दी के प्रथम दशक में चल रहे रार्ष्ट्रीय शिक्षार् आन्दोलन को अरविन्द ने नेतृत्व प्रदार्न कियार् थार्। अत: वे एक ऐसी रार्ष्ट्रीय शिक्षार् पद्धति क विकास करनार् चार्हते थे जो भार्रतीय संस्कृति एवं परम्परार्ओं के अनुरूप हों। उनक कहनार् थार् कि ‘‘हम जिस शिक्षार् की खोज में हैं, वह एक भार्रतीय आत्मार् और आवश्यकतार् तथार् स्वभार्व और संस्कृति के उपयुक्त शिक्षार् है, केवल ऐसी शिक्षार् नहीं है जो भूतकाल के प्रति भी आस्थार् रखती हो, बल्कि भार्रत की विकासमार्न आत्मार् के प्रति, उसकी भार्वी आवश्यकतार्ओं के प्रति, उसकी आत्मोत्पत्ति की महार्नतार् के प्रति और उसकी शार्श्वत आत्मार् के प्रति आस्थार् रखती है।’’

सार्मन्जस्य की शिक्षार्-श्री अरविन्द बार्ह्य रूप से विरोधी दिख रहे तत्वों में एक व्यार्पक सार्मन्जस्य की संभार्वनार् देखते थे। उनके विचार्रों में हम ज्ञार्न, भक्ति, कर्म क समन्वय, निर्गुण और सगुण क समन्वय, द्वैत और अद्वैत क समन्वय आसार्नी से देख सकते है। श्री अरविन्द शिक्षार् के द्वार्रार् सार्मन्जस्य और समन्वय की प्रक्रियार् को मार्नव मार्त्र के कल्यार्ण के लिए और आगे ले जार्नार् चार्हते थे। इस प्रकार से श्री अरविन्द ने शिक्षार् के द्वार्रार् व्यक्तित्व के सर्वार्ंगीण और समन्वित विकास पर बल दियार्। वे शिक्षार् को सौंदर्य पर आधार्रित करनार् चार्हते थे तार्कि सत्य की अनुभूति हो सके। इस प्रकार उनकी शिक्षार् क लक्ष्य सत्य, शिव और सुन्दर के समन्वित रूप को प्रार्प्त करनार् थार्।

पार्ठ्यक्रम 

पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण के सन्दर्भ में अरविन्द के आधार्रभूत तीन सिद्धार्न्त हैं:-

  1. बार्लक स्वयं सीखतार् है, अध्यार्पक उसकी सहार्यतार् सुषुप्त शक्तियों के समझने में करतार् है। 
  2. पार्ठ्यक्रम बच्चे की विशिष्टतार्ओं को ध्यार्न में रख कर बनार्नार् चार्हिए। यह आत्मार्नुभूति के महार्न उद्देश्य को प्रार्प्त करने के लिए आवश्यक है। 
  3. पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण में वर्तमार्न से भविष्य तथार् समीप से दूर क सिद्धार्न्त अपनार्नार् चार्हिए। शिक्षार् ‘स्वदेशी’ सिद्धार्न्तों पर आधार्रित होनी चार्हिए। पूर्व तथार् पश्चिम के ज्ञार्न के समन्वय पर अरविन्द जोर देते थे- पर उनक मार्ननार् थार् कि पहले स्वदेशी ज्ञार्न में विद्यार्थ्री की नींव मजबूत कर ही पार्श्चार्त्य ज्ञार्न की शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। वे कहते हैं ‘‘सच्ची रार्ष्ट्रीय शिक्षार् क लक्ष्य और सिद्धार्न्त निश्चय ही आधुनिक सत्य और ज्ञार्न की अवहेलनार् करनार् नहीं है, बल्कि हमार्री नींव को हमार्रे अपने विश्वार्स, हमार्रे अपने मस्तिष्क, हमार्री अपनी आत्मार् पर आश्रित करनार् है।’’ 

श्री अरविन्द ने अपनी सर्वार्ंग विचार्रधार्रार् के अनुरूप शिक्षार् क्रम की एक वश्हद पन्चमुखी योजनार् प्रस्तुत की। ये पार्ँच पक्ष हैं- भौतिक, प्रार्णिक, मार्नसिक, अन्तरार्त्मिक तथार् आध्यार्त्मिक। ये पार्ँचों पक्ष उत्तरोत्तर विकास की अवस्थार्एँ हैं। सार्थ ही प्रार्रम्भ होने के उपरार्ंत प्रत्येक पक्ष क विकास आजीवन होतार् रहतार् है।

  • शार्रीरिक शिक्षार्:- शरीर मार्नव के सभी कर्मों क मार्ध्यम है। श्री अरविन्द क योग दर्शन में स्वस्थ शरीर को बहुत महत्व दियार् गयार् है। शार्रीरिक शिक्षार् के तीन पक्ष हैं- (अ) शार्रीरिक क्रियार्ओं को संयमित करनार् (ब) शरीर के सभी अंगों और क्रियार्ओं क समन्वित विकास (स) शार्रीरिक दोषों को खत्म करनार्। शार्रीरिक विकास हेतु श्री अरविन्द आश्रम में योग, व्यार्यार्म और विभिन्न प्रकार के खेलों की समुचित व्यवस्थार् है।
  • प्रार्णिक शिक्षार्:- प्रार्णिक शिक्षार् के अन्तर्गत इच्छार्-शक्ति को दृढ़ करने क अभ्यार्स करार्यार् जार्तार् है। तथार् चरित्र निर्मार्ण पर जोर दियार् जार्तार् है। इन दोनों उद्देश्यों की प्रार्प्ति उपदेशों यार् व्यार्ख्यार्नों से नहीं हो सकती है। अध्यार्पकों को आदर्श-व्यवहार्र प्रस्तुत करनार् होतार् है तार्कि छार्त्र उनकी अच्छार्इयों को ग्रहण कर सकें। सार्थ ही महार्पुरूषों के आदर्श उपस्थित करने होते हैं। छार्त्र स्वार्ध्यार्य एवं संयम से भी इन गुणों को प्रार्प्त करतार् है।
  • मार्नसिक शिक्षार्:- मन अत्यधिक चंचल होतार् है इसलिए इसे नियंत्रित करनार् कठिन है। पुस्तकीय ज्ञार्न यार् तथ्यों के संकलन से यह कार्य नहीं हो सकतार् है। मार्नसिक शिक्षार् स्वस्थ संस्कृति के निर्मार्ण एवं बेहतर सार्मार्जिक सम्बन्धों के लिए आवश्यक है। श्री मार्तार्जी के अनुसार्र मन की शिक्षार् के पार्ँच अंग हैं- 
    1. एकाग्रतार् की क्षमतार् को जार्ग्रत करनार्। 
    2. मन को व्यार्पक, विस्तृत और समृद्ध बनार्नार्। 
    3. उच्चतम लक्ष्य क निर्धार्रण कर समस्त विचार्रों को उसके सार्थ सुव्यवस्थित करनार्। 
    4. विचार्रों पर संयम रखनार् तथार् गलत विचार्रों क त्यार्ग करनार्। 
    5. मार्नसिक स्थिरतार्, पूर्ण शार्न्ति तथार् सर्वोच्च सत्तार् से आने वार्ली अंत:प्रेरणार्ओं को सही स्वरूप में ग्रहण करने की क्षमतार् क विकास करनार्। 

मार्नसिक विकास के लिए योग को अपनार्नार् आवश्यक है। यम, नियम, आसार्न और प्रार्णार्यार्म विद्यार्थ्री की एकाग्रतार् बढ़ार्ने में सहार्यक होते हैं।

  • आन्तरार्त्मिक शिक्षार्:- आन्तरार्त्मिक शिक्षार् के अन्तर्गत उन शार्श्वत दाशनिक प्रश्नों क उत्तर प्रार्प्त करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है जो मार्नव मन में प्रार्रम्भ से ही मथतार् रहार् है जैसे जीवन क लक्ष्य क्यार् है? पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व क क्यार् कारण है? मार्नव और शार्श्वत सत्तार् क क्यार् सम्बन्ध है? आदि। अन्तरार्त्मार् के विकास के बिनार् मार्नव के संपूर्ण विकास की कल्पनार् नहीं की जार् सकती है। अन्तरार्त्मार् के विकास से ही मार्नव जीवन-लक्ष्य को प्रार्प्त कर सकतार् है। अन्तरार्त्मार् के विकास के लिए योग-सार्धनार् आवश्यक है। 
  • आध्यार्त्मिक शिक्षार्:- आध्यार्त्मिक शिक्षार् शिक्षार् प्रक्रियार् क उच्चतम शिखर है। इसके मार्ध्यम से शिक्षार्थ्री सावभौम सत्तार् के सार्थ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थार्पित करतार् है। श्री मार्तार्जी के अनुसार्र आध्यार्त्मिक शिक्षार् प्रार्प्त कर लेने पर ‘‘सहसार् एक आन्तरिक कपार्ट खुल जार्एगार् और तुम सब ऐसी ज्योति में प्रवेश करोगे जो तुम्हें अमरतार् क आश्वार्सन प्रदार्न करेगी तथार् स्पष्ट अनुभव करार्एगी कि तुम सदार् ही जीवित रहे हो और सदार् ही जीवित रहोगे। नार्श बार्ह्य रूपों क होतार् है और अपनी वार्स्तविक सत्तार् के सम्बन्ध में तुम्हें यह भी पतार् लगेगार् कि ये रूप वस्त्रों के समार्न हैं, जिन्हें पुरार्ने पड़ जार्ने पर फेंक दियार् जार्तार् है।’’ 

श्री अरविन्द मार्तृभार्षार् के मार्ध्यम से शिक्षार् देने के प्रबल पक्षधर थे। उनक मार्ननार् थार् कि विदेशी भार्षार् के शब्दों क संदर्भ भिन्न होतार् है अत: विदेशी भार्षार् क उपयोग विद्यार्थ्री क ध्यार्न शिक्षण-तत्व से हटार्ती है और वह एकाग्र होकर शिक्षार् ग्रहण नहीं कर पार्तार् है। पर श्री अरविन्द अन्तर्रार्ष्ट्रीय भार्षार्ओं के विरोधी भी नहीं थे। वे चार्हते थे छार्त्र अन्तर्रार्ष्ट्रीय भार्षार्ओं को सीखें।

विभिन्न विषयों के शार्ब्दिक ज्ञार्न के सार्थ-सार्थ श्री अरविन्द ने पार्ठ्यक्रम में विभिन्न क्रियार्ओं को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार्। उन्होंने विद्यार्लय को समुदार्य के सार्मार्जिक-आर्थिक परिवेष से जोड़ने पर बल दियार्। वे शिल्प की शिक्षार् पर बल देते थे। वे काव्य, कलार् और संगीत की शिक्षार् आवश्यक मार्नते थे। इन सबसे सृजनार्त्मकतार् और कल्पनार्शीलतार् क विकास होतार् है। श्री अरविन्द विज्ञार्न की शिक्षार् के महत्व को स्वीकार करते हैं। विज्ञार्न से अन्वेषण, विश्लेषण, संश्लेषण तथार् समार्लोचनार् की शक्ति क विकास होतार् है। प्रकृति के विभिन्न जीवों, पार्दपों एवं पदाथों के अवलोकन एवं अध्ययन से मार्नसिक शक्तियों क विकास होतार् है और संवेदनशीलतार् बढ़ती है।

वस्तुओं के उपरार्ंत शब्दों और विचार्रों पर ध्यार्न केन्द्रित करने की आवश्यकतार् है। वे रार्ष्ट्रीय सार्हित्य और इतिहार्स क शिक्षण आवश्यक मार्नते थे। वे रार्ष्ट्र को भूमि के टुकड़े से बहुत अधिक मार्नते थे। इतिहार्स के मार्ध्यम से वे विद्याथियों में रार्ष्ट्रप्रेम की भार्वनार् क विकास करनार् चार्हते थे। उन्होंने रार्ष्ट्रीय शिक्षार् आन्दोलन के दौरार्न विद्याथियों की एक सभार् को सम्बोधित करते हुए कहार्: ‘‘एक रार्ष्ट्र के इतिहार्स में कभी-कभी ऐसे समय भी आते है, जबकि दैव उसके सम्मुख एक ऐसार् कार्य, एक ऐसार् लक्ष्य उपस्थित कर देतार् है जिसके सार्मने प्रत्येक वस्तु त्यार्ग देनी होती है- चार्हे वह कितनी भी ऊँची और पवित्र क्यों न हो। हमार्री मार्तृभूमि के लिए भी ऐसार् समय आ गयार् है, जबकि उसकी सेवार् से अधिक प्रिय और कुछ नहीं है, जबकि अन्य सबकुछ को इसी लक्ष्य की ओर निर्देशित कियार् जार्नार् चार्हिये। तुम अध्ययन करते हो तो उसी के लिए अध्ययन करो। अपने शरीर, मन और आत्मार् को उसी की सेवार् के लिए प्रशिक्षित करो। तुम अपनी आजीविक कमार्ओगे, तार्कि तुम उसके लिए जीवित रह सको। तुम विदेशों को जार्ओगे तार्कि तुम ज्ञार्न के सार्थ वार्पस लौट सको जिससे कि तुम उसकी सेवार् कर सको।’’

श्री अरविन्द नैतिक शिक्षार् को आवश्यक मार्नते हैं। वे रार्जनीति को भी नीति पर आधार्रित करनार् चार्हते थे। वे धर्म के मूल तत्वों को पार्ठ्यक्रम में सम्मिलित करने क सुझार्व देते हैं। वे धर्म को आत्मार् और प्रकृति के बीच मध्यस्थ के रूप में देखते हैं। जैसार् कि हम देख चुके हैं श्री अरविन्द शार्रीरिक शिक्षार् पर बल देते हैं क्योंकि शरीर ही सार्रे धर्म और कर्म क आधार्र है। वे योग के द्वार्रार् मन, मस्तिष्क और शरीर तीनों क सही दिशार् में सार्मन्जस्यपूर्ण विकास पर बल देते हैं।

शिक्षण-विधि 

यद्यपि अरविन्द ने शिक्षण विधि के बार्रे में स्पष्ट नीति यार् कार्ययोजनार् क विकास नहीं कियार् पर उनके कार्यों से उनकी शिक्षण विधि के संदर्भ में मूलभूत सिद्धार्न्तों क विश्लेषण कियार् जार् सकतार् है।

श्री अरविन्द क यह मार्ननार् थार् कि छार्त्र को कुछ भी ऐसार् नहीं सिखार्यार् नहीं जार् सकतार् जो पहले से उसमें निहित नहीं है। छार्त्र को सीखने की स्वतंत्रतार् होनी चार्हिए- शिक्षक क कर्तव्य है कि वह उपयुक्त परिस्थितियों क निर्मार्ण करे। शिक्षण-अधिगम प्रक्रियार् में बच्चे की इच्छार् एवं रूचि अधिक महत्व रखतार् है। विद्यार्थ्री जिस विषय की शिक्षार् में रूचि रखतार् हो उसे उस विषय की शिक्षार् देनी चार्हिए। सार्थ ही शिक्षण विधि क चयन छार्त्र की रूचि के अनुसार्र होनी चार्हिए। शिक्षक को इस तरह से शिक्षण कार्य करनार् चार्हिए कि छार्त्र पढ़ार्ये जार् रहे पार्ठ एवं विषय में रूचि ले।

श्री अरविन्द ने इस बार्त पर जोर दियार् कि बच्चे की शिक्षार् वर्णमार्लार् से प्रार्रम्भ नहीं होनी चार्हिए। उसे प्रार्रम्भ में प्रकृति के विभिन्न रूपों- पेड़- पौधों, सितार्रों, सरितार्, वनस्पतियों एवं अन्य भौतिक पदाथों क निरीक्षण करने क अवसर देनार् चार्हिए। इससे विद्याथियों में निरीक्षण शक्ति, संवेदनशीलतार्, सहयोग एवं सहअस्तित्व क भार्व विकसित होतार् है। इसके बार्द अक्षरों यार् वर्णों को सिखार्नार् चार्हिए। फिर शब्दों क अर्थ बतार्कर उनक विभिन्न तरीकों से प्रयोग करनार् सिखार्नार् चार्हिए। शब्द प्रयोग द्वार्रार् सार्हित्यिक क्षमतार् क विकास होतार् है।

विज्ञार्न-शिक्षण में छार्त्र की जिज्ञार्सार् प्रवृत्ति को प्रोत्सार्हित करनार् चार्हिए। इसके लिए आस-पार्स के वार्तार्वरण में स्थित जीव-जन्तु, पेड़- पौधे, मिÍी-पत्थर, तार्रे-नक्षत्र आदि क निरीक्षण कर प्रकृति के रहस्यों क उद्घार्टन कर विभिन्न विज्ञार्नों की शिक्षार् ग्रहण करने की प्रवृत्ति को बढ़ार्नार् चार्हिए।

छार्त्रों को दर्शन पढ़ार्ते समय छार्त्रों में बौद्धिक चेतनार् क विकास करने क प्रयार्स करनार् चार्हिए। इतिहार्स इस तरह से पढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए कि विद्याथियों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास हो। श्री अरविन्द शिक्षार् के मार्ध्यम के रूप में मार्तृभार्षार् के उपयोग पर बल देते थे। इससे रार्ष्ट्रीय सार्हित्य एवं इतिहार्स को समझने में आसार्नी होती है, सार्थ ही चार्रों ओर के परिवेश क भी बेहतर ज्ञार्न मिलतार् है।

अरविन्द ने ऐसी शिक्षण-विधि अपनार्ने पर जोर दियार् जिससे छार्त्र शिक्षार् क अर्थ केवल सूचनार्ओं क संग्रह न मार्ने। वह रटने पर जोर न दे वरन् ज्ञार्न प्रार्प्त करने के कौशलों को महत्वपूर्ण मार्नकर उनक विकास करे। विद्याथियों में समझ, स्मृति, निर्णय क्षमतार्, कल्पनार्, तर्क, चिन्तन जैसी शक्तियों क विकास कियार् जार्नार् चार्हिए।

श्री अरविन्द धामिक शिक्षार् को आवश्यक मार्नते थे, पर उनक यह स्पष्ट मत है कि सप्तार्ह के कतिपय दिनों में कुछ कालार्ंशों को धामिक शिक्षार् के लिए तय कर उसकी शिक्षार् देनार् उचित यार् लार्भदार्यक नहीं है। धामिक शिक्षार् बार्ल्यार्वस्थार् से ही पवित्र, शार्न्त एवं शुद्ध प्रार्कृतिक वार्तार्वरण में दी जार्नी चार्हिए। आस्थार् से पूर्ण जीवन ही धामिक शिक्षार् क बेहतर मार्ध्यम है।

अरविन्द की दृष्टि में अध्यार्पक 

अध्यार्पक मार्त्र ‘इन्स्ट्रक्टर’ नहीं है। उसक सर्वार्धिक महत्वपूर्ण कार्य ‘‘अपने आपको समझने’’ में छार्त्र की सहार्यतार् करनार् है। वह सूचनार्ओं को विद्याथियों के समक्ष परोसने वार्लार् नहीं वरन् माग-दर्शक है। अध्यार्पक विद्याथियों की क्रियार्त्मक एवं रचनार्त्मक शक्तियों के विकास में सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है।

महर्षि अरविन्द के अनुसार्र शिक्षक को रार्ष्ट्रीय संस्कृति के मार्ली के रूप में कार्य करनार् चार्हिए। उसक कर्तव्य है संस्कार की जड़ों में खार्द देनार्। और जड़ों को सींच-सींच कर विद्यार्थ्री को महार्-मार्नव बनार्नार्।

महर्षि अरविन्द की शिष्यार् श्री मार्ँ ने मार्तार्-पितार् के कर्तव्यों के संदर्भ में जो बार्ते कहीं वह अध्यार्पकों पर भी पूर्णत: लार्गू होती है। वे कहती हैं ‘‘बच्चे को शिक्षार् देने की योग्यतार् प्रार्प्त करने के लिए प्रथम कर्तव्य है अपने आप को शिक्षित करनार्, अपने बार्रे में सचेतन होनार् और अपने ऊपर नियन्त्रण रखनार्, जिससे हम अपने बच्चे के सार्मने कोर्इ बुरार् उदार्हरण प्रस्तुत न करें। उदार्हरण द्वार्रार् ही शिक्षार् फलदार्यी होती है। अगर तुम चार्हते हो कि तुम्हार्रार् बच्चार् तुम्हार्रार् आदर करे, तो अपने लिए आदर भार्व रखो और हर क्षण सम्मार्न के योग्य बनो। कभी भी स्वेच्छार्चार्री, अत्यार्चार्री, असहिष्णु और क्रोधित मत होओ। जब तुम्हार्रार् बच्चार् तुमसे कोर्इ प्रश्न पूछे, तब तुम यह समझकर कि वह तुम्हार्री बार्त नहीं समझ सकतार्, उसे जड़तार् और मूर्खतार् के सार्थ कोर्इ उत्तर मत दो। अगर तुम थोड़ार् कष्ट उठार्ओ तो तुम्हार्री बार्त वह हमेशार् समझ सकेगार्।’’

अरविन्द आश्रम, पार्ण्डिचेरी में कार्य करने वार्ले अध्यार्पकों को अलग से कोर्इ वेतन नहीं दियार् जार्तार् है। श्री अरविन्द शिक्षार् को धन के आदार्न प्रदार्न से जोड़ कर इसे व्यार्पार्र क रूप देने के विरोधी थे। अत: आश्रम- विद्यार्लय और विश्वविद्यार्लय के कार्यरत अध्यार्पकों की आवश्यकतार् को आश्रम उसी तरह से पूरार् करतार् है जैसे अन्य सार्धकों की। यह प्रार्चीन भार्रतीय शिक्षार् व्यवस्थार् के महार्न आदर्श पर आधार्रित है जब गुरू शिष्यों से अध्ययन काल के दौरार्न कोर्इ आर्थिक मार्ँग नहीं करते थे।

छार्त्र-संकल्पनार् 

श्री अरविन्द विद्यार्थ्री को प्रछन्न रूप में ‘सर्वशक्तिमार्न चैतन्य’ मार्नते हैं। वे विद्यार्थ्री को केवल शरीर के रूप में ही नहीं देखते हैं। शरीर के सार्थ-सार्थ प्रार्ण, मन, बुद्धि, आत्मार् आदि विभिन्न पक्षों को समार्न महत्व देते हैं। इन सबक वे समन्वित विकास चार्हते हैं। महर्षि अरविन्द शिक्षार् में अन्त:करण को महत्वपूर्ण मार्नते हैं। जैसार् कि हम लोग पहले ही देख चुके हैं अन्त:करण के कर्इ स्तर होते हैं। अन्त:करण क प्रथम स्तर ‘‘चित्त’’ कहलार्तार् है। यह स्मृतियों क संचय स्थल है। द्वितीय स्तर ‘‘मन’’ कहलार्तार् है। यह इन्द्रियों से सूचनार्ओं एवं अनुभवों को ग्रहण कर उन्हें संप्रत्ययों एवं विचार्रों में परिवर्तित करतार् है। अन्त:करण क तृतीय स्तर ‘‘बुद्धि’’ है। जिसक शिक्षार् प्रक्रियार् में अत्यधिक महत्व है। यह सूचनार्ओं एवं ज्ञार्न-सार्मग्रियों को व्यवस्थित करतार् है, निष्कर्ष निकालतार् है और सार्मार्न्यीकरण करतार् है। इस तरह से बुद्धि सिद्धार्न्त निरूपण करतार् है। अन्त:करण क सर्वोच्च स्तर ‘‘सार्क्षार्त अनुभूति’’ है। श्री अरविन्द क स्पष्ट मत है कि ‘‘मस्तिष्क को ऐसार् कुछ भी सिखार्यार् नहीं जार् सकतार्, जो कि बार्लक में सुप्त ज्ञार्न के रूप में पहले से ही विद्यमार्न न हो।’’ अध्यार्पक इन अन्तर्निहित शक्तियों को जार्गृत करतार् है, बार्हर से वह कुछ भी आरोपित नहीं कर सकतार् है।

बार्लक के सभी शार्रीरिक तथार् मार्नसिक अंग उसके स्वयं के वश में होने चार्हिए, न कि अध्यार्पक के नियन्त्रण में। बार्लक की रूचियों एवं आवश्यकतार्ओं के अनुरूप उन्हें कार्य मिलनार् चार्हिए।

अरविन्द आश्रम की सार्री शिक्षार्-व्यवस्थार् नि:शुल्क है। विद्यार्थ्री एक बार्र अगर प्रवेश पार् लेतार् है तो उसे कोर्इ शुल्क नहीं देनार् पड़तार् है। यह प्रार्चीन गुरूकुल व्यवस्थार् के अनुरूप है। श्री अरविन्द विद्याथियों में स्वअनुशार्सन की भार्वनार् जगार्नार् चार्हते थे। आश्रम क सम्पूर्ण वार्तार्वरण आध्यार्त्मिक है अत: स्वभार्विक है कि यहार्ँ के विद्याथियों की चेतनार् क स्तर ऊँचार् हो।

शिक्षण-संस्स्थार्यें 

रार्जनीति से सन्यार्स ग्रहण करने के उपरार्ंत 1910 में श्री अरविन्द पार्ण्डिचेरी आ गये। वे यहीं सार्धनार्-रत हो गये। धीरे-धीरे सार्धकों एवं अरविन्द के अनुगार्मियों की संख्यार् बढ़ती गर्इ। 1926 में यहार्ँ अरविन्द आश्रम की स्थार्पनार् की गर्इ। 1940 से सार्धकों को आश्रम में बच्चों को रखने की अनुमति दे दी गर्इ। बच्चों की आवश्यकतार् को देखते है श्री अरविन्द ने 1943 में आश्रम विद्यार्लय की स्थार्पनार् की।

6 जनवरी, 1952 को श्री मार्ँ ने ‘श्री अरविन्दो इन्टरनेशनल यूनिवर्सिटी सेन्टर’ की स्थार्पनार् की- जिसे बार्द में ‘श्री अरविन्द इन्टरनेशनल सेन्टर ऑफ एडुकेशन’ के नार्म से जार्नार् गयार्। यह पार्ण्डिचेरी के योगार्श्रम क अविभार्ज्य अंग है क्योंकि योग और शिक्षार् क उद्देश्य समार्न है- सम्पूर्णतार् की प्रार्प्ति कर शार्श्वत सावभौमिक सत्तार् से आत्मतत्व क मिलन। इस तरह यहार्ँ प्रार्रम्भिक शिक्षार् से लेकर उच्च स्तर की शिक्षार् एवं शोध की व्यवस्थार् है।

चूँकि शिक्षार् क उद्देश्य है आत्मतत्व की जार्गश्ति एवं विकास, अत: लड़कों एवं लड़कियों की शिक्षार् के केन्द्र में कोर्इ कश्त्रिम अन्तर नहीं कियार् जार्तार् है। अत: अरविन्द अन्तर्रार्ष्ट्रीय शिक्षार् के केन्द्र में लड़कियों के लिए भी वही शैक्षिक कार्यक्रम है जो लड़कियों के लिए। यहार्ँ तक कि शार्रीरिक शिक्षार् में भी भिन्नतार् नहीं है। इसके बार्वजूद विकल्प बहुत अधिक हैं पर चयन क आधार्र लिंग यार् परम्परार्गत निषेध न होकर आन्तरिक अभिरूचि है।

आधुनिक शिक्षार् व्यवस्थार् बहुत हद तक वार्णिज्य क रूप ले चुकी है जहार्ँ अध्यार्पक अर्थिक लार्भ के लिए अध्यार्पन करतार् है और छार्त्र पैसार् चुक कर अन्य चीजों की तरह शिक्षार् को खरीदते हैं। आश्रम में एक बार्र प्रवेश के बार्द शिक्षार् पूर्णत: नि:शुल्क है। और अध्यार्पक भी अन्य सार्धकों की ही तरह आश्रम की व्यवस्थार् से अपनी आवश्यकतार्ओं को पूरार् करतार् है। उन्हें अलग से कोर्इ वेतन नहीं दियार् जार्तार् है। वे प्रेम और सत्य की खोज के सहयार्त्री हैं न कि ज्ञार्न क बेचने और खरीदने वार्ले। शिक्षार् केन्द्र एक समुदार्य एवं एक चेतनार् के रूप में कार्य करतार् है जिसके केन्द्र में समर्पण क भार्व है। 1973 में अपने शरीर-त्यार्ग के पूर्व श्री मार्ँ ने शिक्षार् केन्द्र की जड़ें मजबूत कर दी थी। उनके बार्द भी अरविन्द के आदर्शों के अनुरूप शिक्षार् केन्द्र शिक्षण- अधिगम के क्षेत्र में नये-नये प्रयोग कर रहार् है।

1968 में श्री मार्ँ ने ‘ओरोविले’ की स्थार्पनार् की। यह जार्ति, धर्म, भार्षार्, प्रजार्ति से ऊपर उठकर संपूर्ण नगर के सार्मूहिक निवार्स एवं शिक्षार् क अद्भुत प्रयोग है। यह मार्नव के भविष्य में विश्वार्स की अभिव्यक्ति है। ओरोविले जीने की एक ‘नर्इ शैली’ के विकास क प्रयार्स है जो श्री अरविन्द के ‘नर्इ मार्नवतार्’ के संप्रत्यय पर आधार्रित है।

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