श्रम विधार्न क्यार् है ?
आधुनिक प्रचलन में ‘विधार्न’ शब्द से उच्च प्रार्धिकार से युक्त तथार् जनतार् क प्रचुरतार् से प्रतिनिधित्व करने वार्ले विशिष्ट रार्जकीय अभिकरणों द्वार्रार् बनार्ए गए विधि के नियमों क बोध होतार् है। इस दृष्टिकोण के अनुसार्र, विधार्न के अन्तर्गत मुख्यत: जनतार् के समर्थन प्रार्प्त विधार्नमंडलों तथार् अन्य मार्न्यतार् प्रार्प्त सक्षम प्रार्धिकारियों द्वार्रार् बनार्ए गए कानून सम्मिलित होते हैं। व्यवहार्र में, विधार्न को मुख्यत: इसी अर्थ में देखार् जार्तार् है। कार्यकारिणी द्वार्रार् अस्थार्यी अवधि के लिए बनार्ए गए अध्यार्देश भी विधार्न के अंतर्गत आते हैं, क्योंकि इनक बार्द में स्थार्यी रूप से विधार्न मंडलों द्वार्रार् ही स्वीकृत कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। कभी-कभी न्यार्यपार्लिक के निर्णय भी पूरक विधार्न क रूप ले लेते हैं।

आधुनिक प्रजार्तार्ंत्रिक व्यवस्थार् में विधार्न बनार्ने की शक्ति किसी केन्द्रीय अभिकरण (संघ यार् रार्ज्य के स्तर पर)- सार्मार्न्यत: विधार्नमंडलों में निहित होती है तथार् उनके द्वार्रार् बनार्ए गए विधार्न प्रचिलन सभी नियमों, लिखतों यार् निदेशें से सर्वोच्च होते हैं। कुछ प्रकार की रार्जनीतिक व्यवस्थार्ओं, जैसे- तार्नार्शार्ही में विधार्न बनार्ने क कार्य, अलग से कोर्इ विशेष अभिकरण नहीं संपन्न करतार्। ऐसी व्यवस्थार्ओं में कार्यकारिणी, विधार्यिक एवं न्यार्यपार्लिक तीनों के कार्य किसी एक ही व्यक्ति यार् व्यक्तियों के समूह में निहित हो सकते हैं। व्यवहार्र में, आधुनिक विधार्न सक्षम विधार्नमंडलों द्वार्रार् अनुमोदित नियमों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। इस अध्यार्य में आधुनिक श्रम-विधार्न के संदर्भ में ‘विधार्न’ शब्द क प्रयोग इसी अर्थ में कियार् गयार् है।

विधार्न क अर्थ 

‘विधार्न’ शब्द क प्रयोग और भी व्यार्पक अर्थ में कियार् जार्तार् है। कर्इ विचार्रकों के अनुसार्र विधार्न के अंतर्गत विधार्नमंडलों द्वार्रार् स्वीकृत विधियों और नियमों तथार् अध्यार्देशों के अतिरिक्त, कार्यकारिणी प्रशार्सन और क्षेत्रीय एवं स्थार्नीय निकायों द्वार्रार् बनार्ए गए नियमों तथार् विनियमों को भी सम्मिलित कियार् जार्नार् चार्हिए। लेकिन, इस अध्यार्य के प्रयोजन के लिए विधार्न के इस अर्थ को आधुनिक श्रम विधार्न के संदर्भ में नहीं अपनार्यार् गयार् है।

स्वतार्ंत्रिक रार्जनीतिक संस्थार्ओं एवं कल्यार्णकारी रार्ज्य के उदय के पूर्व विधार्न को अत्यंत ही व्यार्पक अर्थ में देखार् जार्तार् थार्। आधुनिक विधार्नमंडलें यार् विधि बनार्ने वार्ले विशिष्ट अभिकरणों के आगमन के पहले सदियों तक व्यक्तियों एवं उनके समूहों के आचरण, कार्यकलार्प तथार् उनकी दशार्ओं पर नियमन विविध प्रकार के लिखतों एवं अनौपचार्रिक निदेशों द्वार्रार् होतार् थार्। इन लिखतों यार् निदेशों में धामिक निदेशों प्रथार्गत नियमों, व्यक्तिगत विधार्यकों की संहितार्ओं, रार्जकीय आदेशों, स्थार्नीय प्रशार्स्कों एवं अभिकरणों द्वार्रार् बनार्ए गए नियमों और लोकरीतियों क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है। सार्मार्न्यत: ये आधुनिक विधार्न की तरह लार्गू होते थे। उनक उल्लंघन दंडनीय उपरार्ध समझार् जार्तार् थार्। प्रार्चीन एवं मध्यकालीन युग के श्रम-विधार्नों की विवेचनार् में इन लिखतों और अनौपचार्रिक निदेशों को विधार्न के अंतर्गत सम्मिलित कियार् गयार् है। आधुनिक विधार्न के उदय से ये महत्वहीन होते गए और अंनत: विधार्न की सर्वोच्चतार् स्थार्पित हुर्इ।

श्रम विधार्न क अर्थ 

वार्स्तव में श्रम विधार्न सार्मार्जिक विधार्न क ही एक अंग है। श्रमिक समार्ज के विशिष्ट समूह होते हैं। इस कारण श्रमिकों के लिये बनार्ये गये विधार्न सार्मार्जिक विधार्न की एक अलग श्रेणी में आते हैं। औद्योगिक के प्रसार्र, मजदूरी अर्जकों के स्थार्यी वर्ग में वृद्धि, विभिन्न देशों के आर्थिक एवं सार्मार्जिक जीवन में श्रमिकों के बढ़ते हुये महत्व तथार् उनकी प्रस्थिति में सुधार्र, श्रम संघों के विकास, श्रमिकों में अपने अधिकारों के प्रति जार्गरूकतार्, संघों श्रमिकों के बीच शिक्षार् के प्रसार्र, प्रबन्धकों और नियोजकों के परमार्अधिकारों में हार्स तथार् कर्इ अन्य कारणों से श्रम विधार्न की व्यार्पकतार् बढ़ती गर्इ है। श्रम विधार्नों की व्यार्पकतार् और उनके बढ़ते हुये महत्व को ध्यार्न में रखते हुये उन्हें एक अलग श्रेणी में रखनार् उपयुक्त समझार् जार्तार् है। सिद्धार्न्त: श्रम विधार्न में व्यक्तियों यार् उनके समूहों को श्रमिक यार् उनके समूह के रूप में देखार् जार्तार् है।

आधुनिक श्रम विधार्न के कुछ महत्वपूर्ण विषय है – मजदूरी की मार्त्रार्, मजदूरी क भुगतार्न, मजदूरी से कटौतियार्ं, कार्य के घंटे, विश्रार्म अंतरार्ल, सार्प्तार्हिक अवकाश, सवेतन छुट्टी, कार्य की भौतिक दशार्यें, श्रम संघ, सार्मूहिक सौदेबार्जी, हड़तार्ल, स्थार्यी आदेश, नियोजन की शर्ते, बोनस, कर्मकार क्षतिपूर्ति, प्रसूति हितलार्भ एवं कल्यार्ण निधि आदि है।

श्रम विधार्न के उद्देश्य 

श्रम विधार्न के अग्रलिखित उद्देश्य है –

  1. औद्योगिक के प्रसार्र को बढ़ार्वार् देनार्। 
  2. मजदूरी अर्जकों के स्थार्यी वर्ग में उपयुक्त वृद्धि करनार्। 
  3. विभिन्न देशों के आर्थिक एवं सार्मार्जिक जीवन में श्रमिकों के बढ़ते हुये महत्व तथार् उनकी प्रस्थिति में सुधार्र को देखते हुये भार्रतीय परिदृष्य में लार्गू करार्नार्।
  4. श्रम संघों क विकास करनार्।
  5. श्रमिकों में अपने अधिकारों के प्रति जार्गरूकतार् फैलार्नार्। 
  6. संघों श्रमिकों के बीच शिक्षार् के प्रसार्र को बढ़ार्वार् देनार्। 
  7. प्रबन्धकों और नियोजकों के परमार्अधिकारों में हार्स तथार् कर्इ अन्य कारणों से श्रम विधार्न की व्यार्पकतार् को बढ़ार्नार्। 

आधुनिक श्रम-विधार्न के कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धार्ंत 

आधुनिक श्रम-विधार्न के कर्इ सिद्धार्ंत है, जिनमें कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धार्ंतों की विवेचनार् नीचे की जार्ती है। यहार्ँ यह उल्लेखनीय है कि इन सिद्धार्ंतों में अधिकांश एक-दूसरे से जुड़े है और उनमें किसी एक को पूर्णत: पृथक समझनार् भार्ंतिपूर्ण होगार्। फिर भी, सुविधार् की दृष्टि से इन सिद्धार्ंतों की निम्नलिखित वर्गो में रखार् जार् सकतार् है-

1. संरक्षार् क सिद्धार्ंत – संरक्षार् के सिद्धार्ंत के अनुसार्र, श्रम एवं सार्मार्जिक विधार्न क उद्देश्य ऐसे श्रमिकों और समार्ज के समूहों को संरक्षार् प्रदार्न करनार् है, जिन्हें संरक्षार् की आवश्यकतार् तो है, पर वे स्वयं अपनी संरक्षार् नहीं कर सकते। जैसार् कि सर्वार्वदित है, औद्योगिकीकरण के प्रार्रंभिक काल में बार्लकों, स्त्रियों, यहार्ं तक कि वयस्क पुरुष-श्रमिकों के कार्य एवं जीवन की दशार्एं अत्यंत ही दुश्कर थी। बहुत ही कम उम्र के छोटे-छोटे बच्चों क कारखार्नों में नियोजन, कार्य के अत्यधिक घंटे, स्त्रियों और बार्लकों क रार्त्रि में तथार् खतरनार्क कामों पर नियोजन, विश्रार्म-अंतरार्ल क अभार्व, अपर्यार्प्त प्रकाश एवं संवार्तन, धूल-धुएं से दूषित पर्यार्वरण तथार् अन्य प्रकार की अस्वार्स्थ्यकर एवं दुश्कर भौतिक कार्य की दशार्एं प्रार्रंभिक औद्योगिकीकरण की कुछ उल्लेखनीय ज्यार्दतियार्ं थीं। सार्थ ही, श्रमिकों को मजदूरी भी बहुत ही कम दी जार्ती थी। मजदूरी भुगतार्न की न तो कोर्इ निश्चित अवधि होती थी और न ही श्रमिक सदार् ही नकद भुगतार्न की आशार् कर सकते थे।

अनुशार्सनहीनतार्, खरार्ब काम, आदेशों के उल्लंघन, अनुपस्थिति, सार्मार्न और मशीनों की क्षति आदि के बहार्ने श्रमिकों पर मनमार्ने ढंग से जुर्मार्ने लगार्ए जार्ते और उन्हें मजदूरों से काटकर वसूल कर लियार् जार्तार्। वयस्क श्रमिक अपने संगठन बनार्कर कार्य की दशार्ओं में सुधार्र लार्ने के लिए नियोजकों पर सार्मूहिक रूप से दबार्व डार्लने क प्रयार्स करते, लेकिन बार्लक, स्त्री तथार् छोटे-छोटे प्रतिष्ठार्नों के असंगठित वयस्क श्रमिक इन ज्यार्दतियों से अपनी रक्षार् करने में असमर्थ थे।

अनियंत्रित पूंजीवार्द और मुक्त प्रतिस्पर्द्धार् वार्ली उम्र संयम की अर्थव्यवस्थार् में नियोजकों क एकमार्त्र लक्ष्य अधिक-से-अधिक मुनार्फार् अर्जित करनार् थार्। वे उद्योग के मार्नवीय तत्वों की अवहेलनार् करते, जिससे स्थिति और भी बिगड़ती गर्इ। ऐसी स्थिति में रार्ज्य ही संरक्षार्त्मक श्रम-विधार्न बनार्कर श्रमिकों को इन ज्यार्दतियों से रक्षार् प्रदार्न कर सकतार् थार्। धीरे-धीरे खार्नों एवं अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठार्नों में भी इस प्रकार के संरक्षार्त्मक श्रम-विधार्न की आवश्यकतार् अनुभव की जार्ने लगी। अंतत: रार्ज्य की ओर से कारखार्नों में श्रम की दशार्ओं को विनियमित करने के उद्देश्य हस्तक्षेप शुरू हुआ। कालार्ंतर में, श्रमिकों की विभिन्न क्षेत्रों में संरक्षार् प्रदार्न करने के उद्देश्य से श्रम-विधार्न बनार्ने क सिलसिलार् स्थार्यी होतार् गयार्।

विश्व क पहलार् कारखार्नार्-विधार्न इंगलैंड में शिक्षु स्वार्स्थ्य एवं नैतिकतार् अधिनियम, 1802 के रूप में बनार्यार् गयार्। इसक मुख्य उद्देश्य सूती वस्त्र-कारखार्नों में काम करने वार्ले शिशु-बार्लकों के स्वार्स्थ्य एवं नैतिकतार् की रक्षार् करनार् थार्। धीरे-धीरे इंगलैंड में क्रम में कर्इ कारखार्नार् अधिनियम बनार्ए गए। बार्द में भार्रत तथार् विश्व के अन्य देशों में भी कारखार्नार् अधिनियम बनार्ए गए। समय के गुजरने के सार्थ-सार्थ इन अधिनियमों के विस्तार्र-क्षेत्र, विषय, मार्नक एवं प्रशार्सन में सुधार्र किए गए। कारखार्नार्-विधार्न की तरह कुछ अन्य संरक्षार्त्मक श्रम-विधार्न भी बनार्ए गए, जैसे- खार्न-विधार्न, बार्गार्न-श्रम-विधार्न, दुकान एवं प्रतिष्ठार्न-श्रम-विधार्न, बार्ल-श्रमिक-विधार्न, न्यूनतम मजदूरी-विधार्न तथार् मजदूरी-भुगतार्न-विधार्न। इस सिद्धार्ंत को ध्यार्न में रखकर बनार्ए गए कुछ भार्रतीय अधिनियम है- कारखार्नार् अधिनियम, 1948, खार्न अधिनियम, 1952, बार्गार्न श्रमिक अधिनियम, 1951, दुकान एवं प्रतिष्ठार्न अधिनियम, मोटर-परिवहन कर्मकार अधिनियम, बार्लश्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986, मजदूरी भुगतार्न अधिनियम, 1936, तथार् न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948। संरक्षार्त्मक श्रम-विधार्नों के कुछ महत्वपूण विषय है- कार्य के अधिकतम घंटे, सार्प्तार्हिक अवकाश, विश्रार्म-अंतरार्ल, रार्त्रि-कार्य, कार्य की भौतिक दशार्एं, जैसे- सफाइ, प्रकाश और संवार्तन, सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य, बार्लकों के नियोजन की निम्नतम उम्र, खार्न के भीतर काम, न्यूनतम मजदूरी और मजदूरी के भुगतार्न से संबद्ध कदार्चार्रों क नियंत्रण।

इसी तरह, कुछ सार्मार्जिक विधार्न समार्ज के अन्य कमजोर वर्गो यार् समूहों की संरक्षार् प्रदार्न करने के उद्देश्य से बनार्ए गए है। इनमें बार्लकों की अनिवाय प्रार्थमिक शिक्षार्-संबंधी विधार्न, स्त्रियों के हितों की रक्षार् के लिए बनार्ए गए विवार्ह और संपत्ति के अधिकार से संबंद्ध विधार्न तथार् अनुसूचित जार्तियों और जनजार्तियों के हितों की रक्षार् के लिए बनार्ए गए विधार्नों क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है। भार्रतीय संविधार्न में भी बार्लकों, स्त्रियों, अनुसूचित जार्तियों एवं जनजार्तियों तथार् समार्ज के अल्पसंख्यक समूहों की रक्षार् में संबंद्ध महत्वपूर्ण उपबंध हैं।

2. सार्मार्जिक न्यार्य क सिद्धार्ंत – सार्मार्जिक न्यार्य क सिद्धार्ंत सार्मार्जिक संबंधों में समार्नतार् की स्थार्पनार् पर जोर देतार् है। यह सिद्धार्ंत समार्नतार् के स्वीकृत मार्नकों के आधार्र पर मनुष्यों एवं उनके समूहों के बीच भेदभार्व क अंत चार्हतार् है। सभ्यतार् के आरम्भ से ही समार्ज में किसी-न-किसी प्रकार की असमार्नतार्एं रही है। विश्व के प्रार्य: सभी देशों में समार्ज के प्रभार्वशार्ली वर्ग कुछ दुर्बल समूहों क शोषण करते आए है। समार्ज के एक ही वर्ग यार् समूहों के बीच भी भेदभार्व के अनेक उदार्हरण मिलते है। जैसार् कि इस अध्यार्य में पहले उल्लेख कियार् जार् चुक है-प्रार्चीन एवं मध्यकालीन युग में दार्सों एवं कृषि-दार्सों को अन्य श्रेणियों के श्रमिकों को उपलब्ध अधिकारों से वंचित रखार् गयार्। इसी तरह बंधुआ और करार्रबद्ध श्रमिकों तथार् बलार्त श्रम पर लगार्ए जार्ने वार्ले श्रमिकों क कर्इ प्रकार से शोषण होतार् आ रहार् है, औद्योगिक और कृषि श्रमिकों के बीच भी भेदभार्व होते आ रहे हैं। पुरुषों की तुलनार् में स्त्रियों को भी कर्इ प्रकार के आर्थिक, सार्मार्जिक और रार्जनीतिक भेदभार्वों क सार्मनार् करनार् पड़ार् है। इसी तरह जार्ति, धर्म, प्रजार्ति, सप्रदार्य आदि के आधार्रों पर मनुष्यों के बीच असमार्नतार्एं रही है। सार्मार्जिक न्यार्य क सिद्धार्ंत मनुष्यों और उनके समूहों के बीच समार्नतार् पर जोर देतार् है।

अंतरार्ष्ट्रीय श्रम-संगठन ने भी सार्मार्जिक न्यार्य की स्थार्पनार् पर प्रार्रंभ से ही जोर दियार् है। इस महत्त्वपूर्ण अंतरार्ष्ट्रीय संगठन द्वार्रार् पार्रित ‘श्रमिकों की स्वतंत्रतार् के अधिकारपत्र‘ में स्पष्ट उल्लेख कियार् गयार् है- ‘‘(1) श्रम कोर्इ वस्तु नही है। (2) धार्रित प्रगति के लिए अभिव्यक्ति एवं संघ बनार्ने की स्वतंत्रतार् के अधिकार अनिवाय है। (3) निर्धनतार् कहीं भी सभी जगह समृद्धि के लिए खतरनार्क होती है।’’ फिलार्डेल्फियार् में 1944 में हुए अंतरार्ष्ट्रीय श्रम-सम्मेलन द्वार्रार् अपनार्ए गए संगठन के लक्ष्यों, उद्देश्यों और सिद्धार्ंतों से संबद्ध घोषणार्पत्र में स्पष्ट रूप से कहार् गयार् कि स्थार्यी शार्ंति तभी स्थार्पित हो सकती है, जब यह सार्मार्जिक न्यार्य पर आधृत हो। घोषणार्पत्र में यह भी पुष्टि की गर्इ – ‘‘सभी मनुष्यों को, प्रजार्ति, संप्रदार्य यार् लिंग के भेदभार्व के बिनार् स्वतंत्रतार् और गरिमार्, आर्थिक सुरक्षार् और समार्न अवसर की दशार्ओं में अपने भौतिक कल्यार्ण तथार् आध्यार्त्मिक विकास दोनों के परिशीलन क अधिकार है।’’

भार्रतीय संविधार्न में भी सार्मार्जिक न्यार्य की स्थार्पनार् से संबद्ध महत्वपूर्ण उपबंध है। समतार् के मूल अधिकार के अंतर्गत कानून के समक्ष समतार्, धर्म, मूलवंश, जार्ति, लिंग के जन्मस्थार्न के आधार्र पर भेदभार्व के प्रतिशेध और रोजगार्र के विषय में अवसर की समार्नतार् क विशेष रूप से उल्लेख कियार् गयार् है। स्वतंत्रतार्, शोषण में रक्षार् जिसमें बलार्त श्रम, बार्लश्रम और व्यक्तियों के क्रय-विक्रय के प्रतिशेध सम्मिलित है। तथार् अल्पसंख्यकों के अपनी संस्कृति, भार्षार् और लिपि के संरक्षण के अधिकार भी सार्मार्जिक न्यार्य की स्थार्पनार् से संबद्ध महत्वपूर्ण सार्ंविधार्निक उपबंध है। रार्ज्यनीति के निर्देशक सिद्धार्ंतों के अंतर्गत स्पष्ट कहार् गयार् है, ‘‘सरकार ऐसी सार्मार्जिक व्यवस्थार् की भरसक कारगर रूप में स्थार्पनार् करके और उसक संरक्षण करके लोक-कल्यार्ण को प्रोत्सार्हन देने क प्रयार्स करेगी, जिसमें रार्ष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीतिक न्यार्य क पार्लन हो।’’ इन सिद्धार्ंतों में समार्न कार्य के लिए समार्न वेतन, सभी स्त्री-पुरुषों को जीवनज्ञार्पन के लिए यथेष्ट तथार् समार्न अवसर, बार्ल्यार्वस्थार् एवं युवार्वस्थार् की शोषण एवं नैतिक परित्यार्ग से रक्षार् और समार्ज के दुर्बल समूहों की सार्मार्जिक अन्यार्य और शोषण से रक्षार् क स्पष्ट उल्लेख कियार् गयार् है।

सार्मार्जिक न्यार्य के सिद्धार्ंत पर बनार्ए गए श्रम एवं सार्मार्जिक विधार्न के उदार्हरण है -दार्स, कृषि-दार्स करार्रबद्ध, बंधुआ तथार् बलार्त श्रम-प्रथार्ओं के अनुबद्ध संबंधी विधार्न, समार्न पार्रिश्रमिक-विधार्न, जार्ति निर्योग्यतार्-निवार्रण-विधार्न, अस्पृष्यतार्-निवार्रण-विधार्न स्त्री तथार् लड़की अनैतिक व्यार्पार्र-दमन-विधार्न तथार् रक्षार्वृत्ति-निवार्रण-विधार्न। इस सिद्धार्ंत को ध्यार्न में रखकर बनार्ए गए कुछ भार्रतीय अधिनियम है- भार्रतीय दार्सतार् अधिनियम, 1843, जार्ति निर्योग्यतार् निवार्रण अधिनियम, 1850, समार्न पार्रिश्रमिक अधिनियम, 1976, बंधुआ श्रम-पद्धति (उत्पार्दन) अधिनियम, 1976, सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 तथार् अनैतिक व्यार्पार्र (निवार्रण) अधिनियम, 1956।

3. नियमन क सिद्धार्ंत – औद्योगिक विकास के प्रार्रंभिक चरणों में श्रमिकों और नियोजकों के संबंधों में व्यार्पक असमार्नतार्एं थीं। नियोजक अपने आर्थिक, रार्जनैतिक और सार्मार्जिक प्रभुत्व क लार्भ उठार्कर औद्योगिक श्रमिकों क अनेक प्रकार से शोषण कियार् करते थे। नियोजकों के शोषण से मुक्ति पार्ने तथार् अपने हितों की रक्षार् के लिए श्रमिकों ने संगठित होनार् शुरू कियार्। लेकिन, रार्ज्य की ओर से उनक दमन होने लगार्। आपरार्धिक शड्यंत्र, व्यार्पार्र-अपरोध तथार् संविदार् भंग आदि आधार्रों पर संगठन यार् संघ बनार्ने वार्ले श्रमिकों पर मुकद्मार् चलार्यार् जार्तार् और उन्हें जुर्मार्ने और कारार्वार्स क दंड दियार् जार्तार्। जब लोक विधि के इन आरोपों से संबद्ध उपबंध श्रमिकों के संगठनों पर अंकुश डार्लने में अप्रभार्वी प्रतीत होने लगे, तब उन्हें स्पष्ट रूप से अवैध घोषित करने के लिए विशेष अधिनियम बनार्ए गए। इंगलैंड के केबिनेशन अधिनियम, 1799, 1800 इस तरह के दमनकारी श्रमसंघ अधिनियम के उदार्हरण है। बार्द में, श्रमिकों के अथक प्रयार्सों, समार्जवार्दी और सार्मूहिक सिद्धार्ंतों के प्रसार्र, प्रजार्तार्ंत्रिक संस्थार्ओं के उदय, श्रमिकों के प्रति रार्ज्य की प्रवृत्ति में परिवर्तन तथार् कर्इ अन्य कारणों से श्रमिकों के संगठनों पर लगार्ए गए विधिक प्रतिबंध हटार्ए जार्ने लगे और अंत में उन्हें विधिक मार्न्यतार् मिली।

विधिक मार्न्यतार् मिलते ही, श्रमसंघों की संख्यार् में अप्रत्यार्शित रूप से वृद्धि हुर्इ और आर्थिक, रार्जनीतिक तथार् सार्मार्जिक जीवन में उनक प्रभार्व बड़ी तेजी से बढ़ने लगार्। वे नियोजकों के सार्थ सौदेबार्जी करते, तथार् अपनी मार्ंगों और विवार्दों को लेकर हड़तार्ल तथार् अन्य प्रकार की औद्योगिक कार्रवार्इयार्ं करते। वे बरार्बरी के स्तर पर और अधिकारस्वरूप नियोजन की दशार्ओं में सुधार्र लार्ने और श्रमिकों के हितों की रक्षार् के लिए नियोजकों और सरकार पर दबार्व डार्लते। कहीं-कहीं श्रमसंघ इतने शक्तिशार्ली हो गए कि नियोजक ही उनसे परेषार्न होने लगे। हड़तार्ल, प्रदर्शन, धरनार्, घेरार्व आदि औद्योगिक कार्रवार्इयों से जनजीवन भी व्यार्पक रूप से प्रभार्वित होने लगार्। श्रमसंघों के बीच प्रतिद्धद्धितार् के कारण भी औद्योगिक संबंध बिगड़ने लगे।

श्रम-विधार्न के नियमन क सिद्धार्ंत मुख्यत: श्रमसंघों और नियोजकों के बीच के संबंधों में संतुलन लार्ने के प्रभुत्त पर जोर देतार् है। अगर नियोजक अधिक शक्तिशार्ली होते है।, नियोजन-विधार्न द्वार्रार् श्रमसंघों को विशेष अविष्कार दिये जार्ते हैं। जब श्रमसंघ अपनी बढ़ती हुर्इ शक्ति क दुरुपयोग कर नियोजकों, अपने सदस्यों यार् सरकार पर अनार्वश्यक रूप से दबार्व डार्लते है, तब उनके क्रियार्कलार्प पर अंकुश डार्लने के लिए भी विधार्न बनार्ए जार्ते है। दोनों के बीच विवार्दों को सुलझार्ने के लिए श्रम-विधार्न द्वार्रार् संबंधों की स्थार्पनार् भी की जार्ती है। श्रमसंघों और नियोजकों के बीच के संघर्षो से उत्पन्न औद्योगिक कार्रवार्इयों से समुदार्य के हितों की रक्षार् के लिए हड़तार्ल, तार्लार्बन्दी, धरनार् आदि पर प्रतिबंध लगार्ने के लिए भी कानून बनार्ए जार्ते हैं। श्रम-विधार्न द्वार्रार् सार्मूहिक सौदेबार्जी के विभिन्न पहलुओं को भी नियंत्रित कियार् जार्तार् है। इस तरह, नियार्मक श्रम-विधार्न के कुछ महत्वपूर्ण विषय है- श्रमिकों को संघ बनार्ने क अधिकार, श्रमसंघों के अधिकार और दार्यित्व, श्रमसंघों क पंजीकरण, औद्योगिक विवार्द सुलझार्ने के तरीके और संयंत्र, सार्मूहिक सौदेबार्जी, प्रबंध में श्रमिकों की भार्गीदार्री, परिवेदनार्-निवार्रण, हड़तार्ल, तार्लार्बन्दी तथार् अन्य औद्योगिक कार्रवार्इयार्ं, श्रमसंघों की मार्न्यतार्, प्रतिनिधि श्रमसंघ क चयन, अनुचित श्रम-व्यवहार्र आदि। सार्मार्न्यत: औद्योगिक संबंध पर बनार्ए गए विधार्न नियार्मक श्रम-विधार्न के अंतर्गत आते हैं। इस सिद्धार्ंत पर आधृत कुछ महत्त्वपूर्ण श्रम-अधिनियम हं-ै ग्रेट ब्रिटेन के श्रमसंघ अधिनियम, श्रमसंघ एवं श्रम-संबंध अधिनियम, 1974, औद्योगिक न्यार्यार्लय अधिनियम, 1919, औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1971, श्रमसंघ एवं श्रम-संबंध (समेकन) अधिनियम, 1992, संयुक्त रार्ज्य अमेरिक के रार्ष्ट्रीय श्रम-संबंध अधिनियम, 1935 और श्रम-प्रबंध संबंध अधिनियम, 1947, औद्योगिक विवार्द अधिनियम, 1947, औद्योगिक नियोजन (स्थार्यी आदेश) अधिनियम, 1946 तथार् रार्ज्यों के औद्योगिक संबंध और औद्योगिक विवार्दों से संबद्ध अधिनियम।

समार्ज के विभिन्न समूहों के बीच के संबंधों को विनियमित करने के लिए भी विधार्न बनार्ए जार्ते है।। इनमें प्रजार्ति-संबंधों, संप्रदार्य-संबंधों, अल्पसंख्यकों और बहुतसंख्यकों के बीच के संबंधों, सार्मार्जिक समार्नतार्, धर्मो और जार्तियों के बीच के संबंधों पर बनार्ए गए विधार्नों को सम्मिलित कियार् जार् सकतार् है।

4. कल्यार्ण क सिद्धार्ंत – वार्स्तव में, श्रम और सार्मार्जिक विधार्न के कल्यार्ण क सिद्धार्ंत संरक्षार् और सार्मार्जिक न्यार्य के सिद्धार्ंतों से जुड़ार् है। ‘कल्यार्ण’ शब्द क अर्थ व्यार्पक होतार् है और इसके अंतर्गत समार्ज के आम नार्गरिकों के भौतिक एवं अभौतिक उन्नयन के अतिरिक्त, विभिन्न समूहों यार् वर्गो के लिए विशेष सेवार्एं यार् सुविधार्एं भी सम्मिलित होती है। सार्थ ही, ‘कल्यार्ण’ के अंतर्गत समार्ज के दुर्बल समूहों के हितों को रक्षार् तथार् विभिन्न समूहों के बीच भेदभार्व के उन्मूलन को भी सम्मिलित कियार् जार्तार् है। श्रम एवं सार्मार्जिक विधार्न के सिद्धार्ंतों के विशेष परिवेष में कल्यार्ण क सिद्धार्ंत समार्ज के विशेष समूहों एवं आम नार्गरिकों के हितों के विकास के लिए अतिरिक्त सुविधार्एं प्रदार्न करने पर जोर देतार् है। कर्इ श्रम एवं सार्मार्जिक विधार्नों में सार्मार्जिक न्यार्य और संरक्षार् के प्रार्वधार्न के अतिरिक्त कल्यार्णकारी सुविधार्एं प्रदार्न करने से संवार्द अलग से विशेष उपबंध रखे गए है। विश्व के कर्इ देशों में श्रमिकों और उनके परिवार्र के सदस्यों को आवार्सीय, चिकित्सीय, मनोरंजनार्त्मक, शैक्षिक तथार् सार्ंस्कृतिक सुविधार्एं प्रदार्न करने के उद्देश्य से ‘कल्यार्ण-निधि’ विधार्न बनार्ए गए है। इसी प्रकार, समार्ज के कुछ अल्पसुविधार् प्रार्प्त समूहों, जैसे बार्लकों, महिलार्ओं प्रवार्सी श्रमिकों आदि को अतिरिक्त सुविधार्एं प्रदार्न करने के उद्देश्य से भी विधार्न बनार्ए गए है। कही-कहीं आवार्सीय, चिकित्सकीय एवं शैक्षिक सुविधार्ओं से संबद्ध सार्मार्न्य विधार्न भी बनार्ए गए हैं।

‘कल्यार्ण’ के सिद्धार्ंत को ध्यार्न में रखकर बनार्ए गए कुछ श्रम एवं सार्मार्जिक विधार्न के उदार्हरण हैं – संरक्षार्त्मक अधिनियमों में कल्यार्ण-संबंधों उपबंध, कोयलार् खार्न श्रम-कल्यार्ण निधि अधिनियम, 1947, अभ्रक खार्न श्रम-कल्यार्ण निधि अधिनियम, 1946, लौह अयस्क, मैंगनीज अयस्क, चूनार्-पत्थर, डोलोमार्इट, क्रोम अयस्क, बीड़ी कर्मकार, असम चार्य-बार्गार्न तथार् रार्ज्य सरकारों के श्रम-कल्यार्ण निधि अधिनियम, रार्ज्य सरकारों के आवार्सीय बोर्ड अधिनियम, बार्लक अधिनियम, विवार्ह में संबद्ध कानून, जैसे हिन्दू विवार्ह अधिनियम, 1955, विशेष निवार्ह अधिनियम, 1954, अंतरार्ज्यीय प्रवार्सी कर्मकार अधिनियम, 1979 तथार् दहेज अधिनियम, 1961।

कुछ संरक्षार्त्मक श्रम-अधिनियमों, जेसे- कारखार्नार् अधिनियम, खार्न अधिनियम, बार्गार्न श्रमिक अधिनियम के अधीन श्रमिकों के लिए कर्इ तरह की कल्यार्णकारी सुविधार्एं उपलब्ध करार्नार् अनिवाय है। इन सुविधार्ओं में कैंटीन, विश्रार्म-कक्ष, शिशु-कक्ष, नहार्ने धोने की सुविधार्, प्रार्थमिक उपचार्र सार्धन तथार् एंबुलेंस कमरार् की व्यवस्थार् तथार् कल्यार्ण अधिकारी की नियुक्ति क विशेष रूप से उल्लेख कियार् जार् सकतार् है।

5. सार्मार्जिक सुरक्षार् क सिद्धार्ंत – व्यार्पक अर्थो में सार्मार्जिक सुरक्षार् समार्ज कल्यार्ण क ही एक अंग है, लेकिन विगत वर्षो में सार्मार्जिक सुरक्षार्-विधार्न के बढ़ते हुए महत्व के कारण इसे अलग श्रेणी में रखनार् उपयुक्त प्रतीत होतार् है। औद्योगिक समार्ज में दुर्घटनार्, बीमार्री, वृद्धार्वस्थार्, आशक्ततार्, बेरोजगार्री, प्रसूति, अर्जक की मृत्यु आदि आकस्मिकतार्ओं की स्थिति में अर्जकों यार् उनके परिवार्र के सदस्यों को अनेक प्रकार की आर्थिक कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। मजदूरी-अर्जकों के स्थार्यी वर्ग में आने वार्ले व्यक्तियों की संख्यार् में अप्रत्यार्शित रूप से वृद्धि होने के कारण उपर्युक्त आकस्मिकतार्ओं से उत्पन्न खतरे और भी जटिल हो गए हैं; क्योंकि ऐसे व्यक्तियों को जीवनयार्पन के लिए केवल मजदूरी पर ही आश्रित रहनार् पड़तार् है। जीवन के इन खतरों के प्रति आर्थिक सुरक्षार् की व्यवस्थार् करनार् ही सार्मार्जिक सुरक्षार् है। सार्मार्जिक सुरक्षार् के दो मुख्य आधार्रस्तंभ होते हैं – (क) सार्मार्जिक बीमार् और (ख) सार्मार्जिक सहार्यतार्। सार्मार्जिक बीमार् में हितार्धिकारियों को हितलार्भ के लिए सार्मार्न्यत: अंशदार्न देनार् पड़तार् है। हितलार्भ के लिए रार्शि बीमित व्यक्तियों और नियोजकों तथार् सरकार के अनुदार्न से आती है। योग्यतार् की शर्ते पूरी करने पर हितार्धिकारियों को हितलार्भ अधिकारस्वरूप मिलते है और उनमें निरंतरतार् कायम रहती है। सार्मार्जिक सहार्यतार् में सरकार यार् अन्य अभिकरणों द्वार्रार् जरूरतमंद व्यक्तियों को बिनार् किसी अंशदार्न की शर्त पर सहार्यतार् दी जार्ती है। सार्मार्जिक सुरक्षार्-विधार्न में सार्मार्जिक बीमार् और सार्मार्जिक सहार्यतार् दोनों प्रकार के विधार्न सम्मिलित होते हैं।

प्रार्रम्भ में सार्मार्जिक सुरक्षार्-विधार्न मुख्यत: औद्योगिक श्रमिकों के लिए बनार्ए गए, लेकिन बार्द में सार्मार्न्य नार्गरिकों के लार्भ के लिए भी ऐसे विधार्न बनार्ए गए। धनी संपन्न देशों में सार्मार्जिक सुरक्षार् विधार्न विकसित अवस्थार् में है। निर्धन देशों में सार्मार्जिक सुरक्षार् की आवश्यकतार् अधिक होती है, लेकिन वे इसकी संतोषजनक रूप से व्यवस्थार् करने में असमर्थ होते है।। सार्मार्जिक सरु क्षार्-विधार्न के अंतर्गत आने वार्ले कुछ महत्वपूर्ण विषय है – दुर्घटनार्ओं की स्थिति में क्षतिपूर्ति, प्रसूति के लार्भ, अशक्ततार्-हितलार्भ, अनियोजन हितलार्भ, उत्तरजीवी यार् आश्रित हितलार्भ बर्धक्य पेंशन, भविष्य निधि, परिवार्र भत्तार् तथार् उपदार्न।

सार्मार्जिक सुरक्षार् के सिद्धार्ंत को ध्यार्न में रखकर बनार्ए गए कुछ महत्त्वपूर्ण विधार्नों के उदार्हरण है- भार्रत में कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923, प्रसूति हितलार्भ अधिनियम, 1961, कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् अधिनियम, 1948 कोयलार्-खार्न भविष्य-निधि तथार् प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1948, कर्मचार्री भविष्य निधि तथार् प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952, तथार् उपदार्न संदार्य अधिनियम, 1972, गेट्र ब्रिटेन में रार्ष्ट्रीय बीमार् अधिनियम, रार्ष्ट्रीय बीमार् (औद्योगिक दुर्घटनार्) अधिनियम तथार् रार्ष्ट्रीय स्वार्स्थ्य बीमार् अधिनियम और संयुक्त रार्ज्य अमेरिक क वृद्धार्वस्थार्, उत्तरजीवी, असमर्थतार् तथार् स्वार्स्थ्य बीमार् अधिनियम।

6. निवार्रण क सिद्धार्ंत – समार्ज में होने वार्ले परिवर्तन और विकास के सार्थ-सार्थ मूल्य-प्रणार्लियों, प्रथार्ओं, रीति-रिवार्जों, सार्मार्जिक संस्थार्ओं और सार्मार्जिक समूहों के पार्रस्परिक संबंधों में परिवर्तन होते रहते हैं। परिवर्तन और विकास की इस प्रक्रियार् में कुछ प्रथार्एं सार्मार्जिक प्रगति एवं मार्नवीय हितों के विकास में बार्धक हो जार्ती है। इनमें कर्इ समार्ज के कुछ समूहों के शोषण को प्रोत्सार्हित करती है, जिनके फलस्वरूप अनेक लोगों के जीवन दयनीय हो जार्ते हैं। इन कुप्रथार्ओं में सती-प्रथार्, शिशु-हत्यार्, बार्लविवार्ह, दहेज-प्रथार्, अस्पृष्यतार्, वेष्यार्वृित्त्, भिक्षार्वृत्ति, दार्स, कृषि दार्स, बलार्त एवं बंधुआ श्रम प्रथार्ओं, बहुविवार्ह, मद्यपार्न आदि क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है। इन सार्मार्जिक कुप्रथार्ओं को रोकने के उद्देश्य से भी समय-समय विधार्न बनार्ए गए हैं। भार्रतीय संविधार्न में बलार्त श्रम, मनुष्यों के क्रय-विक्रय, मध्यपार्न, अस्पृष्यतार्, मनुष्यों में अनैतिक व्यार्पार्र आदि कुप्रथार्ओं को रोकने से संबद्ध महत्त्वपूर्ण उपबंध है। सार्मार्जिक कुप्रथार्ओं को रोकने के लिए कुछ अधिनियम हैं – बंगार्ल (1829), मद्रार्स (1830) और बंबर्इ (1830) के सती विनियम, बार्लक-विवार्ह अवरोध अधिनियम, 1929, अस्पृष्यतार् विधार्न सम्बन्धी नार्गरिक अधिकार संरक्षार् अधिनियम, 1856, अनैतिक (निवार्रण) अधिनियम, 1956 रार्ज्य संरक्षकों के भिक्षार्वृत्ति निरार्य नशार्बंदी से संबद्ध अधिनियम दहेज प्रतिशेध अधिनियम, 1961, सती-कृत्य (निवार्रण) अधिनियम, 1987 और महिलार् अषिश्ट व्यपदेशन (प्रतिशेध) अधिनियम, 1986।

7. आर्थिक विकास क सिद्धार्ंत – किसी भी देश में अनसमुदार्य की सुख-समृद्धि वहार्ं के आर्थिक विकास की अवस्थार् पर निर्भर करती है। जहार्ं कुल और प्रतिव्यक्ति रार्ष्ट्रीय आय अधिक वहार्ं लोगों क रहन-सहन भी उंचे स्तर क होतार् है। विश्व के सभी देशों में आर्थिक विकास के लिए रार्ज्य की ओर कदम उठार्ए गए है। इनमें कर्इ ने योजनार्बद्ध आर्थिक विकास के कार्यक्रम अपनार्एं है। आर्थिक विकास के विभिन्न क्रमों में उद्योग, कृषि, परिवहन एंव संचार्र खनिज शक्ति के सार्धन, सिंचाइ, वन्य संपदार्, वार्णिज्य-व्यार्पार्र, नवीय संसार्धनों और सेवार्ओं के विकास, जनसंख्यार् की वृद्धि पर अंकुष और उत्पार्दन और उत्पार्दकतार् में वृद्धि तथार् आय के वितरण सम्मिलित होते हैं।

श्रम और सार्मार्जिक विधार्न के मार्ध्यम से आर्थिक विकास की गति तेज की जार् सकती है। इससे सार्धनों के अनुचित बंटवार्रे में भी सहार्यतार् मिलती है। श्रम-विधार्नों द्वार्रार् कार्य की भौतिक दशार्ओं में सुधार्र लार्कर उत्पार्दकतार् बढ़ाइ जार् सकती है। इसी तरह समुचित कार्य के घंटे, कल्यार्णकारी सुविधार्ओं, स्वार्स्थ्यप्रद पर्यार्वरण एवं उचित मजदूरी की व्यवस्थार् से लोगों की कार्यक्षमतार् बढ़ाइ जार् सकती है और आर्थिक प्रगति की गति तेज की जार् सकती है। सार्मार्जिक शोषण की रोकथार्म, समार्ज के दुर्बल समूहों की रक्षार्, सार्मार्जिक समार्नतार् की स्थार्पनार्, हड़तार्ल, तार्लार्बंदी तथार् अन्य प्रकार की औद्योगिक कार्रवार्इयों पर रोक, सार्मार्जिक सुरक्षार् की व्यवस्थार्, श्रम-प्रबंध-सहयोग को प्रोत्सार्हन तथार् औद्योगिक विवार्दों को सुलझार्ने के लिए संयंत्र की व्यवस्थार् क उत्पार्दन, उत्पार्दकतार् और आर्थिक विकास पर प्रत्यक्ष यार् परोक्ष प्रभार्व पड़तार् है। विधार्न द्वार्रार् मजदूरी की मार्त्रार्, मजदूरी में अंतर, उत्पार्दन से जुड़ार् बोनस, भविष्य-निधि, कल्यार्ण-निधि, मजदूरी के भुगतार्न, महंगाइ-भत्ते की मार्त्रार् तथार् अन्य भत्तों क नियमन कर रार्ष्ट्रीय आय के वितरण, उत्पार्दन तथार् लोगों के जीवन सतर में सुधार्र लार्यार् जार् सकतार् है। श्रम विधार्नों के मार्ध्यम से बचत और निवेश की भी प्रोत्सार्हित कियार् जार् सकतार् है, जिससे बेरोजगार्री की समस्यार् के समार्धार्न में मदद मिलेगी। जनसंख्यार् के नियंत्रण-संबंधी सार्मार्जिक विधार्न क आर्थिक विकास से गहरार् संबंध होतार् है। भिक्षार्वृत्ति, विवार्ह, सार्मार्जिक कुरीतियों, नशार्बंदी, सार्मार्जिक शोषण से संबद्ध सार्मार्जिक विधार्नों क भी आर्थिक समृद्धि पर प्रभार्व पड़तार् रहतार् है।

उपर्युक्त कारणों से कर्इ देशों में आर्थिक विकास की नीति और कार्यक्रम बनार्ते समय श्रम और सार्मार्जिक विधार्नों की भूमिक पर भी गंभीरतार् से विचार्र कियार् जार्तार् है। कुछ देशों में श्रम-विधार्न तो आर्थिक विकास के कार्यक्रम के आवश्यक अंग होते है।। मजदूरी, बोनस, औद्योगिक संबंध और सार्मार्जिक सुरक्षार् से सुबद्ध विधार्न आज विभिन्न देशों की रार्ष्ट्रीय आर्थिक नीतियों और विकास कार्यक्रमों से गहराइ से जुड़े होते हैं। जिन देशों में जनसंख्यार् क एक बड़ार् भार्ग श्रमिकों क बनार् होतार् है, उनमें आर्थिक विकास के लिए श्रम एवं सार्मार्जिक विधार्न क महत्व और भी अधिक होतार् है।

8. अंतरार्ष्ट्रीय दार्यित्व क सिद्धार्ंत – कर्इ श्रम और सार्मार्जिक विधार्न अंतरार्ष्ट्रीय दार्यित्वों को निवार्हने के लिए भी बनार्एं जार्ते हैं। विश्व के विभिन्न देश प्रथम विश्वयुद्ध के बार्द बने रार्ष्ट्रसंघ और द्वितीय विश्वयुद्ध के बार्द बने संयुक्त रार्ष्ट्र संघ के सदस्य रहे हैं। वे इन संगठनों के विशिष्ट अभिकरणों, जैसे – अंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन, संयुक्त रार्ष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञार्निक और सार्ंस्कृतिक संगठन, संयुक्त रार्ष्ट्र बार्ल कोष, विश्व स्वार्स्थ्य संगठन तथार् अन्य अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों के भी सदस्य है यार् उनके क्रियार्कलार्प में सक्रिय रूप से भार्ग लेते रहे है।। इन अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों के सदस्य होने के नार्ते सदस्य-देशों क यह कर्त्तव्य होतार् है कि वे इनके द्वार्रार् पार्रित किए गए प्रस्तार्वों एवं निर्णयों क सम्मार्न करें। श्रम एवं सार्मार्जिक दशार्ओं के क्षेत्र में अनेक अंतरार्ष्ट्रीय प्रस्तार्व पार्रित किए गए है।, जिनके उपबंधों को लार्गू करने के लिए विभिन्न देशों में कानून बनार्ए गए हैं।

श्रम एवं सार्मार्जिक क्षेत्रों में अंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन द्वार्रार् पार्रित किए गए प्रस्तार्वों की भूमिक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण रही है। संयुक्त रार्ष्ट्र के सभी सदस्य अंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन के भी सदस्य होते हैं। इस संगठन के तीन अवयव होते हैं। ये है – अंतरार्ष्ट्रीय श्रम सम्मेलन, शार्स्ी निकाय तथार् अंतरार्ष्ट्रीय श्रम कार्यार्लय अंतरार्ष्ट्रीय श्रम सम्मेलन की बैठक वर्ष में एक बार्र होती है। इस सम्मेलन में प्रत्येक सदस्य रार्ज्य चार्र प्रतिनिधि भेजतार् है, जिनमें दो सरकार के, एक श्रमिकों के और एक नियोजकों के प्रतिनिधि होते हैं। अंतरार्ष्ट्रीय श्रम सम्मेलन क एक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण कार्य श्रम एवं सार्मार्जिक विषयों पर प्रस्तार्व पार्रित करनार् है। इनमें कुछ प्रस्तार्व अभिसमयों तथार् कुछ सिफार्रिशों क रूप लेते हैं। दोनों के पार्रित होने के लिए सम्मेलन की कम-से-कम दो-तिहाइ सदस्यों की उपस्थिति और दो-तिहाइ क बहुमत आवश्यक होतार् है। सम्मेलन ही निर्णय करतार् है कि कौन सार् प्रस्तार्व अभिसमय क रूप लेगार् और कौन सार् सिफार्रिश का। अगर कोर्इ प्रस्तार्व अभिसमय क रूप लेतार् है, तो उसे अनुसमर्थन के लिए सदस्य रार्ज्यों की सरकारों के पार्स भेजार् जार्तार् है। सदस्य रार्ज्य किसी अभिसमय को अनुर्धित करने यार् नही करने के लिए स्वतंत्र है। अगर कोर्इ रार्ज्य किसी अभिसमय को अनुसमर्थित करने क निर्णय लेतार् है, तो उसक कर्त्तव्य होतार् है कि वह श्रम-विधार्न बनार्कर यार् अन्य तरीके से उसे लार्गू करे। अगर वह किसी अभिसमय क अनुसमर्थन नहीं करने क निर्णय करतार् है, तो उसक कर्त्तव्य होतार् है कि अंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन को अनुसमर्थित नहीं करने के कारणों को भेजे। सिफार्रिशों के सार्थ अनुसमर्थित करने यार् नहीं करने क प्रश्न नहीं उठतार्। उन्हें सदस्य-रार्ज्यों की सरकारों के पार्स इस अनुरोध के सार्थ भेजार् जार्तार् है कि श्रम और सार्मार्जिक नीति संबंधी निर्णय करते समय यार् कार्यक्रम चलार्ते समय सिफार्रिशों के उपबंधों को लार्गू करने क प्रयार्स करें।

अभिसमयों और सिफार्रिशों के कुछ महत्त्वपूर्ण विषय रहे हैं – कार्य की दशार्एं, कार्य के घंटे, सार्प्तार्हिक अवकाश, संवेतन छुट्टी, बार्लकों और अल्पवयों क नियोजन, स्त्रियों क नियोजन, औद्योगिक स्वार्स्थ्य, सुरक्षार् और कल्यार्ण, सार्मार्जिक सुरक्षार्, औद्योगिक संबंध, नियोजन एवं अनियोजन आदि। अवतक अंतरार्ष्ट्रीय श्रम सम्मेलन द्वार्रार् 185 अभिसमय पार्रित किए जार् चुके हैं। अलग-अलग सदस्य रार्ज्यों ने अलग-अलग अभिसमयों को अनुसमर्थित कर श्रम विधार्न बनार्ए है। कुछ देशों ने बड़ी संख्यार् में अभिसमयों की अनुसमर्थित कियार् है, तो कुछ देशों ने कम संख्यार् में भार्रत ने अब तक 39 अभिसमयों को अनुसमर्थित कियार् है। इन अमिसमयों को लार्गू करने क सबसे महत्वपूर्ण तरीक श्रम और सार्मार्जिक विधार्न बनार्नार् रहार् है। इस तरह, विश्व के विभिन्न देशों ने अंतरार्ष्ट्रीय श्रम-संगठन के प्रति अपने दार्यित्व निवार्हने के उद्देश्य से कर्इ श्रम और सार्मार्जिक विज्ञार्न बनार्एं है। कुछ सार्मार्जिक विधार्नों के पीछे अन्य अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों के प्रस्तार्वों क भी हार्थ रहार् है। महिलार्ओं के अधिकारों, वेष्यार्वृत्ति उन्मूलन, नार्गरिक अधिकारों, प्रजार्तीय भेदभार्व की रोकथार्म, बार्लक-विकास, बार्ल-अपरार्ध, सावजनिक स्वार्स्थ्य, अशिक्षार् एवं निरक्षरतार् आदि क्षेत्रों में अंतरार्ष्ट्रीय प्रस्तार्व पार्रित किए गए है। कर्इ देशों ने इन प्रस्तार्वों को लार्गू करने के लिए भी विधार्न बनार्ए हैं।

Share:

Leave a Comment

Your email address will not be published.

TOP