श्रम की अवधार्रणार् एवं विशेषतार्एं

उद्योग एवं श्रम परस्पर सम्बन्धित हैं। बिनार् श्रम के उद्योग की कल्पनार् नहीं की जार् सकती। यह श्रम शार्रीरिक एवं मार्नसिक दोनों तरह क होतार् थार्। पहले उद्योग में शार्रीरिक श्रम को महत्तार् प्रार्प्त थी, परन्तु अब अत्यधिक विकसित प्रौदयोगिकी के कारण मार्नसिक श्रम ने अत्यधिक महत्व प्रार्प्त कियार् है। यद्यपि शार्रीरिक श्रम अभी भी पूर्णतयार् महत्वहीन नहीं हो गयार् है। इस प्रकार बिनार् श्रम के पूँजी एवं उदयोग के लिए आवश्यक अन्य तत्व अस्तित्वविहीन हो जार्तार् है। इस प्रकार उद्योग के लिए श्रम एक आवश्यक तत्व है जिससे सम्बन्धित अनेक समस्यार्एँ समय-समय पर पैदार् होती रहती हैं।

श्रम की अवधार्रणार् एवं विशेषतार्एं

‘श्रम मार्नवीय प्रयार्सों से सम्बन्धित है। ये प्रयार्स शार्रीरिक और मार्नसिक दोनोंं प्रकार के हो सकते हैं। इन प्रयार्सों क उद्देश्य शार्रीरिक यार् मार्नसिक लार्भ प्रार्प्त करनार् होतार् है। यह लार्भ अप्रत्यक्ष यार् प्रत्यक्ष, पूर्णत: यार् आंशिक रूप से किसी भी रूप में हो सकतार् है।’

  1. थार्मस – ‘‘श्रम से शरीर व मस्तिष्क के उन समस्त मार्नवीय प्रयार्सों क बोध होतार् है, जो पार्रिश्रमिक पार्ने की आशार् से किए जार्एँ।’’ 
  2. जेवन्स – ‘‘श्रम मस्तिष्क अथवार् शरीर क वह प्रयार्स है, जो उस कार्य से प्रार्प्त होने वार्ले प्रत्यक्ष सुख के अतिरिक्त पूर्णत: यार् अंशत: किसी लार्भ के लिए कियार् जार्ये।’’

    श्रम की विशेषतार्एँ 

    1. श्रम क तार्त्पर्य मार्नवीय प्रयार्सों से है। ये मार्नवीय प्रयार्स दो भार्गों में विभार्जित हो सकते हैं –
      1. शार्रीरिक, और 
      2. मार्नसिक 
    2. श्रम क श्रमिक से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन्हें प्रथक नहीं कियार् जार् सकतार्। इस प्रकार श्रम और श्रमिक एक ही सिक्के के दो पहलू है। 
    3. श्रम बेचार् जार् सकतार् है। किन्तु इसक तार्त्पर्य यह कदार्पि नही है कि श्रमिक अपने गुणों को बेचतार् है, वह तो सिर्फ अपने श्रम को ही बेचतार् है। 
    4. श्रम नार्शवार्न है। इसे संचित करके नहीं रखार् जार् सकतार्। इसक कारण यह है कि बीतार् हुआ दिन वार्पस नहीं आतार्। 
    5. श्रम में गतिशीलतार् क तत्व भी पार्यार् जार्तार् है। इसक तार्त्पर्य यह है कि श्रम क एक स्थार्न से दूसरे स्थार्न को हस्तार्न्तरण कियार् जार् सकतार् है। यह कोर्इ स्थिर तत्व नही है। 
    6. श्रम उत्पत्ति क आधार्र है। श्रम के अभार्व में उत्पत्ति की कल्पनार् नहीं की जार् सकती। 
    7. श्रम की कार्यकुशलतार् में वृद्धि की जार् सकती है। 
    8. श्रम में सौदार् करने की शक्ति अत्यन्त न्यूनमार्त्रार् में होती है। श्रमिकों की सौदार् करने की दुर्बल शक्ति के निम्न कारण हैं –
      1. श्रम नश्वर होने के कारण श्रमिक इसक संचय न करके तुरन्त बेचतार् है। 
      2. श्रमिकों में व्यार्प्त निर्धनतार् और दरिद्रतार्। 
      3. श्रमिकों की अज्ञार्नतार्, अशिक्षार् और अनुभवहीनतार्। 
      4. श्रम संगठनों क अभार्व और इनकी शिथिलतार्। 
      5. बेरोजगार्री।
    9. श्रमिकों की कार्यकुशलतार् एक ही प्रकार की न होकर इसमें भिन्नतार् होती है। 
    10. श्रमिक उत्पार्दन क सार्धन ही नही है अपितु सार्ध्य भी है। श्रमिक केवल उत्पार्दन ही नही करतार्, अपितु उपभोग में भी हिस्सार् बँटार्तार् है। 

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