श्रम कल्यार्ण के सिद्धार्न्त एवं प्रशार्सन

कोर्इ भी श्रम कल्यार्ण सम्बन्धी योजनार् अथवार् कार्यक्रम तब तक प्रभार्वपूर्ण रूप से नही बनार्यार् जार् सकतार् जब तक कि समार्ज के नीति निर्धार्रक श्रम कल्यार्ण की आवश्यकतार् को स्वीकार करते हुये इसके सम्बन्ध में उपयुक्त नीति बनार्ते हुए अपने इरार्दे की स्पष्ट घोषणार् न करें और इसे कार्यार्न्वित करार्ने की दृष्टि से रार्ज्य क समुचित संरक्षण प्रदार्न करने हेतु उपयुक्त इसे वैधार्निक स्वरूप प्रदार्न न करें।

श्रम कल्यार्ण के सिद्धार्न्त 

सिद्धार्न्त शब्द क प्रयोग यहार्ं पर उन सार्मार्न्यीकरण को सम्बोधित करने के लिए कियार् जार् रहार् है जो श्रम कल्यार्ण के क्षेत्र से सम्बन्धित व्यक्तियों के अनुभवों पर आधार्रित है। और श्रम कल्यार्ण नीतियों के निर्धार्रण, योजनार्ओं के निर्मार्ण, कार्यक्रमों के आयोजन तथार् सेवार्ओं के प्रार्वधार्न को अधिक प्रभार्वपूर्ण बनार्ने में सहार्यक सिद्ध हो सकते हैं। ये कुछ सिद्धार्न्त इस प्रकार है :

1. श्रम कल्यार्ण की आवश्यकतार् की स्वीकृति  

कोर्इ भी श्रम कल्यार्ण सम्बन्धी योजनार् अथवार् कार्यक्रम तब तक प्रभार्वपूर्ण रूप से नही बनार्यार् जार् सकतार् जब तक कि समार्ज के नीति निर्धार्रक श्रम कल्यार्ण की आवश्यकतार् को स्वीकार करते हुये इसके सम्बन्ध में उपयुक्त नीति बनार्ते हुए अपने इरार्दे की स्पष्ट घोषणार् न करें और इसे कार्यार्न्वित करार्ने की दृष्टि से रार्ज्य क समुचित संरक्षण प्रदार्न करने हेतु उपयुक्त इसे वैधार्निक स्वरूप प्रदार्न न करें। नीति निर्धार्रकों द्वार्रार् ‘श्रमेव जयते’ को स्वीकार करते हुये श्रम को व्यक्ति एवं समार्ज के विकास के लिये आवश्यक मार्नते हुये श्रम कल्यार्ण को सार्मार्जिक नीति क एक अभिन्न अंग स्वीकार करनार् चार्हिये और श्रमिकों की कल्यार्ण सम्बन्धी योजनार्ओं एवं कार्यक्रमों को रार्ज्य क संरक्षण प्रदार्न करने हेतु आवश्यक श्रम सम्बन्धी विधार्न बनने चार्हिये।

2. श्रमिक, उनके विचार्र, उद्योग तथार् समार्ज की अन्योन्यार्श्रयितार् – 

श्रम कल्यार्ण के महत्व को सही अर्थ में तभी स्वीकार कियार् जार् सकतार् है जबकि इस बार्त पर सहमति व्यक्त की जार्य कि श्रमिक, उनसे परिवार्र, उद्योग तथार् समार्ज एक दूसरे पर निर्भर है। और वे एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते है।। जिस प्रकार समार्ज के विघटित होने क प्रतिकूल प्रभार्व उद्योग पर, उद्योग के ठीक से न चलने क प्रतिकूल प्रभार्व श्रमिक पर और श्रमिक के विघटित होने क प्रतिकूल प्रभार्व परिवार्र पर पड़तार् है उसी प्रकार श्रमिक के व्यक्तित्व सम्बन्धी संगठन के उचित न होने तथार् उसके द्वार्रार् अपने दार्यित्वों क निर्वार्ह न किये जार्ने पर उद्योग, उनके परिवार्र और समार्ज पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है। धनार्त्मक रूप में एक सुसंगठित समार्ज उद्योग को, उद्योग श्रमिकों को तथार् श्रमिक परिवार्र को उपयुक्त रूप से चलार्ने में सहार्यक सिद्ध होतार् है तथार् एक अच्छे व्यक्तित्व सम्बन्धी संगठन वार्लार् श्रमिक अपने उद्योग, परिवार्र तथार् समार्ज को अच्छी प्रकार चलार्ने में अपनार् योगदार्न देतार् है।

3. अनुभूत आवश्यकतार्ओं क सिद्धार्न्त – 

कोर्इ भी श्रम कल्यार्ण कार्यक्रम तब तक सफल नहीं हो सकतार् जब तक कि वह श्रमिकों की उन अनुभूत आवश्यकतार्ओं पर आधार्रित न हो जिनके लिये वार्स्तव में वह आयोजित कियार् जार्तार् है। श्रमिकों की वार्स्तविक आवश्यकतार्ओं को जार्नने के लिये उनसे सम्पर्क स्थार्पित करते हुये, विचार्र-विमर्ष और पर्यवेक्षण क आश्रय लेते हुये उनकी अनुभूत आवश्यकतार्ओं की जार्नकारी प्रार्प्त की जार् सकती है। श्रमिकों की अनुभूत आवश्यकतार्ओं के अन्तर्गत उनके परिवार्र के सदस्यों, विशेष रूप से आश्रित सदस्यों की अनुभूत आवश्यकतार्यें भी सम्मिलित हैं।

4. अनुभूत आवश्यकतार्ओं में प्रार्थमिकतार् क सिद्धार्न्त – 

श्रमिकों एवं उनके परिवार्र के सदस्यों की अनुभूत आवश्यकतार्यें अनेक प्रकार की होती हैं। इनमें से कुछ अल्पकालीन तथार् कुछ दीर्घकालीन होती है।, इनमें से कुछ आर्थिक, कुछ मनोवैज्ञार्निक, कुछ सार्मार्जिक होती है, इनमें से कुछ स्वयं श्रमिकों के मत में अन्य की तुलनार् में अधिक अनिवाय होती है। चूँकि इन सभी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति एक सार्थ सम्भव नहीं है इसलिये इन आवश्यकतार्ओं में प्रार्थमिकतार् स्थार्पित की जार्नी चार्हिये और उन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति क प्रयार्स पहले कियार् जार्नार् चार्हिये जिन्हें स्वयं श्रमिक तथार् उनके परिवार्र के सदस्य सार्पेक्षत: अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं।

5. श्रमिकों के लचीले प्रकार्यार्त्मक संगठन के विकास क सिद्धार्न्त –

 जीवन के किसी भी क्षेत्र में आवश्यकतार्ओं को पूर्ति के लिये कोर्इ-न-कोर्इ योजनार् एवं कार्यक्रम बनार्नार् ही पड़तार् है। अनवरन् रूप से योजनार्बद्ध ढंग से कार्यक्रम बनार्ये जार्ते रहें और उन्हें सुचार्रू रूप से आयोजित कियार् जार्तार् रहे इसके लिये यह आवश्यक है कि श्रमिकों के संगठन क निर्मार्ण कियार् जार्य जिसमें विभिन्न प्रकार के श्रमिकों की अभिरूचियों क प्रतिनिधित्व करने वार्ले लोग रखे जार्यें। इन प्रतिनिधियों क चयन यथार्सम्भव मतैक्य के आधार्र पर कियार् जार्नार् चार्हिए किन्तु जहार्ँ मतैक्य सम्भव न हो वहार्ँ चयन बहुसंख्यक मत के आधार्र पर कियार् जार्नार् चार्हिए। इस संगठन के अन्तर्गत् श्रमिकों, उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित सरकारी विभार्गों तथार् लोकोपकारी एवं स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित कियार् जार्नार् चार्हिये।

6. श्रमिकों के सक्रिय सम्मिलन क सिद्धार्न्त – 

श्रमिकों के हितों क संरक्षण एवं सम्बर्द्धन करने के लिये आयोजित किये जार्ने वार्ले श्रम कल्यार्ण कार्यक्रमों के सार्थ श्रमिकों में अपनत्व एवं लगार्व की भार्वनार् तब तक विकसित नहीं की जार् सकती जब तक कि उन्हें इन कार्यक्रमों के आयोजनों में सक्रिय रूप से सम्मिलित न कियार् जार्य। ‘श्रमिकों के लिये’ कार्य करने के बजार्य ‘श्रमिकों के सार्थ’ कार्य करनार् अधिक उपयुक्त है और इसलिये यह आवश्यक है कि श्रम कल्यार्ण के नीति निर्धार्रण से लेकर कार्यक्रमों के आयोजन और मूल्यार्ंकन तक के प्रत्येक स्तर पर श्रमिकों को निर्णय लेने एवं उनके द्वार्रार् उपयुक्त समझे गये तरीकों क प्रयोग करते हुये कार्य करने के अवसर सुनिश्चित किये जार्ने चार्हिये।

7. प्रभार्वपूर्ण कार्यक्रम के निर्मार्ण क सिद्धार्न्त – 

प्रार्थमिकतार् के आधार्र पर निश्चित की गयी अनुभूत आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिये आयोजित किये जार्ने वार्ले श्रम कल्यार्ण कार्यक्रमों की रूपरेखार् इस प्रकार तैयार्र की जार्नी चार्हिये कि वे सभी प्रकार के श्रमिकों की व्यक्त एवं सन्निहित, अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन अभिरूचियों की सन्तुष्टि में सहार्यक सिद्ध हो सके। कुछ कार्यक्रम ऐसे होने चार्हिये जिनके परिणार्म प्रत्यक्ष रूप से इनके आयोजन के सार्थ ही सार्थ दिखाइ देने लगें तथार् कुछ कार्यक्रम ऐसे होने चार्हिये जिनके परिणार्म दीर्घकालीन योजनार् क अनुसरण करते हुये सार्पेक्षत: अधिक लम्बे समय के उपरार्न्त परिलक्षित हो सकें।

8. सार्मुदार्यिक संसार्धनों के अधिकतम सुदपयोग क सिद्धार्न्त – 

श्रम कल्यार्ण कार्यक्रमों के लिये संसार्धन आवश्यक होते हैं। सार्मार्न्यत: ये संसार्धन मार्लिकों द्वार्रार् प्रदार्न किये जार्ते है। क्योंकि यह मार्नार् जार्तार् ह ै कि श्रमिक द्वार्रार् किये गये काम से होने वार्ले लार्भों क सबसे बड़ार् हिस्सार् मार्लिक ही लेतार् है। ऐसी उत्पार्दन की व्यवस्थार् में जिसमें श्रमिकों की सहभार्गितार् को प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित किये जार्ने क प्रार्वधार्न हो तथार् जिसमें उद्योग को होने वार्ले लार्भों में श्रमिकों की उत्पार्दकतार् पर आधार्रित लार्भार्ंष प्रार्प्त करने क कानूनी प्रार्वधार्न हो, केवल यह स्वीकार करनार् कि श्रम कल्यार्ण के लिये अपेक्षित सार्धन जुटार्नार् मार्लिकों क दार्यित्व है, उपयुक्त नहीं प्रतीत होतार्। श्रमिकों को भी विशेष रूप से अपने संगठनों के मार्ध्यम से श्रम कल्यार्ण कार्यक्रमों के लिये संसार्धन जुटार्नार् चार्हिये। न केवल इतनार् बल्कि समार्ज को भी इस दिशार् में आगे आनार् चार्हिये क्योंकि श्रमिकों द्वार्रार् किये गये श्रम से उद्योग के मार्ध्यम से किये गये उत्पार्दन से समार्ज प्रत्यक्ष रूप से लार्भार्न्वित होतार् है। इसीलिये यह आवश्यक है कि श्रम कल्यार्ण के लिये आवश्यक संसार्धन जुटार्ने क दार्यित्व मार्लिक, श्रमिक और समार्ज तीनों द्वार्रार् संयुक्त रूप से निभार्यार् जार्य। समुदार्य में अनेक लोकोपकारी व्यक्ति एवं संगठन पार्ये जार्ते है। जो इस कार्य में सहार्यतार् कर सकते है।। इन व्यक्तियों एवं संगठनों की सहार्यतार् लेते हुये समुदार्य में उपलब्ध संसार्धनों क अधिक से अधिक सदुपयोग कियार् जार्नार् चार्हिये।

9. मागदर्शन हेतु समुचित विशेषज्ञ सहार्यतार् उपलब्धि क सिद्धार्न्त –

श्रमिकों से इस बार्त की अपेक्षार् नहीं की जार् सकती कि वे प्रार्थमिकतार् के आधार्र पर निश्चित की गयी विभिन्न प्रकार की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति से सम्बन्धित कार्यक्रमों के निर्णय के सभी पहलुओं की जार्नकारी रखते हों। इसी प्रकार श्रम कल्यार्ण के लिये संगठन में सम्मिलित मार्लिकों, उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित सरकार के विभिन्न विभार्गों के प्रतिनिधियों तथार् लोकोपकारी एवं स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों से भी इस बार्त की आशार् नहीं की जार् सकती कि वे आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिये बनार्ये जार्ने वार्ले कार्यक्रमों के सभी पहलुओं के बार्रे जार्नकारी रखते हों। चूँकि कुछ विशिष्ट प्रकार के कार्यक्रमों के निर्मार्ण में कुछ ऐसे पहलू होते हैं जिनमें तकनीकी ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं की आवश्यकतार् होती है इसलिये समय-समय पर विभिन्न विशेषज्ञों को आमंत्रित करके उनसे आवश्यक परार्मर्श लेते हुए कार्यक्रमों क निर्मार्ण कियार् जार्नार् चार्हिये, किन्तु कार्यक्रम निर्मार्ण से लेकर इसके कार्यार्न्वयन तक के प्रत्येक स्तर पर एक प्रशिक्षित सार्मार्जिक कार्यकर्तार् की सेवार्यें ली जार्नी चार्हिये क्योंकि श्रम कल्यार्ण सम्बन्धी कार्यक्रम मार्नव संसार्धनों के विकास से सम्बन्धित है। तथार् इनक आयोजन सार्है ादपूर्ण तथार् अर्थपूर्ण मार्नवीय सम्बन्धों क आश्रय लेते हुए कियार् जार्तार् है। सार्मार्जिक कार्यकर्तार् की उपस्थिति इस बार्त को सुनिश्चित करेगी कि कार्यक्रम सोद्देश्यपूर्ण बनेगे तथार् इनके कार्यार्न्वयन के दौरार्न उत्पन्न होने वार्ली अन्त:क्रियार् को आवश्यक मागदर्शन प्रार्प्त हो सकेगार्।

10. सतत् मूल्यार्ंकन एवं संशोधन क सिद्धार्न्त – 

श्रम कल्यार्ण कार्यक्रमों क अनवरत् मूल्यार्ंकन होते रहनार् चार्हिये तार्कि इनकी प्रगति, इनके कार्यार्न्वयन के दौरार्न आने वार्ली विभिन्न प्रकार की कठिनार्इयों तथार् अपेक्षित संशोधनों की जार्नकारी प्रार्प्त हो सके और इनके आधार्र पर श्रम कल्यार्ण से सम्बन्धित प्रत्येक स्तर के सभी पहलुओं में आवश्यक संशोधन किये जार् सकें।

श्रम कल्यार्ण प्रशार्सन 

भार्रतीय संविधार्न के अनुच्छेद 246 और अनुसूची 7 में केन्द्र एवं रार्ज्य सरकारों के बीच विधार्यी शक्तियों के विभार्जन-संबंधी उपबंध है। श्रम-संबंधी विधार्न बनार्ने के विषयों को संघ-सूची समवर्ती सूची तथार् रार्ज्य-सूची तीनों में रखार् गयार् है, लेकिन इनमें अधिकांश महत्त्वपूर्ण विषय समवर्ती सूची में रखे गए है। संघ-सूची में उल्लिखित विषयों पर केवल संसद ही कानून बनार् सकती है। समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर संसद और रार्ज्यों के विधार्नमंडल दोनों कानून बनार् सकते है। रार्ज्य-सूची के विषय रार्ज्य विधार्नमंडलों के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं। संघ एवं समवर्ती सूचियों में उल्लेखित विषयों में मुख्य हैं – औद्योगिक संबंध, नियोजन, श्रम-प्रबन्ध-सहयोग, मजदूरी और कार्य की अन्य दशार्ओं क विनियमन, सुरक्षार्, श्रम-कल्यार्ण, सार्मार्जिक सुरक्षार्, श्रम-विवार्द, प्रशिक्षण तथार् सार्ंख्यिकी। इन विषयों के संबंध में केन्द्र सरकार रार्ष्ट्रीय नीतियार्ँ निर्धार्रित करती है तथार् रेलवे, खार्नों, तेलक्षेत्रों, बैंकिग और बीमार्, मुख्य पतनों और गोदियों तथार् केन्द्रीय सरकार के उपक्रमों के संबंध में इन नीतियों क कार्यार्न्वयन भी करती है। अन्य नियोजनों में श्रम-नीतियों क क्रियार्न्वयन मुख्यत: रार्ज्य सरकारों क दार्यित्व है। केन्द्र सरकार रार्ज्य सरकारों के श्रम-सम्बन्धी कार्यकलार्प को समन्वित करती है तथार् आवश्यकतार्नुसार्र उन्हें परार्मर्श और निदेश देती है। श्रम-विधार्नों के कार्यार्न्वयन तथार् श्रम-सम्बन्धी अन्य बार्तों के निष्पार्दन के लिए केन्द्रीय एवं रार्जय दोनों स्तरों पर प्रशार्सनिक तंत्रों की व्यवस्थार् की गर्इ है। इन तंत्रों के कार्यो क संक्षिप्त वितरण है।

1. केन्द्र सरकार क श्रम-प्रशार्सन 

केन्द्र सरकार के श्रम-प्रशार्सन क दार्यित्व श्रम-मंत्रार्लय क है। इस मंत्रार्लय में मुख्य मंत्रार्लय (सचिवार्लय) के अतिरिक्त संबद्ध कार्यार्लय, अधीनस्थ कार्यार्लय, स्वार्यत्त संगठन, न्यार्यनिर्णयन निकाय तथार् विवार्चन निकाय हे।

1. श्रम-मंत्रार्लय (सचिवार्लय) 

श्रम-मंत्रार्लय क सचिवार्लय भार्रत सरकार के श्रम-संबंधी सभी विषयों पर विचार्र करने वार्लार् केन्द्र है। यह श्रम-नीतियों, श्रम-अधिनियमों के प्रवर्तन तथार् श्रम-कल्यार्ण के संवर्धन के संबंध में केन्द्रीय प्रशार्सनिक संयंत्र है। भार्रत सरकार के कार्यो के आबंटन-संबंधी नियमार्वली के अंतर्गत श्रम-मंत्रार्लय को आबंटित विषयों में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण है। –

  1. संघीय विषय – (i) रेलवे के संबंध में मजदूरी क भुगतार्न, श्रम-विवार्द, ऐसे कर्मचार्रियों के कार्य के घंटे जो कारखार्नार् अधिनियम के दार्यरे में नहीं आते, तथार् बार्लकों के नियोजन क विनियमन; (ii) गोदियों के संबंध में गोदी-श्रमिकों की सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य एवं कल्यार्ण-उपार्यों क विनियमन, तथार् (iii) खार्नों तथार् तेलक्षेत्रों में श्रम एवं सुरक्षार् क विनियमन। 
  2. समवर्ती विषय – जैसे – (i) कारखार्नों में श्रम की दशार्ओं क विनियमन; (ii) श्रम-कल्यार्ण, जैसे – औद्योगिक, वार्णिज्यिक तथार् कृषि-श्रमिकों की दशार्ओं क विनियमन, भविष्य-निधि, परिवार्र-पेंशन, उपदार्न; नियोजकों क दार्यित्व और कर्मकार-क्षतिपूर्ति, स्वार्स्थ्य एवं बीमार्री-बीमार्, जिसमें अशंक्ततार्-पेंशन शार्मिल है; तथार् वाधक्य पेंशन; (iii) बेरोजगार्री बीमार्; (iv) श्रमसंघ, औद्योगिक एवं श्रम-विवार्द; (v) श्रम-सार्ंख्यिकी; (vi) ग्रार्मीण रोजगार्री और बेरोजगार्री को छोड़कर रोजगार्री और बेरोजगार्री; तथार् (vii) शिल्पियों क व्यार्वसार्यिक और प्रौद्योगिक प्रशिक्षण। 
  3. अन्य विषय – जैसे – (i) दूसरे देशों के सार्थ हुर्इ संधियों एवं समझौतों क कार्यार्न्वयन; (ii) रोजगार्र कार्यार्लय, (iii) अंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन, (iv) त्रिदलीय श्रम सम्मेलन; (v) खार्नों में सुरक्षार् एवं कल्यार्ण-सम्बन्धी कानूनों क प्रशार्सन; (vi) भार्रतीय गोदी श्रमिक अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् अधिनियम, बार्गार्न श्रमिक अधिनियम तथार् उत्प्रवार्सन से संबद्ध कानूनों क प्रशार्सन; (vii) केन्द्रीय क्षेत्र के उपक्रमों में श्रम-कानूनों क प्रशार्सन; (viii) श्रम-सार्ंख्यिकी; (ix) औद्योगिक न्यार्यधिकरणों, श्रम-न्यार्यार्लयों तथार् रार्ष्ट्रीय औद्योगिक न्यार्यार्धिकरणों क प्रशार्सन; (x) मुख्य श्रमार्युक्त के कार्यार्लय तथार् कारखार्नार् सलार्ह सेवार् तथार् श्रम-संस्थार्न महार्निदेशार्लय क संगठन, (xi) भार्रत सरकार के श्रम-अधिकारियों की भर्ती, स्थार्नार्न्तरण और प्रशिक्षण; (xii) श्रमिक शिक्षार्; (xiii) प्रबन्ध में श्रमिकों की भार्गीदार्री; (xiv) औद्योगिक अनुशार्सन; (xv) मजदूरी-बोर्ड; (xvi) मोटर परिवहन कर्मकारों के कार्य की दशार्ओं क विनियमन; तथार् (xvii) देश में श्रम-कानूनों क मूल्यार्ंकन तथार् कार्यार्न्वयन। 

2. संबद्ध कार्यार्लय श्रम-

मंत्रार्लय से संबद्ध कार्यार्लय है – (i) मुख्य श्रमार्युक्त (केन्द्रीय) क कार्यार्लय, (ii) रोजगार्र और प्रशिक्षण महार्निदेशार्लय, (iii) कारखार्नार् सलार्ह सेवार् और श्रम संस्थार्न महार्निदेशार्लय, (iv) श्रम ब्यूरो। इन कार्यार्लय के कार्यो क संक्षिप्त विवरण है –

  1. मुख्य श्रमार्युक्त (केन्द्रीय) क कार्यार्लय – मुख्य श्रमार्युक्त (केन्द्रीय) क कार्यार्लय नर्इ दिल्ली में हैं। इस कार्यार्लय के महत्त्वपूर्ण कार्य है – 1. केन्द्रीय क्षेत्र में औद्योगिक विवार्द अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवार्दों की रोकथार्म, उनकी जार्ँच करनार् तथार् समझौते करार्नार्, 2. केन्द्रीय क्षेत्र में अधिनिर्णयों तथार् सुलहों तथार् मजदूरी-बोर्डो की सिफार्रिशों क प्रवर्तन करार्नार्; 3. उन उद्योगों तथार् प्रतिष्ठार्नों में श्रम-कानूनों क कार्यार्न्वयन करार्नार् जिनके संबंध में केन्द्रीय सरकार समुचित सरकार है; 4. केन्द्रीय श्रमसंघ संगठनों की सदस्यतार् क सत्यार्पन करनार्; तथार् 5. अनुशार्सन संहितार् के उल्लघंन के मार्मलों की जार्ँच करनार्। यह कार्यार्लय केन्द्रीय क्षेत्र में जिन श्रम-कानूनों के प्रवर्तन क कार्य देखतार् है, उनमें मुख्य है- (i) मजदूरी भुगतार्न अधिनियम, (ii) बार्ल श्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम, (iii) औद्योगिक नियोजन (स्थार्यी आदेश) अधिनियम, (iv) औद्योगिक विवार्द-अधिनियम, (v) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, (vi) गोदी कर्मकार (नियोजन क विनियमन), अधिनियम, (vii) प्रसूति हितलार्भ अधिनियम, (viii) बोनस भुगतार्न अधिनियम, (ix) ठेक श्रम (विनियमन तथार् प्रतिशेध) अधिनियम, (x) उपदार्न संदार्य अधिनियम, (xi) समार्न पार्रिश्रमिक अधिनियम तथार् (xii) अंतररार्ज्यीय उत्प्रवार्सी कर्मकार (नियोजन एवं सेवार्-शर्त विनियमन) अधिनियम। मुख्य श्रमार्युक्त (केन्द्रीय) के कार्यार्लय को केन्द्रीय औद्योगिक संबंध सयंत्र भी कहार् जार्तार् है। इस कार्यार्लय क प्रधार्न श्रमार्युक्त (केन्द्रीय) होतार् है। उनके अधीनस्थ क्षेत्रीय कार्यार्लय है। संगठन में एक संयुक्त मुख्य श्रमार्युक्त, कुछ उप-श्रमार्युक्त, कर्इ क्षेत्रीय श्रमार्युक्त, सहार्यक श्रमार्युक्त और श्रम-प्रवर्तन अधिकारी है। मुख्य श्रमार्युक्त की सहार्यतार् के लिए श्रम-कल्यार्ण के मुख्य परार्मश्र्ार्ी तथार् निदेशक (प्रशिक्षण) भी नियुक्त है।
  2. रोजगार्र और प्रशिक्षण महार्निदेशार्लय – इस महार्निदेशार्लय क मुख्य कार्य व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण के लिए सार्रे देश में नीतियार्ँ, मार्नक एवं पद्धतियार्ँ निर्धार्रित करनार् और रोजगार्र-सेवार्ओं क समन्वय करनार् है। महार्निदेशार्लय अधिकारियों के प्रशिक्षण तथार् कार्यक्रमों के मूल्यार्ंकन के कार्य भी संपन्न करतार् है। इस कार्यार्लय के तत्वार्वधार्न में ही देशभर में रोजगार्र-कार्यार्लयों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थार्नों तार्िार् अन्य विशिष्ट संस्थार्ओं के जरिए रोजगार्र-सेवार्ओं एवं व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण-सबंधी कार्यक्रम चलार्ए जार्ते है।। रोजगार्र-कार्यार्लय तथार् औद्योगिक प्रशिक्षण-संस्थार्नों के दिन-प्रतिदिन के कार्य रार्ज्य सरकारों तथार् संघ रार्ज्य-क्षेत्रों द्वार्रार् संचार्लित होते है।। रार्ष्ट्रीय व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण परिषद तथार् केन्द्रीय शिशुक्षुतार् परिषद इसी महार्निदेशार्लय के महत्वपूर्ण सलार्हकार निकाय है। इस महार्निदेशार्लय द्वार्रार् संचार्लित महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण योजनार्एं यार् कार्यक्रम है – शिल्पी प्रशिक्षण योजनार्, शिक्षु प्रशिक्षण योजनार्, शिल्प अनुदेशक प्रशिक्षण योजनार्, शिल्प अनुदेशक प्रशिक्षण योजनार्, अत्यधिक कुशल शिल्पीकार तथार् पर्यवेक्षक प्रशिक्षण योजनार्, महिलार् प्रशिक्षण योजनार्, स्टार्फ प्रशिक्षण एवं शोध तथार् अनुदेशीय सार्मार्धियों क विकास। इस संगठन क मुख्यार्लय नर्इ दिल्ली में हैं। 
  3. कारखार्नार् सलार्ह सेवार् एवं श्रम संस्थार्न महार्निदेशार्लय – इस महार्निदेशार्लय के मुख्य कार्य कारखार्नों और गोदियों के कर्मकारी की सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य एवं कल्यार्ण से संबद्ध है। यह महार्निदेशार्लय कारखार्नार् अधिनियम के कार्यार्न्वयन को समन्वित करतार् है तथार् अधिनियम के अधीन आदर्श नियम बनार्तार् है। इसके कार्य गोदी कर्मकार (सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य तथार् कल्यार्ण) अधिनियम, 1986 के प्रशार्सन से भी संबद्ध है। महार्निदेशार्लय औद्योगिक सुरक्षार्, व्यार्वसार्यिक स्वार्स्थ्य, औद्योगिक स्वच्छतार्, औद्योगिक मनोविज्ञार्न और औद्योगिक शरीर क्रियार्विज्ञार्न के क्षेत्रों में अनुसंधार्न कार्य भी करतार् है। यह औद्योगिक सुरक्षार् तथार् स्वार्स्थ्य-संबंधी क्षेत्र में प्रशिक्षण-कार्यक्रम भी चलार्तार् है। महार्निदेशार्लय के कार्यो में कारखार्नार्-निरीक्षकों क नियमित प्रशिक्षण भी सम्मिलित है। महार्निदेशार्लय द्वार्रार् संचार्लित श्रम संस्थार्न मुंबर्इ, कानपुर, कोलकातार् और चेन्नर्इ में अवस्थित है। इसक मुख्यार्लय मुंबर्इ है। श्रम-मंत्रार्लय में एक स्वार्यत रार्ष्ट्रीय सुरक्षार् परिषद क भी गठन कियार् गयार् है। इस परिषद क मुख्य उद्देश्य रार्ष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षार्-जार्गृति आंदोलन क विकास करनार् है। इस उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए परिषद कर्इ प्रकार के शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण-संबंधी क्रियार्कलार्प क संचार्लन करतार् है। 
  4. श्रम ब्यूरो – इस ब्यूरो क कार्यार्लय शिमलार् और चड़ीगढ़ में है। श्रम ब्यूरों के मुख्य कार्य है – 1. अखिल भार्रतीय आधार्र पर श्रम-सार्ंख्यिकी क संग्रहण, सकेतन तथार् प्रकाशन, 2. चुने हुए केन्द्रों के लिए श्रमिक वर्ग उपभोक्तार् मूल्य सूचकांक तथार् औद्योगिक श्रमिकों के लिए अखिल भार्रतीय उपभोक्तार्-मूल्य-सूचकांक क निर्मार्ण एवं अनुरक्षण करनार्, 3. कृषि-श्रमिकों के लिए उपभोक्तार्-मूल्य-सूचकांक क निर्मार्ण एवं अनुरक्षण करनार्, 4. औद्योगिक श्रमिकों के कार्य की दशार्ओं से सम्बद्ध अद्यतन आँकड़े अनुरक्षित करनार्, 5. श्रम-नीति के निर्मार्ण के लिए श्रम-सम्बन्धी विशिष्ट समस्यार्ओं के सम्बन्ध में शोध करनार्, 6. श्रम से सम्बद्ध विभिन्न पहलुओं पर रिपोर्ट, पुस्तिक तथार् विवरणिक क प्रकाशन करनार्, 7. इंडियन लेवर र्इयर बुक, इंडियन लेबर जर्नल, इंडियन लेबर स्टैटिस्टिक्स, तथार् श्रम सार्ंख्यिकी लघु पुस्तिका, क प्रकाशन करनार्, तथार् 8. रार्ज्य/जिलार्/इकार्इ के स्तरों पर श्रम-सार्ंख्यिकी में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए आवश्यक सलार्ह देनार्। ब्यूरों के प्रधार्न इसके महार्निदेशक होते हैं। 

3. अधीनस्थ कार्यार्लय श्रम-

मंत्रार्लय के अधीनस्थ कार्यार्लय हैं – (क) खार्न सुरक्षार् महार्निदेशार्लय, तथार् (ख) कल्यार्ण आयुक्तों के कार्यार्लय।

  1. खार्न सुरक्षार् महार्निदेशार्लय – इस कार्यार्लय को खार्न अधिनियम, 1952 के उपबंधों तथार् उसके अधीन बनार्ए गए नियमों और विनियमों को लार्गू करने क दार्यित्व सौंपार् गयार् है। इसक मुख्यार्लय धनवार्द में है तथार् इसके मंडलीय, क्षेत्रीय एवं उपक्षेत्रीय कार्यार्लय विभिन्न खार्न-क्षेत्रों में हैं। इसके महार्निदेशक की अध्यक्षतार् में गठित खार्न-बोर्ड खार्न-प्रबन्धकों, सर्वेक्षकों तथार् वोअरमेन के लिए आवधिक परीक्षार्एँ लेतार् है और योग्यतार्-प्रमार्णपत्र देतार् है। यह कार्यार्लय खार्नों में हितलार्भ अधिनियम, 1961 तथार् भार्रतीय बिजली अधिनियम, 1910 के उपबंधों क खार्नों और तेल-क्षेत्रों में प्रवर्तन करतार् है। 
  2. कल्यार्ण आयुक्त के कार्यार्लय – कल्यार्ण आयुक्तों के कार्यार्लयों क मुख्य दार्यित्व विभिन्न श्रम-कल्यार्ण निधि अधिनियमों के उपबन्धों क प्रवर्तन है। देश में इनके नौ कार्यार्लय अभ्रक, चूनार्-पत्थर और होलोमार्इट, लौह अयस्क, मैंगनीज अयस्क, क्रोम अयस्क, खार्नों और बीड़ी तथार् सिनेमार् उद्योगों में नियोजित कर्मकारी के लिए स्थार्पित किए गए है। कल्यार्ण आयुक्तों के कार्यार्लयों के तत्वार्धार्न में चलार्ए जार्ने वार्ले श्रम-कल्यार्ण के महत्वपूर्ण क्षेत्र है – आवार्सीय, मनोरंजनार्त्मक, चिकित्सकीय तथार् शैक्षिक सुविधार्एँ, पेयजल की आपूर्ति, छार्त्रवृतियों की व्यवस्थार्, तथार् दुर्घटनार्-हितलार्भ ये कार्यार्लय स्वीकृत योजनार्ओं के लिए रार्ज्य सरकारों, स्थार्नीय प्रार्धिकारियों तथार् कर्मचार्रियों को ऋण एवं सहार्यिकी भी उपलब्ध करार्ते हैं। 

4. स्वार्यत्त संगठन 

भार्रत सरकार के श्रम-मंत्रार्लय के अधीनस्थ स्वार्यत्त संगठन है – 1. कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् निगम, 2. कर्मचार्री भविष्य-निधि संगठन, 3. वी0वी0 गिरी रार्ष्ट्रीय श्रम संस्थार्न तथार् 4. केन्द्रीय श्रमिक शिक्षार् बोर्ड। 

  1. कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् निगम – इस निगम क गठन कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् अधिनियम, 1952 के अधीन कियार् गयार् है। यह अधिनियम के उपबंधों के अनुसार्र बीमार्री-हितलार्भ, प्रसूति-हितलार्भ, अशक्ततार्-हितलार्भ, आश्रित-हितलार्भ, अंत्येष्टि व्यय तथार् चिकित्सार्-हितलार्भ की व्यवस्थार् के लिए उत्तरदार्यी है। इसक मुख्यार्लय नर्इ दिल्ली में तथार् क्षेत्रीय कार्यार्लय देश के विभिन्न भार्गों में है।
  2. कर्मचार्री भविष्य-निधि संगठन – यह संगठन कर्मचार्री भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के प्रशार्सन के लिए उत्तरदार्यी है। इसक मुख्यार्लय नर्इ दिल्ली में है तथार् इसके शार्खार् कार्यार्लय देश विभिन्न भार्गों में है। इस संगठन द्वार्रार् कर्मचार्री भविष्य-निधि योजनार्, कर्मचार्री निक्षेप संबद्ध बीमार् योजनार् तथार् कर्मचार्री पेंशन योजनार् क संचार्लन होतार् है। 
  3. वी0वी0 गिरी रार्ष्ट्रीय श्रम संस्थार्न – यह संथार्न नोएडार् (उत्तर प्रदेश) में है। यह संस्थार्न एक पंजीकृत संस्थार्न है। इसके मुख्य कार्य संगठित तथार् असंगठित दोनों क्षेत्रों में श्रम-सम्बन्धी समस्यार्ओं पर कार्योन्मुखी अनुसंधार्न करनार् तथार् ग्रार्मीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में श्रमसंघ आंदोलन में निचले स्तर श्रमिकों तथार् औद्योगिक संबंध, कार्मिक प्रबंध, श्रम-कल्यार्ण आदि से संबद्ध विभिन्न स्तरों के अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदार्न करनार् है। संस्थार्न श्रम-सम्बन्धी विषयों पर कार्यशार्लार्एँ एवं सेमिनार्र भी आयोजित करतार् है। 
  4. केन्द्रीय श्रमिक शिक्षार् बोर्ड – इस कार्यार्लय क मुख्यार्लय नार्गपुर है इसके मंडलीय निदेशार्लय दिल्ली, कोलकातार्, मंबु र्इ और चेन्नर्इ है तथार् देश के कर्इ भार्गों में इसके क्षेत्रीय, निदेशार्लय और केन्द्र स्थार्पित किए गए है। यह संगठन भी एक पंजीकृत संस्थार् है। बोर्ड श्रमसंघवार्द की तकनीकों में प्रशिक्षण देने से संबद्ध योजनार् संचार्लित करतार् है और श्रमिकों को उनके अधिकारों, कर्त्तव्यों और दार्यित्वों से अवगत करार्ने के लिए शैक्षिक कार्यक्रम चलार्तार् है। बोर्ड ने रार्ष्ट्र-स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए मुंबर्इ में भार्रतीय श्रमिक शिक्षार् संस्थार्न की स्थार्पनार् भी की है। बोर्ड ग्रार्मीण शिक्षार् तथार् क्रियार्त्मक प्रौढ़ शिक्षार् संबंधी कार्यक्रम क भी संचार्लन करतार् है। 
  5. न्यार्यनिर्णयन यार् अधिनिर्णयन- निकाय देश के कुछ औद्योगिक केन्द्रों यार् नगरों में केन्द्रीय सरकार द्वार्रार् औद्योगिक विवार्द अधिनियम, 1947 के अधीन उन स्थार्पनों के औद्योगिक विवार्दों के न्यार्यनिर्णयन के लिए औद्योगिक अधिकरण और श्रम-न्यार्यार्लय गठित किए गए है, जिनके संबंध में समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है। ऐसे अधिकरण तथार् श्रम-न्यार्यार्लय धनबार्द, मुंबर्इ, कोलकातार्, आसनसोल, जयपुर, जबलपुर, नर्इ दिल्ली, चण्डीगढ़, कानपुर तथार् बंगलोर में स्थार्पित किए गए है। आवश्यकतार् पड़ने पर, केन्द्रीय सरकार रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् गठित अधिकरणों की सेवार्ओं क भी उपयोग करती है। वर्तमार्न समय में अधिकरण-सह-श्रम न्यार्यलयों की संख्यार् 17 है। 
  6. विवार्चन-निकाय- केन्द्रीय सरकार ने संयुक्त परार्मर्शदार्त्री तंत्र एवं अनिवाय मध्यस्थतार् योजनार् के अधीन तथार् सरकारी कर्मचार्रियों के वेतन तथार् भत्ते, सार्प्तार्हिक कार्य के घंटे तथार् किसी वर्ग यार् श्रेणी के कर्मचार्रियों के लिए अवकाश-संबंधी विवार्दों यार् मतभेदों के निपटार्न के लिए विवार्चन बोर्ड क गठन कियार् है। बोर्ड में एक अध्यक्ष और दो अन्य सदस्य होते हैं। श्रम प्रशार्सन के लिए केन्द्रीय सरकार एवं रार्ज्य सरकार के तंत्रों में तार्लमेल के लिए निरंतर प्रयार्स किए जार्ते हैं। अधिकांश स्थितियों में, केन्द्रीय सरकार रार्ज्य सरकारों के श्रम-संबंधी क्रियार्कलार्प को समन्वित करती है और आवश्यकतार्नुसार्र उन्हें परार्मर्श एवं निर्देश देती है। 

2, रार्ज्य सरकार क श्रम-प्रशार्सन 

जैसार् कि इस अध्यार्य के आरंभ में कहार् जार् चुक है, ‘श्रम’ से संबंद्ध अधिकांश महत्वपूर्ण विषय संविधार्न की समवर्ती सूची में है। सार्मार्न्यत: अधिकांश श्रम-कानून केन्द्रीय सरकार द्वार्रार् बनार्ए गए है, तथार् उनक प्रवर्तन अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र के स्थार्पनों में केन्द्रीय एवं रार्ज्य सरकारें दोनों करती है, लेकिन कुछ श्रम-कानूनों के कार्यार्न्वयन क दार्यित्व रार्ज्य सरकारों को भी सौंपार् गयार् है। कुछ श्रम-कानून रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् भी बनार्ए गए है और उनक प्रवर्तन भी रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् ही होतार् है। केन्द्रीय सरकार तथार् अन्य रार्ज्य सरकारों में भी श्रम-प्रशार्सन के लिए तंत्रों की व्यवस्थार् की गर्इ है जिनक संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

1. सरकार पक्ष 

रार्ज्य में श्रम-प्रशार्सन क दार्यित्व ‘श्रम, नियोजन एवं प्रशिक्षण’ विभार्ग क है। सरकार पक्ष में इस विभार्ग के शीर्ष में मंत्री होते हैं। व्यवहार्र में, वे कैबिनेट स्तर के मंत्री होते है, और आवश्यकतार्नुसार्र उनकी सहार्यतार् के लिए रार्ज्य-मंत्री तथार् उप-मंत्री भी नियुक्त होते रहे है। इस पक्ष में प्रधार्न अधिकारी आयुक्त-सह-प्रधार्न सचिव होतार् है। आयुक्त सह प्रधार्न सचिव श्रम संबंधी सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के निर्धार्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिक निबार्हतार् है और अपने अधीनस्थ विभिन्न विभार्गों के कार्यो पर नियंत्रण रखतार् है तथार् उनके कार्यकलार्प को समन्वित करतार् है। वह श्रम-संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के संबंध में केन्द्रीय श्रम-मंत्रार्लय से संपर्क बनार्ए रखतार् है और उसके निर्देशों एवं सुझार्वों को बिहार्र में क्रियार्न्वित करने के लिए कदम उठार्तार् है। आयुक्त-सह-प्रधार्न सचिव की सहार्यतार् के लिए आवश्यकतार्नुसार्र अपर प्रधार्न सचिव, तथार् कुछ संयुक्त सचिव, उप-सचिव और अवर सचिव नियुक्त किए गए है। क्षेत्रों के प्रशार्स्क सरकार की अनुमति यार् स्वीकृति के लिए अपने सुझार्व यार् अभ्युक्तियार्ँ इसी तंत्र के पार्स भेजते हैं।

2. प्रशार्सनिक पक्ष 

रार्ज्य में श्रम-प्रशार्सन में लगे महत्त्वपूर्ण कार्यार्लय हैं – (क) श्रमार्युक्त क कार्यार्लय, (ख) मुख्य कारखार्नार् निरीक्षणार्लय, (ग) मुख्य बॉयलर निरीक्षणार्लय, (घ) कृषि श्रमिक निदेशार्लय, (ड़) मुख्य निरीक्षी पदार्धिकारी क कार्यार्लय, (च) नियोजन एवं प्रशिक्षण निदेशार्लय, (छ) सार्मार्जिक सुरक्षार् निदेशार्लय, तथार् (ज) निदेशार्लय, चिकित्सार्-सेवार्एँ (कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार्)। इनके अतिरिक्त रार्ज्य से अधिनिर्णयन तंत्र तथार् त्रिपक्षीय निकायों क भी गठन कियार् गयार् है। इन कार्यार्लयों के श्रम-प्रशार्सन-संबंधी महत्त्वपूर्ण क्रियार्कलार्प क संक्षिप्त विवरण है-

  1. श्रमार्युक्त क कार्यार्लय – रार्ज्य के श्रम-प्रशार्सन में श्रमार्युक्त के कार्यार्लय की भूमिक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। रार्ज्य में अधिकांश श्रम-अधिनियमों के प्रशार्सन क दार्यित्व इसी कार्यार्लय पर है। इस कार्यार्लय के मुख्य उद्देश्य है – 1. हड़तार्लों, तार्लार्बंदियों तथार् अन्य औद्योगिक कार्यवार्हियों की रोकथार्म, 2. नियोजकों और कर्मचार्रियों के बीच उनके सार्मार्जिक दार्यित्वों के संबंध में जार्गरूकतार् लार्नार्, तथार् 3. विभिन्न श्रम-कानूनों क प्रवर्तन। यह कार्यार्लय कर्इ श्रम-अधिनियमों के प्रवर्तन क कार्य देखतार् है। इन अधिनियमों में अधिकांश केन्द्रीय अधिनियम है, लेकिन उनक प्रवर्तन अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में केन्द्रीय एवं रार्ज्य सरकारें दोनों करती है। इन अधिनियमों में मुख्य हैं – 1. औद्योगिक विवार्द अधिनियम, 1947, 2. श्रमसंघ अधिनियम, 1926, 3. औद्योगिक नियोजन (स्थार्यी आदेश) अधिनियम, 1946, 4. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948, 5. मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम, 1961, 6. कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923, 7. प्रसूति हितलार्भ अधिनियम, 1961, 8. समार्न पार्रिश्रमिक अधिनियम, 1976, 9. बोनस भुगतार्न अधिनियम, 1965, 10. उपंदार्न संदार्य अधिनियम, 1972, 11. ठेक श्रम (विनियमन और उत्पार्दन) अधिनियम, 1970, तथार् 12. बार्ल श्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986। जिन केन्द्रीय श्रम कानूनों के प्रवर्तन क मुख्य दार्यित्व इस कार्यार्लय पर है, उनमें सम्मिलित है- 1. कारखार्नार् अधिनियम, 1948, 2. बीडी और सिगार्र कर्मकार (नियोजन की शर्ते) अधिनियम, 1966, तथार् 3. बॉयलर अधिनियम, 1923। इस कार्यार्लय क प्रधार्न अधिकारी श्रमार्युक्त है। श्रमार्युक्त के अधीनस्थ एक अपर श्रमार्युक्त तथार् कुछ संयुक्त श्रमार्युक्त मुख्यार्लय में पदस्थार्पित है। श्रमार्युक्त के अधीन उप-श्रमार्युक्त रार्ज्य के विभिन्न प्रमंडलों तथार् महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्रों में और विशेष प्रयोजनों के लिए कार्यरत है। महत्त्वपूर्ण जिलों में तथार् विशेष कार्यो के लिए सहार्यक श्रमार्युक्त तथार् कर्इ क्षेत्रों में श्रम-अधीक्षक नियुक्त किए गए है। प्रखंड-स्तर पर बड़ी संख्यार् में श्रम-प्रवर्तन अधिकारियों की नियुक्ति की गर्इ है, जिनक मुख्य कार्य कृषि-श्रमिकों तथार् अन्य ग्रार्मीण श्रमिकों के संबंध में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 क समुचित क्रियार्न्वयन सुनिश्चित करनार् है। श्रमार्युक्त औद्योगिक विवार्द अधिनियम के अंतर्गत सुलह अधिकारी, श्रमसंघ अधिनियम के अधीन श्रमसंघों क रजिस्ट्रार्र तथार् कुछ श्रम-अधिनियमों के अंतर्गत नियंत्रक प्रार्धिकारी तथार् अपीलों प्रार्धिकारी, तथार् कर्इ श्रम-अधिनियमों के अधीन सार्रे रार्ज्य क निरीक्षक होतार् है। वह अपने कार्यार्लय के स्थार्पन, विवार्चन, पर्यवेक्षण तथार् श्रम-प्रशार्सन-संबंधी कर्इ अन्य कार्य भी संपन्न करतार् है। श्रमार्युक्त के सार्मार्न्य अधीक्षण एवं पर्यवेक्षण में उप-श्रमार्युक्त, सहार्यक श्रमार्युक्त तथार् श्रम-अधीक्षक अपने-अपने क्षेत्रों में औद्योगिक विवार्द अधिनियम के अधीन सुलह अधिकारी के अतिरिक्त, विभिन्न श्रम-कानूनों के अंतर्गत निरीक्षक, तथार् निरोक्षी पदार्धिकारी की भूमिकाएँ निवार्हते है। उप-श्रमार्युक्तों को कृषि-श्रमिकों के श्रमसंघों के पंजीयन के लिए रजिस्ट्रार्र तथार् कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम के अधीन क्षतिपूर्ति आयुक्त की शक्तियार्ँ भी प्रदार्न की गर्इ है। श्रमार्युक्त, अपर श्रमार्युक्त तथार् संयुक्त श्रमार्युक्त क्षेत्रों में कार्यरत कार्मिकों के कार्यो क समय-समय पर्यवेक्षण करते हैं तथार् विभिन्न श्रम-कानूनों के प्रभार्वी प्रवर्तन के लिए परार्मर्श तथार् मागदर्शन देते रहते हैं। मुख्य कारखार्नार् निरीक्षणार्लय, मुख्य बॉयलर निरीक्षणार्लय तथार् कृषि श्रमिक निदेशार्लय भी श्रमार्युक्त के अधीक्षण में अपने दार्यित्व निबार्हते है। श्रमार्युक्त के कार्यार्लय क मुख्यार्लय पटनार् में है। 
  2. मुख्य कारखार्नार् निरीक्षणार्लय – मुख्य कारखार्नार् निरीक्षणार्लय क प्रधार्न मुख्य कारखार्नार्-निरीक्षक होतार् है। उसके अधीन कुछ उप-मुख्य कारखार्नार्-निरीक्षक तथार् कर्इ कारखार्नार्-निरीक्षक नियुक्त है। कारखार्नार्-निरीक्षकों में कुछ चिकित्सकीय एवं रार्सार्यनिक निरीक्षक है। इस निरीक्षणार्लय क मुख्य कार्य रार्ज्य में कारखार्नार् अधिनियम क प्रवर्तन है। निरीक्षणार्लय कारखार्नों में अधिनियम के सुरक्षार्, स्वार्स्थ्य, कल्यार्ण आदि से संबद्ध उपबंधों क अनुपार्लन सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिक निबार्हतार् है। निरीक्षणार्लय को कारखार्नों में मजदूरी भुगतार्न अधिनियम, प्रसूति हितलार्भ अधिनियम, बार्ल श्रम (प्रतिशेध एवं विनियमन) अधिनियम तथार् मजदूरी भुगतार्न अधिनियम के प्रवर्तन क दार्यित्व भी सार्ंपै ार् गयार् है। निरीक्षणार्लय उत्पार्दकतार् के संबंध में रार्ष्ट्रीय उत्पार्दकतार् परिषद के सार्थ सहयोग करतार् है। यह कारखार्नों तथार् उनमें कार्यरत श्रमिकों की दशार्ओं के संबंध में आँकड़ों क संकलन भी करतार् है। मुख्य कारखार्नार्-निरीक्षक श्रमार्युक्त के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण में अपने कर्त्तव्यों क निर्वार्ह करतार् है। 
  3. मुख्य बॉयलर निरीक्षणार्लय – मुख्य बॉयलर निरीक्षणार्लय क मुख्य कार्य भार्रतीय बॉयलर अधिनियम क प्रवर्तन है। इस निरीक्षणार्लय क प्रमुख मुख्य बॉयलर निरीक्षक होतार् है, जो श्रमार्युक्त के नियंत्रण में अपने दार्यित्व निवार्हतार् है। मुख्य बॉयलर निरीक्षक की सहार्यतार् के लिए कुछ बॉयलर निरीक्षकों की नियुक्ति की गर्इ है। 
  4. कृषि श्रमिक निदेशार्लय – इस निदेशार्लय क मुख्य कार्य कृषिक्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम क प्रवर्तन करनार् है। इस कार्यार्लय क प्रमुख संयुक्त श्रमार्युक्त की कोटि क निदेशक, कृषि श्रमिक होतार् है। मुख्यार्लय में निदेशक की सहार्यतार् के लिए उप-निदेशक तथार् प्रखंडों में श्रम-प्रवर्तन-पदार्धिकारी नियुक्त हे। निदेशक, कृषि श्रमिक, श्रमार्युक्त के नियंत्रण तथार् अधीक्षण में अपनार् दार्यित्व निवार्हतार् है। 
  5. मुख्य निरीक्षी पदार्धिकारी क कार्यार्लय – इस कार्यार्लय क मुख्य कार्य दुकान एवं प्रतिष्ठार्न अधिनियम क प्रवर्तन है। इस कार्यार्लय क प्रमुख उप-श्रमार्युक्त की कोटि क मुख्य निरीक्षी पदार्धिकारी होतार् है, जो श्रमार्युक्त के अधीनस्थ अपने कर्तव्यों क निर्वार्ह करतार् है। क्षेत्रों में सहार्यक श्रमार्युक्त तथार् श्रम-अधीक्षक अधिनियम के प्रवर्तन क कार्य संपन्न करते हैं। 
  6. नियोजन एवं प्रशिक्षण निदेशार्लय – इस निदेशार्लय क मुख्य कार्य रोजगार्र-कार्यार्लयों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थार्नों तथार् अन्य विशिष्ट संस्थार्ओं के संचार्लन क कार्य संपन्न करनार् है। इस निदेशार्लय के कार्य केन्द्रीय सरकार के रोजगार्र और प्रशिक्षण महार्निदेशार्लय द्वार्रार् निर्धार्रित नीतियों, मार्नकों तथार् पद्धतियों के अनुसार्र होते हैं। निदेशार्लय द्वार्रार् रार्ज्य के कर्इ नगरों एवं क्षेत्रों में रोजगार्र कार्यार्लय संचार्लित होते हैं तथार् विश्वविद्यार्लयों में रोजगार्र-सूचनार्-केन्द्रों तथार् व्यार्वसार्यिक मागदर्शन ब्यूरो स्थार्पित किए गए है। निदेशार्लय रोजगार्र-बार्जार्र- सूचनार्एँ भी एकत्र करतार् है। इस कार्यार्लय क प्रधार्न निदेशक, नियोजन एवं प्रशिक्षण होतार् है। उसकी सहार्यतार् के लिए कुछ उपनिदेशक, सहार्यक निदेशक तथार् कर्इ रोजगार्र पदार्धिकारी और सहार्यक रोजगार्र पदार्धिकारी नियुक्त है। इस निदेशार्लय क प्रशिक्षण विभार्ग शिक्षु अधिनियम, 1961 को क्रियार्न्वित करतार् है तथार् रार्ज्य के कुछ नगरों में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थार्ओं क संचार्लन करतार् है। इन प्रशिक्षण संस्थार्नों में विभिन्न व्यवसार्यों एवं शिल्पों में प्रशिक्षण की व्यवस्थार् की गर्इ है। इस निदेशार्लय पर बिहार्र सरकार द्वार्रार् चलाइ जार्नेवार्ली अनियोजन संकेतक भत्तार् योजनार् के क्रियार्न्वयन क दार्यित्व भी रहार् है। 
  7. सार्मार्जिक सुरक्षार् निदेशार्लय – इस निदेशार्लय क मुख्य कार्य केन्द्र एवं रार्ज्य सरकार की सावजनिक सार्मार्जिक सुरक्षार् योजनार्ओं क क्रियार्न्वयन है। इन सावजनिक सार्मार्जिक सुरक्षार् योजनार्ओं में मुख्य है- 1. रार्ष्ट्रीय वृद्धार्वस्थार् पेंशन योजनार्, 2. रार्ष्ट्रीय परिवार्र हितलार्भ योजनार्, 3. रार्ष्ट्रीय प्रसूति हितलार्भ योजनार्, 4. रार्ज्य सार्मार्जिक सुरक्षार् पेंशन योजनार्, 5. बंधुआ श्रमिकों क पुनर्वार्सन तथार् 6. अपंगों एवं भिक्षुकों के बीच वस्त्र वितरण योजनार् निदेशार्लय अंतरार्ज्जीय उत्प्रवार्सी कर्मकार (नियोजन एवं सेवार्-शर्ते) अधिनियम, 1976 के प्रवर्तन क कार्य भी देखतार् है। निदेशार्लय क प्रधार्न निदेशक, सार्मार्जिक सुरक्षार् होतार् है। उसकी सहार्यतार् के लिए मुख्यार्लय में उप-निदेशक तथार् क्षेत्रों में सहार्यक निदेशक नियुक्त किए गए है। निदेशार्लय के अधिकांश कार्यक्रम जिलार्धिकारों, अनुमंडल पदार्धिकारियों तथार् प्रखंड विकास पदार्धिकारियों के जरिए संपन्न किए जार्ते हैं। 
  8. निदेशार्लय, चिकित्सार्-सेवार्एँ (कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार्)- कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार् के अन्तर्गत चिकित्सार्-हितलार्भ के संचार्लन क मुख्य दार्यित्व रार्ज्य सरकारों क है। रार्ज्य के श्रम-विभार्ग में निदेशार्लय, चिकित्सार्-सेवार्एं (कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार्) क गठन कियार् गयार् है। यह निदेशार्लय रार्ज्य सरकार के स्वार्स्थ्य विभार्ग के सहयोग से कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार् के अंतर्गत स्थार्पित अस्पतार्लों के लिए चिकित्सकों तथार् अन्य कार्मिकों की सेवार्ओं की व्यवस्थार् करतार् है। निदेशार्लय क प्रमुख निदेशक, चिकित्सार् सेवार्एं होतार् है जो कर्मचार्री रार्ज्य बीमार् योजनार् के अंतर्गत चिकित्सार् हितलार्भ के कार्यार्न्वयन के कार्य को समन्वित और नियंत्रित करतार् है। 

    3. अधिनिर्णयन तंत्र 

औद्योगिक विवार्द अधिनियम, 1947 के अधीन रार्ज्य सरकार ने औद्योगिक न्यार्यार्धिकरणों तथार् न्यार्यार्लयों की भी स्थार्पनार् की है। इस अधिनिर्णयन प्रार्धिकारियों क मुख्य काय्र औद्योगिक विवार्दों क अधिनिर्णयन करनार् है। 

4. त्रिपक्षीय निकाय 

रार्ज्य सरकार के श्रम विभार्ग के तत्वार्वधार्न में कुछ त्रिपक्षीय निकायों क भी गठन कियार् गयार् है। इनमें महत्वपूर्ण है- रार्ज्य केन्द्रीय श्रम सलार्हकार बोर्ड, मूल्यार्ंकन तथार् कार्यार्न्वयन स्थार्यी समिति, चीनी और जूट उद्योगों के लिए स्थार्यी समितियार्ँ तथार् ठेक श्रमिकों और न्यूनतम मजदूरी से संबद्ध सलार्हकार समितियार्ँ। रार्ज्य सरकार के श्रम विभार्ग ने रार्ज्य के विभिन्न क्षेत्रों में श्रम-कल्यार्ण केन्द्रों की स्थार्पनार् की है। इन केन्द्रों के कार्यकलार्प श्रम-कल्यार्ण पदार्धिकारियों की देखरेख में चलार्ए जार्ते रहे है। मुख्यार्लय-स्तर पर इन श्रम-कल्यार्ण केन्द्रों के लिए संयुक्त श्रमार्युक्त को प्रभार्र सार्ंपै ार् गयार् है। इन केन्द्रों के श्रम-कल्यार्ण कार्यकलार्प में सम्मिलित है- प्रसवार्वस्थार् में परिचार्रिक सेवार्एं, संगीत एवं मनोरंजन कार्यक्रमों क आयोजन, पुस्तकालय एवं वार्चनार्लय, पार्रितपोशिक वितरण, सिलाइ कलार् प्रशिक्षण, उत्पार्दन केन्द्र कार्यक्रम, श्रमिकों को मद्यपार्न-व्यसन, ऋणग्रस्ततार् आदि से मुक्ति पार्ने के लिए प्रशिक्षण, श्रमिकों के बच्चों के लिए पठन सार्मग्रियों क वितरण तथार् औद्योगिक स्वार्स्थ्य सेवार्एं। प्रार्रम्भ में श्रम-कल्यार्ण केन्द्रों के कार्यकलार्प बड़े उत्सार्ह से चलार्ए गए, लेकिन विगत वर्षो में रार्शि की कमी के कारण ये कार्यकलार्प सीमित पैमार्ने पर ही चलार्ए जार्ते हैं। वर्तमार्न समय में अधिकांश श्रम-कल्यार्ण केन्द्र निश्क्रिय है।

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