शोध प्रार्रूप क अर्थ, प्रकार एवं महत्व

प्रस्तार्वित सार्मार्जिक शोध की विस्तृत कार्य योजनार् अथवार् शोधकार्य प्रार्रम्भ करने के पूर्वसम्पूर्ण शोध प्रक्रियार्ओं की एक स्पष्ट संरचनार् ‘शोध प्रार्रूप’ यार् ‘शोध अभिकल्प’ के रूप में जार्नी जार्ती है। शोध प्रार्रूप के सम्बन्ध में यह स्पष्ट होनार् चार्हिए कि यह शोध क कोर्इ चरण नहीं है क्योंकि शोध के जो निर्धार्रित यार् मार्न्य चरण हैं, उन सभी पर वार्स्तविक कार्य प्रार्रम्भ होने के पूर्व ही विस्तृत विचार्र होतार् है और तत्पश्चार्त् प्रत्येक चरण से सम्बन्धित विषय पर रणनीति तैय्यार्र की जार्ती है। जब सम्पूर्ण कार्य योजनार् विस्तृत रूप से संरचित हो जार्ती है तब वार्स्तविक शोध कार्य प्रार्रम्भ होतार् है।

  1. एफ.एन. करलिंगर (1964 : 275) के अनुसार्र, ‘‘शोध प्रार्रुप अनुसंधार्न के लिए कल्पित एक योजनार्, एक संरचनार् तथार् एक प्रणार्ली है, जिसक एकमार्त्र प्रयोजन शोध सम्बन्धी प्रश्नों क उत्तर प्रार्प्त करनार् तथार् प्रसरणों क नियंत्रण करनार् होतार् है।’’
  2. पी.वी. यंग (1977 : 12-13) के अनुसार्र, ‘‘क्यार्, कहार्ँ, कब, कितनार्, किस तरीके से इत्यार्दि के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए कियार् गयार् विचार्र अध्ययन की योजनार् यार् अध्ययन प्रार्रूप क निर्मार्ण करतार् है।’’
  3. आर.एल. एकॉफ (1953:5) के अनुसार्र, ‘‘निर्णय लिये जार्ने वार्ली परिस्थिति उत्पन्न होने के पूर्व ही निर्णय लेने की प्रक्रियार् को प्रार्रुप कहते हैं।’’

‘‘क्यार् तथ्य इकट्ठार् करनार् है, किनसे, कैसे और कब तक इकठ्ठार् करनार् है और प्रार्प्त तथ्यों को कैसे विश्लेषित करनार् है कि योजनार् शोध प्रार्रुप है।’’ (www.ojp.usdoj.gov/BJA/evaluation/glossary) स्पष्ट है कि शोध प्रार्रूप प्रस्तार्वित शोध की ऐसी रूपरेखार् होती है, जिसे वार्स्तविक शोध कार्य को प्रार्रम्भ करने के पूर्व व्यार्पक रूप से सोच-समझ के पश्चार्त् तैय्यार्र कियार् जार्तार् है। शोध की प्रस्तार्वित रूपरेखार् क निर्धार्रण अनेकों बिन्दुओं पर विचार्रोपरार्न्त कियार् जार्तार् है। इसे सरलतम रूप में पी.वी. यंग (1977) ने शोध सम्बन्धित विविध प्रश्नों के द्वार्रार् इस तरह स्पष्ट कियार् है-

  1. अध्ययन किससे सम्बन्धित है और आँकड़ों क प्रकार जिनकी आवश्यकतार् है? 
  2. अध्ययन क्यों कियार् जार् रहार् है?
  3. वार्ंछित आँकड़े कहार्ँ से मिलेंगे? 
  4. कहार्ँ यार् किस क्षेत्र में अध्ययन कियार् जार्येगार्? 
  5. कब यार् कितनार् समय अध्ययन में सम्मिलित होगार्? 
  6. कितनी सार्मग्री यार् कितने केसों की आवश्यकतार् होगी? 
  7. चुनार्वों के किन आधार्रों क प्रयोग होगार्?
  8. आँकड़ार् संकलन की कौन सी प्रविधि क चुनार्व कियार् जार्येगार्? 

इस तरह, निर्णय लेने में जिन विविध प्रश्नों पर विचार्र कियार् जार्तार् है जैसे क्यार्, कहार्ँ, कब, कितनार्, किस सार्धन से अध्ययन की योजनार् निर्धार्रित करते हैं। (पी.वी. यंग 1977: 12-13) न्यूयाक यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लार्स वेबसाइट (वॉट इज सोशल रिसर्च, चैप्टर 1 : 9-10) में शोध प्रार्रूप और शोध प्रार्रूप बनार्म पद्धति विषय पर विधिवत विचार्र व्यक्त कियार् गयार् है। उसे हम यहार्ँ प्रस्तुत कर रहे हैं। उसके अनुसार्र शोध प्रार्रूप को भवन निर्मार्ण से सम्बन्धित एक उदार्हरण के द्वार्रार् आसार्नी से समझार् जार् सकतार् है। भवन निर्मार्ण करते समय सार्मग्री क आर्डर देने यार् प्रोजेक्ट पूर्ण होने की तिथि निर्धार्रित करने क कोर्इ औचित्य नहीं है, जब तक कि हमें यह न मार्लूम हो कि किस प्रकार क भवन निर्मित होनार् है। पहलार् निर्णय यह करनार् है कि क्यार् हमें अति ऊँचे कार्यार्लयी भवन की, यार् मशीनों के निर्मार्ण के लिए एक फैक्टरी की, एक स्कूल, एक आवार्सीय भवन यार् एक बहुखण्डीय भवन की आवश्यकतार् है। जब तक यह नहीं तय हो जार्तार् हम एक योजनार् क खार्क तैय्यार्र नहीं कर सकते, कार्य योजनार् तैय्यार्र नहीं कर सकते यार् सार्मग्री क आर्डर नहीं दे सकते हैं। इसी तरह से, सार्मार्जिक अनुसन्धार्न को प्रार्रूप यार् अभिकल्प की आवश्यकतार् होती है यार् तथ्य संकलन के पूर्व यार् विश्लेषण शुरू करने के पूर्व एक संरचनार् की आवश्यकतार् होती है। एक शोध प्रार्रूप मार्त्र एक कार्य योजनार् (वर्क प्लार्न) नहीं है। यह प्रोजेक्ट को पूर्ण करने के लिए क्यार् करनार् है कि कार्य योजनार् क विस्तृत विवरण है। शोध प्रार्रूप क प्रकार्य यह सुनिश्चित करनार् है कि प्रार्प्त सार्क्ष्य हमें प्रार्रम्भिक प्रश्नों के यथार्सम्भव सुस्पष्ट उत्तर देने में सक्षम बनार्ये।

कार्य योजनार् बनार्ने के पूर्व यार् सार्मग्री आर्डर करने के पूर्व भवन निर्मार्तार् यार् वार्स्तुविद् को प्रथमत: यह निर्धार्रित करनार् जरूरी है कि किस प्रकार के भवन की जरूरत है, इसक उपयोग क्यार् होगार् और उसमें रहने वार्ले लोगों की क्यार् आवश्यकतार्एं हैं। कार्य योजनार् इससे निकलती है। इसी तरह से, सार्मार्जिक अनुसन्धार्न में निदर्शन, तथ्य संकलन की पद्धति (उदार्हरण के लिए प्रश्नार्वली, अवलोकन, दस्तार्वेज विश्लेषण) प्रश्नों के प्रार्रूप के मुद्दे सभी इस विषय के कि ‘मुझे कौन से सार्क्ष्य इकट्ठे करने हैं’, के सहार्यक/पूरक होते हैं।

गेरार्ल्ड आर. लेस्ली (1994 : 25-26) क कहनार् है कि, ‘‘शोध प्रार्रूप ब्लू प्रिन्ट है, जो परिवर्त्यों को पहचार्नतार् और तथ्यों को एकत्र करने तथार् उनक विवरण देने के लिए की जार्ने वार्ली कार्य प्रणार्लियों को अभिव्यक्त करतार् है।’’ शोध प्रार्रुप को अत्यन्त विस्तार्र से समझार्ते हुए सौमेन्द्र पटनार्यक (2006 : 31) ने लिखार् है कि, ‘‘शोध प्रार्रुप एक प्रकार की रूपरेखार् है, जिसे आपको शोध के वार्स्तविक क्रियार्न्वयन से पहले तैयार्र करनार् है। योजनार्बद्ध रूप से तैयार्र एक खार्क होतार् है जो उस रीति को बतलार्तार् है जिसमें आपने अपने शोध की कार्य योजनार् तैयार्र की है। आपके पार्स अपने शोध कार्य पर दो पहलुओं से विचार्र करने क विकल्प है, नार्मत: अनुभवजन्य पहलू और विश्लेषणपरक पहलू। ये दोनों ही पहलू एक सार्थ आपके मस्तिष्क में रहते हैं, जबकि व्यवहार्र में आपको अपनार् शोध कार्य दो चरणों में नियोजित करनार् है : एक सार्मग्री संग्रहण क चरण और दूसरार् उस सार्मग्री के विश्लेषण क चरण। आपकी मनोगत सैद्धार्न्तिक उन्मुखतार् और अवधार्रणार्त्मक प्रतिदर्शतार्एँ आपको इस शोध सार्मग्री के स्वरूप को निर्धार्रित करने में मदद करती हैं जो आपको एकत्र करनी है और कुछ हद तक यह समझने में भी कि आपको उन्हें कैसे एकत्र करनार् है। तदोपरार्न्त, अपनी सार्मग्री क विश्लेषण करते समय फिर से आमतौर पर समार्जिक यथाथ सम्बन्धी सैद्धार्न्तिक और अवधार्रणार्त्मक समझ के सहार्रे आपको अपने शोध परिणार्मों को स्पष्ट करने में और प्रस्तुत करने के वार्स्ते शोध सार्मग्री को वर्गीकृत करने में और विन्यार्स विशेष को पहचार्नने में दिशार्निर्देशन मिलतार् है।’’

यंग (1977 :131) क कहनार् है कि, ‘‘जब एक सार्मार्न्य वैज्ञार्निक मॉडल को विविध कार्यविधियों में परिणत कियार् जार्तार् है तो शोध प्रार्रुप की उत्पत्ति होती है। शोध प्रार्रुप उपलब्ध समय, कर्म शक्ति एवं धन, तथ्यों की उपलब्धतार् उस सीमार् तक जहार्ँ तक यह वार्ंछित यार् सम्भव हो उन लोगों एवं सार्मार्जिक संगठनों पर थोपनार् जो तथ्य उपलब्ध करार्येंगे, के अनुरूप होनार् चार्हिए।’’ र्इ.ए. सचमैन (1954 :254) क कहनार् है कि, ‘‘एकल यार् ‘सही’ प्रार्रुप जैसार् कुछ नही है शोध प्रार्रुप सार्मार्जिक शोध में आने वार्ले बहुत से व्यार्वहार्रिक विचार्रों के कारण आदेशित समझौते क प्रतिनिधित्व करतार् है। . . . . (सार्थ हीद्ध अलग-अलग कार्यकर्त्तार् अलग-अलग प्रार्रुप अपनी पद्वतिशार्स्त्रीय एवं सैद्धार्न्तिक प्रतिस्थार्पनार्ओं के पक्ष में लेकर आते हैं . . . . एक शोध प्रार्रुप विचलन क अनुसरण किए बिनार् कोर्इ उच्च विशिष्ट योजनार् नही है, अपितु सही दिशार् में रखने के लिए मागदर्शक स्तम्भों की श्रेणी है।’’ दूसरे शब्दों में, एक शोध प्रार्रुप काम चलार्ऊ होतार् है। अध्ययन जैसे-जैसे प्रगति करतार् है, नये पक्ष, नर्इ दशार्एं और तथ्यों में नयी सम्बन्धित कड़ियार्ँ प्रकाश में आती हैं, और परिस्थितियों की मार्ँग के अनुसार्र यह आवश्यक होतार् है कि योजनार् परिवर्तित कर दी जार्ये। योजनार् क लचीलार् होनार् जरूरी होतार् है। लचीलेपन क अभार्व सम्पूर्ण अध्ययन की उपयोगितार् को समार्प्त कर सकतार् है।

शोध प्रार्रुप के उद्देश्य

मैनहाइम (1977 : 142) के अनुसार्र शोध प्रार्रुप के पार्ँच उद्देश्य होते हैं-

  1. अपनी उपकल्पनार् क समर्थन करने और वैकल्पिक उपकल्पनार्ओं क खण्डन करने हेतु पर्यार्प्त सार्क्ष्य इकठ्ठार् करनार्। 
  2. एक ऐसार् शोध करनार् जिसे शोध की विषयवस्तु और शोध कार्यविधि की दृष्टि से दोहरार्यार् जार् सके। 
  3. परिवत्र्यों के मध्य सहसम्बन्धों को इस तरह से जार्ँचने में सक्षम होनार् जिससे सहसम्बन्ध ज्ञार्त हो सके। 
  4.  एक पूर्ण विकसित शोध परियोजनार् की भार्वी योजनार्ओं को चलार्ने के लिए एक मागदश्र्ार्ी अध्ययन की आवश्यकतार् को दिखार्नार्। 
  5. शोध सार्मग्रियों के चयन की उचित तकनीकों के चुनार्व द्वार्रार् समय और सार्धनों के अपव्यय को रोकने में सक्षम होनार्। 

एक अन्य विद्वार्न ने शोध प्रार्रूप के उद्देश्यों क उल्लेख कियार् है-

  1.  शोध विषय को परिभार्षित, स्पष्ट एवं व्यार्ख्यार् करनार्। 
  2. दूसरों को शोध क्षेत्र स्पष्ट करनार्। 
  3. शोध की सीमार् एवं परिधि प्रदार्न करनार्। 
  4. शोध के सम्पूर्ण परिदृश्य को प्रदार्न करनार्।
  5. तरीकों (modes) और परिणार्मों को बतलार्नार् 
  6. समय और संसार्धनों की सुनिश्चिततार्। 

शोध प्रार्रूप के घटक अंग 

शोध प्रार्रुप के उद्देश्यों से यह स्पष्ट है कि, यह शोध की वह युक्तिपूर्ण योजनार् होती है, जिसके अन्तर्गत विविध परस्पर सम्बन्धित अंग होते हैं, जिनके द्वार्रार् शोध सफलतार्पूर्वक सम्पार्दित होतार् है। पी.वी. यंग (1977 :13) ने शोध प्रार्रुप के अन्तर्गत निम्नार्ंकित घटक अंगों क उल्लेख कियार् है जो अन्तर्सम्बन्धित होते हैं तथार् परस्पर बहिष्कृत नही होते हैं-

  1. प्रार्प्त किये जार्ने वार्ले सूचनार्ओं के स्रोत,
  2. अध्ययन की प्रकृति, 
  3. अध्ययन के उद्देश्य, 
  4. अध्ययन क सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक संदर्श, 
  5. अध्ययन द्वार्रार् समार्हित भौगोलिक क्षेत्र, 
  6. लगने वार्ले समय के काल क निर्धार्रण, 
  7. अध्ययन के आयार्म, 
  8. आँकड़ार् संकलन क आधार्र,
  9. आंँकड़ार् संकलन हेतु प्रयोग की जार्ने वार्ली प्रविधियार्ँ। 

उपरोक्त शोध प्रार्रूप के अन्तर्सम्बन्धित और परस्पर समार्वेषित अंगों की संक्षिप्त विवेचनार् यहार्ँ आवश्यक प्रतीत होती है।

1. सूचनार् के स्रोत 

कोर्इ भी शोध कार्य सूचनार् के अनेकों स्रोत पर निर्भर करतार् है। मोटे तौर पर सूचनार् के इन स्रोतों को हम दो भार्गों में रख सकते हैं। (i) प्रार्थमिक स्रोत और  (ii) द्वैतियक स्रोत।
प्रार्थमिक स्रोत वे हैं जिनक शोधकर्तार् पहली बार्र स्वयं प्रयोग कर रहार् है, यार्नि शोधकर्तार् ने अपने अध्ययन क्षेत्र में जार् कर जिस तकनीक यार् उपकरण अथवार् विधि क प्रयोग कर मौलिक तथ्य प्रार्प्त कियार् है, वह प्रार्थमिक तथ्य कहलार्तार् है। वही दूसरों के द्वार्रार् जो सूचनार् प्रकाशित यार् अप्रकाशित अथवार् अन्य तरीकों से सर्व उपलब्ध हो, और जिसक उपयोग शोधकर्तार् कर रहार् हो वह द्वैतियक सूचनार् क स्रोत होतार् है। उल्लेखनीय है कि बहुधार् द्वैतियक सूचनार् क स्रोत एक समय में किसी शोधकर्तार् क प्रार्थमिक सूचनार् स्रोत होतार् है। अर्थपूर्ण तथ्यों की खोज में लगे समार्जशार्स्त्री उस प्रत्येक सूचनार् के स्रोत क उपयोग करने में हिचकिचार्हट महसूस नहीं करते हैं जिनसे भी शोध कार्य में जरार् भी प्रमार्ण यार् सहार्यतार् मिलने की संभार्वनार् होती है। सूचनार् के इन स्रोत को विधिक विद्वार्नों ने अलग-अलग प्रकारों में रखकर विश्लेषित कियार् है। बैगले (1938 : 202) ने सूचनार् के दो प्रमुख स्रोत क उल्लेख कियार् है- (i) प्रार्थमिक स्रोत और (ii) द्वैतियक स्रोत।

पी.वी. यंग (1977 : 136) क कहनार् है कि सार्मार्न्यत: सूचनार् के स्रोत दो होते हैं- (i) प्रलेखीय और (ii) क्षेत्रीय स्रोत। सूचनार् के प्रलेखीय (डॉक्यूमेन्टरी) स्रोत वे होते हैं, जो कि प्रकाशित और अप्रकाशित प्रलेखों, रिपोर्टों, सार्ंख्यिकी, पार्ण्डुलिपियों, पत्रों, डार्यरियों इत्यार्दि में निहित होते हैं। दूसरी तरफ, क्षेत्रीय स्रोत के अन्तर्गत वे जीवित लोग सम्मिलित होते हैं, जिन्हें उस विषय क पर्यार्प्त ज्ञार्न होतार् है यार् जिनक सार्मार्जिक दशार्ओं और परिवर्तनों के लम्बे समय तक क घनिष्ठ सम्पर्क होतार् है। ये लोग न केवल वर्तमार्न घटनार्ओं को विश्लेषित करने की स्थिति में होते हैं अपितु सार्मार्जिक प्रक्रियार्ओं की अवलोकनीय प्रवृत्तियों और साथक मील क पत्थर को बतार्ने की स्थिति में भी होते हैं।

लुण्डबर्ग (1951 : 122) ने सूचनार्ओं के दो स्रोत क उल्लेख कियार् है- (i) ऐतिहार्सिक स्रोत, और  (ii) क्षेत्रीय स्रोत।

    ऐतिहार्सिक स्रोत के अन्तर्गत प्रलेख, विविध कागजार्तों एवं शिलार्लेखों, भूर्तत्त्वीय स्तरों, उत्खनन से प्रार्प्त वस्तुओं को सम्मिलित करते हुए लुण्डबर्ग (1951:122) क कहनार् है कि, ‘‘ऐतिहार्सिक स्रोत उन अभिलेखों क प्रतिनिधित्व करते हैं जो भूतकाल की घटनार्एं अपने पीछे छोड़ गर्इ हैं, जिनकों की उन सार्धनों द्वार्रार् सुरक्षित रखार् गयार् है जो मनुष्य से परे हैं।’’ उदार्हरण के लिए हम उल्लेख कर सकते हैं उन विविध स्थार्नों क जहार्ँ पुरार्तत्त्वीय उत्खनन के पश्चार्त तत्कालीन समार्ज की विविध सूचनार्एँ प्रार्प्त हुर्इ है यार् विविध पुरार्तार्ित्त्वक संग्रहार्लयों में सुरक्षित रखे दस्तार्वेजों (सरकारी) एवं गैर सरकारी) क जिनक आज भी शोधकर्तार् अपने शोध कार्यों में व्यार्पक रूप से प्रयोग करते हैं। क्षेत्रीय स्रोत के अन्तर्गत लुण्डबर्ग ने जीवित मनुष्यों से प्रार्प्त विशिष्ट सूचनार्ओं तथार् क्रियार्शील व्यवहार्रों के प्रत्यक्ष अवलोकन को सम्मिलित कियार् है। उपरोक्त समस्त विवरण स्पष्ट करतार् है कि सूचनार्ओं के कर्इ स्रोत होते हैं, इन समस्त स्रोत को विद्वार्नों ने अपनी-अपनी तरह से विश्लेषित कियार् है। जो कुछ भी हो सूचनार्ओं के स्रोत जिन्हें प्रयोग में लार्यार् जार्तार् है, शोध प्रार्रूप क अंग होते हैं।

    2. अध्ययन की प्रकृति –

    पी.वी. यंग (1977 : 14) क कहनार् है कि, ‘‘अध्ययन की विशिष्ट प्रकृति क निर्धार्रण शुरू में और ठीक ठीक कर लेनार् चार्हिए, विशेषकर जब सीमित समय और कर्मशक्ति गलत शुरूआत को रोक रहे हों। शोध केस की प्रकृति पर ही अपने को केन्द्रित करते हुए उन्होंने मटिल्डार् वार्इट रिले (1963 : 3-31) की पुस्तक में विविध विद्वार्नों के अध्ययनों के उल्लेख क उदार्हरण देते हुए उन्होंने इस विषय को स्पष्ट कियार् है। क्यार् यह अध्ययन एक व्यक्ति से सम्बन्धित है (जैसार् शॉ की ‘दी जैक रोलर’ में है) कर्इ लोगों से सम्बन्धित है (विलियम वाइट की पुस्तक ‘स्ट्रीट कार्नर सोसार्यटी’ के विश्लेषण में डॉक, माइक और डैनी) यार् क्यार् अध्ययन किसी छोटे समूह पर संकेन्द्रित है (जैसार् कि पॉल हैरे एवं अन्य के अध्ययन ‘स्मार्ल ग्रुप’ यार् बहुत अधिक केसों पर संकेन्द्रित है, जैसार् कि यौन व्यवहार्र सम्बन्धित किन्से क अध्ययन। इस अनुभव के सार्थ की प्रत्येक शोध अध्ययन जटिल होतार् है, उसकी विशिष्ट प्रकृति क यथार्शीघ्र निर्धार्रण कर लेनार् चार्हिए।

    3. शोध अध्ययन क उद्देश्य –

    अध्ययन के उद्देश्यों क निर्धार्रण शोध प्रार्रूप क महत्वपूर्ण अंग है। अध्ययन की प्रकृति और प्रार्प्त किये जार्ने वार्ले लक्ष्यों के अनुसार्र उद्देश्य भिन्न-भिन्न होते हैं। कुछ शोध अध्ययनों क उद्देश्य विवरणार्त्मक तथ्य, यार् व्यार्ख्यार्त्मक तथ्य यार् तथ्य जिनसे सैद्धार्न्तिक रचनार् की व्युत्पत्ति हो, यार् तथ्य जो प्रशार्सकीय परिवर्तन यार् तुलनार् को बढ़ार्वार् दे, को इकट्ठार् करनार् होतार् है।

    अध्ययन क जो भी उद्देश्य हो अपने शोध की प्रकृति के अनुरूप शोध कार्य की तैय्यार्री आवश्यक है। शोध उद्दे
    श्य के अनुरूप उपकल्पनार् क निर्मार्ण और उसके परीक्षण की तैय्यार्री यार् शोध प्रश्नों क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है।

    4. सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक परिस्थिति –

    क्षेत्रीय अध्ययनों में उत्तरदार्तार्ओं की सार्मार्जिक सार्ंस्कृतिक परिस्थिति को जार्ननार् आवश्यक होतार् है। हम सभी जार्नते हैं कि स्थार्नीय आदर्श भिन्न-भिन्न होते हैं। इनमें इतनी ज्यार्दार् भिन्नत सम्भव है जिसकी हम कल्पनार् भी नहीं कर सकते हैं। व्यवहार्र प्रतिरूपों को समझने के लिए स्थार्नीय आदर्शों को जार्ननार् जरूरी है। पी.वी. यंग (1977 : 15) ने इस सन्दर्भ में उचित ही लिखार् है कि ‘‘एक व्यक्ति क निवार्स स्थार्न (प्रार्कृतिक वार्स) उसके जीवन के एक भार्ग से इतनार् घनिष्ठ होतार् है कि उसकी उपेक्षार् करने क मतलब शून्य में अध्ययन करनार् है।’’ उनक यह भी सुझार्व महत्त्वपूर्ण है कि, ‘‘प्रत्येक सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक क्षेत्र क अध्ययन उसके प्रार्कृतिक और भौगोलिक पक्ष के सन्दर्भ में भी कियार् जार्नार् चार्हिए।’’

    5. सार्मार्जिक-कालिक सन्दर्भ –

    यह निर्विवार्द सत्य है कि किसी व्यक्ति पर, समुदार्य पर, समार्ज पर ऐतिहार्सिक काल विशेष क प्रभार्व व्यार्पक रूप से पड़तार् है। किसी देश के कुछ निश्चित ऐतिहार्सिक काल को ही यहार्ं सार्मार्जिक-कालिक सन्दर्भ शब्द से सम्बोधित कियार् जार् रहार् है। कर्इ बार्र भार्रतीय अध्ययनों में औपनिवेशिक काल के प्रभार्वों क उल्लेख इसी क उदार्हरण मार्नार् जार् सकतार् है। अण्डमार्न-निकोबार्र द्वीप समूहों में बन्दी उपनिवेश काल यार् भार्रतवर्ष में वैदिक काल, मुगल काल इत्यार्दि कुछ विशिष्ट ऐतिहार्सिक कालों क समार्ज पर प्रभार्व से हम सभी परिचित हैं। इसलिए व्यक्ति को उसके सार्मार्जिक-कालिक सन्दर्भ यार्नि समय और स्थार्न के ऐतिहार्सिक विन्यार्स में देखार् जार्नार् चार्हिए।

    6.  अध्ययन के आयार्म और निदर्शन कार्यविधि –

    सार्मार्जिक शोध में अक्सर यह सम्भव नहीं होतार् है कि सम्पूर्ण समग्र से प्रार्थमिक तथ्य संकलन क कार्य कियार् जार्ये। ऐसी परिस्थिति में समग्र की कुछ इकार्इयों क वैज्ञार्निक आधार्र पर चयन कर लियार् जार्तार् है और तथ्य संकलन की उपयुक्त विधि के द्वार्रार् उनसे प्रार्थमिक तथ्य इकट्ठे कर लिये जार्ते हैं। ये कुछ चुनी हुर्इ इकार्इयार्ं ही निदर्शन कहलार्ती हैं। अच्छे निदर्शन को सम्पूर्ण समग्र क प्रतिनिधित्व करनार् चार्हिए तार्कि प्रार्प्त सूचनार्यें विश्वसनीय हों तथार् सम्पूर्ण समग्र क प्रतिनिधित्व कर सकें (यद्यपि निदर्शन के कुछ प्रकारों में इसकी कुछ कम संभार्वनार् होती है)। इकार्इयों क चयन निष्पक्ष रूप से पूर्वार्ग्रह रहित होकर करनार् चार्हिए। सम्पूर्ण समूह जिसमें से निदर्शन लियार् जार्तार् है ‘पार्पुलेशन’, ‘यूनिवर्स’ (समग्र) यार् ‘सप्लाइ’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। निदर्शन के कर्इ प्रकार होते हैं। मोटे तौर पर निदर्शन को दो प्रकारों- संभार्वनार्त्मक और असंभार्वनार्त्मक में रखार् जार्तार् है। जब समग्र की प्रत्येक इकार्इ के चुने जार्ने की समार्न सम्भार्वनार् हो तो उसे संभार्वनार्त्मक निदर्शन कहते हैं और यदि ऐसी समार्न संभार्वनार् न हो तो उसे असंभार्वनार्त्मक निदर्शन कहते हैं। संभार्वनार्त्मक और असंभार्वनार्त्मक निदर्शन के अन्तर्गत आने वार्ले विविध प्रकारों को प्रस्तुत कियार् जार् सकतार् है-

    निदर्शन

    संभार्वनार्त्मक निदर्शन   

    असंभार्वनार्त्मक निदर्शन
    (क) दैव निदर्शन       (क) सुविधार्नुसार्र निदर्शन
    (यार् देखार् और सार्क्षार्त्कार लियार्
    निदर्शन)
    (ख) क्रमबद्ध दैव निदर्शन  (ख) सोद्देशपूर्ण निदर्शन (नियत मार्त्रार्) 
    (ग) स्तरीत दैव निदर्शन  (ग) कोटार् निदर्शन 
    (घ) समूह दैव निदर्शन (घ) स्नोबार्ल निदर्शन
    (ड़) स्वनिर्णय निदर्शन 

              

              

    निदर्शन, इसके प्रकार, निदर्शन आकार, गुण एवं सीमार्ओं पर विस्तृत चर्चार् अन्यत्र अध्यार्य में की गर्इ है। यहार्ँ यह उल्लेखनीय है कि शोध प्रार्रूप को बनार्ते समय निदर्शन तथार् उसके आकार पर उपलब्ध समय और सार्धनों की सीमार्ओं के अन्तर्गत व्यार्पक सोच-विचार्र कियार् जार्तार् है। अध्ययन के उद्देश्यों के अनुसार्र तथार् समग्र की संख्यार् तथार् विशेषतार्ओं के अनुसार्र निदर्शन क प्रकार तथार् आकार अलग-अलग होतार् है। उत्तम एवं विश्वसनीय परिणार्म प्रार्प्त करने के लिए यथेष्ट एवं उत्तम निदर्शन क होनार् जरूरी होतार् है।

    सार्मार्जिक शोध कार्यों में सबसे जटिल प्रश्न यह उत्पन्न होतार् है कि निदर्शन क आकार क्यार् होगार्? कितने लोगों को उत्तरदार्तार्ओं के रूप में चयनित कियार् जार्येगार्? सम्पूर्ण समग्र क अध्ययन अक्सर समय और सार्धनों की सीमार्ओं के चलते सम्भव नहीं होतार् है। समुचित निदर्शन के निर्धार्रण की समस्यार् एक जटिल समस्यार् है। यद्यपि कर्इ विद्वार्नों ने इस सन्दर्भ में अपने-अपने सुझार्वों को दियार् है तथार् सार्ंख्यिकीविदों ने तो इसक सूत्र भी बनार् रखार् है, परन्तु इसके बार्वजूद भी समस्यार् किसी न किसी रूप में बनी ही रहती है।

    पी.वी. यंग (1977 : 17) यह मार्नती हैं कि, ‘‘एक परिपक्व शोधकर्तार् द्वार्रार् भी इस प्रश्न के उत्तर को देनार् कठिन है कि कितने केसों की जरूरत है।’’ पी.वी. यंग (1977 :17) ने अपनी पुस्तक में सार्ंख्यिकीविद् मार्रग्रेट हगुड़ (1953) द्वार्रार् सुझार्ये निदर्शन के आधार्रों क उल्लेख कियार् है। हगुड़ (1953 : 272) ने निदर्शन चयन के निम्नार्ंकित सुझार्व दिए हैं’- ‘‘(1) निदर्शन को समग्र क प्रतिनिधित्व करनार् चार्हिए ;अर्थार्त् उसे पूर्वार्ग्रह रहित होनार् चार्हिएद्ध; (2) विश्वसनीय परिणार्म प्रार्प्त करने के लिए निदर्शन पर्यार्प्त आकार क होनार् चार्हिए (अर्थार्त् दोष की विशिष्ट सीमार् तक जैसे मार्पार् जार्य);(3) निदर्शन इस तरह से संरचित कियार् जार्ये कि कुशल हो (अर्थार्त वैकल्पिक प्रार्रूप की तुलनार् में)।’’

    7.  तथ्य संकलन के लिए प्रयुक्त तकनीक – 

    शोध प्रार्रूप क एक महत्वपूर्ण अंग तथ्य संकलन की तकनीक है। शोध कार्य प्रार्रम्भ करने के पूर्व ही इस महत्वपूर्ण विषय पर शोध की प्रकृति और उत्तरदार्तार्ओं की विशेषतार्ओं के परिपे्रक्ष्य में व्यार्पक सोच-विचार्र के पश्चार्त् यह निर्णय लियार् जार्तार् है कि प्रार्थमिक तथ्य संकलन क कार्य किस प्रविधि के द्वार्रार् कियार् जार्येगार्। उल्लेखनीय है कि तथ्य संकलन की विविध प्रविधियार्ं हैं- जैसे अवलोकन, सार्क्षार्त्कार, प्रश्नार्वली, अनुसूची, वैयक्तिक अध्ययन (केस स्टडी) इत्यार्दि। इन सभी प्रविधियों की अपनी-अपनी विशेषतार्एँ तथार् सीमार्एँ हैं। तथ्य संकलन की सही तकनीक क प्रयोग शोध की गुणवत्तार्, विश्वसनीयतार् तथार् वैज्ञार्निकतार् निर्धार्रित करतार् है। उल्लेखनीय है कि इन प्रविधियों क प्रयोग प्रत्येक समार्ज एवं उत्तरदार्तार्ओं पर नहीं कियार् जार् सकतार् है।

    शोध प्रार्रूप क महत्व

    उपरोक्त विस्तृत व्यार्ख्यार् से शोध प्रार्रूप के महत्व क स्पष्ट अनुमार्न हो जार्तार् है। ब्लैक और चैम्पियन (1976=76.77) के शब्दों में कहार् जार्ये तो-

    1. शोध प्रार्रुप से शोध कार्य को चलार्ने के लिए एक रूप रेखार् तैयार्र हो जार्ती है।
    2. शोध प्रार्रूप से शोध की सीमार् और कार्य क्षेत्र परिभार्षित होतार् है। 
    3. शोध प्रार्रूप से शोधकर्तार् को शोध को आगे बढ़ार्ने वार्ली प्रक्रियार् में आने वार्ली समस्यार्ओं क पूर्वार्नुमार्न लगार्ने क अवसर प्रार्प्त होतार् है।

    शोध प्रार्रूप बनार्म तथ्य संकलन की पद्धति 

    शोध प्रार्रूप और तथ्य संकलन की पद्धतियों के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि शोध प्रार्रूप आँकड़े यार् तथ्य इकट्ठे किये जार्ने वार्ली पद्धति से अलग होतार् है। ‘‘यह देखनार् असार्मार्न्य नहीं है कि शोध प्रार्रूप को तथ्य संकलन के तरीके के रूप में देखार् जार्तार् है बजार्ये इसके कि जार्ँच की ताकिक संरचनार् के।’’

    शोध प्रार्रूप और तथ्य संकलन की पद्धति में समार्नतार् क भ्रम होने क कारण कुछ विशेष प्रार्रूपों को किसी विशेष तथ्य संकलन की पद्धति से जोड़कर देखनार् है। उदार्हरण के लिए वैयक्तिक अध्ययनों को सहभार्गी अवलोकन और क्रार्स सेक्शनल सर्वे को प्रश्नार्वलियों से समीकृत कियार् जार्तार् है। वार्स्तविकतार् यह है कि किसी भी प्रार्रूप के लिए तथ्य किसी भी तथ्य संकलन की पद्धति से इकट्ठार् कियार् जार् सकतार् है। विश्वसनीय तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं न कि उन्हें इकट्ठार् करने क तरीका। तथ्य कैसे इकट्ठार् कियार् गयार्, यह प्रार्रूप की ताकिकतार् के लिए अप्रार्संगिक/असम्बद्ध है।

    न्यूयाक यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लार्स वेबसार्इट (पृ. 10) में ‘शोध प्रार्रूप क्यार् है?’ अध्यार्य के अन्तर्गत शोध प्रार्रूप और तथ्य संकलन की पद्धतियों में सम्बन्ध को दर्शार्यार् गयार्-

    इसी तरह से प्रार्रुपों को अक्सर गुणार्त्मक और गणनार्त्मक शोध पद्वतियों से जोड़ार् जार्तार् है। सार्मार्जिक सर्वेक्षण और प्रयोगों को अक्सर गुणार्त्मक शोध के मुख्य उदार्हरणों के रुप में देखार् जार्तार् है और उनक मूल्यार्ंकन सार्ंख्यिकीय, गुणार्त्मक शोध पद्वतियों और विश्लेषण की क्षमतार् और कमजोरियों के विरुद्ध कियार् जार्तार् है। दूसरी तरफ वैयक्तिक अध्ययन को अक्सर गुणार्त्मक शोध के मुख्य उदार्हरण के रूप में देखार् जार्तार् है- जोकि तथ्यों के विवेचनार्त्मक उपार्गम क प्रयोग करतार् है, ‘चीजों’ क अध्ययन उनके सन्दर्भ के अन्तर्गत करतार् है और लोग अपनी परिस्थितियों क जो वस्तुगत अर्थ लगार्ते हैं को विचार्र करतार् है। किसी विशिष्ट शोध प्रार्रुप को गुणार्त्मक यार् गणनार्त्मक पद्वति से जोड़नार् भ्रार्न्तिपूर्ण यार् गलत है। वैयक्तिक अध्ययन प्रार्रुप की एक सम्मार्नित हस्ती यिन (1993) ने वैयक्तिक अध्ययन के लिए गुणार्त्मक/गणनार्त्मक विभेद की अप्रार्संगिकतार् पर जोर दियार् है। उनक कहनार् है कि वैयक्तिक अध्ययन पद्वति तथ्य संकलन के किसी विशिष्ट स्वरूप को अन्तर्निहित नहीं करती है। वह गुणार्त्मक यार् गणनार्त्मक कोर्इ भी हो सकती है

    न्यूयाक यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लार्स वेबसार्इट (पृ. 11.12) में ‘शोध प्रार्रूप क्यार् है?’ अध्यार्य के अन्तर्गत व्यार्ख्यार् में संशयवार्दी उपार्गम को अपनार्ने की आवश्यकतार् क उल्लेख करते हुए लिखार् गयार् है कि, ‘‘शोध प्रार्रुप की आवश्यकतार् शोध के संशयवार्दी उपार्गम के तने और इस दृष्टिकोण से कि वैज्ञार्निक ज्ञार्न हमेशार् अस्थार्यी होतार् है, से निकलती है। शोध प्रार्रुप क उद्देश्य शोध के बहु सार्क्ष्यों की अस्पष्टतार् को कम करनार् होतार् है।’’

    हम हमेशार् कुछ सार्क्ष्यों को लगभग सभी सिद्धार्न्तों के सार्थ निरन्तर पार् सकते हैं। जबकि हमें सार्क्ष्यों के प्रति संशयपूर्ण होनार् चार्हिए और बजार्ये उन सार्क्ष्यों को प्रार्प्त करनार् जो हमार्रे सिद्धार्न्त के सार्थ निरन्तर उपलब्ध हों। हमें ऐसे सार्क्ष्यों को प्रार्प्त करनार् चार्हिए जो सिद्धार्न्त के अकाट्य परीक्षण को प्रदार्न करते हों।

    शोध प्रार्रुप निर्मित करते समय यह आवश्यक है कि हमें आवश्यक सार्क्ष्यों के प्रकारों को चिन्हित कर लेनार् चार्हिए जिससे कि शोध प्रश्नों क उत्तर विश्वार्सोंत्पार्दक हो। इसक तार्त्पर्य यह है कि हमें मार्त्र उन सार्क्ष्यों को इकट्ठार् नहीं करनार् चार्हिए जो किसी विशिष्ट सिद्धार्न्त यार् व्यार्ख्यार् के सार्थ लगार्तार्र बने हुए हों। शोध इस प्रकार से संरचित कियार् जार्नार् चार्हिए कि उससे सार्क्ष्य वैकल्पिक प्रतिद्वन्दी व्यार्ख्यार् दें और हमें यह चिन्हित करने में सक्षम बनार्ये कि कौन सी प्रतिस्पर्द्धी व्यार्ख्यार् आनुभविक रूप से ज्यार्दार् अकाट्य है। इसक यह भी तार्त्पर्य है कि हमें अपने प्रिय सिद्धार्न्त के समर्थन वार्ले सार्क्ष्यों को ही मार्त्र नहीं देखनार् चार्हिए। हमें उन सार्क्ष्यों को भी देखनार् चार्हिए जिनमें यह क्षमतार् हो कि वे हमार्री वरीयतार्पूर्ण व्यार्ख्यार् को नकार सकें।

    शोध प्रार्रुप के प्रकार

    शोध प्रार्रुपों के कर्इ प्रकार होते हैं। विविध विद्वार्नों ने शोध प्रार्रुपों के कुछ तो एक समार्न और कुछ अलग प्रकार के प्रकारों क उल्लेख कियार् है। उदार्हरण के लिए सुसन कैरोल (2010:1) ने शोध प्रार्रुप के आठ प्रकारों क उल्लेख कियार् है। ये हैं-

    1. ऐतिहार्सिक शोध प्रार्रुप (Historical Research Design)
    2. वैयक्तिक और क्षेत्र शोध प्रार्रुप (Case and Field Research Design) 
    3. विवरणार्त्मक यार् सर्वेक्षण शोध प्रार्रुप (Descriptive or Survey Research Design) 
    4. सह सम्बन्धार्त्मक यार् प्रत्यार्शित शोध प्रार्रुप (Correlational or Prospective Research Design)
    5. कारणार्त्मक, तुलनार्त्मक यार् एक्स पोस्ट फैक्टों शोध प्रार्रुप (Causal Comparative or Ex- Post Facto Research Design) 
    6. विकासार्त्मक यार् समय श्रेणी शोध प्रार्रुप (Developmental or Time Series Research Design) 
    7. प्रयोगार्त्मक शोध प्रार्रुप (Experimental Research Design)
    8. अर्द्ध प्रयोगार्त्मक शोध प्रार्रुप (Quasi Experimental Research Design) 

    न्यूयाक यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लार्स वेबसार्इट (2010 : 10) में ‘शोध प्रार्रूप क्यार् है?’ अध्यार्य के अन्तर्गत चार्र प्रकार के शोध प्रार्रुपों क उल्लेख कियार् गयार् है-

    1. प्रयोगार्त्मक (Experimental) 
    2. वैयक्तिक अध्ययन (Case Study) 
    3. अनुलम्ब प्रार्रूप (Longitudinal) 
    4. अनुप्रस्थ काट प्रार्रुप (Cross-Sectional Design) 

    कुछ विद्वार्नों ने अनेकों प्रकारों क उल्लेख कियार् है। जो कुछ भी हो मोटे तौर पर शोध प्रार्रुपों को चार्र महत्वपूर्ण प्रकारों में विभक्त कियार् जार् सकतार् है-

    1. विवरणार्त्मक प्रार्रुप यार् वर्णनार्त्मक शोध प्रार्रुप। 
    2. व्यार्ख्यार्त्मक प्रार्रुप 
    3. अनवेषणार्त्मक प्रार्रुप, और 
    4. प्रयोगार्त्मक प्रार्रुप 

    किसी विशिष्ट प्रार्रूप क चयन शोध की प्रकृति पर मुख्यत: निर्भर करतार् है। कौन सी सूचनार् चार्हिए, कितनी विश्वसनीय सूचनार् चार्हिए, प्रार्रूप की उपयुक्ततार् क्यार् है, लार्गत कितनी आयेगी, इत्यार्दि कारकों पर भी प्रार्रूप चयन निर्भर करतार् है।

    विवरणार्त्मक यार् वर्णनार्त्मक शोध प्रार्रूप 

    जैसार् कि नार्म से ही स्पष्ट है इस प्रार्रुप में अध्ययन विषय़ के सम्बन्ध में प्रार्प्त सभी प्रार्थमिक तथ्यों क यथार्वत् विवरण प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। इस प्रार्रुप क मुख्य उद्देश्य अध्ययन की जार् रही इकार्इ, संस्थार्, घटनार्, समुदार्य यार् समार्ज इत्यार्दि से सम्बन्धित पक्षों क हूबहू वर्णन कियार् जार्तार् है। यह प्रार्रूप वैसे तो अत्यन्त सरल लगतार् है किन्तु यह दृढ़ एवं अलचीलार् होतार् है इसमें विशेष सार्वधार्नी अपेक्षित होती है। इस बार्त पर विशेष ध्यार्न दियार् जार्नार् चार्हिए कि निदर्शन पर्यार्प्त एवं प्रतिनिधित्वपूर्ण हो। प्रार्थमिक तथ्य संकलन की प्रविधि सटीक हो तथार् प्रार्थमिक तथ्य संकलन में किसी भी प्रकार से पूर्वार्ग्रह यार् मिथ्यार् झुकाव न आने पार्ये। अध्ययन समस्यार् के विषय में व्यार्पक तथ्यों को इकठ्ठार् कियार् जार्तार् है, इसलिए ऐसी सतर्कतार् बरतनी चार्हिए कि अनुपयोगी एवं अनार्वश्यक तथ्यों क संकलन न होने पार्ये। अध्ययन पूर्ण एवं यथाथ हो और अध्ययन समस्यार् क वार्स्तविक चित्रण हो इसके लिए विश्वसनीय तथ्यों क होनार् नितार्न्त आवश्यक है।

    वर्णनार्त्मक शोध क उद्देश्य मार्त्र अध्ययन समस्यार् क विवरण प्रस्तुत करनार् होतार् है। इसमें नवीन तथ्यों की खोज यार् कार्य-कारण व्यार्ख्यार् पर जोर नहीं दियार् जार्तार् है। इस प्रार्रुप में किसी प्रकार करके प्रयोग भी नही किए जार्ते हैं। इसमें अधिकांशत: सम्भार्वित निदर्शन क ही प्रयोग कियार् जार्तार् है। इसमें तथ्यों के विश्लेषण में क्लिष्ट सार्ंख्यिकीय विधियों क भी प्रयोग सार्मार्न्यत: नहीं कियार् जार्तार् है।

    इसमें शोध विषय के बार्रे में शोधकर्तार् को अपेक्षार्कृत यथेष्ट जार्नकारी रहती है इसलिए वह शोध संचार्लन सम्बन्धी निर्णयों को पहले ही निर्धार्रित कर लेतार् है। वर्णनार्त्मक शोध प्रार्रूप के अलग से कोर्इ चरण नही होते हैं। सार्मार्न्यत: सार्मार्जिक अनुसंधार्न के जो चरण हैं, उन्हीं क इसमें पार्लन कियार् जार्तार् है। सम्पूर्ण एकत्रित प्रार्थमिक सार्मग्री के आधार्र पर ही अध्ययन सम्बन्धित निष्कर्ष निकाले जार्ते हैं एवं आवश्यकतार्नुसार्र सार्मार्न्यीकरण प्रस्तुत किये जार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।

    1. व्यार्ख्यार्त्मक शोध प्रार्रूप –

    शोध समस्यार् की कारण सहित व्यार्ख्यार् करने वार्लार् प्रार्रूप व्यार्ख्यार्त्मक शोध प्रार्रुप कहलार्तार् है। व्यार्ख्यार्त्मक शोध प्रार्रुप की प्रकृति प्रार्कृतिक विज्ञार्नों की प्रकृति के समार्न ही होती है, जिसमें किसी भी वस्तु, घटनार् यार् परिस्थिति क विश्लेषण ठोस कारणों के आधार्र पर कियार् जार्तार् है। सार्मार्जिक तथ्यों की कार्य-कारण व्यार्ख्यार् यह प्रार्रूप करतार् है। इस प्रार्रुप में विविध उपकल्पनार्ओं क परीक्षण कियार् जार्तार् है तथार् परिवत्र्यों में सम्बन्ध और सहसम्बन्ध ढूढ़ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।

    2. अन्वेषणार्त्मक शोध प्रार्रूप –

    जब सार्मार्जिक अनुसंधार्न क मुख्य उद्देश्य अध्ययन समस्यार् के सम्बन्ध में नवीन तथ्यों को उद्घार्टित करनार् हो तो इस प्रार्रुप क प्रयोग कियार् जार्तार् है। इसमें अध्ययन समस्यार् के वार्स्तविक कारकों एवं तथ्यों क पतार् नही होतार् है। अध्ययन के द्वार्रार् उनक पतार् लगार्यार् जार्तार् है। चूँकि इसमें कुछ ‘नयार्’ खोजार् जार्तार् है इसलिए इसे अन्वेषणार्त्मक शोध प्रार्रुप कहार् जार्तार् है। इस प्रार्रूप द्वार्रार् सिद्धार्न्त क निर्मार्ण होतार् है। 34 कभी-कभी अन्वेषणार्त्मक और व्यार्ख्यार्त्मक शोध प्रार्रुप को एक ही मार्न लियार् जार्तार् है। कर्इ विद्वार्नों ने तो व्यार्ख्यार्त्मक शोध प्रार्रुप क उल्लेख तक नहीं कियार् है। सूक्ष्म दृष्टि से देखार् जार्ये तो यह कहार् जार् सकतार् है कि जिस सार्मार्जिक शोध में कार्य- कारण सम्बन्धों पर बल देने की कोशिश की जार्ती है, वह व्यार्ख्यार्त्मक शोध प्रार्रुप के अन्तर्गत आतार् है, और जिसमें नवीन तथ्यों यार् कारणों द्वार्रार् विषय को स्पष्ट कियार् जार्तार् है, उसे अन्वेषणार्त्मक शोध प्रार्रुप के अन्तर्गत रखते हैं। इसमें शोधकर्तार् को अध्ययन विषय के बार्रे में सूचनार् नही रहती है। द्वैतियक स्रोतों के द्वार्रार् भी वह उसके विषय में सीमित ज्ञार्न ही प्रार्प्त कर पार्तार् है। अज्ञार्त तथ्यों की खोज करने के कारण यार् विषय के सम्बन्ध में अपूर्ण ज्ञार्न रखने के कारण इस प्रकार के शोध प्रार्रुप में सार्मार्न्यत: उपकल्पनार्एँ निर्मित नहीं की जार्ती हैं। उपकल्पनार्ओं के स्थार्न पर शोध प्रश्नों क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है और उन्हीं शोध प्रश्नों के उत्तरों की खोज द्वार्रार् शोध कार्य सम्पन्न कियार् जार्तार् है।

    विलियम जिकमण्ड (1988 : 73) ने अन्वेषणार्त्मक शोध के तीन उद्देश्यों क वर्णन कियार् है (1) परिस्थिति क निदार्न करनार् (2) विकल्पों को छार्ँटनार् तथार्, (3) नये विचार्रों की खोज करनार्। सरन्तार्कोस (1988) के अनुसार्र सम्भार्व्यतार्, सुपरिचितिकरण, नवीन विचार्र, समस्यार् के निरुपण तथार् परिचार्लनीकरण के कारण अन्वेषणार्त्मक शोध प्रार्रुप को अपनार्यार् जार्तार् है। वार्स्तव में जहोदार् तथार् अन्य (1959 : 33) ने ठीक ही कहार् है कि, ‘‘अन्वेषणार्त्मक अनुसन्धार्न अनुभव को प्रार्प्त करने के लिए आवश्यक है जो कि अधिक निश्चित खोज के लिए उपयुक्त उपकल्पनार् के निर्मार्ण में सहार्यक हो।’’

    सार्मार्जिक समस्यार् के अन्तर्निहित कारणों को खोजने के कारण कारण इस प्रार्रुप में लचीलार्पन होनार् जरुरी है। इसमें तथ्यों की प्रकृति अधिकांशत: गुणार्त्मक होती है, इसलिए अधिक से अधिक तथ्यों एवं सूचनार्ओं को प्रार्प्त करने की कोशिश की जार्ती है। तथ्य संकलन की प्रविधि इसकी प्रकृति के अनुरूप ही होनी चार्हिए। समय और सार्धन क भी ध्यार्न रखनार् चार्हिए।

    3. प्रयोगार्त्मक शोध प्रार्रुप –

    ऐसार् शोध प्रार्रुप जिसमें अध्ययन समस्यार् के विश्लेषण हेतु किसी न किसी प्रकार क ‘प्रयोग’ समार्हित हो, प्रयोगार्त्मक शोध प्रार्रुप कहलार्तार् है। यह प्रार्रुप नियंत्रित स्थिति में जैसे कि प्रयोगशार्लार्ओं में ज्यार्दार् उपयुक्त होतार् है। सार्मार्जिक अध्ययनों में सार्मार्न्यत: प्रयोगशार्लार्ओं क प्रयोग नही होतार् है। उनमें नियंत्रित समूह और अनियंत्रित समूहों के आधार्र पर प्रयोग किये जार्ते हैं। इस प्रकार के प्रार्रुप क प्रयोग ग्रार्मीण समार्जशार्स्त्र और विशेषकर कृषि सम्बन्धी अध्ययनों में ज्यार्दार् होतार् है। वैसे औद्योगिक समार्जशार्स्त्र में वेस्टन इलेक्ट्रिक कम्पनी के हार्थोर्न वक्र्स में हुए प्रयोग काफी चर्चित रहे हैं। ग्रार्मीण प्रयोगार्त्मक अध्ययनों में प्रयोगों के आधार्र पर यह पतार् लगार्यार् जार्तार् है कि संचार्र मार्ध्यमों क क्यार् प्रभार्व पड़ रहार् है, योजनार्ओं क लार्भ लेने वार्लों और न लेने वार्लों की सार्मार्जिक-आर्थिक प्रस्थिति में क्यार् अन्तर आयार् है, इत्यार्दि इत्यार्दि। इसी प्रकार के बहुत से विषयों/प्रभार्वों को इस प्रार्रूप के द्वार्रार् स्पष्ट करने की कोशिश की जार्ती है। परिवत्र्यों के बीच कारणार्त्मक सम्बन्धों क परीक्षण इसके द्वार्रार् प्रार्मार्णिक तरीके से हो पार्तार् है।

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