शैक्षिक निर्देशन क्यार् है ?

ब्रेवर ने शैक्षिक निर्देशन की परिभार्षार् देते हुए कहार् है- ‘‘शैक्षिक निर्देशन व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहार्यतार् प्रदार्न करने क सचेतन प्रयत्न है’’, ‘‘शिक्षण यार् अधिगम के लिए किए गए सभी प्रयत्न शैक्षिक निर्देशन के अंग हैं।’’ ब्रेवर के अनुसार्र विद्यार्लय में प्रदार्न की जार्ने वार्ली प्रत्येक प्रकार की सहार्यतार् शैक्षिक निर्देशन है। ब्रेवर इस प्रकार शैक्षिक निर्देशन तथार् संगठित शिक्षार् में कोर्इ अन्तर नहीं पार्ते हैं।

जोन्स ने शैक्षिक निर्देशन की परिभार्षार् इस प्रकार दी है, ‘‘शैक्षिक निर्देशन क सम्बन्ध विद्यार्लय, पार्ठ्यक्रम, पार्ठ्य विषय और विद्यार्लय जीवन के चयन तथार् अनुकूलन हेतु छार्त्रों को दी जार्ने वार्ली सहार्यतार् से है।’’ लेकिन जोन्स शैक्षिक निर्देशन तथार् शिक्षण को एक ही मार्नते हैं। एक स्थार्न पर वह कहते हैं, ‘‘प्रभार्वशार्ली शिक्षण जो कि निर्देशन भी है, समार्ज तथार् विद्यार्लय से ही प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है।’’ जोन्स से मिलती-जुलती परिभार्षार् होपकिंस द्वार्रार् दी गयी है, ‘‘निर्देशन समस्त उचित अधिगम क एक अंग है अतएव अधिगम परिस्थितियों के कुशल प्रबन्ध में निर्देशन केन्द्रित होनार् चार्हिए।’’

आर्थर र्इ0 ट्रेक्सलर के अनुसार्र, ‘‘निर्देशन प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की योग्यतार्एं, रूचियों और व्यक्तित्व सम्बन्धित गुणों को समझने, उनक सम्भार्वित विकास करने, उनको जीवन के उद्देश्यों से सम्बन्धित करने तथार् अन्त में प्रजार्तार्ंत्रिक, सार्मार्जिक व्यवस्थार् के योग्य नार्गरिक की भार्ंति पूर्ण तथार् परिपक्व स्वनिर्देशन की स्थिति तक पहुंचने के योग्य बनार्तार् है। अत: निर्देशन विद्यार्लय के प्रत्येक पहलू जैसे पार्ठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, निरीक्षण, अनुशार्सन, उपस्थिति की समस्यार्एं, पार्ठ्य सहगार्मी क्रियार्एं, स्वार्स्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रम तथार् समार्ज के सम्बन्ध से सम्बन्धित है।’’ ट्रेक्सलर ने अपनी परिभार्षार् के प्रार्रम्भ में तो निर्देशन क स्पष्ट रूप रखार् है, परन्तु अन्त में उसने निर्देशन को विद्यार्लय के सभी कार्यों से जोड़ार् है।

रूथ स्ट्रेंग के अनुसार्र ‘‘व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदार्न करने क मुख्य उद्देश्य छार्त्र को उपयोगी कार्यक्रम क चयन तथार् उसमें प्रगति करने में सहार्यतार् देनार् है।’’

जी0र्इ0 मार्यर्स के अनुसार्र, ‘‘शैक्षिक निर्देशन एक ऐसी प्रक्रियार् है जो एक ओर तो विशिष्ट गुण वार्ले छार्त्रों में और दूसरी ओर अवसरों और आवश्यकतार्ओं के विभिन्न समूहों में ऐसार् सम्बन्ध स्थार्पित करती है, जिससे व्यक्ति के विकास और उसकी शिक्षार् के लिए अनुकूल परिस्थितियों क निर्मार्ण होतार् है।’’ मार्यर्स द्वार्रार् दी गर्इ परिभार्शार् द्वार्रार् यह स्पष्ट कियार् गयार् है कि निर्देशन द्वार्रार् छार्त्र की विशेषतार्ओं तथार् शैक्षिक अवसरों के मध्य सम्बन्ध स्थार्पित कियार् जार्तार् है।

शैक्षिक निर्देशन  की आवश्यकतार्

मनोवैज्ञार्निक अनुसंधार्न के आधार्र पर शिक्षार् के क्षेत्र में पहले की अपेक्षार् अब अधिक परिवर्तन हुए हैं। व्यक्ति तथार् समार्ज की आवश्यकतार्ओं के आधार्र पर शिक्षार् के उद्देश्य निश्चित होते हैं। समार्ज अधिक जटिल होतार् गयार्, विचार्रधार्रार् में परिवर्तन हुए। उसके अनुसार्र ही शिक्षार् के उद्देश्य तथार् उन उद्देश्यों तक पहुंचने की विधि में भी परिवर्तन हुए। हमार्रे देश में भी प्रार्थमिक तथार् मार्ध्यमिक शिक्षार् के क्षेत्र में सुधार्र तथार् पुर्नसंगठन हो रहार् है। वर्तमार्न शिक्षार्-प्रणार्ली क प्रमुख दोष यह है कि यह मनुष्य को वार्स्तविक जीवन के लिए तैयार्र नही करती है। इन दृष्टियों से भी शैक्षिक निर्देशन आवश्यक है।

1. पार्ठ्य-विषयों क चुनार्व – 

‘मार्ध्यमिक शिक्षार् आयोग’ (1052-53) ने अपने प्रतिवेदन में विविध, पार्ठ्यक्रम क सुझार्व दियार् है। छार्त्रों में जब व्यक्तिगत विभिन्नतार् पार्यी जार्ती है, उनकी क्षमतार्एं, योग्यतार्एं, रूचियार्ं समार्न नही होती, तो उनको एक ही पार्ठ्यक्रम क अध्ययन करार्नार् उचित नही है। उस प्रतिवेदन के अनुसार्र कुछ आन्तरिक विषय तथार् इनके अतिरिक्त कुछ वैकल्पिक विषय रखे गये हैं, जिनको 7 वर्गों में विभार्जित कियार् गयार् है। इन वर्गों को चुनार्व करनार् एक कठिन कार्य है। यहार्ँ विद्यार्लयों में छार्त्रों को विषयों के चयन करते समय किसी प्रकार क पथ-प्रदर्शन नही दियार् जार्तार् है। छार्त्रों को स्वयं के तथार् पार्ठ्यक्रम के सम्बन्ध में कोर्इ ज्ञार्न नही होतार् है। वे नही जार्नते हैं कि किस विषय क किस वृत्ति से सम्बन्ध है। ये छार्त्र अपने मार्तार्-पितार् के परार्मर्श से यार् स्वयं उन विषयों को चुन लेते हैं, जो उनको रूचिकर यार् सरल दिखते हैं। इस प्रकार गलत पार्ठ्यक्रम क चुनार्व करने से छार्त्र अवरोधन तथार् अपव्यय की समस्यार् को बढ़ार्ते हैं। गलत पार्ठ्यक्रम क चुनार्व मुख्यत: दो कारणों से होतार् है :

  1. कम योग्यतार् तथार् उच्च महत्वार्कांक्षार् के कारण पार्ठ्य-विषयों क गलत चुनार्व करनार्। बहुत से छार्त्र, जिनकी बुद्धि-लब्धि कम होती है, विज्ञार्न यार् गणित आदि जैसे कठिन विषय चुन लेते हैं। इसक दुष्परिणार्म एक ही कक्षार् में बार्र-बार्र अनुत्तीर्ण होनार् होतार् है।
  2. उच्च योग्यतार् तथार् निम्न महत्वार्कांक्षार् भी गम्भीर समस्यार्एं उत्पन्न करती हैं। अधिकांश छार्त्र प्रखर बुद्धि के होने पर सरल विषय चुन लेते है। इस तरह उनकी प्रखर बुद्धि क लार्भ रार्ष्ट्र यार् स्वयं उस छार्त्र को नही मिल पार्तार् है। इसको रोकने के लिए शैक्षिक निर्देशन अति आवश्यक है।
    1. 2. अग्रिम शिक्षार् क निश्चय – 

    हमार्रे देश में शैक्षिक निर्देशन के अभार्व से छार्त्र अग्रिम शिक्षार् क उचित निश्चय नही कर पार्ते हैं। हाइस्कूल परीक्षार् में सफलतार् प्रार्प्त करने के उपरार्न्त छार्त्रों के लिए यह निर्णय करनार् कठिन हो जार्तार् है कि उनको व्यार्वसार्यिक विद्यार्लय में, औद्योगिक विद्यार्लय में यार् व्यार्पार्रिक विद्यार्लय में कहार्ँ जार्नार् चार्हिए। कभी-कभी छार्त्र गलत विद्यार्लयों में प्रवेश प्रार्प्त कर लेते हैं। ऐसे विद्यार्लयों में बार्द में वे समार्योजित नही हो पार्ते हैं। छार्त्रों को उचित अग्रिम शिक्षार् क निर्णय लेने के लिए शैक्षिक पथ-प्रदर्शन अवश्य दियार् जार्ए।

    3. अपव्यय तथार् अवरोधन को दूर करनार् – 

    भार्रत में प्रार्थमिक शिक्षार् के स्तर पर अधिक अपव्यय होतार् है। भार्रतीय संविधार्न के अनुसार्र 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बार्लकों के लिए शिक्षार् अनिवाय की गयी है लेकिन अधिकांश छार्त्र स्थार्यी सार्क्षरतार् प्रार्प्त किए बिनार् ही विद्यार्लय छोड़ देते हैं। बार्ह्य परीक्षार्ओं में अनुत्तीर्ण होने वार्ले छार्त्रों की संख्यार् दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जार् रही है। यह अवरोधन भी दूसरे रूप में समय, धन तथार् शक्ति क अपव्यय है। अपव्यय को दूर करने के लिए आवश्यक है कि छार्त्रों को निर्देशन दियार् जार्नार् चार्हिए।

    4. नवीन विद्यार्लय में समार्योजन हेतुु – 

    बहुत से छार्त्र जब नवीन विद्यार्लय मे प्रवेश लेते हैं तो उनको वहार्ं के नियमों क ज्ञार्न न होने से वे नवीन वार्तार्वरण में अपने को समार्योजित करने में असफल पार्ते हैं। भार्रत में यह समस्यार् विकट रूप धार्रण किये हुए है। यहार्ं की अधिकांश जनसंख्यार् गार्ंव में निवार्स करती है। इन गार्ंवों में उच्च शिक्षार् क कोर्इ प्रबन्ध नही होतार् है। ग्रार्मीण वार्तार्वरण में पले हुए छार्त्र जब नगरीय क्षेत्र के विद्यार्लयों में प्रवेश प्रार्प्त करते हैं, तो उनको इन विद्यार्लयों में नवीन वार्तार्वरण मिलतार् है। अधिकांश छार्त्र नवीन वार्तार्वरण में समार्योजित न होने पर अध्ययन छोड़कर गार्ंवों को लौट जार्ते हैं। शैक्षिक निर्देशन उपलब्ध होने पर छार्त्रों क कुसमार्योजन रोक जार् सकतार् हैं।

    5. व्यवसार्योंं क ज्ञार्न देनार् – 

    स्वतत्रंतार् प्रार्प्ति के उपरार्न्त देश के आर्थिक तथार् सार्मार्जिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनार्एं बनाइ गर्इ है। इन पंचवर्षीय योजनार्ओं ने हमार्रे नवयुवकों के लिए अवसरों क भण्डार्र खोल दियार् है इन नवीन अवसरों क ज्ञार्न कम व्यक्तियों को है। भार्रत में छार्त्र बिनार् किसी अवसर की परवार्ह किये विद्यार्लयों में प्रवेश ले लेते हैं। उनको इस बार्त क ज्ञार्न नही होतार् कि कौन-सार् पार्ठ्य-विषय किस व्यवसार्य यार् सेवार् की आधार्रशिलार् तैयार्र करतार् है। इसक कुपरिणार्म भार्रत में ‘शिक्षित बेरोजगार्रं की समस्यार् है अगर विद्यार्लयों में निर्देशन द्वार्रार् विभिन्न पार्ठ्य-विषयों से सम्बन्धित अवसरों क ज्ञार्न दे दियार् जार्य तो बेरोजगार्री की समस्यार् कुछ सीमार् तक हल हो सकती है।

    6. विद्यार्लय-व्यवस्थार्, पार्ठ्य्यक्रम तथार् शिक्षण-विधि मेंं परिवर्तन –

    शिक्षार् में पहले की अपेक्षार् बहुत से परिवर्तन हुए हैं। पहले शिक्षार् बौद्धिक विकास की एक प्रक्रियार् मार्त्र थी। परन्तु आज यह व्यक्तिगत तथार् सार्मार्जिक समस्यार्ओं के समार्धार्न क एक सार्धन मार्नी जार्ती है। मौरिस के अनुसार्र निश्चयार्त्मक शिक्षार् का, जो कि विभिन्न सार्मार्जिक स्तर के व्यक्तियों को विभिन्न अवसर प्रदार्न करती है, रूप परिवर्तित होकर प्रजार्तन्त्रार्त्मक शिक्षार् होतार् जार् रहार् है जो कि सभी व्यक्तियों को समार्न अवसर प्रदार्न करती है। सार्हित्यिक पार्ठ्यक्रम के स्थार्न पर विस्तृत, वैज्ञार्निक तथार् सार्मार्जिक पार्ठ्यक्रम स्वीकार कियार् जार् रहार् है जो प्रतिदिन की आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रखकर बनार्यार् जार्तार् है। समार्ज तथार् विद्यार्लय में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थार्पित करने के प्रयत्म किये जार् रहे हैं।

      वर्तमार्न समय में शिक्षार् बार्ल केन्द्रित हैं, जहार्ँ व्यक्तिगत विभिन्नतार् के सिद्धार्न्त पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। ये सभी परिवर्तन शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकतार् पर बल देते हैं।

    शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य

    1. विद्यार्लय जीवन में स्वयं को समार्योजित करने मेंं विद्याथियों की सहार्यतार् करनार् – 

    शैक्षिक निर्देशन क मुख्य उद्देश्य विद्याथियों की इस प्रकार सहार्यतार् करनार् है जिससे वे विद्यार्लय पार्ठ्यक्रम तथार् सम्बन्धित सार्मार्जिक जीवन में स्वयं को समार्योजित कर सकें। जब विद्याथी नवीन विद्यार्लयों में प्रवेश लेते हैं यार् ग्रार्मीण क्षेत्रों के बार्लक समुचित शिक्षार् उपलब्ध न होने पर नगरों में स्थित विद्यार्लयों में प्रवेश लेते हैं तो उनको नयार् वार्तार्वरण व नयार् सार्मार्जिक जीवन मिलतार् है। जिसमें वे स्वयं को समार्योजित नही कर पार्ते तथार् विभिन्न कठिनार्इयों क अनुभव करते है। शैक्षिक निर्देशन नवीन वार्तार्वरण में समार्योजन स्थार्पित करने में विद्याथियों की सहार्यतार् करतार् है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बार्तों को सम्मिलित कियार् जार् सकतार् है-

    1. पार्ठ्य विषयों के चयन में सहार्यतार् प्रदार्न करनार्। 
    2. उपयुक्त अध्ययन आदतों क निर्मार्ण करनार्। 
    3. अन्य छार्त्रों के सार्थ सार्मार्जिक सम्बन्ध स्थार्पित करने में सहार्यतार् करनार्।
    4. उपयोगी पुस्तकों के चयन में सहार्यतार् करनार्। 
    5. विभिन्न विषयों में प्रगति करने के लिए प्रोत्सार्हित करनार्।
    6. पार्ठ्य सहगार्मी क्रियार्ओं के चयन में सहार्यतार् प्रदार्न करनार्। 
    7. छार्त्रवृत्ति प्रार्प्त करने के सम्बन्ध में सहार्यतार् करनार्।
      1. 2. सम्भार्वित तथार् इच्छित अग्रिम शिक्षार् से सम्बन्धित सूूचनार्एं प्रार्प्त करने में छार्त्रोंं की सहार्यतार् करनार् –

      विद्याथियों के समक्ष यह समस्यार् उत्पन्न होती है कि वे किस विद्यार्लय में प्रवेश लें तथार् किन विषयों क चुनार्व करें। अत: आवश्यक है कि शैक्षिक निर्देशन के मार्ध्यम से विद्याथियों को विद्यार्लय के वार्तार्वरण, नियमों तथार् विषयों से सम्बन्धित जार्नकारियार्ं उपलब्ध करार्यी जार्एं।

      3. व्यवसार्य चयन में विद्याथियोंं क माग दर्शन करनार् – 

      शिक्षार् समार्प्ति पर विद्याथियों को जीविकोपाजन के लिए किसी न किसी व्यवसार्य को अपनार्नार् होतार् है किन्तु व्यवसार्यों से सम्बन्धित जार्नकारियों के अभार्व में उनके समक्ष विकट समस्यार् उत्पन्न हो जार्ती है कि वह किस व्यवसार्य क चयन करें? किस व्यवसार्य के लिए कौन-कौन सी योग्यतार्एं आवश्यक हैं, कौन सार् व्यवसार्य उनकी योग्यतार्ओं व क्षमतार्ओं के अनुकूल है, वेतन, नौकरी की शर्ते, प्रगति की सम्भार्वनार्एं इत्यार्दि से सम्बन्धित सूचनार्एं उसे कहार्ं से प्रार्प्त हो सकेंगी, इत्यार्दि। ये सभी प्रकार की सूचनार्ए विद्याथी तक पहुंचार्ने के लिए शैक्षिक निर्देशन क होनार् आवश्यक है।

      4. विभिन्न प्रकार के विद्यार्लयों के कार्यों ओर उद्देश्योंं को जार्नने मेंं विद्याथियों की सहार्यतार् करनार् – 

      पार्ठ्यक्रम की विविधतार् तथार् व्यवसार्यों में वृद्धि के परिणार्मस्वरूप भार्रत में भी विशिष्ट विद्यार्लयों की स्थार्पनार् हुर्इ है। उदार्हरणाथ-बहुउद्देश्यीय विद्यार्लय, औद्यौगिक विद्यार्लय, व्यार्वसार्यिक विद्यार्लय, चिकित्सार् विद्यार्लय, कृषि विद्यार्लय इत्यार्दि। इन विभिन्न प्रकार के विद्यार्लयों में विद्याथियों को उनकी मार्नसिक क्षमतार्, रूचियों व अभिरूचियों के आधार्र पर ही भेजार् जार् सकतार् है क्योंकि प्रत्येक विद्यार्लय के उद्देश्य एवं कार्य भिन्न-भिन्न हैं। अत: प्रत्येक विद्यार्लय सम्बन्धी समस्त जार्नकारियार्ँ प्रार्प्त करने में विद्याथियों की सहार्यतार् करनार् शैक्षिक निर्देशन क उद्देश्य है।

      5. अपनी रूचि के विद्यार्लय में प्रवेश हेतु आवश्यक शर्तो व नियमों की जार्नकारी प्रार्प्त करने में विद्याथिर्यो की सहार्यतार् करनार् – 

      प्रत्यके विद्यार्लय की अपनी व्यवस्थार् पद्धति होती है तथार् इसके प्रवेश के नियम एवं आधार्र निर्धार्रित होते है। भिन्न-भिन्न विषयों के आधार्र पर विद्यार्लय भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रवेश के लिए विशिष्ट विषयों की आवश्यकतार् होती है। कुछ विद्यार्लयों में प्रवेश के लिए पूर्व परीक्षार् यार् सार्क्षार्त्कार यार् दोनों ही होते हैं और कुछ विद्यार्लय कम से कम वार्ंछित शैक्षिक योग्यतार् के आधार्र पर प्रवेश देते हैं। अत: इन विद्यार्लयों के नियमों आदि से परिचित करार्नार् शैक्षिक निर्देशन क लक्ष्य है जिससे विद्याथिर्यो अपनी क्षमतार् के अनुसार्र अपनी पसंद के विद्यार्लय में प्रवेश ले सकें।

      6. विद्याथी को स्वयं की रूचियों, अभिरूचियों व योग्यतार्ओं से अवगत करार्नार् – 

      प्रत्यके विद्याथी की रूचियार्ँ, अभिक्षमतार्एँ व योग्यतार्एँ एक की अपेक्षार् दूसरे से भिन्न होती है। किसी में बुद्धि अधिक होती है तो किसी में कम। वर्तमार्न समय में विद्याथियों को उनकी योग्यतार्ओं, बौद्धिक क्षमतार्ओं, रूचियों, अभिरूचियों व व्यक्तिगत शीलगुणों से अवगत करार्ने के लिए शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त आवश्यक है।

      7. प्रतियोगी परीक्षार्ओं से सम्बन्धित जार्नकारी प्रदार्न करनार् – 

      जोन्स के शैक्षिक निर्देशन क महत्वपूर्ण उद्देश्य विद्याथियों को विभिन्न केन्द्रीय व रार्ज्य स्तरों पर होने वार्ली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षार्ओं जैसे आर्इ0ए0एम0, पी0सी0एस0, आर0ए0एस0, बैकिंग सेवार् इत्यार्दि के सम्बन्ध में जार्नकारियॉ प्रदार्न करनार् है जिससे वह प्रार्रम्भ से ही अपनार् रूझार्न इस ओर बनार् सकें। उपरोक्त सभी प्रकार की परीक्षार्ओं में केवल वही व्यक्ति उत्तीर्ण एवं चयनित होते हैं जो वार्स्तव में योग्य हैं।

      8. विद्यार्लय के विभिन्न पार्ठ्यक्रमों से सम्बन्धित जार्नकारियार्ँ उपलब्ध करार्नार् – 

      आज शिक्षार् क क्षेत्र व्यार्पक होने के कारण पार्ठ्यक्रमों में भी विभिन्नतार् आर्इ है। विद्यार्लयों मे विभिन्न प्रकार के पार्ठ्यक्रमों क अध्ययन करार्यार् जार्तार् है जैसे विज्ञार्न, कलार्, कृषि, वार्णिज्य इत्यार्दि। इन पार्ठ्यक्रमों में भी नवीन विषयों को सम्मिलित कियार् जार् रहार् है। उपयुक्त जार्नकारी के अभार्व में विद्यार्थ्र्ार्ी अनुचित पार्ठ्य विषयों क चयन कर लेते हैं जिनक प्रभार्व उनके व्यवसार्य पर पड़तार् है। अत: यह आवश्यक है कि निर्देशन के मार्ध्यम से विद्याथियों को विभिन्न पार्ठ्यक्रम एवं पार्ठ्य विषयों से सम्बन्धित समस्त आवश्यक जार्नकारियार्ं प्रदार्न की जार्एँ।

      9. अन्य उद्देश्य

      1. अधिगम विधियोंं मेंं सुधार्र करनार् – शैक्षिक निर्देशन क एक मुख्य उद्देश्य शिक्षार् के क्षेत्र में अध्यार्पन विधियों क सुधार्र करनार् भी है। विद्याथियों में इतनी समझदार्री नहीं होती कि वे अपने योग्यतार्ओं व क्षमतार्ओं के अनुरूप उपयुक्त अधिगम विधियों क चयन कर सकें।
      2. प्रतिभार्शार्ली एवं पिछड़े बार्लकोंं के लिए शिक्षार् की व्यवस्थार् करनार्- शैक्षिक निर्देशन क उद्देश्य केवल सार्मार्न्य बार्लकों की सहार्यतार् करनार् ही नही है वरन् शिक्षार् के क्षेत्र में प्रतिभार्शार्ली एवं पिछड़े बार्लकों की सहार्यतार् करनार् भी है। प्रतिभार्शार्ली बार्लकों से तार्त्पर्य ऐसे बार्लकों से है जिनकी क्षमतार्एँ बौद्धिक शक्तियार्ँ, समार्योजन, शैक्षिक उपलब्धि औसत बार्लकों से श्रेष्ठ होती है। निर्देशन के सफल एवं उपयोगी कार्यक्रमों द्वार्रार् प्रतिभार्शार्ली बार्लकों की योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं क पूर्ण विकास कियार् जार्नार् चार्हिए जिससे वे अपनी योग्यतार्ओं के अनुरूप विशिष्ट व्यवसार्यों क चयन कर देश की उन्नति में अपनार् योगदार्न दे सकें। इसके विपरीत कुछ बार्लक ऐसे भी होते हैं जो कक्षार् में किसी तथ्य को बार्र-बार्र समझार्ने पर भी नही समझ पार्ते हैं तथार् औसत बार्लकों के समार्न प्रगति नही कर पार्ते हैं। इन्हें पिछड़े बार्लक कहते हैं। पिछड़ेपन के अनेक कारण हैं जैसे शार्रीरिक दोष, मार्नसिक क्षमतार्एँ, विद्यार्लय क वार्तार्वरण एवं परिस्थितियार्ँ, अनुशार्सनहीनतार्, विघटित परिवार्र एवं संवेगार्त्मक व सार्मार्जिक परिस्थितियार्ं इत्यार्दि। निर्देशन सेवार्ओं क उद्देश्य है कि वह पिछड़े बार्लकों की उचित सहार्यतार् करने तथार् उन्हें शिक्षार् के क्षेत्र में सार्मार्न्य स्तर पर लार्ने के लिए उनकी पहचार्न करें तथार् उपचार्रार्त्मक शिक्षार् की व्यवस्थार् करने में सहार्यतार् करें।
      3. आकांक्षार् स्तर निर्धार्रित करने में सहार्यतार् करनार् – आकांक्षार् स्तर क निर्धार्रण बार्लक की योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं के अनुरूप होनार् चार्हिए। अत: शैक्षिक निर्देशन क उद्देश्य है कि वह छार्त्रों को आत्मबोध करार्यें जिससे वे अपनी योग्यतार्ओं, क्षमतार्ओं, रूचियों, आवश्यकतार्ओं व कमियों को समझ सकें और आकांक्षार् स्तर को वार्स्तविकतार् के आधार्र पर निर्धार्रित कर सकें। यदि आकांक्षार्ओं क निर्धार्रण वार्स्तविकतार् के आधार्र पर नही कियार् जार्तार् है तो बार्द में आकांक्षार्ए पूरी न होने पर विद्याथिर्यो को निरार्शार्, कुंठार् इत्यार्दि क सार्मनार् करनार् पड़ सकतार् है, जो समार्योजन में बार्धक है।

        शैक्षिक निर्देशन के सिद्धार्न्त

      1. विद्यार्लय तथार् अभिभार्वक के मध्य सम्बन्ध क सिद्धार्न्त – 

      शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रियार् की सफलतार् के लिए विद्यार्लय एवं अभिभार्वक में गहरार् सम्बन्ध होनार् अति आवश्यक है क्योंकि विद्याथी से सम्बन्धित आवश्यक सूचनार्एँ विद्यार्लय एवं अभिभार्वक से प्रार्प्त की जार् सकती है।

      2. सभी विद्याथियों के लिए समार्न निर्देशन की सुविधार् प्रदार्न करने क सिद्धार्न्त – 

      शैक्षिक निर्देशन कुछ चयनित विद्याथियों के लिए नही वरन् सभी वर्गों आयु समूहों व सभी योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं वार्ले विद्याथियों के लिए होनार् चार्हिए। शिक्षार् के सभी स्तरों पर विद्याथियों को निर्देशन की आवश्यतार् होती है अत: उनको निर्देशन व सुविधार्एं अवश्य उपलब्ध होनी चार्हिए।

      3. प्रमार्पीकृत परीक्षणों के प्रयोग क सिद्धार्न्त – 

      विद्यार्लय में विद्याथियों की समस्यार्ओं क पतार् लगार्ने, उनकी रूचियों, योग्यतार्ओं एवं अभिक्षमतार्ओं को जार्नने व सम्बन्धित सूचनार्ओं को प्रार्प्त करने के लिए प्रमार्पीकृत परीक्षणों क प्रयोग कियार् जार्नार् चार्हिए। इन परीक्षणों के परिणार्मों से विद्याथियों की उपलब्धि के आधार्र पर किसी विशिष्ट पार्ठ्यक्रम में सफलतार् व असफलतार् के सम्बन्ध में भविष्यवार्णी की जार् सकती है। प्रमार्पीकृत परीक्षणों के द्वार्रार् परिणार्म अप्रमार्पीकृत परीक्षणों की अपेक्षार् वस्तुनिष्ठ एवं श्रेष्ठ होते है।

      4. गोपनीयतार् क सिद्धार्न्त – 

      निर्देशन प्रक्रियार् में प्राथी की समस्यार्ओ की गार्पे नीयतार् पर विषेश ध्यार्न दियार् जार्तार् है। प्राथी से सम्बन्धित कोर्इ भी ऐसी सूचनार् किसी अन्य को न बतार्यी जार्ए जिससे कि वह स्वयं को अपने सहपार्ठियों से कमतर समझे।

      5. अनुगार्मी अध्ययन क सिद्धार्न्त –

      निर्देशन देने के पश्चार्त् निर्देशन की प्रभार्वशीलतार् ज्ञार्त करनार् आवश्यक है। निर्देशन की सफलतार् की जार्ंच करने के लिए समय-समय पर यह जार्ननार् आवश्यक है कि व्यवसार्य में लगे छार्त्र सफल हुए यार् नही। इसी से निर्देशन कार्यक्रमों की सफलतार् क पतार् चल जार्तार् है। यदि अनुगार्मी अध्ययन न कियार् जार्ए तो निर्देशन सेवार् क उद्देश्य ही समार्प्त हो जार्तार् है।

      6. उचित एवं सम्बन्धित सूचनार्ओं क सिद्धार्न्त – 

      निर्देशन व्यवसार्यिक क्षेत्र से सम्बन्धित हो यार् शैक्षिक क्षेत्र से, तब तक सम्भव नही है जब तक पर्यार्प्त मार्त्रार् में सम्बन्धित एवं उपयुक्त सूचनार्एं एकत्रित न की जार्एँ। ये सूचनार्एँ छार्त्र की बुद्धिलब्धि, शैक्षिक उपलब्धि, रूझार्न से सम्बन्धित होती है। इनके आधार्र पर ही निर्देशन प्रदार्न कियार् जार्नार् चार्हिए।

      7. समस्यार् समार्धार्न क सिद्धार्न्त – 

      किसी भी समस्यार् क समार्धार्न, उसके भयंकर रूप धार्रण करने से पूर्व ही प्रार्रम्भ कर देनार् चार्हिए क्योंकि समस्यार् के गम्भीर होने पर निर्देशन प्रक्रियार् अधिक प्रभार्वशली सिद्ध नही हो सकेगी।

        शैक्षिक निर्देशन की विधियार्ं

       सार्मार्न्यतयार् शैक्षिक निर्देशन प्रदार्न करने की विधियार्ं दो वर्गों में विभक्त की जार् सकती हैं-  1. व्यक्तिगत निर्देशन विधियार्ं 2. सार्मूहिक निर्देशन विधियार्ं ।

        1. व्यक्तिगत निर्देशन विधियार्ं –

        व्यक्तिगत निर्देशन विधियों द्वार्रार् निर्देशन व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थार्पित करके प्रदार्न कियार् जार्तार् है। इसमें व्यक्ति की शार्रीरिक, मार्नसिक, सार्मार्जिक, संवेगार्त्मक, बौद्धिक तथार् वैयक्तिक समस्यार्ओं क अध् ययन कियार् जार्तार् है। इसमें निम्नलिखित विधियों क अनुकरण कियार् जार्तार् है-

        1. प्रार्थमिक सार्क्षार्त्कार –विद्याथियों क व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करने के लिए प्रार्थमिक सार्क्षार्त्कार कियार् जार्तार् है। इस प्रार्थमिक सार्क्षार्त्कार में निर्देशन समिति के लिए विद्याथियों से सम्बन्धित विभिन्न सूचनार्एं एकत्रित करनार् आवश्यक है।
          1. पार्रिवार्रिक वार्तार्वरण से सम्बन्धित। 
          2. शिक्षार् एंव व्यवसार्य सम्बन्धी योजनार्ओं के सम्बन्ध में। 
          3. अवकाश के समय में की जार्ने वार्ली क्रियार्ओं के सम्बन्ध में। 
        2. विद्याथियों क संचित अभिलेख –शैक्षिक निर्देशन के लिए विद्याथियों से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार की जार्नकारियों को एकत्रित कियार् जार्तार् है तथार् उन्हें रिकार्ड के रूप में सुरक्षित रखार् जार्तार् है। यही संचित अभिलेख है। संचित अभिलेख में निम्नलिखित सूचनार्एं सम्मिलित की जार्ती हैं-
          1. छार्त्र क परिचय एवं विवरण।
          2. छार्त्र की बौद्धिक स्तर सम्बन्धी सूचनार्एँ। 
          3. रूचियों एवं अभिरूचियों से सम्बन्धी सूचनार्एँ। 
          4. शार्रीरिक एवं स्वार्स्थ्य सम्बन्धी सूचनार्एँं। 
          5. मार्नसिक तथार् उपलब्धि परीक्षण सम्बन्धी जार्नकारी। 
          6. पार्रिवार्रिक, आर्थिक तथार् सार्ंस्कृतिक पृष्ठभूमि। 
          7. पार्ठ्येत्तर क्रियार्कलार्प। 
          8. व्यक्तित्व सम्बन्धी अन्य विशिष्ट जार्नकारियार्ं इत्यार्दि।
        3. सार्मार्जिक व आर्थिक अध्ययन –विद्याथियों के घर, परिवार्र, पार्स-पड़ोस इत्यार्दि के बार्रे में सार्मार्जिक व आर्थिक जार्नकारियार्ं प्रार्प्त कर लेनी चार्हिए। इसके लिए प्रश्नार्वलियार्ं एवं सार्मार्जिक आर्थिक स्तर मार्पनी क भी प्रयोग कियार् जार् सकतार् है। 4. मनोवैज्ञार्निक परीक्षण- शैक्षिक निर्देशन के लिए विद्याथियों के विभिन्न व्यक्तित्व शील गुणों के सम्बन्ध में जार्नने के लिए मनोवैज्ञार्निक परीक्षणों क प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है। ये परीक्षण हो सकते हैं-
          1. बुद्धि परीक्षण 
          2. अभिरूचि परीक्षण 
          3. रूचि परिसूची 
          4. उपलब्धि परीक्षण 
          5. व्यक्तित्व परीक्षण 
          6. स्वार्स्थ्य परीक्षण

        विद्याथियों के स्वार्स्थ्य क परीक्षण भी आवश्यक है। ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क क निवार्स होतार् है।’ अत: विद्याथियों के स्वार्स्थ्य परीक्षण की नियमित एवं समुचित व्यवस्थार् होनी चार्हिए जिससे बार्ह्य व आंतरिक बीमार्रियों तथार् कमजोरियों क पतार् चल सकें। विद्यार्लय जीवन क अध्ययन-विद्याथियों के विद्यार्लय जीवन क अध्ययन करनार् भी अत्यन्त आवश्यक है जिससे विद्याथियों से सम्बन्धित निम्नलिखित जार्नकारियार्ं प्रार्प्त हो सकें-

        1. विद्याथियों ने किन-किन विद्यार्लयों में शिक्षार् प्रार्प्त की है।
        2. उसने किन विषयों को पढ़ने में रूचि दिखाइ है। 
        3. किस विषय में कितने अंक प्रार्प्त किए है।
        4. पार्ठ्य सहगार्मी क्रियार्ओं के प्रति उसकी क्यार् रूचि है। 
        5. उसकी रूचि-अरूचि क्यार् है?
        6.  शिक्षार् व शिक्षकों के प्रति कैसार् दृष्टिकोण है? इत्यार्दि उपरोक्त समस्त जार्नकारियार्ँ, संचित अभिलेख पत्र द्वार्रार् प्रार्प्त की जार् सकती हैं और इन्हीं के आधार्र पर विद्याथियों को शिक्षार् सम्बन्धी निर्देशन प्रदार्न कियार् जार् सकतार् है। 

          2. सार्मूहिक निर्देशन विधियार्ं-

          कभी कभी ऐसी परिस्थितियार्ं व कठिनार्इयार्ं उत्पन्न हो जार्ती है जब विद्याथियों को सार्मूहिक रूप से निर्देशन प्रदार्न कियार् जार्तार् है। सार्मूहिक निर्देशन विधियार्ं हैं-

        1. अनुस्थार्पन वातार्एं –निर्देशक व अन्य विद्वार्नों द्वार्रार् विद्याथियों को सार्मूहिक रूप से शैक्षिक निर्देशन के महत्व को समझार्यार् जार्तार् है। उनकी शिक्षार् सम्बन्धी विभिन्न समस्यार्ओं की विस्तृत चर्चार् की जार्ती है जिससे विद्याथियों स्वयं अपनी समस्यार्ओं के सम्बन्ध में गहनतार् से सोचने के लिए प्रोत्सार्हित होते हैं। विद्याथियों को निर्देशन हेतु मार्नसिक रूप से तैयार्र करने के पश्चार्त् निर्देशन देनार् सदैव प्रभार्वी होतार् है।
        2. पार्श्र्वचित्र निर्मार्ण –विद्याथियों से सम्बन्धित समस्त सूचनार्एं एकत्रित कर लेने के पश्चार्त् एक पार्श्र्वचित्र तैयार्र कर लेनार् चार्हिए। यह ग्रार्फ पेपर पर बनार् हुआ एक रेखार्चित्र होतार् है जिसमें विद्याथियों की योग्यतार्ओं, क्षमतार्ओं तथार् अन्य परीक्षणों के परिणार्मों के स्तर को प्रदर्शित कियार् जार्तार् है। तत्पश्चार्त् इस पार्श्र्वचित्र के आधार्र पर विद्याथियों से सम्बन्धित सूचनार्ओं क निष्कर्ष निकालार् जार्तार् है।
        3. विद्यार्लय से विद्याथियों के सम्बन्ध में सूचनार्एं एकचित्र करनार् –शैक्षिक निर्देशन के लिए विद्याथियों के सम्बन्ध में सूचनार्एं एकत्रित करने के लिए विद्यार्लय एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विद्याथियों की शैक्षिक उपलब्धियों क ज्ञार्न उनके द्वार्रार् विभिन्न परीक्षार्ओं में प्रार्प्त अंकों से हो जार्तार् है। अध्यार्पकों के सार्थ सार्क्षार्त्कार करके विद्याथियों की रूचियों, योग्यतार्ओं, कौशलों, आदतों, व्यक्तित्व सम्बन्धी अन्य विशेषतार्ओं व पार्ठ्यसहगार्मी क्रियार्ओं में रूचि आदि के सम्बन्ध में विभिन्न सूचनार्एं प्रार्प्त हो सकती हैं। अत: निर्देशन के लिए सूचनार्एं एकत्रित करते समय विद्यार्लय एवं अध् यार्पक की सहार्यतार् अवश्य ली जार्नी चार्हिए।
        4. परिवार्र से विद्याथियों के सम्बन्ध में सूचनार्एं एकत्रित करनार् –बच्चों की जीवन में सबसे अधिक निकटतार् परिवार्र में अपने मार्तार्-पितार् से ही होती है। जन्म से ही मार्तार्-पितार् अपनी आंखों के समक्ष उनको विकसित होते हुए देखते हैं तथार् निरन्तर उनकी प्रगति के लिए सोचते रहते हैं। वे बच्चों की आदतों, रूचियों, अभिरूचियों व कठिनार्इयों को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं अत: बार्लकों की भार्वी शैक्षिक एवं व्यार्वसार्यिक योजनार्ओं के बार्रे में वे अच्छी तरह से बतार् सकते हैं। यह सूचनार्एं घर जार्कर, वातार् द्वार्रार् व पत्र व्यवहार्र द्वार्रार् सम्पर्क स्थार्पित करके प्रार्प्त की जार् सकती हैं।
        5. सम्मेलन –विद्याथियों से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार की सूचनार्ओं से प्रार्प्त निष्कर्षों को शैक्षिक निर्देशन समिति के समक्ष रखार् जार्तार् है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी रार्य प्रस्तुत करतार् है तथार् आपसी विचार्र-विमर्श के पश्चार्त् एक सर्वमार्न्य निर्णय पर पहुंचते हैं। यह निर्णय निर्देशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होतार् है तथार् विद्याथियों के भविष्य को प्रभार्वित करतार् है।
        6. रिपोर्ट तैयार्र करनार् –सम्मलेन मे लिए गए निर्णय के आधार्र पर निर्देशन समिति प्रत्येक विद्याथियों के सम्बन्ध में विस्तृत रिपोर्ट तैयार्र करती है। यह रिपोर्ट विद्याथियों के मार्तार्-पितार्, अभिभार्वक एवं विद्यार्लय अधिकारियों को दी जार्ती है जिससे वे विद्याथियों की कार्य योजनार् में सहार्यतार् कर सकें।
        7. अनुवत्त्री कार्य –अनुवर्ती कार्य से तार्त्पर्य है जिन विद्याथियो को निर्देशित कियार् गयार् है उनक निरन्तर मूल्यार्ंकन करते रहनार्, जिससे यह पतार् चल सके कि उन्हें जिस शिक्षार् को ग्रहण करने के लिए प्रोत्सार्हित कियार् गयार् थार्, उसमें वे सफलतार् प्रार्प्त कर रहे हैं यार् नही। यदि विद्याथियों की सफलतार् संतोषजनक नही है तो हमें यह समझनार् चार्हिए कि हमार्री निर्देशन पद्धति दोषपूर्ण है और उस कमी को जार्नकर दूर करने क प्रयार्स करनार् चार्हिए। दूसरे शब्दों मे अनुवर्ती कार्य निर्देशन-कार्यक्रम व्यवस्थार् को सुधार्रने एवं इसकी प्रभार्वशीलतार् क मूल्यार्ंकन करने के लिए अति आवश्यक है।

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