शिक्षार् मनोविज्ञार्न के सम्प्रदार्य एवं इतिहार्स

“मनोविज्ञार्न क अतीत लम्बार् है परन्तु इतिहार्स छोटार् है।” मनोविज्ञार्न के तथ्यों की जार्नकारी पौरार्णिक ग्रीक दर्शनशार्स्त्र से मिलते है। लेकिन एक स्वतंत्र शार्खार् के रूप में 1879 र्इ0 में मनोविज्ञार्न की स्थार्पनार् हुर्इ। 1879 के बार्द तथार् बीसवी शतार्ब्दी के प्रार्रम्भिक वर्षो में कर्इ मनोवैज्ञार्निकों ने मनोविज्ञार्न की विषय-वस्तु तथार् उसके अध्ययनविधि के बार्रे में करीब-करीब एक जैसे विचार्र व्यक्त किये है तथार् अन्य मनोवैज्ञार्निकों ने इनके विचार्रों क विरोध कियार्। एक समार्न विचार्रधार्रार् वार्ले लोगों को एक सम्प्रदार्य के अन्तर्गत रखार् गयार्। इन सम्प्रदार्यों को ही मनोविज्ञार्न के स्कूल की ही संज्ञार् दी गयी। मनोविज्ञार्न के विभिन्न सम्प्रदार्य है

  1. संरचनार्वार्द
  2. प्रकार्यवार्द
  3. व्यवहार्रवार्द
  4. मनोविश्लेषण
  5. गेसटार्ल्ट मनोविज्ञार्न
  6. हार्रमिक मनोविज्ञार्न

संरचनार्वार्द

मनोविज्ञार्न को दर्शनशार्स्त्र से अलग करके क्रमबद्ध अध्ययन करने क श्रेय संरचनार्वार्द को जार्तार् है। जिसके प्रवर्तक विलियम बुण्ट (1832-1920) के शिवार्य र्इ0बी0 टिचनर (1867-1927) थे। इन्होंने अमेरिक के कार्नेल विश्वविद्यार्लय में इसकी शुरूआत करी। बुण्ट ने मनोविज्ञार्न के स्वरूप को प्रयोगार्त्मक बनार्यार् जब 1879 में लिपजिंग विश्वविद्यार्लय में मनोविज्ञार्न की प्रथम प्रयोगशार्लार् की स्थार्पनार् करी। बुण्ट ने मनोविज्ञार्न को चेतन अनुभूति क अध्ययन करने वार्लार् मार्नार्। जिसे मूलत: दो तत्वों में विश्लेषित कियार् जार् सकतार् थार्। वे दो तत्व थे- संवेदन तथार् भार्व। बुण्ट ने चेतन को वस्तुनिष्ठ तत्व बतार्यार्। बुण्ट क विचार्र थार् कि प्रत्येक भार्व क अध्ययन तीन विभार्ओं में अवस्थित कियार् जार् सकतार् है उत्तेजनार्-शार्ंत, तनार्व-शिथिलन तथार् सुखद-दु:खद। इसे भार्व क त्रिविमीय सिद्धार्न्त कहार् गयार्। टिचनर ने बुण्ट की विचार्रधार्रार् को उन्नत बनार्ते हुये कहार् कि चेतनार् के दो नहीं तीन तत्व होते है- संवेदन, प्रतिमार् तथार् अनुरार्ग। टिचनर ने बुण्ट के समार्न अन्त निरीक्षण को मनोविज्ञार्न की एक प्रमुख विधि मार्नार् है। बुण्ट ने चेतनार् के तत्वों की दो विशेषतार्एं बतार्यी थी- गुण तथार् तीव्रतार्। टिचनर ने इनकी संख्यार् चार्र कर दी- गुण, तीव्रतार्, स्पष्टतार् तथार् अवधि। टिचनर ने ध्यार्न प्रत्यक्षण, सार्हचर्य, संवेद आदि क्षेत्रों में भी अपनार् योगदार्न दियार्।

संरचनार्वार्द क शिक्षार् में योगदार्न

  1. संरचनार्वार्द क योगदार्न शिक्षार् तथार् शिक्षार् मनोविज्ञार्न के लिये प्रत्यक्ष नार् होकर परोक्ष रूप में है। संरचनार्वार्द ने सर्वप्रथम मनोविज्ञार्न को दर्शनशार्स्त्र से अलग करके इसके स्वरूप प्रयोगार्त्मक बनार्यार्। जिससे मनोविज्ञार्न की हर शार्खार् जिसमें शिक्षार् मनोविज्ञार्न भी शार्मिल थार्, क स्वरूप प्रयोगार्त्मक हो गयार्।
  2. मनोविज्ञार्न क स्वरूप प्रयोगार्त्मक होने से शिक्षार् की नयी पद्धति के बार्रे में शिक्षकों को सोचने की चेतनार् आयी। अन्तनिरीक्षण विधि को प्रयोग शिक्षाथी की मार्नसिक दशार्ओं क जैसे ध्यार्न, सीखनार्, चिंतन आदि प्रक्रियार्ओं क अध्ययन करने में प्रार्रंभ कर दियार्। 
  3. शिक्षार् में उन पार्ठ्यक्रमों को अधिक महत्व दियार् जार्ने लगार् जिससे शिक्षाथियों के चिन्तन, स्मरण, प्रत्यक्षण एवं ध्यार्न जैसी मार्नसिक क्रियार्ओं क समुचित विकास तथार् उनक प्रयोगार्त्मक अध्ययन संभव हो।

कार्यवार्द

मनोविज्ञार्न में कार्यवार्द एक ऐसार् स्कूल यार् सम्प्रदार्य है जिसकी उत्पत्ति संरचनार्वार्द के वर्णनार्त्मक तथार् विश्लेषणार्त्मक उपार्गम के विरोध में हुआ। विलियम जेम्स (1842-1910) द्वार्रार् कार्यवार्द की स्थार्पनार् अमरीक के हार्रवर्ड विश्वविद्यार्लय में की गयी थी। परन्तु इसक विकास शिकागो विश्वविद्यार्लय में जार्न डीवी (1859-1952) जेम्स आर एंजिल (1867-1949) तथार् हावे ए0 कार (1873-1954) के द्वार्रार् तथार् कोलम्बियार् विश्वविद्यार्लय के र्इ0एल0 थानडार्इक तथार् आर0एफ0 बुडवर्थ के योगदार्नों से हुयी।

कार्यवार्द में मुख्यत: दो बार्तों पर प्रकाश डार्लार्- व्यक्ति क्यार् करते है ? तथार् व्यक्ति क्यों कोर्इ व्यवहार्र करते है ? वुडवर्थ (1948) के अनुसार्र इन दोनों प्रश्नों क उत्तर ढूंढ़ने वार्ले मनोविज्ञार्न को कार्यवार्द कहार् जार्तार् हैं। कार्यवार्द में चेतनार् को उसके विभिन्न तत्वों के रूप में विश्लेषण करने पर बल नहीं डार्लार् जार्तार् बल्कि इसमें मार्नसिक क्रियार् यार् अनुकूली व्यवहार्र के अध्ययन को महत्व दियार् जार्तार् है। अनुकूली व्यवहार्र में मूलत: प्रत्यक्षण स्मृति, भार्व, निर्णय तथार् इच्छार् आदि क अध्ययन कियार् जार्तार् है क्योंकि इन प्रक्रियार्ओं द्वार्रार् व्यक्ति को वार्तार्वरण में समार्योजन में मदद मिलती है।

कार्यवार्दियों ने सार्हचर्य के नियमों जैसे समार्नतार् क नियम, समीपतार् क नियम तथार् बार्रंबार्रतार् क नियम प्रतिपार्दित कियार् जोकि सीखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिक बनार्तार् है।

कोलम्बियार् कार्यवार्दियों में र्इ0एल0 थानडार्इक व आर0एस0 वुडवर्थ क योगदार्न सर्वार्धिक रहार्। थानडार्इक ने एक पुस्तक शिक्षार् मनोविज्ञार्न लिखी जिसमें इन्होंने सीखने के नियम लिखे हैं। थानडार्इक के अनुसार्र मनोविज्ञार्न उछीपन-अनुक्रियार् सम्बन्धों के अध्ययन क विज्ञार्न है। थानडार्इक ने सीखने के लिये संबंधवार्द क सिद्धार्न्त दियार्। जिसके अनुसार्र सीखने में प्रार्रम्भ में त्रुटियार् अधिक होती है। किन्तु अभ्यार्स देने से इन त्रुटियों में धीरे-धीरे कमी आ जार्ती है।

वुडवर्थ ने अन्य कार्यवार्दियों के समार्न मनोविज्ञार्न को चेतन तथार् व्यवहार्र के अध्ययन क विज्ञार्न मार्नार्। इन्होनें सीखने की प्रक्रियार् को काफी महत्वपूर्ण बतार्यार् क्योंकि इससे यह पतार् चलतार् है कि सीखने की प्रक्रियार् क्यों की गयी। वुडवर्थ ने उद्वीपक-अनुक्रियार् (एस0आर0) के सम्बन्ध में परिवर्तन करते हुये प्रार्णी की भूमिक को महत्वपूर्ण मार्नते हुये उद्वीपक-प्रार्णी-अनुक्रियार् (S.O.R.) सम्बन्ध को महत्वपूर्ण बतार्यार्।

कार्यवार्द क शिक्षार् मे योगदार्न

  1. कार्यवार्द ने मार्नव व्यवहार्र को मूलत: अनुकूली तथार् लक्ष्यपूर्ण बतार्यार्। अत: स्कूलों क प्रमुख लक्ष्य बच्चों को समार्ज में समार्योजित करनार् होनार् चार्हिये। सीखने की प्रक्रियार् में वार्तार्वरण की महत्तार् पर बल दियार् गयार्। अत: अध्यार्पकों क यह प्रयार्स होनार् चार्हिये कि विद्याथियों को स्वस्थ वार्तार्वरण प्रदार्न कियार् जार्ये जोकि उनकी सीखने की प्रक्रियार् को प्रेरित करें।
  2. इस विचार्रधार्रार् ने पहले से चले आ रहे सैद्धार्न्तिक प्रत्ययों जोकि पार्ठ्यक्रम के अंग थे, में क्रार्ंतिकारी बदलार्व लार्ये। स्कूल पार्ठ्यक्रम में करके सीखनार् ( Learnning by doing ) पर बल दियार् जार्ने लगार्। 
  3. शिक्षाथियों की क्षमतार् में वैयक्तिक भिन्नतार् पर बल डार्लार् गयार्।
  4. कार्यवार्द ने अलग-अलग आयु स्तरों के बच्चों की आवश्यकतार्यें भिन्न-भिन्न होती है, इस बार्त पर बल दियार्।
  5. कार्यवार्द ने शिक्षार् में उपयोगितार् सिद्धार्न्त को जन्म दियार्। इसने सीखने की प्रक्रियार् में बार्लक की महतार् पर बल दियार्। पार्ठ्यक्रम में केवल उन्हीं विषयों को सम्मिलत करनार् चार्हिये जिनकी समार्ज में उपयोगितार् हो।
  6. इस स्कूल ने शिक्षार् में वैज्ञार्निक जार्नकारी पर बल डार्लार्। सार्थ ही शिक्षण व सीखने के लिये नयी विधियों जैसे: कार्य क्रमित सीखनार् ( Programmed Learning ) जैसी शिक्षण विधि को विकसित कियार्।
  7. कार्यवार्द में विशेषकर थानडार्इक ने इस बार्त पर बल दियार् कि शिक्षक को अध्यार्पन कार्य करने के पहले शैक्षिक उद्देश्यों को परिभार्षित कर लेनार् चार्हिए। तभी शिक्षाथी के व्यवहार्र में परिवर्तन लार् सकते है।

शिक्षक को उन परिस्थितियों पर अधिक बल डार्लनार् चार्हिये जो आम जीवन में अक्सर देखे जार्ते है तथार् उन अनुक्रियार्ओं पर बल डार्लनार् चार्हिये जिनकी जीवन में आवश्यकतार् हो।

व्यवहार्रवार्द

व्यवहार्रवार्द मनोविज्ञार्न क एक ऐसार् स्कूल है जिसकी स्थार्पनार् जे0बी0 वार्टसन द्वार्रार् 1913 में जार्न हार्पीकन्स विश्वविद्यार्लय में की गयी। इस स्कूल की स्थार्पनार् संरचनार्वार्द तथार् कार्यवार्द जैसे सम्प्रदार्यों के विरोध में वार्टसन द्वार्रार् की गयी। वह स्कूल अपने काल में विशेषकर 1920 र्इ0 के बार्द अधिक प्रभार्वशार्ली रहार् जिसके कारण इसे मनोविज्ञार्न में द्वितीय बल के रूप में मार्न्यतार् मिली। वार्टसन ने 1913 में सार्इकोलार्जिकल रिव्यू में एक विशेष शीर्षक Psychology as the behouristic view it के तहत प्रकाशित कियार् गयार्। यही से व्यवहार्रवार्द क औपचार्रिक शुभार्रम्भ मार्नार् जार्तार् है।

वार्टसन क व्यवहार्रवार्द

जे0वी0 वार्टसन ने व्यवहार्रवार्द के मार्ध्यम से मनोविज्ञार्न में क्रार्न्तिकारी विचार्र रखे। वार्टसन क मत थार् कि मनोविज्ञार्न की विषय-वस्तु चेतन यार् अनुभूति नहीं हो सकतार् है। इस तरह के व्यवहार्र क प्रेक्षण नहीं कियार् जार् सकतार् है। इनक मत थार् कि मनोविज्ञार्न व्यवहार्र क विज्ञार्न है। व्यवहार्र क पे्रक्षण भी कियार् जार् सकतार् है तथार् मार्पार् भी जार् सकतार् है। उन्होने व्यवहार्र के अध्ययन की विधि के रूप में प्रेक्षण तथार् अनुबंधन को महत्वपूर्ण मार्नार्। वार्टसन ने मार्नव प्रयोज्यों के व्यवहार्रों क अध्ययन करने के लिये शार्ब्दिक रिपोर्ट की विधि अपनार्यी जो लगभग अन्तर्निरीक्षण विधि के ही समार्न है।

वार्टसन ने सीखनार्, संवेग तथार् स्मृति के क्षेत्र में कुछ प्रयोगार्त्मक अध्ययन किये जिनकी उपयोगितार् तथार् मार्न्यतार् आज भी शिक्षार् मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में अर्निार्क है। व्यवहार्रवार्द के इस धनार्त्मक पहलू को आनुभविक व्यवहार्रवार्द कहार् जार्तार् है। वार्टसन के व्यवहार्रवार्द क ऋणार्त्मक पहलू वुण्ट तथार् टिचनर के संरचनार्वार्द को तथार् एंजिल के कार्यवार्द को अस्वीकश्त करनार् थार्। 1919 र्इ0 में वार्टसन ने अपने व्यवहार्रवार्द की तार्त्विक स्थिति को स्पष्ट कियार् जिसमें चेतनार् यार् मन के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कियार् गयार्। इसे तार्त्विक व्यवहार्रवार्द कहार् गयार्। वार्टसन ने सीखनार्, भार्षार् विकास, चिन्तन, स्मृति तथार् संवेग के क्षेत्र में जो अध्ययन कियार् वह शिक्षार् मनोविज्ञार्न के लिये काफी महत्वपूर्ण है।

वार्टसन व्यवहार्र को अनुवंशिक न मार्नकर पर्यार्वरणी बलों द्वार्रार् निर्धार्रित मार्नते थे। वे पर्यार्वरणवार्द के एक प्रमुख हिमार्यती थे। उनक कथन “मुझे एक दर्जन स्वस्थ बच्चे दे, आप जैसार् चार्हे मै उनको उस रूप में बनार् दूंगार्।” यह उनके पर्यार्वरण की उपयोगितार् को सिद्ध करने वार्लार् कथन है। वार्टसन क मार्ननार् थार् कि मार्नव व्यवहार्र उदीपक-अनुक्रियार् (S-R) सम्बन्ध को इंगित करतार् है। प्रार्णी क प्रत्येक व्यवहार्र किसी न किसी तरह के उद्दीपक के प्रति एक अनुक्रियार् ही होती है।

उत्तरकालीन व्यवहार्रवार्द

वार्टसन के बार्द भी व्यवहार्रवार्द को आगे बढ़ार्ने क प्रयार्स जार्री रहार् और इस सिलसिले में हल स्कीनर, टार्लमैन और गथरी द्वार्रार् कियार् गयार् प्रयार्स काफी सरार्हनीय रहार्। स्कीनर द्वार्रार् क्रियार् प्रसूत अनुबन्धन पर किये गये शोधों में अधिगम तथार् व्यवहार्र को एक खार्स दिशार् में मोड़ने एवं बनार्ये रखे में पुनर्बलन के महत्व पर बल डार्लार् गयार् है। कोर्इ भी व्यवहार्र जिसके करने के बार्द प्रार्णी को पुनर्बलन मिलतार् है यार् उसके सुखद परिणार्म व्यक्ति में उत्पन्न होते है, तो प्रार्णी उस व्यवहार्र को फिर दोबार्रार् करने की इच्छार् व्यक्त करतार् है। गथरी ने अन्य बार्तों के अलार्वार् यह बतार्यार् कि सीखने के लिये प्रयार्स की जरूरत नहीं होती और व्यक्ति एक ही प्रयार्स में सीख लेतार् है। इसे उन्होने इकहरार् प्रयार्स सीखनार् की संज्ञार्न दी। गथरी ने इसकी व्यार्ख्यार् करते हुये बतार्यार् कि व्यक्ति किसी सरल अनुक्रियार् जैसे पेंसिल पकड़नार्, मार्चिस जलार्नार् आदि एक ही प्रयार्स में सीख लेतार् है। इसके लिये उसे किसी अभ्यार्स की जरूरत नही होती। परन्तु जटिल कार्यो को सीखने के लिये अभ्यार्स की जरूरत होती है। गथरी ने एक और विशेष तथ्य पर प्रकाश डार्लार् जो शिक्षार् के लिये काफी लार्भप्रद सार्बित हुआ और वह थार् बुरी आदतों से कैसे छुटकारार् पार्यार् जार्ए। इसके लिए गथरी ने तीन विक्रिार्यों क प्रतिपार्दन कियार् –

  1. सीमार् विधि
  2. थकान विधि
  3. परस्पर विरोधी उद्दीपन की विधि

व्यवहार्रवार्द क शिक्षार् में योगदार्न

पी0 सार्इमण्ड ने शिक्षण व अधिगम के क्षेत्र में व्यवहार्रवार्द की उपयोगितार् बतार्ते हुये कहार् कि सीखने में पुरस्कार (पुर्नबलन) की महती भूमिक है। जिसकी जार्नकारी एक अध्यार्पक के लिये होनार् आवश्यक है। अध्यार्पक द्वार्रार् प्रदत्त पुनर्बलन बच्चों के भविष्य की गतिविधियों के क्रियार्न्वयन में निर्देशन क कार्य करतार् है। अध्यार्पक द्वार्रार् मार्त्र सही यार् गलत की स्वीकश्ति ही बच्चे के लिये पुरस्कार क कार्य करती है। व्यवहार्रवार्द क शिक्षार् के क्षेत्र में योगदार्न है –

  1. व्यवहार्रवार्द ने जो विधियार्ं व तकनीक प्रदार्न करी उनसे बच्चों के व्यवहार्र को समझने में काफी मदद मिली। 
  2. सीखने और प्रेरणार् के क्षेत्र में व्यवहार्रवार्द ने जो विचार्र प्रस्तुत किये वे अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 
  3. बच्चों के संवेगों क प्रयोगार्त्मक अध्ययन करके व्यवहार्रवार्दी मनोवैज्ञार्निकों ने इनके संवेगार्त्मक व्यवहार्र को समझने क ज्ञार्न प्रदार्न कियार्। 
  4. व्यवहार्रवार्द ने मार्नव व्यवहार्र पर वार्तार्वरणीय कारकों की भूमिक पर विशेष जोर दियार्। वार्टसन ने पर्यार्वरणी कारकों को बच्चों के वयक्तित्व विकास में काफी महत्वपूर्ण बतार्यार्। वार्टसन क यह कथन कि यदि उन्हें एक दर्जन भी स्वस्थ बच्चे दिये जार्ते है तो वे उन्हें चार्हे तो डार्क्टर, इंजीनियर, कलार्कार यार् भिखार्री कुछ भी उचित वार्तार्वरण प्रदार्न कर बनार् सकते है, ने वार्तार्वरण की भूमिक पर विशेष प्रकाश डार्लार्। 
  5. स्किनर द्वार्रार् सीखने के लिये जो नयी विधि कार्यक्रमित सीखनार् दी गयी, ने शिक्षार् मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में हलचल मचार् दियार्। आधुनिक मनोवैज्ञार्निकों ने इस विधि को अत्यन्त महत्वपूर्ण मार्नार् है और अनेक तरह के पार्ठों को सिखार्ने में उन्हें सफलतार् भी मिली। 
  6. कुसमार्योजित बार्लकों के समार्योजन के लिए व्यवहार्रवार्द द्वार्रार् जो विस्किार्यार्ं दी गयी वे अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
  7. व्यवहार्रवार्द ने मार्नव व्यहवार्र को समझने के लिये पूर्ववर्ती समस्त वार्द जोकि मार्नसिक प्रक्रियार्ओं पर बल देते थे, के विवार्द क अंत कियार्।

मनोविश्लेषणवार्द

मनोविश्लेषण क प्रयोग मनोविज्ञार्न में तीन अर्थो में होतार् है मनोविश्लेषण मनोविज्ञार्न क एक स्कूल है, मनोविश्लेषण व्यक्तित्व क एक सिद्धार्न्त है तथार् मनोविश्लेषण मनोचिकित्सार् की एक विधि है।

मनोविज्ञार्न के एक स्कूल के रूप में मनोविश्लेषण की स्थार्पनार् सार्इमण्ड फ्रार्यड (1856-1932) द्वार्रार् नैदार्निक परिस्थितियों में की गयी। मनोविज्ञार्न पर इस स्कूल क काफी प्रभार्व पड़ार् थार्। इसी कारण मनोवैज्ञार्निक ने इसे प्रथम बल कहार्। व्यवहार्रवार्दियों द्वार्रार् व्यवहार्र की व्यार्ख्यार् करने में अप्रेक्षणीय मार्नसिक बलों को पूर्णत: अस्वीकश्त कर दियार् थार्, वहीं सार्इमण्ड फ्रार्यड ने ऐसे अदश्श्य एवं अचेतन मार्नसिक बलों को मार्नव प्रकश्त्ति तथार् व्यवहार्र को समझने के लिये काफी महत्वपूर्ण बतार्यार्।

मनोविश्लेषणवार्द की विशेषतार्यें

1. स्थलार्कृतिक संरचनार्

फ्रार्यड ने मन के तीन स्तरों क वर्णन कियार् है-चेतन, अर्द्वचेतन तथार् अचेतन। मन के चेतन में वैसी अनुभूति होती है जिससे व्यक्ति वर्तमार्न समय में पूर्णत: अवगत रहतार् है। अर्द्धचेतन में वैसी अनुभूतियार्ं संचित होती है जिनमें व्यक्ति वर्तमार्न समय में अवगत तो नहीं रहतार् है। परन्तु थोड़ी कोशिश करने पर उससे अवगत हो सकतार् है। अचेतन में वैसी अनुभूतियार्ं संचित होती है जिनसे व्यक्ति वर्तमार्न समय में अवगत तो नही रहतार् है, परन्तु थोड़ार् कोशिश करने पर उससे अवगत हो सकतार् है। अचेतन में वैसी अनुभूतियार्ं, इच्छार्एं आदि होती है जो कभी चेतन में थी लेकिन प्रार्य: असार्मार्जिक होने के कारण चेतन से दमित कर दी गयी और अचेतन स्तर पर चली गयी। फ्रार्यड ने चेतन, अर्द्धचेतन तथार् अचेतन में से, अचेतन को सर्वार्धिक महत्वपूर्ण मार्नार् है। यह भी मार्नार् है कि व्यक्ति क व्यवहार्र अचेतन की प्रेरणार्ओं द्वार्रार् निर्धार्रित होतार् है।

2. संरचनार्त्मक मार्डल

फ्रार्यड ने मार्नव व्यक्तित्व के तीन भार्ग बतार्ये – उपार्हं, अहं तथार् परार्हं। उपार्हं मूल प्रवृत्तियों क भण्डार्र होतार् है और यह आनन्द के नियम द्वार्रार् संचार्लित होतार् है तथार् यह पूर्णत: अचेतन होतार् है। उपार्हं केवल आनन्द प्रार्प्त करनार् चार्हतार् है। अत: उपार्हं में जो इच्छार्ए उत्पन्न होती है उनक मुख्य लक्ष्य सुख की प्रार्प्ति करनार् होतार् है। चार्हे वह इच्छार् सार्मार्जिक दृष्टिकोण से उचित हो यार् अनुचित अथवार् नैतिक दृष्टिकोण से नैतिक हो यार् अनैतिक हो। उनके व्यक्तित्व में होती है। अहं व्यक्तित्व क कार्यपार्लक होतार् है तथार् यह वार्स्तविकतार् के नियम द्वार्रार् संचार्लित होतार् है। अहं को समय तथार् वार्स्तविकतार् क ज्ञार्न होतार् है। परार्हं व्यक्तित्व क नैतिक कमार्ण्डर होतार् है। यह नैतिकतार् के नियम द्वार्रार् संचार्लित होतार् है। परार्हं आदर्शो एवं नैतिकतार्ओं क भंडार्र होतार् है तथार् बच्चों के समार्जीकरण में यह प्रमुख भूमिक निभार्तार् है।

3. दुश्चिंतार् एवं मनोरचनार्एं

फ्रार्यड के अनुसार्र दुश्चिंतार् एक दु:खद अवस्थार् है जो व्यक्ति को आने वार्ले खतरों से आगार्ह करतार् है। इन्होने दुश्चिंतार् के तीन प्रकार बतार्ये – वार्स्तविक दुश्चिंतार्, तंत्रिकातार्पी दुश्चिंतार् तथार् नैतिकतार् संबंधी दुश्चिंतार्। वार्ºय वार्तार्वरण में मौजूद खतरों जैसे आग, सार्ंप, भूकम्प आदि से जब व्यक्ति में चिन्तार् उत्पन्न होती है तो उसे वार्स्तविक दुश्चिंतार् कहते है। तंत्रिकातार्पी दुश्चिंतार् में व्यक्ति को उपार्हं प्रवृत्तियों से खतरार् उत्पन्न हो जार्तार् है। नैतिकतार्-संबंधी दुश्चिंतार् में अहं को परार्हं से दंडित कये जार्ने की धमकी मिलती है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति में आत्मदोष, लज्जार् आदि जैसी मार्नसिक स्थिति उत्पन्न हो जार्ती है। इन चिंतार्ओं से बचने के लिये व्यक्ति विभिन्न तरह ही मनोरचनार्ओं क सहार्रार् लेतार् है। इन मनोरचनार्ओं में दमन युक्त्यार्भार्स, प्रक्षेपण, आत्मीकरण आदि मुख्य है।

मनोविश्लेषणवार्द क शिक्षार् में योगदार्न

  1. शिक्षार् में अचेतन प्रेरणार्ओं क बड़ार् महत्व बतार्यार् गयार् है। इससे शिक्षाथियों के उन व्यवहार्रों को समझने में शिक्षार् मनोवैज्ञार्निक को काफी मदद मिलती है जो ऊपर से देखने में बिनार् कारण लगते है। बार्लक द्वार्रार् कियार् गयार् कोर्इ भी कार्य जिसे बार्लक व्यक्त नहीं कर पार्तार् है। इन्हीं अचेतन की प्रेरणार्ओं में छिपार् रहतार् है। 
  2. मनोविश्लेषणवार्द ने एक बच्चे के जीवन की प्रार्रम्भिक अनुभूतियों व अनुभवों पर काफी बल दियार् है जोकि उसकी शैक्षिक प्रक्रियार् को प्रभार्वित करतार् है। बच्चे को जो भी अनुभव अपने जीवन के पार्ंच वर्षो में मिलते है वे ही उसके व्यक्तित्व की नीवं रखते है। यदि जीवन के आरम्भिक वर्षो में बच्चे को प्यार्र स्नेह और सहार्नुभूति मिलती है तो जीवन के प्रति धनार्त्मक अभिवश्त्ति क जन्म होतार् है। इसके विपरीत यदि ऋणार्त्मक व दण्डार्त्मक पुनर्वलन की अधिकतार् होती है तो भविष्य के लिये खतरार् उत्पन्न हो जार्तार् है।
  3. मनोविश्लेषणवार्द ने बच्चों के लिये विरेचन प्रक्रियार् को महत्वपूर्ण बतार्यार्। बच्चों को कक्षार् के अन्दर व बार्हर अपने संवेगों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रतार् होनी चार्हिए। 
  4. मनोविश्लेषणवार्द ने शिक्षार् मनोवैज्ञार्निकों को समस्यार्त्मक बार्लकों के कारणों तथार् इन्हीं बच्चों को पुन: समार्योजित करने में मदद दी। 
  5. इस वार्द ने शिक्षार् प्रक्रियार् में संवेगों की भूमिक पर विशेष बल दियार्।
  6. व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में स्वतन्त्र भार्वनार्ओं की अभिव्यक्ति क विशेष महत्व होतार् है। मनोविश्लेषणवार्द ने इस स्वतंत्रतार् पर विशेष बल डार्लार्। 
  7. बार्ल्यकालीन अनुभवों क मार्नव व्यक्तित्व पर विशेष प्रभार्व होतार् है। इसी कारण शिक्षार् मनोवैज्ञार्निकों ने बार्ल्यकालीन शैक्षिक व्यवस्थार् पर विशेष बल दियार्। 
  8. विद्याथी जीवन में अध्यार्पक की महत्वपूर्ण भूमिक होती है। विद्याथियों के सार्थ बने अध्यार्पक के अन्तवैयक्तिक सम्बन्ध ही उनके व्यवहार्र को प्रभार्वित करते है और जीवन के प्रति धनार्त्मक अभिवृत्ति विकसित करने में मदद करतार् है। अत: अध्यार्पकों क व्यवहार्र विद्याथियों के प्रति ध् नार्त्मक होनार् चार्हिये।

गेस्टार्ल्ट मनोविज्ञार्न

गेस्टार्ल्ट मनोविज्ञार्न की स्थार्पनार् जर्मनी में मैक्स बरदाइमर द्वार्रार् 1912 र्इ0 में की गयी। इस स्कूल के विकास में दो अन्य मनोवैज्ञार्निकों, कर्ट कौफ्क (1887-1941) तथार् ओल्फगैंग कोहलर (1887-1967) ने भी महत्वपूर्ण भूमिक निभार्यी। इस स्कूल की स्थार्पनार् वुण्ट व टिचनर की आणुविक विचार्रधार्रार् के विरोध में हुआ थार्। इस स्कूल क मुख्य बल व्यवहार्र में सम्पूर्णतार् के अध्ययन पर है। इस स्कूल में अंश की अपेक्षार् सम्पूर्ण पर बल देते हुये बतार्यार् कि यद्यपि सभी अंश मिलकर सम्पूर्णतार् क निर्मार्ण करते है। परन्तु सम्पूर्णतार् की विशेषतार्एं अंश की विशेषतार्ओं से भिन्न होती है। गेस्टार्ल्ट मनोवैज्ञार्निकों ने इसे गेस्टार्ल्ट की संज्ञार् दी। जिसक अर्थ प्रार्रूप आकार यार् आकृति बतार्यार्। इस स्कूल द्वार्रार् प्रत्यक्षण के क्षेत्र में प्रयोगार्त्मक शोध किए गए है। जिससे प्रयोगार्त्मक मनोविज्ञार्न क नक्शार् ही बदल गयार्। प्रत्यक्षण के अतिरिक्त इन मनोवैज्ञार्निकों ने सीखनार्, चिंतन तथार् स्मृति के क्षेत्र में काफी योगदार्न दियार्। जिसने शिक्षार् मनोविज्ञार्न को अत्यधिक प्रभार्वित कियार्।

1. प्रत्यक्षण

प्रत्यक्षण के क्षेत्र में किये गये प्रयोगों ने गेस्टार्ल्ट मनोविज्ञार्न के महत्व को बढ़ार् दियार्। गेस्टार्ल्ट मनोवैज्ञार्निकों ने प्रत्यक्षण के सिद्धार्न्त बतार्ये-

  1. प्रैगनैन्ज क नियम- इस नियम को उत्तम आकृति क नियम भी कहार् जार्तार् है। यह नियम इस बार्त को इंगित करतार् है कि व्यक्ति देखे गये उद्दीपनों को एक संतुलित एवं समकित आकृति के रूप में प्रत्यक्षण करतार् है, जबकि उद्दीपन पैटर्न इतनार् संतुलित व समकित नही भी हो सकतार् है। 
  2. समार्नतार् क नियम – इस नियम में इस बार्त पर बल डार्लार् है कि वस्तु जिनकी संरचनार् समार्न होती है, उसे व्यक्ति एक सार्थ संगठित कर एक प्रत्यक्षणार्त्मक समग्रतार् के रूप में प्रत्यक्ष करतार् है।
  3. समीप्यतार् क नियम – इस नियम के अनुसार्र वे सभी वस्तुएं जो समय तथार् स्थार्न में एक-दूसरे से नजदीक होते है, उसे व्यक्ति प्रतयक्षणार्त्मक रूप में संगठित कर प्रत्यक्षण करतार् है।
  4. निरन्तरतार् क नियम – इस नियम के अनुसार्र वस्तुओं में एक दिशार् में आगे बढ़ते रहने की निरन्तरतार् बनी रहती है, उसे व्यक्ति एक संगठित आकृति वार्लार् तस्वीर के रूप में प्रत्यक्षण करतार् है। 
  5. आकृति पृष्ठभूमि क नियम – यह नियम इस तथ्य पर बल डार्लतार् है कि प्रत्यक्षण किसी आकृति के रूप में संगठित हो जार्ती है जो एक निश्चित पृष्ठभूमि पर दिखार्यी देती है। आकृति क एक मुख्य गुण यह होतार् है कि यह स्पष्ट एवं उत्कृष्ट होती है तथार् पृष्ठभूमि तुलनार्त्मक रूप से अस्पष्ट एवं अनुउत्कृष्ट होते है। पलटार्वी आकृति में आकृति कभी पृष्ठभूमि में और पृष्ठभूमि कभी आकृति के रूप में पलटते हुए देख पड़तार् है।

2. सीखनार्

गेस्टार्ल्ट मनोवैज्ञार्निकों ने सीखने के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोगार्त्मक अध्ययन करके सीखने की एक नयी अन्तर्दृष्टि विधि प्रदार्न की । इन लोगों ने यह स्पष्ट कियार् कि सीखनार् एक तरह क क्षेत्र क प्रत्यक्षणार्त्मक संगठन होतार् है। जिसमें व्यक्ति परिस्थिति को नये ढंग से देखतार् है। इन लोगों ने भी यह स्पष्ट कियार् कि प्रार्णी प्रयत्न एवं भूल से नही बल्कि सूझ से सीखतार् है। सूझ व्यक्ति में किसी समस्यार् क समार्धार्न करते समय यार् किसी पार्ठ को सीखते समय प्रार्य: अचार्नक विकसित होती है और व्यक्ति उद्धीपनों के बीच के संबन्धों के अर्थपूर्ण संबंध को समझ जार्तार् है। इससे सीखने की प्रक्रियार् में तेजी आ जार्ती है। इसलिये गेस्टार्ल्टवार्दियों क मत थार् कि सीखनार् भी अचार्नक होतार् है न कि अभ्यार्स के सार्थ क्रमिक ढंग से धीरे-धीरे होतार् है। गेस्टार्ल्टवार्दियों ने सूझपूर्ण सीखनार् के चार्र व्यवहार्रार्त्मक सूचकांक बतलार्ये-किंकत्र्तव्य विमुढतार् से अचार्नक पूर्णतार् की ओर, अन्तरण नियम को समझने के बार्द निष्पार्दन में तेजी व सहजतार्, उत्तम धार्रण तथार् समार्न समस्यार्त्मक परिस्थिति में तत्परतार् के सार्थ समार्धार्न क अन्तरण। इस अंतिम प्रकार के अन्तरण को गेस्टार्ल्टवार्दियों ने पक्षार्न्तर कहार् है।

3. चिन्तन

गेस्टार्ल्ट मनोवैज्ञार्निकों ने चिन्तन के क्षेत्र में अध्ययन कर शिक्षार् मनोवज्ञार्न के लिये बहुत ही उपयोगी तथ्य प्रदार्न कियार् है। वरदार्इमर ने चिन्तन प्रक्रियार् क वैज्ञार्निक अध्ययन कियार्। अपनी एक पुस्तक प्रोडक्टीव थिंकिंग में इन प्रयोगों को प्रकाशित कियार्। इनके अनुसार्र चिन्तन क अध्ययन समग्रतार् के रूप में कियार् जार्नार् चार्हिये। किसी समस्यार् के समार्धार्न पर चिन्तन करते समय व्यक्ति को परिस्थिति के बार्रे में समग्रस्वरूप से ध्यार्न में रखनार् चार्हिये। समस्यार् क समार्धार्न समग्रतार् से अंश की ओर बढ़नार् चार्हिये।

बरदार्इमर ने चिन्तन के तीन प्रकार बतार्ये ए, बी तथार् वाइ। ए प्रकार क चिंतन एक तरह क उत्पार्दी चिन्तन है। जिसमें बार्लक लक्ष्य तथार् उस पर पहुंचने के सार्धनों के बीच सीधार् संबंध स्थार्पित कर पार्तार् है। इस तरह के चिन्तन में बार्लक समस्यार् के विभिन्न पहलुओं क पुनर्सगठन करने में समर्थ हो पार्ते है। वाइ प्रकार क चिन्तन ऐसार् चिंतन है जिसमें प्रयत्न एवं भूल की प्रधार्नतार् होती है तथार् समस्यार् के विभिन्न पहलुओं क आपसी संबंध बिनार् समझे-बूझे ही बार्लक उसक समार्धार्न करनार् प्रार्रम्भ कर देतार् है। वाइ प्रकार क चिंतन अधिक होने से ए प्रकार क चिन्तन स्वभार्वत: कम हो जार्तार् है। बी प्रकार क चिन्तन ऐसार् चिंतन है जो अंशत: उत्पार्दी तथार् अंशत: अनुत्पार्दी व यार्ंत्रिक होतार् है।

4. स्मृति

गेस्टार्ल्ट मनोवैज्ञार्निकों ने स्मृति के क्षेत्र में प्रत्यक्षण के नियमों क उपयोग कियार् है। इन्होंने स्मृति को एक गत्यार्त्मक प्रक्रियार् मार्नार् है। जिसमें समय बीतने के सार्थ-सार्थ कर्इ तरह के क्रमिक परिवर्तन होते है। ऐसे क्रमिक परिवर्तन प्रत्यक्षणार्त्मक संगठन के नियम के अनुरूप होते है। विभिन्न प्रयोगार्त्मक अध्ययनों से इस बार्त की पुष्टि मनोवैज्ञार्निकों ने की है। गिब्सन (1929), बाटलैट (1932) एवं आलपोर्ट एवं पोस्टमैन (1947) ने अपने प्रयोगों से यह स्पष्ट कियार् कि मूल सार्मग्रियों की धार्रणार् में समय बीतने के सार्थ विकृति होती है, परन्तु इस विकृति क स्वरूप ऐसार् होतार् है जिससे मूल सार्मग्रियों क स्वरूप पहले से कुछ उन्नत हो जार्तार् है। शिक्षार् मनोवैज्ञार्निकों को गेस्टार्ल्टवार्दियों के इस योगदार्न से स्मृति के स्वरूप को समझने में काफी मदद मिली। इसी कारण इन लोगों ने स्मरण के स्वरूप को पुनरूत्पार्दक न कहकर रचनार्त्मक कहार् है।

गेस्टार्ल्टवार्द क शिक्षार् में योगदार्न

  1. गेस्टार्ल्टवार्दियों ने प्रत्यक्षण के नियमों क प्रयोग सीखने के क्षेत्र में भी कियार्। अत: अध्यार्पक को चार्हिये कि वह शिक्षाथी के सार्मने विषय सार्मग्री को पूर्ण रूप में प्रस्तुत करे।
  2. गेस्टार्ल्टवार्दी मनोवैज्ञार्निकों ने सर्वार्ंिगक व्यवहार्र की महत्तार् पर बल दियार्। प्रार्णी द्वार्रार् जो भी अनुभव प्रार्प्त किये जार्ते है वह उन्हें समग्र रूप में बतार्तार् है नार्कि उद्वीपन-अनुक्रियार् संबन्धो के रूप में तोड कर। 
  3. व्यक्तित्व विकास में वार्तार्वरण की अग्रणी भूमिक पर बल दियार्। अत: स्कूल क वार्तार्वरण ऐसार् होनार् चार्हिये जोकि बच्चे के व्यक्तित्व विकास में सहार्यक हों।
  4. शिक्षाथियों में सूझ उत्पन्न करने पर बल दियार् गयार्। तार्कि विद्याथी समस्यार्त्मक परिस्थिति क समार्धार्न सूझ विधि से करके सीख सके।
  5. सीखने के लिये यह आवश्यक है कि अधिगमाथी को उद्धेश्यों और लक्ष्यों को जार्नकारी हो। अत: अध्यार्पक क प्रयार्स होनार् चार्हिये कि विद्याथी स्वयं के लिये एक वैयक्तिक लक्ष्य निर्धार्रित करें। यह वैयक्तिक लक्ष्य शिक्षार्थ्र्ार्ी के समक्ष एक तनार्व की स्थिति उत्पन्न कर देगार्, जिससे विद्याथी उस तनार्व को दूर करने के लिये सीखने के लिये सक्रिय हो जार्येगार्। इस प्रकार लक्ष्यों क निर्धार्रण व्यक्ति को सक्रिय बनार्तार् है। 
  6. स्कूल में शिक्षण-अधिगम प्रक्रियार् को उन्नत बनार्ने के लिये अध्यार्पक, प्रध् ार्ार्नार्चाय और विद्याथियों को संगठित होकर कार्य करनार् चार्हिये। 
  7. अध्यार्पकों को विद्याथियों के विचार्रों को जार्नने व समझने क प्रयार्स करनार् चार्हिये। अपने विचार्रों को उन पर लार्दकर विद्याथियों के प्रत्यक्षण को प्रभार्वित नही करनार् चार्हिये।
  8. अध्यार्पक को पार्ठ्न सार्मग्री रूचिपूर्ण तथार् समझ आने योग्य रूप में शिक्षार्थ्र्ार्ी के समक्ष प्रस्तुत करनार् चार्हिये। जो भी निर्देश दिये जार्ये अर्थपूर्ण होने चार्हिये।
  9. अध्यार्पकों को विद्याथी के सोचने को क्षमतार् यार् कार्यशैली की जार्नकारी होनी चार्हिये। यदि कोर्इ बच्चार् अमूर्त चिंतन करने योग्य नहीं है तो सार्चार्ं केतिक रूप में प्रस्तुत की गयी सूचनार्यें उसके लिये लार्भदार्यक नहीं होगी। 
  10. अध्यार्पक को विद्याथियों के समक्ष सूचनार्यें इस तरह संगठित करके प्रस्तुत करनी चार्हिये कि विद्याथी नये व पुरार्ने अनुभवों की विवेचनार् करके उन्हें समझने योग्य हो जार्ये।

हार्रमिक मनोविज्ञार्न

हार्रमिक मनोविज्ञार्न की स्थार्पनार् विलियम मैक्डूगल ने की। उन्होने ग्रीक शब्द Horme से Hormic बनार्यार्। जिसक अर्थ होतार् है वृत्ति। मैक्डूगल ने मार्नव व्यवहार्र की जो व्यार्ख्यार् व्यवहार्रवार्दियों द्वार्रार् दी गयी, उसक विरोध करते हुय बतार्यार् कि वृत्ति उद्धेश्यपूर्ण होती है। उनक विचार्र थार् कि उद्धेश्य यार् लक्ष्य व्यक्ति को संबंधित अनुक्रियार् करने के लिए बिनार् किसी तरह के आभार्स पैदार् किए हुए ही प्रेरित करतार् है। हार्लार्ंकि कभी-कभी एक अस्पष्ट आभार्स व्यक्ति में उत्पन्न हो जार्तार् है। इन्होंने उद्धेश्यपूर्ण व्यवहार्र की चार्र विशेषतार्ओं क वर्णन कियार् –

  1. उद्धेश्यपूर्ण व्यवहार्र अपने आप होतार् है। अन्य शब्दों में कोर्इ उद्धेश्य यार् लक्ष्य को देखकर व्यक्ति स्वत: संबंधित अनुक्रियार् कर देतार् है। 
  2. उद्धेश्यपूर्ण व्यवहार्र क प्रभार्व लक्ष्य पर पहुंचने के कुछ देर बार्द भी प्रार्णी में बनार् रहतार् है। 
  3. उद्धेश्यपूर्ण व्यवहार्र में प्रार्णी एक के बार्द एक क्रियार्एं व्यक्ति तब तक करतार् जार्तार् है जब तक कि वह लक्ष्य पर न पहुंच जार्ए। 
  4. उद्धेश्यपूर्ण व्यवहार्र अभ्यार्स से उन्नत बनार्तार् है।

मैकडूगल के अनुसार्र उद्धेश्यपूर्ण व्यवहार्र करने के पीछे छिपी शक्ति को मूल प्रवृत्ति कहार् गयार् है। मूल प्रवृत्ति व्यक्ति में एक जन्मजार्त मनोदैहिक प्रवृत्ति होती है जो व्यक्ति की कोर्इ उद्धेश्यपूर्ण क्रियार् करने के लिये बार्ध्य करती है। मैक्डूगल ने प्रमुख सार्त मूल प्रवृत्तियार्ं बतार्यी जो कि किसी न किसी संवेग से जुड़ी होती है। वे सार्त मूल प्रवृत्तियार्ं तथार् उनसे सम्बंधित संवेग है –

मूल प्रवृत्ति  संवेग 
स्वीकृति विरक्ति
लड़ाइ क्रोध
आत्म-दृढ़कथन उल्लार्स
उत्सुक तार्  अचरज 
मार्तृत्व-पितृत्व नरम संवेग
आत्म-अपमार्न नकारार्त्मक
आत्म-भार्व उन्मुक्ति डर

हार्रमिक मनोविज्ञार्न क शिक्षार् में योगदार्न

शैक्षिक परिस्थितियों में हार्रमिक मनोविज्ञार्न द्वार्रार् प्रतिपार्दित मूल प्रवृत्ति के सिद्धार्न्त द्वार्रार् बार्लकों के मूलप्रवृत्तिक व्यवहार्रों को समझने में काफी सहार्यतार् मिली है। टार्रेन्स (1965) के अनुसार्र शिक्षक को शिक्षाथियों द्वार्रार् वर्ग में किए जार्ने वार्ले मूल-प्रवृत्ति से संबंधित स्वार्भार्विक व्यवहार्र को तो समझने में मदद मिलती है, सार्थ ही सार्थ इन शिक्षाथियों के विभिन्न तरह के, संवेगार्त्मक व्यवहार्र जैसे सार्थियों के सार्थ क्रोध करनार्, सार्थियों के सार्थ मिल कर खुशी मनार्नार्, अपने को स्वयं दोषी मार्ननार् आदि व्यवहार्रों के कारणों को भी समझने में, काफी मदद मिलती है। मूलप्रवृत्ति के सिद्धार्न्त ने विद्याथियों के व्यवहार्र को समझने योग्य बनार्यार्।

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