शिक्षार् क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार, प्रक्रियार्, सार्धन एवं कार्य

अमरकोश में शिक्षार् शब्द क प्रयोग णड्-वेदार्गों में से एक वेदार्ंग के लिये प्रयुक्त हुआ है। उस समय शिक्षार्शार्स्त्र क प्रयोजन वेदों की ऋचार्ओं क शुद्ध उच्चार्रण सिखार्नार् थार्।

शिक्षेत्यार्दि श्रुतेरंगमोंकारप्रणवौ समौ।

इतिहार्स पुरार्वण्त्तमण्दार्त्तार्द्यार्स्त्रय: स्वरार्।।

कदार्चित उस युग में वेदों क पठन-पार्ठन ही शिक्षार् क एक मार्त्र उद्देश्य रहार् होगार्, अत: ‘शिक्षार्’ शब्द स्वरशार्स्त्र के लिये रूढ़ बन गयार्। यदि शब्द की उत्पत्ति की दृष्टि से देखार् जार्ये तो शिक्षार् शब्द क उद्गम संस्कश्त की ‘शिक्ष्’ धार्तु से है। शिक्षार् क अर्थ है ‘‘सीखनार्’’। रंघुवंश में शिक्षार् शब्द क दो अर्थ सीखनार् और सिखार्नार् लियार् गयार् है।

भार्रतीय भार्षार्ओं में शिक्षार् के पर्यार्यवार्ची के रूप में विद्यार् तथार् ज्ञार्न शब्दों को भी प्रयोग कियार् जार्तार् है। विद्यार् शब्द क उद्गम भी ‘‘विद्’’ धार्तु से हुआ है, जिसक अर्थ होतार् है ‘‘जार्ननार्’’ पतार् लगार्नार्’ अथवार् ‘सीखनार्’। बार्द में ‘विद्यार्’ शब्द पार्ठ्यक्रम के रूप में रूढ़ हो गयार् है। आरम्भ में विद्यार् के अन्तर्गत चार्र विषयो क समार्वेश कियार् गयार्, कुछ समय पण्चार्त् मनु ने ‘‘आत्मविद्यार्’’ नार्मक पंचम विधार् क एक प्रकार भी जोड़ार् और शनै: शनै: विद्यार्ओं की संख्यार् चौदह हो गयी, जिसमें वेदार्ंग,वेद, धर्म, न्यार्य, मीमार्ंसार् आदि समार्वेशित हुये, परन्तु मूलत: विद्यार् शब्द क अर्थ ज्ञार्तव्य के रूप में प्रचलित रहार्।

भार्रतीय दर्शन में ज्ञार्न शब्द वही अर्थ रखतार् है जो कि व्यार्पक अर्थों में ‘‘शिक्षार्’’ क होतार् है। अमरकोश में ज्ञार्न अथवार् विज्ञार्न शब्दों क अन्तर स्पष्ट करते हुए कहार् गयार् है कि ज्ञार्न क विषय मुक्ति है, जबकि विज्ञार्न क णिल्प और विविध शार्स्त्र। दूसरे शब्दों में ज्ञार्न वह है जो मनुष्य को उन्नत करतार् है एवं मुक्ति क माग प्रशस्त करतार् है। हमने शिक्षार् को अपने दृष्टिकोण से देखार्-परखार् और परिभार्षित कियार् है।

1. शिक्षार् क शार्ब्दिक अर्थ – 

शिक्षार् के लिये प्रयुक्त अँग्रेजी शब्द एजुकेशन पर विचार्र करें तो भी उसक यही अर्थ निकलतार् है। ‘‘एजूकेशन’’ शब्द की उत्पत्ति लेटिन भार्षार् के तीन शब्दों से मार्नी गयी है।

  1. एजुकेटम – इसक अर्थ है- शिक्षण की क्रियार्
  2. एजुकेयर – शिक्षार् देनार्- ऊपर उठार्नार्, उठार्नार्
  3. एजुसियर – आगे बढ़नार्

सरल शब्दों में कहार् जार् सकतार् है कि शिक्षार् क अर्थ है- प्रशिक्षण, संवर्द्धन और पथ-प्रदर्शन करने क कार्य। इस प्रकार एजुकेशन क सर्वमार्न्य अर्थ हुआ बार्लक की जन्मजार्त शक्तियों यार् गुणों को विकसित करके उसक सर्वार्ंगीण विकास करनार्। इस शिक्षार् प्रक्रियार् के स्वरूप की व्यार्ख्यार् करने में मूल भूमिक दाशनिक, समार्जशार्स्त्रियों, रार्जनीतिशार्स्त्रियों, अर्थशार्स्त्रियों और वैज्ञार्निकों ने अदार् की है। सभी ने शिक्षार् को अपने-अपने दृष्टिकोणों से देखार्-परखार् और परिभार्षित कियार् है।

2. शिक्षार् क दाशनिक सम्प्रत्यय- 

दर्शन क विचार्र केन्द्र मनुष्य होतार् है। मार्नव जीवन के अन्तिम उद्देश्य की प्रार्प्ति क सार्धन माग निश्चित करने में दाशनिकों की रूचि होती है। मार्नव जीवन के अन्तिम उद्देश्य के सम्बंध में दाशनिकों के भिन्न मत हैं, अत: इसक प्रभार्व उनके द्वार्रार् दी गयी परिभार्षार्ओं में स्पष्ट झलकतार् है।

  1. जगतगुरू शंकरार्चाय की दृष्टि में –स: विद्यार् यार् विमुक्तये।
  2. भार्रतीय मनीणी स्वार्मी विवेकानन्द के अनुसार्र – शिक्षार् के द्वार्रार् मनुष्य को अपने पूर्णतार् को भी अनुभूति होनी चार्हिए। उनके शब्दों में- ‘‘ मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णतार् को अभिव्यक्त करनार् ही शिक्षार् है।’’
  3. युगपुरूष महार्त्मार् गॉधी के शब्दों में- ‘‘ शिक्षार् से मेरार् अभिप्रार्य बार्लक और मनुष्य के शरीर, मन तथार् आत्मार् के सर्वार्ंगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है।’’
  4. यूनार्नी दाशनिक प्लेटो शिक्षार् के द्वार्रार् शरीर और आत्मार् दोनों क विकाश के महत्व को स्वीकार करते है। उनके अनुसार्र – ‘‘ शिक्षार् क कार्य मनुष्य के शरीर और आत्मार् को वह पूर्णतार् प्रदार्न करनार् है, जिसके कि वे योग्य हैं।’’ 
  5. प्लटेो के शिष्य अरस्तू के अनुसार्र – ‘‘स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन क निर्मार्ण ही शिक्षार् है।’’
  6. भौतिकवार्दी चावार्कों की दृष्टि में-’’शिक्षार् वह है जो मनुष्य को सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने के योग्य बनार्ती है।’’
  7. हरबर्ट स्पेन्सर के अनुसार्र-’’शिक्षार् क अर्थ अन्त: शक्तियों क बार्ह्य जीवन से समन्वय स्थार्पित करनार् है।’’

3. शिक्षार् क समार्जशार्स्त्रीय सम्प्रत्यय- 

समार्ज शार्स्त्रियों क विचार्र केन्द्र समार्ज होतार् है और वे शिक्षार् को व्यक्ति एवं समार्ज के विकास क सार्धन मार्नते हैं। उन्होनें शिक्षार् प्रक्रियार् की प्रकृति के विषय में तथ्य उजार्गर किये-

  1. शिक्षार् एक समार्जिक प्रक्रियार् है- समार्जशार्स्त्रियार् ें के अनुसार्र जब दो यार् दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सार्मार्जिक अन्त: क्रियार् होती है तो वे एक दूसरे की भार्षार्, विचार्र, आचरण से प्रभार्वित होते हैं, यही सीखनार् है और जब कुछ कार्य निश्चित उद्देश्यों को ध्यार्न में रखकर कियार् जार्तार् है तो वह शिक्षार् कहलार्ती है। समार्जशार्स्त्रियों ने स्पष्ट कियार् कि शिक्षार् समार्ज के उद्देश्यों एंव लक्ष्यों को प्रार्प्ति क सार्धन है जैसार् समार्ज होतार् है वैसी उसकी शिक्षार् होती है।
  2. शिक्षार् एक अनवरत प्रक्रियार् है – समार्जशार्स्त्रियों क दसू रार् तथ्य यह है कि शिक्षार् समार्ज में सदैव चलती है। जन्म से प्रार्रम्भ होकर अन्त तक चलती रहती है। शिक्षार् पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। निरन्तरतार् उसक दूसरार् लक्षण है। जे0एस0 मेकजी के अनुसार्र- ‘‘शिक्षार् एक ऐसी प्रक्रियार् है, जो आजीवन चलती रहती है, और जीवन के प्रार्य: प्रत्येक अनुभव से उसके भण्डार्र में वृद्धि होती है।’’ प्रो0 डमविल के अनुसार्र- ‘‘शिक्षार् के व्यार्पक अर्थ में वे सभी प्रभार्व आते हैं जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मश्त्यु तक प्रभार्वित करते हैं।’’
  3. शिक्षार् एक द्वि-ध्रुवीय प्रक्रियार् है- समार्जशार्स्त्रियों ने स्पष्ट कियार् है कि शिक्षार् की प्रक्रियार् में एक पक्ष प्रभार्वित करतार् है और दूसरार् पक्ष प्रभार्वित होतार् है। शिक्षार् के दो ध्रुव होते हैं- एक वह जो प्रभार्वित करतार् है (शिक्षक) और दूसरार् वह जो प्रभार्वित होतार् है (शिक्षाथी)। जार्न डी0वी0 ने शिक्षार् के दो धु्रव मार्ने है- एक मनोवैज्ञार्निक और दूसरार् सार्मार्जिक। मनोवैज्ञार्निक अंग से उनक तार्त्पर्य सीखने वार्ले की रूचि, रूझार्न और शक्ति से है और सार्मार्जिक अंग से उनक तार्त्पर्य उनके सार्मार्जिक पर्यार्वरण से है।
  4. शिक्षार् विकास की प्रक्रियार् है- मनुष्य की शिक्षार् उस े कवे ल परिस्थितियार् ें के सार्थ सार्मन्जस्य करनार् ही नही सिखार्ती है वरन् उसे सार्मार्जिक परिवर्तन करने और परिवर्तनों को स्वीकारने के लिये तैयार्र करती है। इस प्रकार शिक्षार् के उद्देश्य पार्ठ्यचर्चार् और शिक्षण विधियों आदि में आवश्यकतार्नुसार्र परिवर्तन होतार् रहतार् है। डार्0 सर्वपल्ली रार्धार्कश्ण्णन ने स्पष्ट कहार् है कि- ‘‘शिक्षार् को मनुष्य और समार्ज देार्नेार्ं क निर्मार्ण करनार् चार्हिये।’’
  5. शिक्षार् एक गतिशील प्रक्रियार् है- शिक्षार् वह मार्ध्यम है जिसके द्वार्रार् मनुष्य अपनी सभ्यतार् एवं संस्कण्ति में निरन्तर विकास करतार् है। इस विकास के लिये उसकी एक पीढ़ी अपने ज्ञार्न, कलार्, कौशल को दूसरी पीढ़ी को हस्तार्न्तरित करती है। इस हस्तार्न्तरण को प्रत्येक समार्ज विद्यार्लयी शिक्षार् में समार्हित करतार् है। अगर शिक्षार् गतिशील न होती तो हम विकास न कर पार्ते। पार्ण्चार्त्य जगत के प्रसिद्ध समार्जशार्स्त्री ओटवे महोदय ने शिक्षार् के स्वरूप एवं कार्य दोनों को समार्हित करते हुये स्पष्ट कहार् है कि- ‘‘शिक्षार् की सम्पूर्ण प्रक्रियार् व्यष्टियों एवं सार्मार्जिक समूहों के बीच की अन्त:क्रियार् है जो व्यष्टियों के विकास के लिये कुछ निश्चित उद्देश्यों से की जार्ती है।’’ टी0 रेमण्ट महोदय ने शिक्षार् को इस रूप में परिभार्षित कियार् है- ‘‘शिक्षार् विकास की प्रक्रियार् है जिसमें मनुष्य शैशवकाल से प्रौढ़काल तक विकास करतार् है और जिसके द्वार्रार् वह धीरे-धीरे अपने को अनेक प्रकार से अपने प्रार्कश्तिक सार्मार्जिक और आध्यार्त्मिक पर्यार्वरण के अनुकूल बनार्तार् है।’’

4. शिक्षार् क आर्थिक सम्प्रत्यय – 

अर्थशार्स्त्रियों के विचार्र समार्ज कें आर्थिक श्रोत और आर्थिक तन्त्र होते है। शिक्षार् को वे एक उत्पार्दक क्रियार् के रूप में स्वीकार करते हैं। उनकी दृष्टि में शिक्षार् उपभोग की वस्तुओं के सार्थ उत्पार्दन की भी कारक होती है। णोध ये परिणार्म देते हैं कि शिक्षित मनुष्य की उत्पार्दन शक्ति और संगठन क्षमतार् अशिक्षित व्यक्ति की अपेक्षार् अधिक होती है। अर्थशार्स्त्री शिक्षार् को एक निवेश के रूप में स्वीकार करते हैं। उनकी दृष्टि से- शिक्षार् वह आर्थिक निवेश है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति में उत्पार्दन एंव संगठन के कौशलों क विकास कियार् जार्तार् है और इस प्रकार व्यक्ति, समार्ज और रार्ष्ट्र की उत्पार्दन क्षमतार् बढ़ाइ जार्ती है और उनक आर्थिक विकास होतार् है।

5. शिक्षार् क मनोवैज्ञार्निक सम्प्रत्यय- 

भार्रतीय योग मनोविज्ञार्न क विचार्र केन्द्र मनुष्य क बार्ह्य स्वरूप और उसक अन्त: करण दोनो होते हैं। बार्ह्य स्वरूप में वह उसकी कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञार्नेन्द्रियों क अध्ययन करतार् है और अन्त:करण में मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और आत्मार् क अध्ययन करतार् है। उसकी दृष्टि से- शिक्षार् क अर्थ है मनुष्य की बार्ह्य इन्द्रियों और अन्त:करण क प्रशिक्षण। शिक्षार् के द्वार्रार् सर्वप्रथम शरीर मस्तिष्क और चित्त एवं आत्मार् क विकास होनार् चार्हिए। इस विषय में जर्मन शिक्षार्शार्स्त्री पेस्टार्लॉजी क मत है कि यह विकास स्वार्भार्विक, सम और प्रगतिशील होनार् चार्हिये। उनके शब्दों में- ‘‘शिक्षार् मनुष्य की जन्मजार्त शक्तियों क स्वार्भार्विक समरस और प्रगतिशील विकास है।

पेस्टार्लॉजी के शिष्य फ्रोबेल ने शिक्षार् को इस रूप में परिभार्षित कियार् है- ‘‘शिक्षार् वह प्रक्रियार् है, जिसके द्वार्रार् बार्लक अपनी आन्तरिक शक्तियों को बार्हर की ओर प्रकट करतार् है।’’

6. शिक्षार् क वैज्ञार्निक सम्प्रत्यय – 

वैज्ञार्निको  क विषय क्षेत्र सम्पूर्ण ब्रह्मार्ण्ड एवं समस्त क्रियार्यें है। वे किसी भी वस्तु अथवार् क्रियार् को वस्तुनिष्ठ ढंग से देखते हैं। शिक्षार् को वे मनुष्य की शक्तियोंके बार्ह्य जीवनार्नुकूल विकास के सार्धन रूप में स्वीकार करते है। हरबर्ट स्पेन्सर के शब्दो में- ‘‘शिक्षार् क अर्थ अन्त:शक्तियों क बार्ह्य जीवन से समन्वय स्थार्पित करनार् है।’’

शिक्षार् की परिभार्षार्

विभिन्न शिक्षार्शार्स्त्रियों ने शिक्षार् को अपने-अपने दृष्टिकोण से देखार् है।

  1. सुकरार्त-’’शिक्षार् क अर्थ है- प्रत्यके मनुष्य के मस्तिष्क में अदृश्य रूप में विद्यमार्न संसार्र के सर्वमार्न्य विचार्रों को प्रकाण में लार्नार्।’’
  2. एडीसन-’’अब शिक्षार् मार्नव मस्तिष्क को प्रभार्वित करती है तब वह उसके प्रत्येक गुण को पूर्णतार् को लार्कर व्यक्त करती है।’’ 
  3. फ्रार्बेल- ‘‘शिक्षार् वह प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् बार्लक की जन्मजार्त शक्तियॉ बार्हर प्रकट होती है।’’
  4. टी0पी0नन-’’शिक्षार् व्यक्तित्व क पूर्ण विकास है जिससे कि व्यक्ति अपनी पूर्ण योग्यतार् के अनुसार्र मार्नव जीवन को योगदार्न दे सके।’’
  5. पेस्टार्लॉजी- ‘‘शिक्षार् मनण्ु य की जन्मजार्त शक्तियों क स्वार्भार्विक सार्मजं स्यपूर्ण और प्रगतिशील विकास है।’’
  6. जेम्स- ‘‘शिक्षार् कार्य सम्बध्ं ार्ी अर्जित आदतों क सगं ठन है, जो व्यक्ति को उसके भौतिक और सार्मार्जिक वार्तार्वरण में उचित स्थार्न देती है।’’
  7. हान-’’शिक्षार् णार्रीरिक और मार्नसिक रूप से विज्ञार्न विकसित सचते मार्नव क अपने मार्नसिक संवेगार्त्मक और संकल्पित वार्तार्वरण से उत्तम सार्मंजस्य स्थार्पित करनार् है।’’
  8. ब्रार््रार््उन-’’शिक्षार् चैतन्य रूप में एक नियंि त्रत प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति के व्यवहार्र में परिवर्तन किये जार्ते हैं और व्यक्ति के द्वार्रार् समूह में।’’

शिक्षार् क व्यार्पक एवं संकुचित अर्थ

किसी समार्ज में किसी बच्चे की शिक्षार् उसके परिवार्र, छोटे बड़े विभिन्न सार्मार्जिक समूहों, सार्मुदार्यिक केन्द्रों और विभिन्न प्रकार के विद्यार्लयों में चलने वार्ली शिक्षार् को ही शिक्षार् कहते हैं। इस प्रकार शिक्षार् शब्द क प्रयोग दो रूपो में होतार् है- एक व्यार्पक रूप में और दूसरार् संकुचित रूप में।

1. शिक्षार् व्यार्पक अर्थ में- 

शिक्षार् अपने व्यार्पक अर्थ में आजीवन चलने वार्ली प्रक्रियार् है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति अपने जन्म से मश्त्यु तक जो कुछ सीखतार् और अनुभव करतार् है वह सब शिक्षार् के व्यार्पक अर्थ के अन्तर्गत मार्नार् जार्तार् है। शिक्षार्शार्स्त्री जब शिक्षार् की बार्त करते हैं तो वे शिक्षार् के इसी रूप को अपनी विचार्र सीमार् में रखते हैं। इस सम्बंध में हम विद्वार्नों के विचार्रों को नीचे अंकित कर रहे हैं। यथार्- लार्ज- ‘‘बच्चार् अपने मार्तार्-पितार् को और छार्त्र अपने शिक्षको को शिक्षितार् करतार् है। प्रत्येक बार्त, हम जो कहते, सोचते यार् करते हैं हमें किसी प्रकार भी दूसरे व्यक्तियों के द्वार्रार् कहीं, सोची यार् की गयी बार्त से कम शिक्षित नहीं करती है। इस व्यार्पक अर्थ में जीवन शिक्षार् है और शिक्षार् जीवन है।’’

टी0 रेमेमण्ट- ‘‘शिक्षार् विकास क वह क्रम है, जिससे व्यक्ति अपने को धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार से अपने भौतिक, सार्मार्जिक और आध्यार्त्मिक वार्तार्वरण के अनुकूल बनार् लेतार् है। जीवन ही वार्स्तव में शिक्षित करतार् है। व्यक्ति अपने व्यवसार्य, पार्रिवार्रिक जीवन, मित्रतार्, विवार्ह, पितृत्व, मनोरंजन, यार्त्रार् आदि के द्वार्रार् शिक्षित कियार् जार्तार् है।’’

2. शिक्षार् संकुचित अर्थ में- 

शिक्षार् के सीमित अर्थ के अनुसार्र बार्लक को स्कलू में दी जार्ने वार्ली शिक्षार् से है। दूसरे शब्दों में बार्लक को एक निश्चित योजनार् के अनुसार्र, एक निश्चित समय और निश्चित विधियों से निश्चित प्रकार क ज्ञार्न दियार् जार्तार् है। यह शिक्षार् कुछ विशेष प्रभार्वों और विशेष विषयों तक ही सीमित रहती है। बार्लक इस शिक्षार् को कुछ ही वर्षों तक प्रार्प्त कर सकतार् है इसको प्रार्प्त करने क मुख्य स्थार्न विद्यार्लय होतार् है। शिक्षार् देने वार्लार् शिक्षक कहलार्तार् है। शिक्षार् के संकुचित अर्थ की ओर अधिक स्पष्ट करने के लिये हम कुछ विद्वार्नों के विचार्रों को नीचे दे रहे हैं। यथार्- टी0रेमण्ट- ‘‘संकुचित अर्थ में शिक्षार् क प्रयोग बोलचार्ल की भार्षार् और कानून में कियार् जार्तार् है। इस अर्थ में शिक्षार् व्यक्ति, आत्म-विकास और वार्तार्वरण के सार्मार्न्य प्रभार्वों को अपने में कोर्इ स्थार्न नहीं है। इसके विपरीत यह केवल उन विशेष प्रभार्वों को अपने में स्थार्न देती है, समार्ज के अधिक आयु के व्यक्ति जार्नबूझकर और नियोजित रूप में अपने से छोटों पर डार्लते हैं भले ही ये प्रभार्व परिवार्र, धर्म यार् रार्ज्य द्वार्रार् डार्ले जार्ये।’’

शिक्षार् की प्रक्रियार्

एडम द्वार्रार् परिभार्षित शिक्षार् की प्रक्रियार् को इस रूप में प्रदिश्र्णत कियार् जार् सकतार् है शिक्षक शिक्षण प्रक्रियार् शिक्षाथी एडम के अनुसार्र शिक्षार् की प्रक्रियार् दो ध्रुवों के बीच चलती है जिसमें शिक्षक क परिपक्व अनुभव, व्यक्तित्व, शिक्षाथी के अपरिपक्व व्यक्तित्व में वार्ंछित परिवर्तन लार्ने क कार्य करतार् है। शिक्षाथी के विकास की यह प्रक्रियार् न केवल संचेतन होती है, अपितु सविमर्श होती है अर्थार्त् शिक्षक के सम्मुख शिक्षाथी के विकास की दिशार्यें स्पष्ट एवं पूर्व निर्धार्रित होती है। यह परिवर्तन दो मार्ध् यमों से होतार् है। प्रथम तो अध्यार्पक के व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष प्रभार्व एवं द्वितीय ज्ञार्न के विविध रूपों द्वार्रार्। कठोपनिणद् में शिक्षण की प्रक्रियार् जो इस रूप में व्यार्ख्यार् की गयी है।

सहनार्ववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवार्वहै।

तेजस्विनार्वधीतमस्तु मार् विद्विणार्वहै।।

  1. सहनार्ववतु- सार्थ-सार्थ हम एक दूसरे की रक्षार् करे अर्थार्त् शिक्षक शिक्षाथी दोनो ही एक दूसरे के नैतिक विकास में सहार्यक होते हैं, तथार् सम्भार्वित पतन से एक दूसरे की रक्षार् की जार्ती है।
  2. सहनौभुनक्तु- सार्थ-सार्थ उपभोग करें अथात् ज्ञार्नार्जर्न से उपलब्ध सिद्धियों क उपभोग शिक्षक व छार्त्र मिल-जुलकर करें। अर्थार्त् ज्ञार्न की वृद्धि भी सार्थ-सार्थ होती है।
  3. सहवीर्यं करवार्व है- एक दूसरे के शौर्य की रक्षार् करे।
  4. तेजस्विनार्वधीतमस्तु- अध्ययन के फलस्वरूप तजे स्वी बनें।
  5. सार् विद्विणार्वहै- एक दूसरे की उन्नति से र्इष्यार् न करें। उक्त व्यार्ख्यार् यह स्पष्ट करती है कि शिक्षार् की प्रक्रियार् दो तरफार् है शिक्षक और शिक्षाथी दोनों एक दूसरे से प्रभार्वित होते हैं।

शिक्षार् के अंग अथवार् घटक

शिक्षार् प्रक्रियार् के मुख्यत: दो अंग होते हैं- एक सीखने वार्लार् और दूसरार् सिखार्ने वार्लार्। नियोजित शिक्षार् में सीखने वार्ले शिक्षाथी कहे जार्ते हैं और सिखार्ने वार्ले शिक्षक। नियोजित शिक्षार् के तीन अंग और होते हैं- पार्ठ्यचर्यार्, पर्यार्वरण और शिक्षण कलार् एंव तकनीकी।

1. शिक्षाथी – 

इसक अर्थ है सीखने वार्लार्। यह शिक्षार् प्रक्रियार् क सबसे पहलार् और मुख्यतम अंग होतार् है। शिक्षाथी की अनुपस्थिति में शिक्षार् की प्रक्रियार् चलने क केाइ प्रश्न ही नहीं। शिक्षार् अपनी रूचि, रूझार्न और योग्यतार् के अनुसार्र ही सीखतार् है। सीखने की क्रियार् शिक्षाथी के शार्रीरिक स्वार्स्थ्य, मार्नसिक स्वार्स्थ्य, उसकी अभिवृद्धि, विकास एवं परिपक्वतार् और सीखने की इच्छार्, पूर्व अनुभव, नैतिक गुणों, चरित्र, बल, उत्सार्ह, थकान एवं उसकी अध्ययनशीलतार् पर निर्भर करती है। अध्यार्पक सीखने में एक सहार्यक रूप में कार्य करतार् है।

2. शिक्षक- 

शिक्षार् के व्यार्पक अर्थ में हम सब एक दूसरे को प्रभार्वित करते है,ं सीखते हैं, इसलिये हम सभी शिक्षाथी और सभी शिक्षक हैं। परन्तु संकुचित अर्थ में कुछ विशेष व्यक्ति, जो जार्न बूझकर दूसरों को प्रभार्वित करते हैं और उनके आचार्र-विचार्र में परिवर्तन करते हैं, शिक्षक कहे जार्ते हैं। शिक्षक के बिनार् नियोजित शिक्षार् की कल्पनार् आज भी सम्भव नहीं है। शिक्षक बार्लक के विकास में पथ-प्रदर्णक क कार्य करतार् है। पार्ठ्यचर्यार्- नियार्ेि जत शिक्षार् के उद्देश्य निश्चित होते है। इन निश्चित उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिये बच्चों को ज्ञार्न की विभिन्न शार्खार्ओं अर्थार्त् विषयों क ज्ञार्न करार्यार् जार्तार् है, और उन्हें विभिन्न प्रकार की क्रियार्यें करार्यी जार्ती हैं। सार्मार्न्यत: इन सबको पार्ठ्यचर्यार् कहार् जार्तार् है। वार्स्तविक अर्थ में पार्ठ्यचर्यार् और अधिक व्यार्पक होती है, उनमें विषयों के ज्ञार्न एवं क्रियार्ओं के प्रशिक्षण के सार्थ -सार्थ वह पूर्ण सार्मार्जिक पर्यार्वरण भी आतार् है, जिसके द्वार्रार् यथार् उद्देश्यों की प्रार्प्ति की जार्ती है।

शिक्षार् के प्रकार

समकालीन शिक्षार् विचार्रक जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनुसार्र-’’शिक्षार् बचपन से ही जीवन की समूची प्रक्रियार् को समझने में सहार्यतार् करने की क्रियार् है।’’ अर्थार्त् उनके अनुसार्र शिक्षार् क अर्थ समग्र जीवन क विकास, सम्पूर्णतार्, जीवन क समूचार्पन। उनक मार्ननार् है कि- ‘‘जीवन बड़ार् अद्भुत है वह असीम और अगार्ध है, यह अनन्त रहस्यों को लिये हुये है। यह एक विशार्ल सार्म्रार्ज्य है जहार्ं हम मार्नव कर्म करते हैं और यदि हम अपने आपको केवल आजीविक के लिये तैयार्र करते हैं तो हम जीवन क पूरार् लक्ष्य ही खो देते हैं। कुछ परीक्षार्यें उत्तीर्ण कर लेने और रसार्यनशार्स्त्र अथवार् अन्य किसी विषय में प्रवीणतार् प्रार्प्त कर लेने की अपेक्षार् जीवन को समझनार् कहीं ज्यार्दार् कठिन है।’’ शिक्षार् के अनेक रूप मार्ने जार्ते हैं हम उनक संक्षिप्त अध्ययन करेंगे-

1. औपचार्रिक, निरौपचार्रिक एवं अनौपचार्रिक-

1. औपचार्रिक शिक्षार्- 

व्यवस्थार् की दृष्टि से शिक्षार् के तीन रूप है- औपचार्रिक, निरौपचार्रिक और अनौपचार्रिक। वह शिक्षार् जो विद्यार्लयों, महार्विद्यार्लयों और विण्वविद्यार्लयों में दी जार्ती है, औपचार्रिक शिक्षार् कही जार्ती है। इसके उद्देश्य, पार्ठ्यचर्यार् और शिक्षण विधियार्ं सभी निश्चित होते हैं। यह योजनार्बद्ध हेार्ती है और इसकी योजनार् बड़ी कठोर होती है। इसमें सीखने वार्लों को विद्यार्लय समय सार्रिणी के अनुसार्र कार्य करनार् होतार् है। यह शिक्षार् व्यक्ति, समार्ज और रार्ष्ट्र की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करती है। यह शिक्षार् व्यय सार्ध्य होती है। इसे कर्इ स्तरों पर व्यवस्थित कियार् जार्तार् है प्रत्येक स्तर पर परीक्षार् और प्रमार्ण-पत्र की व्यवस्थार् की जार्ती है।

2. अनौपचार्रिक शिक्षार्- 

वह शिक्षार् जिसकी यार्जे नार् नहीं बनार्यी जार्ती न ही निश्चित उद्देश्य होते हैं, न पार्ठ्यचर्यार् और न शिक्षण विधियॉ और जो आकस्मिक रूप से सदैव चलती रहती हैं उसे अनौपचार्रिक शिक्षार् कहते हैं। इस प्रकार की शिक्षार् मनुष्य के जीवन भर चलती रहती है। परिवार्र एवं समुदार्य में रहकर हम जो सीखते हैं उसमे ंसे वह सब जो समार्ज हमें सिखार्नार् चार्हतार् है अनौपचार्रिक शिक्षार् की कोटि में आतार् है। मनौवैज्ञार्निकों क कहनार् है कि मनुष्य के व्यक्तित्व क तीन चौथाइ निर्मार्ण उसके पहले पॉच वर्षों में हो जार्तार् है और इन वर्षों में शिक्षार् प्रार्य: अनौपचार्रिक रूप से ही चलती है।

3. निरौपचार्रिक शिक्षार्- 

वह शिक्षार् जो न तो औपचार्रिक शिक्षार् की भार्ंति विद्यार्लयी शिक्षार् की सीमार् में बार्ंधी जार्ती है और न अनौपचार्रिक शिक्षार् की भार्ंति आकस्मिक रूप से संचार्लित होती है, निरौपचार्रिक शिक्षार् कहलार्ती है। इस शिक्षार् क उद्देश्य, पार्ठ्यचर्यार् और शिक्षण विधियार्ं प्रार्य: निश्चित होते हैं, परन्तु औपचार्रिक शिक्षार् की भार्ंति कठोर नहीं होते। यह शिक्षार् लचीली होती है। इसक उद्देश्य प्रार्य: सार्मार्न्य शिक्षार् क प्रसार्र और सतत् शिक्षार् की व्यवस्थार् करनार् होतार् है। इस पार्ठ्यचर्यार् को सीखने वार्लों की आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रखकर निश्चित की जार्ती है। समय व स्थार्न भी सीखने वार्लों की सुविधार् को ध्यार्न में रखकर निश्चित कियार् जार्तार् है। यह शिक्षार् व्यक्ति की शिक्षार् को निरन्तरतार् प्रदार्न करने क कार्य करती है। निरौपचार्रिक शिक्षार् के भी अनेक रूप हैं। जैसे प्रौढ़ शिक्षार्, खुली शिक्षार्, दूर शिक्षार् और जीवन पर्यन्त शिक्षार् अथवार् सतत् शिक्षार्।

2. प्रौढ़ शिक्षार्, खुली शिक्षार्, दूर शिक्षार् एवं जीवन पर्यन्त  शिक्षार् 

1. प्रौढ़ शिक्षार् –

इस प्रकार की शिक्षार् 15-35 वर्ष की आयु वर्ग के निरक्षर एवं अशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षार् प्रदार्न करने के लिये होती है। यह शिक्षार् उन्हें जीवन जीने की कलार्, अधिकार एवं कर्तव्यों क ज्ञार्न, आर्थिक अभिक्षमतार् तथार् भार्वी समार्ज के निर्मार्ण हेतु योग्य बनार्ती है। यह शिक्षार् देश मे सम्पूर्ण सार्क्षरतार् के लक्ष्य को प्रार्प्त करने में सहार्यक है।

2. खुली शिक्षार्- 

खुली शिक्षार्, शिक्षार् के क्षत्रे में एक नयार् आन्दोलन है। न आयु, न योग्यतार्, न समय और न स्थार्न न पार्ठ्यक्रम क बंधन और न ही कक्षार् शिक्षण बंधन, वार्ली शिक्षार् है, इसलिये इसे खुली शिक्षार् कहार् गयार् है। खुली शिक्षार् को बढ़ार्वार् देने में इवार्न इलिच क बहुत बड़ार् हार्थ है। उनकी पुस्तक ‘‘दी स्कूलिंग सोसार्इटी’’ में उन्होंने खुली शिक्षार् के सकारार्त्मक पक्ष उजार्गर किये। यूरोप में इस शिक्षार् को काफी सफलतार् मिली इसके पार्ठ्यक्रम अति विस्तृत और जीवनोपयोगी है। हमार्रे देश में खुली शिक्षार् क शुभार्रम्भ सबसे पहले 1977 र्इ0 में उच्च शिक्षार् के क्षेत्र में हुआ। यह शिक्षार् पत्रार्चार्र, आकाशवार्णी, टेपरिकार्डर, कैसेट्स, दूरदर्शन और वीडियार् कैसेट्स के मार्ध्यम से दी जार्ती है। इसके मार्ध्यम से शिक्षण व्यवस्थार् करने में नवीनतार् व रोचकतार् रहती है।

3. दूर शिक्षार्- 

दूर शिक्षार् मूलत: किसी देश के दूर -दरार्ज में रहने वार्ले उन व्यक्तियो को शिक्षार् सुलभ करार्ने क एक विकल्प है जो औपचार्रिक शिक्षार् प्रार्प्त नहीं कर पार् रहे हैं। सीखने वार्लो को किसी भी शिक्षण संस्थार्न में नहीं जार्नार् पड़तार् वरन् अपने स्थार्न पर पत्रार्चार्र, आकाशवार्शी, टेप रिकार्डर कैसेट यार् दूरदर्शन, विडियो कैसेट्स के मार्ध्यम से शिक्षार् प्रार्प्त करते हैं। इस शिक्षार् क श्रीगणेश 1856 में बर्लिन(जर्मनी) में हुआ है। हमार्रे देश में दूर शिक्षार् क श्रीगणेश सर्वप्रथम विण्वविद्यार्लयी शिक्षार् के क्षेत्र में हुआ। यह उन लोगों के लिये सुअवसर उपलब्ध करार्ती है, जो किसी भी कारण शिक्षार् नहीं प्रार्प्त कर पार्ते हैं। दूर शिक्षार् की पार्ठ्य सार्मग्री एवं शिक्षण विधियों के क्षेत्र में निरन्तर शोध एवं परिवर्तन होते रहते हैं, ये सदैव अद्यतन एवं उपयोगी होते हैं।

4. जीवन पर्यन्त शिक्षार् – 

जीवन पर्यन्त शिक्षार् क अर्थ है व्यक्ति द्वार्रार् बदली हुयी परिस्थितियों में कुशलतार्पूर्वक समार्योजन करने के लिये जीवन पर्यन्त अद्यतन ज्ञार्न की प्रार्प्ति अथवार् कौशल में प्रशिक्षण अथवार् तकनीकी की जार्नकारी देनार्। काम के सार्थ शिक्षार् ही इसकी विशेषतार् है। यह सतत् शिक्षार् क विशिष्ट रूप है। प्रार्चीन काल में भी आजीवन शिक्षार् सम्बंधी तथ्य यार् कि ज्ञार्न क भण्डार्र असीमित है अत: इसकी प्रार्प्ति हेतु अवकाशकाल में जीवन भर अध्ययन करनार् चार्हिये। यह शिक्षार् मनुष्य को हर समय अद्यतन ज्ञार्न एवं कौशल प्रार्प्त करने हेतु अवसर सुलभ करार्ती है, और उसे नयी परिस्थितियों में समार्योजन की कुशलतार् विकसित करती है। यह निरन्तर मनुष्य की समझ व कार्यकुशलतार् को विकसित करती है।

3. सार्मार्न्य एवं विशिष्ट शिक्षार्

1. सार्मार्न्य शिक्षार्- 

विषय क्षेत्र की दृष्टि शिक्षार् के दो रूप होते है। सार्मार्न्य और विशिष्ट। वह शिक्षार् जो किसी समार्ज के प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक होती है, वह सार्मार्न्य शिक्षार् कहलार्ती है। इसके द्वार्रार् समार्ज की सभ्यतार् एवं संस्कृति क हस्तार्न्तरण होतार् है। यह उदार्र शिक्षार् कहलार्ती है। यह शिक्षार् मनुष्य की परम आवश्यकतार् होती है। इस शिक्षार् में मनुष्य के चरित्र एवं आचरण पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। यह समार्ज के आर्थिक उत्थार्न में सहार्यक नहीं हो पार्ती है।

2. विशिष्ट शिक्षार्- 

वह शिक्षार् जो किसी समार्ज के व्यक्तियों को विशिष्ट उद्देश्य सार्मने रखकर दी जार्ती है विशिष्ट शिक्षार् कहलार्ती है। इसके द्वार्रार् मनुष्य को एक निश्चित कार्य- जैसे बढ़र्इगिरी, लोहार्रगिरी, कताइ-बुनाइ अध्यार्पन आदि के लिये तैयार्र कियार् जार्तार् है। इसे व्यार्वसार्यिक शिक्षार् भी कहते हैं। यह शिक्षार् से मनुष्य की सण्जनार्त्मक शक्तियों को विकसित कियार् जार्तार् है। इस शिक्षार् द्वार्रार् ही कोर्इ व्यक्ति समार्ज अथवार् रार्ष्ट्र में व्यार्वसार्यिक उन्नति करतार् है और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होतार् है।

दोनों ही प्रकार की शिक्षार् क अपनार्-अपनार् महत्व है। मनुष्य को मनुष्य एवं सार्मार्जिक प्रार्णी बनार्ने के लिये सार्मार्न्य अर्थार्त् उदार्र शिक्षार् की आवश्यकतार् होती है तो दूसरी ओर अपनी भौतिक आवश्यकतार्ओं की पूर्ति हेतु विशिष्ट एवं व्यार्वसार्यिक शिक्षार् की आवश्यकतार् होती है।

4. सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक शिक्षार्

1. सकारार्त्मक शिक्षार्- 

शिक्षण विधि के आधार्र पर शिक्षार् को सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक दो रूपों में विभक्त कियार् जार्तार् है। सकारार्त्मक शिक्षार् में हम अपने नव आगन्तुक पीढ़ी को अपनी जार्ति के अनुभवों एवं आर्दशों से कम समय में ही परिचित करार्ने क प्रयार्स करते है। सत्य बोलनार् मार्नव धर्म निभार्नार्, धर्म क पार्लन करनार्, झूठ न बोलनार् आदि सकारार्त्मक शिक्षार् है परन्तु इस प्रकार सीखार् हुआ ज्ञार्न स्थार्यी नहीं होतार् है।

2. नकारार्त्मक शिक्षार्-

नकारार्त्मक शिक्षार् वह है जिसमें बच्चों को स्वय अनुभव करके तथ्यों की खोज करने एवं आर्दशों क निर्मार्ण करने के अवसर दिये जार्ते हैं, अध्यार्पक तो केवल, इन तथ्यों की खोज एवं आर्दणों के निर्मार्ण के लिये बच्चों को अवसर प्रदार्न करतार् है और उनक दिशार् निर्देशन करतार् है। इस प्रकार सीखार् हुआ ज्ञार्न स्थार्यी होतार् है।

करके सीखने एवं स्वार्नुभव द्वार्रार् सीखने से ज्ञार्न स्थार्यी होतार् है, परन्तु इसके लिये शक्ति और परिपक्वतार् चार्हिये। मनुष्य को अपने जार्ति द्वार्रार् दिये गये पूर्व के अनुभवों से लार्भ उठार्नार् चार्हिये। बच्चों को अनुभव एवं आर्दश सीधे बतार्कर उन्हें उनके जीवन के सम्बंधित कर दिये जार्ये और प्रयोग एवं तर्क द्वार्रार् उनकी सत्यतार् स्पष्ट कर दियार् जार्नार् चार्हिये।

शिक्षार् के सार्धन

सार्धन अंग्रेजी शब्द ‘‘एजेन्सी’’ क हिन्दी रूपार्न्तरण है- एजेन्सी क अर्थ है एजेन्ट क कार्य। एजेन्ट से हमार्रार् अभिप्रार्य उस व्यक्ति यार् वस्तु से होतार् है, जो कोर्इ कार्य करतार् है यार् प्रभार्व डार्लतार् है। अत: शिक्षार् के सार्धन- वे तत्व कारण स्थार्न यार् संस्थार्यें है जो बार्लक पर शैक्षिक प्रभार्व डार्लते हैं। समार्ज ने शिक्षार् के कार्यों को करने के लिये अनेक विशिष्ट संस्थार्ओं क विकास कियार् है। इन्हीं संस्थार्ओं को शिक्षार् के सार्धन कहार् जार्तार् है। इनको इस प्रकार वर्गीकश्त कियार् गयार् है।

  1. औपचार्रिक और अनौपचार्रिक
  2. निष्क्रिय एवं सक्रिय सार्धन

1. औपचार्रिक और अनौपचार्रिक

    जॉन डी0वी0 ने शिक्षार् के औपचार्रिक और अनौपचार्रिक सार्धनों को शिक्षार् की सार्भिप्रार्य और आकस्मिक विधियार्ं बतार्यार् है। हैण्डरसन ने लिखार् है- जब बार्लक व्यक्तियों के कार्यों को देखतार् है उसक अनुकरण करतार् है और उनमें भार्ग लेतार् है तब वह अनौपचार्रिक रूप से शिक्षित होतार् है। जब उसको सचेत करके जार्न बूझकर पढ़ार्यार् जार्तार् है, तब वह औपचार्रिक रूप शिक्षार् प्रार्प्त करतार् है।’’

    1. औपचार्रिक सार्धन- शिक्षार् के ये सार्धन यार्जे नार्बद्ध होते है। इनके नियम व योजनार् निश्चित हेार्ते हैं। इनमें प्रशिक्षित व्यक्ति देखभार्ल करते हैं। यह शिक्षार् कितार्बी व विद्यार्लयीय शिक्षार् भी कहलार्ती है। इनके अन्तर्गत स्कूल पुस्तकालय, चित्र भवन एवं पुस्तक आते हैं।
    2. अनौैपचार्रिक सार्धन- शिक्षार् के अनौपचार्रिक सार्धनों क विकास स्वार्भार्विक रूप से होतार् है। इसकी न तो योजनार् न ही नियम होते है। ये बार्लकों के आचरण क रूपार्न्तरण करते हैं पर यह प्रक्रियार् अज्ञार्त अप्रत्यक्ष और अनौपचार्रिक होती है। इसके अन्तर्गत परिवार्र, धर्म, समार्ज, रार्ज्य रेडियो, समार्चार्र-पत्र आदि आते हैं।

    औपचार्रिक शिक्षार् बड़ी सरलतार् से तुच्छ निर्जीव अस्पष्ट और कितार्बी बन जार्ती है। औपचार्रिक शिक्षार् जीवन के अनुभव से कोर्इ सम्बंध न रखकर केवल विद्यार्लयों की विषय सार्मग्री बन जार्ती है। वही दूसरी ओर बार्लक अनौपचार्रिक ढंग से दूसरों के सार्थ रहकर शिक्षार् प्रार्प्त करतार् है और सार्थ रहने की प्रक्रियार् ही शिक्षार् देने क कार्य करती है। यह प्रक्रियार् अनुभव को विस्तृत करती है।

    2. सक्रिय व निष्क्रिय सार्धन-

    1. सक्रिय सार्धन- सक्रिय सार्धन सार्मार्जिक प्रक्रियार् पर नियत्रंण रखने और उसको एक निश्चित दिशार् देने क प्रयत्न करते हैं। इनमें शिक्षार् देने वार्ले और शिक्षार् प्रार्प्त करने वार्ले में प्रत्यक्ष प्रतिक्रियार् होती है, दोनों एक दूसरे पर क्रियार् प्रतिक्रियार् करते हैं। सक्रिय सार्धन के उदार्हरण हैं- परिवार्र, समार्ज, रार्ज्य, स्कूल, आदि।
    2. निष्क्रिय सार्धन-निष्क्रिय सार्धन वे हैं जिनक प्रभार्व एक तरफार् होतार् है। इनकी प्रक्रियार् एक ओर से होती है, क्योंकि ये एक ही को प्रभार्वित करते हैं। इस प्रक्रियार् में एक पक्ष सक्रिय होतार् है और दूसरार् निष्क्रिय। ये सार्धन दूसरों को तो प्रभार्वित करते हैं पर स्वयं दूसरों से प्रभार्वित नहीं होते हैं। निष्क्रिय सार्धनों के उदार्हरण हैं- सिनेमार्, टेलीविजन, रेडियो, प्रेस इत्यार्दि।

    शिक्षार् के कार्य

    शिक्षार् गतिशील है। डेनियल बेक्स्टर के अनुसार्र- ‘‘शिक्षार् क कार्य भार्वनार्ओं को अनुणार्सित, संवेगों को नियंत्रित, प्रेरणार्ओं को उत्तेजित, धामिक भार्वनार् को विकसित और नैतिकतार् को अभिवृद्धित करनार् है।’’इसी प्रकार जॉन डी0वी0 के अनुसार्र- ‘‘शिक्षार् क कार्य असहार्य प्रार्णी के विकास में सहार्यतार् पहॅुचार्नार् है तार्कि वह सुखी, नैतिक और कुशल मार्नव बन सके।’’ शिक्षार् क कार्य देश और काल के अनुरूप बदलतार् रहतार् है,

      मार्नव जीवन में शिक्षार् के कार्य :- 

      उत्तम नार्गरिक उत्तम रार्ज्य क आधार्र स्तम्भ होतार् है। और उत्तम नार्गरिक वह है जो कि अपने एवं रार्ष्ट्र दोनों के लिये उपयोगी हो अर्थार्त् मार्नव जीवन में बदलार्व लार्ने क कार्य शिक्षार् क ही है। मार्नव जीवन में शिक्षार् यह कार्य करती है-

      1. मनुष्य की जन्मजार्त शक्तियों क विकास मागार्न्तीकरण और उदार्त्तीकरण- मनुष्य कुछ मलू भतू शक्तियों को लेकर पैदार् होतार् है शिक्षार् क कार्य इन शक्तियों क विकास करनार् है। मार्नव के शक्तियों क विकास व्यक्ति और समार्ज दोनेार्ं के हितों को ध्यार्न में रखकर कियार् जार्तार् है। वह मूलभूत प्रवश्त्यार्त्मक व्यवहार्र से सार्मार्जिक व्यवहार्र की ओर उन्मुख होतार् है।
      2. संतुलित व्यक्तित्व क विकास- शिक्षार् क प्रमुख कार्य सतुंलित व्यक्तित्व क विकास करनार् भी है। व्यक्तित्व के अन्तर्गत शार्रीरिक, मार्नसिक, नैतिक, आध्यार्त्मिक एवं संवेगार्त्मक पक्ष आते हैं। शिक्षार् इन सभी पहलुओं क संतुलित विकास करती है।
      3. चरित्र निर्माण्ण एवं नैतिक विकास- शिक्षार् क अति महत्वपूर्ण कार्य चरित्र क निर्मार्ण एवं उसक नैतिक विकास करनार् है। शिक्षार् के इस कार्य पर डॉ0 रार्धार्कृष्णन ने बल देते हुये लिखार् है- ‘‘चरित्र भार्ग्य है। चरित्र वह वस्तु है जिस पर रार्ष्ट्र के भार्ग्य क निर्मार्ण होतार् है। तुच्छ चरित्र वार्ले मनुष्य श्रेण्ठ रार्ष्ट्र क निर्मार्ण नहीं कर सकते हैं।’’
      4. सार्मार्जिक भार्वनार् क समार्वेश – व्यक्ति समार्ज क अभिन्न अगं है। समार्ज से दूर रहकर जीनार् असम्भव है, अत: यह आवश्यक है कि उसमें सार्मार्जिक गुणों क विकास कियार् जार्ये। सार्मार्जिक गुणों के विकास क कार्य भी शिक्षार् क ही है। एच0 गाडन के अनुसार्र- ‘‘शिक्षक को यह जार्ननार् आवश्यक है कि उसे सार्मार्जिक प्रक्रियार् में उन व्यक्तियों को समझनार् चार्हिये जो इसे समझने में असमर्थ हैं।’’
      5. आवश्यकतार्ओं की पूर्ति- समार्ज में शिक्षार् क प्रमुख कार्य आवश्यकतार्ओ की पूर्ति है, जीवधार्री होने के कारण उसकी कुछ मूलभूत आवश्यकतार्यें है। रोटी, कपड़ार् और मकान प्रमुख है इन सभी को प्रार्प्त करने योग्य बार्नार्ने क कार्य शिक्षार् क है। स्वार्मी विवेकानन्द ने शिक्षार् के इस कार्य की ओर इंगित करते हुये स्पष्ट लिखार् है कि – ‘‘शिक्षार् क कार्य यह पतार् लगार्नार् है कि जीवन की समस्यार्ओं को किस प्रकार से कम कियार् जार्ये और आधुनिक सभ्य समार्ज क ध्यार्न इस ओर लगार् हुआ है।’’
      6. आत्मनिर्भरतार् की प्रार्प्ति- मार्नव जीवन में शिक्षार् क एक प्रमुख कार्य व्यक्ति को आत्म निर्भर बनार्नार् है। ऐसार् व्यक्ति समार्ज के लिये भी सहार्यक होतार् है, जो अपनार् भार्र स्वयं उठार् लेतार् है। भार्रत जैसे विकासशील समार्ज में व्यक्ति को आत्म निर्भर बनार्ने क कार्य शिक्षार् क है। स्वार्मी विवेकानन्द ने शिक्षार् के इस कार्य को इंगित करते हुये लिखार् थार्- ‘‘केवल पुस्तकीय ज्ञार्न से काम नहीं चलेगार्। हमें उस शिक्षार् की आवश्यकतार् है जिससे कि व्यक्ति अपने स्वयं के पैरों पर खड़ार् हो सकतार् है।’’
      7. व्यार्वसार्यिक कुशलतार् की प्रार्प्ति हमार्रार् देश बडी़ तेजी से विकास की ओर बढ़ रहार् है। वैण्वीकरण के दौर में हमें ऐसे मार्नव संसार्धन की आवश्यकतार् है जो कुशल हो और अर्थ व्यवस्थार् के विभिन्न पक्षों में अपनार् उत्तरदार्यित्व निभार् सकें। ऐसे मार्नव संसार्धन तैयार्र करने क कार्य शिक्षार् क है। डॉ0 रार्धार्कृष्णन के अनुसार्र- ‘‘प्रयोगार्त्मक विषयों में प्रशिक्षित व्यक्ति कृषि और उद्योग के उत्पार्दन को बढ़ार्ने में सहार्यतार् देते है। ये विषय सरल एवं रोजगार्र पार्ने में सहार्यक होते है। शिक्षार् क कार्य है- अर्थकारिक विद्यार्।’’
      8. जीवन के लिये तैयार्री- विलमॉट ने स्पष्ट कहार् है कि- ‘‘शिक्षार् जीवन की तैयार्री है।’’ इससे स्पष्ट है कि शिक्षार् क प्रमुख कार्य बच्चों को जीवन के लिये तैयार्र करनार् है। शिक्षार् के इस कार्य पर विचार्र करते हुये स्वार्मी विवेकानन्द ने स्पष्ट लिखार् है कि- ‘‘क्यार् वह शिक्षार् कहलार्ने के योग्य है जो सार्मार्न्य जन समूह को जीवन के संघर्ष के लियें अपने आपको तैयार्र करने में सहार्यतार् नही देती है और उनमें शेर सार् सार्हस न उत्पन्न कर पार्ये।’’
      9. आध्यार्त्मिक विकास- भार्रतीय सस्ं कश्ति क सम्बन्ध चिरकाल स े आध्यार्त्मिकतार् रही है। शिक्षार् क एक प्रमुख कार्य मार्नव को उस पूर्ण एवं वार्स्तविक शक्ति क आभार्स करार्नार् है। श्री अरविन्द ने लिखार् है- ‘‘शिक्षार् क उद्देश्य – विकसित होने वार्ली आत्मार् को सर्वोत्तम प्रकार से विकास करने में सहार्यतार् देनार् और श्रेण्ठ कार्य के लिये उसे पूर्ण बनार्नार् है।’’
      10. वार्तार्वरण से अनुकूलन- वार्तार्वरण मनुष्य को स्वयं शिक्षित करतार् है और मनुष्य को प्रभार्वित करतार् है। वार्तार्वरण से अनुकूलन न कर सकने के कारण व्यक्ति क जीवन दुरूह हो जार्तार् है। इस सम्बंध में टॉमसन ने लिखार् है- ‘‘वार्तार्वरण शिक्षक है, और शिक्षार् क कार्य-छार्त्र को उस वार्तार्वरण के अनुकूल बनार्नार्, जिससे कि वह जीवित रह सके और अपनी मूल-प्रवण्त्तियों को सन्तुष्ट करने के लिये अधिक से अधिक सम्भव अवसर प्रार्प्त कर सके।’’
      11. वार्तार्वरण क रूप परिवर्र्तन- शिक्षार् क एक प्रमुख कार्य व्यक्ति को वार्तार्वरण क रूप परिवर्तन करने यार् उसमें सुधार्र करने के योग्य बनार्नार् है, यदि शिक्षार् द्वार्रार् व्यक्ति में अच्छी आदतों क निर्मार्ण कर दियार् जार्ये तो वह वार्तार्वरण में परिवर्तन कर सकतार् है। जॉन ड्यूवी ने लिखार् है- ‘‘वार्तार्वरण से पूर्ण अनुकूलन करने क अर्थ है मृत्यु। आवश्यकतार् इस बार्त की है कि वार्तार्वरण पर नियंत्रण रखार् जार्ये।’’

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