शब्द की परिभार्षार् एवं शब्द के प्रकार

ध्वनियों के मेल से बने साथक वर्णसमुदार्य को ‘शब्द’ कहते हैं। शब्द अकेले और कभी दूसरे शब्दों के सार्थ मिलकर अपनार् अर्थ प्रकट करते हैं। इन्हें हम दो रूपों में पार्ते हैं-एक तो इनक अपनार् बिनार् मिलार्वट क रूप है, जिसे संस्कृत में प्रकृति यार् प्रतिपार्दिक कहते हैं और दूसरार् वह, जो कारक, लिंग, वचन, पुरुष और काल बतार्ने वार्ले अंश को आगे-पीछे लगार्कर बनार्यार् जार्तार् है, जिसे पद कहते हैं। यह वार्क्य में दूसरे शब्दों से मिलकर अपनार् रूप झट सँवार्र लेतार् है। शब्दों की रचनार् ध्वनि और अर्थ के मेल से होती है। एक यार् अधि क वर्णों से बनी स्वतंत्र साथक ध्वनि को शब्द कहते हैं जैसे-लड़की, आ, मै, धीरे, परन्तु इत्यार्दि। अत:, शब्द मूलत: ध्वन्यार्त्मक होंगे यार् वर्णार्त्मक। किन्तु, व्यार्करण में ध्वन्यार्त्मक शब्दों की अपेक्षार् वर्णार्त्मक शब्दों क अधिक महत्व है। वर्णार्त्मक शब्दों में भी उन्हीं शब्दों क महत्त्व है, जो साथक हैं, जिनक अर्थ स्पष्ट और सुनिश्चित है। व्यार्करण में निरर्थक शब्दों पर विचार्र नहीं होतार्।

शब्द की व्युत्पत्ति

शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में विद्वार्नों में मतैक्य नहीं है। विद्वार्नों ने शब्द क संबंध एकाधिक धार्तुओं से जोड़ार् है।

डॉ. भोलार्नार्थ तिवार्री ने ‘भार्षार्-विज्ञार्न कोश’ में अपने विचार्र इस प्रकार व्यक्त किए है- फ्शब्द क संबंध शब्द् धार्तु से है, जिसक अर्थ है-शब्द करनार्। डॉ. केलार्शचन्द्र भार्टियार् और रार्मचन्द्र वर्मार् आदि ने भी यही व्युत्पत्ति मार्नी है। अपनी पुस्तक ‘हिंदी शब्द-समूह क विकास’ में शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विस्तृत चर्चार् करते हुए विभिन्न विद्वार्नों के मंतव्यों को दो प्रमुख वर्गों में इस प्रकार विभक्त कियार् है- (क) कुछ भार्षार् वैज्ञार्निकों ने शप् धतु से संबंध जोड़ते हुए शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है-शप् (आक्रोशे) + दन = शब्द। (ख) भार्षार् वैज्ञार्निकों क दूसरार् वर्ग संस्कृत के शब्द धतु से शब्द क संबंध जोड़तार् है-शब्द + घञ (प्रत्यय) = शब्द। मेरे विचार्र से शब्द क संबंध धतु से ही मार्ननार् चार्हिए क्योंकि इसक मूल अर्थ ध्वनि है।

भार्षार् वैज्ञार्निक डॉ. भोलार्नार्थ तिवार्री द्वार्रार् उनकी पुस्तक शब्द विज्ञार्न में विवेच्य शब्द की सटीक और संक्षिप्त परिभार्षार् है- भार्षार् की साथक लघुतम और स्वतंत्र इकाई को शब्द कहते हैं।

शब्द की परिभार्षार्

विश्व की समस्त भार्षार्ओं के शब्दों के संदर्भ से पूर्ण वैज्ञार्निक परिभार्षार् बनार्नार् असंभव है। शब्द की ऐसी परिभार्षार् पर विचार्र करते हुए पार्श्चार्त्य ही नहीं भार्रतीय विद्वार्नों ने भी असमर्थतार् व्यक्त की है। इस प्रकार के विचार्र व्यक्त करने वार्लों में येस्पर्शन, वैद्रियेज, डैनियल जोन्स, डार्ल्टन, डॉ. धीरेंद्र वर्मार्, डॉ. उदयनार्रार्यण तिवार्री, डॉ. कैलार्शचंद्र भार्टियार्, आचाय देवेंद्रनार्थ शर्मार् और आचाय किशोरीदार्स वार्जपेयी के नार्म विशेष उल्लेखनीय हैं। विभिन्न भार्षार्विदों ने समय-समय पर अपने चिंतन के अनुसार्र शब्द को इस प्रकार परिभार्षित कियार् है-

(क) संस्कृत के कई विद्वार्नों ने शब्द की परिभार्षार् की है। महर्षि पतंजलि ने स्फोट को महत्त्व देते हुए कहार् है- स्फोट शब्द:। ध्वनि शब्द गुण:। उन्होंने एक अन्य स्थार्न पर शब्द की विस्तृत परिभार्षार् इस प्रकार की है- श्रोतोपलिब्ध्र्बुद्धनिगर्रार्ह्यि प्रयोगेणार्भिज्वलित: आकाशदेश: शब्द:। अर्थार्त कान से प्रार्प्त, बुद्धि से ग्रार्ह्य, प्रयोग से स्फफरित होने वार्ली आकाशव्यार्पी ध्वनि को शब्द कहते हैं। ‘शब्द कल्पद्रुम’ में शब्द की परिभार्षार् इस प्रकार की गई है- फ्श्रोतग्रार्ह्य गुणपदाथविशेष:। इन परिभार्षार्ओं में ध्वनि के आधार्र पर होने वार्ली अर्थ-प्रतीति को महत्त्व दियार् गयार् है, जबकि अर्थ की प्रतीति शब्द के अतिरिक्त पद तथार् वार्क्य आदि से भी होती है। इस प्रकार उत्तम परिभार्षार् होते हुए भी इन्हें पूर्ण वैज्ञार्निक परिभार्षार् की कोटि में नहीं रख सकते हैं।

(ख) हिंदी के अनेक वैयार्करणों, कोशकारों तथार् भार्षार्विदों ने समय-समय पर शब्द को परिभार्षित कियार् है, जिनमें से कुछ प्रमुख परिभार्षार्एँ उद्धृत हैं। प्रसिद्ध हिंदी वैयार्करण प. कामतार्प्रसार्द गुरु ने ‘हिंदी व्यार्करण’ में शब्द की परिभार्षार् करते हुए कहार् है- एक यार् अधिक अक्षरों से बनी हुई स्वतंत्र साथक ध्वनि को शब्द कहते हैं।

डॉ. रार्मचन्द्र वर्मार् ने ‘मार्नक हिंदी कोश’ में शब्द की परिभार्षार् इन शब्दों में की है- अक्षरों, वर्णों आदि से बनार् और मुँह से उच्चरित यार् लिखार् जार्ने वार्लार् वह संकेत जो किसी कार्य यार् भार्व क बोधक हो।

आचाय श्यार्मसुंदर दार्स ने ‘हिंदी शब्द सार्गर’ में शब्द की परिभार्षार् इस प्रकार की है फ्वह स्वतंत्र, व्यक्त और साथक ध्वनि जो एक यार् अधिक वर्णों के संयोग से कंठ और तार्लु आदि के द्वार्रार् उत्पन्न हो और जिससे सुनने वार्ले को किसी पदाथ, कार्य यार् भार्व आदि क बोध हो, उसे शब्द कहते हैं।

आचाय देवेंद्रनार्थ शर्मार् ने ‘भार्षार्-विज्ञार्न की भूमिका’ में शब्द की परिभार्षार् करते हुए लिखार् है- उच्चार्रण की दृष्टि से भार्षार् की लघुतम इकाई ध्वनि है और साथकतार् की दृष्टि से शब्द।

डॉ. सरयूप्रसार्द अग्रवार्ल ने ‘भार्षार् विज्ञार्न और हिंदी’ में सरलतम परिभार्षार् इस प्रकार दी है- ध्वनियों क संयोजन शब्द …….. है।

डॉ. भोलार्नार्थ तिवार्री ने ‘शब्द-विज्ञार्न’ में शब्द की परिभार्षार् करते हुए उसक विशद विवेचन भी कियार् है उनके अनुसार्र भार्षार् की साथक, लघुतम और स्वतंत्र इकाई को शब्द कहते हैं।

(ग) संस्कृत के आचायों तथार् हिंदी के विद्वार्नों के अतिरिक्त पार्श्चार्त्य विद्वार्नों ने भी शब्द की परिभार्षार् दी है। पार्मर शब्द की परिभार्षार् करते हुए कहते हैं कि “The smallest speech unit capable of functioning as a complete utterance.” अर्थार्त् भार्षार् की ऐसी लघुतम इकाई जो एक महत्त्वपूर्ण उच्चार्रण के रूप में काम कर सके उसे शब्द कहते हैं।

उल्मैन की परिभार्षार् इस प्रकार है- “The smallest significant unit of language.” अर्थार्त् शब्द को भार्षार् की लघुतम महत्त्वपूर्ण इकाई कहते हैं।

मैलेट शब्द के विषय में लिखते हैं- “A word is the result of the association of a given meaning with a given combination of sound capable of given grammatical use.” अर्थार्त् शब्द अर्थ और ध्वनि क वह योग है, जिसक व्यार्करणिक प्रयोग कियार् जार्तार् है।

रार्बर्टसन तथार् केसिडी शब्द की परिभार्षार् करते हुए कहते हैं- “The smallest independent unit with in the sentence.” अर्थार्त् शब्द वार्क्य में लघुतम स्वतंत्र इकाई है। स्वीट शब्द की परिभार्षार् इस प्रकार करते हैं- “An ultimate sense-unit.” अर्थार्त् लघुतम अर्थपूर्ण इकाई को शब्द कहते हैं।

उक्त सभी परिभार्षार्ओं में किसी न किसी दृष्टिकोण की वैज्ञार्निकतार् अवश्य है। मेरे विचार्र से शब्द की परिभार्षार् इस प्रकार की जार् सकती है- भार्षार् की स्फोट-ध्वनि गुणयुक्त लघुतम स्वतंत्र महत्त्वपूर्ण इकाई शब्द है। इस परिभार्षार् में शब्द की सभी विशेषतार्एँ आ जार्ती हैं। विस्फोट शब्द की प्रथम महत्त्वपूर्ण विशेषतार् है, जिससे अर्थ-बोध होतार् है। अर्थ शब्द क अनिवाय तत्त्व है। अर्थ की दृष्टि से शब्द भार्षार् की लघुतम इकाई है। यदि मूल शब्द के दो यार् दो से अधिक खंड कर दिए जार्एँ तो उन खंडों में अर्थहीनतार् यार् अनर्थ क भार्व प्रकट होतार् है। भार्षार् की लघुतम इकाई ध्वनि है, किंतु ध्वनि क सर्वत्र साथक होनार् अनिवाय नहीं है। ध्वनि की अपेक्षार् शब्द बड़ी इकाई है और इसक साथक होनार् भी अनिवाय है। शब्द क स्वतंत्र होनार् भी अनिवाय है, क्योंकि इसक स्वतंत्र अस्तित्व होतार् है। उसके सार्थ किसी सहार्यक तत्त्व क होनार् अनिवाय नहीं है। ‘मधुर’, हिंदी क मूल शब्द है। मूलाथ अभिव्यक्ति हेतु किसी सहार्यक तत्त्व उपसर्ग यार् प्रत्यय की आवश्यकतार् नहीं है। यदि सहार्यक तत्त्व उपसर्ग यार् प्रत्यय क प्रयोग करेंगे, तो अर्थ-परिवर्तन के सार्थ शब्द रूप में भी परिवर्तन होगार् हीऋ यथार्-मधुर के सार्थ ‘सु’ उपसर्ग योग झ सुमधुर, मधुर के सार्थ ‘तार्’ प्रत्यय होगार् झ मधुरतार्। इस परिभार्षार् में शब्द की विशेषतार्एँ समार्हित हैं-

  1. भार्षार् की लघुतम इकाई।
  2. स्फोट गुण-संपन्नतार् अर्थार्त् साथकतार्।
  3. स्वतंत्र महत्त्वपूर्ण इकाई।

शब्द के प्रकार

सार्मार्न्यत: शब्द दो प्रकार के होते हें-साथक और निरर्थक। साथक शब्दों के अर्थ होते हैं। और निरर्थक शब्दों के अर्थ नहीं होते। जैसे-’पार्नी’ साथक शब्द है ‘नीपार्’ निरर्थक शब्द, क्योंकि इसक कोई अर्थ नहीं। भार्षार् की परिवर्तनशीलतार् उसकी स्वार्भार्विक र्कियार् है। समय के सार्थ संसार्र की सभी भार्षार्ओं के रूप बदलते हैं। हिन्दी इस नियम क अपवार्द नहीं है। संस्कृत के अनेक शब्द पार्लि, प्रार्कृत और अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी में आये हैं। इनमें कुछ शब्द तो ज्यों-के-त्यों अपने मूलरूप में हैं और कुछ देश-काल के प्रभार्व के कारण विकृत हो गये हैं।

व्युत्पत्ति की दृष्टि से शब्दों क वर्गीकरण

उत्पत्ति की दृष्टि से शब्दों के चार्र भेद हैं- (1) तत्सम, (2) तद्भव, (3) देशज एवं, (4) विदेशी शब्द।

तत्सम

किसी भार्षार् के मूलशब्द को ‘तत्सम’ कहते हैं। ‘तत्सम’ क अर्थ ही है-’उसके समार्न’ यार् ‘ज्यों-का-त्यों’ (तत्, तस्य = उसके-संस्कृत के, सम = समार्न)। यहार्ँ संस्कृत के उन तत्समों की सूची है, जो संस्कृत से होते हुए हिन्दी में आये हैं-

तत्सम हिन्दी तत्सम हिन्दी
आम्र आम गोमल, गोमय गोबर
उष्ट्र उँट घोटक घोड़ार्
चुल्लि: चूल्हार् शत सौ
चतुष्पार्दिक चौकी सपत्नी सौत
शलार्का सलार्ई हरिद्रार् हल्दी, हरदी
चंचु चोंच पर्यक पलंग
त्वरित तुरत, तुरन्त भक्त भार्त
उद्वर्तन उबटन सूचि सुई
खर्पर खपरार्, खप्पर सक्तु सक्तु

तद्भव

ऐसे शब्द, जो संस्कृत और प्रार्कृत से विकृत होकर हिन्दी में आये हैं, ‘तद्भव’ कहलार्ते हैं। तत्+भव क अर्थ है-उससे (संस्कृत से)। ये शब्द संस्कृत से सीधे न आकर पार्लि, प्रार्कृत और अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी में आये हैं। इसके लिए इन्हें एक लम्बी यार्त्रार् तय करनी पड़ी है। सभी तद्भव शब्द संस्कृत से आये हैं, परन्तु कुछ शब्द देश-काल के प्रभार्व से ऐसे विकृत हो गये हैं कि उनके मूलरूप क पतार् नहीं चलतार्। फलत:, तद्भव शब्द दो प्रकार के हैं-(1) संस्कृत से आनेवार्ले और (2) सीधे प्रार्कृत से आनेवार्ले। हिन्दी भार्षार् में प्रयुक्त होनेवार्ले बहुसंख्य शब्द ऐसे तद्भव हैं, जो संस्कृत-प्रार्कृत से होते हुए हिन्दी में आये हैं। हिन्दी में शब्दों के सरलतम रूप बनार्ये रखने क फरार्नार् अभ्यार्स है। निम्नलिखित उदार्हरणों से तद्भव शब्दों के रूप स्पष्ट हो जार्येंगे-

संस्कृत प्रार्कृत तद्भव हिन्दी
अग्नि अग्गि आग
मयार् मई मैं
वत्स वच्छ बच्चार्, बार्छार्
चतुर्दश चोद्दस, चउद्दह चौदह
पुष्प पुप्फ फूल
चतुर्थ चउट्ठ, चडत्थ चौथार्
प्रिय प्रिय पिय, पियार्
कूत: कओ कियार्
मध्य मज्झ में
मयूर मउफर मोर
वचन वअण बैन
नव नअ नौ
चत्वार्रि चतार्रि चार्र
अद्धतृतीय अड्ढतइअ अढ़ार्ई, ढार्ई

देशज

‘देशज’ वे शब्द हैं, जिनकी व्युत्पत्ति क पतार् नहीं चलतार्। ये अपने ही देश में बोलचार्ल से बने हैं, इसलिए इन्हें देशज कहते हैं। हेमचन्द्र ने उन शब्दों को ‘देशी’ कहार् है, जिनकी व्युत्पत्ति किसी संस्कृत धतु यार् व्यार्करण के नियमों से नहीं हुई। लोकभार्षार्ओं में ऐसे शब्दों की अधिकतार् है। जैसे-तेंदुआ, चिड़ियार्, कटरार्, अण्टार्, ठेठ, कटोरार्, खिड़की, ठुमरी, खखरार्, चसक, जूतार्, कलार्ई, फनगी, खिचड़ी, पगड़ी, बियार्नार्, लोटार्, डिबियार्, डोंगार्, डार्ब इत्यार्दि। विदेशी विद्वार्न् जॉन बीम्स ने देशज शब्दों को मुख्यरूप से अनायस्त्रोत से सम्बद्ध मार्नार् है।

व्युत्पत्तिक शब्दों क दूसरार् नार्म देशज शब्द है।

विदेशी

शब्द विदेशी भार्षार्ओं से हिन्दी में आये शब्दों को ‘विदेशी शब्द’ कहते है। इनमें फार्रसी, अरबी, तुर्की, अँगरेजी, पुर्तगार्ली और र्कांसीसी भार्षार्एँ मुख्य हैं। अरबी, फार्रसी और तुर्की के शब्दों को हिन्दी ने अपने उच्चार्रण के अनुरूप यार् अपभ्रंश रूप में ढार्ल लियार् है। हिन्दी में उनके कुछ हेर-फैर इस प्रकार हुए हैं-

  1. क, ख़्, ग़्, फ, जैसे नुक्तेदार्र उच्चार्रण और लिखवट को हिन्दी में सार्धरणतयार् बिनार् नुक्ते के उच्चरित कियार् और लिखार् जार्तार् है। जैसे-कीमत (अरबी) – कीमत (हिन्दी), खूब (फार्रसी) = खूब (हिन्दी), आगार् (तुर्की) = आगार् हिन्दी, फैसलार् (अरबी) = फैसलार् (हिन्दी)।
  2. शब्दों के अन्तिम विसर्ग की जगह में आकार की मार्त्रार् लगार्कर लिखार् यार् बोलार् जार्तार् है। जैसे-आईन: और कमीन: (फार्रसी) = आईनार् और कमीनार् (हिन्दी), हैज: (अरबी) = हैजार् (हिन्दी), चम्च: (तुर्की) = चमचार् (हिन्दी)।
  3. शब्दों के अन्तिम हकार की जगह हिन्दी में आकर की मार्त्रार् कर दी जार्ती है। जैसे-अल्लार्ह (अरब) = अल्लार् (हिन्दी)।
  4. शब्दों के अन्तिम आकार की मार्त्रार् को हिन्दी में हकार कर दियार् जार्तार् है। जैसे-परवार् (फार्रसी) ¾ परवार्ह (हिन्दी)।
  5. शब्दों के अन्तिम अनुनार्सिक आकार को ‘आन’ कर दियार् जार्तार् है। जैसे-दुका! (फार्रसी) = दुकान (हिन्दी), ईमार्ँ (अरबी) = ईमार्न (हिन्दी)।
  6. बीच के ‘इ’ को ‘य’ कर दियार् जार्तार् है। जैसे-काइद: (अरबी) = कायदार् (हिन्दी)।
  7. बीच के आधे अक्षर को लुप्त कर दियार् जार्तार् है। जैसे-नश्श: (अरबी) = नशार् (हिन्दी)।
  8. बीच के आधे अक्षर को पूरार् कर दियार् जार्तार् है। जैसे-अल्सोस, गर्म, बेरहम, विफश्मिश, जह, (फार्रसी) = अफसोस, गरम, जहर, किशमिश, बेरहम (हिन्दी)। तर्क, नह्र, कस्त्रार्त (अरबी) = तरफ, नहर, कसरत (हिन्दी)। चम्च: तम्गार् (तुर्की) = चमचार्, तमगार् (हिन्दी)।
  9. बीच की मार्त्रार् लुप्त कर दी जार्ती है। जैसे-आबोदार्न: (फार्रसी) = आबदार्नार् (हिन्दी), ज्वार्हिर, मौसिम, वार्पिस (अरबी) = जवार्हर, मौसम, वार्पस (हिन्दी), चुगुल (तुर्की) = चुगल (हिन्दी)।
  10. बीच में कोई “स्व मार्त्रार् (खार्सकर ‘इ’ की मार्त्रार्) दे दी जार्ती है जैस-आतशबार्जी (फार्रसी) = आतिशबार्जी (हिन्दी)। दुन्यार्, तक्य: (अरबी) = दुनियार्, तकियार् (हिन्दी)।
  11. बीच की “स्व मार्त्रार् को दीर्घ में, दीर्घ मार्त्रार् को “स्व में यार् गुण में, गुण मार्त्रार् को “स्व में और “स्व मार्त्रार् को गुण में बदल देने की परम्परार् है। जैस-खुरार्क (फार्रसी) = खूरार्क (हिन्दी) (“स्व के स्थार्न में दीर्घ), आईन: (फार्रसी) = आइनार् (हिन्दी) (दीर्घ के स्थार्न में “स्व) उम्मीद (फार्रसी) = उम्मेद (हिन्दी) (दीर्घ ‘इ’ के स्थार्न में गुण ‘ए’)ऋ देहार्त (फार्रसी) = दिहार्त (हिन्दी) (गुण ‘ए’ के स्थार्न में ‘इ’) मुग़ल (तुर्की) = मोगल (हिन्दी) (‘उ’ के स्थार्न में गुण ‘ओ’)।
  12. अक्षर में सवर्गी परिवर्तन भी कर दियार् जार्तार् है। जैसे-बार्लार्ई (फार्रसी) = मलार्ई (हिन्दी) (‘ब’ के स्थार्न में उसी वर्ग क वर्ण ‘म’)।

हिन्दी के उच्चार्रण और लेखन के अनुसार्र हिन्दी-भार्षार् में घुले-मिले कुछ विदेशी शब्द आगे दिये जार्ते हैं।

(अ) फार्रसी शब्द

अफसोस, आबदार्र, आबरू, आतिशबार्जी, सदार्, आरार्म, आमदनी, आवार्रार्, आफत, आवार्ज, आईनार्, उम्मीद, कद, कबूतर, कमीनार्, कुश्ती, कुश्तार्, किशमिश, कमरबन्द, किनार्रार्, कूचार्, खार्ल, खुद, खार्मोश, खरगोश, खुश खुरार्क, खूब, गर्द, गज, गुम, गल्लार्, गोलार्, गवार्ह, गिरफ्रतार्र, गरम, गिरह, गुलूबन्द, गुलार्ब, गुल, गोश्त, चार्बूक, चार्दर, चिरार्ग, चश्मार्, चरखार्, चूँकि, चेहरार्, चार्शनी, जंग, जहर, जीन, जोर, जबर, जिन्दगी, जार्दू, जार्गीर, जार्न, जुरमार्नार्, जिगर, जोश, तरकश, तमार्शार्, तेज, तीर, तार्क, तबार्ह, तनख्वार्ह, तार्जार् दीवार्र, देहार्त, दस्तूर, दुकान, दरबार्र, दगल, दिलेर, दिल, दवार्, नार्मर्द, नार्व, नार्पसन्द, पलंग, पैदार्वार्र, पलक, फल, पार्रार्, पेशार्, पैमार्नार्, बेवार्, बहरार्, बेहूदार्, बीमार्र, बेरहम, मार्दार्, मार्शार्, मलार्ई, मुफ्रत, मोर्चार् मीनार्, मुर्गार्, मरहम, यार्द, यार्र, रंग, रोगन, रार्ह, लश्कर, लगार्म, लेकिन, वर्नार्, वार्पिस, शार्दी, शोर, सितार्रार्, सरार्सर, सुर्ख, सरदार्, सरकार, सूद, सौदार्गर, हफ्रतार्, हजार्र, इत्यार्दि।

(आ) अरबी शब्द

अदार् अजब, अमीर, अजीब, अजार्यब, अदार्वत, अक्ल, असर, अहमक, अल्लार्ह, आसार्र, आखिर, आदमी, आदत, इनार्म, इजलार्स, इज्जत, इमार्रत, इस्तीफार्, इलार्ज, ईमार्न, उम्र, एहसार्न, औसत, औरत, औलार्द, कसूर, कदम, कब्र, कसर, कमार्ल, कर्ज, किस्त, किस्मत, किस्सार्, किलार्, कसम, कीमत, कसरत, कुर्सी, कितार्ब, कायदार्, कातिल, खबर, खत्म, खत, खिदमत, खरार्ब, खयार्ल, गरीब, गैर, जार्हिल, जिस्म, जलसार्, जनार्ब, जवार्ब, जहार्ज, जार्लिम, जिर्क, जेहन, तमार्म, तकाजार्, तार्रीख, तकियार्, तमार्शार्, तरफ, तै, तार्दार्द, तरक्की, तजुरबार्, दार्खिल, दिमार्ग, दवार्, दार्बार्, दार्वत, दफ्रतर, दगार्, दुआ, दफार्, दल्लार्ल, दुकान, दिक, दुनियार्, दौलत, दार्न, दीन, नतीजार्, नशार्, नार्ल, नकद, नहर, फकीर, फार्यदार्, फैसलार्, बार्ज, बहस, बार्की, मुहार्वरार्, मदद, मुद्दई, मरजी, मार्ल मिसार्ल, मजबूर, मुंसिफ, मार्मूली, मुकदमार्, मुल्क, मल्लार्ह, मवार्द, मौसम, मौका, मौलवी, मुसार्फिर, मशहूर, मजमून, मतलब, मार्नी, मार्त, यतीम, रार्य, लिहार्ज, लफ्रज, लहजार्, लिफार्फार्, लियार्कत, लार्यक, वार्रिस, वहम, वकील, शरार्ब, हिम्मत, हैजार्, हिसार्ब, हरार्मी, हद, हज्जार्म, हक, हुक्म, हार्जिर, हार्ल, हार्िश्यार्, हार्किम, हमलार्, हवार्लार्त, हौसलार्, इत्यार्दि।

(इ) तुर्की शब्द

आगार्, आका, उजबक, उर्दू, कालीन, काबू, कज्जार्क, काबू, कज्जार्क, केची, कुली, कुर्की, चिक, चेचक, चमचार्, चुगुल, चकमक, जार्जिम, तमगार्, तोप, तलार्श, बेगम, बहार्दुर, मुगल, लफंगार्, लार्श, सौगार्त, सुरार्ग इत्यार्दि।

(ई) अँग्रेजी शब्द

(अँग्रेजी) तत्सम तद्भव (अँग्रेजी) तत्सम तद्भव
ऑफीसर अफसर थियेटर थेटर, ठेठर
एंजिन इंजन टरपेण्टार्इन तार्रपीन
डॉक्टर डार्क्टर मार्इल मील
लैनटर्न लार्लटेन बॉटल बोतल
स्लेट सिलेट केप्टेन कप्तार्न

इनके अतिरिक्त, हिन्दी में अँगरेजी के कुछ तत्सम शब्द ज्यों-के-त्यों प्रयुक्त होते है। इनके उच्चार्रण में प्रार्य: कोई भेद नहीं रह गयार् है। जैसे-अपील, आर्डर, इंच, इण्टर, इयरिंग, एजेन्सी, कम्पनी, कमीशन, कमिशनर, केम्प, क्लार्स, क्वाटर, र्किकेट, काउन्सिल, गाड, गजट, जेल, चेयरमैन, ट्यूशन, डार्यरी, डिप्टी, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड, ड्रार्इवर, पेन्सिल, फार्उण्टेन पेन, नम्बर, नोटिस, नर्स, थर्मार्मीटर, दिसम्बर, पाटी, प्लेट, पासल, पेटोल, पार्उडर, प्रेस, पे्रफम, मीटिंग, कोर्ट, होल्डर, कॉलर इत्यार्दि।

(उ) पुर्तगार्ली शब्द

हिन्दी पुर्तगार्ली अलकतरार् Alcatrao अनन्नार्स Annanas आलपीन Alfinete आलमार्री Almario बार्ल्टी Balde किरार्नी Carrane चार्बी Chave फीतार् Fita तम्बार्कू Tobacco इसी तरह, आयार्, इस्पार्त, इस्तिरी, कमीज, कनस्टर, कमरार्, काजू, र्किस्तार्न, गमलार्, गोदार्म, गोभी, तौलियार्, नीलार्म, परार्त, पार्दरी, पिस्तौल, फर्मार्, बुतार्म, मस्तूल, मेज, लबार्दार्, सार्यार्, सार्गू, आदि, पुर्तगार्ली, तत्सम के तद्भव रूप भी हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं।

उपर जिन शब्दों की सूची दी गयी है उनसे यह स्पष्ट है कि हिन्दी भार्षार् में विदेशी शब्दों की कमी नहीं है। ये शब्द हमार्री भार्षार् में दूध-पार्नी की तरह मिले हैं। निस्सन्देह, इनसे हमार्री भार्षार् समृद्ध हुई है।

रचनार् अथवार् बनार्वट के आधार्र पर शब्दों क वर्गीकरण

शब्दों अथवार् वर्णों के मेल से नये शब्द बनार्ने की प्रर्कियार् को ‘रचनार् यार् बनार्वट’ कहते हैं। कई वर्णों को मिलार्ने से शब्द बनतार् है और शब्द के खण्ड को ‘शब्दार्ंश’ कहते हैं। जैसे-’रार्म’ में शब्द के दो खण्ड हैं-’रार्’ और ‘म’। इन अलग-अलग शब्दार्ंशों क कोई अर्थ नहीं है। इसके विपरीत, कुछ ऐसे भी शब्द हैं, जिनके दोनों खण्ड साथक होते हैं। जैसे-विद्यार्लय। इस शब्द के दो अंश हैं-’विद्यार्’ और ‘आलय’। दोनों के अलग-अलग अर्थ हैं। इस प्रकार, बनार्वट के विचार्र से शब्द के तीन प्रकार हैं-(1) रूढ़, (2) यौगिक और (3) योगरूढ़।

रूढ़ शब्द

जिन शब्दों के खण्ड साथक न हों, उन्हें रूढ़ कहते हैं जैसे-नार्क, कान, पीलार्, झट, पर। यहार्ँ प्रत्येक शब्द के खण्ड-जैसे, ‘नार्’ और ‘क’, ‘का’ और ‘न’-अर्थहीन हैं।

यौगिक शब्द

ऐसे शब्द, जो दो शब्दों के मेल से बनते हैं और जिनके खण्ड साथक होते हैं, यौगिक कहलार्ते हैं। दो यार् दो से अधिक रूढ़ शब्दों के योग से यौगिक शब्द बनते है जैसे-आग-बबूलार्, पीलार्-पन, दूध-वार्लार्, छल-छन्द, घुड़-सवार्र इत्यार्दि। यहार्ँ प्रत्येक शब्द के दो खण्ड हैं और दोनों खण्ड साथक हैं।

योगरूढ़

शब्द ऐसे शब्द, जो यौगिक तो होते हैं, पर अर्थ के विचार्र से अपने सार्मार्न्य अर्थ को छोड़ किसी परम्परार् से विशेष अर्थ के परिचार्यक हैं, योगरूढ़ कहलार्ते हैं। मतलब यह कि यौगिक शब्द जब अपने सार्मार्न्य अर्थ को छोड़ विशेष अर्थ बतार्ने लगें, तब वे ‘योगरूढ़’ कहलार्ते हैं जैसे-लम्बोदर, पंकज, चर्कपार्णि, जलज इत्यार्दि। ‘पंक+ज’ अर्थ है ‘कीचड़ से (मैं) उत्पन्नऋ पर इससे केवल ‘कमल’ क अर्थ लियार् जार्येगार्, अत: ‘पंकज’ योगरूढ़ है इसी तरह, अन्य शब्दों को भी समझनार् चार्हिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *