व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क अर्थ, परिभार्षार् एवं क्षेत्र
व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न मनोविज्ञार्न क एक पक्ष है जिसके अन्तर्गत मार्नव की विभिन्न समस्यार्ओं के सुलझार्ने में मनोवैज्ञार्निक सिद्धार्ंतों क प्रयोग कियार् जार्तार् है। व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के विकास पर सर्व प्रथम पैटर्सन ने व्यार्ख्यार् की। उन्होने व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के विकास के चार्र चरण बतार्ए – प्रथम चरण गर्भार्वस्थार्, द्वितीय चरण जन्मकाल, तीसरार् चरण बार्ल्यार्वस्थार् और चौथार् चरण युवार्स्थार्, जिनक अघ्ययन आप आगे करेगें। अनेक मनोवैज्ञार्निकों ने व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की विभिन्न प्रकार की परिभार्षार्एं दी है उनमें से एच. डब्ल्यू. हैपनर, पॉफेन बर्जर तथार् आर. डब्ल्यू. हजबैण्ड की परिभार्षार्एं प्रमुख है । व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क क्षेत्र बड़ार् विस्तृत एवं व्यार्पक है परन्तु हम यहॉ इसके मुख्य मुख्य क्षेत्रो क अघ्ययन करेगें। 

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न अर्थ 

विभिन्न मार्नवीय समस्यार्ओं के सुलझार्ने में मनोवैज्ञार्निक सिद्धार्ंतों क प्रयोग करनार् व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में आतार् है। अर्थार्त्.मार्नव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मनोविज्ञार्न क व्यार्वहार्रिक उपयोग उसकी समस्यों क समार्धार्न करने एवं उसके कल्यार्ण के लिए कियार् जार्तार् है। व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क लक्ष्य मार्नव क्रियार्ओं क वर्णन, भविष्य कथन और उसकी क्रियार्ओं पर नियंत्रण है जिससे कि व्यक्ति अपने जीवन को बुद्धिमतार् पूर्वक समझ सकें, निर्देशित कर सकें तथार् दूसरे के जीवन को प्रभार्वित कर सकें।

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न, मनोविज्ञार्न क ही एक पक्ष है। जिस प्रकार विज्ञार्न के सैद्धार्ंतिक तथार् व्यार्वहार्रिक दो पहलू होते है उसी प्रकार मनोविज्ञार्न में सैद्धार्ंतिक के सार्थ-सार्थ व्यार्वहार्रिक पहलू भी है। इसमें भी मनोवैज्ञार्निक यार् वैज्ञार्निक अपनी प्रयोगशार्लार् में प्रयोग के आधार्र पर सार्मार्न्य सिद्धार्ंतों की खोज करतार् है और इनके लार्भों को जनसार्धार्रण तक पहुंचार्तार् है।

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की ऐतिहार्सिक पृष्ठभूमि एवं विकास- 

सर्व प्रथम पैटर्सन (1940) ने व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के इतिहार्स के विकास पर प्रकाश डार्लार्। उन्होनें अपने लेख Applied Psychology Comes of Age में व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के विकास को चार्र चरणों में बतार्यार् है। ये चरण है गर्भार्वस्थार्, जन्मकाल, बार्ल्यार्वस्थार् तथार् युवार्वस्थार्।

  1. प्रथम चरण – गर्भार्वस्थार् पैटर्सन के अनुसार्र 1882 से लेकर 1917 तक मनोविज्ञार्न क विकास व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के गर्भार्वस्थार् क काल थार्। इस काल में गार्ल्टन, केटेल और बिने जैसे मनोवैज्ञार्निकों क योगदार्न महत्वपूर्ण थार्। इस काल में अमेरिक सहित कर्इ देश विश्व युद्ध में लगे हुए थे। 
  2. द्वितीय चरण – जन्मकाल पैटर्सन ने 1917 से 1918 तक के समय को व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क जन्मकाल मार्नार् है और इसी काल में कर्इ मनोवैज्ञार्निक परीक्षणों क निर्मार्ण हुआ। इस काल में ही अमेरिक जैसे देशों ने सेनार् में भर्ती के लिए मनोवैज्ञार्निक परीक्षणों क उपयोग कियार् और सैनिकों के चुनार्व के लिए आर्मी-अल्फार् और आर्मी-बीटार् परीक्षणों क निर्मार्ण हुआ। अल्फार् परीक्षण अधिकारी वर्ग में चयन के लिए तथार् बीटार् परीक्षण जवार्नों व अनपढ़ लोगों के लिए उपयोग में लिये गए। 
  3. तीसरार् चरण – बार्ल्यार्वस्थार् पैटर्सन के अनुसार्र सन् 1918 से 1937 तक मनोविज्ञार्न के विकास के काल को व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की बार्ल्यार्वस्थार् मार्नी जार्नी चार्हिए। इसी समय 1937 में अमेरिक में व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की एक रार्ष्ट्रीय संस्थार्न की स्थार्पनार् हुर्इ जिसक उद्देश्य रार्ष्ट्रीय सुधार्र में मनोविज्ञार्न के व्यवहार्र को बढ़ार्वार् देनार् थार्। 
  4. चौथार् चरण – युवार्स्थार् सन् 1937 के बार्द व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न ने अपनी युवार्वस्थार् में प्रवेश कियार्। तब से आज तक इसक क्षेत्र बढ़तार् ही जार् रहार् है। वर्तमार्न काल में मार्नव के जीवन के कर्इ कार्य क्षेत्रों में इसक उपयोग हो रहार् है। 

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की परिभार्षार्एं 

मनोवैज्ञार्निकों ने व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की विभिन्न परिभार्षार्एं दी है जिनमें कुछ प्रमुख परिभार्षार्ओं को आगे प्रस्तुत कियार् जार् रहार् है। सार्मार्न्य परिभार्षार् के रूप में ‘‘व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न सार्मार्न्य मनोविज्ञार्न, औद्योगिक मनोविज्ञार्न, नैदार्निक मनोविज्ञार्न एवं सार्मार्जिक मनोविज्ञार्न क व्यार्वहार्रिक अध्ययन है।’’

  1. एच. डब्ल्यू. हैपनर के अनुसार्र ‘‘व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क लक्ष्य मार्नव क्रियार्ओं क वर्णन, भविष्य कथन एवं नियंत्रण है तार्कि हम स्वयं अपने जीवन को बुद्धिमतार्पूर्ण सही ढंग से समझ सकें तथार् अन्य व्यक्तियों को प्रभार्वित कर सकें।’’ 
  2. आर. डब्ल्यू. हजबैण्ड के अनुसार्र ‘‘व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न सार्मार्न्य प्रौढ़ व्यक्तियों के व्यार्वहार्रिक पक्षों क अध्ययन करतार् है।’’ 
  3. पॉफेन बर्जर के अनुसार्र ‘‘व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के उद्देश्य विभिन्न प्रकार की योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं से युक्त व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने तथार् उनके पर्यार्वरण क चयन एवं नियंत्रण करने के बार्द उनको उनके कार्यों से इस प्रकार समार्योजित करनार् है कि वे अधिक से अधिक सार्मार्जिक एवं व्यक्तिगत सुख तथार् संतोष पार् सकें।’’

अन्य मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र अपने यार् दूसरों के व्यवहार्र यार् आचरण एवं व्यार्वहार्रिक समस्यार्ओं क अध्ययन एवं आवश्यकतार् अनुसार्र वार्ंछित परिवर्तन लार्ने वार्ले मनोविज्ञार्न को व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न कहते है।

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के क्षेत्र 

वर्तमार्न में व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क क्षेत्र बरार्बर बढ़तार् जार् रहार् है। उस हर क्षेत्र में जहार्ं मार्नव जीवन में मनोवैज्ञार्निक सिद्वार्ंतों क प्रयोग कियार् जार् सकतार् है वहार्ं व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क भी क्षेत्र है। अत: व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क क्षेत्र बड़ार् व्यार्पक एवं विस्तृत है परन्तु इसके क्षेत्र को निम्नलिखित मुख्य भार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् है-

  1. मार्नसिक स्वार्स्थ्य एवं चिकित्सार् 
  2. सार्मार्जिक समस्यार्एं 
  3. शिक्षार् 
  4. परार्मर्श तथार् निर्देशन 
  5. उद्योग एवं व्यार्पार्र 
  6. सेवार्ओं यार् नौकरियों में चुनार्व 
  7. अपरार्ध निरोध 
  8. सैनिक क्षेत्र 
  9. रार्जनैतिक क्षेत्र 
  10. विश्व शार्ंति 
  11. यौन शिक्षार् 
  12. क्रीड़ार् यार् खेल क्षेत्र 
  13. अन्तरिक्ष मनो विज्ञार्न 

1. मार्नसिक स्वार्स्थ्य एवं चिकित्सार् 

मार्नसिक स्वार्स्थ्य एवं चिकित्सार् व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र में नैदार्निक मनोविज्ञार्न से व्यक्तियों के असार्मार्न्य व्यवहार्र से सम्बन्धित समस्यार्ओं को समझने, उनके कारणों क पतार् लगार्ने तथार् उनक निरार्करण करके व्यक्ति के वार्तार्वरण को अनुकूल बनार्ने में सहार्यतार् मिलती है। मार्नसिक स्वार्स्थ्य को किस तरह उत्तम बनार्ये रखार् जार् सकतार् है इसके लिए विभिन्न उपार्यों तथार् तकनीकों की खोज की जार्ती है एवं इनकी जार्नकारी व्यक्तियों को दी जार्ती है। 

मनोवैज्ञार्निकों के हस्तक्षेप के पूर्व मार्नसिक विक्षिप्तों पर झार्ड़-फूंख करने वार्ल व्यक्तियों द्वार्रार् अमार्नुषिक व्यवहार्र एवं अत्यार्चार्र किये जार्ते थे। मार्नसिक विक्षिप्तों को बेड़ियों में जकड़ कर बन्द स्थार्नों पर रखार् जार्तार् थार्। मनोवैज्ञार्निकों ने ऐसे मार्नसिक विक्षिप्तों की बेड़ियार्ं कटवार् कर मनोरोगों के कारणों क विश्लेषण करके उनकी चिकित्सार् प्रार्रम्भ की। आज प्रत्येक व्यवस्थित एवं विकसित मार्नसिक चिकित्सार्लय में ऐसे लोगों चिकित्सार् होती है। कुछ मार्नसिक रोग जैसे हिस्टीरियार्, मनोविक्षिप्ततार्, मनोग्रंथियार्ं एवं मनोविदलतार् के बार्रे में लोगों में बड़ी भ्रार्न्तियार्ं फैली हुर्इ थीं। लोग इन रोगियों पर भूत-प्रेत क प्रभार्व मार्नते थे। कर्इ मनोरोगियों को डार्यन यार् चूड़ैल समझार् जार्तार् थार् और उन पर अनेक प्रकार के अत्यार्चार्र किये जार्ते थे। मनोवैज्ञार्निकों ने इन मार्नसिक रोगों के कारणों क विश्लेषण करके कारणों क पतार् लगार्कर मार्नसिक रोगों की सफलतार् पूर्वक चिकित्सार् की। फ्रार्यड, युंग, एडलर आदि मनोविश्लेषणवार्दियों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण अन्वेषण किये। मनोवैज्ञार्निकों ने इस बार्त क पतार् लगार्यार् कि मन और शरीर क परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। अत: रोगियों में शार्रीरिक रोगों के सार्थ-सार्थ मार्नसिक व्यार्धियार्ं भी लगी होती है। कर्इ शार्रीरिक रोगों को दूर करने के लिए आधुनिक चिकित्सक मनोवैज्ञार्निकों एवं मनोचिकित्सकों की सहार्यतार् लेते हैं। अनेक विद्वार्नों क मत है कि यदि मार्नव प्रवृत्तियों एवं मार्नसिक प्रक्रियार्ओं को ठीक-ठीक और सही ढंग से समझ लियार् जार्ए तो 95 % रोगी केवल सुझार्वों के द्वार्रार् ठीक किये जार् सकते हैं।

2. सार्मार्जिक समस्यार्एं 

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क सार्मार्जिक समस्यार्ओं को सुलझार्ने तथार् सही और स्वस्थ समार्ज क निर्मार्ण करने में भी महत्वपूर्ण योगदार्न है। समार्ज को समृद्ध बनार्ने और उसकी प्रगति बनार्ये रखने में भी व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न उपयोगी सिद्ध हुआ है। समार्ज के व्यक्तियों के समुचित अनुकूलन के लिए भी इसक उपयोग कियार् जार्तार् है। जार्ति-भेद समस्यार्, रूढ़िवार्दी मार्नसिकतार्, दहेज प्रथार्, कुपोषण और बार्ल विवार्ह जैसी ज्वलन्त समस्यार्ओं पर व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क उपयोग कियार् जार्तार् है। सार्मार्जिक सेवार्ओं, सार्मार्जिक शिक्षार् और समार्ज कल्यार्ण में भी व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क उपयोग कियार् जार्तार् है। मनोवैज्ञार्निक सर्वेक्षणों के आधार्र पर जनतार् की अभिरुचि क पतार् लगार्कर एवं उसको समझकर उसके अनुकूल सुझार्व देने व सुधार्र करने क प्रयत्न कियार् जार्तार् है। पश्चिमी देशों में रंग भेद की समस्यार्एं एवं समार्ज में जार्तिवार्द, जार्तिभेद की समस्यार्एं भी मनोवैज्ञार्निक है। इन सभी को व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न द्वार्रार् हल कियार् जार्तार् है।

समार्ज सार्मार्जिक सम्बन्धों की एक व्यवस्थार् है और इन सार्मार्जिक सम्बन्धों के ठीक रहने से ही समार्ज ठीक रहतार् है। इनमें गड़बड़ी से ही सार्मार्जिक समस्यार्एं उत्पन्न होती है। सार्मार्जिक सम्बन्ध मनुष्यों की प्रवृत्तियों, भार्वनार्ओं आदि के परस्पर समार्योजन पर निर्भर करते है। वार्स्तव में सार्मार्जिक समस्यार्एं इसी समार्योजन की समस्यार्एं है। इनको सुलझार्ने के लिए भी मनोवैज्ञार्निक तरीकों को काम में लियार् जार्तार् है।

3. शिक्षार् 

वर्तमार्न काल में शिक्षार् के क्षेत्र में मनोविज्ञार्न क व्यवहार्र बढ़तार् ही जार् रहार् है। शिक्षार् के क्षेत्र में मनोविज्ञार्न ने क्रार्ंति कर दी है। शिक्षार् मनोविज्ञार्न एक स्वतंत्र विषय बन गयार् है। शिक्षार् के क्षेत्र की समस्यार्ओं एवं प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, चिन्तन, तर्क आदि अनेक मार्नसिक प्रक्रियार्ओं पर शोध एवं मनोवैज्ञार्निक नियमों की खोज की जार् रही है। पार्ठ्यक्रमों को बार्लकों की रुचि के अनुसार्र बनार्ने की चेष्टार् की जार् रही है। बार्लकों की रुचि योग्यतार् और सर्वार्ंगीण व्यक्तित्व के विकास के लिए विभिन्न शोध कार्य किये जार्ते रहे हैं। शिक्षार् मनोविज्ञार्न द्वार्रार् शिक्षार् देने के उत्तम उपार्य खोजे जार् रहे हैं। शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण देने एवं व्यवहार्र कुशल बनार्ने के लिए भी शिक्षार् मनोविज्ञार्न की अहम् भूमिक है। बार्लकों में अनुशार्सन किस तरह उत्पन्न कियार् जार्ए, स्वस्थ आदतें कैसी बनाइ जार्एं, बुरी आदतें कैसे छुड़ाइ जार्एं तथार् उनकी विभिन्न योग्यतार्ओं क सर्वोत्तम विकास किस तरह कियार् जार्ए, यह भी शिक्षार् मनोविज्ञार्न के अन्तर्गत कियार् जार्तार् है। इस क्षेत्र में मनोवैज्ञार्निक विद्याथियों की अभिरुचि तथार् मार्नसिक परीक्षार् करके उनके अध्ययन के विषयों को सुनिश्चित करने में सहार्यतार् देते हैं। बार्लक क सर्वार्ंगीण विकास किस तरह कियार् जार् सकतार् है, बार्लक को क्यार् पढ़ार्यें, कब पढ़ार्यें व कैसे पढ़ार्यें, इन सम्भार्वनार्ओं क भी पतार् लगार्यार् जार्तार् है। मनोवैज्ञार्निक सुझार्वों के आधार्र पर पार्ठ्यक्रमों में सुधार्र तथार् विद्याथियों में विभिन्न कार्यक्रमों क प्रबन्धन, शिक्षक-विद्यार्थ्र्ार्ी सम्बन्ध, शिक्षार्-प्रणार्ली आदि क भी अध्ययन कर इनमें वार्ंछित सुधार्र किये जार्ते है। 

उच्च शिक्षार् के लिए विषयों के चयन के लिए और शिक्षार् समार्प्ति के पश्चार्त् व्यवसार्यों के चयन के लिए मनोवैज्ञार्निकों के द्वार्रार् परार्मर्श व निर्देशन दिये जार्ते है जिससे छार्त्रों में भटकाव की सम्भार्वनार् कम रहती है। छार्त्रों की योग्यतार्एं, अभिवृत्ति, बुद्धि एवं कार्य करने की क्षमतार् के आधार्र पर उनको उचित रोजगार्र की सलार्ह दी जार्ती है। चूंकि विद्यार्थ्र्ार्ी ही आगे जार्कर समार्ज क परिपक्व नार्गरिक बनतार् है, अत: उसे सार्मार्जिक कुरीतियों एवं बुराइयों से दूर रहने की प्रेरणार् व शिक्षार् दी जार्ती है।

मार्दक द्रव्यों के सेवन से होने वार्ली हार्नियों के प्रति भी विद्याथियों को जार्गृत कियार् जार्तार् है जिससे कि वह आगे चलकर व्यसन मुक्त आदर्श व्यक्ति बन सकें। वर्तमार्न समय में संचार्र मार्ध्यमों द्वार्रार्, पार्श्चार्त्य संस्कृति द्वार्रार् हमार्रे देश के बार्लकों पर हमलार् हो रहार् है, जिससे बार्लकों में असार्मार्न्य व्यवहार्र जैसे- विद्यार्लय से भार्ग जार्नार् (भगोड़ार् व्यवहार्र), मार्दक पदाथों क सेवन करनार् तथार् चोरी करने जैसे अन्य असार्मार्जिक व्यवहार्र पैदार् हो रहे हैं। इन सबक उपचार्र व समार्धार्न व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न के अन्तर्गत मनोवैज्ञार्निक करते हैं।

4. परार्मर्श तथार् निर्देशन 

वर्तमार्न काल में व्यक्ति क जीवन संघर्षमय हो गयार् है। व्यक्तियों को भार्री प्रतिस्पर्धार् क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। पढ़े लिखे लोगों में भी बेरोजगार्री फैली हुर्इ है। गलत व्यवसार्य के चयन की समस्यार् हर कहीं बनी हुर्इ है। बेरोजगार्रों की अपेक्षार् नौकरियार्ं बहुत कम है जिससे बेरोजगार्रों में संघर्ष व तनार्व व्यार्प्त है। पढ़े-लिखे लोग भी व्यवसार्यों में जार्नार् नहीं चार्हते और नौकरियों के पीछे भार्गते है। इनमें से अधिकतर लोग यह भी समझ नहीं पार्ते कि वे कौन सार् कार्य कर सकते है व उनमें कौन से कार्य करने की क्षमतार् है। ऐसे लोग ऐसे व्यवसार्य चुन लेते है जो उनके लिए उपयुक्त नहीं होते और कालार्न्तर में वे असफल हो जार्ते है। अत: विकासशील देशों में मनोवैज्ञार्निक परीक्षणों की सहार्यतार् से परार्मर्शदार्तार् एवं मनोवैज्ञार्निक लोगों को उनक व्यवसार्य निश्चित करने के लिए सलार्ह देते है। इस प्रकार की मनोवैज्ञार्निक सेवार्एं विद्यार्लयों में, महार्विद्यार्लयों में, विश्वविद्यार्लयों में और रोजगार्र कार्यार्लयों में भी मनोवैज्ञार्निकों की सहार्यतार् से दी जार्ती है।

सही लोगों के लिए सही काम क चयन (व्यवसार्यी चयन) और उपयुक्त काम के लिए सही व्यक्ति क चयन (कर्मचार्री चयन) भी मनोविज्ञार्न की सहार्यतार् से कियार् जार्तार् है। व्यवसार्य में आने वार्ली रुकावटों और समस्यार्ओं क समार्धार्न भी मनोवैज्ञार्निक तरीकों से कियार् जार्तार् है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन के अतिरिक्त मनोवैज्ञार्निक व्यक्तिगत व घरेलू समस्यार्ओं को सुलझार्ने में भी परार्मर्श देतार् है। इस तरह के परार्मर्श की लोगों को आवश्यकतार् पड़ती रहती है और परार्मर्श से उनकी समस्यार्ओं क समार्धार्न हो जार्तार् है। व्यक्ति की स्वयं की खरार्ब आदतें और अपने पुत्र-पुत्री यार् परिवार्र के किसी सदस्य की असमार्योजन की समस्यार् के लिए भी मनोवैज्ञार्निक परार्मर्श लियार् जार्तार् है। मनोवैज्ञार्निक परार्मर्श से व्यक्ति अपने यार् अपने परिवार्र के सदस्य के व्यवहार्र में वार्ंछित सुधार्र लार्कर अपनी और अपने परिवार्र के सदस्यों की प्रगति कर सकतार् है।

5. उद्योग एवं व्यार्पार्र क्षेत्र 

उद्योग एवं व्यार्पार्र को वैज्ञार्निक स्तर पर लार्ने एवं इनको आधुनिक बनार्ने में भी मनोविज्ञार्न की महत्वपूर्ण भूमिक रही है। औद्योगिक क्षेत्रों में उद्योगों की सही ढंग से स्थार्पनार् करनार्, उनको आधुनिक रूप देनार्, कर्मचार्रियों क चयन, मशीनों क चयन एवं प्रबंधन को दुरूस्त करने में मनोविज्ञार्न ने बहुत सहार्यतार् की है। इसके अध्ययन के लिए मनोविज्ञार्न की शार्खार्एं जैसे-औद्योगिक मनोविज्ञार्न (Industrial Psychology) एवं संगठन मनोविज्ञार्न (Organisational Psychology) की स्थार्पनार् हुर्इ है। औद्योगिक मनोविज्ञार्न उद्योग के उत्पार्दन की समस्यार्, मशीनों की समस्यार्, कर्मचार्रियों की समस्यार् आदि क अध्ययन करतार् है जबकि संगठन मनोविज्ञार्न उद्योग के प्रबन्धन क विशेष रूप से अध्ययन करतार् है। आधुनिक युग में जहार्ं विश्वभर में उद्योग एवं आर्थिक उदार्रीकरण को प्रार्थमिकतार् दी जार् रही है, वहीं व्यार्पार्र क्षेत्र में भी भार्री बदलार्व आ रहार् है। ऐसी स्थिति में औद्योगिक मनोविज्ञार्न एवं संगठन मनोविज्ञार्न क महत्व और भी बढ़ जार्तार् है।

औद्योगिक मनोविज्ञार्न इस बार्त क अध्ययन करतार् है कि कम से कम लार्गत में अधिक से अधिक अच्छी किस्म क उत्पार्दन किस प्रकार कियार् जार् सकतार् है। इसके अतिरिक्त कर्मचार्रियों की व्यक्तिगत समस्यार्एं, कर्मचार्रियों की औद्योगिक समस्यार्एं, कर्मचार्रियों की चयन समस्यार्एं, कर्मचार्रियों की कार्य दशार्एं, कर्मचार्रियों क मनोबल, कर्मचार्रियों क प्रशिक्षण, कारखार्नों में मशीनों की दशार्एं आदि समस्यार्ओं क अध्ययन भी करतार् है। इन सभी समस्यार्ओं के अध्ययन के बार्द मनोवैज्ञार्निक उद्योग एवं कर्मचार्री कल्यार्ण के लिए समार्धार्न सुझार्तार् है। इसके अतिरिक्त कारखार्नों और उद्योगशार्लार्ओं की बहुत सी समस्यार्ओं जैसे यंत्रों में सुधार्र कार्य करने की विधि, कार्य करने के घण्टे तथार् विश्रार्म के समय क वितरण, थकावट और उकतार्हट दूर करने के उपार्य, वेतन तथार् मजदूरी क निर्धार्रण, काम करने की स्वार्स्थ्यप्रद परिस्थितियार्ं आदि पैदार् करने में भी मनोवैज्ञार्निकों से बहुत सहार्यतार् मिलती है। कारखार्नों में दुर्घटनार्ओं की रोकथार्म सम्बंधी मनोवैज्ञार्निक सुझार्व भी दिये जार्ते है। मजदूरों यार् कर्मचार्रियों और प्रबन्धकों के बीच मतभेदों को दूर करने में, तार्ले बन्दी की समस्यार्एं सुलझार्ने में भी मनोविज्ञार्न ने बड़ी सहार्यतार् दी है। कर्मचार्रियों के चौकन्नेपन की, रुचियों की, अभिवृत्ति की, बुद्धि एवं विशेष योग्यतार्ओं की विभिन्न परीक्षार्ओं तथार् परीक्षणों आदि से जार्ंच की जार्ती है। 

उद्योग के उत्पार्दन, वितरण, विनिमय आदि कार्यों के सभी क्षेत्रों में मनोविज्ञार्न क प्रयोग कियार् जार्तार् है। उत्पार्दन के उपभोक्तार्, विक्रय तथार् विज्ञार्पन आदि क मनोवैज्ञार्निक ढंग से अध्ययन कियार् जार्तार् है। उपभोक्तार् किस तरह की वस्तुओं को पसन्द करतार् है और उन वस्तुओं को किस तरह बेचार् जार्तार् है, उत्पार्दन की गुणवत्तार् किस तरह बढ़ाइ जार् सकती है, विज्ञार्पन के कौन से तरीके सफल हो सकते है आदि इन सभी प्रश्नों के मनोवैज्ञार्निक समार्धार्न सुझार्ये जार्ते है। व्यार्पार्रिक क्षेत्र एवं शेयर बार्जार्र में भी मनोवैज्ञार्निक प्रभार्व देखे जार्ते है। 

6. सेवार्ओं यार् नौकरियों में चुनार्व 

वर्तमार्न में लगभग सभी देशों में सभी प्रकार की सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों यार् सेवार्ओं में चुनार्व के लिए मनोवैज्ञार्निकों और मनोवैज्ञार्निक परीक्षणों की सहार्यतार् ली जार्ती है। मनोवैज्ञार्निकों के द्वार्रार् बनार्ये गए मनोपरीक्षण एवं परीक्षार्ओं के आधार्र पर सावजनिक सेवार् आयोग, लोक सेवार् आयोग तथार् अन्य नियुक्ति संस्थार्एं, सरकारी हों यार् गैर सरकारी, कर्मचार्रियों क चुनार्व करती है। सेनार् में भी थल, वार्यु और जल सेवार्ओं के लिए योग्यतार् परीक्षार्ओं द्वार्रार् योग्य व्यक्ति क चुनार्व कियार् जार्तार् है। ये योग्यतार् परीक्षार्एं वार्स्तव में मनोवैज्ञार्निक परीक्षार्एं ही है। द्वितीय विश्वयुद्ध में सेनार् में भर्ती के लिए आर्मी एल्फार् तथार् आर्मी बीटार् मनोवैज्ञार्निक परीक्षण बनार्ए गए थे। अधिकारियों के चुनार्व के लिए आर्मी एल्फार् परीक्षण तथार् सार्मार्न्य सैनिकों के चुनार्व के लिए आर्मी बीटार् परीक्षण काम में लिए गए। कारखार्नों में मशीनों को चलार्ने के लिए उपयुक्त कर्मचार्री के चुनार्व के लिए भी मनोवैज्ञार्निक परीक्षणों क उपयोग कियार् जार्तार् है। गैर सरकारी संस्थार्एं भी अपने कर्मचार्रियों क चुनार्व मनोवैज्ञार्निक ढंग से करती है। आधुनिक युग में जहार्ं नयी-नयी तकनीकों क उपयोग बढ़ रहार् है वहीं उनके संचार्लन के लिए चयनित कर्मचार्रियों की नियुक्ति होती है। इन कर्मचार्रियों क चुनार्व मनोवैज्ञार्निक विधि से होतार् है। इस तरह हम देखते है कि नौकरियों में चुनार्व के लिए व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न क बहुत महत्व है।

7. अपरार्ध निरोध 

अपरार्धों एवं अपरार्धियों की रोकथार्म में मनोविज्ञार्न ने बहुत सहार्यतार् की है। बढ़ती जनसंख्यार् एवं बेरोजगार्री ने समार्ज में अपरार्धियों एवं अपरार्धों की संख्यार् भी बढ़ार् दी है। मनोविज्ञार्न के अनुसार्र अपरार्धी को दण्ड देने की अपेक्षार् उसके दोषों को समझकर उनमें सुधार्र लार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। अपरार्धियों की मार्नसिकतार् बदलने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है तार्कि वह अपरार्ध कर ही न सके। अपरार्धियों को सुधार्रने की दिशार् में नित्य नये प्रयोग किये जार्ते है। खुले जेल-खार्ने, सुधार्र गृह, प्रोबेशन (बार्लसुधार्र गृह), जूवेनिल रिफाम हार्ऊस आदि इसी के परिणार्म है। इस प्रकार मनोविज्ञार्न के प्रभार्व से अपरार्धियों के प्रति दुव्र्यवहार्र बन्द हो गयार् है और उनमें सुधार्र होतार् जार् रहार् है।

बार्ल एवं किशोर अपरार्धियों को सुधार्रने के लिए भी कर्इ मनोवैज्ञार्निक उपार्यों को अपनार्यार् जार्तार् है। किशोर अपरार्धियों के रहने के वार्तार्वरण एवं उनकी परिस्थितियों में भी परिवर्तन लार्ने क मनोवैज्ञार्निक प्रयार्स कियार् जार्तार् है। मनोविज्ञार्न ने अपने शोध कार्यों में यह सिद्ध कर दियार् है कि अपरार्धी अकेले ही अपरार्धों के लिये उत्तरदार्यी नहीं है बल्कि उनकी परिस्थितियार्ं, उनक वार्तार्वरण और समार्ज भी अपरार्ध के लिए जिम्मेदार्र है। अत: मनोविज्ञार्न इन सभी क उपचार्र करने क प्रयत्न करतार् है। छोटे बच्चों द्वार्रार् मार्दक द्रव्यों की तस्करी करनार् और उनक सेवन करनार् बच्चों क अपरार्ध नहीं है बल्कि उनक समार्ज, उनक वार्तार्वरण एवं परिस्थितियार्ं यह कृत्य करने के लिए उन्हें बार्ध्य करती है। ऐसी परिस्थिति में मनोवैज्ञार्निक छोटे बच्चों की परिस्थितियों, मार्नसिक अवस्थार्ओं में सुधार्र लार्ने क प्रयत्न करते है। छोटे बच्चों के वार्तार्वरण, परिस्थितियार्ं एवं उनकी दिनचर्यार् को भी बदलने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।

अपरार्ध निरोध के अतिरिक्त न्यार्य करने में भी मनोविज्ञार्न से बड़ी सहार्यतार् मिलती है। न्यार्यधीश की मनोवैज्ञार्निक अन्र्तदृष्टि सही न्यार्य देने में सक्षम होती है। अनेक यंत्रों द्वार्रार् भी अपरार्धी की आन्तरिक स्थिति क पतार् लगार्यार् जार् सकतार् है और सही न्यार्य कियार् जार् सकतार् है।

8. सैनिक क्षेत्र 

सेनार् में भर्ती हेतु उपयुक्त व्यक्तियों के चुनार्व में मनोविज्ञार्न की सहार्यतार् ली जार्ती है। जल, थल तथार् वार्यु सेनार्ओं में भर्ती के लिए अभ्यार्साथियों क चयन मनोवैज्ञार्निक परीक्षण द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। युद्ध काल के दौरार्न शत्रु को भयभीत करने तथार् सैनिकों क मनोबल बढ़ार्ने के लिए मनोविज्ञार्न की सहार्यतार् ली जार्ती है। देशों के बीच शीतयुद्ध मनोवैज्ञार्निक प्रचार्रों पर ही निर्भर होते है। सैनिकों में स्थिरतार् और दृढ़तार् बनार्ये रखने के लिए मनोवैज्ञार्निक सुझार्व दिये जार्ते है। जैसार् कि पहले कहार् जार् चुक है कि अल्फार् और बीटार् परीक्षण भी सेनार् में सैनिकों के चयन के लिए काम आते है। ये परीक्षण मनोवैज्ञार्निक स्तर पर बनार्ये जार्ते है। युद्ध के दौरार्न कर्इ सैनिक मार्नसिक रोगों के शिकार हो जार्ते है। युद्ध की स्थितियों से मनोबल एवं मनोस्थितियों में बदलार्व आ जार्तार् है और सैनिक युद्ध से भार्ग सकतार् है। अत: सैनिकों क मनोबल बनार्ये रखने व मार्नसिक द्वन्द्वों की तुरंत चिकित्सार् करने के लिए मनोवैज्ञार्निकों एवं मनोचिकित्सकों की सहार्यतार् ली जार्ती है।

9. रार्जनीतिक क्षेत्र

रार्जनीतिक क्षेत्र में, चार्हे रार्ज्य यार् देश तार्नार्शार्ही हो, सार्मन्तशार्ही हो यार् जनतंत्रार्त्मक हो, मनोविज्ञार्न क व्यार्पक रूप से प्रयोग होतार् है। शार्सक को सफल होने के लिए शार्सकों के मनोविज्ञार्न को अच्छी तरह से जार्ननार् जरूरी है। अच्छार् शार्सक अपनी प्रजार् क मनोविज्ञार्न जार्नकर उसके अनुसार्र क्रियार् करतार् है। कानून बनार्ने के बार्द शार्सन की समस्यार् हल नहीं हो जार्ती क्योंकि जनतार् में कानून को मार्नने और तोड़ने दोनों तरह की प्रवृत्तियार्ं पार्यी जार्ती है। कानून क पार्लन करार्ने के लिए शार्सक को जनतार् से मनोवैज्ञार्निक ढंग से व्यवहार्र करने की आवश्यकतार् होती है। इसी तरह कानून बनार्ने में भी इस बार्त के मनोवैज्ञार्निक अध्ययन की आवश्यकतार् है कि उस कानून से प्रभार्वित होने वार्ले लोगों पर क्यार् प्रभार्व पड़ेगार् तथार् उनकी क्यार् प्रतिक्रियार् होगी? रार्जनीति क एक महत्वपूर्ण पहलू चुनार्व भी है और चुनार्व में प्रचार्र क बड़ार् महत्व है। मनोवैज्ञार्निक ढंग से कियार् गयार् चुनार्व प्रचार्र व्यक्ति को अपने उद्देश्य में सफलतार् दे सकतार् है। चतुर लोग मनोवैज्ञार्निक प्रचार्रों से मतदार्तार्ओं क रुख ऐन वक्त पर पलट देते है और हार्री हुर्इ बार्जी को जीत लेते है। कुछ लोग चुनार्व के समय लोगों की भार्वनार्एं जार्नकर, उनकी भार्वनार्ओं को मनोवैज्ञार्निक ढंग से भुनार्कर चुनार्व जीत जार्ते है। चुनार्व के समय विशेष क्षेत्र के मतदार्तार् क्यार् चार्हते है? उनकी मार्नसिक दशार्एं कैसी है? इस ज्ञार्न के आधार्र पर ही चुनार्व प्रचार्र कियार् जार्तार् है। 

रार्जनैतिक प्रशार्सन में भी मनोविज्ञार्न क बहुत महत्व है। रार्जनैतिक पाटियों क मनोबल गिरार्ने यार् बढ़ार्ने में भी मनोविज्ञार्न की अहम भूमिक रहती है। उपद्रवों यार् दंगार् करने वार्ली भीड़ को शार्न्त करनार् हर अधिकारी के लिए सम्भव नहीं है। ऐसार् तो वहीं कर सकतार् है जो भीड़ मनोविज्ञार्न को अच्छी तरह जार्नतार् हो। रार्जनेतार् अपनी रार्जनीति में तभी सफल हो सकतार् है जब उसे अपने दल के कार्यकर्त्तार्ओं के मनोविज्ञार्न क ज्ञार्न हो, सार्थ ही सार्थ दूसरे दलों के मनोविज्ञार्न क भी।

10. विश्व शार्न्ति 

विश्व शार्न्ति को बनार्ये रखने के लिए मनोविज्ञार्न की भूमिक अहम् है। व्यक्तिगत विभिéतार्ओं के कारण समझ लेने पर विभिन्न रार्ष्ट्रों के लोगों में आपसी मतभेद कम हो जार्ते है। लोगों के व्यक्तित्व के विधेयार्त्मक गुणों को बढ़ार्कर तथार् हिंसार्त्मक एवं आक्रार्मक प्रवृत्तियों को ज्ञार्न से अहार्निकारक तरीकों जैसे खेलों की प्रतियोगितार्ओं आदि के द्वार्रार् निकालकर विश्व में हिंसार् और संघर्ष कम किये जार् सकते है। अशार्न्ति और संघर्ष के मनोवैज्ञार्निक कारणों पर दृष्टि रखकर उनके प्रकट होने से पहले ही उन्हें खत्म कियार् जार् सकतार् है। विभिन्न जार्तियों एवं प्रजार्तियों तथार् सम्प्रदार्यों की प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति पर नजर रखी जार् सकती है और उनको आपसी संघर्ष से बचार्यार् जार् सकतार् है। विश्व शार्न्ति की समस्यार्एं मार्नव सम्बन्धों से जुड़ी हुर्इ है। अत: मार्नव मनोविज्ञार्न के ज्ञार्न से विश्व में शार्न्ति बनाइ रखी जार् सकती है।

11. यौन शिक्षार् 

यौन-क्रियार् सभी प्रार्णियों में एक आवश्यक शार्रीरिक यार् जैविक प्रेरणार् है। सभी प्रार्णी प्रजनन से अपनार् वंश बढ़ार्ते है। परन्तु जब मनुष्य में यौन-क्रियार् समय से पूर्व शुरू हो जार्ए और अनैतिक आचरण के लक्षणों के रूप में प्रकट होने लगे तो यह एक व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सार्मार्जिक समस्यार् भी बन जार्ती है। जब व्यक्ति असार्मार्न्य यौन व्यवहार्र करने लगतार् है तथार् असार्मार्न्य सार्धनों से अपनी काम पूर्ति करतार् है तो यह अनैतिक आचरण यार् चरित्र विकृति कहलार्ती है।

वर्तमार्न समय में पार्श्चार्त्य यौन स्वच्छन्दतार् क पूरे विश्व के लोगों पर दुष्प्रभार्व पड़तार् जार् रहार् है। अवयस्क व्यक्ति भी इस समस्यार् की चपेट में आते है और समय से पूर्व वयस्क बन जार्ते है। टी.वी. मीडियार् एवं अन्य कुछ मीडियार् इस समस्यार् के प्रचार्रक है। यौन स्वच्छन्दतार् के कारण व्यक्तियों में चरित्र विकृतियार्ं उत्पन्न होती जार् रही है। बलार्त्कार एवं अन्य यौन विकृतियार्ं भी इसके कारण है। दूसरी ओर इन विकृतियों के बढ़ने से व्यक्तियों में आपरार्धिक भार्वनार् भी पैदार् होती है और वे मनोलैंगिक समस्यार्ओं के शिकार हो जार्ते है। सम्भोग क सही अर्थ न समझनार्, मनोनपुंसकतार् क भय पैदार् हो जार्नार् आदि अनेक यौन समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न एक महत्त्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है।

व्यार्वहार्रिक मनोविज्ञार्न की यौन-शिक्षार् शार्खार् उपरोक्त प्रकार के चरित्र विकृतियों में सुधार्र लार्ने एवं उन्हें ठीक करने के लिए उपार्य सुझार्ती है। मनो-ल®गिक विकृतियों की भी मनोविश्लेषण एवं अन्य मनो-चिकित्सार् द्वार्रार् चिकित्सार् की जार्ती है। अवयस्क व्यक्तियों को यौन शिक्षार् देकर यौन क सही अर्थ समझार्यार् जार्तार् है और उनकी यौन समस्यार्ओं क समार्धार्न कियार् जार्तार् है। यौनार्चार्रण के लिए उन्हें सही समय और व्यवहार्र की जार्नकारी दी जार्ती है।

12. क्रीड़ार् यार् खेल क्षेत्र

खेल यार् क्रीड़ार् जगत् में भी मनोविज्ञार्न क पर्यार्प्त उपयोग होतार् है। खिलार्ड़ियों के चयन के लिए ही मनोविज्ञार्न के परीक्षणों क उपयोग होतार् है। खेलकूद प्रतियोगितार्ओं में खिलार्ड़ियों क मनोबल और उत्सार्ह बढ़ार्ने के लिए भी मनोविज्ञार्न क बहुत उपयोग होतार् है। यदि खिलार्ड़ी किसी कारणवश हतोत्सार्हित हो जार्ए तो ऐसी स्थिति में मनोविज्ञार्न उसकी पूरी सहार्यतार् करतार् है। खिलार्ड़ियों के मार्नसिक स्तर को सही बनार्ए रखने के लिए मनोविज्ञार्न क पर्यार्प्त उपयोग कियार् जार्तार् है। खेल यार् प्रतियोगितार् के समय खिलार्ड़ियों में चिन्तार्एं, नैरार्श्यतार् एवं कुंठार्एं उत्पन्न हो सकती है तथार् उनमें प्रतियोगितार् क एक दबार्व बनार् रहतार् है। ऐसी स्थितियों में मनोवैज्ञार्निक उनकी समस्यार्ओं क निदार्न कर उचित उपार्य यार् परार्मर्श सुझार्ते है जिससे कि खिलार्ड़ियों क मनोबल ऊंचार् बनार् रहे। उनकी चिंतार्एं, कुंठार्एं तथार् नैरार्श्यतार् में कमी लार्यी जार् सके। जिससे उनके खेल क प्रदर्शन बेहतर प्रतियोगितार्ओं में मनोवैज्ञार्निक खिलार्ड़ियों के लिए बार्हरी वार्तार्वरण को उनके पक्ष में बनार्ने के लिए भी प्रयत्न करते है। दर्शकों में कुछ ऐसे दर्शक बिठार् दिए जार्ते है जो निरन्तर खेलने वार्ले खिलार्ड़ियों क मनोबल बढ़ार्ने के लिए दीर्घार् से सकारार्त्मक टिप्पणी करके प्रोत्सार्हित करते रहते है। इसी तरह विरोधी टीम क मनोबल कम करने के लिए दीर्घार् में दर्शक बिठार् दिए जार्ते है। ये सब मनोवैज्ञार्निक स्तर पर होते है। खिलार्ड़ियों क मार्नसिक स्वार्स्थ्य बनार्ए रखने के लिए भी मनोविज्ञार्न पूरी तरह से उपयोगी होतार् है। नये खिलार्ड़ियों को विभिन्न क्रिड़ार्ओं के लिए मनोवैज्ञार्निक ढ़गं से प्रषिक्षण दियार् जार्तार् है। क्रिड़ार्ओं की बार्रीकियों को भी मनोवैज्ञार्निक ढ़गं से समझार्यार् जार्तार् है।

13. अन्तरिक्ष मनोविज्ञार्न 

अन्तरिक्ष में जार्ने वार्ले व्यक्तियों क सभी प्रकार के मनोवैज्ञार्निक परीक्षण किये जार्तें हैं। प्रगोगषार्लार्ओं में कृतिम अन्तरिक्ष क निर्मार्ण कर उनके व्यवहार्र पर पड.नें वार्ले अन्तरिक्षीय उड.ार्नों के प्रभार्वों क भी मनोवैज्ञार्निक अध्ययन कियार् जार्तार् है।

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