व्यार्वसार्यिक निर्देशन क्यार् है ?

यूरोप तथार् पश्चिम के अन्य देशों में औद्योगिक क्रार्न्ति के कारण भौतिकतार् की लहर समग्र विश्व में दौड़ गयी। अमेरिक जैसे सुविकसित महार्देश ने प्रयोजनवार्दी दर्शन अपनार्यार् जिसके कारण उसके सम्मुख मुख्य समस्यार् रार्ष्ट्र की सम्पत्ति के पूर्ण उपभोग की हुर्इ। किसी भी रार्ष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक है कि उसकी मार्नवीय एवं प्रार्कृतिक पूँजी क पूर्णत: सदुपयोग कियार् जार्य। अत: प्रत्येक बार्लक एवं बार्लिक की बौद्धिक एवं शार्रीरिक शक्ति क अन्वेषण करके इसे उचित दिशार् में ले जार्नार् रार्ष्ट्र क महार्न् दार्यित्व बन जार्तार् है क्योंकि सूझ-बूझ, ज्ञार्न तथार् उचित निर्देशन के अभार्व में बहुधार् व्यक्ति ऐसे व्यवसार्य पकड़ लेतार् है जिसमें न तो वह अपनी सर्वोत्तम शक्ति लगार्कर अधिकतम उत्पार्दन कर पार्तार् है और न अपनार् विकास ही कर पार्तार् है। व्यवसार्य की उत्पार्दकतार् पर इसक प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है। अत: मनुष्य की शार्रीरिक एवं बौद्धिक शक्ति के संरक्षण एवं सदुपयोग के लिये तथार् व्यवसार्यों में अधिकतम उत्पार्दन के लिए व्यार्वसार्यिक निर्देशन आवश्यक है।

जिस प्रकार मार्नव में व्यक्तिगत भिन्नतार् पार्यी जार्ती है और एक व्यक्ति दूसरे से भिन्न होतार् है, उसी प्रकार व्यवसार्यों में भी भिन्नतार् पार्यी जार्ती है। एक व्यवसार्य दूसरे व्यवसार्य से अपनी प्रकृति, मार्ँग और अपेक्षार् में भिन्न होतार् है। इसी मनुष्यगत एवं व्यवसार्यगत भिन्नतार् पर व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आधार्रशिलार् रखी हुर्इ है। वर्तमार्न शतार्ब्दी में मनोविज्ञार्न क सार्हित्य बहुत ही तीव्रगति से समृद्ध हुआ है। मनोविज्ञार्न के प्रार्य: सभी शोधों, प्रयोगों तथार् अनुसंधार्नों क बार्हुल्य हो गयार् है। व्यक्तिगत भेद के सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन इसी युग की देन है। प्रत्येक व्यक्ति बौद्धिक क्षमतार्, रूझार्न, अभिरूचि तथार् अन्य मार्नसिक शक्तियार्ँ लेकर जन्म लेतार् है जो दूसरे व्यक्ति की शक्तियों से भिन्न होती है। यही नहीं, अपनी इस जन्मजार्त पूँजी में परिवर्तन भी प्रत्येक व्यक्ति अपने ढंग से करतार् है। अत: दो व्यक्ति सर्वथार् समार्न नहीं होते। व्यार्वसार्यिक निर्देशन के सम्पूर्ण कार्यक्रम क यही आरम्भ बिन्दू है। निर्देशन के पूर्व सर्वप्रथम व्यक्ति की बुद्धिलब्धि, रूचि, रूझार्न, दृष्टिकोण तथार् उसके सार्मार्न्य व्यक्तित्व क अध्ययन कर लेनार् आवश्यक होतार् है। सार्रार्ंशत: यह जार्न लेनार् होतार् है कि व्यक्ति क्यार् है, उसकी जन्मजार्त शक्तियार्ँ क्यार् हैं, उसके दार्यित्व क्यार् हैं और उसकी पूँजी क्यार् है।

मार्नव के प्रति दाशनिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आ चुक है। अब मनुष्य को कार्य, व्यवसार्य एवं संपत्ति के परिवेश में आंक जार्तार् है। समार्ज उसे उपार्देयतार् की दृश्टि से देखतार् है। उपार्देयतार् विहीन व्यक्ति समार्ज पर बोझ है, परोपजीवी है। व्यवसार्यों के क्षेत्र में अनेक प्रकार के विशिष्टीकरण के कारण समृद्धि आ चुकी है, उनमें भेद-उपभेद हो चुके हैं, और कितने व्यवसार्यों ने तो सर्वथार् नये रूप से जन्म ले लियार् है। अत: उपयुक्त व्यक्ति को उपयुक्त कार्य में लगार्ने के लिए व्यवसार्यों क विषद् अध्ययन वार्ंछित है। मनुष्य एक ऐसार् प्रार्णी है जिसके विषय में कोर्इ पूर्व कथन सरलतार् से नहीं कियार् जार् सकतार्। रूचि, रूझार्न, संवेग, स्थार्यी भार्व आदि उसके व्यक्तित्व के प्रमुख निर्धार्रण तत्व होते हैं। अत: व्यक्ति क सुनियोजित अध्ययन एक कठिन कार्य हो जार्तार् है। मनुष्य के विषय में समुचित जार्नकारी के लिए एक सुव्यवस्थित प्रक्रियार् क अनुसरण आवश्यक है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि व्यक्ति एवं व्यवसार्य निर्देशन रूपी तरार्जू के दो पलड़े हैं जिनमें सार्मंजस्य स्थार्पित करनार् व्यार्वसार्यिक निर्देशक क प्रमुख कार्य है।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन की परिभार्षार्

‘‘व्यार्वसार्यिक निर्देशन के सिद्धार्न्त एवं तकनीक’’ नार्मक पुस्तक के सुप्रसिद्ध लेखक र्इ0 डब्ल्यू0 मार्यर्स ने उक्त पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर व्यार्वसार्यिक निर्देशन के समार्रम्भ क विवरण देते हुए लिखार् है कि ‘निर्देशन’’ शब्द के सार्थ जिनते विश्लेषण जोडे़ गये उनमें सर्वप्रथम ‘व्यार्वसार्यिक’ शब्द ही थार्। 1 मर्इ सन् 1809 र्इ0 को बोस्टन के व्यार्वसार्यिक संस्थार्न के संचार्लक फ्रैंक पासन्स के लेख में ‘‘व्यार्वसार्यिक निर्देशन’’ जैसी युक्ति प्रथम बार्र देखने को मिली। सार्थ ही निर्देशन सम्बन्धी अन्य विचार्र पद्धतियों क विकास भी आरम्भ हो गयार् थार्। फलस्वरूप व्यार्वसार्यिक निर्देशन के अतिरिक्त शैक्षिक निर्देशन, नैतिक निर्देशन तथार् स्वार्स्थ्य-निर्देशन सम्बन्धी विचार्रधार्रार्यें पृथक रूप से प्रयोग में आने लगीं। सन् 1921 र्इ0 में ‘‘नेशनल वोकेशनल गार्इडेंस एसोसिएशन’’ ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन की एक सुव्यवस्थित परिभार्षार् देने क प्रयार्स कियार् जिसे सन् 1924 र्इ0 में संषोधित कर दियार् गयार्। संशोधित परिभार्षार् के अनुसार्र ‘‘किसी भी व्यवसार्य के चयन, प्रशिक्षण, उसमें प्रवेश और विकास के हेतु उपयुक्त परार्मर्श, अनुभव तथार् सूचनार् प्रदार्न करनार् ही व्यार्वसार्यिक निर्देशन है।’’ किन्तु इस परिभार्षार् को यथार्तथ्य स्वीकार नहीं कियार् गयार् और इसमें परिवर्तन किये जार्ते रहे। लगभग पन्द्रह वर्शो के सुविचार्रित प्रयार्स के उपरार्न्त इसी संस्थार्न ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन को पुन: नवीन रूप से परिभार्षित कियार् जिसके अनुसार्र ‘‘व्यार्वसार्यिक निर्देशन किसी भी व्यक्ति को व्यवसार्य चुनने, उसके लिए तैयार्री करने, उसमें प्रवेश करने तथार् दक्षतार् प्रार्प्त करने में सहार्यतार् प्रदार्न करने की प्रक्रियार् है।’’

प्रस्तुत परिभार्षार् के विषय में कुछ बार्तें विचार्रणीय हैं। सर्वप्रथम, यह परिभार्षार् किसी एक व्यक्ति द्वार्रार् नहीं दी गयी है, प्रत्युत् एक संस्थार्न द्वार्रार् धैर्य एवं विवेक से निर्धार्रित की गयी है, अत: अधिक विष्वसनीय है। सार्थ ही यह परिभार्षार् सन् 1924 र्इ0 में दी गयी परिभार्षार् से मूलत: भिन्न भी है।

प्रथम परिभार्षार् में मुख्य बल ‘व्यवसार्य क चुनार्व करने के लिए सूचनार्’, अनुभव तथार् परार्मर्श प्रदार्न करने पर है जिससे स्पष्ट होतार् है कि सम्पूर्ण दार्यित्व व्यार्वसार्यिक निर्देशक पर ही है। प्रत्यार्शी को स्वयं कोर्इ भी उपक्रम करने की आवश्यकतार् नहीं है। इसके प्रतिकूल दूसरी परिभार्षार् क बल व्यार्वसार्यिक निर्देशक की ओर से सहार्यतार् मार्त्र प्रदार्न करने से है तार्कि व्यक्ति स्वयं अपने लिये ‘‘व्यवसार्य चुनने’’ क प्रयार्स कर सकें। इस प्रकार व्यार्वसार्यिक निर्देशन पहली परिभार्षार् में जहार्ँ व्यक्ति को एक तटस्थ प्रतीक्षार्थ्री बनार् देतार् है वही दूसरी परिभार्षार् में उसे सम्पूर्ण प्रक्रियार् में भार्गीदार्र बनार् देतार् है। निर्देशक के इंगित पर प्रत्यार्शी सक्रिय रूप से कर्मशील हो जार्तार् है और अपने को सम्पूर्ण कार्य पद्धति क एक अंग मार्नने लगतार् है। किसी विद्वार्न ने उभय परिभार्षार्ओं के अन्तर को बड़ी ही निपुणतार् से व्यक्त कियार् है। प्रथम परिभार्षार् के अनुसार्र कहार् जार् सकतार् है कि निर्देशक प्रत्यार्शी, को पहले भलीभार्ँति समझतार् है, तत्पष्चार्त् व्यवसार्य में उसे सफल बनार्ने क प्रयार्स करतार् है। अर्थार्त् को व्यवसार्य में लगार्ने और उसे सफल बनार्ने क दार्यित्व निर्देशक उसी प्रकार इस कथन में भी ले लेतार् है जिस प्रकार उसने सन् 1924 र्इ0 की प्रथम परिभार्षार् में ली थी। प्रत्यार्शी को न तो यह चिन्तार् है कि उसकी कार्यक्षमतार्, योग्यतार् और बुद्धि कितनी है, उसक रूझार्न किधर है और न उसे व्यवसार्य ढूँढ़ने, स्वीकारने तथार् उसमें सफलतार् प्रार्प्त करने की ही चिन्तार् है। वह एक निष्क्रिय यंत्र की भार्ँति है, जिसे जहार्ँ भी नियुक्त कर दियार् जार्तार् है, वहार्ँ वह कार्यरत हो जार्तार् है। प्रत्यार्शी सचेष्ट न होकर एक निष्चेष्ट प्रार्णी बन जार्तार् है। परन्तु 1940 र्इ0 की परिभार्षार् के अनुकूल व्यक्त करने पर उपर्युक्त कथन क स्वरूप बदल गयार् जिसमें निर्देशक क दार्यित्व प्रत्यार्शी को इस प्रकार सहार्यतार् प्रदार्न करनार् है कि वह अपनार् आत्म विश्लेषण स्वयं कर सके और व्यवसार्य चुन कर उसमें सफलतार् प्रार्प्त करने क प्रयार्स भी स्वयं ही करे। इस दूसरी परिभार्षार् में निर्देशक प्रत्यार्शी को उन समस्त सार्धनों, तकनीकों तथार् आँकड़ों के संग्रह एंव प्रयोग के लिए प्रेरित करतार् है जिनसे वह आत्म-विवेचन कर सके। वह यह भी समझ सके कि उसकी वार्स्तविक कार्यक्षमतार् कितनी है। तदुपरार्न्त वह उस व्यवसार्य क अध्ययन करे जिसे उसने अपनी जीविक हेतु चुनार् है। निर्देशक क कार्य प्रत्यार्शी को उत्सार्हित करनार्, उसे व्यवसार्य सम्बन्धी सार्मग्री उपलब्ध करार्नार् और अनुपलब्ध सार्मग्री को सुलभ बनार्ने हेतु परार्मर्श देनार् है। इस प्रकार दूसरी परिभार्षार् में प्रत्यार्शी एक कर्मठ एव सचेष्ट व्यक्ति है जो निर्देशक की सहार्यतार् से अपने भार्वी माग क निर्धार्रण स्वयं करतार् है। वह जो भी है, स्व-निर्मित है, परोपजीवी नहीं है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संक्षेप में व्यार्वसार्यिक निर्देशन वह सोपार्न है जिस पर खड़ार् होकर व्यक्ति अपने भविश्य क माग स्वयं ढूँढ़तार् है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन के अध्यार्पक और अध्येतार् मुख्यतयार् द्वितीय परिभार्षार् को मार्न्यतार् देते हैं, किन्तु अन्य विचार्रकों द्वार्रार् भी व्यार्वसार्यिक निर्देशन की परिभार्षार्यें दी गयी हैं जिन पर यहार्ँ विचार्र करनार् असंगत न होगार्। ‘सुपर’ ने अपनी पुस्तक में व्यार्वसार्यिक निर्देशन की परिभार्षार् देते हुए कहार् कि व्यार्वसार्यिक निर्देशन क प्रधार्न लक्ष्य ‘‘व्यक्ति को इस योग्य बनार्नार् है कि वह अपने व्यवसार्य से उचित समार्योजन स्थार्पित कर सके, अपनी शक्ति क प्रभार्वशार्ली ढंग से उपयोग कर सके तथार् उपलब्ध सुविधार्ओं से समार्ज क आर्थिक विकास करने में सक्षम हो सकें।’’ यहार्ँ लेखक ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन क एकांगी दृष्टिकोण लियार् है। व्यक्तिगत भेद तथार् व्यार्वसार्यिक वैशम्य जैसी जटिल समस्यार्ओं पर विचार्र नहीं कियार् गयार्। इससे स्पष्ट होतार् है कि व्यक्तिगत भेद तथार् व्यार्वसार्यिक निर्देशन क कार्य मार्त्र जैसे-तैसे व्यक्ति को किसी कार्य में लगार् देनार् है। जिस प्रकार अर्थशार्स्त्री देश की संपत्ति क पूर्ण उपभोग अपनार् लक्ष्य मार्नतार् है, उसी प्रकार सुपर ने भी मार्नवीय शक्ति क सीधार्-सार्दार् उपयोग ही व्यार्वसार्यिक निर्देशन क लक्ष्य मार्नार् है। इसके प्रतिकूल व्यार्वसार्यिक निर्देशन एक जीवनपर्यन्त चलने वार्ली प्रक्रियार् है जिसक समार्पन व्यवसार्यरत हो जार्ने पर ही नहीं हो जार्तार्।

सन् 1949 र्इ0 में अन्तर्रार्ष्ट्रीय श्रम संगठन ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन की परिभार्षार् प्रस्तुत करने हुए लिखार् है कि ‘व्यार्वसार्यिक निर्देशन किसी व्यक्ति को उसकी व्यवसार्य-चयन सम्बन्धी समस्यार्ओं के समार्धार्न तथार् उसकी समृद्धि हेतु दी गयी सहार्यतार् है जो उसके व्यार्वसार्यिक सुअवसरों सम्बन्धी क्षमतार्ओं को ध्यार्न में रख कर दी जार्ती है।’’ प्रस्तुत परिभार्षार् आधुनिक होते हुए भी उन अनेक प्रमुख गुणों क अपने में समार्वेश नहीं करती जो वस्तुत: व्यार्वसार्यिक निर्देशन में है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन एक जीवन्त प्रक्रियार् है। उसक सम्बन्ध चैतन्य मार्नव से है। जिस प्रकार एक नदी अपनी सहार्यक नदियों से जल लेकर विकसित होती जार्ती है और अन्त तक एक बड़ी नदी बन जार्ती है, उसी प्रकार व्यार्वसार्यिक निर्देशन भी निर्देशक, नियोजन, स्वार्मी तथार् अभिभार्वक के सहयोग से एक पुष्ट, जीवन्त तथार् विशार्ल प्रक्रियार् बन जार्तार् है। संक्षेप में, व्यार्वसार्यिक निर्देशन क प्रष्न उठते ही निर्देशक के सम्मुख एक विशार्ल एवं जटिल प्रक्रियार् खड़ी हो जार्ती है। एक ओर व्यक्ति और दूसरी ओर व्यवसार्य के अध्ययन से ही निर्देशक आगे बढ़तार् है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन क विषद विवेचन करने के उपरार्न्त मार्यर्स ने समार्हार्र रूप में कहार् है कि ‘‘व्यार्वसार्यिक निर्देशन व्यक्ति की जन्मजार्त शक्तियों तथार् विद्यार्लयों में प्रदत्त प्रशिक्षण से अर्जित बहुमुल्य क्षमतार्ओं को संरक्षित रखने क एक मूल प्रयार्स है। इस संरक्षण हेतु वह व्यक्ति को उन सभी सार्धनों से सम्पन्न करतार् है जिनसे वह अपनी तथार् समार्ज की तुश्टि के लिए अपनी उच्चतम शक्तियों क अन्वेषण कर सकें’’।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन व्यक्ति, व्यवसार्य तथार् सेवार्-नियोजन के मध्य उपयुक्त गठबन्धन करार्ने की प्रक्रियार् है जिसमें निर्देशक एक सक्रिय घटक रहतार् है। वह देखतार् है कि व्यक्ति और व्यवसार्य के मध्य सम्बन्ध सुखमय हों और दोनों क समार्योजन संतोषजनक हो।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन वह निर्देशन है जो व्यक्ति को मुख्यत: व्यार्वसार्यिक समस्यार्ओं के सम्बन्ध में दियार् जार्तार् है। व्यक्ति और उसकी समस्यार्ओं को एक-दूसरे से पृथक करनार् सम्भव नहीं। अत: व्यार्वसार्यिक निर्देशन किसी व्यक्ति के शैक्षिक, नैतिक एवं सार्मार्जिक पक्षों को भी पृथक नहीं कर सकतार्। वार्स्तव में व्यार्वसार्यिक निर्देशन की प्रक्रियार् व्यक्तित्व के समन्वित एवं उपयुक्त विकास में सहार्यतार् देती है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन क लक्ष्य किसी व्यक्ति को इस उद्देश्य से सहार्यतार् प्रदार्न करनार् है कि वह अपनार् एक समन्वित एवं सच्चार् चित्र विकसित कर सके और उसे समझ सके, व्यवसार्य जगत के यथाथिक धरार्तल पर अपनी उक्त अवधार्रणार् को परख सके और आत्म संतोष एवं समार्ज के हित में अपनी अवधार्रणार् को वार्स्तविक रूप दे सकें। इस परिभार्षार् क महत्वपूर्ण आधार्र यह है कि व्यार्वसार्यिक निर्देशन व्यक्ति के पूर्ण विकास क अभिन्न अंग है और व्यक्ति क व्यार्वसार्यिक विकास उसके व्यक्तित्व के विकास में सहार्यक होतार् है। इस प्रकार व्यार्वसार्यिक निर्देशन व्यक्ति के विकास और उसके स्व-प्रत्यय (Self-concept) के विकास में सहार्यतार् की प्रक्रियार् है। इससे एक ऐसे व्यार्वसार्यिक स्व-प्रत्यय (Vocational Self-Concept) क विकास होतार् है जो व्यक्ति के स्व-प्रत्यय की व्यवस्थार् के अनुरूप हो। इस प्रत्यय के अधिक से अधिक विकास में सहार्यतार् प्रदार्न करनार् निर्देशन क कार्य है। बौद्धिक तथार् भार्वार्त्मक दृष्टिकोण से व्यार्वसार्यिके अवधार्रणार् को स्वीकार करने में व्यक्ति को सहार्यतार् प्रदार्न करनार् व्यार्वसार्यिक निर्देशन क कार्य है। व्यार्वसार्य क निर्देशन की आधुनिक अवधार्रणार् यही है। ‘‘मागरेट बनेट’’ के अनुसार्र ‘‘मार्नव के विकास तथार् उसके उपजीविकीय जीवन के क्षेत्र में अनुसंधार्नों ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन को समझने की दिषार् में नये क्षितिज खोल दिये है। किसी भी उपजीविक के चयन, उसके प्रवेश तथार् समार्योजन के निमित्त मार्नव व्यक्तित्व सम्बन्धी आवश्यकतार्ओं और व्यवसार्यों की आवश्यकतार्ओं के अध्ययन की पुरार्नी अवधार्रणार् भी अब बदल रही है और व्यार्वसार्यिक निर्देशन एक ऐसे कार्य के रूप में उभर रहार् है जो यह बतार्ये कि व्यक्ति अपने समन्वित व्यक्तित्व को किस प्रकार संवार्रे कि उसे आत्मबोध हो सके और वह समार्ज के कल्यार्ण में सहार्यतार् प्रदार्न कर सके।’’ इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यार्वसार्यिक निर्देशन की धार्रणार् तथार् विधि में क्रमश: परिवर्तन तथार् विकास होतार् रहार् है।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन के क्षेत्र

व्यार्वसार्यिक निर्देशन क क्षेत्र अत्यन्त व्यार्पक है क्योंकि इसके अध्ययन क्षेत्र के अन्तर्गत व्यक्ति और व्यवसार्य प्रमुख रूप से आते हैं। व्यक्ति (मनुष्य) के अध्ययन के सम्बन्ध में मार्नव सम्बन्धी सभी शार्स्त्रों क सम्पर्क व्यार्वसार्यिक निर्देशन से होतार् है। मनुष्य की व्यवसार्य के प्रति विभिन्न रूचियों, दृष्टिकोणों, मनोभार्वों, बुद्धि तथार् योग्यतार् क ज्ञार्न प्रार्प्त करने के लिए व्यार्वसार्यिक निर्देशन मनोविज्ञार्न से सम्पर्क स्थार्पित करतार् है। मनुष्य के मनोभार्व और उसकी जीवन पद्धति क कोर्इ न कोर्इ दाशनिक आधार्र होतार् है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन मनुष्य की प्रकृति, उसक स्वभार्व और व्यक्तित्व पहचार्नने के लिए दर्शनशार्स्त्र क सहार्रार् लेतार् है। दर्शनशार्स्त्र की आधार्रशिलार् पर ही मार्नवीय विज्ञार्नों एवं शार्स्त्रों क प्रार्सार्द खड़ार् है। इसलिए व्यार्वसार्यिक निर्देशन तथार् दर्शनशार्स्त्र क सम्बन्ध घनिष्ठ है। अर्थशार्स्त्र, समार्जशार्स्त्र तथार् शिक्षार् शार्स्त्र जैसे विषय भी व्यार्वसार्यिक निर्देशन के अध्ययन क्षेत्र के अन्तर्गत आते है क्योंकि मार्नव जीवन से इन शार्स्त्रों क निकट क सम्बन्ध है।

जहार्ँ तक व्यवसार्य क प्रश्न है, इसक अध्ययन व्यार्वसार्यिक निर्देशन विज्ञार्न के मार्ध्यम से करतार् है। विभिन्न व्यवसार्यों के विश्लेषण, उनकी अपेक्षार्ओं तथार् मार्ँगों के निरार्करण के लिए वैज्ञार्निक दृष्टिकोण की आवश्यकतार् पड़ती है। इन पार्ठ्यक्रमीय विशयों के अतिरिक्त व्यार्वसार्यिक निर्देशन क सम्बन्ध अनेक पार्ठ्येत्र क्रियार्ओं से भी होतार् है, यथार् पत्रकारितार्, पुस्तकालय, वार्द-विवार्द, चलचित्र आदि। इन सबक उपयोग व्यार्वसार्यिक निर्देशक प्रत्यार्शी को व्यार्वसार्यिक सूचनार् प्रदार्न करने में करतार् है। अत: हम देखते हैं कि व्यार्वसार्यिक निर्देशन क क्षेत्र अत्यन्त व्यार्पक है।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन के उद्देश्य

मूल रूप से व्यार्वसार्यिक निर्देशन क उद्देश्य व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसार्य में लगने के लिए सहार्यतार् प्रदार्न करनार् है। इसी प्रकार किसी व्यवसार्य के लिए उसकी आवश्यकतार्ओं के अनुरूप उपयुक्त व्यक्ति को ढूँढ़नार् भी व्यार्वसार्यिक निर्देशन क कार्य है। किन्तु जोन्स ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन के उद्देश्यों की सूची निम्नलिखित प्रकार से दी है-

  1. विद्याथी को उन व्यवसार्य समूहों की विशेषतार्ओं, कार्यों, कर्तव्यों और पुरस्कारों से अवगत करार्नार् जिनमें से उसे अपने व्यवसार्य क चयन करनार् है।
  2. उसे यह पतार् लगार्ने में सहार्यतार् देनार् कि विचार्रार्धीन व्यवसार्य समूह के लिए किन विशिष्ट योग्यतार्ओं तथार् चार्तुर्यो की आवश्यकतार् है और उक्त व्यवसार्य में प्रवेषाथ कितनी उम्र, कितनी तैयार्री और किस लिंग (पुरुष अथवार् स्त्री) की 
  3. विद्यार्लय के भीतर तथार् बार्हर विद्याथी को ऐसे अनुभव प्रार्प्त करार्नार् जिनसे उसे ऐसी सूचनार् मिले कि किसी व्यवसार्य की क्यार् परिस्थितियार्ँ हैं जिनके योग्य उसे अपने को बनार्नार् है। 
  4. व्यक्ति को ऐसे दृष्टिकोण के विकास में सहार्यतार् प्रदार्न करनार् कि सभी र्इमार्नदार्री क परिश्रम उत्तम है और किसी भी व्यवसार्य के चयन के प्रमुख आधार्र निम्न हैं-
  1.  व्यक्ति समार्ज की क्यार् सेवार् कर सकतार् है ? 
  2.  व्यवसार्य में उसे कितनी संतुष्टि मिलती है ? 
  3. व्यवसार्य के लिए किस प्रकार के दृष्टिकोण की अपेक्षार् होती है ? 
  1. व्यक्ति को व्यार्वसार्यिक सूचनार् के विश्लेषण की विधि से परिचित होने में सहार्यतार् प्रदार्न करनार् तथार् व्यवसार्य के चयन सम्बन्धी अन्तिम निर्णय लेने के पूर्व इन सूचनार्ओं क विश्लेषण करने की आदत क विकास करनार्।
  2. ऐसी सहार्यतार् प्रदार्न करनार् कि व्यक्ति अपनी विशिष्ट तथार् व्यार्पक योग्यतार्ओं, रूचियों तथार् क्षमतार्ओं के विषय में अपेक्षित जार्नकारी प्रार्प्त कर सकें। 
  3. आर्थिक दृष्टि से पिछड़े बार्लकों को विभिन्न प्रकार की आर्थिक सहार्यतार् प्रदार्न करनार् जिससे वे अपनी व्यार्वसार्यिक योजनार्ओं के अनुसार्र शिक्षार् प्रार्प्त कर सकें। 
  4. विभिन्न शैक्षिक संस्थार्ओं द्वार्रार् प्रदत्त व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण के निमित्त अपेक्षित धन के विषय में जार्नकारी प्रार्प्त करने में सहार्यतार् प्रदार्न करनार्। 
  5. जिस व्यवसार्य में व्यक्ति लगार् है उससे समार्योजन स्थार्पित करने, उसी व्यवसार्य तथार् अन्य व्यवसार्यों में लगे अन्य कार्यकर्तार्ओं से सम्बन्ध स्थार्पित करने में सहार्यतार् प्रदार्न करनार्। 
  6. विद्याथियों को इस विषय में विष्वसनीय सूचनार्एँ प्रदार्न करनार् कि अपने भार्ग्य जार्नने तथार् सुधार्रने की विभिन्न अवैज्ञार्निक विधियार्ँ, जैसे हस्तरेखार् विज्ञार्न आदि कितनी अनुपयुक्त है तथार् उनकी अपेक्षार् विषेशज्ञों से परार्मर्श करके वैज्ञार्निक विधियों क अनुसरण कितनार् लार्भकर है।

क्रो0 तथार् क्रो0 ने अपनी पुस्तक में व्यार्वसार्यिक निर्देशन के निम्न उद्देश्यों क उल्लेख कियार् है- 

  1. विद्याथी जिन व्यवसार्यों क चयन कर सकते हैं, उनके कार्य, कर्त्तव्य तथार् उत्तरदार्यित्वों से अवगत करार्नार्।
  2. स्वयं अपनी योग्यतार्ओं आदि क पतार् लगार्ने में विद्याथी की सहार्यतार् करनार् तथार् विचार्रार्धीन व्यवसार्य से उनक सार्मन्जस्य स्थार्पित करनार्। 
  3. स्वयं अपने तथार् समार्ज के हित की दृष्टि  से विद्याथी की योग्यतार् तथार् रूचियों क मूल्यार्ंकन करनार्।
  4. कार्य के प्रति ऐसे दृष्टिकोण के विकास में विद्याथी की सहार्यतार् करनार् कि वह जिस प्रकार के भी व्यवसार्य में प्रवेश लेनार् चार्हे, उसक मार्न बढ़ार्ए।
  5.  विद्यार्लय शिक्षण के विभिन्न क्षेत्रों में इस बार्त क अवसर प्रदार्न करनार् कि विद्याथी को विभिन्न प्रकार के कार्यों क अनुभव प्रार्प्त हो सकें। 
  6. विद्याथी को आलोचनार्त्मक दृष्टि से विभिन्न प्रकार के व्यवसार्य पर विचार्र करने में सहार्यतार् प्रदार्न करनार् और प्रार्प्त व्यार्वसार्यिक सूचनार्ओं के विष्लेशण की विधि सिखार्नार्।
  7. मार्नसिक, शार्रीरिक तथार् आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए व्यक्तियों की सहार्यतार् प्रदार्न करनार् जो उनके तथार् समार्ज के हित में सर्वोत्तम समार्योजन स्थार्पित करने में सहार्यतार् दे। 
  8. विद्याथियों में शिक्षकों तथार् अन्य निर्देशन कार्यकर्तार्ओं के प्रति विश्वार्स उत्पन्न करनार् जिससे वे उनसे अपनी समस्यार्ओं पर विचार्र विमर्श करने में उत्सार्हित हों। 
  9. विभिन्न शैक्षिक संस्थार्ओं द्वार्रार् जो व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण दियार् जार्तार् है उसके विषय में आवश्यक सूचनार्यें प्रार्प्त करने में विद्याथी की सहार्यतार् करनार्।
  10. उच्चतर शिक्षण संस्थार्ओं में प्रवेश की शर्तों, प्रशिक्षण की अवधि तथार् व्यय आदि के विषय में सूचनार्यें प्रदार्न करनार्।
  11. विद्यार्लय शिक्षण की अवधि में ऐसी सहार्यतार् देनार् कि व्यक्ति आगे चलकर अपने कार्य की परिस्थितियों तथार् अन्य कार्यकर्तार्ओं से समार्योजन स्थार्पित कर सके।
  12. विद्याथी की सहार्यतार् करनार् कि वह कार्यकर्तार्ओं के मध्य अपनार् स्थार्न बनार् सकें। 
  13. कार्य में दक्षतार् प्रार्प्त करने के लिए दीर्घकालीन प्रशिक्षण की आवश्यकतार् के प्रति विद्याथी को सचेष्ट करनार्। 
  14. प्रत्येक विद्याथी को व्यार्वसार्यिक दक्षतार् प्रार्प्त करने की अवैज्ञार्निक विधियों से सार्वधार्न करनार्।
  15. यह अनुभव करने में शिक्षार्थ्री को सहार्यतार् प्रदार्न करनार् कि प्रयत्न द्वार्रार् ही सफलतार् प्रार्प्त हो सकती है और अपनार् कार्य योग्यतार् एवं र्इमार्नदार्री से करने में ही संतोष मिलतार् है।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार्

व्यार्वसार्यिक निर्देशन के संघटन एवं संचार्लन क मूल आधार्र व्यक्ति तथार् व्यवसार्य के मध्य चलने वार्ली विषमतार् है। यदि सभी व्यक्ति अभिरूचि बुद्धि, व्यक्तित्व, प्रतिभार् तथार् क्षमतार् में समार्न होते तो यह समस्यार् नार् उठती। इसके प्रतिकूल यदि सभी व्यवसार्य अपनी मार्ँग, कार्य पद्धति उपार्देयतार् में समार्न होते तो भी व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् नार् होती। व्यक्ति के अनुरूप व्यवसार्य और व्यवसार्य के अनुरूप व्यक्ति निश्चित करने की आवश्यकतार् है। व्यक्ति एवं समार्ज की आवश्यकतार्एँ प्रतिदिन नवीन होती जार् रही है। आज हमार्री आवश्यकतार्एँ सभी सीमार्ओं को लार्ंघ चुकी है। समार्ज क जीवन आज विभिन्नतार् से परिपूर्ण है। इसके लिए प्रशिक्षित व्यक्तियों की मार्ँग है। जिसमें अपेक्षित प्रतिभार्, क्षमतार् एवं बुद्धि हो। यह व्यवसार्यिक निर्देशन से सम्भव है। व्यवसार्यों की आवश्यकतार् ने विभिन्नतार् को जन्म दियार् है। यह व्यक्ति क्रम, व्यवसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् को जन्म देतार् है। जिसके कारण है-

  1. मार्नव की मूलभूत आवश्यकतार् –सर आर्थर जोन्स ने अपनी पुस्तक में एक उदार्हरण देते हुए एक संकेत दियार् कि सुअवसर एवं उचित निर्देशन नार् मिलने के कारण मिल्टन और क्रार्मवेल गॉव में लुप्त हो गये। इस वार्क्य से ही स्पष्ट है कि निर्देशन की आधार्रशिलार् मार्नव शक्ति एवं मार्नव जीवन के संरक्षण पर निहित है। और इसकी आवश्यकतार् ही इसक प्रमुख आधार्र है।
  2. परिवार्र की परिवर्तनशील संरचनार् –परिवार्र समार्ज क लघु रूप है। परिवर्तित समय के सार्थ शार्सन और परिवार्र की प्रकृति एवं आकार बदलतार् चलार् गयार्। आज से पहले विभिन्न व्यवसार्यों क प्रशिक्षण अनार्यार्स ही प्रार्प्त हो जार्तार् थार् किन्तु अब व्यवसार्यों की अधिकतार् ने प्रशिक्षण को भी प्रार्प्त करनार् आसार्न नही रखार्। अब शिक्षार् के प्रचार्र-प्रसार्र ने अच्छार् जीवन स्तर प्रार्प्त करनार् एवं क्षमतार् और रूचि के अनुसार्र व्यवसार्य प्रार्प्त करने के रूझार्न को बढ़ार्वार् दियार् है। इससे उचित निर्देशन की आवश्यकतार् बढ़ी।
  3. उद्योग की परिस्थितियों में परिवर्र्तन –स्वतत्रंतार् प्रार्प्ति के पश्चार्त्‌ हमार्रे देश में औद्योगिक विकास बहुत ही तेजी से हुआ। अन्तर्रार्ष्ट्रीय क्षेत्र में हमार्रार् देश भी अपनी पहुच बनार्ने के लिए विशिष्ट वस्तुओं के उत्पार्दन में रूचि दिखार् रहार् है। और इस प्रकार की प्रकृति ने श्रम में विशिष्ट प्रशिक्षण एवं दक्षतार् को अनिवाय बनार् दियार् है। विशिष्ट क्षमतार्, बुद्धि, धार्रणार् एवं रूचि के व्यक्ति के खोज के लिए निर्देशन सेवार् की आवश्यकतार् है।
  4. जनसंख्यार् में वृद्धि –जनसख्ंयार् वृद्धि ने विश्व के परिस्थितियों को विस्फार्टे क बनार् दियार्। पहले जीवन बहुत की सरल-सहज, सार्दार् एवं सीमित आवश्यकतार्ओं वार्लार् थार्। अब जनसंख्यार् वृद्धि के सार्थ लोगों को मूलभूत आवश्यकतार्एॅ भी पूरी करने के लिए भी संघर्श करनार् पड़तार् है। जिससे उसक पूरार् जीवन संघर्शमय एवं भटकाव के सार्थ व्यतीत होने की सम्भार्वनार् रहती है। इससे आवश्यक निर्देशन की मॉग बढ़ी।
  5. शिक्षार् की मॉग में वृद्धि –स्वतत्रं तार् प्रार्प्ति के पश्चार्त्‌ सम्पूर्ण सार्क्षरतार्, सबके लिए शिक्षार् एवं शिक्षार् सावजनिकरण एवं सभी स्तरों पर शिक्षार् को सर्वसुलभ बनार्ये जार्ने से शिक्षित लोगों के समूह में वृद्धि हुयी है और उन्हे आवश्यक व्यवसार्य प्रदार्न करनार् व्यवसार्यिक शिक्षार् क प्रमुख उद्देष्य बन गयार्।
  6. जन्म-मृत्यु संख्यार् में परिवर्तन –पूरे विश्व मे वैज्ञार्निक खोजों ने मार्नव जीवन को सुविधार् को परिपूर्ण कर दियार् इससे मृत्यु संख्यार् घटी और जीवन आयु बढ़ी है इससे जनसंख्यार् में बेतहार्शार् वृद्धि हुर्इ है। जनसंख्यार् वृद्धि ने व्यवसार्यिक खोजने और चार्हने वार्ले व्यक्तियों की संख्यार् बढ़ार् दी हैं। उनकी आवश्यकतार्ओं की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष पूर्ति नए व्यवसार्यों क जन्म होनार् भी सम्भव हो रहार् है। इससे व्यवसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् बढ़ती जार् रही हैं।
  7. धामिक तथार् नैतिक आदर्शों में परिवर्तन –हमार्रे देश की अनेक रूढ़िगत मार्न्यतार्यें थीं जिनक अब धीरे-धीरे विघटन हो रहार् है। उदार्हरण के लिए किसी उच्च जार्ति अथवार् वर्ग क व्यक्ति दर्जीगिरी अथवार् जूते क व्यार्पार्र नहीं करतार् थार्। ब्रार्ह्मण क्षत्रिय एवं कायस्थ हल ग्रहण नहीं करते थे, अत: कुछ ऐसे व्यवसार्य थे जिन पर समार्ज के किसी विशिष्ट वर्ग क ही दबार्व रहार् करतार् थार्। किन्तु अब इन धार्रणार्ओं तथार् पूर्वार्ग्रहों में शिथिलतार् आती जार् रही है। अत: निर्देशन की आवश्यकतार् भी बढ़ती जार् रही है।
  8. परिवर्तित शिक्षार् दर्शन –शिक्षार् दर्शन मे भी उत्तरोत्तर परिवर्तन होतार् जार् रहार् है। हमार्रे देश की शिक्षार् तथार् जीवन-दर्शन क आधार्र आदर्शवार्दी थार्। धर्म तथार् नैतिकतार् ही इस देश की संस्कृति के प्रार्ण हैं। किन्तु पार्श्चार्त्य देशों के प्रयोजनवार्दी दर्शन तथार् वर्तमार्न सार्मार्जिक परिस्थितियों के कारण भौतिकवार्दी दर्शन हमार्री शिक्षार् तथार् जीवनषैली में शनै:- शनै: प्रवेश करते जार् रहे हैं। अत: इस प्रकार व्यवसार्य तथार् जीविकोपाजन क भी महत्व बढ़तार् जार् रहार् है।
  9. अवकाश क सदुपयोग –वैसे तो अन्य देशों मे भी यह समस्यार् है कि अवकाश क सदुपयोग कैसे कियार् जार्ये। छार्त्र जीवन के अतिरिक्त भी उद्योग धन्धों में, कृशि में, सेवार्ओं में, सर्वत्र अवकाश की समस्यार् आ खड़ी होती है। हमार्रे देश में इसक विशेष महत्व है। हमार्रे देश के जलवार्यु में बहुत अधिक विविधतार् है जिसक प्रभार्व जीवन शैली एवं शरीर तथार् मन पर भी पड़तार् है। अवकाश के समय में भी उपयोगी कार्य किये जार् सके इसके लिए व्यवसार्यिक निर्देशन की नितार्न्त आवश्यकतार् प्रतीत होती है। कुछ विद्वार्न व्यसवसार्यिक निर्देशन की बढ़ती हुर्इ आवश्यकतार् के लिए इन घटकों को उत्तरदार्यी मार्नते हैं-
    1. समार्ज की परिवर्तनशील संरचनार् –समार्जवार्दी समार्ज के गठन की आरे हमार्रार् देश धीरे-धीरे बढ़ रहार् है। धनी और निर्धन के बीच की खाइ पटती जार् रही हैं समार्ज क वह वर्ग जो कुछ दशकों पूर्व अपने को शार्सक मार्नतार् थार् और किसी भी प्रकार क व्यवसार्य अपनार्नार् यार् नौकरी करनार् हेय मार्नतार् थार्, वह भी अब व्यवसार्य के क्षेत्र में उतर रहार् है। इसी प्रकार सवर्णेतर जार्तियों के लोग जो किसी विशेष प्रकार के व्यवसार्य अथवार् नौकरियॉ करते थे, अब सभी व्यवसार्यों की ओर बढ़ रहे हैं। अत: व्यार्वसार्यिक निर्देशन के सम्मुख एक नयी चुनौती आ रही है।
    2. रार्जनीतिक परिवर्तन-स्वतत्रं तार् प्रार्प्ति के उपरार्न्त देश में समार्जवार्द लार्ने के लिए रार्जनीतिक दल सार्मने आये जो पूजीवार्द तथार् वर्गवार्द के भी समर्थक थे। परन्तु धीरे-धीरे जन-चेतनार् जार्ग्रत हुर्इ और सभी रार्जनीतिक दलों तथार् वर्गवार्द के भी समर्थक थे। परन्तु धीरे-धीरे जन-चेतनार् जार्ग्रत हुर्इ और सभी रार्जनीतिक दलों ने यह अनुभव कियार् कि देश के लिए समार्जवार्दी व्यवस्थार् ही एक उपयुक्त व्यवस्थार् है। सम्प्रति देश में जो महार्निर्वार्चन हो रहे हैं, उस सम्बन्ध में विभिन्न रार्जनीतिक दलों ने अपने जो कार्यक्रम प्रकाशित किये है; उन सभी में श्रमिकों, मजदूरों, कर्मचार्रियों तथार् किसार्नों के कल्यार्ण की बार्त जोरदार्र शब्दों में कही गयी है। अत: स्पष्ट है कि व्यार्वसार्यिक निर्देशन क आयार्म उत्तरोत्तर बढ़ रहार् है।
    3. नगरीकरण –नगरीकरण की भी समस्यार् देश के सम्मुख उपस्थित हार् े रही है। शिक्षित समुदार्य गॉव छोड़कर नगरों की ओर खिसक रहार् है। परिणार्मस्वरूप व्यवसार्यों पर बोझ बढ़ रहार् है। इसके समार्धार्न के लिए नये व्यवसार्यों क जन्म हो रहार् है तथार् नगरों में बसने वार्ले व्यक्तियों के लिए नये व्यवसार्य उपलब्ध करार्ने की भी समस्यार् हो रही है।
    4. पार्श्चार्त्य देशों क प्रभार्व –हमार्रे देश की जीवन पद्धति पर पार्श्चार्त्य देशों क जो पदाथवार्दी तथार् भौतिकवार्दी प्रभार्व पड़ार् है उसकी चर्चार् इसके पूर्व की जार् चुकी है।
    5. विज्ञार्न तथार् मार्नव –शार्स्त्रों क विकास-नित्य नये आविश्कार तथार् खोज विज्ञार्न एवं मार्नव शार्स्त्रों को अधिक समृद्ध बनार् रहे हैं। विज्ञार्न के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यार्त्रार् जैसे अनेक नवीन विज्ञार्नों क उदय अत्यन्त आधुनिक है। इसी प्रकार मार्नवषार्स्त्रों के क्षेत्र में ऐसे विचार्र सार्मने आ रहे हें जिनक नार्म भी वर्तमार्न शतार्ब्दी के आरम्भ में किसी ने नहीं सुनार् थार्। अत: नवीन शार्स्त्रों तथार् विज्ञार्नों के उदय से व्यार्वसार्यिक निर्देशन की सम्भार्वनार्ओं में भी वृद्धि हो गयी है।
    6. विशिष्टीकरण पर बल –सभ्यतार् के विकास तथार् आविश्कारों के फलस्वरूप व्यवसार्यों के विशिष्टिकरण को बल मिल रहार् है। समार्ज व्यवसार्यों के स्थूल रूप से ही अब संतुश्ट नहीं है, वरन् वह उनके सूक्ष्म विवेचन में लगार् है। किसी भी व्यवसार्य के विशिष्ट पहलू पर शोध हो रहे हैं और फलस्वरूप नयी दिषार्यें सार्मने आ रही हैं। अत: विशिष्टिकरण के लिए विशेष प्रकार की प्रतिभार्ओं को खोजने की समस्यार् है। प्रतिभार्वार्न व्यक्तियों को उनकी रूचि तथार् योग्यतार् के अनुरूप व्यवसार्य खोजने की भी समस्यार् है। जोन्स ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् के संदर्भ में  घटकों की चर्चार् की है-
      1. व्यवसार्यों में विभिन्नतार् –व्यवसार्यो मे भिन्नतार् की चर्चार् हम कर चुके है। पहले की अपेक्षार् अब व्यवसार्यों की संख्यार् बहुत बढ़ गयी है। अत: युवकों को इन नवीन व्यवसार्यों से परिचित करार्ने तथार् नये व्यवसार्यों के लिए अच्छे कर्मचार्री खोजने के लिए व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् है।
      2. छार्त्रों के जीवन में स्थिरतार् क प्रश्न-वर्तमार्न शिक्षार्, जिसक सम्बन्ध यथाथ जीवन से नहीं हैं विद्यार्थ्री को निरार्धार्र समार्ज में खड़ार् कर देती है। अज्ञार्त वार्तार्वरण में समार्योजन ढूढ़नार् उसके लिए समस्यार् बन जार्ती है। अत: यह आवश्यक है कि विद्याथियों को छार्त्र-जीवन में ही व्यवसार्य जगत क पर्यार्प्त ज्ञार्न करार् दियार् जार्य तार्कि विद्यार्थ्री-जीवन समार्प्त होने के उपरार्न्त उनके जीवन में स्थिरतार् आ सके।
      3. व्यक्तिगत भिन्नतार्ए –व्यवसार्यगत भिन्नतार्ओं के समार्न ही व्यक्ति में भी भिन्नतार्यें पार्यी जार्ती हैं। प्रत्येक व्यक्ति कार्य नहीं कर सकतार्। इसी प्रकार प्रत्येक कार्य के लिए प्रत्येक व्यक्ति भी योग्य नहीं होतार्। अत: प्रत्येक व्यक्ति को उसके योग्य कार्य क ज्ञार्न देने की आवश्यकतार् हैं।
      4. आर्थिक दृष्टिकोण –उचित निर्देशन के अभार्व में आज क शिक्षित युवक जो भी व्यवसार्य पार्तार् है, उसी में लग जार्तार् है। इसके लिए उसकी आर्थिक परिस्थिति तथार् बेकारी की समस्यार् उत्तरदार्यी होती और जिसमें वह मन लगार्कर काम नहीं कर पार्तार्। अत: शिक्षितों के लिए उचित व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् हैं।
      5. स्वार्स्थ्य क दृष्टिकोण –स्वार्स्थ्य की दृष्टि से भी व्यार्वसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् होती है। अरूचिकर व्यवसार्य क श्रमिक के स्वार्स्थ्य पर बुरार् प्रभार्व पड़तार् है। वह बिनार् उत्सार्ह के कार्य करतार् है और अपने जीवन में नीरसतार् क अनुभव करतार् है। यदि व्यवसार्य रूचिकर है तो श्रमिक प्रसन्नतार् और सन्तोश क अनुभव करतार् है जो उसके स्वार्स्थ्य के लिये सुखकर होतार् है।
      6. व्यक्तित्व क दमन –अरूचिकर तथार् उपयुक्त व्यवसार्य में लग जार्ने पर व्यक्ति को आर्थिक हार्नि तो होती ही है, सार्थ ही उसके व्यक्तित्व क भी ह्यस होने लगतार् है। उसमें एक प्रकार की हीन-भार्वनार् समार् जार्ती है और वह जीवन से धीरे-धीरे अन्यमनस्क होने लगतार् हैं व्यवसार्य निर्देशन से ही व्यक्ति को उसके रूचि के अनुकूल व्यवसार्य में डार्लार् जार् सकतार् है।
      7. व्यार्वसार्यिक निर्देशन के व्यक्तिगत तथार् सार्मार्जिक मूल्य –उपयुक्त व्यवसार्य वही है जहार् कर्मचार्री अधिकतम सन्तोश, सुख, उत्सार्ह तथार् आषार् क अनुभव करतार् है। ऐसे व्यवसार्य म ही उसके व्यक्तित्व क विकास सम्भव है। मनुष्य क सार्मार्जिक इकार्इ के रूप में मूल्य तभी है जब वह अधिकतम सार्मार्जिक कल्यार्ण करतार् है। वह हितैशी तभी मार्नार् जार् सकतार् है जब वह संसार्र क अधिकतम भलार् कर सके। कोर्इ भी व्यक्ति जीविक जगत से बार्हर रहकर यह कार्य नहीं कर सकतार् और जीविक में उसकी सफलतार् तभी सम्भव है जब जीविक व्यक्ति के उपयुक्त हो। जब मनुष्य उपयुक्त कल्यार्णकारी कार्यो को सफलतार्पूर्वक करतार् है तो यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि वह उपयुक्त व्यवसार्य में नियुक्त है। यदि ऐसार् नहीं है तो उसे व्यवसार्य निर्देशन की आवश्यकतार् है।
      8. मार्नव शक्ति क उपयुक्त उपयोग –मार्नव की छिपी हुर्इ क्षमतार्ओं को व्यवसार्य के मार्ध्यम से व्यक्त कियार् जार् सकतार् है। प्रसिद्ध किव ग्रे के शब्दों में अवसर न मिलने के अभार्व में अनेक विभूतियॉ नष्ट हो गयी। उचित निर्देशन के मार्ध्यम से व्यक्ति की प्रच्छत्र शक्तियों को सुविकसित कियार् जार् सकतार् है।
      9. परिवर्तन परिस्थितियॉ –सार्मार्जिक तथार् आर्थिक परिस्थितियों के नित्यश: परिवर्तित होने के कारण व्यार्वसार्यिक-निर्देशन की आवश्यकतार् और बढ़ जार्ती है। परिवर्तन के कारण नये व्यवसार्य जन्म लेते है और उनकी मॉगें नयी होती है और इन मॉगों और अपेक्षार्ओं के अनुकूल व्यक्ति खोजने के लिए व्यवसार्यिक निर्देशन की आवश्यकतार् होती है। व्यार्वसार्यिक निर्देशन की व्यार्पकतार् दिन-प्रतिदिन बढ़ती जार् रही है।

व्यार्वसार्यिक निर्देशन देने की विधि 

व्यार्वसार्यिक निर्देशन देते समय निर्देशन को दो तत्व सार्मने रखकर चलनार् पड़तार् है : प्रथम-व्यवसार्य के लिए वार्ंछित योग्यतार्ओं की सूची अर्थार्त् अमुक व्यवसार्य के लिए किस स्तर के स्वार्स्थ्य की जरूरत पड़ती है, कितनी तथार् किस प्रकार की बुद्धि की आवश्यकतार् होती है; किस प्रकार की अन्य क्षमतार्ओं, रूचियों तथार् अभिरूचियों, शिक्षार्, अनुभव आदि की जरूरत होती है; द्वितीयत:-उस व्यक्ति में व्यवसार्य के योग्य कितनी अनुकूलतार् है। जहॉ तक व्यवसार्य के अध्ययन की जरूरत है, इसके लिए पहले से ही एक सूची निर्धार्रित कर दी जार्ती है कि उसके लिए किस स्तर के स्वार्स्थ्य, बुद्धि, अनुभव, शिक्षार् आदि की आवश्यकतार् होती है। प्रत्येक व्यवसार्य के सम्बन्ध में प्रत्येक निर्देशन को इस प्रकार की सूचनार्एँ तैयार्र रखनी चार्हिए। जहॉ तक व्यक्ति के अध्ययन क प्रश्न है, यह प्रश्न बड़ार् जटिल है। व्यक्ति क अध्ययन बड़ी सार्वधार्नी से करनार् चार्हिए। व्यक्ति के अध्ययन हेतु निम्न प्रणार्ली अपनार्यी जार् सकती है।:-

(1) प्रार्थमिक सार्क्षार्त्कार

निर्देशक को सर्वप्रथम बार्लक क एक प्रार्थमिक सार्क्षार्त्कार करनार् चार्हिए। इस सार्क्षार्त्कार के द्वार्रार् निर्देशन बार्लक के सार्मार्जिक तथार् आर्थिक वार्तार्वरण क अध्ययन कर सकेगार्। सार्थ ही सार्थ वह बार्लक के स्वार्स्थ्य, नेत्र-ज्योति, स्वर, श्रवण-शक्ति, उसक दिखार्वार् उसके बार्ह्य सम्बन्ध आदि क ज्ञार्न सरलतार्पूर्वक प्रार्प्त कर सकतार् है। सार्मार्न्य निर्देशन को इस सार्क्षार्त्कार में निम्नार्ंकित तथ्यों की जार्नकारी प्रार्प्त करने की चेष्टार् करनी चार्हिए: (1) बार्लक क नार्म, (2) जन्म तिथ तथार् आयु (3) मार्तार्-पितार् के नार्म जार्ति, धर्म, (4) मार्तार्-पितार् क व्यवसार्य, (5) अन्य भाइ-बहिनों की संख्यार्, (6) भाइ-बहिनों में उसक क्रम, (7) मार्तार्-पितार् तथार् भाइ-बहिनों की संख्यार्, (8) परिवार्र की कुल आय, (9) आय के कुल सार्धन, (10) वंशार्नुक्रमिक रोग, (11) शार्रीरिक अस्वस्थतार्, (12) विद्यार्लय जिनमें शिद्वार्ार् प्रार्प्त की, (13) मित्र, (14) रूचिकर खेल, (15) हॉबीज (16) अन्य तथ्य।

(2) बौद्धिक स्तर की मार्प

बार्लक के आर्थिक व सार्मार्जिक वार्तार्वरण क ज्ञार्न प्रार्प्त कर लेने के पश्चार्त निर्देशन को चार्हिए कि वह बार्लक के बौद्धिक स्तर क मार्प करें। निर्देशन में बौद्धिक स्तर क बड़ार् महत्व है। कभी-कभी तो केवल बौद्धिक स्तर के आधार्र पर भी व्यक्तियों क श्रेणी-विभार्जन करते हुए देखार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिए, हम बर्ट के श्रेणी-विभार्जन को ले सकते हैं। वे कहते हैं कि 150 बुद्धि-लब्धि वार्ले अच्छे प्रशार्सक, 130-150 बु0ल0 वार्ले अच्छे टेक्नीशियन, निम्न श्रेणी के अच्छे प्रशार्सक, 115-130 बु0 ल0 वार्ले अच्छे दक्ष श्रमिक होते हैं। बुद्धि के सम्बन्ध में मार्प करते समय ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि बुद्धि के दो तत्व होते हैं-(1) सार्मार्न्य बुद्धि-तत्व तथार् (2) विशिष्ट बुद्धि-तत्व। निर्देशक को दोनों ही तत्व की मार्प अनेक बुद्धि परीक्षणों द्वार्रार् कर सकतार् है। इसके लिए निर्देशक को विभिन्न प्रकार के परीक्षणों क सहार्रार् लेनार् चार्हिए। उसे मौखिक बुद्धि-परीक्षण, सार्मूहिक बुद्धि-परीक्षण, शक्ति व गति परीक्षणों के अलार्वार् क्रियार्त्मक परीक्षणों आदि सभी प्रकार के परीक्षणों की सहार्यतार् लेनी चार्हिए। निर्देशक निम्नार्ंकित परीक्षणों क प्रयोग कर सकतार् हैं-डॉ0 सोहन लार्ल क सार्मूहिक बुद्धि-परीक्षण विशिष्ट तत्वों की मार्प के लिए निर्देशक को निम्नलिखित विशिष्ट योग्यतार्ओं की मार्प हेतु अलग-अलग से परीक्षण अपनार्ने चार्हिए:-

  1. यार्ंत्रिक योग्यतार्-यार्ंत्रिक योग्यतार् हेतु निर्देशक इन परीक्षण क प्रयार्गे कर सकतार् है –
    1. Minnesota Mechenical Assembly Test
    2. Detroit Mechenical Aptitude test
    3. Paper and Pencil Test of Mechenical Aptitude
    4. Stenquist test for Mechenical Aptitude
    5. O’ Rourke Mechenical Aptitude Test
  2. लिपिक योग्यतार्- इसके लिए इन परीक्षण प्रमुख है :-
    1. Minnesota Vocational Test for Clercial Works
    2. Thurstone Examination in Clerical Works
    3. Centroit Clerical Aptitude Examination
  3. संगीत योग्यतार्-इसके लिए क नार्म उल्लेखनीय है।
  4. कलार्-योग्यतार्- इसके लिए क नार्म उल्लेखनीय हैं।

इस प्रकार विभिन्न विशिष्ट योग्यतार्ओं क मार्प करने के पश्चार्त निर्देशक गेंस रूप से बार्लक की बुद्धि क पतार् लगार् लेगार्।

(3) व्यक्तित्व की मार्प-

बुद्धि के दोनों पहलुओं क मार्प करने के पश्चार्त निर्देशक को बार्लक के व्यक्तित्व क मार्प करनार् चार्हिए। व्यक्ति की मार्प किस प्रकार तथार् किन परीक्षणों के द्वार्रार् की जार्नी चार्हिए, इसक उल्लेख आगे विस्तृत रूप से कर दियार् गयार् है।

(4) रूचि की मार्प-

निर्देशक को निर्देशन कार्य के लिए बार्लक की रूचि क भी पतार् लगार् लेनार् चार्हिए। इसके लिए उनकी रूचि क मार्प करनार् चार्हिए। रूचि की मार्प के विषय में आगे विस्तृत विवेचनार् की गर्इ है।

इस प्रकार बार्लक क अध्ययन विभिन्न पहलुओं से करके एक निष्कर्ष निकालनार् चार्हिए। यदि हम बार्लक की विभिन्न मार्पों को ग्रार्फ पर अंकित करें तो एक छवि बन जार्येगी। इसे हम पार्श्व-चित्र कहते है। इसक एक काल्पनिक नमूनार् नीचे दियार् गयार् है :-

व्यक्ति क मनोवैज्ञार्निक पार्श्व-चित्र

  1. बुद्धि के मौखिक परीक्षण
  2. शब्द-भण्डार्र परीक्षण
  3. भार्टियार् परफॉरमेन्स
  4. संगीत परीक्षण
  5. यार्ंत्रिक परीक्षण
  6. निश्पित्त परीक्षण
  7. चित्र निर्मार्ण परीक्षण
  8. सार्मूहिक बुद्धि-परीक्षण
  9. व्यक्तित्व परीक्षण
  10. शार्रीरिक क्षमतार् परीक्षण
  11. स्थिरतार् परीक्षण
  12. टरमन-मैरिल स्केल

व्यक्ति के इस पार्ष्र्व चित्र की तुलनार् विभिन्न व्यवसार्यों के पार्श्व-चित्र से करनी चार्हिए। जिस व्यवसार्य के पार्श्व-चित्र के सार्थ पार्श्व-चित्र की सर्वार्धिक अनुरूपतार् हो, समझनार् चार्हिए कि व्यक्ति उसी व्यवसार्य के सर्वार्धिक उपयुक्त है। यहार्ँ यह ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि कभी भी व्यक्ति तथार् व्यवसार्य पार्श्व-चित्र शत-प्रतिशत अनुरूप नहीं होते हैं।

(5) अन्तिम सार्क्षार्त्कार

समस्त प्रकार के मार्पन के पश्चार्त अन्त में पुन: एक सार्क्षार्त्कार करनार् चार्हिए। इस सार्क्षार्त्कार के यदि निर्देशन की कोर्इ शंक रह गर्इ है, तो उसक समार्धार्न करनार् चार्हिए। अपनी शंकाओं के समार्धार्न, छार्त्र के सार्मार्जिक व आर्थिक वार्तार्वरण तथार् विभिन्न मार्पों के आधार्र पर अन्त में निर्देशक को अपनार् विवरण लिखकर प्रस्तुत करने चार्हिए।

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