व्यक्तित्व विकार क अर्थ, परिभार्षार्, लक्षण, कारण एवं प्रकार

व्यक्तित्व विकृति एक प्रकार से अपरिपक्व व्यक्तित्व विकास क परिणार्म होतार् है। इसमें ऐसे लोगों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है, जिनके व्यक्तित्व के शीलगुण तथार् उनक विकास इतने अपरिपक्व एवं विकृत ढंग से होतार् है कि ये अपने वार्तार्वरण की प्रार्य: प्रत्येक वस्तु, घटनार्, परिस्थिति, व्यक्ति के बार्रे में एक दोषपूर्ण प्रत्यक्षण एवं चिन्तन करते हैं। परिणार्मस्वरूप इनमें कुसमार्योजनशीलतार् इतनी अधिक बढ़ जार्ती है कि दूसरे लोगों के लिये इनक व्यवहार्र असह्य हो जार्तार् है। वे इनके व्यवहार्र को स्वीकार नहीं कर पार्ते हैं। इस प्रकार व्यक्तित्व विकृति न तो तनार्वपूर्ण परिस्थिति के प्रति एक प्रकार की प्रतिक्रियार् है और न ही यह चिंतार् के प्रति एक तरह के बचार्व क प्रतिफल है, बल्कि यह तो मूल रूप से शीलगुणों की विकृति है जो वार्तार्वरण को दोषपूर्ण यार् कुसमार्योजित ढंग से प्रत्यक्षण करने, चिन्तन करने और उसके प्रति प्रतिक्रियार् करने की प्रवृत्ति की ओर संकेत करतार् है।

  1. कारसन एवं बुचर के अनुसार्र- ‘‘सार्मार्न्यत: व्यक्तित्व विकृतियार्ँ व्यक्तिगत शीलगुणों क एक उग्र यार् अतिरंजित प्रार्रूप है जो व्यक्ति को उत्पार्ती व्यवहार्र विशेषकर अंतवैयिक्तिक प्रकृति के उत्पार्ती व्यवहार्र को करने के लिये एक झुकाव उत्पन्न करतार् है;‘
  2. DSM-IV के अनुसार्र-’’व्यक्तित्व विकृति व्यवहार्र एवं आन्तरिक अनुभूतियों क एक ऐसार् स्थार्यी पैटर्न होतार् है जो व्यक्ति की संस्कृति की प्रत्यार्शार्ओं से लम्बे रूप से विचलित होतार् है, अनम्य एवं व्यार्पक होतार् है, जिसकी शुरूआत किशोरार्वस्थार् यार् आरंभिक बार्ल्यार्वस्थार् में होतार् है जो विशेष समय तक स्थिर रहतार् है तथार् जिससे तकलीफ एवं हार्नि होती है।’’
  3. डेविसन तथार् नील के शब्दों में- ‘‘व्यक्तित्व विकृति विकृतियों क विषम समूह है, जो वैसे व्यवहार्रों एवं अनुभूतियों क स्थार्यी एवं अनम्य पैटर्न होतार् है, जो सार्ंस्कृतिक प्रत्यार्शार्ओं से विचलित होतार् है और तकलीफ यार् हार्नि पहुँचार्तार् है।’’

व्यक्तित्व विकृति के विभिन्न परिभार्षार्ओं के विश्लेषण के आधार्र पर यह कहार् जार् सकतार् है कि व्यक्तित्व विकृति से ग्रस्त होने पर व्यक्ति क व्यवहार्र इतनार् अधिक विचलित हो जार्तार् है कि उसके बार्रे में किसी प्रकार क पूर्वार्नुमार्न नहीं लगार्यार् जार् सकतार् है और न ही दूसरे लोग उनके व्यवहार्र क कोर्इ ठीक-ठीक अर्थ निकाल पार्ते हैं। परिणार्मस्वरूप ऐसार् व्यवहार्र लोगों को मार्न्य नहीं होतार् है। पार्ठकों, आपकी जार्नकारी के लिये बतार् दें कि व्यक्तित्व विकृति में व्यक्ति सार्मार्न्यत: किसी प्रकार की चिन्तार् यार् अवसार्द से ग्रस्त नहीं रहतार् है। किसी विकृति को व्यक्तित्व विकृति की श्रेणी में रखने के लिये यह आवश्यक है कि विकृत शीलगुण क स्वरूप चिरकालिक हो। व्यक्तित्व विकार के सभी लक्षण प्रार्य: किशोरार्वस्थार् तक स्पष्ट रूप से दिखार्यी देने लगते हैं और वयस्कावस्थार् में भी बने रहते हैं, किन्तु मध्यार्वस्थार् अथवार् प्रौढ़ार्वस्थार् के आते-आते लगभग समार्प्त हो जार्ते है। कारसन एवं बुचर ने व्यक्तित्व विकृति को चार्रित्रिक विकृति क नार्म दियार् है।

व्यक्तित्व विकृति के लक्षण यार् व्यक्तित्व विकृति क नैदार्निक स्वरूप-

जैसार् कि आप जार्नते है मनोवैज्ञार्निकों एवं मनश्चिकित्सकों द्वार्रार् व्यक्तित्व विकृति के अनेक प्रकार बतार्ये गये है और प्रत्येक प्रकार की अपनी कुछ अलग विशेषतार्यें हैं, किन्तु फिर भी कुछ विशेषतार्यें ऐसी है, जो सभी प्रकार की व्यक्तित्व विकृतियों में पार्यी जार्ती है। 1) विघटित व्यक्तिगत संबंध 2) चिरकालिक दु:खदार्यी व्यवहार्र 3) नकारार्त्मक नतीजार् 4) एक ही कुसमार्योजी व्यवहार्र को दोहरार्नार् 5) व्यवहार्र परिवर्तन के विरोधी

  1. विघटित व्यक्तिगत संबंध- व्यक्तित्व विकृति की पहली सार्मार्न्य विशेषतार् है-विघटित व्यक्तिगत संबंध। व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों के व्यक्तिगत संबंध संतोषजनक नहीं होते हैं। इनके व्यक्तिगत संबंध इतने खरार्ब रहते हैं कि दूसरे लोग प्रार्य: इनसे नार्रार्ज रहते हैं और सार्थ ही सार्थ इनसे घबरार्ये भी रहते है। 
  2. चिरकालिक दु:खदार्यी व्यवहार्र- व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों क व्यवहार्र दूसरों के लिये अत्यन्त कष्टदार्यी होतार् है। इस प्रकार के व्यवहार्र क स्वरूप चिरकालिक होतार् है। 
  3. नकारार्त्मक नतीजार्- व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों को अपनी जिन्दगी की घटनार्ओं के प्रार्य: नकारार्त्मक परिणार्मों क ही सार्मनार् करनार् पड़तार् है। जैसे- व्यसन संबंधी विकृतियार्ँ, विवार्ह-विच्छेद, विभिन्न प्रकार की आपरार्धिक गतिविधियार्ँ इत्यार्दि। प्रसिद्ध विद्वार्न् खार्नृजिनय तथार् ट्रोस ने अपने अध्ययन के दौरार्न पार्यार् कि व्यक्तित्व विकृति के सभी प्रकारों में व्यक्ति में नार्रकोटिक के प्रति एक प्रकार की मजबूत निर्भरतार् पार्यी जार्ती है। 
  4. एक ही कुसमार्योजी व्यवहार्र को दोहरार्नार्- एक ही कुसमार्योजी व्यवहार्र को दोहरार्नार् व्यक्तित्व विकृति की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विशेषतार् है। इसके अन्तर्गत व्यक्तित्व विकार से ग्रस्त व्यक्ति अपने कुसमार्योजी यार् दोषपूर्ण व्यवहार्र से कुछ सीखे बिनार् लगार्तार्र उसे दोहरार्तार् रहतार् है। इस प्रकार व्यक्तित्व विकृति में जो भी विशेष शीलगुण पैटर्न विकसित होतार् है, जैसे-द्वेष करनार्, शक करनार् आदि, वह प्रत्येक परिस्थिति में व्यक्ति के द्वार्रार् दिखलार्यार् जार्तार् है। 
  5. व्यवहार्र परिवर्तन के विरोधी- व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोग व्यवहार्र परिवर्तन के नितार्न्त विरोधी होते हैं। ये समय परिस्थिति के अनुसार्र अपने व्यवहार्र में किसी भी प्रकार क विवेकपूर्ण परिवर्तन करनार् नहीं चार्हते। इसके सार्थ ही दूसरे लोगों को भी इस बार्त क अवसर नहीं देते हैं कि वे उसके व्यवहार्र में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की मार्ँग कर सके। 
    उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि व्यक्तित्व विकृति की कुछ ऐसी सार्मार्न्य विशेषतार्यें हैं, जिनसे इनके स्वरूप को समझने में सहार्यतार् मिलती हैं। नीचे व्यक्तित्व विकृति क एक उदार्हरण दियार् जार् रहार् है जिससे इन विशेषतार्ओं को और ज्यार्दार् ढंग से समझार् जार् सकतार् है। ‘‘ माक नार्म के एक 22 सार्ल के युवक को मनोवैज्ञार्निक उपचार्रगृह में लार्यार् गयार्, जिस पर चोरी एवं डकैती क मुकदमार् चलने वार्लार् थार्। उस युवक की केस स्टडी से पतार् लगार् कि वह 9 वर्ष की आयु से ही अनेक बार्र सार्मार्जिक रूप से घिनौने कार्य करने के कारण जेल जार् चुक थार्। इसके सार्थ-सार्थ वह कर्त्तव्यत्यार्गितार् और अपने विध्वंसार्त्मक व्यवहार्र के कारण विद्यार्लय से भी निकाल दियार् गयार् थार्। अनेक बार्र वह कर्इ दिनों एवं सप्तार्हों के लिये घर से भार्ग गयार् थार्। आज तक वह लम्बे समय तक टिककर कोर्इ भी नौकरी नहीं कर पार्यार्। उसके मित्र भी न के बरार्बर थें। इसलिये उसे अकेलार् ही कहार् जार् सकतार् है। शुरूआत में तो वह किसी भी व्यक्ति से अत्यन्त आकर्षक ढंग से मिलतार् थार् किन्तु तत्काल ही वह अपने आक्रार्मक एवं आत्म-उन्मुखी व्यवहार्र के कारण उनसे झगड़ लेतार् थार्।’’ पार्ठकों, उपर्युक्त केस उदार्हरण में व्यक्तित्व विकार के प्रार्य: सभी लक्षण स्पष्ट रूप से दिखार्यी दे रहे हैं।

    व्यक्तित्व विकृति के कारण –

    व्यक्तित्व विकृति के मूल रूप से क्यार्-क्यार् कारण है, इस पर मनोवैज्ञार्निकों एवं मनश्चिकित्सकों द्वार्रार् ज्यार्दार् प्रकाश नहीं डार्लार् गयार् है। व्यक्तित्व विकृति के कारणों के संबंध में पर्यार्प्त अध्ययन एवं जार्नकारी न होने के प्रमुख कारण हैं-

    1. इसक प्रथम कारण तो यह है कि व्यक्तित्व विकार की औपचार्रिक रूप से स्वतंत्र पहचार्न 1952 के पहले नहीं हो पार्यी थी। अत: इस क्षेत्र में आवश्यक शोध अध्ययन की कमी है। 
    2. दूसरार् प्रमुख कारण यह है कि व्यक्तित्व विकृतियों क स्पष्ट रूप से निदार्न करने में लोगों को अभी भी अनेक प्रकार की दिक्कतों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है और इस विकृति से ग्रसित लोग अभी भी उपचार्र हेतु मनोवैज्ञार्निक उपचार्रगृह में नहीं जार्ते हैं। 
      इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्तित्व विकृति के कारणों को लेकर अनेक कठिनार्इयार्ँ मौजूद है, किन्तु इसके बार्वजूद अन्य मनोविकारों के समार्न ही व्यक्तित्व विकृति के भी तीन प्रमुख कारण बतार्ये गये हैं। 1. जैविक कारक 2. मनोवैज्ञार्निक कारक 3. सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक कारक

      1. जैविक कारक- मनोवैज्ञार्निकों एवं मनश्ििचकित्सकों ने व्यक्तित्व विकृति के कारणों में जैविक कारकों की भूमिक को प्रधार्न रूप से स्वीकार कियार् है। विभिन्न प्रयोगार्त्मक अध्ययनों के अनुसार्र बच्चों में विशेष तरह की शरीर संगठनार्त्मक प्रतिक्रियार् प्रवृत्ति जैसे-अति संवेदनशीलतार् उच्च अथवार्  जीवन शक्ति आदि कारणों से एक विशेष प्रकार की व्यक्तित्व विकृति के उत्पन्न होने की संभार्वनार् रहती है। केन्टलर एवं गु्रयनवर्ग के अनुसार्र स्थिर व्यार्मोही व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करने में जैविक यार् शार्रीरिक कारकों की भूमिक महत्त्वपूर्ण होती है। लोरैन्गर एवं उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन के आधार्र पर ज्ञार्त कियार् कि सीमार्न्त रेखीय व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करने में शार्रीरिक कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते है। इसके सार्थ ही समार्जविरोधी व्यक्तित्व विकृति की उत्पत्ति में भी जैविक कारकों को महत्त्वपूर्ण मार्नार् गयार् है।
      2. मनोवैज्ञार्निक कारक- व्यक्तित्व विकृति में जैविक कारकों के सार्थ-सार्थ मनोवैज्ञार्निक कारकों की भूमिक को भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मार्नार् गयार् है। इन मनोवैज्ञार्निक कारकों में प्रार्रंभिक सीखनार् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस मत के अनुसार्र बच्चे बचपन में ही अपने आसपार्स के वार्तार्वरण से कुछ-कुछ अनुक्रियार्ओं को कुछ खार्स ढंग से करनार् सीख जार्ते हैं, जो आगे चलकर व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करती है। वैसे तो सभी प्रकार की व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करने में मनोवैज्ञार्निक कारक महत्त्वपूर्ण है, किन्तु इनमें भी समार्ज-विरोधी व्यक्तित्व विकार के कारणों में इनकी विशिष्ट भूमिक को स्वीकार कियार् गयार् है।
      3. सार्मार्जिक -सार्ंस्कृतिक कारक-जैविक एवं मनोवैज्ञार्निक कारकों की तरह सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक कारक किस प्रकार व्यक्तित्व विकृतियों को उत्पन्न करते हैं यह बार्त अभी अधिक स्पष्ट नहीं हो पार्यी है। इस संबंध में और अधिक शोध अध्ययन की आवश्यकतार् है। मनोवैज्ञार्निकों क ऐसार् मत है कि आधुनिक आरार्मतलब जिन्दगी, तुरंत संतुष्टि, समस्यार्ओं क तुरंत समार्धार्न होनार् आदि के कारण व्यक्ति में उत्तरदार्यित्वहीनतार् एवं आत्मकेन्द्रिततार् जैसे लक्षण विकसित होने लगते है, जो धीरे-धीरे व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करती हैं। फिर भी इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहने के लिये पर्यार्प्त शोध की आवश्यकतार् है।

      इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्तित्व विकृति के कारणों में जैविक, मनोवैज्ञार्निक, सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक कारकों की भूमिक महत्वपूर्ण है, किन्तु इस क्षेत्र में पर्यार्प्त शोध अध्ययन की आवश्यकतार् आज भी निरन्तर अनुभव की जार् रही है।

      व्यक्तित्व विकृति के निदार्न में सम्मिलित समस्यार्यें-

      व्यक्तित्व विकृतियों क ठीक-ठीक निदार्न करने में अनेक तरह की समस्यार्यें है।

      1. व्यक्तित्व विकृतियों के निदार्न में पहली समस्यार् तो पर्यार्प्त शोध अध्ययनों क अभार्व है, जिसके कारण नैदार्निक मनोवैज्ञार्निक एवं मनश्चिकित्सक इनके निदार्न हेतु वस्तुनिष्ठ कसौटी नहीं बनार् पार्ये हैं। इसके अतिरिक्त विद्वार्नों ने व्यक्तित्व विकृति को स्पष्ट रूप से परिभार्षित भी नहीं कियार् है, जिसके कारण इनके निदार्न में अनेक समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। 
      2. विडगर तथार् फ्रार्न्सेस क मत है कि व्यक्तित्व विकारों की ठीक-ठीक पहचार्न करनार् इसलिये भी कठिन हो जार्तार् है, क्योंकि व्यक्तित्व विकृति के विभिन्न प्रकार परस्पर अनन्य नहीं है। कहने क आशय यह है कि एक ही व्यक्ति में व्यक्तित्व विकार के एक से अधिक लक्षण देखने को मिलते है। इस कारण यह निश्चित करनार् कठिन हो जार्तार् है कि व्यक्तित्व विकारों में से कौन सार् प्रकार है। 
      3. फ्रार्न्सेस के शब्दों में ‘‘ व्यक्तित्व विकृतियों में पार्ये जार्ने वार्ले व्यक्तित्व शीलगुण क स्वरूप विमीय होने के कारण वे सार्मार्न्य अभिव्यक्ति से लेकर रोगार्त्मक अभिव्यक्ति दोनों में पार्ये जार्ते हैं।’’ कहने क अभिप्रार्य यह है कि ऐसे शीलगुण कुछ मार्त्रार् में सार्मार्न्य व्यक्तियों में भी देखने को मिलते हैं, जिसके कारण वार्स्तविक व्यक्तित्व विकृति क निदार्न करनार् अत्यन्त कठिन हो जार्तार् है। 
      4. व्यक्तित्व विकृतियों के निदार्न में एक और कठिनाइ यह है कि इन विकृतियों को वस्तुनिष्ठ व्यवहार्रों के आधार्र पर परिभार्षित नहीं कियार् जार्तार् है बल्कि अनुमार्नित शीलगुणों के आधार्र पर परिभार्षित कियार् जार्तार् है। इस कारण भी इनके निदार्न में कठिनाइ क सार्मनार् करनार् पड़तार् है।

      इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि व्यक्तित्व विकृति के निदार्न यार् पहचार्न में नैदार्निक मनोवैज्ञार्निकों एवं मनश्चिकित्सकों को अनेक प्रकार की समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़तार् है, जिससे निदार्न की विश्वसनीयतार् बुरी तरह प्रभार्वित होती है। इन समस्यार्ओं को दूर करने के लिये यह आवश्यक है कि व्यक्तित्व विकृति के निदार्न हेतु वस्तुनिष्ठ कसौटी तैयार्र की जार्ये।

      व्यक्तित्व विकृति के प्रकार-

      असार्मार्न्य व्यवहार्रों के नैदार्निक वर्गीकरण तंत्र-DSM-IV TR (2000) में व्यक्तित्व विकृति को 10 श्रेणियों में वर्गीकृत कियार् गयार् है,

      1. स्थिर व्यार्मोही व्यक्तित्व विकृति (Pararoid personality disorder) 
      2. स्किजोआयड व्यक्तित्व विकृति (Schizaid personality disorder) 
      3. स्किजोटार्इपल व्यक्तित्व विकृति (Schizotypal personality disorder) 
      4. हिस्ट्रओनिक व्यक्तित्व विकृति (Histrionic Personality disorder) 
      5. आत्ममोही व्यक्तित्व विकृति (Narcissistic personality disorder) 
      6. समार्जविरोधी व्यक्तित्व विकृति (Antisocial personality disorder) 
      7. सीमार्न्तरेखीय व्यक्तित्व विकृति (Boarderline personality disorder) 
      8. परिवर्जित व्यक्तित्व विकृति (Avoidant personality disorder)
      9. अवलम्बित व्यक्तित्व विकृति (Dependent personality disorder)
      10. मनोग्रस्ति-बार्ध्यतार् व्यक्तित्व विकृति (Obsessive-compulsive personality disorder)

      इन 10 तरह की व्यक्तित्व विकृतियों को समूह अ, समूह ब एवं समूह स में बार्ँटार् गयार् है,
      1. समूह अ –समूह अ में तीन व्यक्तित्व विकृतियों को रखार् गयार् है-

      1. स्थिर व्यार्मोही व्यक्तित्व विकृति
      2. स्किजोआयड व्यक्तित्व विकृति
      3. स्किजोटार्इपल व्यक्तित्व विकृति

      इन तीनों प्रकार के व्यक्तित्व विकृतियों के व्यवहार्र में प्रार्य: समार्नतार् देखने को मिलती है। इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृतियों में व्यक्ति क व्यवहार्र विचित्र, असार्मार्जिक एवं अनियमित होतार् है।
      2. समूह ब – इस समूह में चार्र व्यक्तित्व विकृतियों को रखार् गयार् है-

      1. हिस्ट्रीओनिक व्यक्तित्व विकृति 
      2. आत्ममोही व्यक्तित्व विकृति 
      3. समार्जविरोधी व्यक्तित्व विकृति 
      4. एवं सीमार्न्तरेखीय व्यक्तित्व विकृति

      इन चार्रों विकृतियों को एक ही समूह में इसलिये रखार् गयार् है, क्योंकि इन चार्रों ही व्यक्तित्व विकारों में रोगी क व्यवहार्र सार्ंवेगिक, नार्टकीय एवं सनकी जैसार् होतार् है।
      3. समूह स – समूह स में तीन व्यक्तित्व विकृतियों को रखार् गयार् है-

      1. परिवर्जित व्यक्तित्व विकृति 
      2. अवलम्बित व्यक्तित्व विकृति 
      3. मनोग्रस्ति बार्ध्यतार् व्यक्तित्व विकृति

      चिन्तार् यार् डर लक्षण के आधार्र पर इन तीनों विकारों को एक श्रेणी में रखार् गयार् है। यद्यपि मनोग्रस्तिबार्ध्यतार् विकृति में रोगी ज्यार्दार् चिन्तित यार् भयग्रस्त नहीं रहतार् है।

      1. स्थिर व्यार्मोही व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार के व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों में शक, अतिसंवेदनशीलतार्, र्इष्र्यार्, जिद जैसे शीलगुणों की प्रधार्नतार् होती है। ऐसे लोग तर्क के आधार्र पर अपने प्रत्येक कार्य को और अपने को निर्दोष सार्बित करने क प्रयार्स करते है, जबकि इनके कार्य एवं व्यवहार्र प्रार्य: हर तरह से दोषपूर्ण होते हैं। ऐसे व्यक्तियों में अपने पद एवं प्रतिष्ठार् के प्रति अत्यधिक सजगतार् देखने को मिलती है। जो लोग पद-प्रतिष्ठार् में इनसे निम्नस्तर के होते हैं उनके प्रति ये घृणार् क भार्व रखते हैं और जो इनसे ऊँचे पद वार्ले होते हैं, उनके प्रति इनके मन में र्इष्र्यार् क भार्व होतार् है। 
      2. स्किजोआयड व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोग सार्मार्जिक संबंध बनार्ने में अक्षम होते हैं और उनकी इसमें अभिरूचि भी नहीं होती है। इनमें सार्मार्जिक कुशलतार् की कमी पार्यी जार्ती है। इस प्रकार के व्यक्तित्व विकार वार्ले व्यक्ति अपनी भार्वनार्ओं को भी ठीक प्रकार से अभिव्यक्त नहीं कर पार्ते हैं। इसलिये इन्हें एकान्तप्रिय एवं असार्मार्जिक मार्नार् जार्तार् है। 
      3. स्किजोटार्इपल व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार के व्यक्तित्व विकृति वार्ले व्यक्तियों क प्रधार्न लक्षण यह है कि इनके प्रत्यक्षण, चिन्तन एवं बार्तचीत करने में सनकपनार् यार्, झक्कीपनार् बहुत अधिक होतार् है। ऐसे व्यक्ति भी एकान्तप्रिय एवं अत्यन्त संवेदनशील होते हैं। वार्स्तविकतार् क ज्ञार्न होते हुये भी ऐसे लोगों में व्यक्तिगत तथार् अन्धविश्वार्सयुक्त चिन्तन की प्रधार्नतार् होती है। निरन्तर इस प्रकार के चिन्तन के कारण उनक वार्स्तविकतार् से सम्पर्क कम होने लगतार् है। 
      4. हिस्ट्रीओनिक व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों में मूल रूप से कुछ ऐसे व्यवहार्रार्त्मक पैटर्न दिखार्यी देते हैं जिसमें उत्तेजनार्, अपरिपक्वतार्, सार्ंवेगिक अस्थिरतार्, उत्तेजनार् के लिये उतार्वलार्पन आदि प्रमुख होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लैंगिक एवं अन्तवैयक्तिक संबंध संतोषजनक नहीं होते है। ऐसे लोग आत्मकेन्द्रित होते हैं तथार् इनमें दूसरों क अनुमोदन प्रार्प्त करने की तीव्र लार्लसार् पार्यी जार्ती है। 
      5. आत्ममोही व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों में आत्म महत्व की भार्वनार् अत्यन्त तीव्र एवं मजबूत पार्यी जार्ती है। इस प्रकार के लोग स्वयं को अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यक्ति समझते हैं और दूसरे लोगों से विशेष सेवार् की अपेक्षार् रखते हैं। सार्थ ही ऐसे लोग अपनी इच्छार् को ही सर्वोपरि मार्नते हैं और अपनी इच्छार् के समझ दूसरों की इच्छार् क तृच्छ मार्नकर उसे कोर्इ महत्व नहीं देते हैं। ये लोग अत्यन्त महत्वार्कांक्षी होते हैं। इसके अतिरिक्त ऐसे लोग दूसरों को अपने निकट नहीं आने देते हैं और उनको अपने ऊपर निर्भर भी नहीं बनार्ते हैं। ऐसे लोगों में परार्नुभूति क सर्वथार् अभार्व पार्यार् जार्तार् है और ये स्वयं में किसी प्रकार के दोष यार् कमी को स्वीकार नहीं करते हैं। अत: ये कभी भी मनोवैज्ञार्निक उपचार्रगृह में जार्कर उपचार्र करवार्ने की आवश्यकतार् अनुभव नहीं करते हैं। 
      6. समार्जविरोधी व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोग समार्जविरोधी यार् आक्रार्मक व्यवहार्र दिखलार्कर दूसरों के अधिकारों की अवहेलनार् करते हैं। सार्थ ही किसी भी प्रकार के असार्मार्जिक तथार् अनैतिक कार्यों को करने में कोर्इ संकोच यार् हिचकिचार्हट नहीं होती है तथार् इस प्रकार के कार्यों को करनार् वे अपनार् अधिकार समझते हैं। इस प्रकार के लोग दूसरों को धोखार् देने और ठगने में भी बहुत होशियार्र होते हैं। 
      7. सीमार्न्त रेखीय व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति वार्ले व्यक्तियों में व्यक्तित्व विकार के लक्षण के अतिरिक्त कुछ ऐसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं जो गंभीर मनोरोग यार्नि भार्वनार्त्मक रोग में होते है इसी आधार्र पर इस व्यक्तित्व विकृति क नार्म सीमार्न्त रेखीय व्यक्तित्व विकृति रखार् गयार् है। इस प्रकार के विकार में व्यक्ति में व्यवहार्रार्त्मक समस्यार् के सार्थ-सार्थ मनोदशार् में भी परिवर्तन होतार् रहतार् है। थोड़ार् सार् भी उत्तेजन मिलने से ऐसे लोग बहुत क्रोधित हो जार्ते हैं। ऐसे लोग स्वभार्व से आवेगशील होते हैं और इनक व्यवहार्र अस्थिर, आक्रार्मक एवं अपूर्वार्नूमेय होतार् है। विडिगर तथार् उनके सहयोगियों क मत है कि ऐसे लोगों की पहचार्न आवेगशीलतार् एवं आत्म-विकृति के आधार्र पर आसार्नी से की जार् सकती है। गुण्डरसन एवं सिंगर के शब्दों में ऐसे व्यक्तियों क अन्तवैयक्तिक संबंध असंतोषजनक होतार् है। इसके सार्थ ही इनमें आत्महत्यार् की प्रवृत्ति अधिक मजबूत होती है। 
      8. परिवर्जित व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति वार्ले लोगों क लक्षण यह है कि ऐसे लोग दूसरे व्यक्तियों द्वार्रार् अपने प्रति दिखलार्ये गये तिरस्कार एवं उपेक्षार् के प्रति बहुत ज्यार्दार् संवेदनशील होते हैं। ऐसे लोगों के सार्मार्जिक संबंध भी व्यार्पक नहीं होते। अपने सार्मार्जिक संबंधों को मजबूत और व्यार्पक बनार्ने की चिन्तार् इनमें बिल्कुल भी नहीं होती है। इस प्रकार के व्यक्तित्व विकार से ग्रसित लोग अपनी आलोचनार् से भी अत्यधिक भयभीत रहते हैं। 
      9. अवलम्बित व्यक्तित्व विकृति- जैसार् कि नार्म से ही स्पष्ट है इस प्रकार के व्यक्तित्व विकार वार्ले लोगों में दूसरों पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति प्रबल होती है। अकेले रहने पर वे अत्यधिक बेचैन हो उठते हैं। सार्थ ही सार्थ इनमें आत्म-विश्वार्स क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। जिसके कारण पर्यार्प्त योग्यतार् तथार् कौशल होने के बार्वजूद ये अपने आपको असहार्य महसूस करते है। ऐसे व्यक्तियों को जब दूसरों के सार्थ मिलकर काम करनार् होतार् है तब तो इसक निष्पार्दन संतोषप्रद होतार् है किन्तु अकेले ये ठीक प्रकार से कोर्इ कार्य करने में सक्षम नहीं होते हैं। 
      10. मनोग्रस्ति बार्ध्यतार् व्यक्तित्व विकृति- इस प्रकार के व्यक्तित्व विकार वार्ले लोग नियम, कानून आदि के प्रति अत्यधिक सतर्क होते है तथार् सार्थ ही वे इस मत को मार्नने वार्ले होते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने तरीके से कार्य करने की स्वतंत्रतार् होनी चार्हिये। ऐसे लोग अपनी भार्वनार्ओं को ठीक प्रकार से व्यक्त नहीं कर पार्ते है। और न ही इनमें हार्स्य करने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे व्यक्ति स्वभार्व से अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ, अविरोधी, दृढ़ एवं जिद्दी होते है। ऐसे लोगों क जीवन बार्ध्यतार्पूर्ण आदेशों से भरार् होतार् है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि मनोवैज्ञार्निकों एवं मनश्चिकित्सकों ने भिन्न-भिन्न लक्षणों के आधार्र पर व्यक्तित्व विकृति के अनेक प्रकारों क वर्णन कियार् है।

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