व्यक्तित्व क अर्थ, प्रकार एवं सिद्धार्न्त

मनोवैज्ञार्निकों द्वार्रार् व्यक्तित्व की विभिन्न परिभार्षार्एं दी गई है। परिभार्षार्ओं के क्रम में सबसे पुरार्नी परिभार्षार् व्यक्तित्व शब्द की उत्पत्ति से सम्बिन्ध् ार्त संप्रत्यय पर आधार्रित है। व्यक्तित्व क अंग्रजी अनुवार्द ‘Personality’ है जो लैटिन शब्द 

से बनार् है तथार् जिसक अर्थ मुखौटार् होतार् है, जिसे नार्टक करते समय कलार्कारों द्वार्रार् पहनार् जार्तार् थार्। इस शार्ब्दिक अर्थ को ध्यार्न में रखते हुए व्यक्तित्व को बार्रही वेशभूषार् और और दिखार्वे के आधार्र पर परिभार्षित कियार् गयार् है। इसे मनोवैज्ञार्निकों द्वार्रार् अवैज्ञार्निक घोषित कियार् गयार् और तदन्तर अनेक परिभार्षार्एँ दी गई है। परन्तु ऑलपोर्ट द्वार्रार् दी गई परिभार्षार् को सर्वार्धिक मार्न्यतार् प्रार्त्त है।

ऑलपोर्ट (1937) के अनुसार्र, “व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोशार्रीरिक तन्त्रो क गतिशील यार् गत्यार्त्मक संगठन है जो वार्तार्वरण में उसके अपूर्व समार्योजन को निर्धार्रित करते है।” ऑलपोर्ट की इस परिभार्षार् मे व्यक्तित्व के भीतरी गुणों तथार् बार्हरी गुणो को यार्नी व्यवहार्र को सम्मिलित कियार् गयार् है। परन्तु ऑलपोर्ट ने भीतरी गुणों पर अधिक बल दियार् है। व्यक्तित्व को निम्नलिखित रूप में विश्लेषित कियार् जार् सकतार् है – 

अर्थार्त् यह कहार् जार् सकतार् है कि व्यक्तित्व में भिन्न-भिन्न शीलगुणों क एक ऐसार् गत्यार्त्मक संगठन होतार् है जिसके कारण व्यक्ति क व्यवहार्र तथार् विचार्र किसी भी वार्तार्वरण में अपने ढंग क अर्थार्त् अपूर्व होतार् है।

व्यक्तित्व के उपार्गम

व्यक्तित्व के स्वरूप की व्यार्ख्यार् करने के लिए विभिन्न तरह के उपार्गमों के अन्तर्गत विभिन्न सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन कियार् गयार् है, जिनमें प्रमुख निम्नवत् है –

(1) प्रकार उपार्गम –

प्रकार सिद्धार्न्त व्यक्तित्व क सबसे पुरार्नार् सिद्धार्न्त है। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र व्यक्ति को विभिन्न प्रकारों में बार्ंटार् जार्तार् है और उसके आधार्र पर उसके शीलगुणों क वर्णन कियार् जार्तार् है।
मागन, किंग, विस्ज तथार् स्कोपलर के अनुसार्र व्यक्तित्व के प्रकार से तार्त्पर्य, “व्यक्तियों के एक ऐसे वर्ग से होतार् है जिनके गुण एक-दूसरे से मिलते जुलते है। जैसे-अन्तर्मुखी एक प्रकार है और जिन व्यक्तियों को इसमें रखार् जार्तार् है उनमें कुछ सार्मार्न्य गुण जैसे-संकोचशीलतार्, सार्मार्जिक कार्यो में अरूचि, लोगो से कम मिलनार्-जुलनार् पार्यार् जार्तार् है।”

शार्रीरिक गुणों के आधार्र पर –

  1. हिप्पोक्रेटस ने शरीर द्रवों के आधार्र पर – व्यक्तित्व के चार्र प्रकार बतार्एं है। इनके अनुसार्र शरीर में चार्र मुख्य द्रव पार्ये जार्ते है – पीलार् पित्त, कालार् पित्त, रक्त तथार् कफ यार् श्लेष्मार्। प्रत्येक व्यक्ति मे इन चार्रों द्रवो में से कोई एक द्रव अधिक प्रधार्न होतार् है और व्यक्ति क स्वभार्व यार् चिन्तप्रकृति इसी की प्रधार्नतार् से निर्धार्रित होतार् है।
  2. क्रेश्मर क वर्गीकरण – क्रेश्मर एक मनोवैज्ञार्निक थे जिन्होने व्यक्तित्व के चार्र प्रकार बतार्ए जोकि निम्नवत् है –
    1. स्थूलकाय प्रकार – ऐसे व्यक्ति क कद छोटार् होतार् है तथार् शरीर भार्री एवं गोलार्कार होतार् है, गर्दन छोटी और मोटी होती है। इनक स्वभार्व सार्मार्जिक और खुशमिजार्ज होतार् है। 
    2. कृशकाय प्रकार – इस तरह के व्यक्ति क कद लम्बार् होतार् है परन्तु वे दुबले पतले शरीर के होते है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर की मार्ँसपेशियार्ँ विकसित नही होती है। स्वभार्व चिड़चिड़ार् होतार् है तथार् सार्मार्जिक उत्तरदार्यित्व से दूर रहने की प्रवृति अधिक होती है
    3. पुष्टकाय प्रकार – ऐसे व्यक्ति की मार्ँसपेिशयार्ँ काफी विकसित एवं गठी होती है। शार्रीरिक कद न तो अधिक लम्बार् होतार् है न अधिक मोटार्। शरीर सुडौल और सन्तुलित होतार् है। इनके स्वभार्व में न अधिक चंचलतार् होती है और न अक्तिार्क मन्दन इन्हें काफी सार्मार्जिक प्रतिष्ठार् मिलती है। 
    4. विशार्लकाय प्रकार – इसमें उपरोक्त तीनों प्रकार के गुण मिले – जुले रूप में पार्ये जार्ते है।
  3. शेल्डन क वर्गीकरण – शेल्डन ने 1990 में शार्रीरिक गठन के आधार्र पर सिद्धार्न्त दियार्, जिसे सोर्मेटोटार्इप सिद्धार्न्त कहार् गयार्। शेल्डन ने व्यक्तित्व के तीन प्रकार बतार्ये है-
    1. एण्डोमाफी – इस प्रकार के व्यक्ति मोटे एवं नार्टे दिखतार् है। इस तहर के शार्रीरिक गठन वार्ले व्यक्ति आरार्मपसंद, खुशमिजार्ज, सार्मार्जिक तथार् खार्ने – पीने की चीजों में अधिक अभिरूचि दिखार्ने वोले होते है। 
    2. मेसोमाफी – ऐसे लोगों की हडिड्यार्ँ व मार्ँसपेिशयॉ काफी विकसित होती है। तथार् शार्रीरिक गठन काफी सुडौल होतार् है। 
    3. एक्टोमाफी – ऐसे व्यक्तियों क कद लम्बार् तथार् दुबले पतले होते है। मार्ँसपेशियार्ँ अविकसित तथार् शार्रीरिक गठन इकहरार् होतार् है। इन्हें अकेले रहनार् और लोगों से कम मिलनार् जुलनार् पसन्द है।

मनोवैज्ञार्निक गुणो के आधार्र पर-

युंग (1923) ने व्यक्तित्व के दो प्रकार बतार्ये-

  1. बर्हिमुखी – इस तरह के व्यक्ति की अभिरूचि विशेषकर समार्ज के कार्यो की ओर होती है। वह अन्य लोगों से मिलनार् जुलनार् पसन्द करतार् है तथार् प्रार्य: खुशमिजार्ज होतार् है। 
  2. अन्तर्मुखी – ऐसे व्यक्ति में बहिमुर्खी के विपरीत गुण पार्ये जार्ते है। इस तरह के व्यक्ति बहुत लोगों से मिलनार् जुलनार् पसंद नही करते है और उनकी दोस्ती कुछ ही लोगों तक सीमित होती है। इसमें आत्मकेन्द्रितार् क गुण अधिक पार्यार् जार्तार् है। 

आधुनिक मनोवैज्ञार्निकों के अनुसार्र अधिकतर मनुष्यों मे दोनों श्रेणियों के गुण पार्ये जार्ते हैं अर्थार्त एक परिस्थिति में वे बहिर्मुखी व्यवहार्र करते है और अन्य में अन्तर्मुखी। ऐसे व्यक्तियों को उभयमुखी कहार् जार्तार् है।

(2) शीलगुण उपार्गम –

शीलगुण सिद्धार्न्त के अनुसार्र व्यक्ति की संरचनार् भिन्न – भिन्न प्रकार के शीलगुण से ठीक वैसी बनी होती है जैसे एक मकान की संरचनार् छोटी – छोटी ईंट से बनी होती है। शीलगुण क समार्न्य अर्थ होतार् है व्यक्ति के व्यवहार्रों क वर्णन। जैसे- सतर्क, सक्रिय और मंदित आदि। शीलगुण सिद्धार्न्त के अनुसार्र व्यक्ति क व्यवहार्र भिन्न-भिन्न शीलगुणों द्वार्रार् नियन्त्रित होतार् है जो प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद रहते है। शीलगुण सिद्धार्न्त में निम्नलिखित मनोवैज्ञार्निकों क महत्वपूर्ण योगदार्न है-

(1) आलपोर्ट क योगदार्न – 

ऑलपोर्ट क नार्म शीलगुण सिद्धार्न्त के सार्थ मुख्य रूप से जुड़ार् है। यही कारण है कि ऑलपोर्ट द्वार्रार् प्रतिपार्दित व्यक्तित्व के सिद्धार्न्त को ‘ऑलपोर्ट क शीलगुण सिद्धार्न्त’ कहार् जार्तार् है। इन्होने शीलगुणों को दो भार्गो में बार्ँटार् है –

  1. सार्मार्न्य शीलगुण – सार्मार्न्य शीलगुण से तार्त्पर्य वैसै शीलगुणों से होतार् है जो किसी समार्ज संस्कृति के अधिकतर लोगों में पार्यार् जार्तार् है। 
  2. व्यक्तिगत शीलगुण – यह अधिक विवरणार्त्मक होतार् है तथार् इससे संभ्रार्न्ति भी कम होतार् है। ऑलपोर्ट के अनुसार्र व्यक्तिगत प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है-
    1. कार्डिनल प्रवृत्ति – इस तरह की व्यक्तिगत प्रवृत्ति व्यक्तित्व क इतनार् प्रमुख एवं प्रबल गुण होतार् है कि उसे छिपार्यार् नहीं जार् सकतार् है और व्यक्ति के प्रत्येक व्यवहार्र की व्यार्ख्यार् इस तरह से कार्डिनल प्रवृत्ति के रूप में आसार्नी से की जार् सकती है।
    2. केन्द्रीय प्रवृत्ति- यह सभी व्यक्तियो में पार्यी जार्ती है। पत््रयेक व्यक्ति में 5 से 10 ऐसी प्रवृत्तियार्ं होती हैं जिसके भीतर उसक व्यक्तित्व अधिक सक्रिय रहतार् है। इन गुणों को केन्द्रीय प्रवृत्ति कहते हैं जैसे सार्मार्जिकतार्, आत्मविश्वार्स आदि।
    3. गौण प्रवृत्ति – गौण प्रवृत्ति वैसे गुणों को कहते है जो व्यक्तित्व के लिए कम महत्वपूर्ण, कम संगत, कम अर्थपूर्ण तथार् कम स्पष्ट होते है। जैसे – खार्ने की आदत, केश शैली आदि। एक व्यक्ति के लिए कोई प्रवृत्ति केन्द्रीय प्रवृत्ति हो सकती है वहीं दूसरे के लिए गौण प्रवृत्ति हो सकती है।

(2) कैटल क योगदार्न – 

शीलगुण सिद्धार्न्त में ऑलपोर्ट के बार्द कैटल क नार्म महत्वपूर्ण मार्नार् गयार् है। कैटल ने प्रमुख शीलगुणों की शुरूआत ऑलपोर्ट द्वार्रार् बतलार्ये गए 18,000 शीलगुणों में से 4,500 शीलगुणों को चुनकार कियार्। बार्द में, इनमें से समार्नाथ शब्दों को एक सार्थ मिलार्कर इसकी संख्यार् उन्होने 200 कर दी और फिर बार्द में विशेष सार्ंख्यिकीय विधि यार्नी कारक विश्लेषण के सहार्रे अन्तर सहसंबंध द्वार्रार् उसकी संख्यार् 35 कर दी कैटल ने शीलगुणो को दो भार्गों में विभार्जित कियार् है।

  1. सतही शीलगुण – इस तरह क शीलगुण व्यक्तित्व के ऊपरी सतह यार् परिधि पर होतार् है यार्नी इस तरह के शीलगुण ऐसे होते है जो व्यक्ति के दिन – प्रतिदिन की अन्त: क्रियार् में आसार्नी से अभिव्यक्त हो जार्ते है।
  2. स्रोत यार् मूल शीलगुण – कैटल के अनुसार्र मलू शीलगुण व्यक्तित्व की अधिक महत्पूर्ण संरचनार् है तथार् इसकी संख्यार् सतही शीलगुण की अपेक्षार् कम होती है। मूल शीलगुण सतही शीलगुण के समार्न, व्यक्ति के दिन प्रतिदिन की अन्त: क्रियार् में स्पष्ट रूप से व्यक्त नही हो पार्ते है।

मनोश्लेषिक सिद्धार्न्त –

सिगमण्ड फ्रार्यड (1856 – 1939) ने करीब – करीब 40 सार्ल के अपने नैदार्निक अनुभवों के बार्द व्यक्तित्व के जिस सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार् है, उसे व्यक्तित्व क मनोवैश्लेषिक सिद्धार्न्त कहार् जार्तार् है। मनोवैश्लेषिक सिद्धार्न्त मार्नव प्रकृति यार् स्वभार्व के बार्रे में कुछ मूल पूर्वकल्पनार्ओं पर आधार्रित है। इनमे से निम्नार्ंकित प्रमुख है-

  1. मार्नव व्यवहार्र वार्ह्यय कारकों द्वार्रार् निर्धार्रित होतार् है तथार् ऐसे व्यवहार्र अविवेकपूर्ण, अपरिवर्तनशील, समस्थितिक है।
  2. मार्नव प्रकृति पूर्णतार्, शरीरगठनी तथार् अप्रलक्षतार् जैसी पूर्व कल्पनार्ओं से हल्के – फुल्के ढंग से प्रभार्वित होती है।
  3. मार्नव प्रकृति आत्मनिष्ठ की पूर्वकल्पनार् से बहुत कम प्रभार्वित होती है। इन पूर्व कल्पनार्ओं पर आधार्रित मनोवैश्लेषिक सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार् निम्नलिखित तीन मुख्य भार्गों मे बॉट कर की जार्ती है-
    • व्यक्तित्व की संरचनार्
    • व्यक्तित्व की गतिकी
    • व्यक्तित्व की विकास
  1. व्यक्तित्व की संरचनार् – फ्रार्यड ने व्यक्तित्व की संरचनार् क वणर्न करने के लिए निम्नलिखित दो मॉडल क निर्मार्ण कियार् है -(i) आकारार्त्मक मॉडल (ii) गत्यार्त्यक मॉडल यार् संरचनार्त्मक मॉडल
    1. आकारत्मक मॉडल- मन क आकारार्त्मक मॉडल से तार्त्पर्य वैसे पहलू से होतार् है जहार्ँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यार्त्मकतार् उत्पन्न होती है। मन क यह पहलू सचमुच में व्यक्तित्व के गत्यार्त्मक शक्तियों के बीच होने वार्ले संघर्षो क एक कार्यस्थल होतार् है। फ्रार्यड ने इसे तीन स्तरों में बॉटार् है- चेतन, अर्द्धचेतन तथार् अचेतन।
      1. चतेन – चेतन से तार्त्पर्य मन के वैसे भार्ग से होतार् है जिसमे वे सभी अनूभूतियार्ँ एवं सेवेदनार्एँ होती है जिनक संबंध वर्तमार्न से होतार् है। 
      2. अर्द्धचेतन – इसमें वैसी इच्छार्एँ, विचार्र, भार्व आदि होते है जो हमार्रे वर्तमार्न चेतन यार् अनुभव में नही होते है परन्तु प्रयार्स करने पर वे हमार्रे चेतन मन में आ जार्ते है।
      3. अचेतन – हमार्रे कछु अनुंभव इस प्रकार के होते है जो न तो हमार्री चेतन मे होते हैं और न ही अर्द्धचेतन में । ऐसे अनुभव अचेतन में होते है। फ्रार्यड के अनुसार्र पर अचेतन अनुभूतियों एवं विचार्रों क प्रभार्व हमार्रे व्यवहार्र पर चेतन एवं अर्द्धचेतन की अनुभूतियों एवं विचार्रों से अधिक होतार् है।
    2. गत्यार्त्मक यार् संरचनार्त्मक मॉडल- फ्रार्यड के अनुसार्र मन के गत्यार्त्मक मॉडल से तार्त्पर्य उन सार्धनों से होतार् है जिनके द्वार्रार् मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मार्नसिक संघर्षो क समार्धार्न होतार् है। ऐसे सार्धन यार् प्रतिनिधि तीन है -उपार्हं (id), अहं (ego), तथार् परार्हं (Super ego),
      1. उपार्ह  (id) – यह व्यक्तित्व क जैिवक तत्व है जिनमें उन प्रवृत्तियों की भमार्र होती है जो जन्मजार्त होती है तथार् जो असंगठित, कामुक, आक्रमकतार्पूर्ण तथार् नियम आदि को मार्नने वार्ली नही होती है। उपार्हं की प्रवृत्तियार्ँ “आनन्द सिद्धार्न्त” द्वार्रार् निर्धार्रित होती है।
      2. अहं – मन के गत्यार्त्मक पहलू क दूसरार् पम्रुख भार्ग अहं है। अहं मन क वह हिस्सार् है जिसक संबंध वार्स्तविकतार् से होतार् है।
      3. परार्हं – परार्हं को अहं से ऊँचार् भी कहार् गयार् है। जैसे -जैसे बच्चार् बडाऱ् होते जार्तार् है वह अपनार् तार्दार्त्म्य मार्तार् – पितार् के सार्थ स्थार्पित करते जार्तार् है। जिसके परिणार्मस्वार्रूप वह यह सीख लेतार् है कि क्यार् अनुचित है तथार् क्यार् उचित है। इस तरह के सीखने से परार्हं के विकास की शुरूआत होती है।
  2. व्यक्तित्व की गतिकी –फ्रार्यड के अनुसार्र मार्नव जीव एक जटिल तन्त्र है जिसमें शार्रीरिक ऊर्जार् तथार् मार्नसिक उर्जार् दोनों ही होते है। फ्रार्यड के अनुसार्र इन दोनों तरह की ऊर्जार्ओं क स्पर्श बिन्दु उपार्हं होतार् है। फ्रार्यड व्यक्तित्व की गत्यार्त्मक पहलुओं जैसे – मूलप्रवृत्तियों, चिन्तार् तथार् मनोरचनार्ओं क वर्णन होतार् है।
    1. मलू प्रवृत्ति – मलू प्रवृत्ति क तार्त्पर्य वैसे शार्रीरिक उत्तेजनार्ओं से होतार् है, जिसके द्वार्रार् व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार्र निर्धार्रित किये जार्ते है। फ्रार्यड ने मूल प्रवृत्तियों को मूल्त: दो भार्गो में बार्ँटार् – (i) जीवन मूल प्रवृत्ति – (ii) मृत्यु मूल प्रवृत्ति अपने विशेष अहमियत के कारण फ्रार्यड ने जीवन मूल प्रवृत्ति से मौन मूलप्रवृत्ति को अलग करके वर्णन कियार् है। मौन मूल प्रवृत्ति के ऊर्जार् बल को लिबिडो कहार् गयार् है जिसकी अभिव्यक्ति सिर्फ लैगिक क्रियार्ओं के रूप में होती है।
    2. चिन्तार् – चिन्तार् एक ऐसी भार्वार्त्मक एवं द:ुखद अवस्थार् होती है जो अहं को आलम्बित खतरे से सतर्क करतार् है तार्कि व्यक्ति वार्तार्वरण के सार्थ अनुकूली ढंग से व्यवहार्र कर सके। फ्रार्यड ने चिन्तार् के तीन प्रकार बतलार्यें है।
    3. अहं रक्षार्त्मक प्रक्रम – अहं रक्षार्त्मक प्रक्रम के विचार्र क प्रतिपार्दन सिगमण्ड फ्रार्यड ने कियार् परन्तु इसकी सूची उनकी पुत्री अन्नार् फ्रार्यड तथार् अन्य नव फ्रार्यडियन मनोवैज्ञार्निकों ने तैयार्र की यह प्रक्रम अहं को चिन्तार्ओं से बचार् पार्तार् है। रक्षार्त्मक प्रक्रमों क प्रयोग सभी व्यक्ति करते है परन्तु इसक प्रयोग अक्तिार्क करने पर व्यक्ति के व्यवहार्र में बार्हयतार् एवं स्नार्युविकृति क गुण विकसित होतार् है।
  3. व्यक्तित्व क विकास – फ्रार्यड ने व्यक्तित्व विकास की व्यार्ख्यार् दो दृष्टिकोण से कियार् है। पहलार् दृष्टिकोण इस बार्त पर बल डार्लतार् है कि वयस्क व्यक्तित्व बार्ल्यवस्थार् के भिन्न-भिन्न तरह की अनुभूतियों द्वार्रार् नियंत्रित होती है तथार् दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार्र जन्म के समय लैंगिग ऊर्जार् बच्चों में मौजूद होती है जो विभिन्न मनोलैगिंग अवस्थार्ओं से होकर विकसित होती है। फ्रार्यड के इस दूसरे दृष्टिकोण को मनोलैंगिक विकास क सिद्धार्न्त कहार् जार्तार् है। फ्रार्यड द्वार्रार् प्रतिपार्दित मनोलैंगिक विकास के सिद्धार्न्त की पार्ँच अवस्थार्एँ क्रम में निम्नार्ंकित है –
    1. मुखार्वस्थार्
    2. गुदार्वस्थार्
    3. लिंग प्रधार्नार्वस्थार्
    4. अव्यक्तार्वस्थार्
    5. जननेन्द्रियार्वस्थार्

कार्ल रोजर्स- व्यक्तित्व क सार्ंवृत्तिक सिद्धार्न्त

कार्ल रोजर्स क सिद्धार्न्त घटनार् विज्ञार्न यार् सार्ंवृत्तिकशार्स्त्र के नियमों पर आधार्रित है। सार्ंवृत्तिकशार्स्त्र वह शार्स्त्र होतार् है जिसमें व्यक्ति की अनुभूतियों, भार्वों एवं मनोवृत्तियों तथार् उनके अपने बार्रे में यार् आत्मन् के बार्रे में तथार् दूसरों के बार्रे में व्यक्तिगत विचार्रों क अध्ययन विशेष रूप से कियार् जार्तार् है। रोजर्स के सिद्धार्न्त को मार्नवतार्वार्दी आन्दोलन के अन्तर्गत एक पूर्णत: सार्ंवृत्तिक सिद्धार्न्त मार्नार् गयार् है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धार्न्त को आत्म सिद्धार्न्त यार् व्यक्ति केन्द्रित सिद्धार्न्त भी कहलार्तार् है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धार्न्त को निम्नार्ंकित भार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् है-

  1. व्यक्तित्व के स्थार्यी पहलू
  2. व्यक्तित्व की गतिकी
  3. व्यक्तित्व क विकास

(1) व्यक्तित्व के स्थार्यी पहलू- 

रोजर्स क व्यक्तित्व सिद्धार्न्त उनके द्वार्रार् प्रतिपार्दित क्लार्यंट केन्द्रित मनोचिकित्सार् से प्रार्प्त अनुभूतियों पर आधार्रित है। उनके सिद्धार्न्त क मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में होने वार्ले परिवर्तनों एवं वर्धनों क अध् ययन करनार् है। इन्होंने व्यक्तित्व के दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर बल डार्लार् है- प्रार्णी एवं आत्मन

  1. प्रार्णी – रोजर्स के अनुसार्र पार््रणी एक ऐसार् दैिहक जीव है जो शार्रीरिक एवं मनोवैज्ञार्निक दोनों ही तरह से कार्य करतार् है। प्रार्णी सभी तरह की अनुभूतियों क केन्द्र होतार् है। इन अनुभूतियों में अपने दैहिक गतिविधियों से संबंक्तिार्त अनुभूतियार्ं तथार् सार्थ ही सार्थ बार्ºय वार्तार्वरण की घटनार्ओं के प्रत्यक्षण की अनुभूतियार्ं दोनों ही सम्मिलित होती है। सभी तरह की चेतन और अचेतन अनुभूतियों के योग से जिस क्षेत्र क निर्मार्ण होतार् है, उसे प्रार्संगिक क्षेत्र कहते हैं।
  2. आत्मन – रोजर्स क व्यक्तित्व सिद्धार्न्त क यह सबसे महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। धीरे-धीरे अनुभव के आधार्र पर प्रार्संगिक क्षेत्र क एक भार्ग अधिक विशिष्ट हो जार्तार् है और इसे ही रोजर्स ने आत्मन कहार् है। आत्मन व्यक्तित्व की अलग विमार् नही होतार् है बल्कि आत्मन क अर्थ ही सम्पूर्ण प्रार्णी से होतार् है।

(2) व्यक्तित्व की गतिकी- 

रोजर्स ने अपने व्यक्तित्व गतिकी की व्यार्ख्यार् करने के लिए एक महत्वपूर्ण अभिप्रेरक क वर्णन कियार् है जिसे उन्होंने वस्तुवार्दी प्रवृत्ति (actualizing tendency) कहार् है। रोजर्स के अनुसार्र वस्तुवार्दी प्रवृत्ति से तार्त्पर्य प्रार्णी में सभी तरह की क्षमतार्ओं को विकसित करने की जन्मजार्त प्रवृत्ति से होतार् है जो व्यक्ति को अपने आत्मन को उन्नत बनार्ने तथार् प्रोत्सार्हन देने क काम करतार् है।

(3) व्यक्तित्व क विकास- 

रोजर्स ने फ्रार्यड एवं एरिक्सन की भार्ँति व्यक्तित्व क कोर्इ अवस्थार् सिद्धार्न्त प्रतिपार्दित नही कियार् है। उन्होंने व्यक्तित्व के विकास में आत्मन तथार् व्यक्तित्व की अनुभूतियों में संगततार् को महत्वपूर्ण बतार्यार् है। जब इन दोनों में अर्थार्त व्यक्ति की अनुभूतियों तथार् उनके आत्म संप्रव्यय के बीच अन्तर हो जार्तार् है तो इससे व्यक्ति में चिन्तार् उत्पन्न होती है। असंगतार् के अन्तर से उत्पन्न इस चिन्तार् की रोकथार्म के लिए व्यक्ति कुछ बचार्व प्रक्रियार्एं प्रार्रम्भ कर देतार् है। इसे प्रतिरक्षार् की संज्ञार् दी गयी है।

एब्रार्हम मैसलो: व्यक्तित्व क मार्नवतार्वार्दी सिद्धार्न्त –

एब्रार्हम मैसलो मार्नवतार्वार्दी मनोविज्ञार्न के आध्यार्त्मिक जनक मार्ने गए है। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धार्न्त में प्रार्णी के अनूठार्पन क उसके मूल्यों के महत्व पर तथार् व्यक्तिगत वर्धन तथार् आत्म निर्देश की क्षमतार् पर सर्वार्धिक बल डार्लार् है। इस बल के कारण ही उनक मार्ननार् है कि सम्पूर्ण प्रार्णी क विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होतार् है। इन आन्तरिक कारकों की तुलनार् में बार्ºय कारकों जैसे गत अनुभूतियों क महत्व नगण्य होतार् है।

व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण क पदार्नुक्रमिक मॉडल- 

मैसलो के व्यक्तित्व सिद्धार्न्त क सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसक अभिप्रेरण सिद्धार्न्त है। इनक विश्वार्स थार् कि अधिकांश मार्नव व्यवहार्र की व्यार्ख्यार् कोर्इ न कोर्इ व्यक्तिगत लक्ष्म पर पहुंचने की प्रवृत्ति से निर्देशित होतार् है। मैसलों क मत थार् कि मार्नव अभिप्रेरक जन्मजार्त होते है और उन्हें प्रार्थमिकतार् यार् शक्ति के आरोही पदार्नुक्रम में सुव्यवस्थित कियार् जार् सकतार् है। ऐसे अभिप्रेरकों को प्रार्थमिकतार् यार् शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलार्यार् गयार् है-

व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण क पदार्नुक्रमिक मॉडल-

इनमें से प्रथम दो आवश्यकतार्ओं अर्थार्त शार्रीरिक यार् दैहिक आवश्यकतार् तथार् सुरक्षार् की आवश्यकतार् को निचले स्तर की आवश्यकतार् तथार् अन्तिम तीनआवश्यकतार्ओं अर्थार्त संबंद्धतार् एवं स्नेह की आवश्यकतार्, सम्मार्न की आवश्यकतार् तथार् आत्म सिद्धि की आवश्यकतार् को उच्च स्तरीय आवश्यकतार् कहार् है। इस पदार्नुक्रम मॉडल में जो आवश्यकतार् जितनी ही नीचे है, उसकी प्रार्थमिकतार् यार् शक्ति उतनी ही अधिक मार्नी गयी है।

व्यक्तित्व आंकलन

व्यक्तित्व आंकलन की प्रमुख तीन प्रविधियार्ं होती है-

  1. व्यक्तिगत प्रविधि      
  2. वस्तुनिष्ठ प्रविधि      
  3. प्रक्षेपण प्रविधि 

(1) व्यक्तिगत प्रविधि –

जब मूल्यार्ंकनकर्तार् की व्यक्तिगत विशेषतार्एं मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् को प्रभार्वित करती हैं तो वे व्यक्तिगत विधि कहलार्ती है। इसके अन्तर्गत प्रमुखत: सार्क्षार्त्कार विधि, जीवन इतिहार्स विधि आत्मकथार्, व प्रश्नार्वली विधि आती है। सार्क्षार्त्कार विधि- सार्क्षार्त्कार विधि की सहार्यतार् से शोधकर्तार् पय्रोज्य के स्वयं के अनुभवों के बार्रे में अच्छी सूझ उत्पन्न कर सकतार् है और इस प्रकार व्यक्ति के उन साथक पक्षों के बार्रे में जार्न सकतार् है जिनके बार्रे में अन्य किसी संगठित व पूर्व निर्धार्रित परीक्षण द्वार्रार् नही जार्नार् जार् सकतार् है।

जीवन इतिहार्स विधि- इस विधि में बार्लकों की समस्यार्ओं क अध्ययन करने के लिये एक केश विवरण यार् इतिहार्स तैयार्र कियार् जार्तार् है। बार्लक द्वार्रार् पिछले कर्इ वर्षो में की गयी अन्त: क्रियार्ओं क एक विशेष रिकार्ड तैयार्र कियार् जार्तार् है। इन अन्त:क्रियार्ओं क विश्लेषण करके बार्लक के बार्रे में समस्त जार्नकारी प्रार्प्त की जार्ती है। इसमें बार्लक के बार्रे में समस्त सूचनार्यें संकलित की जार्ती है।

(2) वस्तुनिष्ठ प्रविधि-

इसमें मूल्यार्ंकनर्तार् की व्यक्तिगत विशेषतार्एं मूल्यार्ंकन की प्रक्रियार् को प्रभार्वित नही करती है। इसके अन्तर्गत आने वार्ली प्रमुख विधियार्ँ- निरीक्षण विक्रिार्, समार्जमिति, व्यक्तित्व प्रश्नार्वली मार्पनियार्ँ, कोटिक्रम मार्पनी, आदि आते हैं।

व्यक्तित्व प्रश्नार्वली – कुछ मनोवैज्ञार्निकों द्वार्रार् व्यक्तित्व को मार्पने हेतु प्रमार्पीकृत प्रश्नार्वलियों क निर्मार्ण कियार् गयार् है जिनकी सहार्यतार् से लोगों के शीलगुणों के बार्रे में जार्नार् जार् सकतार् है। उदार्हराथ- 16 व्यक्तित्व गुण (16 PF) – यह प्रमुख मनोवैज्ञार्निक कैटल द्वार्रार् निर्मित है। इसके मार्ध्यम से किसी भी व्यक्ति के 16 शीलगुणों के बार्रे में बतार्यार् जार् सकतार् है। इसक भार्रत में अनुकरण एस0डी0 श्रीवार्स्तव ने कियार् है जिसमें 187 कथन है। प्रत्येक कथन के समक्ष तीन विकल्प हमेशार्, कभी-कभी व कभी नही है। इनमें से प्रत्येक कथन के लिए व्यक्ति को एक विकल्प चुननार् होतार् है। इसके पश्चार्त स्टेन्सिल कुंजी की सहार्यतार् से व्यक्ति द्वार्रार् चयनित उत्तरों को अंक प्रदार्न किए जार्ते हं। सभी प्रतिक्रियार्ओं के लिए दिए गये अंकों को जोड़कर प्रार्प्तार्ंक निकालार् जार्तार् है और इस प्रप्तार्ंक के आधार्र पर स्टेन स्कोर ज्ञार्त कियार् जार्तार् है। इस स्टेन स्कोर के आधार्र पर व्यक्ति के व्यक्तित्व क विवरण प्रस्तुत कियार् जार्तार् है।

समार्जमिति- इस विधि द्वार्रार् पत््र यके व्यक्ति के आपसी स्वीकार व तिरस्कार की बार्रम्बार्रतार् द्वार्रार् सार्मूहिक संरचनार् क अध्ययन कियार् जार्तार् है। यह एक समूह के व्यक्तियों में आपसी सम्बन्धों क अध्ययन करती है। यह समूह में व्यक्ति की स्थिति व उसके स्तर को बतार्ती है। इसके मार्ध्यम से एक बड़े समूह में व्यार्प्त छोटे-छोटे समूहों की भी जार्नकारी मिलती है। इसके मार्ध्यम से निम्न बार्तों को जार्नार् जार् सकतार् है।मुख्यत: लिखित बार्तों की जार्नकारी दो तरह से प्रार्प्त की जार् सकती है-

  1. सोशियोंमीट्रिक मेट्रिशस
  2. सोशियोंग्रार्म

A

     

C ↔ B 

                     ↖ 

              ↑         D

  E

(3) प्रक्षेपण प्रविधि –

यह प्रक्षेपण के प्रत्यय पर आधार्रित है। फ्रार्यड के अनुसार्र प्रक्षेपण एक ऐसी अचेतन प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति अपने अपूर्ण विचार्रों, मनोवश्त्तियों, इच्छार्ओं, संवेगों तथार् भार्वनार्ओं को दूसरे व्यक्तियों यार् वस्तुओं पर आरोपित करतार् है। इसके अन्तर्गत आने वार्ले प्रमुख परीक्षण इस प्रकार है-

  1. रोर्शार्क इंक ब्लार्ट परीक्षण
  2. थीमेटिक अपरशैप्सन परीक्षण
  3. वार्क्यपूर्ति परीक्षण
  4. रोजनबिग पिक्चर फ्रस्टेशन परीक्षण
  5. ड्रार् ए मैन परीक्षण

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