व्यक्तित्व क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार, एवं व्यक्तित्व क विकास

व्यक्तित्व क अर्थ, परिभार्षार्, प्रकार, एवं व्यक्तित्व क विकास


By Bandey

अनुक्रम

व्यक्तित्व को अंग्रेजी भार्षार् में Personality कहते हैं जिसकी उत्पत्ति लैटिन भार्षार् के Persona से हुई है। ‘परसोनार्’ शब्द क अर्थ है बार्हरी वेशभूषार् यार् मुखौटार् (Mask)। इस प्रकार व्यक्तित्व क अर्थ व्यक्ति के बदले हुए रूप से है, जिसमें उसकी बोलचार्ल, वेशभूषार्, व्यवहार्र, रंग, रूप आदि सम्मिलित किये जार्ते हैं। लेकिन व्यक्तित्व को बार्हर के आवरण (वेशभूषार्) अथवार् शार्रीरिक गठन के रूप में मार्ननार् गलत है। कुछ शिक्षार्विदों ने व्यक्तित्व को आन्तरिक गुणों क पुंज मार्त्र मार्नार् है। दाशनिकों ने व्यक्तित्व को पूर्णतार् क आदर्श (Ideal of Perfection) मार्नार् है जबकि समार्जशार्स्त्री व्यक्ति को उन गुणों क संगठन मार्नते हैं जो समार्ज में उसक पद और कार्य निर्धार्रित करते हैं। इस प्रकार कहार् जार् सकतार् है – ‘‘व्यक्तित्व सम्पूर्ण मुनष्य है।’’ उसकी स्वार्भार्विक अभिरुचि तथार् क्षमतार्एँ उसके भूतकाल में अर्जित किये गये अधिगम-फल, इन कारकों क संगठन तथार् समन्वय व्यवहार्र प्रतिमार्नों, आदर्शों, मूल्यों तथार् सेवार्ार्ओं की विशेषतार्ओं से पूर्ण होतार् है।

शिक्षार् मनोविज्ञार्न मार्नव व्यवहार्र क अध्ययन करतार् है। व्यवहार्र व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। कोई व्यक्ति जैसार् भी व्यवहार्र करेगार् वैसार् ही उसक व्यक्तित्व प्रकट होगार्। प्रत्येक समार्ज तथार् विद्यार्लय बार्लकों के व्यक्तित्व के विकास में रुचि लेतार् है। अत: विद्यार्लय की शिक्षार् क मुख्य उद्देश्य बार्लकों के व्यक्तित्व क समुचित विकास करनार् है। व्यक्तित्व क समुचित विकास योग्यतार् एवं समार्योजन की क्षमतार् की पुष्टि करतार् है।


व्यक्तित्व की परिभार्षार्

  1. आलपोर्ट (Allport) के अनुसार्र – ‘‘व्यक्तित्व, व्यक्ति में उन मनोशार्रीरिक अवस्थार्ओं क गतिशील संगठन है जो उसके पर्यार्वरण के सार्थ उसक अद्वितीय सार्मंजस्य निर्धार्रित करतार् है।’’
  2. मन (Munn) के अनुसार्र – ‘‘व्यक्तित्व की परिभार्षार्, व्यक्ति की बनार्वट, व्यवहार्र के ढंग, अभिवृत्ति, रुचि, योग्यतार्, क्षमतार् और अभिरुचि आदि गुणों के संगठन के रूप में दी जार् सकती है। विशेषत: जब इसको परिस्थितियों के समार्योजन के दृष्टिकोण से देखार् जार्तार् है।’’
  3. वुडवर्थ (Wood worth) के अनुसार्र- ‘‘व्यक्तित्व व्यक्ति के व्यवहार्र के समस्त गुणों को कहते हैं।’’
  4. ग्रीन लीफ (Green Leaf) के अनुसार्र- ‘‘आपक व्यक्तित्व प्रधार्नत: चार्र बार्तों से निर्धार्रित होतार् है- (i) किस प्रकार आप देखते हैं? (ii) किस प्रकार आप अनुभव करते हैं? (iii) आप क्यार् कहते हैं? (iv) आप क्यार् करते हैं?
  5. बोरिंग (Boring) के अनुसार्र- ‘‘व्यक्तित्व व्यक्ति के अपने वार्तार्वरण के सार्थ अपूर्व और स्थार्यी समार्योजन है।’’

व्यक्तित्व के प्रकार

प्रार्रम्भ से ही मार्नव समार्ज में देखार् गयार् है कि हम विभिन्न व्यक्तियों को किसी न किसी श्रेणी में विभार्जित करके देखते आये हैं। इस प्रकार अत्यधिक प्रचलित प्रथार् रही है। ड्रार्मार्, उपन्यार्स तथार् कलार् के क्षेत्र में अच्छार्, बुरार्, सार्धु, पार्पी, सच्चार्, झूठार् आदि अनेक विशेषण लगार्कर विभिन्न पार्त्रों क किसी न किसी श्रेणी में रखकर देखार् जार्तार् है।

जब मनोवैज्ञार्निक इस प्रकार की श्रेणी बनार्ते हैं तब वह वैज्ञार्निक आधार्र पर अपनी तकनीकी भार्षार् में शब्दों क प्रयोग करते हैं जो व्यक्तिगत इच्छार् यार् रूचि से भिन्न होते हैं। इस दिशार् में मनोवैज्ञार्निक कार्ल युग क वर्गीकरण सर्वविदित है। उसने ‘व्यक्तित्व’ को अन्तर्मुखी (Introvert) तथार् बहिर्मुखी (Extrovert) दो वर्गों में रखार् है।

व्यक्तित्व की विभिन्नतार् के आधार्र पर अनेक प्रकार से व्यक्तित्व क वर्गीकरण कियार् गयार् है। सार्मार्जिकतार् के आधार्र पर युंग (Yung) ने व्यक्तियों के तीन प्रार्रूप मार्ने हैं-

(i) अन्तर्मुखी (Introvert) : इस प्रकार के व्यक्ति एकान्तप्रिय, वार्स्तविक जीवन से निरार्श एवं काल्पनिक संसार्र में विचरने वार्ले होते हैं। इनमें संवेगों की प्रधार्नतार् होती है। महार्त्मार्, वैज्ञार्निक एवं कलार्कार लोगों की गणनार् इसी श्रेणी में की जार्ती है। यह दूसरों को अपने विचार्रों से प्रभार्वित करने वार्ले होते हैं, आदर्शवार्दी होते हैं। इनमें शीघ्र निर्णय शक्ति एवं व्यवहार्र कुशलतार् क अभार्व सार् रहतार् है। अन्तर्मुखी प्रार्य: आत्म-केन्द्रित होते हैं। सार्मार्जिक परिस्थितियों से अधिक वह अपनी आन्तरिक मन:स्थिति से जुड़े रहते है उन्हें सार्मार्न्य तौर व्यवहार्रकुशल नही कहार् जार् सकतार् है। चिन्तन करने की प्रवृत्ति तथार् शार्ंत जीवन की इच्छार् रखने वार्ले यह अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के लोग सार्मार्जिक जीवन में कम रूचि रखते हैं तथार् अपने मित्रों आदि में एकाकीपन अनुभव करते रहते हैं।

(ii) बहिर्मुखी (Extrovert) : यह अपने स्वभार्व के अन्य लोगों से मिलनार्-जुलनार् पसन्द करते हैं। सार्मार्जिक आदार्न-प्रदार्न में अधिक भार्ग लेते हैं। यथाथवार्दी होने के कारण जीवन की परिस्थितियों क वस्तुगत रूप से सार्मनार् करते हैं तथार् भार्वनार् प्रधार्न होते हैं। शीघ्र निर्णय लेते हैं और उस पर तत्काल अमल करते हैं। व्यवहार्र कुशल तथार् कर्मठ होने के कारण ऐसे लोग जीवन में व्यार्पार्री, खिलार्ड़ी अभिनेतार्, सार्मार्जिक तथार् रार्जनैतिक नेतार् के रूप में अधिक सफल होते हैं।

बहिर्मुखी से युंग क तार्त्पर्य ऐसे व्यक्तित्व से है जिसमें सार्मार्जिक वार्तार्वरण में अधिक रूचि रखने की प्रवृत्ति होती है। फलस्वरूप ऐसे व्यक्ति सन्तुष्ट, उदार्र, तथार् सदैव दूसरों की सहार्यतार् करने के लिए तथार् उनके सुख-दुख को बार्ँटने के लिये तत्पर रहते है। इस कारण यह कहनार् उचित होगार् कि उनक व्यक्तित्व बार्ह्य परिस्थितियों द्वार्रार् अधिक प्रभार्वित होतार् है। उसक गठन, विभिन्न सार्मार्जिक परिस्थितियों में सक्रिय भार्ग लेने के फलस्वरूप उस व्यक्तित्व से भिन्न होतार् है जो प्रार्य: अपनी भार्वनार्ओं तथार् आन्तरिक मन:स्थिति से ही उलझार् रहतार् है। नेतार्, रार्जनीतिज्ञ, समार्जसेवी, अभिनेतार् आदि इस प्रकार के व्यक्ति होते है। जिन्हें सार्मार्जिक जीवन में खुलकर भार्ग लेनार् पड़तार् है और उनक व्यक्तित्व इस कारण खुलार् हुआ होतार् है।

इस वर्गीकरण की मार्न्यतार्यें सभी वैज्ञार्निक को मार्न्य नहीं है। उनक विचार्र है कि सार्मार्न्य जीवन में कोई भी व्यक्ति न तो पूर्णत: बहुर्मुखी होतार् है, और नही अन्तर्मुखी। वार्स्तव मे वह उभयमुखी व्यक्तित्व होतार् है, और उसमें दोनों, अन्तर्मुखी तथार् बहिर्मुखी लक्षण विद्यमार्न होते है। सार्मार्जिक परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रियार् के फलस्वरूप उसकी अभिव्यक्ति प्रत्येक व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से करतार् है।

(iii) उभयमुखी : उभयमुखी वह व्यक्ति होते हैं जो किसी भी समस्यार् पर एकाग्र होकर गहरार्ई से नहीं सोच पार्ते हैं और न ही उस समस्यार् पर विहंगम विचार्र कर पार्ते हैं। ऐसे छार्त्र प्रत्येक विषय क सार्मार्न्य ज्ञार्न ही एकत्र कर पार्ते हैं जबकि अन्तर्मुखी छार्त्र एकाग्र होकर गहरार्ई तक सोचते हैं और बहिर्मुखी छार्त्र नयार् ज्ञार्न एकत्र करने के लिए चहुंमुखी चिंतन करते हैं। उभयमुखी छार्त्र सार्मार्न्य स्तर क ज्ञार्न प्रार्प्त कर सार्मार्न्य श्रेणी में ही रह जार्त हैं। वह न तो प्रतिभार्वार्न बन पार्ते हैं और न सृजनार्त्मक। उभयमुखी छार्त्रों क चिंतन न तो किसी समस्यार् विशेष पर गहरार्ई से सोच पार्तार् है और न वृहद क्षेत्र में उसक हल ढूंढ़ पार्तार् है, अत: वह ज्ञार्न के सार्मार्न्य स्तर पर ही रह जार्तार् है एवं अपने स्वयं के निर्णय लेने में हमेशार् पीछे रहतार् है वह चार्हतार् है कि कोई आकर उससे बार्तचीत कर, परार्मर्श देकर उसे निर्णय लेने में सहार्यतार् करे।

व्यक्तित्व के लेखकों तथार् विख्यार्त मनोविज्ञार्न पोषकों ने व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार के वर्णन द्वार्रार् हमार्रे सम्मुख उपस्थित करने क प्रयत्न कियार् है। इस वर्णन में इन्होंने स्पष्टत: सम्पूर्ण व्यक्तित्व की किसी मुख्य विशेषतार् पर अधिक बल दियार् है और इसके अन्य निहित गुणों की अवहेलनार् की है। इनमें से कुछ सिद्धार्न्त प्रार्चीन समय से हैं:

1. चार्र प्रकार के स्वभार्व – हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.) और उसके बार्द गॉलिन (100 ई) ने शार्रीरिक द्रवों के आधार्र पर व्यक्तित्व क वर्णन कियार् है। इसके अनुसार्र चार्र प्रकार के समूह इस प्रकार हैं:-

  1. मन्द – वे लोग जो धीमे, निर्बल और निरुत्तेजित होते हैं।
  2. खिन्न – वे लोग जो निरार्शार्वार्दी हैं।
  3. क्रोधी – वे लोग जो शीघ्र ही क्रोधित हो जार्ते हैं।
  4. आशार्मय – वे लोग जो बहुत शीघ्र ही कार्य करते हैं और प्रसन्न रहते हैं।

वार्स्तव में इस सिद्धार्न्त पर अधिक समय तक विश्वार्स न कियार् जार् सक और हम इस प्रकार के व्यक्तियों के वर्गों को स्वीकार नहीं करते हैं। युंग के अतिरिक्त क्रेचनर, शेल्डन, टकर तथार् स्टेवैन्स ने भी व्यक्तित्व क वर्गीकरण कियार्। क्रंशमर क वर्गीकरण युंग के समार्न है। उसने व्यक्तित्व को दो भार्गों में विभार्जित कियार् है : प्रधार्न तथार् गौड़। शेल्डन क वर्गीकरण आधुनिक आधुनिक मनोविज्ञार्न में सर्वार्धिक मार्न्य है और इस कारण महत्वपूर्ण समझार् जार्तार् है।

2. शार्रीरिक प्रकार – क्रेचनर ने 400 व्यक्तियों के अध्ययन के आधार्र पर जो मार्नसिक दोषयुक्त थे, व्यक्तियों को चार्र समूहों में उनकी शार्रीरिक रूपरेखार् के अनुसार्र विभक्त कियार् : शेल्डन के अनुसार्र व्यक्तित्व तीन प्रकार के होते है – गोलार्कार, आयतार्कार तथार् लम्बार्कार।

  1. सुडौलकायार् – वे जो शक्तिवार्न होते हैं और इच्छार्नुसार्र व्यवस्थार्पन कर लेते हैं, कार्य में रुचि लेते हैं और दूसरी वस्तुओं की चिन्तार् बहुत थोड़ी करते हैं।
  2. लम्बकाय – इस प्रकार के व्यक्ति लम्बे और पतले होते हैं दूसरों की निन्दार् करते हैं, किन्तु अपनी निन्दार् के प्रति सजग होते हैं। लंबार्कार व्यक्तित्व के लोग शरीर में क्षीण व कमजोर होते हैं। इस कारण प्रार्य: अधिक संकोची, चिड़चिड़े , क्रोधी और एकाकी जीवन के प्रति रूचि रखने वार्ले होते हैं।
  3. गोलकाय – इस प्रकार के लोग मजबूत तथार् छोटे होते हैं और दूसरे लोगों के सार्थ सरलतार् से मिल जार्ते हैं।
  4. डार्यसप्लार्स्टिक – इस प्रकार के लोगों क शरीर सार्धार्रण होतार् है।

3. शार्रीरिक गुणों के आधार्र पर वर्गीकरण – यह वर्गीकरण शैल्डन ने भी शार्रीरिक गुणों के आधार्र पर कियार् है। इन वर्गीकरण क आधार्र शैल्डन क शरीरविज्ञार्न तथार् शरीर विकास विज्ञार्न के आधार्र पर 4000 व्यक्तियों क अध्ययन है; यथार् –

  1. कोमल तथार् गोलार्कार – इस प्रकार के व्यक्ति अत्यन्त कोमल, किन्तु देखने में मोटे लगते हैं और इनक व्यवहार्र उनकी आदतों के आन्तरिक शक्तिशार्ली पार्चन पर निर्भर होतार् है। गोलार्कार व्यक्तित्व के लोग स्थूल शरीर के होते है और स्वभार्व में हसमुख, आरार्म-पसन्द तथार् अच्छे भोजन के प्रति आकर्षण रखने वार्ले होते हैं।
  2. आयतार्कार – ये वे लोग होते हैं जो पूर्ण रूप से शक्तिवार्न होते हैं। इनक शरीर भार्री व मजबूत होतार् है और खार्ल पतली होती है। आयतार्कार व्यक्तित्व के लोग अच्छे शार्रीरिक गठन के कारण आकर्षक होते हैं और स्वभार्व से खूब सार्हसी और बार्ह्य जीवन के प्रति आकर्षित होने वार्ले होते हैं। यह मुख्यत: बहिर्मुखी व्यक्तित्व वार्ले होते है और सार्मार्जिक जीवन में प्रभार्वशार्ली होते हैं।

व्यक्तित्व के प्रकार से यह अनुमार्न लगार्नार् अनुचित होगार् कि मार्नव समार्ज में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी श्रेणी यार् वर्ग क अवश्य होतार् है। हम कह सकते हैं कि किसी व्यक्ति में कुछ लक्षण प्रधार्न होते हैं, किसी व्यक्ति में दूसरे अन्तर्मुखी तथार् बहिर्मुखी व्यक्तित्व एक रेखार् के दो अन्तिम बिन्दु मार्ने जार् सकते है। इस रेखार् के आरम्भ से अन्त तक विभिन्न लक्षणों की प्रधार्नतार् के अनुसार्र व्यक्तित्व देखे जार् सकते हैं। शार्रीरिक रचनार् तथार् स्वभार्व की निर्धार्रक सीमार् के भीतर व्यक्तित्व क गठन स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है, परन्तु यह दोनों तत्व भी पार्रस्परिक रूप से भिन्न लगते हुए भी एक-दूसरे पर आधार्रित होते हैं।

व्यक्तित्व के प्रमुख प्रकार

मनोवैज्ञार्निकों ने विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार्र पर व्यक्तित्व के निम्नार्ंकित प्रकार बतार्ये हैं। उनमें से कुछ दृष्टिकोणों क वर्णन इस प्रकार है-

भार्रतीय दृष्टिकोण

  1. सतोगुणी व्यक्तित्व- इसमें अध्यगुणों क पार्लन, उच्च आदर्श, श्रेष्ठ, मूलय, उत्तम स्वभार्व एवं नैतिक मूल्य से युक्त व्यक्तित्व आतार् है।
  2. तमोगुणी व्यक्तित्व- ऐसे व्यक्ति कामी, क्रोधी, आलसी तथार् अमार्नवीय व्यवहार्रों से युक्त होते हैं।
  3. रजोगुणी व्यक्तित्व- सतोगुण व तमोगुण के मध्य की स्थिति रजोगुण की होती है। अत: रजोगुणी व्यक्ति में कुछ अच्छे गुणों व कुछ बुरार्इयों क समार्वेश होतार् है। आयुर्वेद विज्ञार्न में व्यक्तित्व क विभार्जन शरीर के तीन गुणों- कफ, वार्त, पित्त के आधार्र पर कियार् गयार् है।

पार्श्चार्त्य दृष्टिकोण

(अ) हिपोक्रेट्स क विभार्जन- पश्चिमी मनोविज्ञार्नियों ने व्यक्तित्व क विभार्जन संवेग, विचार्र, कार्यों और शार्रीरिक, मार्नसिक विशेषतार्ओं के आधार्र पर कियार् है। उनमें से कुछ मुख्य विद्वार्नों के विचार्र इस प्रकार हैं। ग्रीक विद्वार्न हिपोक्रेट्स ने संवेग के आधार्र पर निम्न प्रकार से व्यक्तित्व को विभार्जित कियार् है-

  1. फ्लैगमैटिक प्रकार (Phlegmatic type)- इस तरह के व्यक्ति शार्ँत स्वभार्व वार्ले व धैर्यवार्न होते हैं।
  2. मैलनकॉलिक प्रकार (Melancholic)- ऐसे व्यक्ति सुस्त, निरार्शार्पूर्ण एवं दु:खी जीवन वार्ले होते हैं।
  3. कॉलेरिक प्रकार (Choleric)- इस प्रकार के व्यक्ति शीघ्र उत्तेजनशील एवं अधीर स्वभार्व वार्ले होते हैं।
  4. सैंग्विन प्रकार (Sanguine)- ऐसे व्यक्ति कर्त्तव्य परार्यण, कर्मशील, असहनशील तथार् किसी भी कार्य को शीघ्र पूरार् करने वार्ले होते हैं।

(ब) क्रिश्चमर क विभार्जन – शरीर के आधार्र पर क्रिश्चरमर (Krietschmer) महोदय ने व्यक्तित्व क विभार्जन इस प्रकार कियार् है-

  1. पुष्टकाय (Athletic type)- ऐसे व्यक्ति शरीर से तन्दुरुस्त, हष्ट-पुष्ट, आत्मविश्वार्सी व शक्ति संपन्न होते हैं।
  2. लम्बकाय (Asthenic type)- इस प्रकार के व्यक्ति दुबले-पतले, कमजोर, शीघ्र क्रोधी, चिड़चिड़े व निरार्श प्रकृति के होते हैं।
  3. गोलकाय (Pyknic type)- ऐसे व्यक्ति शरीर से नार्टे, मोटे व गोल-गट्टे होते हैं। इनक स्वभार्व प्रसéचित वार्लार् होतार् है। वे अत्यधिक आरार्मप्रिय व मिलनसार्र होते हैं।
  4. मिश्रित (Dysplastic type)- ऐसे व्यक्ति उपरोक्त तीनों प्रकार के गुणों से युक्त हुआ करते हैं।

(स) स्प्रेन्जर क विभार्जन- ‘स्प्रेन्जर’ (Spranger) ने व्यक्तित्व को छ: भार्गों में विभार्जित कियार् है-

  1. आर्थिक (Economic type)- ऐसे व्यक्ति हर वस्तु क मूल्यार्ंकन अर्थ यार् धन की दृष्टि से करते हैं।
  2. सैद्धार्न्तिक (Theoretical)- ऐसे व्यक्ति सैद्धार्न्तिक व्यवहार्र वार्ले हुआ करते हैं। ये कार्य करने में विश्वार्स तथार् तथ्य की खोज करने में लगे रहते हैं।
  3. सौन्दर्यप्रेमी (Aesthetic)- ऐसे व्यक्ति हर वस्तु को सुन्दरतार् की दृष्टि से परखते हैं।
  4. सार्मार्जिक (Social)- ऐसे व्यक्ति मित्र मण्डली, समुदार्य व समार्ज के लिए कार्य करने वार्ले होते हैं।
  5. रार्जनैतिक (Political)- ऐसे व्यक्तियों की अभिरुचि रार्जनीति में होती है और दूसरों पर अपनार् प्रभार्व डार्लने क प्रयत्न कियार् करते हैं।
  6. धामिक (Religious)- ऐसे व्यक्ति के विचार्र धर्म से युक्त एवं सार्त्विक हुआ करते हैं।

(द) गैरेट (Garret) व टर्मन (Terman) ने बुद्धिलब्धि (I.Q.) के आधार्र पर व्यक्तित्व क विभार्जन कियार् है।

व्यक्तित्व के गुण

व्यक्तित्व क पूर्णरूप से वर्णन करने से पहले हमें उनके गुणों को समझनार् चार्हिए। मनोवैज्ञार्निकों क गुण से तार्त्पर्य ‘व्यवहार्र के ढंग’ से है। वुडवर्थ ने इसकी परिभार्षार् इस प्रकार दी है-’’व्यक्तित्व के गुण हमार्रे व्यवहार्र क एक मुख्य प्रकार क ढंग है; -जैसे प्रसन्नतार् यार् आत्मविश्वार्स आदि, जो कुछ समय तक तो हमार्रे व्यवहार्र के गुण ही होते हैं, किन्तु कुछ दिन बार्द हमार्रे जीवन के एक आवश्यक अंग बन जार्ते हैं।’’ वुडवर्थ व्यक्तित्व को इन्हीं गुणों क योग बतार्तार् है लेकिन इसके सार्थ ही सार्थ वह आगे यह भी बतार्तार् है कि व्यक्तित्व क तार्त्पर्य इस योग से कुछ अधिक भी है, अर्थार्त केवल योग ही व्यक्तित्व नहीं है वरन व्यक्तित्व में कुछ और भी गुण सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार व्यक्ति जो प्रसन्न और आत्मविश्वार्सी है यार् दुखी है, इसक तार्त्पर्य केवल यही नहीं कि वह इस प्रसन्नतार्, आत्म-विश्वार्स यार् दुख क ही योग है, वरन् वार्स्तव में वह इससे भी कुछ अधिक है।

गॉर्डन आलपोर्ट महोदय ने व्यक्तित्व के संगठन पर जैविक शार्रीरिक दृष्टि से विचार्र कियार् है और उसक विश्वार्स है कि ‘‘गुण हमार्रे परिवर्तित हो जार्ने वार्ले सक्रिय संस्कार हैं। संस्कार कम से कम अंशत: हमार्री विशिष्ट आदतों से उत्पन्न होते हैं और हमार्रे वार्तार्वरण के ढंग को बनार्ते हैं।’’

इस परिभार्षार् से तार्त्पर्य यह है कि व्यक्ति क व्यवहार्र उसकी आन्तरिक भार्वनार्ओं और बार्ह्म वार्तार्वरण के प्रभार्व के द्वार्रार् संचार्लित होतार् है। एक कठिन परिश्रम करने वार्ले व्यक्ति से आशार् की जार् सकती है कि वह सदैव कठिन परिश्रम करेगार् और इसी प्रकार एक सहार्नुभूति दिखार्ने वार्ले से आशार् की जार् सकती है कि वह सहार्नुभूति को सदैव अपने अन्दर रखेगार्। यही गुणों के संगठनों क सार्मार्न्य सिद्धार्न्त है।

जीवन काल के विभिन्न स्तरों पर व्यक्तित्व क विकास

शैशवार्स्थार्

इस अवस्थार् में शिशु स्नेह और सुरक्षार् की आवश्यकतार् क अनुभव करतार् है। यदि इन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति मार्तार्-पितार् द्वार्रार् उचित ढंग से कर दी गई तो व्यक्तित्व उचित दिशार् में विकसित होगार्, अन्यथार् विपरीत दिशार् में विकास होगार्। मार्तार् जब दूध पिलार्नार् बन्द करती है तो बार्लक के मन को धक्क लगतार् है। कुछ प्रयोगों क यह निष्कर्ष निकलार् है कि जिन बार्लकों को मार्तार् शीघ्र ही दूध पिलार्नार् बन्द कर देती हैं वे बार्लक आगे चलकर अपने को असुरक्षित अनुभव करते हैं और उनमें भोजन और धनसंग्रह करने की उत्कृष्ट अभिलार्षार् रहती है, किन्तु यह बार्त सावभौम सत्य नहीं कही जार् सकती। फिर भी शैशवकाल में बार्लक को जिस प्रकार क वार्तार्वरण मिलतार् है उसकी छार्प उसके व्यक्तित्व पर अमिट पड़ती है। पिछले लगभग पचार्स वर्षों से शैशवकाल के महत्व को अत्यधिक स्वीकार कियार् है और इस दिशार् में अनेकानेक प्रयोग चल रहे हैं।

बार्ल्यार्वस्थार्

लगभग छ: वर्ष से बार्रह वर्ष तक रहती है। इस अवस्थार् में बार्लक के वार्तार्वरण क क्षेत्र कुछ बढ़ जार्तार् है। घर के अन्दर से निकलकर वह इसी अवस्थार् में समार्ज में पदापण करतार् है। अब वह अपने पैरों पर खड़ार् होनार् सीखतार् है। भोजन, शौच, स्नार्न आदि में मार्ं-बार्प अब उसे सहार्यतार् नहीं देते। कुछ मार्तार्-पितार् इस अवस्थार् में बार्लक की बहुत अधिक देखभार्ल करते रहते हैं ऐसे बार्लक डरपोक हो जार्ते हैं इसी अवस्थार् में बार्लक स्कूल जार्तार् है और अन्य बार्लकों से उसक परिचय होतार् है। मित्र-मण्डली के प्रति अब वह अधिक स्वार्मिभक्ति दिखार्तार् है। जिन बार्लकों को मार्तार्-पितार् से प्रेम नहीं मिलतार् वे इस अभार्व की पूर्ति मित्र-मण्डली में करनार् चार्हते हैं। नेतृत्व, मैत्री, सहार्नुभूति, सहयोगितार् आदि के गुण बार्लक मित्रमंडली में ही सीखतार् है। बार्लक आगे चलकर जो कुछ बनेगार् उसमें इस मित्रमंडली क भी हार्थ है। स्कूल के अध्यार्पक भी उस पर प्रभार्व छोड़ते हैं। बहुत से बार्लक समार्ज-विरोधी कार्यों की ओर इसलिए मुड़ते हैं, क्योंकि उन्हें अध्यार्पकों से उचित सहार्नुभूति व स्नेह नहीं मिलार्। इस अवस्थार् में बार्लक बड़ों के सम्पर्क में भी आतार् है। बड़ों की अभिवृत्तियों को वह प्रत्यक्ष अथवार् अप्रत्यक्ष रीति से ग्रहण करतार् चलतार् है। जिन अनुभवों में बार्लक अपने ‘स्व’ क प्रकाशन देखतार् है और जो अनुभव उसे रुचिकर प्रतीत होते हैं वे अनुभव उसके द्वार्रार् बार्र-बार्र दुहरार्ए जार्ते हैं और कालार्न्तर में ये ही अभिवृत्तियों क रूप धार्रण कर लेते हैं।

किशोरार्वस्थार्

भार्रतीय बार्लकों में यह अवस्थार् बार्रह वर्ष के आसपार्स आती है। कुछ दिन पहले इसे तूफार्नी अवस्थार् कहार् जार्तार् थार्, किन्तु अब यह धार्रणार् भ्रमार्त्मक सिद्ध हो गई है। फिर भी इस आयु में अनेक प्रकार के परिवर्तन होते हैं। उसके शरीर में यौवन छलकने लगतार् है। बार्लक एवं बार्लिकाओं के अंगों में भिन्नतार् आ जार्ती है। काम-वार्सनार् प्रस्फुटन इस अवस्थार् में सबसे बड़ी घटनार् है। बार्लकों में प्रथम शुक्रपार्त और बार्लिकाओं में प्रथम रजोदर्शन से दोनों की रुचियों में महार्न परिवर्तन हो जार्तार् है। अब प्रेम में कामुकतार् क रंग चढ़ जार्तार् है। बार्लक, बार्लिकाओं के अंगों, वस्त्रों एवं कार्यों में रुचि लेने लगते हैं और बार्लिकाएं बार्लकों के शार्रीरिक अंगों एवं कार्यों की ओर आकर्षित होती हैं। लैंगिक विकास में आसपार्स की दुनियार् अब उन्हें एक-दूसरे रंग में रंगी हुई दिखार्ई पड़ने लगती है और मूल्यों में भार्री परिवर्तन हो जार्तार् है। यदि किशोरों एवं किशोरियों की काम-भार्वनार् को दबार्यार् जार्तार् है तो उनमें काम गं्रथि बन जार्ती है और किशोर आगे चलकर शर्मीले एवं अपरार्धी बन सकते हैं। यदि किशोरों को स्वतन्त्र छोड़ दियार् जार्ए तो वे अनेक पार्पार्चार्र में लग सकते हैं। सन्तुलित व्यक्तित्व के विकास के लिए काम-भार्वनार् पर उचित नियन्त्रण रखकर उसके शोधन अथवार् ऊध्र्वगमन के लिए शिक्षार् देनार् ही अभीष्ट है। किशोरार्वस्थार् में एक प्रभार्व जो सबसे अधिक है वह है मित्रमंडली का। किशोरों की गोष्ठियार्ं बड़ी ही गुप्त होती हैं। यदि गोष्ठी बुरे किशोरों की हुई तो इसक प्रत्येक सदस्य आगे चलकर समार्ज के लिए एक समस्यार् बनेगार्। यदि मित्रमंडली में अच्छे बार्लक हुए तो किशोर स्वार्वलम्बन क पार्ठ पढ़तार् है, सहयोग करनार् सीखतार् है, प्रजार्तार्न्त्रिक प्रणार्ली से परिचित होतार् है और नेतृत्व क विकास करतार् है। यह निश्चित बार्त है कि इन सब बार्तों क व्यक्तित्व के विकास में प्रभार्व पड़तार् रहतार् है।

प्रौढ़ार्वस्थार्

यह अवस्थार् व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न समय पर आती है। कुछ बार्ईस वर्ष, तो कुछ पच्चीस वर्ष के ऊपर तक क समय ले लेते हैं। इस अवस्थार् में व्यक्ति किसी व्यवसार्य में लग जार्तार् हैं वह जीवन में एक निश्चित दिशार् की ओर उन्मुख हो जार्तार् है। अब उसके मार्नसिक, शार्रीरिक, बौद्धिक एवं संवेगार्त्मक विकास की दिशार् निश्चित हो गई होती है। परिवार्र, व्यवसार्य और समार्ज के प्रति उसक समंजन हो जार्तार् है। व्यक्ति में इस समय आदर्श एवं अभिवृत्तियार्ं निश्चित हो चुकी होती हैं और इसीलिए प्रौढ़ समार्ज के लिए कोई विशेष समस्यार् नहीं खड़ी करते। यदि प्रार्रम्भ से विकास दूषित हो गयार् है तो अवश्य वे समार्ज के लिए समस्यार् उत्पन्न करेंगे। मनोविज्ञार्न की दृष्टि से इसमें कोई विशेष परिवर्तन यार् समस्यार् नहीं होती।

वृद्धार्वस्थार्

इस अवस्थार् में व्यक्ति क अनुभव बढ़ जार्तार् है, किन्तु उसकी उपाजन शक्ति कम जो जार्ती है, स्वार्स्थ्य बिगड़ जार्तार् है, स्मृति मध्यम पड़ जार्ती है और अंग शिथिल हो जार्ते हैं। इस अवस्थार् में व्यक्ति को समार्ज उसी दृष्टि से नहीं देखतार् है जैसे उसे कभी देखार् जार्तार् थार्। वृद्धों में रुचियार्ं पुरार्नी पड़ जार्ती हैं। भार्रत में वृद्धों के लिए अभी भी बड़ार् सम्मार्न है। अत: यहार्ं पर उनके लिए उतनार् मार्नसिक क्लेश नहीं होतार् जितनार् प्रगतिशील पश्चिमी देशों में होतार् है। पश्चिम के कुछ देशों में वृद्धार्वस्थार् एक समस्यार् है। यह है व्यक्तित्व के विकास क परिचय। यहार्ं पर यह बार्त पुन: दोहरार् देनार् आवश्यक है कि व्यक्तित्व के विकास में व्यक्ति की आवश्यकतार्एं एवं उनकी पूर्ति, भग्नार्शार्, निरार्शार्, संघर्ष, जीवन की घटनार्एं सभी प्रभार्व डार्लती रहती हैं। व्यक्तित्व क विकास सदार् होतार् रहतार् है, किन्तु इसकी रूपरेखार् शैशवार्स्थार् एवं बार्ल्यार्वस्थार् में ही प्रार्य: निश्चित हो जार्ती हैं।

व्यक्तित्व की विशेषतार्एँ

  1. आत्म चेतनार् (Self-Consciousness)- व्यक्तित्व की सबसे प्रथम विशेषतार् आत्म चेतनार् है। आत्म चेतनार् वह शक्ति है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति अपने संबंध में जार्नतार् है कि वह क्यार् है? वह यह भी जार्नने लगतार् है कि दूसरे व्यक्ति उसके बार्रे में क्यार् सोचते हैं? यह ज्ञार्न वार्स्तविक व्यवहार्रों को निर्धार्रित करतार् है। व्यक्ति वार्स्तव में वह नहीं है जो वह अपने बार्रे में सोचतार् है, व्यक्ति वार्स्तविक रूप में वह भी नहीं है जो दूसरे उसके बार्रे में सोचते हैं, वरन् व्यक्ति वह है जो यह जार्नतार् है कि दूसरे मेरे बार्रे में क्यार् सोचते हैं? यह आत्म चेतनार् है। “I am not what I think I am, I am not what you think I am, but I am what I think you think I am.”
  2. गत्यार्त्मकतार् (Dynamicity)- अच्छे व्यक्तित्व स्थिर नहीं होते, वे एक ही सिद्धार्न्त यार् आदर्श पर अंधे होकर सदैव-सदैव के लिए नहीं चिपके रहते। अच्छे व्यक्तित्व सदैव अपनार् तथार् बार्ह्य परिस्थितियों क विश्लेषण करते रहते हैं तथार् आवश्यकतार्नुसार्र अपने मूल्यों, विचार्रों, धार्रणार्ओं तथार् आदर्शों में परिवर्तन करते रहते हैं। इन परिवर्तनों क उद्देश्य सदैव विकासार्त्मक होतार् है। परिणार्मस्वरूप अच्छार् व्यक्तित्व हमेशार् विकासोन्मुखी होतार् है और विकास की यह प्रक्रियार् जन्म से मृत्यु पर्यन्त चलती है।
  3. शार्रीरिक संरचनार् (Pysical Construction)- अच्छे व्यक्तित्व क तीसरार् चिन्ह अच्छी शार्रीरिक संरचनार् है। शार्रीरिक संरचनार् के अन्तर्गत ही हम शार्रीरिक स्वार्स्थ्य को सम्मिलित करते हैं। शार्रीरिक संपूर्णतार् जब तक नहीं होगी तब तक व्यक्ति के व्यवहार्र भी सार्मार्न्य नहीं होते और न उसक विकास ही संतुलित होगार्।
  4. मार्नसिक स्वार्स्थ्य (Mental Health)- अच्छे व्यक्तित्व क अच्छार् मार्नसिक स्वार्स्थ्य होतार् है। व्यक्तित्व मनोदैहिक शक्तियों क संगठन है अर्थार्त् मार्नसिक व शार्रीरिक शक्तियों के संगठन को व्यक्तित्व कहार् जार्तार् है। अच्छे मार्नसिक स्वार्स्थ्य पर ही संवेगों क नियंत्रण, संतुलित व्यवहार्र, तर्क, चिन्तन आदि क्रियार्एँ निर्भर हैं। अत: अच्छे व्यक्तित्व के लिये अच्छे मार्नसिक स्वार्स्थ्य होनार् आवश्यक है।
  5. समन्वय (Integration)- व्यक्तित्व अनेक मनोदैहिक शक्तियों क योग मार्त्र नहीं है, वरन् इसमें अनेकानेक शार्रीरिक व मार्नसिक क्रियार्ओं क अद्भुत समन्वय होतार् है। यह किसी एक शक्ति क अकेलार् विकास नहीं है और न पृथक-पृथक शक्तियार्ँ एक-दूसरे से स्वतंत्र होकर ही कार्य करती है, वरन् संपूर्ण शक्तियार्ँ एक होकर समन्वित रूप से कार्य करती हैं।
  6. समार्योजन शक्ति (Power of Adjust)- अच्छार् व्यक्तित्व आन्तरिक जीवन तथार् बार्ह्य वार्तार्वरण के सार्थ अपने को समार्योजित करने की शक्ति रखतार् है। कभी-कभी व्यक्ति के अन्तर्मन में ऐसे विचार्र यार् कल्पनार्एँ आती हैं जो सार्मार्जिक दृष्टि से उचित नहीं होती, अच्छार् व्यक्तित्व इन विचार्रों व कल्पनार्ओं के सार्थ समार्योजन स्थार्पित करतार् है। इसी प्रकार कभी-कभी व्यक्ति क सार्मार्जिक व भौतिक वार्तार्वरण अचार्नक उल्लेखनीय रूप से बदल जार्तार् है। अच्छे व्यक्तित्व इन परिवर्तित वार्तार्वरण के सार्थ ही शीघ्र अपने को समार्योजित कर लेते हैं और समार्योजन में उन्हें अधिक कठिनार्ई नहीं आती है।
  7. सार्मार्जिकतार् (Sociability)- मनुष्य एक सार्मार्जिक प्रार्णी है। समार्ज से भिé मार्नव की कल्पनार् आज के युग में नहीं की जार् सकती है क्योंकि समार्ज से बार्हर उसक न तो जीवन ही संभव है और न विकास ही संभव है। उसे समार्ज में रहनार् ही है। इतनार् ही नही, समार्ज में रहकर उसे सार्मार्जिक मार्न्यतार्ओं, परंपरार्ओं, मूल्य तथार् धार्रणार्ओं व रीति-रिवार्जों क पार्लन भी करनार् होगार्, उसे समार्ज के दूसरे सदस्यों के सार्थ मिलकर चलनार् होगार्। अच्छार् व्यक्तित्व इन कार्यों को सरलतार् से कर देतार् है।
  8. दृढ़ इच्छार् शक्ति (Strong Will Power)- अच्छे व्यक्तित्व वार्ले व्यक्ति में दृढ़ इच्छार् शक्ति होती है। इस शक्ति के कारण ही वह लगन के सार्थ कार्य करतार् है तथार् जीवन में आने वार्ले अनेकानेक संघर्षों क धैर्य के सार्थ मुकाबलार् करतार् है।
  9. संतोष, उच्चार्कांक्षार् तथार् उद्देश्यपूर्णतार् (Satisfaction, Ambitious and Purposiveness)- अच्छे व्यक्तित्व में आत्म संतोष, हर पल पर आगे बढ़ने की आकांक्षार् तथार् अपने प्रत्येक कार्य को किसी न किसी उद्देश्य के सार्थ करने की योग्यतार् होती है। वह कोई भी कार्य उद्देश्य विहीनतार् की स्थिति में नहीं कर पार्तार् है। सुनिश्चित उद्देश्य उसके प्रत्येक कार्य तथार् व्यवहार्र को एक निश्चित दिशार् प्रदार्न करतार् है।


Share:

Leave a Comment

Your email address will not be published.

TOP