वेद शब्द क अर्थ, स्वरूप, चतुर्धार् विभार्जन एवं भार्ग

वेद शब्द क अर्थ, स्वरूप, चतुर्धार् विभार्जन एवं भार्ग


By Bandey

‘वेद’ शब्द क अर्थ- वैदिक ग्रन्थों में ‘वेद’ शब्द दो प्रकार के पार्ये जार्ते है- अन्तोदार्त्त एवं आद्युदार्त्त। इनमें प्रथम प्रकार क शब्द ‘दर्भमुष्टि’ के अर्थ में एवं द्वितीय प्रकार क शब्द ‘ज्ञार्न’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद-संहितार् में ‘असुन्’ प्रत्ययार्न्त वेद: (वेदस्) शब्द अनेक बार्र आयार् है। भार्ष्यकारों के द्वार्रार् इस शब्द क अर्थ ‘धन’ कियार् गयार् है। निघण्टु में भी धन के पर्यार्यवार्ची शब्दों में वेद शब्द पढ़ार् गयार् है। ऐसार् लगतार् है कि यह शब्द ‘विद’ ज्ञार्ने धार्तु से निष्पन्न न होकर ‘विद्लृ लार्भे’ धार्तु से निष्पन्न है। ज्ञार्न अर्थवार्ची ‘ज्ञार्’ और ‘विद्’ दोनों धार्तुए है, परन्तु इन दोनों के अर्थ में अन्तर है। भौतिक विद्यार्ओं की जार्नकारी को ज्ञार्न एवं आध्यार्त्मिक विद्यार्ओं की जार्नकारी को ‘वेद’ कहार् जार्तार् है।

‘वेद’ शब्द के अर्थ के विषय में अनेक विचार्र प्रार्प्त होते है। ऋग्वेद-प्रार्तिशार्ख्य की वर्गद्वयवृत्ति की प्रस्तार्वनार् में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- ‘‘विद्यन्ते ज्ञार्यन्ते लभ्यन्ते वैभिर्धर्मार्दिपुरूषाथार् इति वेदार्:।’’ अर्थार्त् जिसके द्वार्रार् धर्मार्दि चार्रों पुरूषाथ प्रार्प्त किये जार्ते है उसे ‘वेद’ कहते है। सार्यणार्चाय ने ‘वेद’ शब्द के विषय में स्पष्ट कहार् है कि जो ग्रन्थ अभीष्ट वस्तु की प्रार्प्ति तथार् अनिष्ट वस्तु के परिहार्र के लिए अलौकिक उपार्य क ज्ञार्न करार्तार् है, वह ‘वेद’ है। सार्यणार्चाय के इस लक्षण में वेद क अर्थ ज्ञार्नमूलक है। वार्स्तव में जो उपार्य प्रत्यक्ष, अनुमार्न एवं अन्य प्रमार्णों से ज्ञार्त नही किये जार् सकते उनके लिए प्रबल प्रमार्ण वेद ही है- ‘धर्मजिज्ञार्समार्नार्नार्ं प्रमार्णं परमं श्रुति:।’ तैत्तिरीय संहितार् में वेद शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहार् गयार् है कि ‘वेद’ के द्वार्रार् ही देवतार्ओं ने असुरों की सम्पत्ति को प्रार्प्त कियार्, यही ‘वेद’ क वेदत्व है। दूसरे शब्दों में कहार् जार् सकतार् है कि ऐहलौकिक सुख-सम्पन्नतार् से सम्बन्धित जार्नकारी ज्ञार्न एवं पार्रलौकिक सुख-सम्पन्नतार् से सम्बन्धित जार्नकाी ‘वेद’ कहलार्ती है। आचाय सार्यण के अनुसार्र जो ज्ञार्न प्रत्यक्ष अथवार् अनुमार्न के द्वार्रार् नही प्रार्प्त हो सकतार् उसक अवबोध ‘वेद’ के द्वार्रार् हो जार्तार् है, यही ‘वेद’ की वेदतार् है-

‘‘प्रत्यक्षेणार्नुमित्यार् वार् यस्तूपार्यो न बुध्यते।

एनं विन्दन्ति वेदेन तस्मार्द्वेदस्य वेदतार्।।’’

आचाय सार्यण ने भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुरूषाथचतुष्टय की प्रार्प्ति क परम सार्धन ‘वेद’ को ही स्वीकार कियार् है- ‘‘अलौकिकं पुरूषाथोपार्यं वेत्ति अनेन इति वेदशब्द निर्वचनम्।’’ स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती ने ज्ञार्न, सत्तार्, लार्भ तथार् विचार्र, इन चार्रों अर्थो को बतलार्ने वार्ली ‘विद्’ धार्तु से वेद शब्द की व्युत्पत्ति स्वीकार की है। इस धार्तु से करण और अधिकरण अर्थ में घञ् प्रत्यय करने से वेद शब्द सिद्ध होतार् है। इस प्रकार वेद शब्द क अर्थ है- जिससे सभी मनुष्य सभी सत्य विद्यार्ओं को जार्नते है, जिससे सम्पूर्ण जगत् स्थित है, जिससे लौकिक एवं पार्रलौकिक, सभी प्रकार के सुख प्रार्प्त होते है, जिससे ग्रार्ह्य एवं त्यार्ज्य पदाथो क विचार्र कियार् जार्तार् है, उसे वेद कहार् जार्तार् है। इस प्रकार भार्रतीय आस्तिक परम्परार् के आधार्र पर यह निर्विवार्द रूप में स्वीकार कियार् गयार् है कि ‘वेद’ शब्द क अभिधेयाथ ‘ज्ञार्न’ है तथार् विश्व के सम्पूर्ण ज्ञार्न क उद्गम-स्थार्न भी वेद ही है।

वेद क स्वरूप

विद्वार्नों में वेद के स्वरूप के सम्बन्ध में विभीन्न मत प्रार्प्त होते है। बौधार्यनगृह्यसूत्र में मन्त्र और ब्रार्ह्मण दोनों ही वेद कहे गये है। कात्यार्यन विरचित ‘प्रतिज्ञार्परिशिष्ट’ एवं ‘सत्यार्षार्ढ़श्रौतसूत्र‘ भी मन्त्र और ब्रार्ह्मण भार्ग को ही वेद स्वीकार करते है। आचाय सार्यण ने भी मन्त्र और ब्रार्ह्मण इन दोनो को वेद मार्नार् है- ‘‘मन्त्रब्रार्ह्मणार्त्मक: शब्दरार्शिर्वेद:’’। आचाय जैमिनि ने मीमार्ंसार्-सूत्रों में मन्त्र और ब्रार्ह्मण को वेद मार्नकर उनकी प्रार्मार्णिकतार् क प्रतिपार्दन कियार् है। वार्स्तव में अठार्रहवीं शतार्ब्दी से पूर्व के सभी विद्वार्नों ने मन्त्र और ब्रार्ह्मण भार्ग को वेद स्वीकार कियार् है। वेद ऋषि-दृष्ट है, अपौरूषेय मार्ने जार्ते है। वेद के इस तथ्य को मार्नने वार्ले विद्वार्न मार्त्र मन्त्रों को ही वेद मार्नते है। उनक कहनार् है कि ऋषियों ने मन्त्रों को संहितार्पार्ठ के रूप में ही देखार् अत: संहितार्त्मक मन्त्र-भार्ग ही वेद है। ब्रार्ह्मण भार्ग तो संहितार्त्मक मन्त्रों के भार्ष्य है। पार्श्चार्त्य विद्वार्न् विल्सन और ग्रिफिथ ने भी मन्त्रों को ही वेद स्वीकार कियार् है, परन्तु मैक्समूलर महोदय क विचार्र उदार्रतार्पूर्ण है। उनके अनुसार्र वेद क अर्थ मार्त्र संहितार् नही है, बल्कि ब्रार्ह्मण, आख्यक, उपनिषद्, आदि सभी वेद कहलार्ने की योग्यतार् रखते है। वार्स्तव में वैदिक युग के सम्पूर्ण सार्हित्य संहितार्, ब्रार्ह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् को वैदिक सार्हित्य मार्नार् गयार् है। सार्थ ही सब में संहितार् ग्रन्थों के ज्ञार्न क ही सरल एवं ग्रार्ह्य रूप प्रतिपार्दित होने से सभी वेद ही है।

वेदों क चतुर्धार् विभार्जन

तप:पूत ऋषियों के अन्त:करण से उद्भूत वेद-रार्शि प्रार्रम्भ में एक थी। कालार्न्तर में महर्षि कृष्ण-द्वैपार्यन (वेदव्यार्स) ने उसक चार्र संहितार्ओं के रूप में संकलन कियार्। ये संकलन ही ऋग्वेद संहितार्, यजुर्वेद संहितार्, सार्मवेद संहितार् तथार् अथर्ववेद संहितार् कहलार्ये। उस संकलन के मूल में यार्ज्ञिक अनुष्ठार्न की प्रक्रियार् है। यज्ञ में प्रधार्नत: चार्र ऋत्विज होते है- होतार्, अध्वर्यु, उद्गार्तार् और ब्रह्मार्। होतार् नार्मक ऋत्विज् यज्ञ में ऋग्वेद क पार्ठ करके उपयुक्त देवतार्ओं को यज्ञ में बुलार्तार् है। वह यार्ज्यार् और अनुवार्क्य ऋचार्ओं क पार्ठ करतार् है। उद्गार्तार् नार्मक ऋत्विज् औदगार्त्र कर्म क सम्पार्दन सार्मवेद के मन्त्रों को गार्कर करतार् है। जिन ऋचार्ओं के उपर सार्म क गार्यन होतार् है उन्हें ‘योनि’ कहते है। सार्म क पार्रिभार्षिक नार्म ‘स्तोत्र‘ भी है। यज्ञ क प्रमुख ऋत्विज् अध्वर्यु होतार् है। वह प्रत्येक कर्म करते समय यजुर्वेद के मन्त्रों को पढ़तार् है। अध्वर्यु यजुर्वेद के मन्त्रों क उपार्ंशु रूप में पार्ठ करतार् हुआ अपने कार्यो क सम्पार्दन करतार् है। ब्रह्मार् नार्मक ऋत्विज् क कार्य यज्ञ की वार्ह्य विघ्नों से रक्षार्, स्वरों में सम्भार्वित त्रुटियों क निरार्करण तथार् अनुष्ठार्न में विविध दोषों को दूर करनार् होतार् है। इसीलिए तो यज्ञ क अध्यक्ष पद ब्रह्मार् को ही प्रदत्त है। वार्स्तव में ब्रह्मार् को ऋग्यजुस्सार्म क भी ज्ञार्तार् होनार् चार्हिए।

इस प्रकार यज्ञीय दृष्टि से इन चार्र ऋत्विजों के विविध कर्मो को दृष्टि में रखकर सम्पूर्ण वेद-रार्शि उपर्युक्त चार्र संहितार्ओं के रूप में विभार्जित है। जिन मन्त्रों में अर्थवशार्त् पार्दों की व्यवस्थार् है उन छन्दोवद्ध मन्त्रों को ‘ऋक्’ कहार् जार्तार् है। ऋचार्ओं पर गार्ये जार्ने वार्ले गार्यन को सार्म कहते है5। गद्यमय मन्त्रों को यजुष् कहते है, अर्थार्त् जो मन्त्र ऋचार्ओं और सार्मो से व्यतिरिक्त स्वरूप वार्ले है, वे यजुष कहलार्ते है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि पार्दवद्ध मन्त्रों क संकलन ऋग्वेद, सार्मयुक्त मन्त्रों क संकलन सार्मवेद, गद्यमय मन्त्रों क संकलन ही यजुर्वेद है। इस प्रकार स्वरूप की दृष्टि से तीन ही वेद हुए। परन्तु सम्पूर्ण सार्मवेद में मार्त्र 75 मन्त्रों को छोड़कर शेष सभी मन्त्र ऋग्वेद से उद्धृत है। ऐसार् अनेक विद्वार्न स्वीकार करते है जबकि 99 ऐसे मन्त्र है जो एकदम नवीन है। हो सकतार् है, ये नवीन मन्त्र ऋग्वेद की अनुपलब्ध शार्खार्ओं से संकलित किये गये हों। इसी प्रकार यजुर्वेद में गद्यमय मन्त्रों के अतिरिक्त पार्दबद्ध पद्यमय मन्त्र भी पार्ये जार्ते है। हो सकतार् है, उनके पार्ठ करने की प्रणार्ली गद्यमय ही स्वीकार्य हो। अब प्रश्न यह है कि ऋग्यजुस्सार्म रूप वेदत्रयी के अतिरिक्त चतुर्थ संहितार् यथर्ववेद क उद्भव क्यों और किस प्रकार हुआ। इस प्रश्न के उत्तर में कहार् जार् सकतार् है कि जीवन को सुचार्रू रूप से चलार्ने के लिए ऐहलौकिक एवं पार्रलौकिक दोनो प्रकार के सुख-सार्धन आवश्यक है तथार् आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यार्त्मिक, तीनों प्रकार के दु:खों से मुक्ति प्रार्प्त करनार् भी आवश्यक है। ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सार्मवेद के मार्ध्यम से पार्रलौकिक सुख-समृद्धि तो प्रार्प्त हो सकती है, आधिदैविक एवं आध्यार्त्मिक दु:ख भी दूर हो जार्ते है परन्तु ऐहलौकिक सुख की प्रार्प्ति तथार् आधिभौतिक दु:ख क निवार्रण प्रत्यक्षरूपेण नही हो सकतार्। अत: ऋषियों ने इन उद्देश्यों की सद्य: पूर्ति के लिए अथर्ववेद क पृथक् संकलन कियार्।

वेदवार्ची शब्द

‘वेद’ के पर्यार्यवार्ची शब्दों में श्रुति, आम्नार्य, त्रयी, छन्दस्, स्वार्ध्यार्य, आगम और निगम मुख्य है। यहार्ँ इन शब्दों के अर्थ के विषय में विवेचन करनार् अप्रार्संगिक नही होगार्। ‘श्रुति’ शब्द क अर्थ है श्रवण कियार् यार् सुनार् हुआ। यह शब्द ‘श्रु’ धार्तु से ‘क्तिन्’ प्रत्यय लगकर बनार् है। प्रार्चीन काल में गुरूपरम्परार् से शिष्यगण सुनकर यार्द करते थे, इसीलिए वेद को श्रुति कहार् गयार्। निरूक्त में मन्त्रब्रार्ह्मणार्त्मक वेद के लिए ‘श्रुति’ शब्द क प्रयोग मिलतार् है। वेद के लिए ‘अनुश्रव’ शब्द भी श्रुति क समार्नार्थ्र्ार्ी है। स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती के अनुसार्र वेद को श्रुति इसीलिए कहार् जार्तार् है कि लोग इससे सभी प्रकार के ज्ञार्न-विज्ञार्न को सुनते हैं। इनके अनुसार्र केवल मन्त्र-भार्ग ही ‘श्रुति’ है।

वेद को आम्नार्य भी कहार् गयार् है। ‘आम्नार्य’ पद आ उपसर्ग पूर्वक ‘म्नार् अभ्यार्से’ धार्तु से निष्पन्न है। इसक अर्थ है, जो ग्रन्थ अभ्यार्स के द्वार्रार् कथित हो वह आम्नार्य कहलार्तार् है। गुरूमुख द्वार्रार् बार्र-बार्र अभ्यार्स करार्ये जार्ने के कारण वेदों को आम्नार्य कहार् जार्तार् है। ‘त्रयी’ शब्द भी वेद क समार्नाथक है। वार्स्तव में ऋक्, यजुष् और सार्म को ही त्रयी कहते है। परन्तु इससे ऐसार् समझनार् भ्रमपूर्ण होगार् कि अथर्ववेद त्रयी नही है, क्योंकि अथर्ववेद में भी ऋक् और यजुष् मन्त्र हैं। ऋक्, यजुष् और सार्म क अर्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सार्मवेद ही नहीं समझनार् चार्हिए। ऋक् तो ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वेदों में भी हैं। इसी प्रकार यजुष् अथर्ववेद में भी हैं। वर्णित है कि जिन मन्त्रों में पार्दव्यवस्थार् हो वे ऋक् है तथार् गद्यमय मन्त्र ही यजुष् हैं। षड्गुरूशिष्य ने सर्वार्नुक्रमणी की वृत्ति में वेद की चार्रों संहितार्ओं को त्रयी मार्नार् है। वेद के पर्यार्य के रूप में ‘छन्दस्’ यार् चन्द शब्द क भी अनेक ग्र्रन्थों में प्रयोग प्रार्प्त होतार् है। अष्टार्ध्यार्यी में ‘बहुलं छन्दसि’ सूत्र अनेक बार्र आयार् है जिससे ‘छन्दसि’ शब्द क अर्थ ‘वेद’ में है। निरूक्त के रचयितार् यार्स्काचाय ने ‘छन्द आच्छार्दने’ धार्तु से इस शब्द को निष्पन्न मार्नार् है। यार्स्क के निर्वचन क आधार्र मैत्रार्यणी-संहितार्, तैत्तिरीय-संहितार्, छार्न्दोग्य ब्रार्ह्मण एवं जैमिनि ब्रार्ह्मण आदि वैदिक ग्रन्थ ही है। शतपथ-ब्रार्ह्मण में छन्दस् शब्द क निर्वचन ‘छन्द प्रीणने’ धार्तु से कियार् गयार् हैै। छन्द क अर्थ है- बन्धन। अर्थार्त् निश्चित नियम में बंधे हुए शब्द-समूह को छन्दस् कहते हैं। कुछ विद्वार्न् पूजार् अर्थ में पठित छन्द यार् छद् धार्तु से छन्दस् शब्द को निष्पन्न मार्नते है। इनके अनुसार्र वेद मन्त्रों को ‘छन्दस्’ इसलिए कहार् जार्तार् है कि इन्हीं के द्वार्रार् देवतार्ओं की पूजार् होती है। अथवार् हमार्रे द्वार्रार् पूजनीय होने के कारण भी वेद छन्दस् हैं। वेद के स्वरूप के विषय में जब से ‘मन्त्रब्रार्ह्मणयोर्वेदनार्मधेयम्’ की धार्रणार् प्रबल हुई तब से ‘छन्दस्’ के द्वार्रार् ब्रार्ह्मण-ग्रन्थों क भी ग्रहण कियार् जार्ने लगार्। पार्णिनि ने मन्त्र और ब्रार्ह्मण दोनों के लिए ‘छन्दस्’ शब्द क प्रयोग कियार् है। परवर्ती आचायो ने कल्पसूत्र आदि ग्रन्थों में भी छन्दस्त्व स्वीकार कियार् है।

‘स्वार्ध्यार्य’ शब्द क अर्थ भी वेद ही है। स्वार्ध्यार्यो•ध्येतव्य:, स्वार्ध्यार्यार्न्मार् प्रमद: आदि वेदवार्क्यों में ‘स्वार्ध्यार्य’ शब्द क अर्थ वेद ही है। मनुस्मृति में स्पष्टत: कहार् गयार् है कि ब्रार्ह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि द्विजार्तियों के लिए वेद क स्वार्ध्यार्य अपरिहाय है, अत: स्वार्ध्यार्य क अर्थ भी वेद हो गयार्। उस समय वेदार्तिरिक्त कोई विषय स्वार्ध्यार्य के लिए स्वीकृत नही थार्। पश्पशार्ह्निक में ‘‘रक्षोहार्गमलघ्वसंदेहार्: प्रयोजनम्।’’ इस वार्क्य में ‘आगम’ शब्द वेद के पर्यार्यवार्ची रूप में प्रयुक्त हुआ है। सार्ंख्यकारिक की छठी कारिक में ईश्वरकृष्ण ने ‘‘तस्मार्दपि चार्सिद्धं परोक्षमार्प्तार्गमार्त्’’ के द्वार्रार् भी मन्त्रब्रार्ह्मणार्त्मक वेद के लिए ‘आगम’ शब्द क प्रयोग कियार् है। स्यर्तव्य है कि कालार्न्तर में तन्त्र के लिए एवं एक विशेष प्रकार के धामिक सम्प्रदार्य के सार्हित्य के लिए भी ‘आगम’ शब्द क प्रयोग होने लगार्, जैसे शैव आगम, वैष्णव आगम, जैन आगम एवं बौद्ध आगम आदि। वेद के लिए ‘निगम’ शब्द क प्रयोग भी प्रार्य: कियार् जार्तार् है। यार्स्क ने निरूक्त में जितने उदार्हरण वेदों से दिये हैं उनमें प्रार्य: सर्वत्र ‘निगम’ शब्द क प्रयोग कियार् है। यह शब्द उन स्थलों पर ‘वेद’ क ही वार्चक है। आगम और निगम दोनों ही पद-रचनार् एवं अर्थ की दृष्टि से लगभग समार्न ही हैं। अन्तर मार्त्र ‘आ’ और ‘नि’ उपसर्गो क है। ‘आ’ क अर्थ है मर्यार्दार्, सीमार्, और ‘नि’ क अर्थ है निश्चित रूप से। इस प्रकार जो ग्रन्थ सब ओर से ऐहिक तथार् आमुष्मिक सुख को प्रार्प्त करार्वे वह आगम, तथार् जो ग्रन्थ निश्चित रूप से ऐहिक तथार् आमुष्मिक सुख की प्रार्प्ति के सार्धनभूत उपार्यों क ज्ञार्न करार्वे उसे निगम कहते हैं।

वेदों के भार्ग

प्रत्येक ‘वेद’ के मुख्य चार्र विभार्ग है- संहितार्, ब्रार्ह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद।

संहितार्

संहितार् ग्रन्थों में मन्त्रों क संकलन है। ऋग्वेद के मन्त्रों को ‘ऋचार्’ यार् ‘ऋक्’, सार्मवेद के मन्त्रों को ‘सार्म’, यजुर्वेद के मन्त्रों को ‘यजुष्’ कहते है एवं अथर्ववेद के मन्त्रों को भी इन्ही से अभिहित कियार् जार्तार् है। सार्मवेद में ऋग्वेद के ही मन्त्र, जिनको सस्वर लय एवं तार्ल से गार्यार् जार् सके, संकलित किये गये है। इसमें मार्त्र 78 यन्त्र ऋग्वेद से नही लिए गये हैं। अथर्ववेद के भी लगभग 1200 मन्त्र ऋग्वेद से किए गये है, शेष मन्त्र स्वतन्त्र हैं।

ब्रार्ह्मण

ब्रार्ह्मण-ग्रन्थों में कर्मो तथार् विनियोगों के अतिरिक्त मन्त्रों की व्यार्ख्यार् की गयी है। विश्व-सार्हित्य में गद्यों क प्रार्दुर्भार्व तो यजुर्वेद से ही हो जार्तार् है, परन्तु उसक विकास ब्रार्ह्मण-ग्रन्थों से प्रार्रम्भ होतार् है। सभी ब्रार्ह्मण-ग्रन्थ गद्यमय है। इनमें यज्ञों में होने वार्ले विविध-कर्मों क औचित्य ललित-कथार्ओं के मार्ध्यम से बतार्यार् गयार् है। प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्रार्ह्मण-ग्रन्थ हैं। ब्रार्ह्मण-ग्रन्थों में ही यह भी बतलार्यार् गयार् है कि यज्ञ के किस कर्म में किस मन्त्र क पार्ठ कियार् जार्नार् चार्हिए।

आरण्यक

आरण्यक अर्थार्त् जंगलों में पठनीय होने के कारण ब्रार्ह्मण ग्रन्थों के परिशिष्ट भार्ग को आरण्यक कहार् जार्तार् है। वार्नप्रस्थार्श्रम में करणीय यज्ञ, महार्व्रत एवं हौत्र आदि कर्मों, उनकी व्यार्ख्यार्ओं एवं विधियों क प्रतिपार्दन आरण्यक ग्रन्थों में कियार् गयार् है। सार्थ ही सार्थ इनमें यज्ञों की आध्यार्त्मिक व्यार्ख्यार् तथार् दाशनिक चिन्तन भी सन्निहित हैं।

उपनिषद्

वेद के अन्तिम भार्ग उपनिषद शब्द ‘उप’ और ‘नि’ उपसर्गपूर्वक ‘षद्लृ’ धार्तु से ‘क्विप्’ प्रत्यय करने पर निष्पन्न होतार् है। ‘षद्लृ’ धार्तु के चार्र अर्थ होते है- बैठनार्, नार्श करनार् (विशरण), प्रार्प्त करनार् (गति) और शिथिल करनार् (अवसार्दन)। ‘उप’ क अर्थ है समीप और ‘नि’ क अर्थ है ध्यार्नपूर्वक।

| Home |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *