वेदार्न्त दर्शन क्यार् है? –

वेदार्न्त दर्शन क्यार् है?

By Bandey

अनुक्रम

वेद के अन्तिम भार्ग को वेदार्न्त कहते हैं। वेद के दो भार्ग हैं- मंत्र और ब्रार्ह्यण ‘‘मंत्रार्ब्रार्ह्मणार्त्मको वेद:’’। किसी देवतार् को स्तुति में होने वार्ले अर्थ स्मार्रक वार्क्यार् को मंत्र कहते हैं तथार् यज्ञार्नुष्ठार्नार्दि क वर्णन करने वार्ले भार्ग को ब्रार्ह्मण कहते हैं। मंत्र समुदार्य को संहितार् कहार् जार्तार् है। ऋक, यजु, सार्म और अर्थव ये चार्र सहिंतार्यें हैं। अत: सभी वैदिक मंत्र ऋग्वेद, सार्मवेद, यजुर्वेद और अर्थवेद नार्मक संहितार्ओं में संकलित हैं। ब्रार्ह्मण भार्ग में मुख्यतार् वैदिक कर्मकाण्ड की विवेचनार् है। वेदों क अन्तिम भार्ग उपनिद् कहलार्तार् है। इसी को वेदार्न्त भी कहते हैं। उपनिषदों में अध्यार्त्म विषयक गम्भीर विवेचनार् की गयी है जो समत श्रुतियों क चरम सिद्धार्न्त है। विषय की दृष्टि से वेद के तीन भार्ग हैं- कर्म, उपार्सनार् और ज्ञार्न जिनक परिचय संहितार्, ब्रार्ह्मण तथार् अरण्यक में प्रार्प्त होतार् है। प्रार्चीन काल में अध्ययन प्रार्य: संहितार् से प्रार्रम्भ होतार् थार्। गृहस्थार्श्रम में यज्ञार्दि कर्म के लिए ब्रार्ह्यण क प्रोजन होतार् थार्। वार्नप्रस्थ और सन्यार्स में आरण्यक की आवश्यकतार् होती थी। इन्हें आरण्यक इसलिए कहार् जार्तार् थार् कि इनक प्रार्य: एकान्त निर्जन वन (अरण्य) में ही होतार् थार्। आरण्यक सार्हित्य में ही उपनिषदों में ज्ञार्न काण्ड की प्रधार्नतार् है। उपनिषद् अनेक हैं। उपनिषदों क विषय तो एक ही है, परन्तु विषय की व्यार्ख्यार् में आपार्तत: विरोधों क परिहार्र करने के लिये तथार् सभी उपनिषदों में एकवार्क्यतार् के लिये बार्दरार्यण व्यार्स ने ब्रहार्सूत्रों क निर्मार्ण कियार्। इसे वेदार्न्त-सूत्र, शार्रीरक-सूत्र, शार्रीरक मीमार्ंसार् यार् उत्तर मीमार्ंसार् आदि कहते हैं। वार्दरार्यण में भिक्षुओं यार् सन्यार्सियों के लिये ही इन सूत्रों की रचनार् की, अत: ब्रह्य-सूत्र, शार्रीरक मीमार्ंसार् यार् उत्तर मीमार्ंसार् आदि कहते हैं। वार्दरार्यण में भिक्षुओं यार् सन्यार्सियों के लिये ही इन सूत्रों की रचनार् की, अत: ब्रह्म-सूत्र को भिक्षुसूत्र को भी कहते हैं। ब्रह्मसूत्र में चार्र अध्यार्य हैं तथार् प्रत्येक अध्यार्य में चार्र पार्द हैं। इन चार्र अध्यार्यों में ‘अथार्तो ब्रह्मजिज्ञार्सार्’ आदि सूत्रों से बार्दरार्यण ने उपनिषदर्थ क विचार्र कियार् है। अत: यह वेदार्न्त कहार् जार्तार् है। ब्रह्य सूत्रों पर अपने सार्म्प्रदार्यिक अर्थ के प्रतिपार्दन के लिये अनेक आचायों में भार्ष्य लिखे, जिनक संक्षिप्त वर्णन  हैं :-

भार्ष्य भार्ष्यकार वार्द
शार्ंकर भार्ष्य श्री शंकरार्चाय अद्वैतवार्द
श्री भार्ष्य श्री रार्मार्नुजार्चाय विशिष्टार्द्वैतवार्द
भार्स्कर भार्ष्य श्री भार्स्करार्चाय भेदार्भेदवार्द
पूर्णप्रज्ञ भार्ष्य श्री मार्ध्वार्चाय द्वैतवार्द
सौरभ भार्ष्य श्री निम्बार्काचाय भेदार्भेदवार्द
अणु भार्ष्य श्री बल्लभार्चाय शुद्धार्द्वैतवार्द
शैव भार्ष्य श्री कण्ठ शैवविशिष्टार्द्वैतवार्द
श्रीकर भार्ष्य श्री पति वीरशैवविशिष्टार्द्वैतवार्द
विज्ञार्नार्मृत  विज्ञार्नार्भिक्षु अविभार्गार्द्वैतवार्द
गोविन्द भार्ष्य बलदेव अचिन्त्य भेदार्भेदवार्द

इन सभी भार्स्करों ने अपनी-अपनी दृष्टि से वेदार्न्त क प्रतिपार्दन कियार् है तथार् अपने भार्ष्य को ही यथाथ श्रुतिमूलक बतलार्यार् है। परन्तु सभी भार्ष्यों में शार्ंकरभार्ष्य सर्वोपरि मार्नार् जार्तार् है।


अद्वैत वेदार्न्त के प्रमुख आचाय

महर्षि बार्दरार्यण ने उपनिषद् के सिद्धार्न्तों को सूत्र रूप दियार्। इसे वेदार्न्त सूत्र कहते हैं। परन्तु बार्दरार्यण के पूर्व भी कुछ आचायो ने वेदार्न्त सिद्धार्न्त को संकलित कियार् है। ब्रह्मसूत्र में इन आचायों क उल्लेख हुआ है- बार्दरि, काष्र्णार्जिनि, आत्रेय, औड्डलोभि, आश्मार्रथ्य, कशकृत्सन, जैमिनि और काश्यप आदि के नार्म उल्लेखनीय है।

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