वृक्क की संरचनार् एवं कार्य

मार्नव शरीर की उदरीय गुहार् के पश्च भार्ग में रीढ के दोनों ओर दो वृृक्क स्थित होते हैं। ये बैगंनी रंग की रचनार्यें होती है जो आकार में बहुत बडी नहीं होती है। इन वृृृक्कों के पर टोपी के समार्न अधिवृक्क ग्रन्थियार्ं नार्मक रचनार् पार्यी जार्ती हैं। ये वृक्क शरीर में रक्त को छार्नकर, रक्त की अशुद्वियों को मूत्र के रुप में शरीर से उत्सर्र्जित करने क कार्य करती हैं। वृक्कों क कार्य मार्त्र रक्त को छार्नकर मूत्र निमाण ही नही होतार् अपितु इनक कार्य शरीर में जल, शर्करार् तथार् खनिज लवणों आदि शरीरोपयोगी तत्वों क शरीर में समअनुपार्त बनार्ये रखनार् होतार् है। वृक्क शरीर में स्थित अनार्वश्यक तत्वों को बार्हर निकालकर शरीर में समस्थिति (Homeostsis) बनार्ने क महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

वृक्क प्रतिक्षण क्रियार्शील रहते हुए रक्त को छार्नने की क्रियार् में लगे रहते हैं। ये वृक्क चयार्पचय क्रियार् में उत्पन्न हुए उत्सर्जी पदाथो को छार्नकर मूत्र क निमाण करते हैं। इसके सार्थ सार्थ वृक्क रक्त में उपस्थित अन्य हार्निकारक पदाथो को भी मूत्र के सार्थ शरीर से उत्सर्जित करते हैं। इन वृक्कों की कार्यकुशलतार् एवं कार्यक्षमतार् पर आहार्र विहार्र सीधार् प्रभार्व रखतार् है। आहार्र में उत्तेजक पदाथ, मिर्च मसार्ले एवं मार्ंसार्हार्री पदाथो क प्रयोग करने से इन वृक्कों पर नकारार्त्मक प्रभार्व पडतार् है। धूम्रपार्न, एल्कोहल तथार् दवाइयों क अधिक सेवन के दुष्प्रभार्वों से शरीर को बचार्ने में वृक्काणुओं को अधिक कार्य करनार् पडतार् है इस कार्य में ये वृक्काणु नष्ट हो जार्ते हैं, जिससे वृक्कों की कार्य क्षमतार् कम हो जार्ती है। यदि इसके उपरार्न्त भी इन हार्निकारक पदाथो क प्रयोग बन्द नही कियार् जार्तार् तब ये वृक्काणु अक्रियार्शील होकर अपनार् कार्य बन्द कर देते हैं। यह अवस्थार् किडनी (Renalfailure) कहलार्ती है। जिसमें वृक्कों में रक्त निस्यन्दन की क्रियार् बन्द हो जार्ती है।

वृक्क की संरचनार्

वृक्क की संरचनार् को हम दो भार्गों में बार्ंट सकते है -1- वृक्क की बार्ह्य संरचनार् 2- वृक्क की आन्तरिक संरचनार्

1. वृक्क की बार्ह्य संरचनार्

वृक्क की बार्ह्य संरचनार्

मार्नव शरीर में उदरीय गुहार् के पश्च भार्ग में रीढ के दोनों ओर एक जोडी वृक्क जार्यी जार्ती हैं। एक वयस्क मनुष्य में वृक्क क भार्र 140 से 150 ग्रार्म के मध्य होतार् है। प्रत्येक वृक्क की लम्बाइ 10 से 12 सेमी0 के मध्य एवं चौडाइ 5 से 6 सेमी0 के मध्य होती है। ये वृक्क देखने में सेम के बीज के समार्न आकृति वार्ले होते हैं। इन दोनों वृक्कों में बार्एं वृक्क की तुलनार् में दार्हिनार् वृक्क अपेक्षार्कृत आकार में छोटार् एवं अधिक फैलार् हुआ अर्थार्त मोटार् होतार् है। यह दार्हिनार् वृक्क कुछ नीचे की ओर एवं बार्यार् वृक्क पर की ओर फैलार् होतार् है। इन वृक्कों क भीतरी किनार्रार् अवतल एवं बार्हरी किनार्रार् उत्तल होतार् है एवं इनक मध्य भार्ग गहरार् होतार् है। वृक्कों क मध्य भार्ग हार्यलम कहलार्तार् है, इस मध्य भार्ग से ही रक्त वार्हिकाएं वृक्कों में प्रवेश करती है एवं मूत्रवार्हिकाएं बार्हर निकलती हैं। वृक्क क ऊपरी सिरार् उध्र्व ध्रुव एवं निचलार् सिरार् निम्न ध्रुव कहलार्तार् है। प्रत्येक वृक्क के ऊपरी धु्रव पर एकएक अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal Gland) उपस्थित होती है। प्रत्येक वृक्क कैप्सूल के एक आवरण में लिपटार् रहतार् है। यह कैप्सूल तन्तु उतक से बनार् होतार् है, जिसे वृक्कीय सम्पुट ( Renal capsule) कहार् जार्तार् है इस कैप्सूल में वसार् संचित रहती है जिससे यह गद्दी की तरह कार्य करतार् हुआ वृक्कों को बार्ह्य आधार्तों एवं चोटों से सुरक्षित रखने क कार्य करतार् है।

2. वृक्क की आन्तरिक संरचनार्

वृक्क की आन्तरिक संरचनार्

वृक्क की आन्तरिक संरचनार् तीन भार्गों मे बटी होती है – 1- वृक्कीय श्रोणि (Renal pelvis) 2-वृक्कीय अतस्थार् (Renal medulla) 3- वृक्कीय प्रार्न्तस्थार् (Renal cortex)

  1. वृक्कीय श्रोणि :- यह वृक्क क सबसे आन्तरिक भार्ग होतार् है यहीं से मूत्रनली बार्हर की ओर निकलती है। इस स्थार्न पर संचार्यक स्थार्न (Collecting space) होतार् है। 
  2. वृक्कीय अन्तस्थार् :- यह वृक्क क मध्यभार्ग होतार् है जिसे 8 से 18 तक की संख्यार् में वृक्कीय पिरार्मिड्स पार्ये जार्ते हैं। ये पिरार्मिड्स शंकु के आकार के होते हैं तथार् वृक्कीय श्रोणि में आकर खुलते हैं। इन पिरार्मिड्स में स्थित नलिकाएं मूत्र के पुन: अवशोषण की क्रियार् में भार्ग लेती हैं।
  3. वृक्कीय प्रार्न्तार्स्थार् :- यह वृक्क क सवसे बार्हरी भार्ग होतार् है जो वृक्कीय सम्पुट के सार्थ जुडार् होतार् है अर्थार्त यह भार्ग वृक्क के बार्हरी आवरण से जुडार् होतार् है। वृक्क के इस भार्ग में नलिकाएं गुच्छों के रुप में अथवार् जार्ल के रुप में फैली होती हैं।

वृक्क क निर्मार्ण करने वार्ली कोशिकाएं वृक्काणु अथवार् नेफ्रार्न (Nephrons) कहलार्ती है अर्थार्त वृक्काणु वृक्कों की मूल रचनार्त्मक एवं क्रियार्त्मक इकार्इ होती है तथार् प्रत्येक वृक्काणु स्वतंत्र रूप से कार्य करने वार्ली इकार्इ होती है। वृक्काणुओं की रचनार् इतनी अधिक छोटी होती है कि इन्हें ऑखों से नहीं देखार् जार् सकतार् बल्कि इन्हें सूक्ष्मदश्र्ार्ी की सहार्यतार् से ही देखार् जार् सकतार् है, इसलिए इन्हें सूक्ष्मदश्र्ार्ी इकार्इ (Microscopic unit) कहार् जार्तार् है। प्रत्येक वृक्क क निर्मार्ण 10 से 13 लार्ख वृक्काणुओं के मिलने से होतार् है। वृक्क की कार्य क्षमतार् एवं कार्यकुशलतार् इन वृक्काणुओं की क्रियार्शीलतार् पर निर्भर करती है तथार् 45 से 50 वर्ष की आयु के उपरार्न्त इन वृक्काणुओं की संख्यार् लगभग एक प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से घटने लगती है इसक प्रभार्व वृक्कों की कार्यक्षमतार् पर पडतार् है तथार् इसके परिणार्म स्वरूप रक्त छार्नने (Filtration) एवं मूत्र निर्मार्ण (Urine formation) की क्रियार् धीमी पडती है। यही कारण होतार् है कि 50 वर्ष से अधिक उम्र होने पर आहार्र एवं विहार्र में अधिक नियम सयंम की आवश्यक्तार् पडती है। इस अवस्थार् में विकृत आहार्र लेने से रक्त में विकृति उत्पन होने पर वृक्क रक्त को पुन: शुद्ध बनार्ने में सक्ष्म नही हो पार्ते तथार् शरीर रोगों से ग्रस्त हो जार्तार् है।

अब आपके मन में इन वृक्काणुओं को जार्नने की जिज्ञार्सार् निश्चित ही बढ गयी होगी। वृक्क में दो प्रकार के वृक्काणु उपस्थित होते हैं। वृक्क में वृक्काणुओं क वह वर्ग जो प्रतिक्षण क्रियार्शील रहतार् है एवं संख्यार् में बहुत अधिक वृक्क के लगभग दो तिहाइ भार्ग में फैले होतार् है कोर्टिकल नेफ्रार्न कहलार्तार् है जबकि वृक्क में उपस्थित वृक्काणुओं क वह वर्ग जो केवल विशेष परिस्थिति अर्थार्त तनार्व व दबार्व मे ही क्रियार्शील होतार् है, जक्स्टार्मेड्यूलरी नेफ्रार्न कहलार्तार् है। इन जक्स्टार्मेड्यूलरी नेफ्रार्न की संख्यार् अपेक्षार्कृत कम होती है।

प्रत्येक वृक्काणु की रचनार् को दो भार्गों में बार्ंटार् जार्तार् है-1- केशिक गुच्छीय (Glomerular) 2- वृक्कीय नलिक (Renal tubule)

  1.  केशिक गुच्छीय – इसे मार्लपीजी क पिण्ड (Malpighian body) भी कहार् जार्तार् हैै। यह वृक्काणु क आरम्भिक भार्ग है जो गुच्छे के रूप में होतार् है। यह कप (प्यार्ले) के समार्न रचनार् बनार्कर रक्त निस्यन्दन (Filteration) की क्रियार् में भार्ग लेतार् है। वृक्काणुओं क यह भार्ग चार्य की छलनी के समार्न एक जार्लनुमार् रचनार् क निमाण करतार् है। इस छलनीनुमार् रचनार् से जब रक्त छनतार् है तब रक्त में उपस्थित जल एवं घुलनशील लवण (ग्लूकोज, यूरियार्, एमनो अम्ल आदि) तो इनमें से छन जार्ते हैं जबकि बडे प्रोटीन के अणु इनमें से नहीें गुजर पार्ते है यह क्रियार् केशिक गुच्छीय निस्यन्दन (Glomerular Filtration) कहलार्ती है। यह रक्त छार्नने क प्रथम चरण है, जिसमे रक्त से उपयोगी शर्करार् एवं लवण आदि छन जार्ते है। इन छने हुए पदाथो क वृक्क में पुन: अवशोषण कियार् जार्तार् है।
  2. वृक्कीय नलिक – यह वृक्काणु क ऐंठार् हुआ कुण्डलार्कार भार्ग होतार् है। यह भार्ग अग्रेंजी भार्षार् के अक्षर यू के आकार की रचनार् बनार्तार् है। इस रचनार् को हेनले क लूप (loop of Henle) कहार् जार्तार् है। यहार्ं वृक्काणु की एक भुजार् पहले नीचे की ओर आती है तथार् फिर उपर की ओर जार्ती है। वृक्कीय नलिक के इस भार्ग में गुच्छीय निस्यन्दन से छनकर आये द्रव से पुन: अवशोषण की क्रियार् होती है, इस क्रियार् के अन्तर्गत जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल एवं शरीर के लिये उपयोगी खनिज लवणों क पुन: अवशोषण कर लियार् जार्तार् है। पुन: अवशोषण के उपरार्न्त ये उपयोगी पदाथ पुन: रक्त में मिलार् दिये जार्ते हैं जबकि निस्यन्दन के परिणार्मस्वरुप उत्पन्न अंश को वृक्कीय श्रोणि में भेज दियार् जार्तार् है। यहार्ं से यह मूत्र की संज्ञार् ग्रहण कर लेतार् है। यह मूत्र वृक्कीय श्रोणि से मूत्रनलिक में एवं मूत्रनलिक से मूत्रार्शय में चलार् जार्तार् है।

वृक्कों की क्रियार्विधि

वृक्कों में महार्धमनी (Aorta) रक्त लेकर आती है तथार् अनेकों शार्खार्ओं मे विभार्जित हो जार्ती है। ये शार्खार्एं पहले केशिक गुच्छीय के छलनीनुमार् भार्ग से होकर गुजरती है। यहार्ं पर रक्त को छार्नकर उससे अशुद्धियार् अलग कर दी जार्ती है यह क्रियार् गुच्छीय निस्यन्दन (Glomerular Filtration) कहलार्ती है। आगे पुन: वृक्क नलिक हेनले लूप से होकर निकलती है तथार् यहार्ं पर एक बार्र पुन: पूर्व में छने पदाथो को छार्नार् जार्तार् है, यह क्रियार् पुन: अवशोषण कहलार्ती है अर्थार्त वृक्कों में रक्त दो बार्र छनतार् है। इस प्रकार दो बार्र छार्नने के उपरार्न्त रक्त में स्थित यूरियार्, अमोनियार्, क्रिएटीन, सल्फेट, फार्स्फेट तथार् अतिरिक्त शर्करार् आदि पदाथ अलग कर दिये जार्ते हैं। ये पदाथ जल के सार्थ घुले हुये अर्थार्त द्रव अवस्थार् में होते है एवं वृक्क के वृक्कीय श्रोणि नार्मक भार्ग में इकठ्ठार् कर दिये जार्ते है। यहार्ँ से ये पदाथ मूत्र के रुप में मूत्र नली के द्वार्रार् वृक्कों से बार्हर निकलते हैं एवं मूत्रार्श्य नार्मक अंग में जार्कर भर जार्ते है। इस प्रकार ये वृक्क प्रतिक्षण रक्त को छार्नने के कार्य में लगे रहते हैं। सार्मार्न्य परिस्थितियों में एक स्वस्थ मनुष्य के वृक्क प्रतिमिनट 125 उस की दर से छार्नते रहते हैं। रक्त छार्नने की इस दर पर देश, काल एवं परिस्थितियार्ं अपनार् प्रभार्व रखती है तथार् यह दर घटती एवं बढती रहती है।

वृक्कों के कार्य

वृक्क मार्नव शरीर के विशिष्ट आन्तरिक अंग होते हैं जो महत्वपूर्ण कार्य करते है।

1. रक्त को छार्नकर मूत्र निमाण करनार्  

वृक्क क सबसे मुख्य कार्य रक्त को छार्नकर रक्त में उपस्थित उत्सर्जित पदाथों को अलग करनार् होतार् है। वृक्क इन वज्र्य पदाथो को रक्त से छार्नकर जल में घोलकर मूत्र क निमाण करतार् हैै।मनुष्य के दोनों वृक्क प्रतिदिन ( 24 घन्टे ) 150 से 180 लीटर रक्त को छार्नकर रक्त में उपस्थित शरीर के लिये अनुपयोगी पदाथो को मूत्र के रुप में अलग करने क कार्य करते हैं।

इस प्रकार एक मनुष्य प्रतिदिन 1 से 1.8 लीटर स्वच्छ , पार्रदश्र्ार्ी, हल्के पीले रंग के द्रव मूत्र क उत्सर्जन करतार् है। इस मूत्र क हल्क पीलार् रंग यूरेबिलिन नार्मक रंजक पदाथ के कारण होतार् है। मूत्र में अपनी एक विशेष एरोमेटिक गन्ध होती है। मूत्र की पी0 एच0 5.0 से 8.0 के बीच होती है, यह पी0 एच0 ग्रहण किये आहार्र के अनुसार्र परिवर्तित होती रहती है। शार्काहार्री एवं सार्त्विक आहार्र लेने वार्ले मनुष्यों क मूत्र उदार्सीन अथवार् हल्क क्षार्रीय प्रकृति क जबकि मार्ंसार्हार्री एवं मिर्च मसार्ले युक्त अम्लीय प्रकृति क आहार्र लेने वार्ले व्यक्तियों में मूत्र अम्लीय प्रकृति क होतार् है।

मूत्र में सबसे अधिक मार्त्रार् में जल होतार् है जबकि शेश पदाथो में कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदाथ होते हैं। मूत्र में उत्र्सजित होने वार्ले पदाथों में सबसे प्रमुख घटक कार्बनिक पदाथ यूरियार् होतार् है। एक मनुष्य सार्मार्न्य अवस्थार् में प्रतिदिन शरीर से 300 से 400 मिग्रार्म यूरियार् मूत्र के सार्थ उत्र्सजित करतार् है। शरीर से कम मार्त्रार् में मूत्र क उत्सर्जन ओलार्इगूरियार् (Oliguria) कहलार्तार् है जबकि शरीर से मूत्र क उत्सर्जन बिल्कुल बंद होनार् एनूरियार् (Anuria )अथवार् किडनी फैल(Renal Failure ) कहलतार् है। शरीर में बहुत अधिक मार्त्रार् में मूत्र क स्रार्वण पोलीयूरियार् (Polyuria) कहलार्तार् है।

शरीर से सार्फ स्वच्छ, दुर्गन्धहीन एवं यथोचित मार्त्रार् में मूत्र क स्रार्वण शार्रीरिक स्वार्स्थ्य को दर्शार्तार् है जबकि इसके विपरित मूत्र के सार्थ शरीरोपयोगी शर्करार्, लवणों, धार्तुओं एवं रक्त आदि क आनार् शरीर में रोग की ओर सकेंत करतार् है। शरीर से उत्सर्जित मूत्र परिक्षण के आधार्र पर शरीर की विभिन्न अवस्थार्ओं एवं रोगों की पहचार्न की जार् सकती है। इनमें से कुछ अवस्थार्ओं क वर्णन इस प्रकार है –

  1. मूत्र के सार्थ अधिक मार्त्रार् में रक्त शर्करार् (ग्लूकोज) क आनार् मधुमेह रोग क सूचक है।
  2. मूत्र के सार्थ अधिक मार्त्रार् में प्रोटीन क आनार् धार्तुक्षय अथवार् एल्बूमिनेरियार् रोग क सूचक है। 
  3. मूत्र के सार्थ अधिक मार्त्रार् में पित्त क आनार् पीलियार् रोग क सूचक है। 
  4. मूत्र में अधिक मार्त्रार् में रक्त कणों (श्वेत रक्त कणों व लार्ल रक्त कणों ) की उपस्थिति शरीर में संक्रमण रोग की सूचनार् देती है। 
  5. मूत्र में अधिक मार्त्रार् में एसीटोन क आनार् अधिक समय तक भोजन नही करने क सूचक है। 
  6. मूत्र के सार्थ जीवार्णुओं क आनार् शरीर में संक्रार्मक रोगों को दर्शार्तार् है। 
  7. जब शरीर में स्थित जीवार्णु वृक्कों को संक्रमित कर देते हैं तब वृक्कों में भयंकर वेदनार् एवं जलन होती है। वृक्कों की यह अवस्थार् वृक्क प्रदार्ह नार्मक रोग के नार्म से जार्नी जार्ती है, इस अवस्थार् में वृक्कों में शोथ उत्पन्न हो जार्तार् है। 
  8. जब वृक्क कैल्सियम के सल्फेट, क्लोरार्इड एवं फार्स्फेटों को रक्त से छार्नकर अलग तो कर देते हैं किन्तु उन्हे मूत्र के सार्थ उत्सर्जित नही कर पार्ते तब ये अकार्बनिक पर्दार्थ वृक्क में ही इकठ्ठार् होकर एक पथरी के समार्न रचनार् बनार् लेते हैं, इसे वृक्क की पथरी कहार् जार्तार् है। 
  9. जब वृक्क भलि-भार्ंति रक्त में उपस्थित यूरियार् को उत्सर्जित नही कर पार्ते तब रक्त में यूिरेक एसिड की मार्त्रार् बढनें लगती है। यह यूरिक एसिड शरीर के जोडों में एकत्र होकर जोडों क दर्द एवं सूजन गठियार् रोग कहलार्तार् है। 
  10. अत्यधिक तनार्व की अवस्थार् में वृक्कों क पूर्णतयार् निश्क्रिय हो जार्नार् किडनी फैल कहलार्तार् है। 

2. जल सन्तुलन करनार् 

वृृृक्कों क दूसरार् प्रमुख कार्य शरीर में जल की मार्त्रार् को सन्तुलित करनार् होतार् है। इसी कारण अधिक जल क सेवन करने पर मूत्र की मार्त्रार् बढ जार्ती हैं एवं मूत्र क आयतन भी बढ जार्तार् है। इसके विपरीत कम मार्त्रार् में जल क सेवन करने पर अथवार् पसीनार् अधिक निकलने पर मूत्र की मार्त्रार् घट जार्ती है, तार्त्पर्य यह कि वृक्क शरीर में जल की मार्त्रार् को सन्तुलित करने क कार्य करते हैं।

3. अम्ल क्षार्र सन्तुलन बनार्ए रखनार् 

 वृक्क शरीर में अम्ल क्षार्र सन्तुलन बनार्ने क कार्य करते हैं। अधिक मार्त्रार् में अम्लीय पदाथो को ग्रहण करने पर अनार्वश्यक तत्वों को वृक्क मूत्र के रुप में शरीर से उत्सर्जित कर देते हैं जबकि क्षार्रीय शरीर तत्वों की अधिकतार् होने पर इन तत्वों को रक्त से छार्नकर वृक्क मूत्र के सार्थ उत्सर्जित कर देते हैं।

4. रक्त शर्करार् क नियन्त्रण

रक्त शर्करार् (ग्लूकोज) क नियन्त्रण करने में वृृक्क महत्वपूर्णतार् से भार्ग लेते हैं। रक्त में 80-120 मिलीग्रार्म प्रति 100उस रक्त शर्करार् उपस्थित होती है। वृक्क से जब रक्त निस्यन्दन (filtration) की क्रियार् होती है तब इस शर्करार् को छार्नकर पुन: अवशोशित कर लियार् जार्तार् है तथार् रक्त में यह मार्त्रार् स्थिर रखी जार्ती है। रक्त में शर्करार् की यह मार्त्रार् अधिक बढने पर वृक्क अतिरिक्त मार्त्रार् की शर्करार् को मूत्र के सार्थ उत्सर्जित करते हुए रक्त में शर्करार् की मार्त्रार् को नियन्त्रित करने क कार्य करते हैं।

5. यूरियार् क नियन्त्रण

एक स्वस्थ मनुष्य के 100उस रक्त में 20-40 मिलीग्रार्म यूरियार् पार्यार् जार्तार् है। यूरियार् की यह मार्त्रार् वृक्कों द्वार्रार् नियन्त्रित की जार्ती है। इसी कारण वृक्कों की क्रियार्शीलतार् कम होने पर रक्त में यूरियार् (यूरिक एसिड) की मार्त्रार् बढ जार्ती है, इसके परिणार्म स्वरुप जोडों में दर्द एवं सूजन आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

6. सोडियम एवं कैल्सियम क नियन्त्रण

वृक्क रक्त में सोडियम एवं कैल्सियम आदि शरीरोपयोगी खनिज लवणों के स्तर को नियन्त्रित करने क कार्य करते हैं। वृक्क इन लवणों की अतिरिक्त मार्त्रार् को मूत्र के सार्थ उत्सर्जित करते हुए रक्त में इनकी मार्त्रार् स्थिर रखते हैं। छ-रक्त दार्ब नियन्त्रण: एक स्वस्थ मनुष्य क रक्त रक्तवार्हिनियों में 80-120mm of Hg के दबार्व से बहतार् है जिसे रक्त दार्ब कहार् जार्तार् है। इस रक्त दार्ब को नियन्त्रित करने में भी वृक्क भार्ग लेते हैं।

वृक्कों को प्रभार्वित करने वार्ले कारक

वृक्क प्रतिक्षण क्रियार्शील बने रहते हुए मूत्र निमाण की क्रियार् में लगे रहते है। इन वृक्कों की कार्य क्षमतार् एवं क्रियार्शीलतार् पर कुछ  कारक सीधार् प्रभार्व डार्लते हैं-

  1. जल की मार्त्रार् – शरीर मे ग्रहण की गर्इ जल की मार्त्रार् वृक्कों में मूत्र निमाण की क्रियार् को प्रभार्वित करती है। अधिक मार्त्रार् में जल सेवन करने पर मूत्र निमाण की क्रियार् बढ जार्ती है जबकि कम मार्त्रार् में जल क सेवन करने पर मूत्र की मार्त्रार् कम हो जार्ती है। इसी कारण शरीर में अशुद्वियों की मार्त्रार् बढने पर अधिक मार्त्रार् में जल क सेवन करनार् चार्हियें। इससे वृक्क अधिक क्रियार्शील होकर मूत्र के रुप में इन अशुद्वियों को बार्हर निकाल देते हैं। 
  2. वार्तार्वरण – गर्मी के दिनों में अधिक माऱ्त्रार् में पसीने के उत्पन होने के कारण ार्तार्रक्त में उपस्थित अशुद्वियार् पसीने के रुप में बार्हर निकल जार्ती है तथार् वृक्कों क कम हो जार्तार् है। इससे मू़त्र की मार्त्रार् कम हो जार्ती है जबकि सर्दी के दिनों में पसीने की मार्त्रार् कम होने पर मूत्र की मार्त्रार् बढ जार्ती है ।
  3. उत्तेजक पदाथ – उत्तेजक पदाथ जैसे चार्य, काफी, एल्कोहल व दवार्इयो के सेवन करने से वृक्क में स्थित वृक्काणु उत्तेजित हो जार्ते हैं जिससे मूत्र निमाण की क्रियार् ती्रव हो जार्ती है तथार् अधिक मार्त्रार् में मूत्र क उत्पार्दन एवं उत्र्सजन होतार् है ।
  4. शार्मक पदाथ – निकोटिन युक्त पदाथ जैसे तम्बार्कू, गुटक ,धुम्रपार्न आदि क सेवन वृक्कों में स्थित वृक्काणुओं की क्रियार् शीलतार् को कम कर देतार् है जिससे मूत्र की कम मार्त्रार् उत्सर्जित होती है ।
  5. अन्त:स्रार्वी हामोन्स – वृक्कों पर पिटयूटरी ग्रन्थि एवं अधिवृृक्क ग्रथियों से उत्पन होने वार्ले हामोन्स क प्रभार्व पडतार् है । अधिवृक्क ग्रन्थि से उत्पन्न रैनिन नार्मक हामोन वृक्कों की क्रियार्शीलतार् को बढार्कर मूत्र उत्पार्दन की क्रियार् को त्रीव करतार् है।
  6. मनोस्थिति :मन की दशार्ओं जैसे क्रोध ,भय, तनार्व एवं हिंसक वृत्ति आदि क प्रभार्व वृक्कों की क्रियार् शीलतार् पर पडतार् है। इन अवस्थार्ओं में मूत्र निर्मार्ण की क्रियार् त्रीव हो जार्ती है तथार् अधिक मार्त्रार् में मूत्र उत्सर्जित होतार् है।

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