विधिशार्स्त्र तथार् विधिक सिद्धार्न्त क अर्थ, परिभार्षार्

मनुष्य एक सार्मार्जिक प्रार्णी है तथार् समूह में रहनार् उसकी नैसर्गिक प्रवृत्ति है। यह नैसर्गिक प्रवृत्ति मनुष्य को अन्य मनुष्यों से सम्बन्ध रखने को बार्ध्य करती है। सार्मार्जिक जीवन इन्हीं संबंधों पर आधार्रित है। इन सार्मार्जिक संबंधों को व्यवस्थित रखने के लिए मनुष्य के व्यवहार्र पर नियंत्रण रखनार् आवश्यक होतार् है। यही कारण है कि विधि यार् उन नियमों क जन्म हुआ जो मनुष्य के आचरण को नियंत्रित एवं सुव्यवस्थित रख सकें तथार् समार्ज में शार्न्ति व्यार्प्त हो सके। विधि के नियम मनुष्य के पार्रस्परिक हितों की रक्षार् के लिए आवश्यक है। विधिक नियमों क जन्म किस प्रकार हुआ इस पर व्यार्पक मतार्न्तर हैं। कुछ विधिशार्स्त्री विधि के नियमों को दैवीय मार्नते हैं तथार् कछु इनको प्रार्कृतिक की संज्ञार् देते हैं। आधुनिक यगु में विधिक नियमों क निर्मार्ण रार्ज्य द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। रार्ज्य, विधिक नियमों के मार्ध्यम से नार्गरिकों को उनके कर्तव्यों एवं अधिकारों क बोध करार्ते हैं तथार् अनुचित आचरण एवं व्यवहार्र के लिए दंडित करते हैं। तार्त्पर्य है कि विधि एक ऐसार् मार्ध्यम है जिसकी सहार्यतार् से रार्ज्य नार्गरिकों के आचरण, संव्यवहार्र तथार् क्रियार् कलार्प पर नियंत्रण रखते हुए समार्ज में शार्न्ति व्यवस्थार्, की स्थार्पनार् तथार् न्यार्य प्रदार्न करतार् है।

उपरोक्त विधिक नियमों को, विधि के अध्ययन के अन्तर्गत एक पृथक विषय के रूप में स्थार्न दियार् गयार् है जिसको विधिशार्स्त्र कहार् जार्तार् है।

विधिशार्स्त्र एवं विधिक सिद्धार्न्त क अर्थ 

‘विधिशार्स्त्र‘ शब्द की उत्पत्ति दो लैटिन शब्दों ‘ज्यूरिस’ (Juris) और ‘प्रूडेंशियार्’ (Prudentia) के योग से हुर्इ है। ‘ज्यूरिस’ शब्द क अर्थ विधि से है जबकि पू्रडेंशियार् शब्द क अर्थ है ज्ञार्न। इस प्रकार विधिशार्स्त्र (Jurisprudence) क शार्ब्दिक अर्थ ‘विधि क ज्ञार्न’ है। यथाथ में यह विधि क ज्ञार्न मार्त्र न होकर विधि क क्रमबद्ध ज्ञार्न है इसीलिये सार्मण्ड (Salmond) ने विधिशार्स्त्र को ‘विधि क विज्ञार्न’ (Science of Law) निरूपित कियार् है। यहार्ँ ‘विज्ञार्न’ से आशय विषय के क्रमबद्ध अध्ययन से है। मोयली (Moyle) के मतार्नुसार्र विधिशार्स्त्र क अन्तिम लक्ष्य सार्धार्रणत: वही है जो किसी अन्य विज्ञार्न क होतार् है। यही कारण है कि विधिशार्स्त्र को विधि-सिद्धार्न्तों क सूक्ष्म एवं क्रमबद्ध अध्ययन कहार् जार्तार् है। फिट्जेरार्ल्ड (Fitzgerald) विधिशार्स्त्र को विधि के विज्ञार्न के रूप में एक विशेष प्रकार की खोजबीन यार् जार्ँच-पड़तार्ल मार्नते हैं। इस खोजबीन क उद्देश्य विधि एवं विधिक प्रणार्ली के आधार्रभूत सिद्धार्न्तों को निश्चित करनार् है। परन्तु इस खोजबीन की प्रकृति अमूर्त, सार्मार्न्य और सैद्धार्न्तिक है।

विधिशार्स्त्र (Jurisprudence) तथार् विधिक सिद्धार्न्त यार् विधि के सिद्धार्न्त (Legal theory) क प्रयोग कभी समार्न अर्थों तथार् कभी असमार्न अर्थों में हुआ है। पार्उण्ड (Pound), पैटन (Paton), डार्यस (Dias), सार्मण्ड (Salmond) आदि की विधिशार्स्त्र की पुस्तकों के शीर्षक में ‘विधिशार्स्त्र‘ शब्द क प्रयोग कियार् गयार् है जबकि फ्रीडमैन (Friedman) तथार् फिंच (Finch) की पुस्तकों क शीर्षक ‘विधिक सिद्धार्न्त’ है।

प्रथम दृश्ट्यार् दो अलग-अलग भार्वाथों के प्रयोग से प्रतीत होतार् है कि दोनों के अर्थ एवं परिक्षेत्र अलग-अलग हैं। ऐसार् विधि के विश्लेशण, विवरण एवं निरूपण के दृष्टिकोणों के कारण प्रतीत होतार् है। ऐंग्लो सैक्सन देशों तथार् ब्रिटिश कालोनियों में विधिशार्स्त्र क अर्थ एक विशेष प्रकार के विश्लेशणार्त्मक अध्ययन से लियार् गयार् है जो ताकिकतार् पर आधार्रित यथार्स्थितिवार्दी विधिक प्रणार्ली क अध्ययन प्रस्तुत करतार् है। यह बेन्थम् (Bentham), आस्टिन (Austin), केल्सन (Kelsen) की परम्परार् मार्नी जार् सकती है। यह अध्ययन शुद्धत: ताकिक एवं अनुभवार्श्रित है जिसक कार्य स्थिरतार् एवं विधिक न्यार्य निश्चित करनार् है। यह विधि के उद्देश्यों पर ध्यार्न नहीं देतार् है।

इसके विपरीत महार्द्वीपीय विधिशार्स्त्रियों क दृष्टिकोण विधिक सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार् करनार् है जिसमें दाशनिक, नैतिक एवं सार्मार्जिक प्रभार्वों क समार्वेश है। इसी कारण इहरिंग (Ihering), स्टैमलर (Stammler), ड्यूगिट (Duiguit), कोहलर (Kohler), जेनी (Geny) तथार् अमरीकी विधिशार्स्त्रियों ने सजीव विधि, सतत् परिवर्तनीय विषयवस्तु के सार्थ विधि, आवश्यकतार्ओं और हितों, सार्मार्जिक बलों तथार् प्रक्रियार् के संदर्भ में विधि की व्यार्ख्यार् की। यह अध्ययन मार्त्र विश्लेशणार्त्मक यार् संकल्पनार्त्मक (Conceptual) अध्ययन न होकर मूल्यार्ंकन एवं दाशनिक दृष्टिकोण पर आधार्रित है जिसमें नैतिक, सार्मार्जिक एवं मार्नवीय तत्वों की भूमिक को उचित स्थार्न दियार् गयार् है। फ्रीडमैन ने स्पष्ट कियार् है कि उन्नीसवीं शतार्ब्दी के पूर्व विधिक सिद्धार्न्त मुख्य रूप से दर्शन, धर्म, नीतिशार्स्त्र तथार् रार्जनीति से उत्पन्न थार् क्योंकि महार्न विधि विचार्रक प्रमुख रूप से दाशनिक, पार्दरी यार् रार्जनीतिज्ञ थे। तत्पष्चार्त ऐसे विधिक सिद्धार्न्त क अभ्युदय हुआ जो विधिक अनुसंधार्नों, प्रणार्लियों एवं व्यवसार्यिक शिक्षणों पर आधार्रित थार्। फ्रीडमैन क यह मार्ननार् है कि विधिक सिद्धार्न्त एक ओर दर्शन से जुड़ार् है तो दूसरी ओर रार्जनीतिक सिद्धार्न्त से। इसक प्रार्रम्भ कभी दर्शन से होकर रार्जनीतिक सिद्धार्न्त की सहार्यक भूमिक के सार्थ आगे बढ़तार् है तो कभी रार्जनीतिक सिद्धार्न्त से प्रार्रम्भ होकर दर्शन की सहार्यक भूमिक के सार्थ अग्रसर होतार् है। परन्तु उनके अनुसार्र विधिक सिद्धार्न्त की विचार्रधार्रार् के अन्तर्गत दर्शन के तत्वों में विश्व में मनुष्य की स्थिति क प्रतिबिम्बन और सर्वोत्तम समार्ज के लिए आवश्यक विचार्रों क समार्वेश होनार् चार्हिए। विधिक सिद्धार्न्त क मुख्य कार्य विधि की दाशनिक अवधार्रणार्ओं क परीक्षण एवं विश्लेशण है जो स्वयं दाशनिक, रार्जनीतिक एवं विभिन्न वैचार्रिक गुत्थियों से मिश्रित है। फ्रीडमैन, हाट (Hart), फुलर (Fuller), रोनॉल्ड ड्वॉरकिन (Ronald Dworkin) आदि के अध्ययन, विधिक सिद्धार्न्त क उदार्हरण है।

वार्स्तव में विधिशार्स्त्र एंव विधि के सिद्धार्न्त में अन्तर मार्त्र विचार्र तथार् भ्रम पर आधार्रित है। क्योंकि दोनों की विषयवस्तु, ध्येय और उद्देश्य पृथक्करणीय नहीं है। दोनों में कियार् जार्ने वार्लार् अन्तर मार्त्र अनुभूति (Emphasis) तथार् क्षेत्र विस्तार्र (Range) क है, विषयवस्तु (Content) क नहीं। दोनों सार्मार्न्य तौर से विधि की प्रकृति, विधि को प्रभार्वित करने वार्ले सार्मार्जिक, आर्थिक और रार्जनीति तत्वों और विभिन्न विधिक अवधार्रणार्ओं एवं सिद्धार्न्तों के मूल्यार्ंकन की तरीकों की दृष्टि से समार्न है। विधिशार्स्त्र के अद्यतन विधिशार्स्त्रियों ने इस तत्व को समझकर दोनों क समार्न अर्थ में प्रयोग कियार् है। फिन्च क मार्ननार् है कि चार्हें विधिशार्स्त्र क अर्थ विधिक अवधार्रणार्ओं यार् संकल्पनार्ओं, अधिकार, अधिपत्य, स्वार्मित्व, निगम आदि क अध्ययन मार्नार् जार्ये, चार्हे विधिक सिद्धार्न्त क तार्त्पर्य स्वयं विधि क अध्ययन मार्नार् जार्ए, दोनों में समार्नतार् है। विधिशार्स्त्र और विधि के सिद्धार्न्त के भेद को, समयगत विकास के परिप्रेक्ष्य में विधिशार्स्त्र की उदार्र परिभार्षार् कर, विश्लेशणार्त्मक दार्यरे के संकुचन से उन्मुक्ति दे कर और उद्देश्यों, मूल्यार्ंकन एवं विधि से इतर विषयों के प्रभार्व को सम्मिलित कर मिटार् दियार् गयार् है। विधिशार्स्त्र मार्त्र विधिक अवधार्रणार्ओं के विश्लेशण तक संकुचित न रह कर विधि के दर्शन को भी अध्ययन की विषयवस्तु मार्नतार् है जिसके एक दूसरे से संबंधित तीन उद्देश्य है- मूल्यार्ंकन (विश्लेशण), सार्मार्न्य संष्लेशण, और ताकिक बुद्धिपरक तरीके द्वार्रार् विधिक संकल्पनार्ओं में सुधार्र। डार्यस के अनुसार्र विधिशार्स्त्र क अध्ययन मार्त्र विधि के विवरण यार् प्रतिपार्दन (म्गचवेपजपवद) से संबंधित नहीं है बल्कि इसक अर्थ विधि के संबंध में अनुसंधार्न यार् निरूपण (Disquisition) से है।

विधिशार्स्त्र की परिभार्षार्यें 

प्रसिद्ध रोमन विधिवेत्तार् अल्पियन (Ulpian) ने ‘डार्यजेस्ट’ नार्मक अपने ग्रन्थ में विधिशार्स्त्र को उचित एवं अनुचित क विज्ञार्न (Science of just and unjust) कहार् है। यह परिभार्षार् ‘विधिशार्स्त्र‘ शब्द की उत्पत्ति की अनुकूलतार् पर प्रकाष डार्लती है, परन्तु यह इतनी अधिक व्यार्पक है कि इसे नीतिशार्स्त्र, धर्मशार्स्त्र तथार् दर्शनशार्स्त्र आदि के प्रति भी लार्गू कियार् जार् सकतार् है।

प्रसिद्ध दाशनिक सिसरो (Cicero) ने विधिशार्स्त्र की परिभार्षार् देते हुए इसे ‘ज्ञार्न क दाशनिक पक्ष’ कहार् है।

सार्मंड (Salmond) के अनुसार्र प्रार्थमिक दृष्टि से विधिशार्स्त्र में समस्त कानूनी सिद्धार्न्तों क समार्वेश है। यह विधि क ज्ञार्न है, इसलिये इसे व्यार्वहार्रिक विधि के प्रार्थमिक सिद्धार्न्तों क विज्ञार्न भी कहार् गयार् है। सार्मंड के विचार्र से विधि न्यार्यशार्स्त्रियों द्वार्रार् लार्गू की जार्ती है तथार् यह धामिक कानून यार् नैतिकतार् सम्बन्धी नियमों से भिन्न है। विधि को देश-विदेश की सीमार् में न्यार्यार्लय तथार् न्यार्यार्धिकरणों द्वार्रार् लार्गू कियार् जार्तार् है तथार् इसक उल्लंघन किये जार्ने पर शार्स्ति (Sanction) की व्यवस्थार् होती है, अत: यह व्यार्वहार्रिक ज्ञार्न की शार्खार् है।

सार्मंड ने विधिशार्स्त्र की व्यार्ख्यार् दो अर्थों में की है। विस्तृत अर्थ में विधिशार्स्त्र से उनक अभिप्रार्य नार्गरिक विधि के विज्ञार्न (Science of civil law) से है, जिसके अन्तर्गत समस्त विधिक सिद्धार्न्तों क क्रमबद्ध अध्ययन कियार् जार्तार् है। सिविल विधि से उनक आशय उस विधि विशेष से है जो किसी देश द्वार्रार् अपने निवार्सियों के प्रति लार्गू की जार्ती है और जिसे उस देश के नार्गरिक, अधिवक्तार् और न्यार्यार्लय मार्नने के लिये बार्ध्य होते हैं। इस प्रकार सार्मंड के अनुसार्र विधिशार्स्त्र ऐसी विधियों क विज्ञार्न है जिन्हें न्यार्यार्लय लार्गू करते हैं।

सार्मंड ने सिविल विधि के विज्ञार्न के रूप में विधिशार्स्त्र के निम्नलिखित तीन रूप बतार्ये हैं –

  1. विधिक प्रतिपार्दन (Legal exposition) :- इसक प्रयोजन किसी काल-विशेष में प्रचलित वार्स्तविक विधि की विषय-वस्तु क वर्णन करनार् है।
  2. विधिक इतिहार्स (Legal history) :-इसक प्रयोजन उस ऐतिहार्सिक कार्यवार्ही क वर्णन करनार् है जिससे विधि-प्रणार्ली विकसित होते हुए वर्तमार्न अवस्थार् को प्रार्प्त हुर्इ है। 
  3. विधार्यन विज्ञार्न (Science of legislation) :-इसक उद्देश्य विधि क इस प्रकार निरूपण करनार् है, जैसी कि वह होनी चार्हिए। 

सार्मंड के अनुसार्र उपर्युक्त दूसरे अर्थ में विधिशार्स्त्र की विषय-वस्तु अत्यन्त संकीर्ण है। इस अर्थ में विधिशार्स्त्र नार्गरिक विधि के प्रार्थमिक सिद्धार्न्तों क विज्ञार्न है। इससे उनक आशय विधि के उन मूलभूत सिद्धार्न्तों से है जो विभिन्न देशों की नार्गरिक विधियों क आधार्र-स्तम्भ होते हैं। इस प्रकार सार्मंड क यह स्पष्ट मत है कि विधिशार्स्त्र में विधि-विशेष क अध्ययन नहीं कियार् जार्तार्, वरन् विधियों के आधार्रभूत सिद्धार्न्तों क कार्य-कारण विषयक क्रमबद्ध अध्ययन कियार् जार्तार् है, जो किसी विषय को ‘शार्स्त्र‘ में परिवर्तित करने के लिये आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि इस दृष्टिकोण से सार्मंड की परिभार्षार् अन्य परिभार्षार्ओं की तुलनार् में अधिक सरल, स्पष्ट तथार् व्यवहार्रिक प्रतीत होती है।

आंग्ल विधि-शार्स्त्री जॉन ऑस्टिन (John Austin) ने विधिशार्स्त्र को ‘वार्स्तविक विधि क दर्शन’ कहार् है। उनके मतार्नुसार्र विधिशार्स्त्र क वार्स्तविक अर्थ है विधिक संकल्पनार्ओं क प्रार्रूपिक विश्लेशण करनार् (Formal analysis of legal concepts) परन्तु बकलैंड (Buckland) ने ऑस्टिन की इस परिभार्षार् को अत्यन्त संकीर्ण मार्नते हुए कहार् है कि वर्तमार्न समय में विधिशार्स्त्र की परिभार्षार् अधिक विस्तृत होनी चार्हिए। इस दृष्टि से जूलियस स्टोन (Julius Stone) द्वार्रार् दी गयी परिभार्षार् अधिक तर्कसंगत प्रतीत होती है। उन्होंने विधिशार्स्त्र को ‘अधिवक्तार्ओं की बार्ह्यदर्षितार्’ (Lawyer’s extroversion) निरूपित कियार् है। इसक आशय यह है कि वर्तमार्न ज्ञार्न के अन्य स्रोतों के आधार्र पर अधिवक्तार्गण विधि की अवधार्रणार्ओं, आदर्शों तथार् पद्धतियों क जो परीक्षण करते हैं, उसे विधिशार्स्त्र की विषय-वस्तु कहार् जार् सकतार् है। जूलियस स्टोन ने विधिशार्स्त्र की विषय-वस्तु को तीन वगोर्ं में विभक्त कियार् है जिन्हें क्रमश: (1) विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र, (Analytical Jurisprudence), (2) क्रियार्त्मक विधिशार्स्त्र (Functional Jurisprudence) तथार् (3) न्यार्य के सिद्धार्न्त कहार् गयार् है।

हार्लैंड (Holland) ने विधिशार्स्त्र को वार्स्तविक विधि क औपचार्रिक विज्ञार्न (formal science of positive law) निरूपित कियार् है। इस विषय के प्रति व्यार्वहार्रिक दृष्टिकोण अपनार्ते हुए उन्होंने विधिशार्स्त्र को विधि के प्रचलित नियमों, विचार्रों तथार् सुधार्रों से सम्बन्धित शार्स्त्र मार्नार् है। उनक विचार्र है कि ‘‘विधिशार्स्त्र भौतिक नियमों की बजार्य विधि के नियमों द्वार्रार् शार्स्ति होने वार्ले मार्नवीय व्यवहार्रों से ही अधिक सम्बन्ध रखतार् है।’’

उल्लेखनीय है कि हार्लैंड द्वार्रार् दी गर्इ विधिशार्स्त्र की परिभार्षार् में प्रयुक्त ‘वार्स्तविक विधि’ (Positive law) क आशय सार्मंड की परिभार्षार् में प्रयुक्त ‘सिविल विधि’ (civil law) से बहुत कुछ मिलतार्-जुलतार् है। वार्स्तविक विधि से अभिप्रार्य सार्मार्यिक सम्बन्धों को विनियमित रखने वार्ले ऐसे कानूनों से है जो रार्ज्य द्वार्रार् निर्मित होते है तथार् न्यार्यार्लयों द्वार्रार् लार्गू किये जार्ते हैं। ऐसे नियमों को ही सार्मण्ड ने व्यार्वहार्रिक विधि (civil law) कहार् है। हार्लैण्ड ने विधिशार्स्त्र को ‘औपचार्रिक विज्ञार्न’ इसलिये कहार् है क्योंकि इस शार्स्त्र में उन नियमों क अध्ययन समार्विश्ट नहीं है जो स्वयं पाथिव सम्बन्धों से उत्पन्न हुए हैं अपितु इसमें उन सम्बन्धों क अध्ययन कियार् जार्तार् है, जो वैध नियमों द्वार्रार् क्रमबद्ध रूप में संचार्ार्लित किये जार्ते हैं। इस प्रकार यह विज्ञार्न भौतिक विज्ञार्न (Material Science) से भिन्न है।

जे0सी0गे ्र (J.C. Gray) के अनुसार्र विधिशार्स्त्र विधि क विज्ञार्न है जिसके अन्तर्गत न्यार्यार्लय द्वार्रार् लार्गू किये जार्ने वार्ले क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित नियमों और उनमें सन्निहित सिद्धार्न्तों क अध्ययन कियार् जार्तार् है। ग्रे ने हार्लैण्ड द्वार्रार् दी गर्इ विधिशार्स्त्र की परिभार्षार् की आलोचनार् करते हुए उसे संकीर्ण तथार् केवल सार्ंकेतिक निरूपित कियार् है। उनक कथन है कि विधिशार्स्त्र केवल औपचार्रिक विज्ञार्न नहीं है बल्कि यह एक पाथिव विज्ञार्न भी है, अत: इसे वैध सम्बन्धों और विधिक नियमों क विज्ञार्न कहार् जार् सकतार् है।

गे ्र के अनुसार्र विधिशार्स्त्र विधि के विवेचन पर बल देतार् है, अत: इसके स्वार्भार्विक स्वरूप को हार्लंडै की परिभार्षार् तक सीमित रखनार् उचित नहीं है।

पैटन (Paton) के अनुसार्र विधिशार्स्त्र विधि अथवार् विधि के विभिन्न प्रकारों क अध्ययन है जबकि ऐलन (Allen) ने विधिशार्स्त्र को विधि के मूलभूत सिद्धार्न्तों क वैज्ञार्निक संश्लेशण कहार् है।

डार्यस ने विधिशार्स्त्र को ‘‘विधिक प्रशिक्षण एवं शिक्षार्’’ के रूप में स्वीकार कियार् है। इस दृष्टि से उन्होंने विधिशार्स्त्र में चार्र प्रमुख बार्तों क समार्वेश कियार् है जो क्रमश: इस प्रकार है-

  1. विधि सम्बन्धी संकल्पनार्एँ (concepts relating to law) 
  2. विधि की संकल्पनार् (concept of law) 
  3. विधि क सार्मार्जिक प्रयोजन (social function of law) तथार् 
  4. विधि क उद्देश्य (purpose of law)। 

विख्यार्त विधिशार्स्त्री ली (Lee) क विचार्र है कि विधिशार्स्त्र एक ऐसार् विधार्न है जो मौलिक सिद्धार्न्तों को अभिनिश्चित करने क प्रयार्स करतार् है तथार् जिसकी अभिव्यक्ति विधि में पाइ जार्ती है।

जी0डब्ल्यू0 कीटन (Keeton) ने विधिशार्स्त्र को विधि के सार्मार्न्य सिद्धार्न्तों क ज्ञार्न मार्त्र मार्नार् है। उनके मतार्नुसार्र यह शार्स्त्र विधि के सार्मार्न्य सिद्धार्न्तों क व्यार्पक अर्थ में अध्ययन करते हुए उनके क्रमबद्ध विकास क माग प्रषस्त करतार् है।

विनोग्रैडॉफ (Vinogradoff) ने विधि के प्रति ऐतिहार्सिक दृष्टिकोण अपनार्ते हुए विधिशार्स्त्र की परिभार्षार् दी है। उनके अनुसार्र विधिशार्स्त्र की उत्पत्ति रार्ष्ट्रों के इतिहार्स में उनकी वार्स्तविक विधि में पाइ जार्ने वार्ली विशमतार्ओं से हुर्इ है, जिनक उद्देश्य विधिक अधिनियमों एवं न्यार्यिक निर्णयों में निहित सार्मार्न्य सिद्धार्न्तों को खोज निकालनार् है।

समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र (Sociological Jurisprudence) के प्रणेतार् डीन रार्स्को पार्उण्ड (Dean Roscoe Pound) ने विधिशार्स्त्र की परिभार्षार् देते हुए कहार् है कि ‘‘विधिशार्स्त्र विधि क ज्ञार्न है।’’ यहार्ँ विधि से तार्त्पर्य न्यार्यिक अर्थों में है, अर्थार्त् विधिशार्स्त्र ऐसे सिद्धार्न्तों क संकलन है जो न्यार्य की स्थार्पनार् के लिये निर्मित किये गये हैं और जिन्हें न्यार्यार्लयों द्वार्रार् मार्न्य और लार्गू कियार् जार्तार् है। रार्स्को पार्उण्ड ने विधिशार्स्त्र के सार्मार्जिक पहलू पर विशेष जोर दियार् है। मार्नव-जीवन में न्यार्य की अपनी महत्तार् है। न्यार्यविहीन समार्ज में मनुष्य को जीवन निर्वार्ह करनार् कठिन हो जार्येगार्, इसलिये विधिशार्स्त्र को महत्वपूर्ण मार्नते हुए रार्स्को पार्उण्ड ने इसे न्यार्य की स्थार्पनार् करने वार्ले सिद्धार्न्तों क विज्ञार्न मार्नार् है।

विधिशार्स्त्र की प्रकृति तथार् विशेषतार्यें 

अनेक विद्वार्नों ने विधिशार्स्त्र को विधि क विज्ञार्न निरूपित कियार् है। विचार्रणीय प्रश्न यह है कि क्यार् विधिशार्स्त्र को विज्ञार्न की कोटि में रखार् जार् सकतार् है? विधिशार्स्त्र की विभिन्न परिभार्षार्ओं के अनुसार्र इसके अन्तर्गत विधि से संबंधित पहलुओं क व्यवस्थित, क्रमबद्ध तरीके से अध्ययन कियार् जार्तार् है। जैसार् कि ऑस्टिन और उसके पष्चार्त्वर्ती विधिशार्स्त्रियों ने कहार् है कि विधिशार्स्त्र में प्रथार्ओं तथार् सार्मार्जिक व नैतिक मार्न्यतार्ओं को कोर्इ स्थार्न नहीं है क्योंकि ये विधि की संकल्पनार् को धूमिल करती हैं। इसलिये प्रमार्णवार्दी विचार्रकों (Positivists) ने विधि को संप्रभु क आदेश निरूपित कियार् तार्कि उसमें निश्चिततार्, तर्कसंगततार् एवं व्यार्वहार्रिकतार् बनी रहे जो विज्ञार्न की किसी भी शार्खार् के प्रमख्ु ार् तत्व हैं। विधिशार्स्त्र के अध्ययन के प्रति अपनाइ जार्ने वार्ली यह पद्धति उसे विज्ञार्न के बहुत निकट लार्कर खड़ार् करती है।

अगस्त कॉम्टे (August Comte) ने विधिशार्स्त्र के अध्ययन में कल्पनार्ओं तथार् रूढ़िवार्दी परम्परार्ओं पर आधार्रित मार्न्यतार्ओं को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए उसके प्रति विश्लेशणार्त्मक एवं अन्वेशणार्त्मक पद्धति अपनार्एं जार्ने पर बल दियार् जो कि किसी भी विज्ञार्न के प्रमुख लक्षण होते हैं। तत्पष्चार्त् बीसवीं सदी की यथार्थर्व ार्दी विचार्रधार्रार् के प्रवर्तकों ने विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत विधि के अध्ययन को सार्मजिक परिवेश में किये जार्ने पर जोर दियार् तथार् इसी तार्रतम्य में रार्स्को पार्उंड ने विधि (जो कि विधिशार्स्त्र की विषय वस्तु है) को सार्मार्जिक यार्ंत्रिकी (Social Engineering) निरूपित कियार्। इसी विचार्रधार्रार् को आगे चलकर इहरिंग, इहर्लिच (Ehrlich), मार्क्र्स (Marx), वेबर (Weber) तथार् होम्स (Holmes) आदि ने बढ़ार्यार् तथार् विधि को सार्मार्जिक परिवर्तन क एक सषक्त मार्ध्यम निरूपित कियार्। विधिशार्स्त्र के प्रति सकारार्त्मक रूख अपनार्ये जार्ने के कारण इसे विज्ञार्न की कोटि में रखार् जार्नार् ही उचित होगार्। विधिशार्स्त्र अपनी निम्नलिखित विशेषतार्ओं के कारण विधि के अन्य विषयों से भिन्न है।

  1. विधि की अनेक तथार् अधिकतर विधार्ओं में निश्चित नियम है जो संहितार्कृत (codified) भी होते हैं। जैसे भार्रतीय संविदार् विधि के नियम यार् भार्रतीय दण्ड संहितार्। परन्तु विधिशार्स्त्र की विषयवस्तु के संबंध में इस तरह के निश्चित नियम नहीं पार्ए जार्ते हैं। 
  2. विधि के अन्य विषयों के लिए निश्चित प्रार्धिकारिक स्रोत मिल जार्ते हैं जैसे-विधार्यन, न्यार्यिक निर्णय आदि। भार्रतीय संविधार्न के अध्ययन के लिए अधिनियमित भार्रतीय संविधार्न यार् दण्ड विधि के अध्ययन के लिए अधिनियमित भार्रतीय दण्ड संहितार् प्रार्प्त है। अपकृत्य विधि मुख्यतार् प्रार्धिकारिक न्यार्यिक निर्णयों पर आधार्रित है, परन्तु विधिशार्स्त्र के संबंध में निश्चित प्रार्धिकारिक स्रोत नहीं पार्यार् जार्तार् है। 
  3. विधि पार्ठ्यक्रम के अन्य विषयों की तरह, विधिशार्स्त्र क व्यवहार्रिक समस्यार्ओं के निरार्करण में कोर्इ विशेष महत्व नहीं है। उदार्हरण स्वरूप कोर्इ संविदार् करतार् है यार् संपत्ति अन्तरण करतार् है और कोर्इ समस्यार् उत्पन्न हो जार्ती है तो उस समस्यार् क निरार्करण संविदार् विधि यार् संपत्ति अन्तरण अधिनियम क सहार्रार् लेकर न्यार्यार्लय के मार्ध्यम से कियार् जार् सकतार् है। विधिशार्स्त्र क इस प्रकार क व्यवहार्रिक महत्व नहीं है। विधिशार्स्त्र की विशेषतार् इसक सैद्धार्न्तिक होनार् है। परन्तु इसक तार्त्पर्य यह नहीं है कि विधिशार्स्त्र महत्वहीन है। वार्स्तव में विभिन्न नियमों के मूलभूत तत्वों क निर्धार्रण विधिशार्स्त्र में ही होतार् है। उदार्हरणत: संविदार् विधि में यार् संपत्ति अन्तरण में किसी पक्ष के सार्थ अन्यार्य न हो, यह मूलभूत नियम, विधिशार्स्त्र से ही उपजार् है। 
  4. विधिशार्स्त्र सभी संकल्पनार्ओं क एक मूल, सार्मार्न्य, तार्त्विक तथार् व्यार्पक चित्रण प्रस्तुत करतार् है। जैसे कि संविदार् यार् अपकृत्य विधि में देखार् जार्तार् है कि एक पक्ष क दूसरे पक्ष के विरूद्ध क्यार् अधिकार है। विधिशार्स्त्र में यह अध्ययन कियार् जार्तार् है कि अधिकार क्यार् है, इसकी विषयवस्तु, स्रोत, तत्व तथार् प्रयोजन क्यार् है। विधिशार्स्त्र इन प्रश्नों पर विचार्र करतार् है कि नियमों के लिए क्यार् तत्व अपेक्षित हैं कि विधिक नियम बन सके अथवार् वे कौन से तत्व हैं जो विधि को नैतिकतार्, शिष्टार्चार्र आदि से अलग करते हैं।

विधिशार्स्त्र क क्षेत्र 

विधिशार्स्त्र विधि क अध्ययन है जो सतत् विकासशील एवं परिवर्तनीय है अतएव विधिशार्स्त्र के क्षेत्र की सीमार् क रेखार्ंकन सरल नहीं है। विधिशार्स्त्र के अध्ययन क विस्तार्र क्षेत्र, विधि के क्रमश: विकास, विधि एवं विधिक प्रणार्ली के अध्ययन के तरीकों, विधि से संबंधित नवीन प्रश्नों एवं सार्मार्जिक चुनैतियों के सार्थ बढ़तार् जार्तार् है। संभवत: इसी कारण अमरीकी विधिशार्स्त्री कार्ल लेवेलिन (Karl Llewellyn) ने कहार् कि ‘‘विधिशार्स्त्र उतनार् ही विस्तृत है जितनी विस्तृत विधि है। यह विधि से भी ज्यार्दार् विस्तृत है।’’

विधिशार्स्त्र के क्षेत्र को अनेक विधिशार्स्त्रियों ने अपने अध्ययन के आधार्र पर अपने ढंग से प्रस्तुत कियार् है। अनिरूद्धप्रसार्द के अनुसार्र इसक विस्तार्र क्षेत्र वार्स्तविक विध्यार्त्मक विधि के अध्ययन से प्रार्रम्भ होकर विधिक समस्यार्ओं के वैज्ञार्निक अन्वेशण (Jurimatrix), विधि के संष्लेशण एवं विधिवेत्तार्ओं की वार्ह्यदर्षितार् की दूरी तय करते हुए पूर्ण अन्तर्विधार् विषय के रूप में बदल गयार् है।

ऑस्टिन और केल्सन ने कठोर रूप में कही जार्ने वार्ली विध्यार्त्मक विधि के विश्लेशण तक विधिशार्स्त्र के क्षेत्र को निश्चित कर उच्चतर विधि और नैतिकतार् को इसके क्षेत्र से बार्हर कियार्। इन विधिशार्स्त्रियों ने ‘विधि जैसी है’(Law as it is) क अध्ययन कियार् तथार् विधि की उपयोगितार्, प्रयोजन, अच्छाइ यार् बुराइ पर ध्यार्न देनार् अनार्वष्यक तथार् वर्जित मार्नार्। प्रमार्णवार्दी विचार्रधार्रार् के पष्चार्तवर्ती विचार्रकों ने विधिशार्स्त्र के क्षेत्र को इतनार् संकुचित नहीं रखार् तथार् ‘विधि कैसी होनी चार्हिए’ ;(Law as ought to be) को सम्मिलित कर विधिशार्स्त्र क क्षेत्र विस्तृत कियार्। ऐतिहार्सिक विचार्रधार्रार् के विधिशार्स्त्रियों ने समार्ज के संदर्भ में विधि के विकास को मूल्यार्ंकित कियार्। समार्ज के सन्दर्भ में विधिशार्स्त्र क अध्ययन समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र के विकास में सहार्यक सिद्ध हुआ और विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत विधि और विधिक संस्थार्ओं के सार्मार्जिक उद्भव, विधि क समार्ज पर प्रभार्व, विधि क समार्ज में कार्य और विधि की वैधतार् के सार्मार्जिक आधार्रों पर इसके क्षेत्र को विस्तृत कियार् गयार्।

विधिशार्स्त्र के अध्ययन क्षेत्र के विकासक्रम में यह अनुभव कियार् गयार् कि विधि क उद्देश्य मार्नवीय आवश्यकतार्ओं की पूर्ति एवं पार्रस्परिक हितों में संतुलन को कायम करनार् है। अत: विधि को अध्ययन की अन्य विधार्ओं के ज्ञार्न से अलग नहीं रखार् जार् सकतार् है। विधि क अन्य विधार्ओं के सार्थ मेलजोल आवष्यभार्वी हो गयार्। फ्रीडमैन ने मार्नार् कि विधिक सिद्धार्न्त क एक छोर दर्शन तथार् दूसरार् छोर रार्जनीतिक सिद्धार्न्त से जुड़ार् हुआ है। रैडक्लिफ ने स्पष्ट कियार् कि विधिशार्स्त्र इतिहार्स, अर्थशार्स्त्र, समार्जशार्स्त्र, नीतिशार्स्त्र एवं दर्शनशार्स्त्र क भार्ग है। विधिशार्स्त्र की अन्तर्विधार् अपेक्षार् के कारण ही जूलियस स्टोन (Julius Stone) ने विधिशार्स्त्र को विधिवेत्तार् की बार्ह्यदर्षितार् अर्थार्त विधि से इतर विषयों के अध्ययन से प्रार्प्त विधिवेत्तार् के ज्ञार्न के आलोक में विधि क अध्ययन मार्नार्। अन्तत: यही कहनार् सर्वार्धिक उचित होगार् कि विधिशार्स्त्र क क्षेत्र विधि पर आधार्रित होने के कारण सदैव खुले सिरे वार्लार् (Open ended) अध्ययन है। जैेस-जैसे नवीन सार्मार्जिक तथार् वैज्ञार्निक प्रवृत्तियों क विकास होगार्, वैसे-वैसे विधिशार्स्त्र के अध्ययन क क्षेत्र भी विकसित होतार् रहेगार्।

विधिशार्स्त्र के अध्ययन की विधियार्ँ 

पार्रम्परिक तौर पर विधिशार्स्त्र के अध्ययन की विश्लेशणार्त्मक, ऐतिहार्सिक, तुलनार्त्मक, नीतिशार्स्त्रीय, समार्जशार्स्त्रीय तथार् आलोचनार्त्मक विधियार्ँ मार्नी गयी हैं। विश्लेशणार्त्मक तरीके के मार्ध्यम से विधिक अवधार्रणार्ओं क ताकिक ढंग से विश्लेशण एवं उनक आपसी संबंध निश्चित कर ताकिक रूप से सुसंगत प्रणार्ली (Logically self consistent system) क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है। विधि की इस ताकिकतार् क लार्भ यह है कि विधिक व्यवस्थार् के अध्ययन में निश्चिततार् कायम की जार् सकती है। इस तरीके ने संकल्पनार्ओं की परिभार्षार् के क्षेत्र में सर्वश्रेश्ठ योगदार्न दियार् है। परन्तु इसकी कमी यह है कि यह एक समय विशेष में पाइ जार्ने वार्ली विधि क सूक्ष्मतम विश्लेशण करतार् है परन्तु विधि के भविष्यकालीन विकास के संबंध में इसक योगदार्न नगण्य है। ऐतिहार्सिक अध्ययन के तरीके में विधिक प्रणार्ली के विकास क परीक्षण कियार् जार्तार् है। यह तरीक विधि में होने वार्ले परिवर्तनों और उन तत्वों की विवेचनार् करतार् है जिन्होंने विधि के परिवर्तन को प्रभार्वित कियार् है। इस पद्धति क लार्भ है कि यह लोगों को भूतकाल की भूलों को दोहरार्ने से रोकतार् है। इस पद्धति की कमी है कि यह भूतकाल को अतिषयतार् में उचित ठहरार्ने क प्रयार्स करतार् है। तुलनार्त्मक अध्ययन की पद्धति में विधि की विभिन्न प्रणार्लियों के मध्य समार्नतार्ओं और विभेदों को उजार्गर कियार् जार्तार् हैं। नीतिशार्स्त्रीय पद्धति में विधि के उद्देश्यों को ध्यार्न में रखकर विधि की बुराइयों को दूर कियार् जार्तार् है। इसकी कमी है कि इस तरीके में विधि और नैतिकतार् क परिक्षेत्र अनिश्चित रहतार् है। समार्जशार्स्त्रीय अध्ययन के तरीके के मार्ध्यम से समार्ज के परिप्रेक्ष्य में विधि के अध्ययन क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। विधिशार्स्त्र के अध्ययन की आलोचनार्त्मक पद्धति में विधिशार्स्त्र क अध्ययन भविश्य को ध्यार्न में रखकर कियार् जार्तार् है।

वर्तमार्न समय में वैज्ञार्निक दृष्टिकोण से भौतिक विज्ञार्न के क्षेत्र में अपनार्ए गये तरीकों के मार्ध्यम से विधिशार्स्त्र क अध्ययन कियार् जार् रहार् है। जिसमें मुख्यत: दो पद्धतियार्ँ है- अनुभव निरपेक्ष (A priori) तथार् अनुभव सार्पेक्ष यार् अनुभवार्श्रित (A posteriori).

अनुभव निरपेक्ष :- यह पद्धति मार्नती है कि पहले से ही चेतनार् में निहित ज्ञार्न क अस्तित्व अनुभवजन्य ज्ञार्न के पूर्व और उससे स्वतंत्र है। काण्ट (ज्ञंदज) क यह मार्ननार् थार् कि ज्ञार्नेन्द्रियों से प्रार्प्त ज्ञार्न असत्य है। इसक परिप्रतिवर्तन करके काण्ट ने संवेदनग्रार्हितार् के (देश तथार् काल) और विवेक (कारण, आवश्यकतार्) के अनुभव निरपेक्ष रूपों को प्रार्मार्णिक ज्ञार्न के रूप में प्रस्तुत कियार्। अत: इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र मनोभार्व (Notions), तर्क वार्क्य (propositions) और मूल कल्पनार्यें (postulates) अनुभव के बिनार् सत्य और आवश्यक मार्न लिए जार्ते हैं और ये अनुभव से पूर्व हैं। दूसरे शब्दों में ये अनुभव से प्रार्प्त नहीं होते हैं फिर भी वैध मार्ने जार्ते हैं। अत्यार्धुनिक अर्थ में इसक प्रयोग उन मनोभार्वों, तर्क वार्क्यों और मूल कल्पनार्ओं के लिए कियार् गयार् है जो अध्ययन की जार् रही विधिक प्रणार्ली अथवार् विचार्रों के तरीकों से बार्हर स्थित हैं। केल्सन क ‘मूल मार्नक’ (Grund Norm) तथार् हाट क ‘मार्न्यतार् क सिद्धार्न्त’ (Rule of Recognition) इसके उदार्हरण हैं।

अनुभव सार्पेक्ष यार् अनुभवार्श्रित :- यह उस ज्ञार्न क द्योतक है जो अनुभव से प्रार्प्त होतार् है। यह अनुभव निरपेक्ष की भार्ँति मार्त्र तर्क से प्रार्प्त नहीं हो सकतार् है। इसकी सत्यतार् की परख के लिए मार्त्र तर्क पर्यार्प्त नहीं हैं। तर्क के अतिरिक्त तथ्यों यार् अनुभव क सहार्रार् लेनार् होतार् है, जो प्रत्यक्ष ज्ञार्न यार् अनुभूति, सार्क्ष्य और अन्तर्ज्ञार्न पर आधार्रित होते हैं। अनुभव निरपेक्ष तथार् अनुभव सार्पेक्ष अध्ययन के तरीकों में मूल भेद यह है कि अनुभव निरपेक्ष सार्मार्न्यीकरण से प्रार्रम्भ होतार् है जिसके प्रकाश में तथ्यों क परीक्षण कियार् जार्तार् है, जब कि अनुभव सार्पेक्ष तथ्यों से सार्मार्न्यीकरण की ओर अग्रसर होतार् है। अनुभव निरपेक्ष सार्मार्न्यीकरण को अनुभव सिद्ध खोजबीन पर बनार्यार् जार्नार् अपेक्षित है और अनुभव सिद्ध खोजबीन अक्सर प्रार्रम्भिक स्तर पर अनुभव निरपेक्ष संकल्पनार् से बहुत हद तक सहूलियत पार्ती है। अत: दोनों तरीकों क प्रयोग लगार्तार्र होतार् रहतार् है। डार्यस ने स्पष्ट कहार् है कि इन दो तरीकों में एक दूसरे की अपेक्षार् ज्यार्दार् सत्य यार् ठीक होने क प्रश्न नहीं उठतार् है और न ही उन्हें एक दूसरे से अलग रखने क प्रश्न उठतार् है। वे दोनों उपयोगी हैं और दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। प्रश्न मार्त्र यह है कि कौन ज्यार्दार् महत्वपूर्ण होगार् जो एक वरीयतार् क विषय है।

विधिशार्स्त्र क वर्गीकरण 

विधिशार्स्त्रियों ने विधिशार्स्त्र को अपनी-अपनी धार्रणार् के अनुसार्र विभिन्न वगोंर् में विभार्जित कियार् है। जॉन ऑस्टिन (John Austin) ने विधिशार्स्त्र को सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र तथार् विशिष्ट विधिशार्स्त्र के रूप में विभार्जित करते हुए यह स्पष्ट कियार् है कि दोनों के क्षेत्र भिन्न-भिन्न तथार् निश्चित हैं।

सार्मंड के अनुसार्र विशिष्ट अर्थ में विधिशार्स्त्र को तीन भार्गों में विभक्त कियार् जार् सकतार् है, जिन्हें उन्होंने क्रमश: विधिशार्स्त्र की विश्लेशणार्त्मक (Analytical), ऐतिहार्सिक (Historical) तथार् नैतिक (Ethical) शार्खार् कहार् है। विख्यार्त आंग्ल-विधिवेत्तार् जर्मी बेन्थम (Jeremy Bentham) के अनुसार्र विधिशार्स्त्र को दो भार्गों में, अर्थार्त् व्यार्ख्यार्त्मक (Expository) तथार् मूल्यार्ंकात्मक (Censorial) विधिशार्स्त्र के रूप में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है। वर्तमार्न में विधिशार्स्त्र को सार्मार्जिक अभियार्ंत्रिकी (Social Engineering) के रूप में स्वीकार कियार् गयार् है।

सार्मार्न्य एवं विशिष्ट विधिशार्स्त्र 

ऑस्टिन ने विधिशार्स्त्र को दो भार्गों में विभार्जित कियार् है- (1) सार्मार्न्य तथार् (2) विशिष्ट। उनके मतार्नुसार्र सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत विधि के उन सभी उद्देश्यों, सिद्धार्न्तों, धार्रणार्ओं और विभेदों क वर्णन रहतार् है जो समस्त विधि-प्रणार्ली में समार्न रूप से पार्ये जार्ते हैं। विधि की प्रणार्लियों से ऑस्टिन क आशय ऐसी परिपक्व और सुस्थार्पित प्रणार्लियों से है जो अपनी तर्क-शक्ति एवं परिपक्वतार् के कारण प्रौढ़ वैधार्निक व्यवस्थार् के रूप में विकसित हो चुकी हैं। यही कारण है कि सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र को सैद्धार्ंतिक विधिशार्स्त्र भी कहार् गयार् है। इसके विपरीत विशिष्ट विधिशार्स्त्र एक संकीर्ण विज्ञार्न है जिसके अंतर्गत किसी ऐसी वर्तमार्न यार् भूतकालीन विधिक-प्रणार्ली क अध्ययन कियार् जार्तार् है जो किसी रार्ष्ट्र विशेष तक ही सीमित रही है। इसीलिये विशिष्ट विधिशार्स्त्र को व्यार्वहार्रिक विधिशार्स्त्र यार् रार्ष्ट्रीय विधिशार्स्त्र भी कहार् गयार् है। ऑस्टिन ने सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र को ‘सकारार्त्मक विधि क दर्शन’ (Philosophy of positive law) कहार् है। यहार्ँ ‘दर्शन’ शब्द से उनक अभिप्रार्य वैज्ञार्निक अध्ययन से है। उनके विचार्र से सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र क आशय ऐसी विधियों के तत्वों और उद्देश्यों की विवेचनार् से है जो सभी विधिक व्यवस्थार्ओं में समार्न रूप से पाइ जार्ती है जबकि विशिष्ट विधिशार्स्त्र किसी देश-विदेश की व्यार्वहार्रिक विधिक-प्रणार्ली यार् उसके किसी अंष क विज्ञार्न है।

उल्लेखनीय है कि अनेक विधिवेत्तार्ओं ने ऑस्टिन द्वार्रार् किये गये विधिशार्स्त्र के उपर्युक्त विभार्जन की आलोचनार् की है जिनमें हार्लैण्ड तथार् सार्मण्ड प्रमख्ु ार् हैं। हार्लण्ै ड के विचार्र से विधिशार्स्त्र को सार्मार्न्य और विशिष्ट विधिशार्स्त्र के रूप में विभार्जित करनार् उचित नहीं है। उनक तर्क है कि ‘विशिष्ट विधिशार्स्त्र‘ की कल्पनार् पूर्णत: भ्रार्मक है। उनके मतार्नुसार्र ऑस्टिन ने विधिशार्स्त्र को ‘विशिष्ट’ इसलिये बतार्यार् है, क्योंकि इसकी विषय-वस्तु विशिष्ट है न कि इस कारण कि यह एक ‘विशिष्ट विज्ञार्न’ है। हार्लैण्ड क स्पष्ट मत है कि किसी विज्ञार्न क निर्मार्ण सार्मार्न्य प्रतिपार्दनों (General Propositions) से ही होतार् है। विज्ञार्न को अधिक सुदृढ़ आधार्र देने के लिये यह आवश्यक है कि वैज्ञार्निक अपने तथ्यों को अधिक विस्तृत क्षेत्र से एकत्रित करें और उनसे अपने निश्कर्श निकालें। आशय यह है कि किसी विज्ञार्न क सीमित क्षेत्र में पर्यवेक्षण करनार् उचित नहीं है। उसक क्षेत्र जितनार् विस्तृत होगार्, निश्कर्श उतने ही सही होंगे। अत: हार्लैण्ड क मत है कि ‘विधिशार्स्त्र‘ को बिनार् किसी विशेषण के ही सम्बोधित कियार् जार्नार् चार्हिए तथार् उसे विधि के आधार्रभूत सिद्धार्न्तों (Basic Principles of Law) क विज्ञार्न कहनार् अधिक उचित होगार्। अपने तर्क की पुश्टि में एक उदार्हरण देते हुए हार्लैण्ड कहते हैं कि इंग्लैण्ड क भू-गर्भशार्स्त्र (Geology) सार्मार्न्य भू-गर्भशार्स्त्र से भिन्न नहीं हो सकतार् है, क्योंकि विज्ञार्न चार्हे किसी क्षेत्र-विशेष में किये गये परीक्षण पर ही आधार्रित क्यों न हो, परन्तु उसकी विषय-वस्तु तथार् लक्षण समस्त संसार्र में एक समार्न होंगे। ठीक इसी प्रकार इंग्लैण्ड की विधि पर आधार्रित आंग्ल विधिशार्स्त्र समस्त विष्व के लिये लार्गू हो सकतार् है क्योंकि यह ब्रिटेनवार्सियों के स्वभार्व में निहित प्रवृत्तियों के अध्ययन पर अपनी विषय-सार्मग्री को आधार्रित करेगार्। ये मार्नव-प्रवृत्तियार्ँ अन्य स्थार्नों पर भी एक समार्न होंगी क्योंकि ये मार्नव-स्वभार्व से सम्बन्धित हैं, न कि मार्नव की परिस्थितियों से। परन्तु निवेदित है कि हार्लैण्ड द्वार्रार् दिये गये इस दृश्टार्न्त की साथकतार् सन्देहार्स्पद प्रतीत होती है क्योंकि सभी देशों की विधि-व्यवस्थार् एक जैसी नहीं होती। जैसार् कि ब्रार्इस (Bryce) ने कहार् है ‘‘किसी भी देश की विधि-व्यवस्थार् उस देश की आर्थिक और सार्मार्जिक परिस्थितियों क परिणार्म होती है। स्थार्नीय परिस्थितियों क प्रभार्व देश-विदेश की बौद्धिक क्षमतार् पर भी पड़तार् है जिसकी अभिव्यक्ति वहार्ँ की विधि-प्रणार्ली में मिलती है।’’

सार्मण्ड ने भी ऑस्टिन के ‘सार्मार्न्य और विशिष्ट’ विधिशार्स्त्र के भेद की आलोचनार् की है। सार्मण्ड के विचार्र से सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत विधिक सिद्धार्न्तों के सार्मार्न्य रूप क नहीं, अपितु विशिष्ट विधि पद्धति के सार्मार्न्य अथवार् मूल तत्वों क अध्ययन कियार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिये यद्यपि न्यार्यिक पूर्वोक्तियों (Judicial precedents) क प्रयोग आंग्ल-विधि व्यवस्थार् क एक प्रमुख सिद्धार्न्त है तथार्पि इस नियम को किसी भी अन्य देश की विधि-व्यवस्थार् में अपनार्यार् जार्नार् उतनार् ही उचित होगार् जितनार् कि वह इंग्लैण्ड में है। तार्त्पर्य यह है कि सार्मार्न्य विधिशार्स्त्र क प्रयोजन विधि-प्रणार्लियों क सार्मार्न्य रूप से अध्ययन करनार् ही नहीं है अपितु किसी विधि पद्धति के सार्मार्न्य एवं आधार्रभूत तत्वों क अध्ययन करनार् भी है। सार्मण्ड के इस विचार्र पर टिप्पणी करते हुए एलेन ने कहार् है कि इस दृष्टिकोण से केवल ‘विशिष्ट विधिशार्स्त्र‘ ही विधिशार्स्त्र क एकमार्त्र रूप मार्नार् जार्नार् चार्हिए।

विश्लेशणार्त्मक, ऐतिहार्सिक तथार् नैतिक विधिशार्स्त्र 

विशिष्ट अर्थ में विधिशार्स्त्र को तीन भार्गों में विभार्जित कियार् गयार् है जिन्हें सार्मण्ड ने क्रमश: विश्लेशणार्त्मक (Analytical), ऐतिहार्सिक (Historical) एवं नैतिक (Ethical) विधिशार्स्त्र कहार् है। उल्लेखनीय है कि विधि के विविध पहलुओं में इतनार् घनिश्ठ सम्बन्ध है कि इनक पृथक विवेचन करने से विधिशार्स्त्र क विषय ही अपूर्ण रह जार्येगार्। अत: विधिशार्स्त्र के अध्ययन के लिये इन तीनों क समार्वेश आवश्यक है।

विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र से आशय विधियों के प्रार्थमिक सिद्धार्न्तों क विश्लेशण करनार् है। इस विश्लेशण में उनके ऐतिहार्सिक उद्गम अथवार् विकास यार् नैतिक महत्व आदि क निरूपण नहीं कियार् जार्तार् है। विधिशार्स्त्र की इस शार्खार् के प्रणेतार् जॉन ऑस्टिन थे जिन्होंने विधि-विज्ञार्न की विभिन्न समस्यार्ओं के प्रति इस शार्खार् के विचार्रों क प्रतिपार्दन अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘प्रार्विन्स ऑफ ज्यूरिसप्रुडेन्स डिटरमिन्ड’ में कियार् जो सर्वप्रथम सन् 1832 में प्रकाशित हुर्इ थी। इस शार्खार् के अन्य समर्थक माकबी (Markby), एमॉस (Amos), हॉलैण्ड (Holland) तथार् सार्मण्ड (Salmond) हैं।

विधिक पद्धति के प्रार्थमिक सिद्धार्न्तों तथार् आधार्रभूत संकल्पनार्ओं के इतिहार्स को ‘ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र‘ कहार् गयार् है। सर्वप्रथम प्रसिद्ध विधिशार्स्त्री सैविनी ने विधिशार्स्त्र के प्रति ऐतिहार्सिक दृष्टिकोण अपनार् कर ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र क सूत्रपार्त कियार्। इंग्लैण्ड के सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) को ब्रिटिश ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र क संस्थार्पक मार्नार् जार्तार् है। इस शार्खार् क उद्देश्य विधि के उद्गम, विकास तथार् विधि को प्रभार्वित करने वार्ले विभिन्न कारकों के सार्मार्न्य सिद्धार्न्तों को प्रतिपार्दित करनार् है। इसमें उन विधिक धार्रणार्ओं तथार् सिद्धार्न्तों के उद्गम तथार् विकास क समार्वेश है जिन्हें विधिशार्स्त्र की विषय सार्मग्री में महत्वपूर्ण स्थार्न प्रार्प्त है।

विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र तथार् ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र में मुख्य भेद यह है कि विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र रार्ज्य के प्रति अपने सम्बन्ध को ही विधि क सबसे महत्वपूर्ण पहलू समझतार् है। इसके अन्तर्गत विधि को रार्ज्य के संप्रभुतार्धार्री क समार्देश (Command) मार्नार् गयार् है। इसीलिये इसे विधि की आदेशार्त्मक शार्खार् (Imperative School) भी कहार् जार्तार् है। विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र के समर्थक विधि के भूत अथवार् भविश्य पर ध्यार्न नहीं देते बल्कि वे विधि के केवल वर्तमार्न रूप क ही विश्लेशण करते हैं।

ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्री रार्ज्य के प्रति विधि के सम्बन्ध को विशेष महत्व न देकर उन सार्मार्जिक प्रथार्ओं को अधिक महत्व देते है जिनसे विधि क निर्मार्ण हुआ है। ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र समार्ज की प्रार्चीन विधिक संस्थार्ओं पर अपनार् ध्यार्न केन्द्रित करतार् है। इसके अनुसार्र आदर्श विधि एक ऐसार् रूढ़िजन्य नियम है जिसक विकास ऐतिहार्सिक आवश्यकतार् तथार् लोकप्रिय प्रणार्ली से सहज रूप में हुआ है। दूसरे शब्दों में, ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत यह अध्ययन कियार् जार्तार् है कि वर्तमार्न विधिक धार्रणार्ओं क विकास कब, कैसे और किन विभिन्न अवस्थार्ओं में हुआ तथार् इनके अस्तित्व में आने के क्यार् कारण थे? सार्थ ही यह देखनार् भी आवश्यक होतार् है कि इनक वर्तमार्न रूप क्यार् है? सार्रार्ंष यह है कि विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र वर्तमार्न कानूनी विचार्रों के विश्लेशण को महत्व देतार् है जबकि ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र इन कानूनी विचार्रों की उत्पत्ति तथार् विकास क पतार् लगार्ने की ओर ध्यार्न केन्द्रित करतार् है। इस संदर्भ में यह स्पष्ट कर देनार् उचित होगार् कि विधिक इतिहार्स (Legal History) को ही ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र (Historical Jurisprudence) मार्ननार् नितार्न्त भूल होगी। इन दोनों के क्षेत्र भिन्न हैं। विधिक इतिहार्स उन विभिन्न चरणों को प्रस्तुत करतार् है जिनसे होकर कोर्इ विधि-पद्धति विकसित होती हुर्इ वर्तमार्न स्वरूप को प्रार्प्त हुर्इ हो परन्तु ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र किसी विशेष विधिक पद्धति के इतिहार्स क विवेचन मार्त्र न होकर विधिक पद्धति के प्रार्थमिक सिद्धार्न्तों एवं उसकी आधार्रभूत धार्रणार्ओं क इतिहार्स है।

नैतिक विधिशार्स्त्र क सम्बन्ध विधि के नैतिक पहलू से है। विधि कैसी है अथवार् कैसी थी, इसक विवेचन करनार् नैतिक विधिशार्स्त्र क कार्य नहीं है वरन् इसक मुख्य कार्य यह है कि विधि कैसी होनी चार्हिए। इसक उद्देश्य न्यार्य की स्थार्पनार् से सम्बन्धित विषयों क अध्ययन करनार् है। इसीलिये सार्मण्ड ने नैतिक विधिशार्स्त्र को नीतिशार्स्त्र और विधिशार्स्त्र क सार्मार्न्य आधार्र मार्नार् है। इसके अन्तर्गत न्यार्य की धार्रणार्ओं तथार् न्यार्य और विधि के पार्रस्परिक सम्बन्धों क विवेचन कियार् जार्तार् है। नैतिक विधिशार्स्त्र क मुख्य उद्देश्य यह है कि वह विधि के लक्ष्यों क निर्धार्रण करे और उन आदर्षवार्दी तथ्यों की खोज करे जिन्हें समार्ज स्वीकार करनार् चार्हतार् है। सार्मण्ड के अनुसार्र नैतिक विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत निम्नलिखित बार्तों क समार्वेश है-

  1. विधि और न्यार्य के परस्पर सम्बन्धों क निर्धार्रण 
  2. विधि के सिद्धार्न्तों क ज्ञार्न 
  3. न्यार्य की स्थार्पनार् के लिये आवश्यक सार्धनों की खोज 
  4. न्यार्य और विधि की विषय-वस्तु और उनके क्षेत्रों क निर्धार्रण तथार् 
  5. विश्लेशण पद्धति के मूलभूत सिद्धार्न्तों के नैतिक महत्व क परिणार्म। 

संक्षेप में यह कहार् जार् सकतार् है कि यदि विश्लेशणार्त्मक विधिशार्स्त्र विधि के वर्तमार्न स्वरूप को अधिक महत्व देतार् है तो नैतिक विधिशार्स्त्र आदर्श विधि को सर्वार्धिक महत्वपूर्ण मार्नतार् है। यधपि विधि शार्स्त्र की उपर्युक्त तीनों शार्खार्एँ एक दूसरे से भिन्न हैं तथार्पि विधि शार्स्त्र के अध्ययन में इनमें से किसी की भी अनदेखी नहीं की जार् सकती अन्यथार् इस विषय क अध्ययन ही अधूरार् रह जार्येगार्।

व्यार्ख्यार्त्मक तथार् मूल्यार्ंकात्मक विधिशार्स्त्र 

सुप्रसिद्व आंग्ल- विधिवेत्तार् जर्मी बेन्थम के अनुसार्र विधिशार्स्त्र को दो भार्गों में रखार् जार् सकतार् है। व्यार्ख्यार्त्मक तथार् मूल्यार्ंकात्मक। व्यार्ख्यार्त्मक विधि शार्स्त्र इस बार्त की व्यार्ख्यार् करतार् है कि विधि क्यार् है मूल्यार्ंकात्मक विधि शार्स्त्र क उददेश्य यह स्पष्ट करतार् है कि विधि कैसी होनी चार्हिए बेन्थम ने व्यार्ख्यार्त्मक विधि शार्स्त्र को दो भार्गों में विभार्जित कियार् है-(1) प्रार्धिकारिक (Authoritative) जिसक सृजन विधार्यी शक्ति से होतार् है, अर्थार्त जिसे विधार्न मण्डल से शक्ति प्रार्प्त होती है, तथार् (2) अप्रार्धिकारिक (Unauthoritative) जो विधिक सार्हित्य से अपनी सार्मग्री प्रार्प्त करतार् है। अप्रार्धिकारिक व्यार्ख्यार्त्मक विधिशार्स्त्र को पुन: दो भार्गों में वर्गीकृत कियार् गयार् है-स्थार्नीय तथार् सावभौमिक। स्थार्नीय (Local) अप्रार्धिकारिक विधिशार्स्त्र में किसी देश-विदेश क विधि-सार्हित्य समार्विश्ट रहतार् है, जबकि सावभौमिक (Universal) अप्रार्धिकारिक विधिशार्स्त्र में समस्त विश्व की विधि-सार्मग्री क समार्वेश रहतार् है।

बेन्थम के अनुसार्र व्यार्ख्यार्त्मक विधिशार्स्त्र क संबन्ध ‘विधि जैसी है’ से है न कि ‘विधि जैसी होनी चार्हिए’ से। दूसरे शब्दों में विधि क नैतिकतार् यार् अनैतिकतार् क कोर्इ सरोकार नहीं होतार् है, वह तो केवल प्रचलित विधि के विश्लेशण से संबन्धित रहती है। बेंथम के इन विचार्रों क उल्लेख उनकी कृति-’लिमिट्स ऑफ ज्यूरिसपु्रडेंस डिफार्इन्ड’ में मिलतार् है, जो उनके द्वार्रार् सन् 1782 में लिखी गयी थी, लेकिन जिसे एवरेट (Everett) ने सन् 1945 में प्रकाशित करार्यार्। इस कृति में बेन्थम ने प्रार्कृतिक विधि की आलोचनार् करते हुए संप्रभु के आदेश को ही वार्स्तविक विधि मार्नार् तथार् इसक अनुपार्लन किये जार्ने पर बल दियार्। इस दृष्टि से यह कहनार् अनुचित न होगार् कि विधिशार्स्त्र की विश्लेशणार्त्मक विचार्रधार्रार् के वार्स्तविक प्रजनक बेन्थम थे कि न जॉन आस्टिन।

हॉलैण्ड ने विधिशार्स्त्र के उक्त वर्गीकरण की आलोचनार् करते हुए कहार् है कि विधिशार्स्त्र को इस प्रकार विशेषणों सहित सम्बोधित करनार् उचित नहीं है। उनक मत है कि वर्तमार्न विधि में सुधार्र हो सके, इस दृष्टि से इसकी आलोचनार् करनार् विधिशार्स्त्र क कार्य क्षेत्र नहीं है वरन् यह विधार्यन (Legislation) क विषय है।

समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र 

समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र की संकल्पनार् अपेक्षार्कृत आधुनिकतम है। इसक उद्भव उन्नीसवीं सदी में हुआ जब मार्नव यह अनुभव करने लगार् कि समार्ज के विकास के लिये उसे सार्मार्जिक अनुशार्सन में रहकर आपसी सहयोग क माग अपनार्नार् नितार्न्त आवश्यक है। वर्तमार्न में मनुष्य के वैयक्तिक पक्ष के बजार्य सार्मार्जिक पक्ष पर अधिक जोर दियार् जार्ने लगार् है। विधि क सार्मार्जिक परिवर्तनों से निकटतम सम्बन्ध होने के कारण वह मार्नव के इस बदले हुए दृष्टिकोण से अप्रभार्वित हुए बिनार् न रह सका। फलत: विधिशार्स्त्र की एक नर्इ पद्धति क प्रार्दुर्भार्व हुआ जो समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र के नार्म से विकसित हुर्इ। इसके अन्तर्गत विधि के सार्मार्जिक पहलू पर अधिक जोर दियार् गयार् है।

समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र को ‘हितों क विधिशार्स्त्र (Jurisprudence of Interest) भी कहार् गयार् है क्योंकि प्रत्येक सार्मार्जिक व्यवस्थार् क मुख्य लक्ष्य यही है कि मनुष्य के हितों क संरक्षण एवं संवर्धन हो सके। विधि के प्रति इस दृष्टिकोण को अपनार्ने वार्ले विधिशार्स्त्रियों क विचार्र है कि मार्नव के परस्पर विरोधी हितों में समन्वय स्थार्पित करनार् विधिशार्स्त्र क प्रमुख कार्य है। जर्मन विधिशार्स्त्री रूडोल्फ इहरिंग ने इस विचार्रधार्रार् को अधिक विकसित कियार् है। उनके अनुसार्र विधि न तो स्वतंत्र रूप से विकसित हुर्इ है और न वह रार्ज्य की मनमार्नी देन ही है। वह विवेक (Reason) पर भी आधार्रित नहीं हैं बल्कि समीचीनतार् (Expediency) पर आधार्रित है क्योंकि इसक मूल उद्देश्य समार्ज के परस्पर विरोधी हितों में टकरार्व की स्थिति को समार्प्त कर उनमें समन्वय और एकरूपतार् स्थार्पित करनार् है।

समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र के विधिशार्स्त्रियों के अनुसार्र न्यार्यार्लयों के लिये यह आवश्यक है कि विधि के अमूर्त और लेखबद्ध स्वरूप पर विशेष जोर न देकर उसके व्यार्वहार्रिक पहलू पर अधिक बल दें अर्थार्त् वे उन सार्मार्जिक आवश्यकतार्ओं और उद्देश्यों की जार्ँच करें जो सम्बन्धित कानून पार्रित होने के लिए कारणीभूत हुए हैं।

समार्जशार्स्त्रीय विधिशार्स्त्र को अमेरिक में प्रबल समर्थन प्रार्प्त हुआ है। प्रसिद्ध अमेरिकी विधिशार्स्त्री डीन रार्स्को पार्उण्ड ने तो विधिशार्स्त्र को ‘सार्मार्जिक अभियन्त्रिकी’ (Social engineering) की संज्ञार् दी है। इस विचार्रधार्रार् के अनुसार्र विधिशार्स्त्र के अन्तर्गत मुख्यत: दो बार्तों क अध्ययन कियार् जार्तार् है- (1) मार्नव और उसके व्यवहार्रों पर विधि क क्यार् प्रभार्व पड़तार् है; तथार् (2) मार्नव के संव्यवहार्र विधि को किस प्रकार प्रभार्वित करते हैं?

विधिशार्स्त्र के प्रति समार्जशार्स्त्रीय दृष्टिकोण अपनार्ये जार्ने के फलस्वरूप अमेरिक में यथाथवार्दी विचार्रधार्रार् (Realist School) क प्रार्दुर्भार्व हुआ जिसके अन्तर्गत विधि के क्रियार्त्मक पहलू को इतनार् अधिक महत्व दियार् गयार् है कि इससे संहितार्ओं और अधिनियमों के अमूर्त नियमों तथार् उनमें सन्निहित सिद्धार्न्तों क महत्व न्यूनप्रार्य हो गयार्।

विधि तथार् विधिशार्स्त्र के प्रति प्रयोजनार्त्मक (Pragmatic) दृष्टिकोण अपनार्ते हुए यथाथवार्दियों ने विधि को काल्पनिक सिद्धार्न्तों से उबार्रकर तथ्यों पर आधार्रित वार्स्तविक रूप प्रदार्न कियार् और इस प्रकार विधि को सार्मार्जिक समस्यार्ओं को सुलझार्ने वार्लार् एक क्रियार्त्मक सार्धन मार्नार्। इस विचार्रधार्रार् के प्रबल समर्थक जेरोम फ्रैंक (Jerome Frank) क मार्ननार् थार् कि विधि की निश्चिततार् एक काल्पनिक तथ्य है क्योंकि विधि सदैव ही परिवर्तनषील होती है और इसीलिये विधि के संहितार्करण यार् पूर्व-निर्णयों को विशेष महत्व नहीं दियार् जार्नार् चार्हिए। फ्रेंक के अनुसार्र विधि के विकास क सार्मार्जिक प्रगति से सीधार् सम्बन्ध रहतार् है।

लेविलिन (Llewellyn) ने विधिशार्स्त्र को सार्मार्जिक प्रगति क स्रोत मार्नते हुए उसके क्रियार्त्मक पहलू पर बल दियार् गयार् है। उनके अनुसार्र विधिशार्स्त्री क यह कर्तव्य है कि वह विधि क अध्ययन और विश्लेशण सम-सार्मयिक सार्मार्जिक समस्यार्ओं के परिप्रेक्ष्य में करें। विधि को सैद्धार्न्तिक दार्यरे से हटकर मार्नव जीवन के व्यार्वहार्रिक पहलू से समस्यार्ओं के निवार्रण में सहार्यक होनार् चार्हिए।

आंग्ल विधिशार्स्त्र तथार् महार्द्वीपीय विधिशार्स्त्र 

सार्मंड ने आंग्ल विधिशार्स्त्र (English Jurisprudence) और महार्द्वीपीय (अन्य यूरोपीय देशो के) विधिशार्स्त्र में विभेद करते हुए कहार् है कि इन दोनों में अनेक समार्नतार्यें हैं। अंग्रेजी में ‘विधि’ शब्द क अर्थ अन्य कुछ न होते हुए केवल कानून (Law) ही है परन्तु अन्य महार्द्वीपीय देशों में इस शब्द क अर्थ केवल कानून ही नहीं वरन् ‘औचित्य’ यार् ‘अधिकार’ यार् ‘न्यार्य’ भी है। परिणार्मत: आँग्ल विधिशार्स्त्र में ‘विधि’ तथार् ‘अधिकार’ में अन्तर है। जबकि यूरोप के अन्य देशों में ‘विधि’ तथार् ‘अधिकार’ में कोर्इ विभेद नहीं है। इसके अतिरिक्त आँग्ल विधिशार्स्त्र के दो मुख्य रूप है- विश्लेशणार्त्मक एवं ऐतिहार्सिक विधिशार्स्त्र। परन्तु अन्य यूरोपीय देशों में विधिशार्स्त्र को केवल नैतिक रूप ही प्रार्प्त है जो तर्क और विवेक पर आधार्रित है। इसी प्रकार महार्द्वीपीय विधिशार्स्त्र (Continental Jurisprudence) विधि एवं न्यार्य को पृथक नहीं मार्नतार् है जब कि आँग्ल विधिशार्स्त्री इन दोनों शब्दों को पृथक मार्नते हैं।

तुलनार्त्मक विधिशार्स्त्र 

अनेक विधिशार्स्त्रियों ने विधि के विभिन्न वर्गों के अनुसार्र विधिशार्स्त्र क विभार्जन कियार् है। ऐलन (Allen) ने विधि को दो यार् अधिक पद्धतियों से तुलनार्त्मक अध्ययन करने को तुलनार्त्मक विधिशार्स्त्र कहार् है। हॉलैण्ड (Holland) ने इस प्रकार के वर्गीकरण को अनार्वष्यक और व्यर्थ बतार्ते हुए यह विचार्र व्यक्त कियार् है कि इसके विधिशार्स्त्र क क्षेत्र अनेक भार्गों में बँटकर सीमित हो जार्येगार्। तुलनार्त्मक विधिशार्स्त्र को विकसित करने क वार्स्तविक श्रेय दो सुविख्यार्त विधिशार्स्त्री काण्ट तथार् स्टोरी को दियार् जार्नार् चार्हिए। जिन्होंने इस बार्त पर जोर दियार् कि विधार्यन और विधि में व्यार्वहार्रिक सुधार्र लार्ने में तुलनार्त्मक अध्ययन की अहम भूमिक रहती है। सार्मंड ने भी विभिन्न देशों की विधियों के गुण-दोशों के आधार्र पर स्वदेशीय विधि क तुलनार्त्मक मूल्यार्ंकन किये जार्ने की आवश्यकतार् प्रतिपार्दित की है लेकिन वे इसे (तुलनार्त्मक विधिशार्स्त्र को) विधिशार्स्त्र की एक स्वतंत्र शार्खार् के रूप में मार्नने से इन्कार करते हैं। उनके अनुसार्र यह विधिशार्स्त्र के अध्ययन क एक तरीक मार्त्र है।

विधिशार्स्त्र के अध्ययन क महत्व 

सार्मण्ड के अनुसार्र विधिशार्स्त्र के अध्ययन की अपनी अभ्यार्न्तरिक रूचि है जिसके कारण इसकी तुलनार् किसी गंभीर ज्ञार्न की शार्खार् से की जार् सकती है। वार्स्तव में अनुमार्न और सिद्धार्न्त क प्रार्कृतिक आकर्शण होतार् है। विधिषार्स्त्रिक अनुसंधार्न विधिक, रार्जनीतिक, सार्मार्जिक आदि विचार्रों को प्रभार्वित करते हैं अतएव विधिशार्स्त्र क अध्ययन महत्वपूर्ण है। विधिशार्स्त्र क अध्ययन मार्नव के चिन्तन मनन की प्रखरतार् में वृद्धि करतार् है। डार्यस के अनुसार्र यह विधि-वेत्तार् को सिद्धार्न्त और जीवन प्रकाष लार्ने क सुअवसर देतार् है क्योंकि यह सार्मार्जिक विज्ञार्न के संबंध में मार्नव विचार्रों पर विचार्र करतार् है। विधिक अवधार्रणार्ओं के ताकिक विश्लेशण से विधिवेत्तार्ओं की ताकिक पद्धति क विकास होतार् है। इससे विधिवेत्तार् की व्यवसार्यिक प्रार्रूपवार्द की बुराइ को दूर कियार् जार् सकतार् है। डार्यस ने मार्नार् कि विधिशार्स्त्र विधि में जीवनदार्यी (Lifemanship) क विकास कर अध्येतार् में प्रतिभार् निखार्र की अनुप्रेरणार् देतार् है। जे0जी0 फिलीमोर (J.G. Phillimore) ने स्पष्ट कियार् है कि विधिशार्स्त्र क विज्ञार्न इतनार् उच्च स्तरीय है कि इसक ज्ञार्न इसके अध्येतार् को ज्ञार्नपूर्ण अवधार्रणार्ओं और मनोवेगों, जो मार्नव परिस्थितियों में उत्पन्न सभी अपेक्षार्ओं में लार्गू हो सके, के सार्थ जीवन में प्रवेश करार्तार् है। लार्स्की (Laski) ने विधिशार्स्त्र के महत्व क मूल्यार्ंकन करते हुए इसे ‘विधि क नेत्र‘ कहार् है। विधि की बढ़ती गुत्थियों एवं मार्नव संबंधों की जटिलतार्ओं के निरार्करण क रार्स्तार् विधिशार्स्त्र के अध्ययन में पार्यार् जार् सकतार् है। इसीलिए इसे विधि क व्यार्करण मार्नार् गयार् है। अनिरूद्ध प्रसार्द के अनुसार्र विधिशार्स्त्र क जार्गरूक अध्ययन सार्मार्जिक समस्यार्ओं के समार्धार्न एवं न्यार्य की साथकतार् को अवश्यभार्वी करतार् है। वर्तमार्न जेल सुधार्र, कैदियों के सार्थ मार्नवीय व्यवहार्र की अपेक्षार्, मार्नव गरिमार् के सार्थ जीने के अधिकार के सार्थ सोशल एक्शन लिटीगेशन तथार् लोक हित वार्दों क अन्वेशण नवीन विधिशार्स्त्रीय दृष्टिकोण से ही उपजार् है। इसी प्रकार पर्यार्वरण सुधार्र विधि, गरीबों के लिए मुफ्त कानूनी सहार्यतार् आदि विधिशार्स्त्र और अन्य सार्मार्जिक विज्ञार्नों की अन्तर्विद्यार् ज्ञार्न के आदार्न-प्रदार्न तथार् पार्रस्परिक प्रभार्वों की देन है। विधिशार्स्त्र विधि की विभिन्न शार्खार्ओं की मूलभूत संकल्पनार्ओं के सैद्धार्न्तिक आधार्रों क ही ज्ञार्न नहीं करार्तार् है बल्कि उनके अन्तर्सम्बन्धों क भी ज्ञार्न करार्तार् है। विधिशार्स्त्र केवल विधिक प्रणार्ली के मार्ध्यम से न्यार्य प्रशार्स्ति ही नहीं करतार् वरन् नवीन सिद्धार्न्तों, विचार्रों एवं अन्य मागों की खोज के मार्ध्यम से न्यार्यपूर्ण समार्ज की स्थार्पनार् में सहार्यक होतार् है।

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