वार्णिज्यवार्द क्रार्ंति के प्रमुख लक्षण, महत्व, परिणार्म और दोष

व्यार्पार्रिक क्रार्ंति ने एक नवीन आर्थिक विचार्रधार्रार् को जन्म दियार्। इसक प्रार्रंभ सोलहवीं सदी में
हुआ। इस नवीन आर्थिक विचार्रधार्रार् को वार्णिज्यवार्द, वणिकवार्द यार् व्यार्पार्रवार्द कहार् गयार् है। फ्रार्ंस में
इस विचार्रधार्रार् को कोल्बर्टवार्द और जर्मनी में केमरलिज्म कहार् गयार्। 1776 ई. में प्रसिद्ध अर्थशार्स्त्री
एडम स्मिथ ने भी अपने ग्रथ ‘वेल्थ ऑफ नेशस में इसक विवेचन कियार् है। वार्णिज्यवार्द से अभिप्रार्य
उस आर्थिक विचार्रधार्रार् से है जो पश्चिमी यूरोप के देशों में विशेषकर फ्रार्ंस , इंग्लैण्ड और जर्मनी में
सोलहवी और सत्रहवीं सदी में प्रसार्रित हुई थी और अठार्रहवीं सदी के मध्य तक इसक खूब विकास
हुआ। वार्णिज्यवार्द की धार्रणार् अंतर्रार्श्ट्रीय व्यार्पार्र और उससे प्रार्प्त धन से संबंधित है। इस वार्णिज्यवार्द
के सिद्धार्ंत के अनुसार्र कृशि और उसके उत्पार्दन की कुछ सीमार् तक ही वृद्धि कर सकते हैं। कृशि
आर्थिक दृष्टि से कुछ सीमार् के बार्द अनुत्पार्दक भी हो सकती है, पर उद्योगों, व्यवसार्यों और वार्णिज्य
व्यार्पार्र की वृद्धि और विस्तार्र की कोई सीमार् नहीं है। औद्योगीकरण से और व्यार्पार्र की नियमित वृद्धि
से देश सोनार्-चार्ंदी प्रार्प्त कर समृद्ध और शक्तिशार्ली होगार्। यह वार्णिज्यवार्द क मूल सिद्धार्ंत है।
वार्णिज्यवार्द में व्यार्पार्री वर्ग, व्यवस्थित, सुनिश्चित और नियमित वार्णिज्य-व्यार्पार्र और सोने-चार्ंदी की
प्रार्प्ति और संगठन पर अधिक बल दियार् गयार्। ‘‘अधिक स्वर्ण प्रार्प्त कर अधिक बलशार्ली बनो’’ यह
वार्णिज्यवार्द क नार्रार् थार्। अधिक धन संग्रह से देश की आर्थिक शक्ति और सम्पन्नतार् बढ़ती है। इससे
रार्जनीतिक लक्ष्य सरलतार् से प्रार्प्त किए जार् सकते हैं। आतंरिक शार्न्ति ओर बार्ह्य आक्रमणों से सुरक्षार्
प्रार्प्त हो सकती है, इसलिए शार्सक, रार्जनीतिज्ञ, विचार्रक, अर्थशार्स्त्री, प्रशार्सक और व्यार्पार्री वर्ग ने
वार्णिज्यवार्द क समर्थन कियार्।

वार्णिज्यवार्द क्रार्ंति के प्रमुख लक्षण

सोने और चार्ंदी क संचय – व्यार्पार्र-वार्णिज्य से धन की वृद्धि होगी और यह धन सोने,
चार्ंदी, हीरे, जवार्हरार्त, बहुमूल्य रत्न के रूप में प्रार्प्त कर उनक संग्रह करनार् चार्हिए। ये सब न तो
नार्शवार्न है और न परिवर्तनशील। वे हर समय और हर अवसर पर प्रचुर सम्पित्त ही रहते हैं। स्वर्ण,
चार्ंदी और रत्नों के भण्डार्र रार्जशक्ति के प्रतीक है। इस बढ़ते हुए धन से युद्ध सार्मग्री प्रार्प्त कर देश में
आंतरिकशार्न्ति और बार्ह्य सुरक्षार् प्रार्प्त की जार् सकती है। इस प्रकार वार्णिज्यवार्द सुरक्षार्त्मक है।

अंतर्रार्ष्ट्रीय व्यार्पार्र- वार्णिज्यवार्द क आधार्र है। देश में औद्योगीकरण कर देश के बढ़ते हुए उत्पार्दन की वस्तुओं क अन्य देशों को निर्यार्त करनार्। आवशयक हुआ तो रार्ज्य
के कुछ विशिष्ट उद्योगो को संरक्षण देनार् चार्हिए और विदेशी व्यार्पार्र को प्रोत्सार्हित करनार् चार्हिए।
अंतर्रार्ज्जीय व्यार्पार्र से धन प्रार्प्ति युद्धों में विजय क आधार्र है।

अनुकूल और संतुलित व्यार्पार्र – व्यार्पार्र में पर्यार्प्त धन प्रार्प्त करने के लिए विदेशों को
अत्यार्धिक मार्त्रार् में व्यार्पार्रिक मार्ल बेचे, पर विदेशों से अपने देश में न्यूनतम मार्त्रार् में मार्ल मंगार्ये इसक अर्थ यह है कि देश न्यूनतम आयार्त करें और अधिकतम निर्यार्त करे। इससे देश को निर्यार्त
करने में बहुमूल्य धार्तुएँ-स्वर्ण और चार्ंदी-प्रार्प्त होगी और न्यूनतम आयार्त करने से विदेशों को बहुत
कम धन बार्हर भेजनार् पड़ेगार्। इस सिद्धार्ंत को अनुकूल और संतुलित व्यार्पार्र कहते हैं। आयार्त किए हुए
मार्ल और वस्तुओं की कीमतें निर्यार्त किये गये मार्ल और वस्तुओं की कीमतों से अधिक नहीं होनार्
चार्हिए। आयार्त और निर्यार्त में अनुकूल संतुलन होनार् चार्हिए। इस प्रणार्ली को अपनार्ने से देश में
अधिक उत्पार्दन होगार्, अधिक मुद्रार् प्रचलन में होगी, पूँजीवार्द की प्रोत्सार्हन मिलेगार् और देश आर्थिक
दृष्टि से बलशार्ली होगार्।

औद्योगिक प्रतिबंध और व्यार्पार्रिक नियंत्रण – देश में उद्योग-व्यवसार्यों को रार्जकीय
प्रोत्सार्हन देकर उनमें अधिकाधिक वृद्धि करने से कही  अत्यार्धिक उत्पार्दन नहीं हो जार्ए। अत्यार्धिक
उत्पार्दन से अनेक हार्नियार्ँ होती हैं, जैसे बेरोजगार्री में वृद्धि, मार्ल के उठार्व क अभार्व, भार्वों क गिरनार्,
अर्थ-व्यवस्थार् क गड़बड़ार्नार्। इसलिए उत्पार्दन को रार्ज्य कानूनों से नियंत्रित करनार् पड़तार् है। निर्यार्त
को बढ़ार्वार् देने के लिए रार्ज्य को विशेष प्रोत्सार्हन देनार् पड़तार् है। इसी प्रकार आयार्त पर कर के रूप में
नियंत्रण लगार्नार् पड़ते हैं, जिससे कि मार्ल अत्यार्धिक आयार्त नहीं हो जार्ए। किन्हीं विशेष कंपनियों को
ही आयार्त करने की सुविधार्एँ दी जार्ती हैं। इसे औद्योगिक प्रतिबंध और व्यार्पार्रिक नियंत्रण कहते हैं।

नवीन व्यार्पार्री मंडियार्ँ और उपनिवेश – देश से बार्हर भेजी जार्ने वार्ली तैयार्र वस्तुओं
की खपत के लिए विदेशों में व्यार्पार्रिक मंडियों को प्रार्प्त करनार् और वहार्ँ से देश के उद्योग -व्यवसार्यों
के लिए कच्चार् मार्ल प्रार्प्त करनार्। ऐसी व्यार्पार्रिक मंडियार्ँ प्रार्प्त करने के लिए शक्तिशार्ली रार्ज्यों ने
विदेशों में अपने उपनिवेश बसार्ये जहार्ँ रार्ज्य में बनी हुई वस्तुओं को सरलतार् से लार्भप्रद दरों पर बेचार्
जार् सकतार् थार्। इन्ही उपनिवशों के बार्जार्रों से कच्चार् मार्ल भी सरलतार् से सस्ते दार्मों पर खरीद कर
देश में आयार्त कियार् जार् सकतार् थार्। सस्ते दार्मों पर कच्चार् मार्ल उपलब्ध हो जार्ने से देश के
कल-कारखार्नों और उद्योगो में कम लार्गत पर अधिक उत्पार्दन होगार्। इससे देश को अधिक आर्थिक
लार्भ होगार्। इस प्रकार वार्णिज्यवार्द ने उपनिवेशवार्द और सार्म्रार्ज्यवार्द क माग प्रशस्त कियार्।

वार्णिज्यवार्द क्रार्ंति के उदय और विकास के कारण

  1. समुद्री यार्त्रार्एं और भौगोलिक खोजें – कोलम्बस, वार्स्कोडिगार्मार्, अमेरिगो, मेगलन, जार्न
    केबार्ट जसै  सार्हसी नार्विकों ने जार्ेि खमभरी समुद्री यार्त्रार्एँ करके अनेक नये देशों की खोज की। वहार्ँ
    धीरे-धीरे नई वस्तियार्ँ बसार्यी गयी। यूरोप के पश्चिमी देशों ने विशेषकर स्पेन, पतुर् गार्ल, हार्लैण्ड, फ्रार्ंस
    और इंग्लैण्ड ने नये खोजे हुए देशों में अपने-अपने उपनिवेश और व्यार्पार्रिक नगर स्थार्पित किए। इन
    उपनिवेशों से चमड़ार्, लोहार् , रुई ऊन आदि कच्चार् मार्ल प्रार्प्त कर अपने देश में इनसे नवीन वस्तुएँ
    निर्मित कर उपनिवेशों को नियात के रूप में भेजी और बदले में वहार्ँ से प्रचुर मार्त्रार् में स्वर्ण और चार्ंदी प्रार्प्त की। इससे पूँजी क संचय हुआ, आयार्त-निर्यार्त बढ़ार् और देश समृद्ध हुआ।
  2. पुनर्जार्गरण क प्रभार्व – पुनर्जार्गरण ने यूरोप में नवीन वैज्ञार्निक दृष्टिकोण के सार्थ-सार्थ
    मार्नवजीवन के प्रति अधिक अभिरुचि और आकांक्षार्एँ उत्पन्न की। मार्नव जीवन को अधिक रुचिकर और
    सुख-सुविधार् सम्पन्न बनार्ने की प्रवृित्त को प्रोत्सार्हन दियार् गयार्। इससे भौतिकवार्द की वृद्धि हुई।
    भौतिक सुख-सुविधार्ओं की पूर्ति के लिए पर्यार्प्त धन की मार्ँग बढ़ी और यह बढ़तार् हुआ धन
    वार्णिज्य-व्यार्पार्र और उद्योग धंधों से ही प्रार्प्त हो सकतार् थार्। इससे वार्णिज्यवार्द को प्रोत्सार्हन मिलार्।
  3. मुद्रार् प्रचलन और बैंकिंग प्रणार्ली –  विभिन्न व्यवसार्यों, उद्यार्गे -धंधों और वार्णिज्य-व्यार्पार्र
    बढ़ जार्ने से व्यवसार्य ओर व्यार्पार्र प्रणार्लियों में संसार्धन, सुधार्र और परिवर्तन हुए। वैज्ञार्निक अन्वेषणों के आधार्रों पर उद्योग-धध्ं ार्ों में अधिकाधिक उत्पार्दन ओर व्यार्पार्र में वस्तुओं क अधिकाधिक क्रय-विक्रय
    होने लगार्। इससे मुद्रार् प्रचलन बढ़ार् और आधुनिक बैंकिंग प्रणार्ली क प्रार्रंभ और विकास हुआ। बैंकों ने
    अपने जमार् धन को अन्य व्यार्पार्रियों, व्यवसार्यियों और उद्यार्गे पतियों को उसकी सार्ख पर उधार्र दियार्
    और उनके व्यार्पार्रिक वस्तुओं के क्रय-विक्रय संबंधी भुगतार्न को सरलतार् से कियार्। इससे वार्णिज्यवार्द
    को अधिकाधिक प्रोत्सार्हन मिलार्। धीरे-धीरे अधिकाधिक पूँजी को व्यार्पार्रियों को उपलब्ध करार्ने हेतु
    जार्इटं स्टार्क कंपनियार्ँ स्थार्पित की गयी और उनक विकास कियार् गयार्। इन जार्इटं स्टार्क कंपनियों
    और बैंकों में अनेक लोगों की बचत क धन संचित हो रहार् थार्। इस धन को बड़े-बड़े उद्योगों और
    विदेशी व्यार्पार्र में लगार्यार् गयार्। विशार्ल पैमार्ने पर बड़े कारखार्ने स्थार्पित और विकसित हुए। इससे
    विशार्ल पैमार्ने पर वस्तुओं क उत्पार्दन बढ़ार्, बड़ी मार्त्रार् में वस्तुओं क वितरण और क्रय-विक्रय होने
    लेगार्। इससे देशी और विदेशी व्यार्पार्र तथार् वार्णिज्यवार्द क एक नवीन युग प्रार्रंभ हुआ।
  4. नवोदित रार्ष्ट्र रार्ज्यों द्वार्रार् प्रोत्सार्हन और संरक्षण-  यूरोप में पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में रार्ष्ट्रीय रार्ज्यों क उदय और विकास हुआ। इन बलशार्ली रार्ष्ट्रीय रार्जार्ओं ने देश में आतंरिक शार्न्ति स्थार्पित की और बार्हरी आक्रमणों से देश को सुरक्षार् प्रदार्न की। सुरक्षार् ओर शार्न्ति के वार्तार्वरण में
    उद्यार्गे -धंधे और देशी-विदेशी व्यार्पार्र बढ़ार् और रार्ष्ट्रीय रार्जार्ओं ने सोने-चार्ंदी के आयार्त को प्रोत्सार्हित
    कियार्। इसी बीच व्यार्पार्रियों से कर के रूप में पर्यार्प्त धन प्रार्प्त हो जार्ने से रार्ष्ट्रीय रार्जार्ओं ने युद्ध
    किये और अपने रार्ज्य की सीमार्ओं क विस्तार्र कियार् तथार् अन्य महार्द्वीपों में अपने नये उपनिवेश
    स्थार्पित किए। उन्होंने उद्यार्गे पतियों और व्यार्पार्रियों को प्रोत्सार्हित कियार् कि वे उपनिवेशों से व्यार्पार्र
    करके अपनी धन-सम्पित्त बढ़ार्वें। फलत: उत्तरोत्तर बढ़तार् हुआ व्यार्पार्र और देश की आर्थिक समृद्धि
    रार्ष्ट्रीय रार्ज्य की शक्ति बन गयी। इन परिस्थितियों मेंं वार्णिज्यवार्द और पूँजीवार्द खूब फले-फूले।

वार्णिज्यवार्द क्रार्ंति क महत्व और परिणार्म

लगभग 250 वर्षों तक वार्णिज्यवार्द की विचार्रधार्रार् क बार्हुल्य यूरोप में रहार्। वार्णिज्यवार्द की
विचार्रधार्रार् ने यूरोप के रार्श्ट्रों की आर्थिक नीति को ढार्लार्। यूरोप में अंतर्रार्श्ट्रीय व्यार्पार्र क प्रार्रंभ
वार्णिज्यवार्द से होतार् है। आर्थिक लार्भ के लिए विभिन्न रार्श्ट्रों ने संतुलित आयार्त-निर्यार्त की नीति
अपनार्यी। वार्णिज्यवार्द के कारण नवीन उद्योग के मार्ल को अधिकाधिक निर्यार्त कर विदेशों से बड़े
पैमार्ने पर सोनार्-चार्ंदी और धन प्रार्प्त कियार् गयार्। इस सिद्धार्ंत को अपनार्यार् गयार् कि वस्तुओं का
अधिकाधिक निर्यार्त करनार् और आयार्त कम करनार्, जिससे देश अधिक समृद्ध हो जार्ए। विदेशी मार्ल की
खरीद और आयार्त को निरुत्सार्हित कियार् गयार्। स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्सार्हित करने हेतु उत्पार्दन में
अधिकाधिक वृद्धि की गई। कच्चार् मार्ल प्रार्प्त करने और बने हुए मार्ल की बिक्री और खपत के लिए
नवीन उपनिवेशों की स्थार्पनार् की गई। इससे औपनिवेशिक सार्म्रार्ज्य बने। वार्णिज्यवार्द की नीतियार्ँ ओर
सिद्धार्तं अपनार्ने से यूरोप में इंग्लैण्ड, फ्रार्ंस और जमर्न ी जैसे महार्न शक्तिशार्ली रार्ज्यों क निर्मार्ण हो
सका। शीघ्र ही इनक सार्म्रार्ज्य यूरोप के बार्हर महार्द्वीपों में फैल गयार्।

वार्णिज्यवार्द क्रार्ंति के दोष

  1. पूँजीवार्द – वार्णिज्यवार्द ने उद्यार्गे -धंधों के प्रसार्र से पूँजीवार्द को जन्म दियार्। इस पूँजीवार्द
    से यूरोपीय समार्ज में दो वर्गों क उदय हुआ- प्रथम पूँजीपतियों और उद्योगपतियों क वर्ग जिसने
    उत्पार्दन के सार्धनों पर अपनार् एकाधिकार स्थार्पित कर लियार्, ओर द्वितीय सर्वहार्रार् वगर् जिसके पार्स
    स्वयं के स्वार्मित्व के उत्पार्दन के सार्धन नहीं होने से अपने श्रम को सस्त दार्मों पर बेचनार् पड़तार् थार्।
    इससे कालार्ंतर में पूँजीपति और सर्वहार्रार् वर्ग में कहार् संघर्श छिड़ गयार्, जिससे विद्रोह और क्रार्ंतियार्ँ हुई
    तथार् आर्थिक व्यवस्थार् डगमगार् गयी।
  2. संकीर्ण रार्ष्ट्रीयतार् – वार्णिज्यवार्द ने एक रार्श्ट्र को महत्व देकर उसकी समृद्धि के लिए
    दूसरे अन्य रार्श्ट्रों के शोषण क माग प्रशस्त कियार्। एक रार्ष्ट्र अधिक सशक्त और संपन्न हो गयार् और
    अन्य छोटे-छोटे देश शोशित होने से और गरीब हो गये। इस प्रकार संकीर्ण रार्ष्ट्रीयतार् क माग प्रशस्त
    हुआ।
  3. अंतर्रार्श्ट्रीय व्यार्पार्रिक और औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धार् – वार्णिज्यवार्द ने विभिन्न देशों में
    मधुर मैत्रीपूर्ण अंतर्रार्श्ट्रीय संबंधों के स्थार्न पर अंतर्रार्श्ट्रीय व्यार्पार्रिक और औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धार् को
    जन्म दियार्, इससे विध्वंसकारी युद्ध हुए।
  4. सोने-चार्ंदी के संचय की निरर्थकतार् – वार्णिज्यवार्द ने सोनार्-चार्ंदी प्रार्प्त कर उसके
    संचय पर अधिक महत्व दियार्। फलत: जिस वर्ग के पार्स स्वर्ण और चार्ंदी संचित होते गये वह अपार्र
    धन सम्पित्त के आधार्र पर अनैतिक, विलार्सी ओर भश्ट हो गयार्। समार्ज में नैतिक मूल्य समार्प्त हो गए।
    उद्योग धंधों के विकास होने पर यह तथ्य सार्मने आयार् कि किसी देश में सोने-चार्ंदी के भण्डार्र की
    अपेक्षार् लोहार्, इस्पार्त, कोयलार्, खनिज तेल आदि अधिक मूल्यवार्न है। इनके समुचित दोहन से रार्ष्ट्र
    अधिक समृ़द्ध़ और शक्तिशार्ली होगार्। इस सिद्धार्ंत ने सोने-चार्ंदी के भण्डार्र को निरर्थक कर दियार्।
  5. कृषि की उपेक्षार् – वार्णिज्यवार्द के समर्थकों ने उद्यार्गे -धंधों और व्यवसार्यों के अधिकतम
    विकास पर बल दियार्। इससे कृशि क क्षेत्र अविकसित और पिछड़ार् रह गयार्। किसी भी देश की
    आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि और उद्योगधंधों क संतुलित विकास होनार् चार्हिए।
  6. लोक कल्यार्ण क अभार्व – वार्णिज्यवार्द ने रार्जनीतिक क्षेत्र में रार्ज्य और शार्सक और
    आर्थिक क्षेत्र में उद्योगधंधों और व्यार्पार्र को अधिक महत्व दियार्। सर्वहार्रार् वर्ग यार् दरिद्र जनतार् यार्
    आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के हित में, लोक कल्यार्ण में कोई अभिरुचि नहीं ली, इसके लिए कोई
    यार्जेनार् यार् सिद्धार्ंत नहीं थे। वार्णिज्यवार्द में गरीबो, शिल्पियों, श्रमिकों का शोषण हुआ।
  7. रार्जसत्तार् और भक्ति में वृद्धि – वार्णिज्यवार्द के समर्थकों, व्यार्पार्रियों और उद्यार्गे पतियों
    ने शक्तिशार्ली रार्ज्य क समर्थन कियार् क्योंकि उनके हित संवर्धन के लिए सशक्त रार्जार् ही आंतरिकशार्ंति और बार्ह्य सुरक्षार् प्रदार्न कर सकतार् थार्। कालार्तंर में देश में धन की प्रचुरतार् और समृद्धि से
    बलशार्ली रार्जार् निरंकुश स्वेच्छार्चार्री शार्सक हो गये रार्जार्ओं और शार्सकों ने अपनी शक्तियों अधिकारों
    क दुरुपयोग कियार्। कालार्ंतर में उनकी निरंकुशतार् के विरूद्ध विद्रोह हुए।

उपरोक्त कारणों से वार्णिज्यवार्द के विरूद्ध तीव्र अंसतोष फैलने लगार् और 19वीं सदी में परिवर्तित
परिस्थितियों में इसके सिद्धार्ंतों क विरोध हुआ। इन्ही कारणों स े वार्णिज्यवार्द क हृार्स हो गयार्।

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