वार्क्य के प्रकार और उदार्हरण

वार्क्य, भार्षार् की सबसे छोटी किन्तु साथक तथार् वार्स्तविक इकाई होतार् है। भतरृहरि तो ‘भार्षार्’ की सबसे छोटी इकाई ‘वार्क्य’ को ही मार्नते हैं। उनसे पूर्व यह बार्त किसी ने इतने बलपूर्वक नहीं कही थी-

‘‘यदन्त: शब्द तत्त्वं तु नार्दैरंकं प्रकाशितं।

तदार्हुरपरेशब्दं तस्य वार्क्ये तथेकतार्।।’’

वस्तुत: वार्क्य ही अक्षर, ध्रुव कूटस्थ, अपरिणार्मी, अक्षय एवं किसी प्रकार के अवयवों से रहित है, पद नहीं। वार्क्य ही साथक होतार् है, पद नहीं। कुल मिलार्कर वार्क्य भार्षार् की मुख्य इकाई और लघुतमपूर्ण विचार्र-“The sentence is the cheif unit of speech, it may be defined quite simply as a minimum complete utterance.”

वार्क्य के प्रकार

विभिन्न आधार्रों पर वार्क्य के अनेक भेद बतार्ए गये हैं-

  1. आकृति के आधार्र पर,
  2. संरचनार् के आधार्र पर,
  3. शैली के आधार्र पर,
  4. क्रियार् के आधार्र पर तथार्
  5. अर्थ के आधार्र

आकृति के आधार्र पर

वार्क्यों की आकृति के आधार्र पर उनके दो भेद मार्ने जार्ते हैं, अयोगार्त्मक तथार् योगार्त्मक। आगे चलकर योगार्त्मक वार्क्यों के भी तीन भेद हो जार्ते हैं, श्लिष्ट योगार्त्मक, अश्लिष्ट योगार्त्मक तथार् प्रश्लिष्ट योगार्त्मक। इस प्रकार पद-विन्यार्स अथवार् आकृति के आधार्र पर वार्क्य के चार्र प्रकार हो जार्ते हैं- (अ) अयोगार्त्मक, (ब) श्लिष्ट योगार्त्मक, (स) अश्लिष्ट योगार्त्मक तथार् (द) प्रश्लिष्ट योगार्त्मक वार्क्य। इन्हें क्रमश: इस प्रकार देखार् जार् सकतार् है।

(अ) अयोगार्त्मक वार्क्य-इन वार्क्यों में सभी शब्दों की स्वतंत्र सत्तार् होती है। यहार्ँ पदों की रचनार् प्रकृति-प्रत्यय के योग से नहीं की जार्ती। प्रत्येक शब्द क अपनार् निश्चित स्थार्न होतार् है और इसी आधार्र पर इनक व्यार्करणिक सम्बन्ध जार्नार् जार्तार् है। चीनी भार्षार् अयोगार्त्मक वार्क्यों के लिए प्रसिद्ध है। इस भार्ग में पदों क स्थार्न ही व्यार्करणिक सम्बन्ध क बोध करार्तार् है। यथार्-

न्गो-तार्-नी = मैं तुमको मार्रतार् हूँ।

नी-तार्न-न्गो = तुम मुझे मार्रते हो।

(ब) श्लिष्ट योगार्त्मक वार्क्य-जहार्ँ पदों की रचनार् विभत्तिफयों की सहार्यतार् अथवार् योग से की जार्य, उन्हें श्लिष्ट योगार्त्मक वार्क्य कहते हैं। यहार्ँ विभत्तिफ धार्तु के सार्थ इस प्रकार संश्लिष्ट हो जार्ती है कि दोनों क अस्तित्व अलग-अलग नहीं जार्न पड़तार् है। प्रत्ययों क अस्तित्व एकदम समार्प्त हो जार्तार् है। उत्तफ विभत्तिफयार्ँ अन्तर्मुखी होती हैं। यथार्-’’जैदुन अम्रन जरब अ’’ (जैद ने अमर को मार्रार्) लेकिन संस्कृत की विभत्तिफयार्ँ बहिर्मुखी होती है। यथार् ‘रार्घव: गृहं गच्छति’, ‘मोहन: मृगं पश्यति’ आदि।

(स) अश्लिष्ट योगार्त्मक वार्क्य –जिन वार्क्यों की रचनार् प्रत्ययों के योग से होती है, उन्हें अश्लिष्ट योगार्त्मक वार्क्य कहते हैं। प्रत्यय पदों के पूर्व मध्य और अन्त में प्रयुत्तफ किये जार्ते हैं। तुर्की भार्षार् विशेषत: प्रत्यय प्रधार्न है। संस्कृत में प्रत्यय शब्द के अन्त में प्रयुक्त किये जार्ते हैं। कृत्रिम भार्षार् ‘एस्पैरेन्तो’ में भी प्रत्यय प्रधार्न भार्षार् के दर्शन यदार्-कदार् हो जार्ते हैं।

(द) प्रश्लिष्ट योगार्त्मक वार्क्य-जब अनेक शब्दों के योग से एक ऐसार् सार्मार्सिक पद बन जार्य कि उसी से वार्क्य क बोध होने लगे, तब वार्क्य प्रश्लिष्ट योगार्त्मक कहलार्तार् है। इन वार्क्यों में कर्त्तार्, कर्म, क्रियार् सभी एक पद में इस प्रकार गुंथे हुए होते हैं कि, पूरार् वार्क्य एक शब्द प्रतीत होतार् है। दक्षिणी अमेरिक की चेरार्की भार्षार् में इस प्रकार के वार्क्य मिल जार्ते हैं। यथार्- अमोखल = नार्व, नार्तेन = लार्ओ, निन = हम इन शब्दों के मेल से बने वार्क्य ‘नार्धोलिनिन’ क अर्थ है-’’हमार्रे लिए एक नार्व लार्ओ।’’

संरचनार् के आधार्र

वार्क्य-रचनार् के आधार्र पर वार्क्य के तीन भेद होते हैं। (क) सार्धार्रण अथवार् सरल वार्क्य (Simple sentence) (ख) संयुक्त वार्क्य (Compoundsentence) तथार् (ग) मिश्र तथार् जटिल वार्क्य (Complex sentence)।

(क) सार्धार्रण अथवार् सरल वार्क्य-जिस वार्क्य में केवल एक कर्त्तार् तथार् एक क्रियार् होती है, उसे सार्धार्रण अथवार् सरल वार्क्य कहते हैं। यथार् रार्म वृक्ष पढ़तार् है। मुरार्री खेती करतार् है।

(ख) संयुक्त वार्क्य-कुछ सरल वार्क्यों अथवार् सरल एवं मिश्र वार्क्यों अथवार् मिश्र एवं मिश्र वार्क्यों को परस्पर जोड़ने से संयुक्त वार्क्य बनतार् है। इसे बिनार् किसी बार्धार् के तोड़कर खण्डों अथवार् विभार्गों में विभक्त कर सकते हैं। यथार् ‘तुम जार्ओ और अपने पितार्जी से कहनार्’। इस वार्क्य में दो सरल वार्क्य हैं-’तुम जार्ओ’। ‘अपने पितार्जी से कहनार्’। इन दोनों वार्क्यों को ‘और’ से जोड़कर संयुक्त वार्क्य बनार्यार् गयार् है। आगे एक मिश्र और सरल वार्क्य को जोड़कर बने संयुक्त वार्क्य क उदार्हरण प्रस्तुत कियार् जार् रहार् है-’’मैं तुम्हार्रे पार्स आऊँगार्, क्योंकि तुमसे एक जरूरी काम है, पर तुरन्त लौट भी जार्ऊँगार्।

(ग) मिश्र वार्क्य-जिस वार्क्य में दो वार्क्य खण्ड जुड़े हों तथार् एक वार्क्य दूसरे पर पूरी तरह निर्भर करतार् हो, वह मिश्र वार्क्य कहलार्तार् है। मिश्र वार्क्य संयुक्त वार्क्य से पूरी तरह भिन्न होतार् है, क्योंकि मिश्र वार्क्य में प्रथम वार्क्यार्ंश के बार्द दूसरे की आकांक्षार् बनी रहती है, जबकि संयुक्त वार्क्य के प्रत्येक अंश में पृथक-पृथक आकांक्षार् की पूर्ति हो जार्ती है। मिश्र वार्क्य के कुछ उदार्हरण इस प्रकार हैं-उसने कहार् कि मैं जार्ऊँगार्। भैंस भीग रही है, क्योंकि वर्षार् हो रही है। अध्यार्पक मेहनत से पढ़ार् रहे हैं, क्योंकि बच्चों की परीक्षार् सन्निकट है।

शैली के आधार्र पर

शैली क आशय यहार्ँ रचनार्-शैली से है। शैली के आधार्र पर वार्क्य के तीन प्रकार बतार्ये गये हैं। (अ) शिथिल वार्क्य, (ब) समीकृत वार्क्य तथार् (स) आवर्तक वार्क्य

(अ) शिथिल वार्क्य-जब कोई लेखक अथवार् वत्तफार् बिनार् अलंकार क सहार्रार् लिए किसी बार्त को सीधे-सार्दे ढंग से कहे तो उसे शिथिल वार्क्य कहते हैं। यथार्-’रार्म, सीतार् और लक्ष्मण जंगल में जार् रहे थे। रार्म आगे, सीतार् बीच में तथार् लक्ष्मण सबसे पीछे थे। कुछ दूर आगे जार्ने पर सीतार् को प्यार्स और थकान महसूस हुई। उन्होंने रार्म से पूछार्-आप पर्णकुटी कहार्ँ बनार्येंगे।

(ब) समीकृत वार्क्य-सार्म्य मूलक अथवार् वैषम्यमूलक संगति के द्वार्रार् वत्तफार् जब अपने भार्वों को व्यत्तफ करतार् है, तब उसे समीकृत वार्क्य कहते हैं। समीकृत वार्क्य के उदार्हरण हैं, ‘जैसार् देश वैसार् भेष’। ‘जिसकी लार्ठी उसकी भैंस’ आदि। विषमीकृत वार्क्य के उदार्हरण हैं, ‘एक तो चोरी, दूसरे सीनार् जोरी’। ‘कहार्ँ रार्जार् भोज कहार्ँ गंगु तेली’ आदि।

(स) आवर्तक वार्क्य-श्रोतार् अथवार् पार्ठक के मन में जिज्ञार्सार् यार् उत्सुकतार् पैदार् करने के बार्द जो वार्क्य वत्तफार् अथवार् लेखक द्वार्रार् प्रयुक्त किये जार्ते हैं, उन्हें आवर्तक वार्क्य कहते हैं। आवर्तक वार्क्य क उदार्हरण दीजिए।

क्रियार् के आधार्र पर

क्रियार् पद के आधार्र पर भी वार्क्य दो प्रकार के होते हैं। (अ) क्रियार् युक्त तथार् (ब) क्रियार्पद हीन।

(अ) क्रियार्पद युक्त वार्क्य-जिन वार्क्यों में क्रियार् क प्रयोग हुआ रहतार् है, वे क्रियार्पदयुत्तफ वार्क्य कहलार्ते हैं। अधिकतर वार्क्य क्रियार्पद युत्तफ ही होते हैं। यथार्-रार्म ने रार्वण को मार्रार्। सुकुल विद्यार्लय जार्तार् है आदि।

(ब) क्रियार्पद हीन वार्क्य-यदि कोई क्रियार् वार्क्य के अभार्व में भी सम्यक् अर्थ की अभिव्यक्ति दे, तो वह क्रियार्पद हीन वार्क्य कहलार्तार् है, यथार्-

प्रमोद-अरे कहार्ँ से?

महेन्द्र-तुम्हार्रे यहार्ँ से।

प्रमोद-कहो, क्यों, कैसे?

महेन्द्र-वैसे ही।

‘आम के आम गुठलियों के दार्म ‘मुहार्वरार् भी इसके अन्तर्गत समझार् जार्येगार्।

अर्थ के आधार्र पर

इस आधार्र पर वार्क्य के नौ भेद किये जार्ते हैं, यथार्-

(क) विधि वार्क्य- वह पढ़तार् है।

(ख) निषेध वार्क्य- वह नहीं पढ़तार् है।

(ग) आज्ञाथक वार्क्य- अब तुम पढ़ो।

(घ) इच्छाथक वार्क्य- भगवार्न तुम्हें सकुशल रखें।

(ड.) सम्भार्वनाथक वार्क्य- शार्यद आज धूप निकले।

(च) संदेहाथक वार्क्य- मोहन आ रहार् होगार्।

(छ) प्रश्नाथक वार्क्य- क्यार् तुम कल जार्ने वार्ले हो?

(ज) संकेताथक वार्क्य- वह मेरार् पैसार् दे देतार् तो मैं पुस्तक खरीदतार्।

(झ) विस्मयार्दि बोधक वार्क्य- अरे! अभी तुम यहीं हो।

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