वस्ति क्यार् है? –

वस्ति क्यार् है?

By Bandey

अनुक्रम

वस्ति नार्म बड़ी आंत के लिए प्रयुक्त होतार् है । इस अभ्यार्स में गुदार् द्वार्रार् वार्यु अथवार् जल को खीचार् जार्तार् है जिससे बड़ी आंत की सफार्ई होती है। चुँकि बड़ी आंत शरीर में अवशिष्ट पदाथो क निष्काशन शरीर से बार्हर करती है।

वस्ति कर्म के प्रकार

वस्ति कर्म दो प्रकार क होतार् है (1) जल वस्ति (2) शुष्क वस्ति जल वस्ति जल वस्ति क अभ्यार्स जल में कियार् जार्तार् है शुष्क वस्ति क अभ्यार्स भूमि पर, सूखे स्थल पर कियार् जार्तार् है।


जल वस्ति

जल से बड़ी आंतो की सफार्ई की यह क्रियार् जल वस्ति के नार्म से जार्नी जार्ती है।

क्रियार्विधि-

  1. सरोवर, नदी में उत्कट आसन लगार्कर खडे हो जार्ये।
  2. पैरो को उत्कट आसन में इतनार् मोडे कि जल नार्भि तक आ जार्ये।
  3. दोनों हार्थों को जंघार्ओं पर रख लीजिए।
  4. गुदार् द्वार्र क संकुचन व प्रसार्रण कीजिए।

नोट- जल वस्ति की वह प्रार्चीनतम प्रक्रियार् के लार्भ एनिमार् द्वार्रार् भी लिए जार् सकते है।

लार्भ –

  1. मधुमेह के उपचार्र में सहार्यक है।
  2. आंतों के अनेकानेक रोगों विशेष रूप से कब्ज व बवार्सीर में लार्भकारी है।
  3. शरीर से दूषित वार्यु क निष्कासन कर शरीर की शुद्धि करती है।
  4. तंत्रिक तंत्र पर इसक प्रभार्व पड़तार् है।
  5. त्वचार् सम्बन्धित रोगों में भी लार्भकारी है।

सार्वधार्नियॉं- हठयोग की प्रार्चीनतम यह क्रियार् गुरू के मागदर्शन व निर्देश के अनुसार्र की जार्नी चार्हिए। चूँकि वर्तमार्न में सरोवर तार्लार्ब क जल अशुद्ध देखार् गयार् है। अत: योग गुरू के निर्देशार्नुसार्र इस क्रियार् की जगह ‘एनिमार्’ घर पर ही लियार् जार् सकतार् है।

स्थल वस्ति

चूँकि यह क्रियार् स्थयल अर्थार्त जमीन पर की जार्ती है अत: यह क्रियार् स्थल अर्थार्त जमीन पर की जार्ती है अत: यह क्रियार् स्थल वस्ति के नार्म से जार्नी जार्ती है।

क्रियार्विधि-

  1. सर्वप्रथम दण्डार्सन में बैठ जार्ये।
  2. दोनों हार्थो से दोनों पैरों की अंगुलियों को पकड़ ले।
  3. गुद्रार् द्वार्र क आंकुन्चन एवं प्रसार्रण कीजिए।
  4. “वार्स लेते समय गुद्रार् द्वार्रार् क आंकुन्चन तथार् “वार्स छोड़ते समय गुदार् द्वार्र क प्रसार्रण कीजिए।

लार्भ-

  1. बड़ी आंत की स्वछतार् की यह सर्वोत्तम विधि है।
  2. इस अभ्यार्स को नियमित करने से कोष्ठ दोष से मुक्ति मिलती है।
  3. भूख बढ़ार्ने में यह क्रियार् सहार्यक है।
  4. वार्यु विकार, अजीर्ण कब्ज, पित्त व कफ दोषों में लार्भकारी है।

सार्वधार्नियॉं-

  1. उच्च रक्त चार्प व हानियार् में इस अभ्यार्स को न करें।
  2. पार्चन सम्बन्धी कोई गंभीर रोग हो तो वो व्यक्ति भी इस अभ्यार्स को न करे।
  3. योग गुरू की सलार्ह इस अभ्यार्स को करनार् चार्हिए।

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