लोक व्यय क्यार् है? –

लोक व्यय क्यार् है?

By Bandey

अनुक्रम

लोक व्यय लोक व्यय उस व्यय को कहते हैं, जो लोक सनार्ओं-अर्थार्त् केन्द्र, रार्ज्य तथार् स्थार्नीय सरकारों के द्वार्रार् यार् तो नार्गरिकों की सार्मूहिक आवश्यकतार्ओं की सन्तुष्टि के लिए कियार् जार्तार् है अथवार् उन के आर्थिक एवं सार्मार्जिक कल्यार्ण में वृद्धि करने के लिए। आजकल सरकारी व्यय की मार्त्रार्, संसार्र के प्रार्य: सभी देशों में निरन्तर बढ़ रही है। इसक कारण यही है कि विभिन्न क्षेत्रों तथार् मोर्चों पर सरकार तथार् अन्य लोक निकायों (Public bodies) के कार्यों क निरन्तर विस्तार्र हो रहार् है। 19वीं शतार्ब्दी में तो सरकारी व्यय के सिद्धार्ंत को अधिक आवश्यक नहीं मार्नार् जार्तार् थार् क्योंकि उन दिनों सरकार के कार्यों क क्षेत्र बड़ार् सीमित थार्, किन्तु 20वीं शतार्ब्दी में, शिक्षार् तथार् सावजनिक स्वार्स्थ्य जैसे सार्मार्जिक मार्मलों में तथार् वार्णिज्यिक व औद्योगिक मार्मलों में जैसे-रेलवे, सिंचार्ई, बिजली तथार् ऐसी ही अन्य प्रयोजनार्ओं के क्षेत्र में रार्ज्य के कार्यों क अत्यधिक विस्तार्र हुआ है, अत: उन के कारण सरकारी व्यय में भार्री वृद्धि हुई है। सरकारी व्यय की प्रकृति तथार् मार्त्रार् के कारण और इस कारण कि यह अनेक प्रकार से देश के आर्थिक जीवन को प्रभार्वित कर सकतार् है, इसक महत्त्व काफी बढ़ गयार् है। उदार्हरण के लिए, सरकारी व्यय उत्पार्दन तथार् वितरण के स्तर को और आर्थिक क्रियार्ओं के सार्मार्न्य स्तर को प्रभार्वित कर सकतार् है।

प्रार्चीन विचार्रधार्रार्

प्रार्चीन अर्थशार्स्त्रियों ने सावजनिक व्यय पर बहुत कम ध्यार्न दियार् थार्। तत्कालीन रार्ज्य क कार्यक्षेत्र सीमित होने के कारण उन्होंने सावजनिक व्यय के सिद्धार्ंत को आवश्यक नहीं समझार्। शार्स्त्रीय यार् प्रार्चीन अर्थशार्स्त्री व्यक्तिगत आर्थिक स्वतन्त्रतार् पर जोर देते थे। वे नहीं चार्हते थे कि रार्ज्य अर्थव्यवस्थार् में अनार्वश्यक हस्तक्षेप करे। यही वह कारण है, जिससे शार्स्त्रीय अर्थशार्स्त्री रार्ज्य के कार्यक्षेत्र की सीमित रखनार् चार्हते थे। जे. बी. से (J. B. Say) के विचार्रार्नुसार्र-वित्त की सार्री योजनार्ओं में सर्वोत्तम वह है, जिसमें कम खर्च कियार् जार्ये। एडम स्मिथ क मत थार् कि रार्ज्य के कार्य न्यार्य, प्रतिरक्षार् और कुछ सावजनिक सेवार्ओं के प्रबन्ध तक ही सीमित रहने चार्हिए। एक अमेरिकन आलोचक के मतार्नुसार्र पुरार्ने अंग्रेज लेखकों को व्यय के सिद्धार्ंत की आवश्यकतार् नहीं थी, क्योंकि सरकार के सम्बन्ध में उनक जो सिद्धार्ंत थार्, उसक तार्त्पर्य थार् सरकारी कार्यों की एक निश्चित सीमार्।


सर पार्रनेल के शब्दों में-समार्जिक व्यवस्थार् को बनार्ये रखने तथार् विदेशी आक्रमणों से रक्षार् के लिए अति आवश्यक व्यय से अधिक व्यय क प्रत्येक भार्ग अपव्यय है तथार् जनतार् पर अन्यार्यपूर्ण तथार् अत्यार्चार्रपूर्ण भार्र है। इस प्रकार प्रार्चीन अर्थशार्स्त्री रार्ज्य के कार्यों को सीमित रखनार् चार्हते थे, क्योंकि वे सरकारी कार्यों को प्रार्य: अनुत्पार्लक तथार् समार्ज को कोई विशेष लार्भ न देने वार्ले मार्नते थे।

आधुनिक विचार्रधार्रार्

आजकल प्रार्चीन अर्थशार्स्त्रियों की उपर्युक्त विचार्रधार्रार् को सही नहीं कहार् जार् सकतार्, क्योंकि वर्तमार्न युग के रार्ज्य प्रार्चीन युग के रार्ज्यों की भार्ँति पुलिस रार्ज्य न होकर, कल्यार्णकारी रार्ज्य हैं। कल्यार्णकारी रार्ज्य को जनतार् क अधिक कल्यार्ण-कार्य करनार् पड़तार् है, जिसमें सरकार को सार्मार्जिक कल्यार्ण और आर्थिक विकास के लिए अनेक उद्देश्यों को पूरार् करने हेतु भार्री मार्त्रार् में व्यय करनार् पड़तार् है। यही कारण है कि वर्तमार्न रार्ज्यों के कार्यों में पर्यार्प्त वृद्धि हो गई है। आजकल सावजनिक व्यय प्रार्य: निम्नलिखित कार्यों के लिए कियार् जार्तार् है-

  1. सुरक्षार् के लिए,
  2. समार्ज के दलित वर्गों की रक्षार् के लिए,
  3. समार्ज के विकास के लिए,
  4. सावजनिक उद्योगों की स्थार्पनार् के लिए,
  5. व्यार्पार्र-चक्रों के प्रभार्वों को कम करने के लिए,
  6. प्रार्कृतिक प्रकोपों को दूर करने के लिए,
  7. जनोपयोगी सेवार्ओं के लिए,
  8. प्रशार्सनिक सेवार्ओं के लिए।

लोक व्यय में वृद्धि के कारण

रार्ज्य की क्रियार्ओं में वृद्धि

सरकारें उपभोक्तार्ओं को नि:शुल्क अथवार् लार्गत से कम मूल्य पर जो सेवार्एँ उपलब्ध करार्ती हैं, उनक क्षेत्र अब काफी बढ़ गयार् है। शिक्षार्, जनतार् क स्वार्स्थ्य तथार् जनतार् के लिए मनोरंजन की व्यवस्थार् इसके ज्वलन्त उदार्हरण हैं। मकानों तथार् चिकित्सार् सुविधार्ओं की व्यवस्थार् वे नये क्षेत्र हैं जिनमें सरकारें प्रविष्ट हो चुकी हैं। इन सेवार्ओं की व्यवस्थार् सरकार इस सिद्धार्ंत को दृष्टिगत रखकर करती है कि लार्भ प्रार्प्तकर्तार् अपने धन से इन सेवार्ओं क जितनार् उपयोग कर सकते हैं, उन के मुकाबले यदि सरकार इन सेवार्ओं क अधिक उपभोग करार् सके तो वह जनहित में ही होगार्। सरकारों ने रेलों तथार् सड़कों जैसे सावजनिक निर्मार्ण के कार्यों पर किये जार्ने वार्ले खर्चों में इसलिए काफी वृद्धि की है, तार्कि लोगों की कठिनार्इयार्ँ कम की जार् सके और बेकार पड़े श्रम तथार् सार्धनों क उपयोग कियार् जार् सके। इस प्रकार क व्यय देश को मन्दी की स्थिति से उबार्रने की दृष्टि से भी वार्ंछनीय मार्नार् जार्तार् है। इस संदर्भ में, यह मार्नार् जार् सकतार् है कि वर्तमार्न समय में रार्ज्य की क्रियार्ओं में वृद्धि से सम्बन्धित वैगनर क नियम (Wagner’s law) सावलौकिक रूप से सही है। वैगनर क कहनार् थार् कि रार्ज्य के कार्यों में व्यार्पक एवं गहन वृद्धि (extensive and intensive increase) की एक स्थार्यी प्रवृत्ति पार्ई जार्ती है। रार्ज्य नये-नये कार्यों को निरन्तर अपने हार्थ में लेते जार् रहे हैं और पुरार्ने कार्यों को और अधिक बड़े पैमार्ने पर अधिक कुशलतार् के सार्थ सम्पन्न कर रहे हैं। अत: इस बढ़ते हुए कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अधिकाधिक सरकारी व्यय को आश्रय लियार् जार् रहार् है।

औद्योगिक विकास

औद्योगिक क्रार्न्ति (Industrial Revolution) से संसार्र के अधिकांश देशों के केवल औद्योगिक ढार्ँचे में ही आमूल परिवर्तन नहीं हुआ अपितु उनक रार्जनैतिक व सार्मार्जिक रूप भी काफी बदल गयार् है। औद्योगिक क्रार्न्ति के पश्चार्त् आविष्कारों की लम्बी शृंखलार् के कारण जहार्ँ उत्पार्दन की विधियों में भार्री परिवर्तन हुए, वहार्ँ इन परिवर्तनों में रार्जनैतिक व सार्मार्जिक कारणों ने भी अपनार् योगदार्न दियार्। औद्योगिक उत्पार्दन की वृद्धि के सार्थ ही सार्थ लोगों की आय तथार् उनक जीवन-स्तर ऊँचार् उठार्, जनसंख्यार् के एक बड़े भार्ग को सहार्रार् मिलार् और उनमें अपनी नई-नई आवश्यकतार्ओं को सन्तुष्ट करने की क्षमतार् आई। इन सब परिवर्तनों के सार्थ ही, समस्यार्ओं क जन्म हुआ, जिसके फलस्वरूप श्रम-सम्बन्धों (labour relations), उद्योग-धन्धों के नियमन, उपभोक्तार्ओं के संरक्षण, धन तथार् आय के वितरण और आर्थिक असुरक्षार् से सम्बन्धित सरकार के कार्यों व खर्च में वृद्धि हुई।

सार्मार्जिक सुरक्षार् में वृद्धि

वर्तमार्न काल में रार्ज्यों ने सार्मार्न्यतयार् कल्यार्णकारी रार्ज्यों क रूप धार्रण कर लियार् है और समस्त देश में अपने श्रमिकों को किसी न किसी रूप में सार्मार्जिक सुरक्षार् प्रदार्न करते हैं। सरकारों की यह जिम्मेदार्री है कि वे देखें कि उद्यमी श्रमिकों को वार्स्तविक मजदूरी दे रहे हैं यार् नहीं तथार् उन के लिए पर्यार्प्त रूप से सार्मार्जिक सुरक्षार् प्रदार्न की गई है यार् नहीं। इस प्रकार वर्तमार्न सरकारें अपने नार्गरिकों की सार्मार्जिक सुरक्षार् जैसे, औद्योगिक श्रमिकों के लिए वृद्धार्वस्थार् में पेन्शन, आश्रित लार्भ, नि:शुल्क शिक्षार्, बीमार्री में सहार्यतार्, दुर्घटनार् लार्भ, चिकित्सार् सुविधार् आदि पर बड़ी मार्त्रार् में व्यय करती हैं। इसके अलार्वार् कई सरकारों ने गृह-निर्मार्ण में सहार्यतार् तथार् बेरोजगार्री लार्भ की योजनार्एँ शुरू की हैं। आजकल सरकार अपने नार्गरिकों के लिए स्वार्स्थ्य एवं चिकित्सार् सुविधार्एँ प्रदार्न करने के लिए काफी मार्त्रार् में व्यय करती है। भार्रतवर्ष में भी सन् 1948 में रार्ज्य अधिनियम के अन्तर्गत कर्मचार्रियों को विभिन्न प्रकार की सुविधार्एँ प्रदार्न की जार् रही हैं।

उद्योग-धन्धों तथार् व्यार्पार्र क रार्ष्ट्रीयकरण

व्यार्पार्र तथार् उद्योगों क रार्ष्ट्रीयकरण सरकार की ओर से कियार् जार्ने वार्लार् एक ऐसार् प्रयार्स है जिसके द्वार्रार् सरकार जनतार् के लिए न्यूनार्धिक रूप से वार्णिज्यिक आधार्र पर वस्तुएँ सेवार्एँ प्रदार्न करने की व्यवस्थार् करती है। सरकार ऐसे उत्तरदार्यित्व को अपने ऊपर कई कारणों से ले सकती है, जैसे एकाधिकारों (monopolies) अथवार् अद्धर्-एकाधिकारों के नियमन की कठिन समस्यार् के समार्धार्न के लिए, उपभोक्तार्ओं को घटी कीमतों पर वस्तुएँ तथार् सेवार्एँ उपलब्ध करार्ने के लिए अथवार् गैर-सरकारी आर्थिक गतिविधियों की सीमार् निर्धार्रित करने के लिए। इससे धन तथार् आय के वितरण और श्रम की दशार्ओं में भी सुधार्र की सम्भार्वनार् रहती है। परन्तु रार्ष्ट्रीयकरण किये गये उद्योगों की क्षति पूर्ति के भुगतार्न तथार् उन उद्योगों की स्थार्पनार् व संचार्लन के लिए सरकार को भार्री मार्त्रार् में व्यय करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार निजी व्यवसार्य तथार् व्यार्पार्र को भी इसलिए अपने अधिकार में ले सकती है जिससे वह समस्यार्ओं को हल कर सके तथार् रार्जकोष (treasury) के लिए अधिक लार्भ कमार् सके।

कृषि विकास

किसी देश विशेषकर भार्रत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्थार् क कृषि विकास उसकी अर्थव्यवस्थार् के विकास की धुरी होतार् है। आर्थिक विकास के लिए कृषि तथार् गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों के विकास करने के लिए सुविधार्एँ प्रदार्न करनी आवश्यक होती हैं क्योंकि दोनों क्षेत्र परस्पर निर्भर करते हैं। उदार्हरणाथ, कृषि आय में वृद्धि होने से औद्योगिक वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि हो जार्ती है जिसके फलस्वरूप औद्योगीकरण को बढ़ार्वार् मिलतार् है। इस प्रकार कृषि तथार् उद्योगों में परस्पर निर्भरतार् होती है। इस निर्भरतार् को निम्न प्रकार दर्शार्यार् जार् सकतार् है-छषि क्षेत्र क कच्चार् मार्ल उद्योगों में आगतों (inputs) के रूप में काम में लार्यार् जार्तार् है। इसी प्रकार उद्योगों क निर्गत (output) कृषि क्षेत्र में आगतों के रूप में प्रयोग होतार् है। इस प्रकार भार्रत जैसे देश में आर्थिक एवं सार्मार्जिक विकास को द्रुतगति प्रदार्न करने के लिए कृषि ढार्ँचे को मजबूत करनार् जरूरी है। इसलिए विकासशील देश अपने कृषि विकास के लिए बड़ी मार्त्रार् में व्यय कर रहे हैं। सरकार किसार्नों को कम ब्यार्ज दर पर ऋण प्रदार्न करनार्, निर्यार्तों को अनुदार्न, कृषिगत वस्तुओं क निर्धार्रित मूल्य पर क्रय, तटकर सुविधार् प्रदार्न करनार् इत्यार्दि सुविधार्ओं पर व्यय करती है। इसके अतिरिक्त सरकार कृषि अनुसन्धार्न एवं कृषिगत सार्धनों के निर्मार्ण पर काफी मार्त्रार् में व्यय करती है।

कीमतों के बढ़ने की प्रवृत्ति

संसार्र के प्रत्येक देश में कीमतों में वृद्धि की जो प्रवृत्ति पार्ई जार्ती है, उसके कारण भी सरकारी व्यय बढ़तार् नजर आतार् है। मूल्य-स्तर में वृद्धि होने के सार्थ ही सरकारें इस बार्त के लिए बार्ध्य हो जार्ती हैं कि वे उन वस्तुओं व सेवार्ओं के लिए अधिक धन क भुगतार्न करें जिन्हें कि वे चार्हती हैं और सरकारी कर्मचार्रियों के वेतन तथार् महँगार्ई भत्ते में वृद्धि करें। यह स्थिति सरकारी व्यय क और विस्तार्र करती है, यद्यपि इस विस्तार्र से यह आवश्यक नहीं है कि सरकारी क्रियार्ओं में भी वृद्धि हो। इस प्रकार सरकारी व्यय में जो वृद्धि होती है, वह जितनी वार्स्तविक होती है, उससे कुछ अधिक ही दिखार्ई देती है।

प्रतिरक्षार् की समस्यार्

इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि देश की प्रतिरक्षार् की समस्यार् सरकारी खर्च की वृद्धि क एक प्रमुख कारण बन गई है। कोई देश अपनी प्रतिरक्षार् के लिए सेनार्ओं को शक्तिशार्ली बनार्नार् चार्हतार् है तो दूसरे केवल आत्मरक्षार् के लिए ही ऐसार् पग उठार्ने को विवश हो जार्ते हैं। युद्ध सम्बन्धी हथियार्रों के निर्मार्ण तथार् सेनार् के रख-रखार्व पर भार्री धनरार्शि व्यय करनी होती है। पिफर, युद्ध लड़ने की विधियों में दिन-रार्त जो परिवर्तन होते रहते हैं उन के कारण भी सेनार् को नये-नये हथियार्रों की आवश्यकतार् होती है। इससे पुन: रार्ज्य पर खर्च क भार्र बढ़तार् है। प्रतिरक्षार् व्यय में केवल सैनिकों तथार् सैनिक सार्मग्री क व्यय ही सम्मिलित नहीं होतार् है बल्कि सैनिकों की पेन्शन तथार् युद्ध हेतु लिए गये ऋण पर ब्यार्ज भी शार्मिल होतार् है। युद्ध के विज्ञार्न और कलार् में इतनी अधिक प्रगति हुई है कि आज के शस्त्र कल पुरार्ने तथार् अप्रचलित हो जार्ते हैं जिससे युद्ध व्यवस्थार् बड़ी खर्चीली हो गयी है। काफी देश सुरक्षार् पर अपनी रार्ष्ट्रीय आय क बड़ी मार्त्रार् में व्यय कर रहे हैं। उदार्हरणाथ, पार्किस्तार्न अपनी रार्ष्ट्रीय आय क लगभग 15 प्रतिशत तथार् भार्रत लगभग 5 प्रतिशत व्यय करते हैं। भार्रत में यह व्यय 1950-51 में केवल 164.13 करोड़ रु. थार् जो 1986-87 के बजट में 9728 करोड़ रुपयार् आँक गयार् है।

नगरीकरण यार् शहरीकरण

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जनसंख्यार् क बढ़तार् हुआ शहरीकरण भी सरकारी खर्च की वृद्धि क एक महत्त्वपूर्ण कारण है। नगरों पर बढ़ती हुई लार्गत क नियम पूर्णतयार् लार्गू होतार् है। नगर क आकार बढ़ने के सार्थ ही सार्थ जल-पूर्ति, यार्तार्यार्त सेवार् व उसक नियन्त्रण, पुलिस संरक्षण, स्वार्स्थ्य तथार् सपफार्ई आदि सेवार्ओं पर किये जार्ने वार्ले खर्च की प्रति व्यक्ति लार्गत भी बढ़ जार्ती है। इसके अतिरिक्त अस्पतार्लों, सड़कों, गलियों, रोशनी, खेल के मैदार्न तथार् सार्मुदार्यिक हॉल आदि के निर्मार्ण व रख-रखार्व के कारण तथार् जीवनपयोगी अनिवाय पदाथों के वितरण व नियन्त्रण के कारण भी सरकारों पर खर्च क अतिरिक्त भार्र पड़तार् है।

सरकार के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन

सरकारी खर्च में कुछ वृद्धि इस कारण भी हुई है क्योंकि पिछले वर्षों में सरकार के प्रति सार्मार्न्य दृष्टिकोण में काफी परिवर्तन हुआ है। एक शतार्ब्दी पूर्व तो लोग सरकार के नार्म से भी डरते थे और उसे निरंकुश तथार् स्वेच्छार्चार्री शक्ति क प्रतीक समझते थे। किन्तु आज इस सम्बन्ध में सर्वसार्मार्न्य दृष्टिकोण यह है कि सार्मार्न्य व्यक्ति के लिए अच्छी वस्तु तथार् सभी व्यक्तियों के लिए अधिक सुविधार्पूर्ण जीवन तब तक उपलब्ध नहीं करार्यार् जार् सकतार्, जब तक कि काफी मार्त्रार् में सरकार पर निर्भर न रहार् जार्ये। सरकार के प्रति दृष्टिकोण में इस परिवर्तन के अनेक कारण हैं, जिनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण कारणों क उल्लेख नीचे कियार् जार् रहार् है-

  1. तकनीकी परिवर्तन-तकनीकी परिवर्तनों के कारण भी परस्पर निर्भरतार् की भार्वनार् में वृद्धि हुई है तथार् इस कारण भी अनेक लोग ऐसी शक्तियों के बीच कार्य करने में असमर्थ रहते हैं जो कि उन के नियंत्रण से पूरी तरह बार्हर होती हैं।
  2. जब व्यवसार्य तथार् उत्पार्दन की छोटी-छोटी इकाइयार्ँ हुआ करती थीं-आर्थिक पद्धति एक स्वयं चलित मशीनरी के रूप में अच्छी प्रकार कार्य करती दिखार्ई देती थी, वही आर्थिक पद्धति जब एकाधिकारी नियन्त्रण के अधीन दलदल में फँसी हुई तथार् अनेक प्रकार से शोषण सी करती हुई दिखार्ई देती है। इसी के फलस्वरूप सरकार से यह मार्ँग की जार्ने लगी कि वह व्यार्वसार्यिक मन्दी क प्रतिरोध करे तथार् अद्धर्-व्यवसार्य को सन्तुलित रखे। कुछ लोग यहार्ँ तक जोर डार्लते हैं कि सरकार को आर्थिक स्थिरतार् बनार्ये रखने की जिम्मेदार्री अपने ऊपर लेनी चार्हिए, परन्तु ऐसार् होनार् तभी सम्भव है जबकि सरकारी खर्च में वृद्धि की जार्ये।
  3. मार्नव कल्यार्ण-वर्तमार्न समय में मार्नवतार् की भार्वनार् के अधिकाधिक विकास के कारण किसी भी देश में विद्यमार्न व्यार्पक गरीबी को बहुत बुरार् समझार् जार्तार् है और उसको मिटार्ने के लिए सार्मूहिक पग उठार्ने क सुझार्व दियार् जार्तार् है। इस स्थिति में सरकार क सहयोग अनिवाय हो जार्तार् है। और सावजनिक कल्यार्ण तथार् सावजनिक निर्मार्ण के कार्यों के लिए उसे भार्री व्यय क आशय लेनार् होतार् है।
  4. आर्थिक व रार्जनीतिक जटिलतार्एँ-यह भी अनुभव कियार् जार्तार् है कि आजकल रार्जनीतिक व आार्ख्रथक समस्यार्ओं की जटिलतार्एँ बहुत बढ़ गई हैं। अन्य कारणों में भी एक कारण है जो शिक्षार् तथार् अन्य अनेक ऐसी कल्यार्णकारी क्रियार्ओं के लिए बड़ी मार्त्रार् में खर्च की वृद्धि को प्रोत्सार्हित करतार् है जैसे कि चिकित्सार्, मकान, पुलिस तथार् गृह प्रशार्सन आदि।

आर्थिक विकास

अल्पविकसित देशों में भी सरकारी व्यय तेजी से बढ़ रहार् है। ऐसे देशों में अधिकतर देश अपने यहार्ँ तीव्र आर्थिक विकास के कार्यक्रमों को लार्गू करते हैं। इन कार्यक्रमों के अन्तर्गत परिवहन, संचार्र तथार् विद्युत जैसी मूलभूत आर्थिक सेवार्ओं की व्यवस्थार् की जार्ती है। रार्ज्य के लिए यह आवश्यक होतार् है कि वह उच्च कोटि के आर्थिक व सार्मार्जिक सेवार्ओं की व्यवस्थार् करे तार्कि उद्योग-धन्धे तेजी से विकसित हो सके। इसके अतिरिक्त अधिकांश आधुनिक सरकारों की यह एक नीति बन गई है कि उत्पार्दन के प्रयार्सों में निजी व्यक्तियों की मदद की जार्ये। कृषकों तथार् उद्योगपतियों को उपार्दार्न (bounties), कर्ज (loans) तथार् सहार्यक अनुदार्न (grant-in-aid) देकर वे ऐसार् करती हैं। यही नहीं, विभिन्न प्रकार की सुविधार्एँ प्रदार्न कर के भी सरकार द्वार्रार् उनकी सहार्यतार् की जार्ती है जैसे कि तकनीकी माग-दर्शन तथार् कच्चे मार्ल आदि की सहार्यतार्।

आर्थिक नियोजन

सभी देशों ने रूस की आर्थिक नियोजन की सफलतार् से प्रभार्वित होकर अपने आर्थिक विकास नियोजित रूप में करने आरम्भ कर दिये हैं। आर्थिक नियोजन में इस प्रकार के प्रयार्स किये जार्ते हैं कि उपलब्ध सार्धनों क इस प्रकार से शोषण कियार् जार्ये तार्कि चहुँमुखी आर्थिक विकास के सार्थ लोगों क जीवन-स्तर ऊँचार् उठे तथार् रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि हो। आर्थिक नियोजन के लिए सरकार को बड़ी-बड़ी परियोजनार्एँ बनार्नी पड़ती हैं जिनको पूरार् करने के लिए काफी मार्त्रार् में धन की आवश्यकतार् होती है। देश व विदेशों से ऋण लेने के पश्चार्त् भी यदि व्यय की पूर्ति नहीं होती है तो घार्टे की वित्त व्यवस्थार् क प्रबन्ध करनार् पड़तार् है। उदार्हरण के लिये, भार्रत में अब तक छ: पंचवष्र्ार्ीय योजनार्एँ पूरी हो चुकी हैं और उन पर क्रमश: अधिक व्यय हुआ है। सार्तवीं योजनार् में पिछली योजनार्ओं से कहीं अधिक व्यय की व्यवस्थार् की गई थी। सार्तवीं योजनार् (1985-90) के लिए रखी गई रार्शि 1984-85 की कीमतों के आधार्र पर थी। छठी योजनार् में वार्स्तविक कुल व्यय 11, 000 करोड़ रुपयार् हुआ है। सार्तवीं योजनार् में सावजनिक क्षेत्र के लिए 1, 80, 000 करोड़ रुपये की व्यवस्थार् की गई थी। आठवीं योजनार् 1992-1997 के लिये है।

जनसंख्यार् में वृद्धि

सावजनिक व्यय में वृद्धि क एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण जनसंख्यार् वृद्धि दर भी है। बढ़ी हुई जनसंख्यार् के सुख और सुविधार्ओं के लिए सरकार को काफी मार्त्रार् में व्यय करनार् पड़तार् है। विगत वर्षों में जनसंख्यार् में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। विश्व स्वार्स्थ्य संगठन के अनुसार्र विगत 45 वर्षों में विश्व की जनसंख्यार् 155 करोड़ से बढ़कर 415 करोड़ हो गई है। भार्रत की जनसंख्यार् 1981 की जनगणनार् के अनुसार्र 68.38 करोड़ हो गई है। भार्रत की आबार्दी में लगभग 2.5 प्रतिशत की वार्ख्रषक वृद्धि हो रही है। जनसंख्यार् वृद्धि से न केवल रार्ज्य के प्रशार्सन के व्यय में वृद्धि होती है बल्कि उन के सुख-सुविधार्ओं की वृद्धि करने पर रार्ज्य के व्यय में वृद्धि हो जार्ती है। सरकार को बढ़ती हुई जनसंख्यार् के लिए शिक्षार्, स्वार्स्थ्य, मनोरंजन, आवार्स आदि पर काफी मार्त्रार् में व्यय करनार् पड़तार् है।

अन्य कारण

  1. मूल्यों में वृद्धि-द्वितीय महार्युद्ध के पश्चार्त् प्रत्येक देश में कीमतों में बहुत वृद्धि हुई है। मूल्य स्तर में वृद्धि के फलस्वरूप सरकार को पहले की अपेक्षार् अधिक व्यय करनार् पड़ रहार् है। एक तो सरकार को स्वयं कई वस्तुएँ एवं सेवार्एँ खरीदनी पड़ती हैं तथार् द्वितीयत: सरकार उत्पार्दन के लिए जो भी व्यय क अनुमार्न लगार्ती है, कीमतों में वृद्धि होने के कारण सरकार को उस उत्पार्दन पर पहले की अपेक्षार् अधिक खर्च करनार् पड़तार् है।
  2. रार्ष्ट्रीय आय एवं जीवन-स्तर में वृद्धि-पिछले वर्षों में आर्थिक विकास के फलस्वरूप रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि हुई जिसके फलस्वरूप लोगों के जीवन-स्तर में वृद्धि हुई है। सरकार को इस जीवन-स्तर के बढ़ने के सार्थ-सार्थ अधिक व्यय करनार् पड़ रहार् है।
  3. प्रजार्तन्त्र क भार्र-विश्व में अनेक देशों में प्रजार्तन्त्रीय सरकार है। इसके लिये सरकार को मुख्य चुनार्व एवं मध्यार्वधि चुनार्व करार्ने पड़ते हैं जिनको सम्पन्न करार्ने के लिए सरकार को काफी व्यय करनार् पड़तार् है। इसके अलार्वार् मन्त्री एवं अन्य चुने हुए प्रतिनिधियों पर सरकार को काफी व्यय करनार् पड़तार् है। सरकारों को अन्य देशों से भी कूटनीतिक सम्बन्ध बनार्ये रखने पड़ते हैं। दूसरे देशों में रार्जदूतार्वार्स खोलने पड़ते हैं जिन पर भी सरकार को काफी व्यय करनार् पड़तार् है।
  4. अन्तर्रार्ष्ट्रीय सहयोग-वर्तमार्न युग में प्रत्येक देश को दूसरे देशों से आर्थिक सहयोग करनार् पड़तार् है। प्रत्येक सरकार किसी न किसी देश की ऋण, अनुदार्न एवं अन्य आर्थिक सहार्यतार् देती है। इसके अतिरिक्त अन्तर्रार्ष्ट्रीय वित्तीय संस्थार्एँ जैसे-अन्तर्रार्ष्ट्रीय मुद्रार्कोष, अन्तर्रार्ष्ट्रीय पुनर्निर्मार्ण एवं विकास बैंक, अन्तर्रार्ष्ट्रीय विकास संघ, एशियन बैंक इत्यार्दि संस्थार्ओं को भी समय-समय पर सरकार को सदस्यतार् शुल्क देनार् होतार् है। इस प्रकार अन्तर्रार्ष्ट्रीय सहयोग बनार्ये रखने के लिए सरकारों को काफी व्यय करनार् पड़ रहार् है।

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