लियोपोल्ड वॉन रार्ंके क जीवन परिचय तथार् उसकी रचनार्एं
लियोपोल्ड वॉन रॉके

लियोपोल्ड वॉन रॉके इतिहार्स में आधुनिक शार्स्त्रीय अध्ययन और इतिहार्स लेखन की प्रणार्ली में पथप्रदर्शक की भूमिक 19 वीं शतार्ब्दी के जर्मन विश्वविद्यार्लयों, विशेषकर, गॉन्टिनजेन विश्वविद्यार्लय ने निभार्ई थी। महार्नतम जर्मन इतिहार्सकार, वस्तुनिश्ठ इतिहार्स लेखन के जनक, मूल्यों से मुक्त वस्तुनिश्ठतार् के मसीहार् तथार् आलोचनार्त्मक इतिहार्स-विज्ञार्न के संस्थार्पक – लियोपोल्ड वॉन रॉके ने इस क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय योगदार्न दियार् है। यूनीवर्सिटी ऑफ लीपज़िग में रॉके ने धर्म-शार्स्त्र एवं शार्स्त्रीय दर्शन की शिक्षार् प्रार्प्त की थी। जिमनेशियम ऑफ़ फ्रैकफ़र्ट में सार्त वर्श अध्यार्पन कार्य करने के दौरार्न अचार्नक ही रॉके की अभिरुचि दर्शन के स्थार्न पर इतिहार्स में हो गई। प्रार्चीन रोम के इतिहार्स के सन्दर्भ में बाटहोल्ड नेबूर द्वार्रार् ऐतिहार्सिक अन्वेशण की वैज्ञार्निक प्रणार्ली क विस्तार्र कर रॉके ने इतिहार्स दर्शन की निश्चयार्त्मक अभिगम क विकास कियार्।


बार्वेरियार् के शार्सक मैक्समिलियन द्वितीय ने रॉके से प्रभार्वित होकर ने बार्वेरियन एकेडमी ऑफ़ सार्इंस के अन्तर्गत 1858 में हिस्टोरिकल कमीशन की स्थार्पनार् की और रॉके को उसक अध्यक्ष नियुक्त कियार्। अपने ग्रंथ ‘दि हिस्ट्री ऑफ़ दि लैटिन एण्ड ट्यूटोनिक पीपुल्स फ्रॉम 1494 टु 1514’ से ही रॉके ने अपने समकालीन इतिहार्सकारों की तुलनार् में विविध ऐतिहार्सिक स्रोतों क अत्यधिक विस्तृत अध्ययन कियार्। इनमें संस्मरण, दैनन्दिनी, व्यक्तिगत एवं औपचार्रिक पत्र,सरकारी दस्तार्वेज़, कूटनीतिक विज्ञप्ति और प्रत्यक्षदर्शियों क आँखो-देखार् वृतार्न्त सम्मिलित थे। लियोपोल्ड वॉन रॉके को इस बार्त क श्रेय दियार् जार्तार् है कि उसी के कारण परवर्ती काल की शैक्षिक संस्थार्ओं में सुव्यवस्थित अभिलेखीय शोध और स्रोत-समीक्षार् के सिद्धार्न्तों को अपनार्यार् जार्नार् एक आम बार्त हो गई।

लियोपोल्ड वॉन रॉके इतिहार्स की महत्तार् और उपयोगितार् को स्वीकार करतार् है। ‘हिस्ट्री ऑफ़ दि लैटिन एण्ड जर्मेनिक नेशन्स’ में वह कहतार् है – ‘ आप यह समझते हैं कि इतिहार्स को भूतकाल क आकलन करने क तथार् भविष्य के कल्यार्ण हेतु वर्तमार्न को निर्दिश्ट करने क दार्यित्व दियार् गयार् है। परन्तु मेरार् ग्रंथ ऐसी कोई आशार् नहीं रखतार् है। यह तो केवल यह प्रस्तुत करने की कोशिश करनार् चार्हतार् है कि वार्स्तव में क्यार् घटित हुआ।’

लियोपोल्ड वॉन रॉके के पूर्ववर्ती इतिहार्सकार अपने ग्रंथों की रचनार् करते समय बिनार् अभिलेखीय शोध किए हुए पूर्व-रचित ग्रंथों की हू-ब-हू नकल कर लेते थे और स्रोत-विश्लेशण क आलोचनार्त्मक परीक्षण भी नहीं करते थे। रॉके किस प्रकार किसी चयनित विशय पर शोध करतार् थार्? अपनी पहली ही रचनार् से लेकर अपनी अन्तिम रचनार् तक रॉके ने अभिलेखीय शोध हेतु अथक परिश्रम कियार् थार्। अपने जीवन में उसने 50,000 दस्तार्वेज़ों को एकत्र कियार् थार्। अपने शोध में उसने गौण स्रोतों को भी महत्व दियार् थार्। उसके निजी पुस्तकालय में 24,000 ग्रंथ थे।

1831 में उसने ‘कॉन्सिपिरेसी ऑफ़ वेनिस-1618’ की रचनार् की। इस पुस्तक में रॉके ने यूरोपीय इतिहार्स के एक विशिष्ट क्षण (एक खार्स घटनार्) का, तथार् उससे सम्बन्धित मूल स्रोतों क विष्लेशण कियार् है। रॉके ने अन्तर्रार्ष्ट्रीय रार्जनीतिक परिदृष्य को इतिहार्स में महत्वपूर्ण स्थार्न दिलार्ने में सफलतार् प्रार्प्त की। उसक कहनार् थार् – ‘इतिहार्स में विशेष तथ्य क उल्लेख होतार् है किन्तु उसे व्यार्पक सन्दर्भ ही देखार् जार्नार् चार्हिए।’

1832-36 में वह ‘हिस्टोरिको.पोलिटिकल रिव्यू’ क सम्पार्दक रहार्। 1834 से 1836 के मध्य उसने बहु-खण्डी ‘हिस्ट्री ऑफ़ दि पोप्स, देयर चर्च एण्ड देयर स्टेट इन दि सिक्सटीन्थ एण्ड सेवेन्टीन्थ सेन्चुरीज़’ की रचनार् की। प्रोटैस्टेन्ट मत के अनुयार्यी होने के कारण उसे वैटिकन अभिलेखगार्र जार्कर मूल स्रोतों क अध्ध्यन करने की अनुमति प्रार्प्त नहीं हुई किन्तु उसने इस हेतु रोम तथार् वेनिस में उपलब्ध सभी निजी पत्रों क विस्तृत अध्ध्यन कर इस वृहद ग्रंथ की रचनार् की थी। रॉके ने पोप के पद को यूरोपीय सभ्यतार् को एकीकृत करने क श्रेय दियार् है। इस पुस्तक क सार्र प्रति-धर्मसुधार्र आन्दोलन थार् जिसक कि रॉके पहलार् आधिकारिक व्यार्ख्यार्कार थार्। जी0 पी0 गूच ने इस ग्रंथ में रोमन कैथोलिकों एवं प्रोटेस्टैन्टों के प्रति पूर्णरूपेण तटस्थ भार्व रखने के लिए रॉके की भूरि-भूरि प्रशंसार् की है। रॉके ने 1839 से 1843 के मध्य ‘जर्मन हिस्ट्री ऐट दि टार्इम ऑफ़ दि रिफ़ॉर्मेशन’ की रचनार् की। इस पुस्तक क विषय प्रोटेस्टैन्ट मत की उत्पत्ति है किन्तु गूच के अनुसार्र इसमें रॉके ने माटिन लूथर की उपलब्धियों को बढ़ार्-चढ़ार् कर दिखार्यार् है। 1847-48 में रॉके ने ‘नार्इन बुक्स ऑफ़ प्रशियन हिस्ट्री’ की रचनार् की जिसमें कि उसने एक महार्-शक्ति के रूप में प्रशार् के उत्थार्न पर प्रकाश डार्लार् है। लियोपोल्ड वॉन रॉके हिंसक क्रार्न्ति क पोशक नहीं थार् क्योंकि वह ईश्वर प्रदत्त विधार्न में विश्वार्स रखतार् थार्। 1836 में लिखे गए अपने लेख – ‘डॉयलॉग ऑन पोलिटिक्स’ में उसने यह कहार् है कि ईश्वर द्वार्रार् हर देश को एक खार्स नैतिक चरित्र प्रदार्न कियार् गयार् है। उसने इन देशों के निवार्सियों से यह अपेक्षार् की कि वो अपने-अपने रार्श्ट्र के विशिष्ट नैतिक चरित्र को उत्कृश्टतार् तक पहुंचार्ने के लिए हर सम्भव प्रयार्स करें। रॉके तथ्यों की प्रस्तुति में भले ही तटस्थतार् क दार्वार् करतार् हो किन्तु उसके इतिहार्स लेखन में उसकी अपनी पसन्द और नार्पसन्द की झलक मिल जार्ती है। ई0 एच0 कार ‘व्हार्ट इज हिस्ट्री’ में कहतार् है – ‘तथ्य वही बोलते हैं जो इतिहार्सकार उनसे बुलवार्तार् है।’

1859 में लियोपोल्ड वॉन रॉके ने इतिहार्स सम्बन्धित पत्रिक ‘हिस्टोरिक पोलिट्ज़े ज़ीट्शरिफ़्ट’ क प्रकाशन कियार् जिसक कि उद्देश्य इतिहार्स लेखन को वैज्ञार्निक आधार्र प्रदार्न करनार् और ऐतिहार्सिक शोध की एक निश्चित एवं यथाथवार्दी प्रणार्ली क प्रतिनिधित्व करनार् थार्। अपनी इस पत्रिक में रॉके ने उदार्रतार्वार्द पर प्रहार्र किए। रॉके ने यूरोप की सभी महार्-शक्तियों क पृथक-पृथक इतिहार्स लिखार्। इन इतिहार्स- ग्रंथों में ‘दि ओटोमन एण्ड दि स्पैनिश एम्पार्यर्स इन दि सिक्सटींथ एण्ड सेविन्टींथ सेन्चुरीज़’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ फ्रार्ंस (1852-61)’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंग्लैण्ड (1859-68)’ तथार् ‘दि जर्मन पॉवर्स एण्ड दि प्रिन्सेज़ लीग (1871)’ प्रमुख हैं। रॉके ने अपने ग्रंथ ‘हिस्ट्री ऑफ़ फ्रार्ंस’ में स्वयं जर्मन होते हुए भी फ्ऱार्न्सीसियों के प्रति किसी भी प्रकार की दुर्भार्वनार् नहीं रखी है। इस पुस्तक में उसने एकछत्र रार्जतन्त्र के अन्तर्गत हेनरी चतुर्थ के चरित्र और उसकी नीतियों, सली के आर्थिक सुधार्रों, रिशलू की महार्नतार् व निश्ठुरतार्, मैज़ेरिन क मिथ्यार्भिमार्न और उसक लार्लच तथार् लुई चौदहवें के शार्सन की विस्तार्र से चर्चार् की गई है। रॉके ने लुई चौइहवें की विदेश नीति की भत्र्सनार् की है किन्तु कलार्, सार्हित्य और विज्ञार्न के विकास में उसके योगदार्न की सरार्हनार् की है। अपने जीवन के अन्तिम चरण में रॉके ने सावभौमिक इतिहार्स ‘यूनीवर्सल हिस्ट्री: दि ओल्डेस्ट हिस्टोरिकल ग्रुप ऑफ़ नेशन्स एण्ड दि ग्रीक’ की रचनार् की। रॉके की एक अन्य महत्वपूर्ण रचनार् के अंग्रेज़ी अनुवार्द क शीर्षक – ‘दि सीक्रेट ऑफ़ वर्ड हिस्ट्री: सेलेक्टेड रार्इटिंग्स ऑन दि आर्ट एण्ड सार्इंस ऑफ़ हिस्ट्री’ है।

लियोपोल्ड वॉन रॉके क इतिहार्स

दर्शन यूनार्नी इतिहार्सकार थ्यूसीडार्इडीस (456-396 ईसार् पूर्व) घटनार्ओं की तह तक जार्कर तथ्यों को एकत्र करतार् थार् और वह तथ्यों को इतिहार्स की रीढ़ की हड्डी मार्नतार् थार्। यूनार्नी इतिहार्सकार पोलिबियस ने सत्य को इतिहार्स की आँख मार्नार् थार्, वह कहतार् थार् कि यदि इतिहार्स में से सत्य निकाल लियार् जार्ए तो वह अंधार् हो जार्एगार्। चीनी इतिहार्स लेखन में भी तथ्यों की यथाथतार् पर विशेष बल दियार् गयार् है। उन्नीसवीं शतार्ब्दी में इतिहार्स लेखन के लिए प्रार्मार्णिक तथ्यों की आवश्यकतार् पर ग्रैण्ड ग्रार्उण्ड ने लिखार् थार् – ‘मुझे तथ्य चार्हिए और जीवन में हमको केवल तथ्यों की आवश्यकतार् है।’

लियोपोल्ड वॉन रॉके ने स्रोतों की विश्वसनीयतार् अर्थार्त् उनकी निश्चयार्त्मकतार् नितार्न्त आवश्यक मार्नार् है। उसकी दृष्टि में अनुमार्न क इतिहार्स लेखन में कोई स्थार्न नहीं है और अनुमार्न व निष्कर्ष क अधिकार केवल पार्ठक क है। उसक मार्ननार् है कि इतिहार्सकारों को सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन करने की प्रवृत्ति से बचकर रहनार् चार्हिए। रॉके इतिहार्स और दर्शन शार्स्त्र की घनिष्टतार् के भी विरुद्ध है। रॉके तथ्यों को बुद्धि की कसौटी पर परख कर ही उनको इतिहार्स लेखन के लिए उपयुक्त मार्नतार् है। रॉके की दृष्टि में इतिहार्सकार क यह धर्म है कि वह तथ्यों को उसी रूप में प्रस्तुत करे जैसे कि वो वार्स्तव में थे। इतिहार्स दर्शन की निश्चयार्त्मक अभिगम क जनक रॉके प्रार्थमिक स्रोतों की प्रार्मार्णिकतार् के बिनार् उन्हें स्वीकार नहीं करतार् है। विवेचनार्त्मक ऐतिहार्सिक विज्ञार्न क पथप्रदर्शक रॉके कहतार् है – ‘मैं उस समय की आहट सुन रहार् हूँ जब हम आधुनिक इतिहार्स को विवरणों (भले वो समकालीन भी क्यों न हों) पर आधार्रित करने के स्थार्न पर प्रत्यक्ष-दर्शियों के बयार्नों और प्रार्मार्णिक व मौलिक दस्तार्वेज़ों के आधार्र पर लिखेंगे।’

इतिहार्स के तकनीकी दृष्टिकोण के अनुसार्र प्रत्येक काल अपने परवर्ती काल की तुलनार् में पिछड़ार् हुआ होतार् है। सत्रहवीं शतार्ब्दी में इतिहार्सकारों क यह विश्वार्स थार् कि यह पार्श्चार्त्य सभ्यतार् की नियति थी कि वह कपोल-कल्पनार्ओं क विनार्श करे, सार्ंस्कृतिक स्मरणों को मिटार् दे और इतिहार्स को अप्रसार्ंगिक बनार् दे। परन्तु रॉके इसे स्वीकार नहीं करतार् है। रॉके क यह मत है कि -’हम सार्वधार्नी व सार्हस के सार्थ विशिष्ट से सार्मार्न्य की ओर बढ़ सकते हैं किन्तु ऐसार् कोई माग नहीं है जिससे कि हम सार्मार्न्य से विशिष्ट की ओर बढ़ सकें।’ बार्वेरियार् के भार्वी शार्सक मैक्समिलियन द्वितीय के समक्ष अपनी भार्षण श्रृंखलार् में रॉके ने कहार् थार् – ‘प्रत्येक युग ईश्वर के निकट है।’ इस कथन से उसक तार्त्पर्य यह थार् कि इतिहार्स क प्रत्येक युग विशिष्ट है और उसको उसी के परिप्रेक्ष्य में समझनार् चार्हिए और केवल उन सार्मार्न्य विचार्रों की खोज क प्रयार्स करनार् चार्हिए जिन्होंने कि उस काल को जीवन्त बनार्यार् थार्। रॉके ने किसी भी रार्जनीतिक व्यवस्थार् को उसी के ऐतिहार्सिक सन्दर्भ के अन्तर्गत ही समझने क प्रयार्स कियार्। ऐतिहार्सिक तथ्यों (जैसे संस्थार्, विचार्र आदि) की प्रकृति को समझने के लिए उनके ऐतिहार्सिक विकास और कालार्न्तर में उनमें आए हुए परिवर्तनों को समझनार् आवश्यक थार्। रॉके क यह मार्ननार् है कि ऐतिहार्सिक युगों को पूर्व-निर्धार्रित आधुनिक मूल्यों एवं आदर्शों की कसौटी पर नहीं परखार् जार्नार् चार्हिए बल्कि आनुभविक सार्क्ष्यों पर आधार्रित इतिहार्स (जैसार् कि वार्स्तव में हुआ थार्) के परिप्रेक्ष्य में उनक आकलन कियार् जार्नार् चार्हिए।

नीरस और उबार्ऊ इतिहार्स लेखन के लिए आलोचनार् क पार्त्र होने के बार्वजूद रॉके ने पवित्र रोमन सार्म्रार्ज्य के उदार्हरण के अनुरूप एक संगठित यूरोप की कल्पनार् की थी। उसके सभी ग्रंथों में यह कल्पनार् प्रतिबिम्बित होती है। अपने समकालीन इतिहार्सकारों की तुलनार् में रॉके क ऐतिहार्सिक दृष्टिकोण बहुत हटकर है। वह न तो रोमार्नी आन्दोलन क अनुकरण करतार् है, न दैवकृत इतिहार्स की रचनार् करतार् है और न ही सार्मार्जिक डाविनवार्द से सहमत होतार् है। वह वह बुद्धिवार्द व यथाथवार्द की महार्द्वीपीय परम्परार् क अनुगमन करतार् है। इतिहार्सकार के रूप में रॉके ने पूर्व-स्थार्पित सिद्धार्न्तों और धार्रणार्ओं को नकार कर मूल स्रोतों के श्रम-सार्ध्य उपयोग द्वार्रार् तथ्यों क बिनार् लिपार्-पुतार् मौलिक स्वरूप प्रस्तुत करतार् है।

रॉके हीगेल द्वार्रार् प्रतिपार्दित इतिहार्स दर्शन की कटु आलोचनार् करतार् है। उसक कहनार् है कि हीगेल ने इतिहार्स में मार्नव-क्रियार् की भूमिक की उपेक्षार् की है। जब कि मार्नव-क्रियार् की उपेक्षार् कर केवल विचार्र और अवधार्रणार् के आधार्र पर हम प्रार्मार्णिक इतिहार्स की रचनार् नहीं कर सकते।

लियोपोल्ड वॉन रॉके के इतिहार्स ग्रंथों के गुण एवं दोष

प्रार्थमिक स्रोतों पर आधार्रित वस्तुनिष्ठ इतिहार्स

नेबूर और रॉके क यह विश्वार्स थार् कि उन्होंने वैज्ञार्निक एवं वस्तुनिश्ठ इतिहार्स की रचनार् की है। उनक मत है कि इतिहार्सकार क यह दार्यित्व है कि वह प्रार्थमिक स्रोतों के आधार्र पर ऐतिहार्सिक तथ्यों की सत्यतार् क परीक्षण कर उन्हें ज्यों क त्यों प्रस्तुत करे। तथ्यों क वस्तुनिष्ठ पुनर्सर्जन रॉके मत के इतिहार्स लेखन की विशिष्टतार् है और इसमें इतिहार्सकार से यह अपेक्षार् की जार्ती है कि वह अपने काल के मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में भूतकाल की घटनार्ओं क आकलन नहीं करे।

रार्जनीतिक इतिहार्स को महत्व

चूंकि रॉके रार्जनीतिक शक्ति को इतिहार्स क प्रमुख प्रतिनिधि मार्नतार् है, इसलिए उसने अपने इतिहार्स ग्रंथों में सार्मार्जिक एवं आर्थिक बलों की उपेक्षार् कर रार्जार्ओं और अन्य रार्जनीतिक नेतार्ओं के कायोर्ं को, अर्थार्त् रार्जनीतिक इतिहार्स को सर्वार्धिक महत्व दियार् है। रॉके पर बीसवीं शतार्ब्दी के इतिहार्सकारों द्वार्रार् यह आरोप लगार्यार् जार्तार् है कि उसने रार्जनीतिक इतिहार्स, विशेषकर महार्-शक्तियों के रार्जनीतिक इतिहार्स को आवश्यकतार् से अधिक महत्व दियार् है परन्तु अपने लेखन में उसने सार्ंस्कृतिक इतिहार्स को भी महत्व दियार् है। ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंग्लैण्ड’ में उसने महार्रार्नी एलिज़ार्बेथ प्रथम के शार्सन काल के सार्हित्य पर एक सम्पूर्ण अध्यार्य लिखार् है।

रार्जनीतिक अनुदार्रतार्

अपने ग्रंथ – ‘दि ओरिजिन्स ऑफ़ दि वार्र ऑफ़ दि रिवोल्यूशन’ में रॉके ने फ्रार्ंसीसी क्रार्न्ति की भत्र्सनार् की है और उसको प्रशार् के सन्दर्भ में उपयुक्त नहीं मार्नार् है। प्रशार् के लिए वह सुदृढ़ रार्जतन्त्र को ही उपयुक्त मार्नतार् थार् और प्रशार् की प्रजार् से वह यह अपेक्षार् करतार् थार् कि वह प्रशियन रार्ज्य के प्रति स्वार्मिभक्त रहे। रॉके की यह मार्न्यतार् है कि शार्सन के सावभौमिक सिद्धार्न्त निरर्थक ही नहीं अपितु खतरनार्क भी हैं। प्रशार् के सन्दर्भ में वह सक्षम तथार् ईमार्नदार्र निरंकुश रार्जतन्त्र क पक्षधर है।

इतिहार्स में धर्म क स्थार्न

रॉके इतिहार्स को धर्म मार्नतार् है अथवार् धर्म और इतिहार्स के मध्य घनिश्ठ सम्बन्ध देखतार् है। वह इतिहार्स को ईश्वरीय लीलार् के रूप में देखतार् है।

इतिहार्स में व्यक्तित्व की भूमिका

रॉके इतिहार्स में महार्न विभूतियों की भूमिक को महत्वपूर्ण एवं निर्णार्यक मार्नतार् है।

सावभौमिक इतिहार्स

रॉके इतिहार्स लेखन में व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़तार् है। वह विभिन्न देशों के इतिहार्स की विशिष्टतार्ओं को सावभौमिक इतिहार्स की आवश्यक कड़ियार्ं मार्नकर सावभौमिक इतिहार्स की ओर बढ़तार् है।

रॉके की इतिहार्स विषयक अध्ययन-गोष्ठी

रॉके की अध्ययन गोष्ठी की तकनीक ने इतिहार्स के उन्नत विद्याथियों को ऐतिहार्सिक स्रोतों के आलोचनार्त्मक अध्ययन की प्रणार्ली में एक क्रार्न्ति क सूत्रपार्त कियार्।

इतिहार्सकार के रूप में लियोपोल्ड वॉन रॉके क आकलन

अधिकांश आधुनिक इतिहार्सकारों पर रॉके की तकनीक क स्पष्ट प्रभार्व देखार् जार् सकतार् है। रॉके तथार् उसके अनुयार्यियों – थियोडोर मॉमसे, जॉन गुस्टार्व ड्रॉयसेय, फ्रेडरिक विल्हेम शिरमार्कर और हेनरिक वॉन ट्रीट्स्के ने समीक्षार् एवं ऐतिहार्सिक प्रणार्ली के नियम स्थार्पित किए। जर्मन विचार्रधार्रार् ने इतिहार्स लेखन को एक व्यवसार्य के रूप में प्रतिष्ठित कियार् और उसने इतिहार्स के औपचार्रिक शार्स्त्रीय अध्ययन की स्थार्पनार् की। कैरोलिन होफ़री ने रॉके को इसक श्रेय दियार् है कि उसने 19 वीं शतार्ब्दी के उत्तराध में यूरोप और अमेरिक में इतिहार्स को एक स्वतन्त्र एवं प्रतिष्ठित विषय के रूप में मार्न्यतार् दिलार्ई। उसने अपनी कक्षार्ओं में अध्ययन गोष्ठी की प्रणार्ली प्रार्रम्भ की और अभिलेखीय शोध एवं ऐतिहार्सिक दस्तार्वेज़ों के विश्लेषण पर अपनी दृष्टि केन्द्रित की। इतिहार्स लेखन में पूर्ण तटस्थतार् क अनुचित दार्वार् करने के बार्वजूद रॉके आधुनिक युग के महार्नतम इतिहार्सकारों में प्रतिष्ठित होने क अधिकारी है। जी0 पी0 गूच के अनुसार्र समकालीन प्रार्मार्णिक स्रोतों को ऐतिहार्सिक पुनर्सर्जन के लिए सर्वथार् आवश्यक सिद्ध करनार्, इतिहार्स लेखन के क्षेत्र में रॉके की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। रॉके प्रथम इतिहार्कार थार् जिसने ऐतिहार्सिक नार्यकों के निजी पत्रों को ऐतिहार्सिक दस्तार्वेज़ के रूप में प्रयुक्त कियार्। 

रॉके ने इतिहार्स में वैयक्तिकतार् और विकास दोनों पर ही महत्व दियार्। हर ऐतिहार्सिक तथ्य, काल और घटनार् की अपनी वैयक्तिकतार् होती है और यह इतिहार्सकारों क काम है कि वह इनके सार्र को स्थार्पित करे। इस गुरुतर कार्य के लिए इतिहार्सकारों को उस विशिष्ट युग में स्वयं को उतार्रनार् होगार् और उसी समय के मूल्यों के अनुरूप उसक आकलन करनार् होगार्। 

रॉके शब्दों में – ‘इसके लिए इतिहार्सकारों को अपने निजी व्यक्तित्व की आहुति देनी होगी।’ रॉके इतिहार्स के विज्ञार्न क सूत्रधार्र है। रॉके ने किसी समकालीन ग्रंथ क परीक्षण करते समय उसके लेखक के पद, उसके द्वार्रार् अपने ग्रंथ की रचनार् हेतु स्रोत सार्मग्री एकत्र करने की उसकी सार्मथ्र्य, उसकी मार्नसिकतार् तथार् उसकी निष्ठार् क भी आलोचनार्त्मक परीक्षण कियार् और सार्थ ही सार्थ उसके द्वार्रार् उपलब्ध जार्नकारी क अन्य समकालीन गं्रथों में उपलब्ध जार्नकारी के सार्थ तुलनार्त्मक अध्ययन भी कियार्। रॉके ने स्वयं ईसार्ई होते हुए भी अन्य धर्मार्वलम्बियों की उपलब्धियों की कभी भी उपेक्षार् नहीं की। 

उसक कहनार् थार् – ‘मैं पहले इतिहार्सकार हूँ और बार्द में ईसार्ई हूँ।’ रॉके को इसक श्रेय जार्तार् है कि उसने इतिहार्स लेखन में आत्मपरकतार् के स्थार्न पर वस्तुनिश्ठतार् को महत्व दियार्। उसके लेखन में जार्तीय अथवार् धामिक पूर्वार्ग्रहों क कोई स्थार्न नहीं है। पूर्ण तटस्थतार् अपनार्ते हुए और पूर्वार्ग्रहों को नकारते हुए उसने तथ्यों को ज्यों क त्यों प्रस्तुत करने की एक ईमार्नदार्र कोशिश की है।

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