रॉलेक्ट एक्ट क्यार् है ?

प्रथम विश्वयुद्ध में भार्रतीयों ने अंगरेजी सार्म्रार्ज्य की सुरक्षार् के लिए बहुत अधिक सहयार्गे कियार्। उन्हें यह उम्मीद थी कि युद्ध समार्प्ति के बार्द ब्रिटिश सरकार भार्रतीय जनतार् की आकांक्षार्ओं को पूरार् करने क प्रयार्स करेगी। लेकिन सरकार की भार्रतीयों को स्वार्यत्ततार् देने की कोर्इ इच्छार् नहीं थी। वह तो देश में फैल रही रार्ष्ट्रीयतार् एवं क्रार्ंतिकारी भार्वनार् से भयभीत थी। इसीलिए उसने 1918 में सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षतार् में एक समिति नियुक्ति की। इस समिति की सिफार्रिशों के आधार्र पर दो विधेयक पश्े ार् किये गये। इन विधेयकों को तमार्म गैर भार्रतीय सदस्यों के विरोध के बार्वजूद पेश कर दियार् गयार्। इन विधेयकों अन्तर्गत यह व्यवस्थार् की गर्इ थी कि जिस व्यक्ति के रार्जद्रोही होने क संदेह जो उस पर नियंत्रण रखार् जार्ए, ऐसी किसी भी सार्मग्री के प्रकाशन को, जिससे जनतार् में रार्ष्े ार् की भार्वनार् फैल,े अपरार्ध मार्नार् जार्एगार्। वस्तुत: इस कानून के द्वार्रार् युद्ध काल में नार्गरिक अधिकारों पर जो प्रतिबंध लगार्ए गए थे उन्हे ही स्थार्यी बनार्ने क एक प्रयार्स थार्।

भार्रतीय जनतार् के सभी वर्गों में इन विधेयकों के प्रति गहरार् आक्रोश थार्, लेकिन इसके विरोध करने क जो ढंग गार्ँधीजी नें सुझार्यार् वह अनूठार् और व्यार्वहार्रिक थार्। इसकी सिफार्रिशों पर प्रतिक्रियार् करते हुए गार्ँधीजी ने कहार् कि ‘‘उन सिफार्रिशों ने मुझे चौंक दियार्।’’ यह सार्म्रार्ज्य के एक उस वफार्दार्र नार्गरिक के विचार्र परिवर्तन क बिन्दु थार् जिसको अब तक यह विश्वार्स थार् कि ‘‘सार्म्रार्ज्य कुल मिलार्कर भलाइ के लिए काम करने वार्ली शक्ति ही है। इस परिवर्तन ने उन्हें एक एसे ार् विद्रार्हे ी बनार् दियार् जिसको यकीन हो चुक थार् कि ब्रिटिश सार्म्रार्ज्य आज शैतार्नियत क प्रतीक है।’’ इसके विरोध में देशव्यार्पी हड़तार्ल क आहवार्न कियार् गयार्। एक सत्यार्पन सभार् क गठन कियार् गयार्। इस सभार् ने अपनार् समस्त ध्यार्न प्रचार्र सार्हित्य छार्पने एवं सत्यार्ग्रह की शपथ के लिए हस्तार्क्षर एकत्रित करने में लगार्यार्। स्वयं गार्ँधीजी भार्रत के तूफार्नी दौरे पर निकल पडे़। माच और अप्रैल के बीच उन्होंने बम्बर्इ (मुम्बर्इ), दिल्ली, इलार्हार्बार्द, लखनऊ और दक्षिण भार्रत के अनेक नगरों की यार्त्रार् की। देश व्यार्पी हड़तार्ल के लिए पहले 30 माच और बार्द में 6 अप्रैल की तिथि सुनिश्चित की गर्इ। हड़तार्ल के आहवार्न क आशार्तीत उत्तर मिलार्। देश के अनेक हिस्सों में इस हड़तार्ल को सफल बनार्ने की होड़ लग गर्इ। गार्ँधीजी ने लिखार् : ‘‘एक कोने से दूसरे कोने तक संपूर्ण भार्रत में, भार्रत के एक-एक गार्ंव में हड़तार्ल पूर्ण सफल रही।’’

दिल्ली में 30 माच को सत्यार्ग्रह सभार् आयार्ेि जत की गर्इ। पद्रर्शनों में हिन्दु-मुसलमार्न एक सार्थ शार्मिल हुए। यह रॉलेट एक्ट विरोधी आन्दोलन तीन चरणों में चलार्। 4 अप्रैल को जार्मार् मस्जिद में एकत्र मुसलमार्नों को आर्य समार्जी नेतार् श्रद्धार्पदं ने संबोधित कियार्। गार्ँधीजी के दिल्ली प्रवेश निषेध के समार्चार्र से यह अफवार्ह फैली कि उन्हें गिरफ्तार्र कर लियार् गयार् है इससे लोगों की भार्वनार्ए  भड़क उठी और 10 अप्रैल तक लगार्तार्र हड़तार्ल रही। बम्बर्इ में गार्ँधी स्वयं उपस्थित थे। अहमदार्बार्द में और अन्य स्थार्नों पर भी दंगे भड़क उठे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के विरूद्ध दमनार्त्मक कार्रवार्इयार्ं की।

पंजार्ब में इस आंदोलन की व्यार्पकतार् सर्वार्धिक रही। पूरे प्रार्ंत में कर्इ विरोध-सभार्ओं क आयोजन हो चुक थार्। 6 अप्रैल को लार्हौर और अन्य शहरों में हड़तार्ल हुर्इ। 10 अप्रैल को यह समार्चार्र मिलने पर कि गार्ँधीजी को गिरफ्तार्र कर लियार् गयार्। लार्हौर में जूलूस निकालार् गयार्। पुलिस ने इस भीड़ पर गोलियार्ं बरसाइ लेकिन अमृतसर में अधिक भयार्वह घटनार् घटने वार्ली थी। वहार्ँ 6 अपै्रल को हुर्इ हड़तार्ल शार्ंितपूर्ण रही। इसके पश्चार्त् 9 अपै्रल को हिंदुओं, मुसलमार्नों और सिक्कों क एक बड़ार् जुलूस निकालार् गयार्। अमृतसर 10 अप्रैल को सैफुˆीन किचलू और डार्. सत्यपार्ल की गिरफ्तार्री के खिलार्फ टार्उन हॉल और पोस्ट ऑफिस पर हमले किए गए, टेलिग्रार्फ तार्र काट दिए गए और अंग्रेजों को मार्रार्-पीटार् गयार्। औरतों पर भी हमले किए गये। शहर को सैनिक अधिकारियों को सौंप दियार् और नगर क प्रशार्सन जनरल डॉयर के हार्थों सौंप दियार् गयार्। डार्यर ने चेतार्वनी दी कि अगर सभार्एँ और जुलूस आयोजित किये गए तो उसके गंभीर परिणार्म होंगें।

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