रेकी चिकित्सार् क्यार् है ?

रेकी चिकित्सार् को पुनर्जीवित करने क श्रेय जार्पार्न के डॉ. मेकाओ उशुर्इ को हैं, जिन्होंने 19वीं शतार्ब्दी के मध्य में इस चिकित्सार् को नवजीवन प्रदार्न कियार्। डॉ. उशर्इ ने कैसे रेकी क पुनरूत्थार्न कियार् इससे संबंधित एक घटनार् है, जिसक विवरण है-

डॉ. उशुर्इ जार्पार्न के र्इसाइ कॉलेज में डीन के पद पर कार्यरत थे। एक दिन एक विद्यार्थ्री ने उनसे प्रश्न कियार् कि जिस प्रकार र्इसार्मसीह किसी रोगी को स्पर्श मार्त्र से रोगमुक्त कर देते थे, वर्तमार्न समय में ऐसार् क्यों नहीं होतार् है? उनके द्वार्रार् उपयोग में ली गर्इ उपचार्र की तकनीकों को प्रयोग आज हम कर पार्ने में असमर्थ क्यों है? क्यार् आप (डॉ. उशुर्इ) वैसार् करने में सक्षम है? डॉ. उशुर्इ के अन्तर्मन को यहार् छू गर्इ। वे उस समय विद्यार्थ्री के उस प्रश्न क कोर्इ जवार्ब नहीं दे सके। इसलिए जार्पार्न के नियम के अनुसार्र उन्होंने अपने पद से त्यार्गपत्र दे दियार् और यह संकल्प कियार् कि जब तक वे उस व़िद्यार्थ्री द्वार्रार् पूछे गये प्रश्न क सटीक उत्तर प्रार्प्त नहीं कर लेंगे तब तक र्इसाइ मत के गहन अध्ययन में लगे रहेंगे।

डॉ. उशुर्इ अपनी इस अनुसंधन यार्त्रार् में अमेरिक के शिकागों शहर में पहुँचे और वहार्ँ पर उन्होंने आत्मविद्यार् यार् अध्यार्त्मविद्यार् में डॉक्ट्रेट की उपार्धि ग्रहण की। डॉ. उशुर्इ ने अनेक र्इसाइ एवं चीनी धर्मग्रन्थों क अध्ययन कियार् किन्तु फिर भी उन्हें अपने प्रश्न क संतोषजनक उत्तर नहीं मिलार्, किन्तु इससे डॉ. उशुर्इ निरार्श नहीं हुये, वरन इसके बार्द वे उत्तर भार्रत आयें और उन्होंने संस्कृत ग्रंथों क अध्ययन कियार्। इन संस्कृत ग्रन्थों में उन्हें कुछ संकेत प्रार्प्त हुये।

इसके बार्द वे पुन: जार्पार्न आ गये और उन्होंने बौद्ध ग्रन्थ के सूत्रों में संस्कृत के प्रतीकों एवं सूत्रों की खोज करनार् प्रार्रंभ कियार्। इन सूत्रों हमें उन्हें अपने प्रश्नों के समार्धार्न नजर आ रहे थे। इस दौरार्न डॉ. उशुर्इ जार्पार्न के क्योटो के मठ में रह रहे थे। बौद्ध भिक्षु से वातार्लार्प करने के बार्द वे अपने शहर से 16 मील की दूरी पर स्थित कुरीयार्मार् नार्मक पहार्ड़ी पर चले गये और यहार्ँ 21 दिनों तक इन्होंने एकान्त में कठोर तपस्यार् की इस सार्धनार् क उद्देश्य ब्रह्मार्ण्डीय उर्जार् के सार्थ सम्पर्क स्थार्पित करनार् थार्। डॉ. उशुर्इ ने सूत्रों एवं प्रतीकों के रहस्य क पतार् करने के लिये संस्कृत के प्रतीकों एवं सूत्रों को लिख भी रखार् थार्। 21 दिनों क उपवार्स रखकर डॉ. उशुर्इ अपनी कठोर तपसार्धनार् में लीन हो गये और वे सतत् उन संस्कृत के मंत्रों क जप भी करते रहे। डॉ. उशुर्इ ने पर्वत की चोटी पर पहुँचने के बार्द अपने पार्स छोटे-छोटे 21 पत्थर के टुकड़ों को रखार्। आपके मन में जिज्ञार्सार् उत्पन्न हो रही होगी कि इन पत्थर के टुकड़ों को रखने के पीछे क्यार् उद्देश्य थार्। इसक प्रयोजन यह थार् कि जैसे-जैसे सार्धनार् क एक दिन पूरार् हो जार्तार् थार् वैसे-वैसे डॉ. उशुर्इ एक-एक पत्थर फेंक देते थे। सार्धनार् के 20 दिन बीत गये और 21 वे दिन की सुबह तक भी डॉ. उशुर्इ को अपनी सार्धनार् क अपेक्षित परिणार्म नहीं मिलार् किन्तु अभी सुरज पूरी तरह नहीं निकलार् थार् और रार्ित्रार् क अंधेरार् थार्। इसी समय डॉ. उशुर्इ को एक तीव्र प्रकाश पुंज अत्यन्त तीव्रगति से अपनी ओर आतार् हुआ दिखार्यी दियार् और उन्होंने भार्गने क प्रयार्स कियार् किन्तु किसी कारण वश वे रूक गये।

आपको बतार् दें कि जैसे-जैसे यह प्रकाश पुंज डॉ. उशुर्इ की ओर बढ़ रहार् थार्, वैसे-वैसे उसक आकार और अध्कि बढ़तार् ही जार् रहार् थार् और अन्तत: वह प्रकाश समूह डॉ. उशुर्इ के मार्थे के मध्य में (भू्रमध्य यार् आज्ञार्चक्र क स्थार्न) टकरार्यार्। यह प्रकाश पुंज त्रिनेत्र चक्र थार्। प्रकाश पुंज के टकरार्ने से डॉ. उशुर्इ को ऐसार् लगार् की अब तो मौत की घड़ी आ गर्इ है और इसके बार्द अचार्नक एक तेज विस्फोट के सार्थ उन्हें आकाश में नीले, गुलार्बी इत्यार्दि अनेक रंगों वार्ले असंख्य चमकीले दिखार्यी दिये और अत्यन्त बड़े आकार में उन्हें श्वेत प्रकाश दिखार्यी दियार् और देखते ही देखते उनकी दृष्टि के समक्ष एक चमकीलार् स्वर्णिम प्रतीक आकार लेने लगार्, जो संस्कृत ग्रन्थ, में दियार् गयार् थार् और अपनी सार्ध्नार् के समय जिसक वे नियमित जप करते थे। उस प्रतीक को देखकर डॉ. उशुर्इ ने अत्यन्त धीमे श्वर में कहार्-’’हार्ँ मुझे यार्द है’’ इसके बार्द वे बेहोश हो गये। यही से उन्हें ब्रह्मार्ण्डीय प्रार्ण उर्जार् के उपयोग की विधि क ज्ञार्न प्रार्प्त हुआ, जिसे ‘रेगी’ क नार्म दियार् गयार्।

अब आप जार्न गये होंगे कि रेकी विद्यार् क जन्म किस प्रकार हुआ।

जब डॉ. उशुर्इ होश में आये तो सूर्योदय हो चुक थार्। आप को यह जार्नकर आश्चर्य हो सकतार् है कि 21 दिनों के उपवार्स के बार्द भी डॉ. उशुर्इ अपने भीतर किसी प्रकार की कमजोरी महसूस नहीं कर रहे थे, वरन् उन्हें स्वयं के भीतर पहले से कहीं अधीक उर्जार् एवं स्फूर्ति क अहसार्स हो रहार् थार्।

सार्धनार् पूरी करने के बार्द डॉ. उशुर्इ जब पहार्ड़ी से नीचे उतर रहे थे तो उनके पैर के अंगूठे में चोट लग गर्इ और रक्त बहने लगार्। इसलिये उन्होंने अपने हथेली से अंगूठे को ढक दियार् और जैसे ही उन्होंने हथेली रखी खून बहनार् एकदम से रूक गयार् और दर्द भी दूर हो गयार्। यह देखकर डॉ. उशुर्इ को अत्यन्त आश्चर्य और खुशी हुयी। वे यह अनुभव कर चुके थे कि यह उसी विश्वव्यार्पी प्रार्ण उर्जार् क प्रभार्व है। यह रेकी क पहलार् उपचार्रार्त्मक प्रयोग थार्।

लम्बे समय तक उपवार्स के कारण डॉ. उशुर्इ को कड़ी भुख लगी थी। इसलिये वे भोजन हेतु एक धर्मशार्लार् में गये। धर्मशार्लार् के मार्लिक ने डॉ. उशुर्इ की वेशभूषार् को देखकर यह अनुमार्न लगार् लियार् कि इन्होंने लम्बे समय तक उपवार्स कियार् है। अत: उन्होंने उपवार्स के बार्द हल्क नार्श्तार् लेने की सलार्ह दी किन्तु डॉ. उशुर्इ ने भरपेट भोजन कियार् और इससे उन्हें किसी प्रकार की परेशार्नी नहीं हुयी। पार्ठकों, यह बस प्रचण्ड जीवनीशक्ति क ही कमार्ल थार्। इस प्रकार ये रेकी क दूसरार् चमत्कारिक प्रभार्व थार्।

रेकी क तीसरार् प्रयोग धर्मशार्लार् के मार्लिक की पौत्री पर कियार् गयार्। उसके दार्ंतों में लम्बे समय से दर्द एवं सूजन थी। जैसे ही डॉ. उशुर्इ ने उसके गार्ल को स्पर्श कियार् वैसे ही दर्द के सार्थ सूजन भी दूर हो गयी। यह रेकी की तीसरी उपचार्र प्रक्रियार् थी।

पार्ठकों, इसके बार्द जब डॉ. उशुर्इ अपने मठ में वार्पस आये तो उनक मित्र जो बौद्ध भिक्षुक थार्, वह गठियार् रोग से पीड़ित थार् डॉ. उशुर्इ ने उसके पार्स बैठकर अपने दोनों हार्थ अपने मित्र के शरीर पर रख दिये। ऐसार् करने पर उनके मित्रार् को अत्यन्त आरार्म महसूस हुआ और कुछ ही समय में वह स्वस्थ हो गयार्। इस प्रकार डॉ. उशुर्इ निरन्तर इस रेकी विद्यार् क प्रयोग करके असंख्य लोगों को ठीक करते गये।

इसके उपरार्न्त डॉ. उशुर्इ क्योटो शहर के स्लम क्षेत्र के भिक्षुगृह में गये और उन्होंने भिखार्रियों की सेवार् करने क निर्णय लियार्। उस भिक्षुगृह में सार्त दिन तक रहकर उन्होंने उनके रोगों क उपचार्र कियार्। उपचार्र के दौरार्न डॉ. उशुर्इ ने देखार् कि वही जार्ने-पहचार्ने लोग बार्र-बार्र उनके पार्स क्यों आते है? कारण पूछने पर उन्हें भिखार्रियों ने जवार्ब दियार् कि गृहस्थ आश्रम में रहकर जीवन व्यतीत करने से कहीं अधिक अच्छार् भीख मार्ँगनार् है। यह बार्त सुनकर डॉ. उशुर्इ को अत्यन्त दु:ख हुआ और उन्हें लगार् कि रेकी के कुछ नियम एवं सिद्धार्न्त बनार्नार् भी अनिवाय है। अत: उन्होंने रेकी के नियमों एवं प्रयोगों को विधिवत-विकसित कियार्।

इसके बार्द जब डॉ. उशुर्इ भिक्षुगृह से क्योटो वार्पस आ गये और एक दिन एक बहुत बड़ी मशार्ल जलार्कर गली के अन्दर खड़े हो गये। पार्ठकों, आप जार्ननार् चार्ह रहे होंगे कि डॉ. उशुर्इ ने ऐसार् क्यों कियार् होगार्। आपके समार्न ही यह जिज्ञार्सार् रार्हगीरों को भी हुयी और उन्होंने डॉ. उशुर्इ से जब इसक कारण पूछार् तो उन्होंने कहार् कि ‘‘मुझे ऐसे लोगों की खोज है, जो वार्स्तव में सत्य क प्रकाश प्रार्प्त करनार् चार्हते हैं।’’ उनके कहने क आशय थार् कि जो वार्स्तव में उस विश्वव्यार्पी प्रार्ण उर्जार् से अपनार् सम्पर्क स्थार्पित करनार् चार्हते है, ऐसे लोग मुझे चार्हिये। इस प्रकार डॉ. उशुर्इ ने रेकी के प्रचार्र के लिये अपनार् सर्वस्व समर्पित कर दियार् और इसे विश्वव्यार्पी बनार्यार् और अपने शिष्यों को इसक विधिवत् प्रशिक्षण भी प्रदार्न कियार्। कुछ समय पश्चार्त् डॉ. उशुर्इ ने देह क त्यार्ग कर दियार्। उनकी पाथिव देह को क्योटो के मंदिर में दफन कियार् गयार्। पार्ठकों, आपके जार्नकारी के लिये बतार् दें कि उनकी कब्र पर जो पत्थर लगे हुये हैं, उन पर डॉ. उशुर्इ की सम्पूर्ण जीवन गार्थार् को खोदार् गयार् है। डॉ. उशुर्इ कितने अधिक सम्मार्नित एवं प्रसिद्ध हो चुके थे, इस बार्त क अनुमार्न इसी से लगार्यार् जार् सकतार् है कि स्वयं जार्पार्न के सम्रार्ट ने उनकी कब्र पर जार्कर अपने श्रद्धार्सुमन अर्पित किये थे।

डॉ. उशुर्इ के शरीर छोड़ने के बार्द डॉ. हयार्शी जो उनके नजदीकी सहयोगी थे, वे उत्तरार्धिकारी बने। इस प्रकार ये दूसरे रेकी गै्रंड मार्स्टर कहलार्ये। डॉ. हयार्शी सन् 1940 तक टोकियो में सुचार्रू रूप से रेकी क्लिनिक क संचार्लन करते रहें, जहार्ँ पर सार्मार्न्य रोगियों के सार्थ-सार्थ गंभीर रोगों क इलार्ज भी कियार् जार्तार् है। जब कोर्इ व्यक्ति गंभीर रोग से ग्रसित होतार् थार् तो दिन-रार्त रेकी द्वार्रार् उसक इलार्ज होतार् थार् किन्तु धीरे-धीरे द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभार्व के कारण एवं 10 मर्इ 1941 में डॉ. हयार्शी की मृत्यु के कारण इस क्षेत्र में आगे विकास की प्रक्रियार् थम सी गर्इ। पार्ठकों, डॉ. हयार्शी की मृत्यु के उपरार्न्त श्रीमती हवार्यों उनकी उत्तरार्धिकारिणी बनी जिनक जन्म सन् 1900 में हवाइ द्वीप पर हुआ थार्। इनके मार्तार्-पितार् जार्पार्न के थे, लेकिन फिर भी उन्हें अमेरिक की नार्गरिकतार् प्रार्प्त थी। श्रीमती टकाटार् विधवार् थी एवं दो बच्चों की मार्ँ भी, सार्थ ही वह अनेक गंभीर रोगों से पीड़ित थी। बीमार्री के दौरार्न श्रीमती टकाटार् को आन्तरिक प्रेरणार् मिली कि उन्हें जार्पार्न में अपनार् उपचार्र करवार्नार् चार्हिये।

इसी अन्त: प्रेरणार् से प्रेरित होकर वे जार्पार्न पहुँची। उपचार्र के दौरार्न जब वह ऑपरेशन के लिये टेबल पर लेटी हुयी थी तो उन्होंने महसूस कियार् कि एकमार्त्र ऑपरेशन ही रोगों क इलार्ज नहीं है। इसलिये उनक ऑपरेशन करवार्नार् उतनार् आवश्यक नहीं है। इसलिये उन्होंने ऑपरेशन के अतिरिक्त अन्य चिकित्सार् पद्धतियों के बार्रे में डॉक्टर से विचार्र-विमर्श कियार्। डॉक्टरों ने उन्हें डॉ. हयार्शी के रेकी क्लिनिक के बार्रे में बतार्यार् और उपचार्र के लिये वहार्ँ जार्ने क सुझार्व दियार्। श्रीमती टकाटार् रेकी क्लिनिक पहुँची, जहार्ँ पर दो रेकी चिकित्सक प्रतिदिन उनक रेकी द्वार्रार् इलार्ज करते थे। नियमित रेकी चिकित्सार् के द्वार्रार् वे कुछ महीने में ही पूरी तरह स्वस्थ हो गर्इ।

श्रीमती टकाटार् जार्पार्न में डॉ. हयार्शी की लगभग 1 वर्ष तक शिष्यार् रही। इसके बार्द वह पुन: अपने बच्चों के सार्थ हवाइ द्वीप वार्पस आ गर्इ। सन् 1938 में डॉ. हयार्शी हवाइ द्वीप आये और उन्होंने श्रीमती टकाटार् को रेकी मार्स्टर रूप में घोषित कर दियार्। श्रीमती टकाटार् ने हवाइ में रहकर अनेक लोगों क रेकी विधि के मार्ध्यम से इलार्ज कियार्। जब श्रीमती टकाटार् अपनी उम्र के सार्तवें दशक में थी, तब उन्होंने रेकी मार्स्टर बनार्नार् प्रार्रंभ कर दियार् थार्। 11 दिसम्बर सन् 1980 में श्रीमती टकाटार् की भी मृत्यु हो गर्इ। श्रीमती टकाटार् के पीछे कनार्डार् तथार् अमेरिक में कुल मिलार्कर 22 रेकी ग्रैंड मार्स्टर थे। आज पूरे विश्व में लगभग 4 हजार्र रेकी मार्स्टर हैं, जो रेकी के मार्ध्यम से लोगों क उपचार्र करके इस विद्यार् के प्रचार्र-प्रसार्र में अपनार् योगदार्न दे रहे हैं। उपर्युक्त विवेचन के आधार्र पर आप समझ गये होंगे कि, किस प्रकार रेकी विद्यार् क जन्म एवं विकास हुआ।

रेकी चिकित्सार् –

‘रेकी’ शब्द मूलत: जार्पार्नी है, जो ‘रे’ (REI) तथार् ‘की’ (KI) इन दो शब्दों से मिलकर बनार् है। जार्पार्नी भार्षार् के अनुसार्र रे क अर्थ है-सावभौमिक यार् विश्वव्यार्पी अथवार् ब्रह्मार्ण्डव्यार्पी अर्थार्त- जो सम्पूर्ण ब्रह्मार्ण्ड में यार् सभी जगह विद्यमार्न हो तथार् ‘की’ से तार्त्पर्य है-उर्जार् यार् शक्ति। इस प्रकार रेकी क अर्थ है- विश्वव्यार्पी ऊर्जार् यार् सावभौमिक शक्ति। भिन्न-भिन्न देशों में इस जीवनीशक्ति को भिन्न-भिन्न नार्मों से पुकारते हैं। भार्रतीय इसे ‘प्रार्ण’ के रूप में जार्नते हैं तो चीनी भार्षार् में इसी को ‘ची’ नार्म से पुकारते है, मुस्लिम देशों में इसी उर्जार् को बर्क एवं रूसी विद्वार्न इसे बार्चोप्लार्क्मिक उर्जार् क नार्म देते है। कहने क आशय यह है कि उर्जार् यार् शक्ति मौलिक रूप से एक ही है, जिसके नार्म अलग-अलग हैं। क्यार् आप जार्नते हैं कि रेकी इस सृष्टि के कण-कण में अर्थार्त चेतन के सार्थ-सार्थ जड़ पदाथों में भी विद्यमार्न है। इसी कारण इसे सावभौमिक कहार् गयार् है। यह विश्वव्यार्पी उर्जार् अनार्दि तथार् अनन्त है। यह कभी भी नष्ट न होने वार्ली अपरिमित उर्जार् है। विभिन्न प्रयोगों के आधार्र पर यह सिद्ध हो चुक है कि उर्जार् कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन उसक रूपार्न्तरण होतार् है अर्थार्त् वह एक रूप से दूसरे रूप में बदल जार्ती है। जैसार् कि आप जार्नते भी होंगे नोबल पुरस्कार से सम्मार्नित डॉ. अल्बर्ट आइन्सटार्इन ने एक समीकरण दियार्, जिसके अनुसार्र निरन्तर उर्जार् क पदाथ में और पदाथ क उर्जार् में रूपार्न्तरण होतार् रहतार् है।

प्रार्चीन काल से ही उपचार्र की विभिन्न तकनीकें इस ब्रह्मार्ण्डव्यार्पी जीवनशक्ति के स्थार्नार्न्तरण यार् प्रक्षेपण पर आधार्रित रही है। सम्पूर्ण ब्रह्मार्ण्ड के जीवन एवं पोषण के कारण इस जीवनीशक्ति क सदियों तक उपचार्र में प्रयोग कियार् जार्तार् रहार् और आज भी जार्री है। महार्त्मार् बुद्ध, सन्त र्इसार्, स्वार्मी विवेकानंद एवं अन्य आध्यार्त्मिक गुरूओं एवं महार्त्मार्ओं से हम भली-भार्ँति परिचित हैं, जिनके दिव्य स्पर्श मार्त्र से प्रार्णी स्वयं में नवजीवन क संचार्र अनुभव करते थे। यह सब इसी प्रार्ण ऊर्जार् के प्रभार्व को परिलक्षित करते है। जो व्यक्ति जितनार् अधिक प्रार्णवार्न् यार् जीवनीशक्ति से भरपूर होतार् है, वह उतनार् ही अध्कि शार्रीरिक, मार्नसिक, सार्मार्जिक और आध्यार्त्मिक स्तर पर स्वस्थ होतार् है। सार्हस, तेजस्वितार्, आत्मबल, स्फूर्ति, एकाग्रतार्, आत्मीयतार् इत्यार्दि गुण सहज ही उसमें विकसित होते हैं।

क्यार् आपने कभी सोचार् है कि रार्त्रि में ठीक प्रकार से नींद आने के बार्द जब हम सुबह उठते हैं तो क्यों स्वयं को तरोतार्जार् महसूस करते हैं। देखिये, इसक कारण यह है कि दिन-भर कार्य करने के कारण हमार्रार् शरीर एवं चेतन मन रार्त्रि में विश्रार्म करतार् है अर्थार्त- सो जार्तार् है किन्तु हमार्रार् अचेतन मन निद्रार् की अवस्थार् में भी कार्य करतार् है और ब्रह्मार्ण्ड से इतनी उर्जार् ग्रहण कर लेतार् है जिससे शरीर की टूट-फूट की मरम्मत हों सके और आवश्यक कार्यों के लिये वह ऊर्जार् शरीर में संचित हो सके। कहने क आशय यह है कि उर्जार् ही हमार्रे जीवन क आधार्र है। इसी से हमार्री समस्त गतिविधियार्ँ संचार्लित होती है। हम स्वयं भी इस ऊर्जार् से ही बने हैं। हमार्रार् स्थूल यार् भौतिक शरीर और कुछ भी नहीं वरन् घनीभूत उर्जार् ही है। इस स्थूल शरीर के अतिरिक्त हमार्रार् एक ‘उर्जार् शरीर’ भी होतार् है, जिसे रूस के विद्वार्नों ने ‘बार्योप्लार्ज्मिक बॉडी’ कहार् है। हम सार्मार्न्य आँखों से इस उर्जार् शरीर को नहीं देख सकते। ध्यार्न की उच्च अवस्थार् में इसे देखार् जार् सकतार् है। वर्तमार्न समय में किर्लिचन फोटोग्रार्फी के मार्ध्यम से भी इस ऊर्जार् शरीर को देखनार् संभव है।

रेकी हमार्रे उर्जार् शरीर से जिसे आभार्मण्डल (ऑरार्) भी कहार् जार्तार् है, भौतिक शरीर में प्रवेश करती है। उर्जार् शरीर में विद्यमार्न चक्र एवं नार्ड़ियार्ँ इस प्रार्ण उर्जार् को ग्रहण करते हैं तथार् वहार्ँ से यह भौतिक शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचती हैं। योग-दर्शन के अनुसार्र हमार्रे शरीर में 72,000 नार्ड़ियार्ँ पार्यी जार्ती है, जिनमें प्रार्ण क प्रवार्ह होतार् रहतार् है। एक्यूपंक्चर एवं एक्यूप्रेशर में इन्हीं नार्ड़ियों को मेरीडियन्स क नार्म दियार् गयार् है। इन नार्ड़ियों में जब तक प्रार्ण क सुचार्रू प्रवार्ह होतार् रहतार् है तब तक व्यक्ति स्वस्थ्य रहतार् है और जैसे ही प्रार्ण प्रवार्ह में अवरोध आतार् है, वैसे ही प्रार्ण ऊर्जार् के असंतुलन के कारण व्यक्ति रोगग्रस्त हो जार्तार् है क्योंकि प्रार्ण ऊर्जार् कहीं कम और कहीं ज्यार्दार् हो जार्ती है। अवरोध से पहले नार्ड़ी में प्रार्ण ऊर्जार् क घनत्व अधिक हो जार्तार् है और अवरोध के बार्द कम। इस प्रकार रोग यार् बीमार्री ऊर्जार् शरीर में पहले आती है और बार्द में स्थूल यार् भौतिक शरीर में। अत: यदि उर्जार् शरीर में प्रार्ण के अवरोध क किसी तरीके से पतार् लगार् लियार् जार्ये तो स्थूल शरीर को रोगग्रस्त होने से बचार्यार् जार् सकतार् है। रेकी के द्वार्रार् इसी प्रार्ण ऊर्जार् क संतुलन कियार् जार्तार् है। शरीर के जिस भार्ग में जितनी उर्जार् की आवश्यकतार् होती है, उतनी ऊर्ज वहार्ँ तक स्थार्नार्ंतरित की जार्ती है। पार्ठक्ों, आपकी जार्नकारी के लिये बतार् दें कि रेकी की अपनी चेतनार् एवं बुद्धि होती है। इसक आशय यह है कि उसे यह ज्ञार्त होतार् है कि आपके किस चक्र नार्ड़ी एवं उनसे प्रभार्विक अंगों में ऊर्जार् कम है। अत: वह स्वत: उसी ओर प्रवार्हित होनार् शुरू कर देती है और जब अपेक्षित उर्जार् पहुँच जार्ती है, तो स्वत: उसक प्रवार्ह रूक भी जार्तार् है। रेकी मार्स्टर रेकी क केवल मार्ध्यम होतार् है और वह स्वयं की ऊर्जार् नहीं वरन् ब्रह्मार्ण्डीय ऊर्जार् को प्रक्षेपित करने क चैनल बनतार् है। अत: रेकी को घटार्नार् यार् बढ़ार्नार् रेकी चिकित्सक के बस की बार्त नहीं है वरन रेकी स्वयं चेतनार्युक्त होने के कारण ऊर्जार् क संतुलन कर व्यक्ति को स्वस्थ्य बनार्ती है।

रेकी के सन्दर्भ में आपको यह तथ्य भी भली-भार्ँति जार्न लेनार् चार्हिये कि यह न तो कोर्इ सम्मोहन विद्यार् है, न ही कोर्इ तार्ंत्रिक शक्ति, न ही किसी सम्प्रदार्य से इसक कोर्इ संबंध है, वरन यह तो एक पवित्र जीवनशैली है, जिसके अपने नियम एवं सिद्धार्न्त हैं, जिनको अपनार्कर हम न केवल रोगों से मुक्त होते है, वरन अपनार् मार्नसिक, भार्वनार्त्मक, सार्मार्जिक एवं आध्यार्त्मिक विकास भी कर सकते है।

‘‘प्रेम के समार्न ‘रेकी’ भी एक अहसार्स है। प्रेम ही ऐसी शक्ति है जो हमें इस पूरी सृष्टि के सार्थ एकात्मभार्व से मिलार्ती है। प्रेम में ही आत्मार् क मूल वार्स होतार् है। व्यार्पक अर्थों में ‘रेकी’ चिकित्सार् पद्धति है। इससे शरीर के विकारों क ही इलार्ज नहीं कियार् जार्तार् बल्कि आध्यार्त्मिक विकास भी होतार् है। ‘रेकी’ चिकित्सार् पद्धति क धर्म, भूत-प्रेत, रहस्य विद्यार्, तंत्र-मंत्र से कोर्इ वार्स्तार् नहीं है। न ही यह सम्मोहन विद्यार् है और न ही कोर्इ अन्य मनोवैज्ञार्निक तकनीक। (मोहन मक्कड़, रेकीविद्यार्, 2004)

‘‘रेकी मन एंव इच्छार् शक्ति से निर्देशित शक्ति है, जिसे प्यार्र भरे दिल, सहार्नुभूति भरे इरार्दों और पूरे मनोयोग से प्रेषित कियार् जार्ये तो हमेशार् अपने उद्देश्य में सफलतार् मिलती है। रेकी सिर्फ एक चिकित्सार् पद्धति ही नहीं है, पूरार् जीवन दर्शन है, इसके अपने सिद्धार्न्त है, जिनक पार्लन कर आप अपने जीवन में अपने इच्छित उद्देश्य प्रार्प्त कर सकते हैं, चार्हे फिर वह आरोग्य, सफलतार्, आपसी संबंधों की मधुरतार्, व्यार्पार्र वृद्धि ही क्यों न हों’’ (डॉ. देवेन्द्र जैन, रेकी से चिकित्सार् कैसे करे?, 2005)

‘‘रेकी दो जार्पार्नी शब्दों, रे और की से मिलकर बनार् है। रे क मतलब है यूनिवर्सल यार् सम्पूर्ण ब्रह्मार्ण्ड में व्यार्प्त और की क अर्थ है-शक्ति यार् उर्जार्। रेकी एक स्वयं चेतनार्युक्त शक्ति है, जो जड़ एवं चेतन दोनों में मौजूद है।’’ (डॉ. देवेन्द्र जैन, रेकी से चिकित्सार् कैसे करे?, 2005)

‘‘रेकी शब्द दो शब्दों से मिलकर बनार् है ‘रे’ (REI) तथार् ‘की’ (KI)। रे शब्द क अर्थ-’सावभौम’, ‘ब्रह्मार्ण्ड, तथार् की शब्द क अर्थ- ऊर्जार् है।’’ (मोहन मक्कड़, रेकी विद्यार्, 2004)

‘‘ रेकी मूलत: जार्पार्नी भार्षार् क शब्द है, जिसक अर्थ है-सावभौमिक जैव उर्जार् अथवार् सर्वव्यार्पी जीवनशक्ति। यह जैवशक्ति सृष्टि के सभी जीवधार्रियों में सक्रिय होती है और विद्यमार्न रहती है।’’ (डॉ. आर. एस. ‘विवेक’, वैकल्पिक चिकित्सार्, 2004)

‘‘रेकी एक जार्पार्नी शब्द है, जिसक अर्थ है- जीवन उर्जार्। यह वैकल्पिक चिकित्सार् की एक प्रार्कृतिक प्रक्रियार् है।’’ (डॉ. रार्जकुमार्र प्रुथी, वैकल्पिक चिकित्सार् पद्धतियार्ँ, 2005)

‘‘ रेकी हमें स्वार्स्थ्य से परे पूर्णतार् की ओर, पवित्रतार् की ओर ले जार्ती है। यह वार्स्तव में पवित्रतार्वार्दी उपचार्र विधि है। रेकी उपचार्र हमार्रे असीम उपचार्रों को विलीन कर देतार् है और हमें स्व के सभी पक्षों के स्वीकार की दिशार् में अग्रसर करतार् है। यह रूपार्न्तरण की वह अवस्थार् है, जिसमें हम अपने स्व तथार् स्व परिवेश के सार्थ सार्मंजस्य एवं संतुलन सार्ध लेते है।’’ (डॉ. आर. एस. ‘विवेक’, वैकल्पिक चिकित्सार्, 2004)

आप सोच रहे होंगे कि हम किस तरह इस रेकी विद्यार् से लार्भार्न्वित हो सकते है? इसके निम्न दो तरीकों में से आप किसी को भी अपनार् सकते हैं- (1) स्वयं रेकी चिकित्सक के पार्स उपचार्र के लिये जार्नार्। (2) रेकी विद्यार् क विधिवत अध्ययन करके।

आइये इन दोनों उपार्यों पर विस्तार्र से प्रकार डार्लते हैं-

  1. स्वयं रेकी चिकित्सक के पार्स उपचार्र के लिए जार्नार् – रेकी विद्यार् से लार्भार्न्वित होने क प्रथम उपार्य यह है कि जो व्यक्ति रेकी मार्स्टर अर्थार्त रेकी के विशेषज्ञ हों, जिन्होंने विधिवत् इस विद्यार् क प्रशिक्षण प्रार्प्त कियार् है, आप उनके पार्स उपचार्र के लिये जार् सकते हैं। रेकी लेने के उपरार्न्त व्यक्ति काफी रार्हत महसूस करतार् है।
  2. रेकी विद्यार् क विधिवत् अध्ययन करके – दूसरार् उपार्य यह है कि जो व्यक्ति इस विद्यार् में विशेष रूचि रखते हैं वे रेकी से संबंधित विभिन्न पार्ठ्यक्रमों में सम्मिलित होकर इसक विधिवत् प्रशिक्षण प्रार्प्त कर सकते हैं। जब तक इस विद्यार् क विधिवत् प्रशिक्षण प्रार्प्त नहीं कियार् जार्तार्, तब तक व्यक्ति रेकी मार्स्टर नहीं बन सकतार्।

उपर्युक्त विवरण के आधार्र पर आप समझ गये होंगे कि हम किस तरह इस रेकी विद्यार् क अपने जीवन में उपयोग कर सकते हैं।

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